Download App

बौलीवुड में सैरोगेसी और टैस्टट्यूब बेबी का बढ़ता चलन

हाल ही में प्रसिद्ध ऐक्टर जीतेंद्र के सुपुत्र तुषार कपूर ने कुंआरा बाप बन कर पूरी फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया. तुषार कपूर के अनुसार वे पिता का सुख पाना चाहते थे और उस के लिए ज्यादा इंतजार भी नहीं करना चाहते थे लिहाजा, उन्होंने सैरोगेसी का सहारा लिया. वे बच्चों को बहुत पसंद करते हैं, लेकिन उन का फिलहाल शादी का कोई इरादा नहीं है. दरअसल, जब उन की डाक्टर फिरोजा पारीख से मुलाकात हुई तो उन्होंने उन्हें आईवीएफ के जरिए सैरोगेसी के सहारे बच्चा पैदा करने का सुझाव दिया. उन्हें डाक्टर का यह सुझाव पसंद आया और उन्होंने उस को फौलो किया. फाइनली वे एक बच्चेके पिता बन गए हैं जिस का नाम उन्होंने लक्ष्य रखा है. फिल्म इंडस्ट्री में कई  ऐसे लोग हैं जिन्होंने किराए की कोख यानी सैरोगेसी और टैस्टट्यूब बेबी जैसी नई मैडिकल तकनीक के जरिए बच्चों को जन्म दिया है.

एक समय था जब मातापिता इस तकनीक को गलत मानते थे और कुछ लोगों की यह भी धारणा थी कि मैडिकल साइंस के द्वारा जन्मे बच्चे स्वस्थ नहीं होते और उन की उम्र भी ज्यादा नहीं होती. लेकिन धीरेधीरे मैडिकल साइंस ने साबित कर दिया कि मैडिकल साइंस के जरिए न सिर्फ बच्चे जन्मे जा सकते हैं बल्कि वे स्वस्थ भी होते हैं. इसी के चलते काफी साल पहले सुभाष घई ने टैस्टट्यूब के जरिए एक बच्ची को जन्म दिया था जिस का नाम है मुसकान.

सुभाष घई को भी बच्चे का सुख प्राप्त करने में मुश्किलें आ रही थीं जिस के चलते उन्होंने एक बेटी को गोद लिया. उस के बाद कई साल के बाद उन को टैस्टट्यूब बेबी की जानकारी मिली और टैस्टट्यूब बेबी के जरिए एक बच्ची को उन की पत्नी रेहाना ने जन्म दिया.

बांझपन दुखदायी

एक औरत के लिए मां बनना सब से सुखद एहसास होता है जबकि किसी महिला के लिए बांझ कहलाना सब से ज्यादा दुखदायी होता है, लेकिन आज मैडिकल साइंस ने इतनी तरक्की कर ली है कि सैरोगेसी का सहारा ले कर सिर्फ स्त्री ही नहीं बल्कि पुरुष भी बाप बनने का सुख प्राप्त कर सकते हैं. अगर आप के पास पैसा है और आप मां या बाप बनने की इच्छा रखते हैं तो यह कार्य अब मुश्किल नहीं है. सूत्रों के मुताबिक सैरोगेसी या टैस्टट्यूब बेबी के जन्म के लिए लाखों में खर्च आता है. सैरोगेसी के लिए तकरीबन 10 से 15 लाख रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं.

बौलीवुड में सैरोगेसी

फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा से ज्यादा मैडिकल साइंस का सहारा ले कर बच्चे पैदा करने का चलन है. इस की कई वजह हैं, जैसे कि कुछ लोग कैरियर बनाने के चक्कर में उस उम्र को पार कर गए जब बच्चे नैचुरल तौर पर पैदा किए जा सकते हैं. बढ़ती उम्र में शादी कर के बच्चे पैदा करना मुश्किल ही नहीं खतरनाक भी साबित हो सकता है, इसीलिए कुछ बड़ी उम्र के मातापिता ने टैस्टट्यूब बेबी या सैरोगेसी का सहारा ले कर बच्चा पाने का सुख प्राप्त किया.

इस के लिए कोरियोग्राफर डायरैक्टर फराह खान का नाम सब से पहले आता है जिन्होंने मैडिकल साइंस के जरिए 3 बच्चों को एकसाथ जन्म दिया. फराह खान के अलावा शाहरुख खान और आमिर खान ने भी 50 की उम्र में सैरोगेसी से पिता बनने का सुख प्राप्त किया. शाहरुख खान ने इस उम्र में बाप बनने का मन इसलिए बनाया, क्योंकि जब उन के 2 बच्चों सुहाना और आर्यन का जन्म हुआ था तो वे अपने अभिनय कैरियर को संवारने में इतने व्यस्त थे कि उन को अपने बच्चों का बचपन ऐंजौय करने का समय ही नहीं मिला. लिहाजा, अबराम के जरिए अब वे अपने बच्चे का बचपन ऐंजौय कर रहे हैं.

शाहरुख खान की तरह आमिर खान ने भी अपनी दूसरी पत्नी किरण के लिए सैरोगेसी के जरिए एक बच्चे को जन्म दिया जिस का नाम आजाद है. आमिर खान की तरह सोहेल खान ने भी सैरोगेसी का सहारा ले कर एक बेटे को जन्म दिया. इस के अलावा 400 से ज्यादा मलयालम, तेलुगू, तमिल और हिंदी फिल्मों में काम कर चुकी शोभना की बेटी नारायणी भी सिंगल पेरैंट हैं.

फिल्म ‘विक्की डोनर’

पिछले दिनों मैडिकल साइंस द्वारा बच्चे पैदा करने की पद्धति को ले कर एक फिल्म बनी थी ‘विक्की डोनर.’ इस फिल्म का हीरो आयुष्मान खुराना पैसा कमाने के लालच में अपने स्पर्म बेचता है और उस की वजह से करीबन 46 लोगों को मांबाप बनने का सुख प्राप्त होता है. इस फिल्म व मैडिकल साइंस के जरिए बच्चे पैदा करने की प्रथा को बढ़ावा दिया गया था जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया.

करण जौहर भी सैरोगेसी के जरिए 2 बच्चों के पिता बन चुके हैं करण जौहर ने बेटे का नाम यश और बेटी का नाम रूही रखा है. करण 44 वर्ष के हैं और वे हमेशा अपने जैंडर को ले कर चर्चा में रहे हैं.

कुछ स्टारों ने बच्चे गोद ले कर पाया बच्चों का सुख…

बौलीवुड में कई स्टार ऐसे भी हैं जिन्होंने बच्चे गोद ले कर उन को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया है, जिन में सब से पहले नाम आता है सलमान खान का, जिन्होंने अर्पिता को न सिर्फ गोद लिया बल्कि ढेर सारा प्यार भी दिया. अर्पिता सलमान की फेवरिट हैं और वे अपनी बहन के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं. इसी तरह सुष्मिता सेन, रवीना टंडन, मिथुन चक्रवर्ती जैसे कई स्टारों ने बच्चों को गोद ले कर उन का जीवन संवारा है.

फिल्म इंडस्ट्री में समलैंगिकता, अतिव्यस्तता और बड़ी उम्र में विवाह कर बच्चा पैदा न कर पाने वाले लोगों के लिए सैरोगेसी और टैस्टट्यूब बेबी वरदान साबित हुआ है.  कई सारे अविवाहित ऐक्टर जो 40-50 की उम्र पार कर चुके हैं और अविवाहित हैं. ऐसे लोगों के लिए तुषार कपूर ने कुंआरा बाप बन कर इस प्रथा की शुरुआत कर दी है, जिस में अब महिलाएं भी सिंगल मदर बनने के लिए तैयार हैं और अब किसी को बच्चे न होने के दुख से भी नहीं गुजरना पड़ेगा.

अरे जनाब, ऐसी भक्ति से तो गौ माता भी शरमा जाए

पहले गली में कुत्तों को खुला छोड़ दो और जब वे 2-4 को काटकाट कर मार डालें तो भी उन्हें बजाय रस्सी से बांधने के केवल शूशू कर के चुप करा दो. यह सीन बहुत जगह देखा होगा. कुत्तों की मालकिनों को कुत्तों से इतना प्रेम होता है कि उन का कुत्ता किसी को काट ले तो भी वे दोषी दूसरे को ही ठहराती हैं कि उस ने ही कुत्ते को उकसाया होगा.

ऐसा ही सा कुछ गौरक्षकों के साथ भी हो रहा है. देश भर में गौरक्षकों को भगवा गमछा गले में लटका कर गायभैंस पालने वालों को मारनेपीटने का लाइसैंस दे दिया गया है. बीसियों तो जान गंवा चुके हैं इन गौरक्षकों के हाथों और सैकड़ों पिटे और लुटे हैं. न राज्य सरकारें, जिन का काम राज्य में कानून व्यवस्था कायम करना है इन गौरक्षकों को पकड़ रही हैं और न केंद्र सरकार.

नरेंद्र मोदी ने इस पर चिंता व्यक्त कर दी, राज्य सरकारों को सलाह दे दी और बस. गौभक्तों की इस देश में कमी नहीं. प्रचार और रीतिरिवाजों के गुलाम से गौभक्त गौरक्षकों को भरपूर समर्थन देते हैं. पढ़ेलिखे, कानून के बारे में समझ रखने वाले, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने वाले भी आस्था के पागलपन में बह कर ऐसे मामलों में चुप रह जाते हैं. नतीजा यह है कि ये गौरक्षक असल में पैरलल पुलिस फोर्स बनने लगे हैं और हरेक से गौशाला, गौपूजा और रात्रि जागरण के नाम पर चंदा वसूली भी करने लगे हैं.

इस चंदे का हिसाब तो किसी को नहीं देना होता. जो चाहे मरजी करो. ऊंची जातियों के लोग पहले घर में लठैत पालते थे, जो वसूलियां भी करते थे, अब गौरक्षक पालने लगे हैं. पुलिस भी इन से डरती है, क्योंकि इन की पहुंच मंत्रियों तक होती है.

गौरक्षा देश की अर्थव्यवस्था के किए कितनी जरूरी है या कितनी घातक या फिर गौपूजा का कोई तार्किक आधार है या नहीं, इस सवाल को छोड़ भी दें, तो भी सदियों से चले आ रहे गाय पर आधारित व्यापार को यों ही धर्म के नाम पर गौरक्षकों के सुपुर्द नहीं करा जा सकता. यही गौरक्षक सामाजिक नियमों के ठेकेदार बनने लगे हैं. कोई क्या पहने, क्या खाए, क्या बोले, क्या देखे, क्या पढ़े सब गौरक्षक सद्रश लोग तय करने लगे हैं.

देश ने बड़ी मुश्किलों से थोड़ाबहुत सामाजिक परिवर्तन देखा है. आज भी समाज की सोच 18वीं सदी की है, पूरी नहीं तो आधी की तो है ही. आज भी शादीब्याह, त्योहार, आनाजाना, कुंडली, मंत्रों, हवनों, माता की चौकियों, शुभ काल, देवों के जागनेसोने पर हो रहा है. ऊपर से ये गौरक्षक पुरातनपंथी लट्ठमार सोच थोपने लगे हैं. दुनिया भर में घूमने वाले, अंतरिक्ष में यान भेजने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन को मूक नहीं, सक्रिय समर्थन दे रहे हैं ताकि राजनीति पर पकड़ बनी रहे.

घरों की औरतों को इस से ज्यादा नुकसान होगा, क्योंकि एक कट्टरवादी सोच दूसरी कट्टरवादी सोच का सहारा बनती है. आज गौरक्षा के नाम पर लट्ठ चल रहे हैं कल संस्कृतिरक्षा के नाम पर विधवा विवाहों पर रोक लगने लगेगी.

कई फिल्मों में लीड रोल निभा चुके नवाजुद्दीन कभी हीरो नहीं बनना चाहते थें

अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने साधारण शक्ल-सूरत होने के बावजूद अपने शानदार अभिनय के बलबूते दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है. अभिनेता लीक से हटकर भूमिकाएं करने के लिए जाने जाते हैं. फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ में वह सुपारी लेकर हत्या करने वाले शख्स की किरदार में हैं.

इन दिनों ज्यादातर फिल्मों में लीड और महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहे नवाज ने यह भी बताया कि वह कभी हीरो बनना नहीं चाहते थे. उनका मानना है कि फिल्मों में हीरो को कुछ ज्यादा ही आदर्श दिखाया जाता है लेकिन कोई ऐसा इंसान हो ही नहीं सकता जिसमें कोई बुराई ना हो.

नवाज ने कहा कि इसीलिए उन्हें कभी पाजिटिव और आदर्श हीरो की भूमिका निभाने में कोई दिलचस्पी नहीं रही. साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें नेगेटिव या थोड़े अजीब से किरदार निभाना ज्यादा पसंद है.

अपनी आने वाली फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ और अन्य फिल्मों के बीच अंतर बताते हुए कहा नवाज ने कहा कि इस फिल्म का हीरो अन्य फिल्मों के हीरोज जैसा नहीं है. उन्होंने गर्व से कहा कि इस फिल्म में वह ‘यूपी के जेम्स बॉन्ड’ की भूमिका में हैं.

इस फिल्म में उन्होंने अभिनेत्री बिदिता बाग के साथ काफी बोल्ड सीन किए हैं. अभिनेता से जब पूछा गया कि इस तरह के दृश्य करने को लेकर वह कितना सहज रहे, तो उन्होंने बताया, “फिल्म में कुछ ज्यादा ही बोल्ड दृश्य और रोमांस है. शुरू-शुरू में मुझे थोड़ा असहज महसूस हुआ, क्योंकि जब तक लड़की को आप पर भरोसा नहीं होता, तब तक आपके मन में डर होता है कि कहीं वह आपको गलत न समझ ले. बिदिता हर दृश्य को अच्छे से निभाना चाहती थीं, शायद इसलिए उन्होंने सरेंडर कर दिया. इसके बाद इन दृश्यों की शूटिंग आसानी से हो गई.”

फिल्म बाबूमोशाय बंदूकबाज में फिल्माए गए इंटीमेट्स सीन चर्चा में हैं. माडल बिदिता बाग ने अपनी पहली ही फिल्म में बाबूमोशाय बंदूकबाज में इतने बोल्ड सीन दिए की सेंसर बोर्ड ने इसे आठ कट के साथ रिलीज करने का आदेश दिया है.

सूत्रों की मानें तो नैचुरल दिखने के लिए कुछ सीन बिदिता ने खुद रीटेक कराए थे. पहले बिदिता बाग वाला किरदार चित्रांगदा सिंह निभा रही थीं, लेकिन बोल्ड सीन के कारण ही उन्होंने ये फिल्म छोड़ दी थी. निर्माता से उनका झगड़ा मीडिया में खूब छाया रहा. बाद में उन्हें बिदिता बाग से रिप्लेस किया गया.

बिदिता ने ये इंटीमेट सीन नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ फिल्माए हैं, जो उनसे उम्र में 18 साल बड़े हैं. नवाज 43 के हैं और बिदिता सिर्फ 25 की.

चित्रांदगा के फिल्म छोड़ने के बाद खुद पर दबाव होने के सवाल पर बिदिता कहती हैं, ‘मैं जानती हूं चित्रांगदा एक बड़ी कलाकार हैं, लेकिन उनकी जगह लेते हुए मैंने कोई दबाव महसूस नहीं किया. वे भले ही जाना-पहचाना नाम हो, लेकिन मैं भी माडलिंग की दुनिया में काफी फेमस हूं.’

बिदिता कई टीवी विज्ञापन में नजर आ चुकी हैं. उन्होंने बंगाली और असमिया फिल्में भी की हैं. साथ ही बिदिता ट्रेंड क्लासिकल सिंगर भी हैं. उन्हें पेंटिंग का भी शौक है. फिलहाल वे अपनी अपकमिंग फिल्म बाबूमोशाय बंदूकबाज के कारण चर्चा में बनी हुई हैं.

कुशन नंदी की ये फिल्म क्राइम क्राइम थ्रिलर है. पहले पहलाज निहलानी के कार्यकाल में सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 48 कट लगाए थे, जिस पर निर्माता ने इसका विरोध किया था. बाद में फिल्म अपेलिट ट्राइब्यूनल (एफसीएटी) में गई और आठ कट के साथ रिलीज के आदेश दिए गए.

करीब 10 लाख बैंक कर्मी हड़ताल पर, आज ही निपटा लें बैंक के जरूरी काम

अगर आपके पास बैंक के कुछ जरूरी काम हैं, जो आप आज करने की बजाय कल पर टाल रहे हैं तो संभल जाएं, क्योंकि कल यानी मंगलवार को बैंक हड़ताल पर रहेंगे. बैंक कर्मचारी यूनियनों के संगठन यूनाइटेड फोरम आफ बैंकिंग यूनियन्स (UFBU) ने 22 अगस्त (मंगलवार) को देशव्यापी हड़ताल पर जाने का फैसला किया है. हालांकि, इस बारे में बैंकों ने अपने ग्राहकों को पहले से ही सूचित कर दिया है.

दरअसल, सरकार के एकीकरण के कदम और कुछ अन्य मांगों के समर्थन में यूनाइटेड फोरम आफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) के तत्वावधान में सभी बैंक यूनियनों ने 22 अगस्त को हड़ताल का आह्वान किया है. यूएफबीयू नौ यूनियनों का प्रमुख निकाय है. इसके तहत आल इंडिया बैंक आफिसर्स कनफेडरेशन (एआईबीओसी), आल इंडिया बैंक एम्पलाइज एसोसिएशन (आईबीईए) और नेशनल आर्गेनाइजेशन आफ बैंक वर्कर्स (एनओबीडब्ल्यू) आती हैं.

एआईबीओसी के महासचिव डी टी फ्रैंको ने कहा, ”मुख्य श्रम आयुक्त के साथ सुलह नहीं हो पाई. अब यूनियनों के पास हड़ताल पर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इसके साथ ही सरकार और बैंक मैनेजमेंट की ओर से कोई आश्वासन नहीं मिला है. ऐसे में 10 लाख बैंक कर्मी जो कि देश भर में करीब 132,000 शाखाओं में काम कर रहे हैं, वह 22 अगस्त को हड़ताल पर रहेंगे.

एसोसिएशन की मांगें

एसोसिएशन की खास मांगों में बैंक चार्ज में वृद्धि की वापसी, एनपीए की सख्ती से वसूली नहीं करना, संसदीय समितियों की अनुशंसाओं को लागू करना, एफआरडीआई बिल वापस लेना, सभी संवर्गों में समुचित भर्ती, बोर्ड-ब्यूरो को खत्म करना, बड़े बकायेदारों को अपराधी घोषित करना और जीएसटी का बोझ ग्राहकों पर नहीं डालना आदि हैं. UFBU ने बैंकों के डूबते कर्ज (NPA) के बढ़ते आंकड़े पर भी चिंता जताई और कहा कि सरकारी बैंकों का करीब 6.83 करोड़ रुपये NPA घोषित हो चुका हैं. जो बैंकिंग सेक्टर के लिए चिंता का विषय है.

निजी बैंको में नहीं होगी हड़ताल

बहरहाल निजी क्षेत्र के आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक, एक्सिस और कोटक महिंद्रा बैंक में कामकाज सामान्य रहने की संभावना है. इन बैंकों में चेक समाशोधन में देरी हो सकती है.

गर्लफ्रैंड या ब्वायफ्रैंड से मिलने के लिए यंगस्टर्स को खूब भा रहे हैं ये हौट बहाने

‘‘पापा, आज मेरी ऐक्स्ट्रा क्लास है, मैं लेट हो जाऊंगी,’’ घर से बाहर निकलते हुए मेघा ने पापा से कहा तो पापा तब तक उसे जाते हुए देखते रहे जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई. अब आएदिन इस तरह का बहाना सुनना उन की आदत में शुमार हो गया है. लेकिन उन्हें नहीं पता कि ऐक्स्ट्रा क्लास के बहाने उन की बेटी अपने बौयफ्रैंड अजीत से मिलने जाती है. वे जा कर चैक थोड़े न कर रहे हैं कि ऐक्स्ट्रा क्लास में है या कहीं और. इसी तरह ऐजुकेशनल ट्रिप के बहाने एक प्राइवेट कंपनी में कार्यरत आदर्श अकसर घर से बाहर रहता है. वापस आने पर वही पुराना बहाना कि मम्मी इस बार हम शिमला गए थे, खूब ऐंजौय किया, जबकि इसी बहाने वह अपनी गर्लफ्रैंड के साथ घूम कर आ गया. बच्चे अपने पेरैंट्स से बहाने बना कर मौजमस्ती करते हैं और पेरैंट्स बेचारे यकीन कर चुप बैठ जाते हैं. मैट्रो सिटीज में आजकल इस तरह के बहाने न केवल फलफूल रहे हैं बल्कि पेरैंट्स की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे ये बहाने पूरी तरह सफल भी हो रहे हैं. जानिए कुछ प्रचलित बहाने, जिन्हें यंगस्टर्स अपनी ढाल बना कर आसानी से बच निकलते हैं :

ऐक्स्ट्रा क्लास यानी फुल मस्ती

सब से अधिक युवा ऐक्स्ट्रा क्लास का बहाना ही बनाते हैं. इस में फंसने का डर भी कम रहता है, साथ ही घर से इस बहाने पूरी छूट भी मिल जाती है. बीसीए का छात्र प्रियांक बताता है कि उसे जब भी संडे के दिन अपनी गर्लफ्रैंड के साथ घूमने जाना होता है तो वह अपने पेरैंट्स से ऐक्स्ट्रा क्लास का बहाना बनाता है. किसी को कुछ पता भी नहीं चल पाता और हम खूब मस्ती भी कर लेते हैं. 3-4 घंटे मौजमस्ती कर के हम वापस भी आ जाते हैं.

ग्रुप स्टडी के बहाने डेटिंग

ग्रुप स्टडी का बहाना भी यंगस्टर्स को खूब रास आता है. इसी बहाने उन्हें घर से बाहर निकलने व 4-6 घंटे का समय मिल जाता है, जिस से उन की डेटिंग में कोई बाधा नहीं आती. रितिका को जब भी डेटिंग पर जाना होता है वह मम्मी से स्नेहा के घर जा कर ग्रुप स्टडी करने का फंडा प्रयोग में लाती है. उस की मम्मी को कहां इतनी फुरसत है कि वे स्नेहा के घर जा कर चैक करें. तिस पर स्नेहा का मोबाइल नंबर तो रितिका ने मम्मी को ही दे रखा है. फोन आने पर स्नेहा सब संभाल ही लेगी.

ऐजुकेशनल ट्रिप से दिलों में रोमांस

लगभग हर स्कूलकालेज अपने छात्रों को घुमाने के लिए ले जाता है. इसी बहाने युवा अपने प्यार को परवान भी चढ़ाते हैं. घर से दूर, दोस्तों के साथ किसी अनजान जगह पर अपने पार्टनर के साथ दिल की बात कहने का मौका आखिर कौन चूकना चाहेगा. ऐजुकेशनल ट्रिप तो एक बहाना है. इस के लिए बच्चों द्वारा ही टीचर्स पर दबाव डाला जाता है कि सर हमें कहीं घुमाने ले चलो. इस ऐजुकेशनल ट्रिप से उन्हें ऐजुकेशन कम लेकिन प्यार के लमहे जरूर हासिल हो जाते हैं.

साइबर कैफे की जगह मल्टीप्लैक्स

लोकेश की मजबूरी है कि वह तान्या से शाम 4 बजे के बाद ही मिल सकता है, क्योंकि दोनों अलगअलग कालेज में पढ़ते हैं और रोजरोज कालेज बंक मारना संभव नहीं हो पाता. अत: दोनों अपने पेरैंट्स से साइबर कैफे जाने के बहाने घर से निकलते हैं. फिर चाहे इसी बहाने वे मल्टीप्लैक्स में मिलें या पार्क में, मम्मीपापा तो यही समझ रहे होते हैं कि बच्चे इंटरनैट पर जरूरी जानकारी जुटा रहे हैं.

बस नहीं मिली तो हो गया लेट

प्यार में तड़पते दिल को आधे घंटे का समय भी मिल जाए तो काफी है. क्लास खत्म होने के बाद वे जल्दी से किसी कोने अथवा कैंटीन में आधाएक घंटा दिल के जज्बात व्यक्त करते हैं और फिर घर पहुंचने पर वही पुराना बहाना कि आज बस नहीं मिली या बाइक खराब हो गई. इस बार भी किसी का शक उन पर नहीं जाता और वे आसानी से बच निकलते हैं. अगली बार फिर कोई नया फंडा निकालेंगे.

पेरैंट्स की भी मजबूरियां

ऐसा नहीं कि हर बार यंगस्टर्स के ये बहाने पेरैंट्स की आंखों में धूल झोंकने में सफल हो जाएं. कभीकभी उन की कुछ मजबूरियां भी होती हैं जिन के चलते वे बच्चों की हर बात में टांग अड़ाना उचित नहीं समझते और सबकुछ जानते हुए भी इग्नोर कर देते हैं. 45 वर्षीय रमेश का बेटा अकसर कोई न कोई बहाना बना कर घर से गायब रहता है. रमेश को पता है कि वह झूठ बोल कर अपने दोस्त के यहां वीडियो गेम खेलने जाता है, लेकिन बारबार टोक कर वे उसे नीचा नहीं दिखाना चाहते. हो सकता है उम्र के साथ उसे अपनी गलती समझ में आ जाए और रास्ते पर लौट आए.

स्पेस को सीमाओं में बांधें

इस संदर्भ में यंगस्टर्स द्वारा यह दलील दी जाती है कि जमाना बदल रहा है तथा पेरैंट्स को भी अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए. हमेशा रोकटोक के बजाय हमें थोड़ा सा स्पेस युवा होते बच्चों को भी देना चाहिए. इस बारे में फैमिली काउंसलर श्वेता सिंह का कहना है कि युवापीढ़ी को थोड़ा सा स्पेस देना बुरा नहीं है बल्कि उस थोड़े से स्पेस की आड़ में उन के द्वारा खिलाए जा रहे गुल और सीमाओं को लांघने की लालसा पेरैंट्स को अपना कदम वापस खींचने के लिए मजबूर कर देती है. उन के छोटेछोटे बहाने किसी दिन पेरैंट्स को भीषण संकट में डाल सकते हैं.

बच्चों का है ये फर्ज, मां बाप की वीरान ‌जिंदगी में भरें रंग

लोहरदगा (झारखंड) की एक बिटिया ने गत 14 जून को स्वयं आगे बढ़ कर अपने विधुर पिता की शादी कराने का हौसला दिखाया. 42 साल के महावीर उरांव की पत्नी का निधन एक साल पहले हो चुका है. उन के 2 लड़के और 2 लड़कियां हैं. वहीं 45 वर्षीया, मनियारी उरांव भी अकेली थीं. उन के पति ने 7 साल पहले उन्हें छोड़ दिया था. उन की एक 27 वर्षीय पुत्री है, जिस की शादी हो चुकी है.

महावीर और मनियारी दोनों दिल ही दिल में एकदूसरे को पसंद करते थे और इस बात की जानकारी महावीर की 17 वर्षीया पुत्री प्रमिला टोप्पो को थी. उसी के प्रयासों से जीवनसाथी खो चुके 2 तनहा दिलों की उजड़ी वीरान जिंदगी फिर से संवर गई.

यह एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे बच्चे या परिवार वाले यदि चाहें तो अपने घर के विधवा/विधुर सदस्य की जिंदगी में फिर से उम्मीद और खुशी की लहर जगा सकते हैं.

भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनका पार्टनर समय से पहले उन्हें छोड़ कर जा चुका हो. हाल में प्राप्त मैरिज डाटा 2011 के अनुसार, भारत में 4.6% यानी 121 करोड़ में से 5.6 करोड़ व्यक्ति अपना जीवनसाथी खो चुके हैं, और तन्हा जिंदगी जी रहे हैं. इन में महिलाओं की संख्या पुरुषों के देखे काफी ज्यादा है और इस की वजह है, उन की जीवन प्रत्याशा का अधिक होना. वर्ल्ड बैंक 2012 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पुरुषों की जीवन प्रत्याशा जहां 65 वर्ष है, वहीं स्त्रियों की 68 साल है.

विधवा/विधुर होना कोई अभिशाप नहीं. यह तो जमाना है जो उन के साथ अछूतों सा व्यवहार करने लगता है और इस का खामियाजा उन्हें ताउम्र भोगना पड़ता है.

भारत के ज्यादातर हिस्सों में इन के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता. परिवार और समाज से इन्हें केवल उपेक्षा और तनहाई ही मिलती है. परिवार द्वारा शोषण और सामाजिक वर्जना की स्थिति का सामना करना पड़ता है.

सामाजिक वर्जना

42 साल की अनीता (परिवर्तित नाम) बताती हैं, ‘‘जब मैं 40 साल की थी, तो मैं ने अपना पति खो दिया, यही वह समय था जब मेरा परिवार/समाज (विशेष रूप से विवाहित महिलाएं) मुझसे अछूतों जैसा व्यवहार करने लगीं, वह महिलाएं मेरे साथ बैठने या साथ खाने से भी परहेज करने लगी. मुझे किसी भी आयोजन में आमंत्रित नहीं किया जाता. मैं हंसतीमुसकराती तो लोग मुझे शंका की दृष्टि से देखते. लगता जैसे मैं ही अपने पति की मौत के लिए जिम्मेदार हूं और मुझे इस अपराधबोध के साथ जीने को अकेला छोड़ दिया गया है.’’

सिर्फ स्त्रियां ही नहीं, पुरुष भी इस सामाजिक बहिष्कार का शिकार बनते हैं. एकतरफ जहां अपने ही घरवाले उन्हें इग्नोर करते हैं, वही दोस्त और रिश्तेदार कपल्स भी किसी भी तरह के गेटटुगेदर में इन्हें अवौइड करने से बाज हीं आते. यदि विधुर पुरुष किसी पारिवारिक समारोह में शरीक होता भी है और अनजाने ही किसी जानपहचान वाली महिला के साथ हंसीमजाक करने लगता है तो लोगों की टेढ़ी नजरें इन की तरफ उठ जाती हैं. वह पुरुष शक के दायरे में आ जाता है और लोगों को लगता है कि वह चांस मार रहा है.

शोषण

विधुरों के देखे विधवाओं को ज्यादा शोषण और पीड़ा झेलनी पड़ती है. देश में अभी भी कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां विधवाओं को अपशगुनी या चुड़ैल का तमगा लगा कर उन्हें शारीरिक मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जाता है. उ.प्र., मध्य भारत और बिहार, झारखंड, नेपाल सीमा से लगे कुछ ग्रामीण हिस्सों में भी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं.

आवाज उठानी है जरूरी

अनीता बताती हैं कि पति की मौत के बाद परिवार वाले उन के साथ बहुत बुरा व्यवहार करने लगे थे. उन्हें किसी से मिलने की इजाजत भी नहीं थी. उन्हें पीटा जाता और सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया. ऐसे में किसी तरह एक पारिवारिक मित्र की मदद से उन्होंने मामला दर्ज कराया.

आईपीसी की धारा 498ए, घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उस केस की सुनवाई हुई और आरोपी परिवार को 4 माह के कारावास और जुर्माने की सजा मिली. उसे संपत्ति में अपना हिस्सा भी मिला. अब वह एक स्वतंत्र और सुरक्षित जिंदगी जी रही हैं. जाहिर है, विधवा स्त्री चाहे तो कानूनी मदद ले सकती है और अपने आप को सुरक्षित बना सकती हैं.

कुणाल मदान, सौलिसिटर व एडवोकेट, के एमए लौ फर्म (दिल्ली हाईकोर्ट) कहते हैं, यह बहुत बुरा है कि जहां एकतरफ हम 21वीं सदी में कदम रख रहे हैं, प्रोद्यौगिकी और आधुनिकीकरण के इस दौर में एक ऐसा क्षेत्र भी है, जिस में हम अभी भी परिवर्तन का इंतजार कर रहे हैं और वह है, विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार.

भारत में विधवापन यहां तक कि उच्च जातियों में भी एक सामाजिक मृत्यु भी अवस्था जैसी है.

साधारणतः विधवा महिलाओं को उस के ससुराल वालों की संपत्ति में हिस्सेदारी से वंचित कर दिया जाता है क्योंकि भारतीय समाज में संपत्ति आमतौर पर बड़ों के नाम पर होती है और इस स्थिति में (ससुराल वालों द्वारा स्वयं अर्जित संपत्ति में) विधवा किसी भी हिस्से की हकदार नहीं होती. यदि संपत्ति विधवा के पति के नाम पर है तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार विधवा की सास भी संपत्ति की सहमालकिन होती है.

समाज में महिलाओं की सुरक्षा हेतु काम करने वाली संस्था ‘मिर्ची झोंक’ की फाउंडर प्रेसीडैंट सीमा मलिक कहती हैं कि कितनी ही विधवा महिलाएं हैं, जो देश के ऊंचे और महत्त्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं. वह स्वतंत्र और स्वाभिमानपूर्ण जिंदगी जी रही हैं. सच तो यह है कि अशिक्षा और गरीबी की वजह से ही महिलाओं का शोषण होता है.

हमारा फर्ज है कि ऐसी महिलाओं की सहायता करें. उन्हें आत्मनिर्भर बनने या पुर्नविवाह के लिए प्रोत्साहन दें. आपराधिक तत्त्वों और पुराने रीतिरिवाजों से आजादी दें.

स्त्रियां ज्यादा बेहतर ढंग से जूझती हैं अकेलेपन से

स्त्री और पुरुष दुख व अकेलेपन से अलगअलग तरह से जूझते हैं. उदाहरण के लिए दुनिया के कुछ देशों में आधे से ज्यादा विधुर 18 महीनों के अंदर ही दूसरी शादी कर लेते हैं, मगर विधवाओं के मामले में ऐसा बहुत कम होता है. इस की वजह यह नहीं कि विधुर सिर्फ अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति हेतु दूसरी शादी करते हैं, वरन हकीकत यह है कि वे खुल कर सारी बातें जीवनसाथी को ही बताते हैं. इस लिए उन के बगैर बहुत तन्हा महसूस करते हैं. इस के विपरीत स्त्रियां भावनात्मक तौर पर खुद को जल्द संभाल लेती हैं और नातीपोतों, बच्चों व घर के कामों में अपना मन लगाने का प्रयास करती हैं. घरवालों द्वारा उपेक्षित किए जाने के बावजूद महिलाएं पुरुषों के देखे महिलाएं अकेलेपन से लड़ना ज्यादा बेहतर ढंग से जानती हैं.

जरूरत है दर्द समझने की

वृंदा ने हाल ही में अपने पति को खोया है. शाम के समय सब के लिए थाली निकालते वक्त वह अपने पति के लिए भी खाना परोसने लगती है, पर सहसा उसे अपनी गलती का आभास होता है और वह फूटफूट कर रो पड़ती है.

इस तरह की परिस्थितियां अक्सर आती हैं, जब व्यक्ति अपने जीवनसाथी को बरबस ही याद कर भावुक हो उठता है. कोई खास दिन, कोई अवसर या फिर जीवनसाथी द्वारा दी गई कोई भेंट, पुरानी यादें ताजा कर इंसान की आंखों में आंसू ला सकती है.

ऐसे में व्यक्ति को जरूरत होती है किसी ऐसे शख्स की, जिस से वह अपने दिल का हर गम बांट सके. जिस से वह अपने जीवनसाथी के बारे में खुल कर बातें कर सके. उन की पसंद नापसंद के बारे में चर्चा कर सके. अपने जज्बात जाहिर कर सके. आप चाहें तो उन के लिए ऐसा ही साथी बन सकते हैं.

परिवार वालों को चाहिए कि उन्हें छोटेमोटे कामों में व्यस्त रखें, उन के शौक जिंदा रखें, प्रोत्साहन देने का प्रयास करें, ताकि जिंदगी के प्रति उन की रुचि बरकरार रहे. उन्हें जीने का नया मकसद मिल सके.

ऐसे व्यक्ति को किसी के साथ की बहुत जरूरत होती है. आप जितना हो सके, इन के साथ समय बिताएं और संभव हो सके तो उन के लिए एक जीवन भर का साथी ढूंढ़ दें.

सरकारी प्रयास

करीब 9 वर्ष पूर्व एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की थी. इस में अपनों द्वारा छोड़ी गई विधवाओं की दयनीय स्थिति को सुधारने की बात कही गई थी. इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से विधवाओं को पर्याप्त घर उपलब्ध कराने और मंथली ग्रांट में इस साल 1 जनवरी से 292% की वृद्धि करते हुए 1300 रुपए से बढ़ा कर 1500 रुपए करने के लिए कहा है.

केंद्र सरकार दिसंबर 2017 तक वृंदावन में एक हजार विधवाओं के लिए घर बनवाएगी. इस के लिए 57 करोड़ का बजट रखा गया. इन के मेंटीनेंस के लिए हर साल 4 करोड़ रुपए दिए जाएंगे. सिर्फ वृंदावन ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के दूसरे शहरों, प. बंगाल, उड़ीसा और उत्तराखंड को भी रिलीफ दिए जाने की बात की.

विधवाओं के हित के लिए एक अच्छा कदम है आम जनता के द्वारा भी निरंतर इस दिशा में प्रयास किया जाना चाहिए.

अगर आप भी सबसे छिपकर देखते हैं पोर्न, तो ये खबर आपके लिए है

पोर्न फिल्म का जिक्र आते ही युवाओं का दिल मचलने लगता है और उन के चेहरे पर एक खुशी की लहर दौड़ जाती है. कुछ लोगों का मानना है कि पोर्न फिल्में देखने में कोई हर्ज नहीं है. यही वजह है कि युवाओं में पोर्न फिल्में देखने का चलन बहुत बढ़ गया है. उन्हें सैक्स के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती और जब वे इस तरह की मूवी देखते हैं तो उन्हें लगता है कि यही सैक्स है. लेकिन सच तो यह है कि पोर्न असली जिंदगी के सैक्स की तरह नहीं है और न ही यह सैक्स और अंतरंगता के बारे में जानने का सर्वोत्तम तरीका है बल्कि यह तो पैसा कमाने का एक जरिया है.

एक सीमा तक तो ठीक है, लेकिन जब पोर्न देखना आदत में शुमार हो जाता है तो इस से परेशानियां पैदा होने लगती हैं. इसलिए पोर्न देखना अच्छी बात नहीं है और अगर देखना भी है तो इस की एक लिमिट आप को खुद ही तय करनी होगी ताकि यह आप की पर्सनल लाइफ को प्रभावित न करने लगे. आइए, पोर्न के बारे में जानें कुछ जरूरी बातें :

पोर्न नशा कैसे है

पोर्न देखने की आदत जब इस हद तक बढ़ जाए कि उस से हमारी पर्सनल और प्रोफैशनल लाइफ प्रभावित होने लगे तो वह पोर्न का नशा बन जाता है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि पोर्न देखने वाला शौकीन व्यक्ति हर वक्त पोर्न देखने की फिराक में रहता है, उसे अकेलापन अच्छा लगने लगता है, वह कभी भी कहीं भी पोर्न देखने के मौके को छोड़ना नहीं चाहता और इसलिए धीरेधीरे दोस्तों से भी दूरी बना लेता है, क्योंकि ज्यादा टाइम उसे पोर्न देखने में बिताना होता है. पोर्न देखने के लिए वह बहाने बनाना भी शुरू कर देता है. इस तरह पोर्न एक ऐसा नशा है जो लत बन जाता है.

इस बारे में मनोचिकित्सक स्मिता देशपांडे का कहना है कि हमारे शरीर में डोपामाइन व सेरोटोनिन नामक हारमोंस होते हैं, जिन्हें ‘हैप्पीनैस हारमोंस’ भी कहा जाता है. इन्हीं हारमोंस की वजह से हमें कुछ भी करने में खुशी मिलती है. अमूमन जब हमें कुछ अच्छा लगता है या खुशी देता है तब 5-10 यूनिट हारमोंस रिलीज होते हैं. पोर्न के केस में यह रिऐक्शन अलग तरह से होता है. पोर्न देखते ही दिमाग को कुछ ऐसा मिलता है जो उस ने पहले अनुभव नहीं किया होता. ऐसा होने पर कई बार 1 हजार यूनिट तक डोपामाइन रिलीज होते हैं. डोपामाइन की यह तगड़ी लहर फीलगुड तो ले कर आती ही है साथ ही ऐसी प्यास भी जगा देती है जिस का कोई अंत नहीं. यही पोर्न के नशे का कारण बनता है.

पोर्न के पीछे इंसान ऐसे चल पड़ता है जैसे सूखे रेगिस्तान में पानी मिलने की आस में प्यासा व्यक्ति कोसों चलता है. लेकिन हर पोर्न देखने वाले का नजरिया अलग होता है जैसे कि कुछ को शराब से ही नशा हो जाता है तो कुछ को उस के साथ ड्रग्स ले कर. इसी तरह कुछ को पोर्न तसवीरें देखने में मजा आता है तो कुछ को पोर्न फिल्में और कुछ को वाइल्ड सैक्स देखने में. इस तरह यह नशा एक तरफ तो फीलगुड का ऊंचा लैवल सैट कर देता है और दूसरी तरफ उस हिस्से को भी ऐक्टिव कर देता है जिस में कुछ और नया देखने और ज्यादा आनंद लेने की इच्छा जाग्रत होती है. इस तरह पोर्न देखने का शौकीन न तो इस के बिना रह पाता है और न ही जल्दी से इस से संतुष्ट हो पाता है. इस का नतीजा होता है कि इस से व्यक्ति मानसिक रूप से पंगु हो जाता है और उस की सोचने की शक्ति भी कम हो जाती है. वहीं उस के दिमाग में बस, पोर्न ही घूमता रहता है. इस से उस का स्वास्थ्य भी खराब होता है.

पोर्न के शौकीन हैं तो इन बातों का रखें खयाल :

पोर्न का शौक इंसान के मन में कामुक विचार पैदा करता है. सैक्स के विचार युवाओं से ले कर हर वर्ग के व्यक्ति को गंदी फिल्में, गंदी कहानियां पढ़ने को मजबूर करते हैं. वैसे भी युवावस्था ऐसी उम्र है जिस में युवा सैक्स के बारे में सोचे बिना रह नहीं सकते. अब बात करें व्यक्ति के टेस्ट की तो हर व्यक्ति का टेस्ट सैक्स के बारे में अलगअलग होता है. इस टेस्ट को और भी मजेदार बनाते हैं पोर्न स्टार्स.

हिस्ट्री करें डिलीट

इंटरनैट से उस साइट की हिस्ट्री क्लीन कर दीजिए जहां पर आप ने पोर्न देखा है ताकि अगर कोई आप के कंप्यूटर का इस्तेमाल करे तो वह यह न देख पाए कि आप ने कौन सी साइट देखी है. आप ऐसा ‘इन प्राइवेट ब्राउजिंग’ पर जा कर कर सकते हैं, जोकि इंटरनैट ऐक्सप्लोरर और फायरफौक्स दोनों पर आप को मिलेगी. लेकिन अगर कोई फाइल आप ने डाउनलोड की है तो वह कंप्यूटर पर रहेगी. इसलिए जो फाइल आप ने डाउनलोड की है उसे खोलने के लिए पासवर्ड का इस्तेमाल करें, ताकि कोई और यह फाइल न खोल पाए और आप को किसी के सामने शर्मिंदा भी न होना पड़े.

प्रतिबंधित साइट्स न देखें

भारत सरकार और टैलीकौम डिपार्टमैंट ने कुछ पोर्नोग्राफी साइट्स पर प्रतिबंध लगाने की काफी कोशिश की है, क्योंकि पोर्न फिल्में बनाना गैरकानूनी है. इसलिए ध्यान रखें कि प्रतिबंधित साइट्स न देखें. साथ ही बच्चों के साथ जिन साइट्स पर शारीरिक शोषण होते हुए दिखाया जाता है उन्हें भी देखने की कोशिश न करें.

पोर्न रियल लाइफ नहीं है

अधिकतर पोर्न फिल्में काल्पनिक दुनिया को दर्शाती हैं, जोकि असल जिंदगी में नहीं होती. असल जिंदगी में लोग वैसे नहीं दिखते जैसे पोर्न फिल्मों में दिखाया जाता है और न ही वैसी हरकतें करते हैं जैसी उन में दिखाई जाती हैं. इसलिए पोर्न देख कर अपनी रियल लाइफ में अपने साथी से या अपने सैक्स अनुभवों से पोर्न फिल्मों जैसी अपेक्षा रखना सही नहीं है. इसलिए रियल लाइफ में पोर्न स्टार बनने की कोशिश मत कीजिए.

पोर्न देखने से पहले फेसबुक लौगआउट कर दें

अगर आप फेसबुक पर लौगइन करते हुए किसी एडल्ट साइट पर जाते हैं तो संभव है कि आप को टै्रक किया जा रहा हो. यह आशंका तब ज्यादा होती है जब उस पोर्न साइट पर फेसबुक का प्लगइन हो. ऐसा इसलिए कि फेसबुक यह ट्रैक करता है कि आप कौन सी वैबसाइट सर्फ कर रहे हैं. इस तरह से जुटाई गई जानकारी की मदद से बाद में ट्रैक करने वाला आप की पसंद के हिसाब से विज्ञापन दिखाना शुरू कर देता है और आप परेशान होते रहते हैं कि इस तरह की पोस्ट या विज्ञापन आप के फेसबुक पर अचानक कैसे आने लगे.

स्मार्टफोन पर पोर्न देखने पर है खतरा

आजकल इंटरनैट पर काफी सारे ऐसे फ्री ऐप्स मिलते हैं जो फ्री पोर्न वीडियोज देखने की सुविधा प्रदान करते हैं. ये ऐप्स एंड्रौएड फोन में बड़ी आसानी से इंस्टौल हो जाते हैं. इन ऐप्स के जरिए लोग अपने मनपसंद पोर्न वीडियोज सर्च करते हैं. आप के स्मार्टफोन के लिए सब से बड़ा खतरा यही पोर्न ऐप्स हैं. जब आप इन ऐप्स के जरिए फ्री पोर्न देख रहे होते हैं तो उसी वक्त ये ऐप्स आप के स्मार्टफोन में स्टोर किए गए आप के ईमेल, बैंक अकाउंट डिटेल्स, जरूरी पासवर्ड और दूसरी जानकारी को हैकर्स के पास भेज रहे होते हैं. ये सारा डाटा चोरीछिपे ट्रांसफर भी हो जाता है और आप को पता भी नहीं चलता. इस से आप को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है इसलिए ऐसे फ्री ऐप्स के लालच में न आएं.

पोर्न में मिथ ज्यादा वास्तविकता कम

पोर्न द्वारा यह भ्रम पैदा किया जाता है कि प्रेम, सैक्स और आत्मीयता सब एक ही चीज हैं. पोर्न यह भी सिखाता है कि किसी अनजान व्यक्ति से सैक्स किया जा सकता है, क्योंकि पोर्न में जिस से कामुक संबंध बनते हैं वह अकसर अपरिचित ही होता है. पोर्न यह भी संदेश देता है कि सैक्स में संतुष्टि मिलना ही महत्त्वपूर्ण है चाहे वह किसी के भी शरीर से मिले. पोर्न यह भी मिथ बनाता है कि सैक्स किसी से भी और कहीं भी किया जा सकता है, लेकिन सचाई का इस से कोई लेनादेना नहीं है. कम उम्र के युवा सैक्स के अधकचरे ज्ञान के कारण इसे ही सही मान लेते हैं और गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं जिस कारण उन्हें बाद में पछताना पड़ता है.

–       पोर्न साइट्स पर युवतियों की बहुत खराब छवि को प्रस्तुत किया जाता है. वहां युवतियां सैक्स करने के एक खिलौने की तरह होती हैं जिसे पैसे खर्च कर कोई भी खरीद सकता है और खरीदने के बाद सैक्स करना अपना अधिकार मानता है. इस में दिल और भावनाओं को पूरी तरह नकारा जाता है जबकि यह गलत है.

–       पोर्न में आमतौर पर युवतियों के बारे में गंदी और घटिया भाषा का प्रयोग किया जाता है. पोर्न के जरिए यह भी बताया जाता है कि छोटे बच्चों के साथ भी सैक्स किया जा सकता है. पिता को बेटी के साथ, मां को बेटे के साथ, भाई को बहन के साथ और इंसान को पशु के साथ सैक्स करते हुए दिखाया जाता है, जोकि पूरी तरह अमानवीय है.

बुरा है पोर्नोग्राफी वैबसाइट्स का चसका

इंटरनैशनल सिक्योरिटी सिस्टम लैब के कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ डा. गिलबर्ट वोंडरेसेक ने अपनी टीम के साथ किए एक परीक्षण में पाया कि ज्यादातर लोग पोर्न साइट्स के चक्कर में फंस जाते हैं. इस नए अध्ययन से पता चला है कि पोर्न साइट्स की सैर करने वाले लोग साइबर अपराधियों के जाल में फंस रहे हैं. डा. वोंडरेसेक के अध्ययन के तहत 2,69,000 वैबसाइट्स का विश्लेषण किया गया. इस से पता चला है कि करीब 3.23त्न साइट्स पर प्रयोक्ताओं की गोपनीय जानकारी इकट्ठा करने वाली स्क्रिप्ट रखी हुई थी.

सेहत पर भी बुरा असर

जब युवा एक बार पोर्न देखना शुरू करते हैं तो उन्हें इस के लिए एकांत की तलाश होती है और इस के लिए रात का समय सब से अच्छा रहता है इसलिए रात भर जाग कर पोर्न फिल्में देखते हैं और सुबह फिर डेली रूटीन के काम में लग जाते हैं. इस कारण नींद पूरी नहीं होती और सेहत बिगड़ने लगती है.

–       पोर्न देखने के बाद लोग कुछ ऐसा करना चाहते हैं जो उन के स्वभाव और प्राकृतिक तौर पर उन के दिमाग का हिस्सा नहीं है. चाहे वह जानवरों के साथ, कई लोगों के साथ हो या फिर कष्टकारी सैक्स ही क्यों न हो, वे सब ट्राई करना चाहते हैं.

–       युवा अपना काफी पैसा पोर्न फिल्में देखने में बरबाद करते हैं जिस से उन्हें आर्थिक रूप से परेशानी होती है.

–       कई बार वर्तमान पार्टनर विजुअल इमेज वाली तसवीर से मेल नहीं खाता, जिस से सैक्स इच्छा घटने लगती है क्योंकि वह साथी से कुछ ऐक्स्ट्रा की उम्मीद करने लगता है.

ब्लू व्हेल चैलेंज गेम से भी ज्यादा खतरनाक हैं ये गेम्स

इन दिनों औनलाइन गेम, ब्लू व्हेल गेम बच्चों की मौत की वजह से सुर्खियों में है. इस गेम को दुनिया के खतरनाक औनलाइन गेम में गिना जाता है. इस गेम का शिकार ज्यादातर किशोर होते हैं, जिन्हें इस गेम के जरिए खतरनाक चैलेंज दिए जाते हैं. बता दें कि इस गेम को बैन किया जा चुका है. भारत सरकार ने इंटरनेट पर मौजूद इस गेम की सभी लिंक हटाने के आदेश दे दिए हैं, बावजूद इसके इस गेम की वजह से बच्चों की खुदकुशी जैसे कई मामले सामने आ रहे हैं.

बता दें कि ब्लू व्हेल चैलेंज कोई पहला ऐसा खतरनाक चैलेंज नहीं है, इससे पहले भी ऐसे कई देशों में ऐसे चैलेंज आ चुके हैं जो लोगों को मौत के घाट उतार चुके हैं.

एयरोसोल चैलेंज

ये गेम 2014 में चर्चा में आया जब इस गेम के चलते कई बच्चों ने खुद को घायल कर लिया. इस गेम में बच्चों को स्किन पर एयरोसोल (Aerosol) स्प्रे छिड़कने का टास्क दिया जाता था. उस समय बच्चे स्प्रे करती हुई वीडियो को सोशल मीडिया पर पोस्ट करते थे. इस गेम से अमेरिका में कई बच्चों ने स्किन के बहुत करीब से स्प्रे छिड़ककर खुद को जला लिया था.

नेक्नोमिनेट

ये एक ड्रिकिंक चैलेंज है, जिसमें एक सोशल मीडिया पर एक दूसरे को ड्रिंक को लेकर अजीबोगरीब चैलेंज दिया जाता था. इनमें से कुछ चैलेंज ऐसे भी थे जिनके चलते लोगों ने मौत को गले लगा लिया. पिसे हुए चूहे और कीड़ो का काकटेल बना कर पीना, गोल्डफिश को निगलना, अडें, बैटरी का लिक्विड, यूरीन और 3 गोल्डफिश को एक साथ मिलाकर जूस पीना, टॉयलेट क्लीनर, वोडका और मिर्च पाउडर का शेक पीने जैसा इस चैलेंज का हिस्सा था.

पास-आउट चैलेंज

ये गेम सोशल मीडिया के जरिए आगे बढ़ रहा था. गेम में अमरीकी बच्चे एक दूसरे को सोशल मीडिया खतरनाक चैलेंज देते थे. ये चैलेंज खुद को आग से जलाने, सीने पर चढ़ कर सांस रोकने या गरम पानी खुद पार डाल लेने का चैलेंज होते थे. इस गेम की वजह से कई बच्चों ने अपने भाई-बहनों को भी बुरी तरह जला दिया था.

रेपले

ये एक ऐसा चैलेंज है, जिसें महिला विरोधी अपराधों को बढ़ावा देने वाला शुरू किया गया था. हालांकि कुछ देशों के इसके खिलाफ होने के चलते इस पर जल्दी ही रोक लगा दी गई थी. अर्जेंटीना, इंडोनेशिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देश शामिल थे जिन्होंने इस पर बैन लगा दिया था.

फायर चैलेंज

ये चैलेंज पूरी तरह खुद को जलाने को था. इसमें लोग एक दूसरे को खुद पर शराब छिड़क कर उसमें आग लगाने या खुद पर पर्फयूम डालकर उस पर लाइटर आन करके जलाने जैसा चैलेंज दिया जाता था.

लोग ऐसे चैलेंज को एक्सेप्ट करते थे और सोशल मीडिया पर इसकी वीडियोंज को पोस्ट करते थे. इस चैलेंज से बहुत से बच्चे और यूवा मौत की चपेट में आ चुके हैं.

दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश तक, देश में कहीं सुरक्षित नहीं महिलाएं

10 जनवरी, 2017 दिल्ली : राजधानी में फुटपाथ पर रहने वाली एक किशोरी से गैंगरेप करने के बाद उसे बेबस हालत में छोड़ने की घटना ने झकझोर कर रख दिया. किशोरी  साढ़े 7 माह की गर्भवती थी. रेप के बाद किशोरी ने अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया. आरोपियों ने किशोरी के साथ फुटपाथ पर ही रेप किया और मरने के लिए उसे वहीं छोड़ दिया.

6 जनवरी, 2017 उत्तर प्रदेश : महिलाओं की सुरक्षा के मामले में हमेशा सवालों के घेरे में रहने वाले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में 4 हैवानों ने पीडि़ता के साथ रेप की कोशिश की लेकिन जब पीडि़ता ने हिम्मत न हारते हुए अपनी आबरू बचाने के लिए उन का विरोध किया तो सनक में डूबे सिरफिरों ने पीडि़ता के कान काट दिए और फरार हो गए.

4 जनवरी, 2017 : नए साल की बदनुमा शुरुआत हुई  सोनीपत में जहां बर्बरता और कायरता का परिचय देते हुए समाज के वहशी दरिंदों, हत्यारों ने एक बुजुर्ग महिला के प्राइवेट पार्ट में टौयलेट क्लीनर की प्लास्टिक की बोतल डाल दी. लगातार ब्लीडिंग की वजह से उस बुजुर्ग महिला की मौत हो गई. पीडि़ता के शव का पोस्टमौर्टम करने वाले डाक्टरों का मानना है कि उन्होंने इस तरह का क्रूर और बर्बर कृत्य अपने जीवन में नहीं देखा. 80 वर्षीय वृद्धा के साथ निर्भया जैसी बर्बरता अपराधियों के बुलंद होते हौसलों का जीताजागता प्रमाण ही है.

4 जनवरी, 2017 : बेंगलुरु में समाज को शर्मसार करने वाला ऐसा वीडियो सामने आया जो किसी भी सभ्य समाज को स्वीकार नहीं होगा. घर से महज कुछ ही दूरी पर एक लड़की अकेली रात में घर की ओर बढ़ रही थी. तभी 2 लड़के स्कूटर से उस के पीछे से आते हैं और आगे जो कुछ भी होता है वह अत्यंत ही निंदनीय है. लड़की से छेड़खानी करने के बाद उसे सड़क पर बेबस हालत में छोड़ कर वे भाग जाते हैं. छेड़छाड़ के दौरान लड़की बचाव की पूरी कोशिश करती है लेकिन सफल नहीं हो पाती. इस घटना का एक अन्य शर्मनाक पहलू यह था कि छेड़छाड़ के दौरान प्रत्यक्षदर्शियों में से कोई भी लड़की की मदद के लिए आगे नहीं आया.

31 दिसंबर, 2016 : बेंगलुरु की भयावह रात जहां सड़कों पर नए साल का जश्न मनाने निकली कई महिलाओं के साथ मध्य बेंगलुरु के एमजी रोड, ब्रिगेड रोड और चर्च स्ट्रीट पर मनचलों ने महिलाओं से छेड़छाड़ की. मनचलों ने महिलाओं पर न केवल भद्दे कमैंट किए बल्कि उन के साथ शारीरिक छेड़छाड़ करने की भी कोशिश की. मदद की गुहार लगाने पर पुलिस ने ऐसी महिलाओं की मदद से परहेज किया. इन घटना की प्रत्यक्षदर्शी गवाह और बेंगलुरु मिरर की फोटोग्राफर अनंता सुब्रमण्यम ने इस घटना के बारे में ट्वीट कर के कहा था, ‘सड़कों पर ‘हैपी न्यू ईयर’ के शोर की जगह ‘हैल्प मी’ ने ले ली थी.’

23 दिसंबर, 2016 लखनऊ : नवाबों की नगरी लखनऊ जिसे तहजीब और नजाकत की नगरी भी कहा जाता है, वहां इस के मिजाज के उलट 23 दिसंबर की रात हैवानियत का खेल खेला गया. कुछ अज्ञात लोगों ने 7 साल की बच्ची के साथ रेप किया और उसे खून से लथपथ हालत में पुलिस थाने के बाहर छोड़ गए. वारदात साढ़े 3 बजे दिन को हुई जब लड़की पास की दुकान से सामान खरीदने गई थी. मासूम बच्ची पुलिस को थाने के पास झाडि़यों में मिली, उसे तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया.

16 दिसंबर, 2012 निर्भया कांड के बाद एक मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ ही सही मगर कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक लोग सड़कों पर उतरे थे और इंसाफ की मांग इसलिए की थी कि आज यह किसी और की बेटी के साथ ऐसा हुआ है तो कल हमारी बेटी के साथ भी हो सकता है. उस दौरान पीडि़ता के परिवार के साथ किया गया वादा अभी भी अधूरा है. तमाम कमेटियां बनाई गईं, कानून बने. बावजूद इस के, महिलाओं के खिलाफ दिनोंदिन बढ़ते अपराध निर्भया के बलिदान को मुंह चिढ़ा रहे हैं.

भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के मुताबिक, साल 2015 में भारत में बलात्कार के कुल 34 हजार 651 मामले दर्ज किए गए. बलात्कार पीडि़तों की आयु 6 से ले कर 60 साल तक की थी. इस के अलावा महिलाओं से जुड़े अपराधों की संख्या 3 लाख 27 हजार रही. देश में हर दिन औसतन 93 औरतें बलात्कारियों का शिकार बन रही हैं.

ये आंकड़े यह चीखचीख कर बता देते हैं कि भारत ही नहीं, दुनिया के किसी भी कोने में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. पिछले साल 6 अक्तूबर को बीए में पढ़ने वाली एक लड़की ने बिहार के वैशाली के थानाइंचार्ज रंजीत कुमार पर आरोप लगाया कि रंजीत उसे शादी का झांसा दे कर 2 सालों तक उस का यौनशोषण करता रहा. लड़की ने वैशाली थाना में यौनशोषण के लिए एफआईआर दर्ज करा दी है.

लड़की ने एफआईआर में लिखा है कि एक बार वह छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने गई थी. उस के बाद केस की जांच के बहाने रंजीत कुमार रोज उस के मोबाइल फोन पर कौल करने लगा और काफी देर तक बातें करता रहता. केस के सिलसिले में उसे कई दफे थाना बुलाया और कई दफे रंजीत उस के घर पर भी पहुंच गया. इसी दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बात विवाह तक पहुंच गई. विवाह करने की बात कह कर रंजीत ने 2 सालों तक उस के शरीर से खिलवाड़ किया और बाद में मुकर गया.

आम इंसान तो दूर, पढ़ेलिखे और समझदार लोग भी यौनशोषण के शिकार हो जाते हैं. साल 2015 के जनवरी महीने में बिहार के भभुआ जिले की महिला डीएसपी, निर्मला कुमारी (2006 बैच की बिहार पुलिस सेवा की औफिसर) ने कैमूर के एसपी, पुष्कर आनंद (2009 बैच के आईपीएस औफिसर) पर उस से विवाह करने का झूठा भरोसा दे कर अंतरंग संबंध बनाने का आरोप लगा कर बिहार सरकार और पुलिस मुख्यालय में हड़कंप मचा दिया था. सूबे में किसी महिला पुलिस औफिसर के अपने ही सीनियर औफिसर पर यौनशोषण करने का आरोप मढ़ने का पहला वाकेआ सामने आया था. डीएसपी ने भभुआ के महिला थाने में दर्ज एफआईआर में एसपी पर यौनशोषण का आरोप लगाया और यह भी लिखा कि जब उस ने शादी से मुकरने का उस का विरोध किया तो एसपी ने कैरियर खराब करने की धमकी दे कर उस का मुंह बंद करने की पुरजोर कोशिश की.

निर्मला ने एसपी के पिता उमाकांत मेहता और माता के खिलाफ भी आईपीसी की धारा 376 (2)बी, 120 (बी) 354 (ए), 354 (डी) और 509 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी.

निर्मला ने एफआईआर में कहा कि एसपी पुष्कर आनंद ने उस के जौइन करने के 2 दिनों के बाद से ही फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए उस से दोस्ती और नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी थी. कुछ दिनों बाद एसपी ने उस से विवाह करने की इच्छा जाहिर की और उन्होंने अपने घर वालों को भी इस बारे में बताया. उस के बाद एसपी के घर वालों ने उस की जन्मकुंडली मांगी थी. दोनों के विवाह की बात आगे बढ़ने के बाद दोनों और नजदीक आए. विवाह की बात के आगे बढ़ने के बाद दोनों के बीच अंतरंग रिश्ते भी बने.

जन्मकुंडली देने के कुछ दिनों के बाद ही जब महिला पुलिस औफिसर के परिवार वालों ने एसपी के परिवार वालों से मिल कर विवाह की तारीख पक्की करने के बारे में बात की तो यह कह कर विवाह से इनकार कर दिया गया कि पुष्कर और निर्मला की जन्मकुंडली मिली ही नहीं. इस वजह से दोनों की शादी मुमकिन ही नहीं है.

एसपी ने सफाई दी थी निर्मला काम के सिलसिले में अकसर उन के चैंबर में आतीजाती थी. इसी बीच लगता है कि उसे किसी बात को ले कर गलतफहमी हो गई. कुछ समय के बाद इसी बीच निर्मला ने उन से शादी की बात की,

पर उन्होंने इस की अनदेखी कर दिया. इस के बाद भी वह मौकेबेमौके शादी की इच्छा जाहिर करती रही. बाद में उस ने शादी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया.

एसपी का दावा है कि निर्मला पहले भी कई मामलों में विवादित रह चुकी है. इस मामले पर भले ही पुलिस महकमे ने परदा डाल कर अपनी किरकिरी होने से बचा लिया लेकिन इस मामले ने इस बात का तो भंडाफोड़ कर ही दिया कि महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है, चाहे वह समाज और दुनिया को सुरक्षा देने का दावा करने वाला पुलिस महकमा ही क्यों न हो?

बदलाव की समीक्षा

मानव विकास संस्थान यानी आईएचडी द्वारा ‘मेकिंग सिटीज सेफ ऐंड इन्क्लूसिव: पर्सपैक्टिव फ्रौम साउथ एशिया’ विषय पर दिल्ली में आयोजित सैमिनार में दिल्ली व पटना जैसे शहरों में गरीबी, असमानता व हिंसा पर जम कर बहस चली. सैमिनार में प्रस्तुत रिसर्चपेपर के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि दिल्ली में 2012 में हुई रेप की घटना का कईर् सामाजिक संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था और उस के बाद फौजदारी कानून में कई संशोधन किए गए.

सवाल यह उठता है कि क्या महिलाओं की सुरक्षा के लिए चलाए गए अभियानों या सरकार की ओर से महिला सुरक्षा को ले कर उठाए गए कदमों से महिलाओं में अपने साथ हुई छेड़छाड़, बलात्कार की वारदातों की रिपोर्ट दर्ज कराने की हिम्मत आई है? क्या लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले अपराध की बढ़ोतरी से उन के परिजनों में खौफ का माहौल बना है? क्या इसी खौफ की वजह से कई जगहों पर लड़कियों को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई है?

एवौन इंडिया की प्रशिक्षण प्रमुख नीतू पाराशर कहती हैं कि यह बहुत ही गंभीर मामला है. वाकई में आज के समय में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. औफिस से निकलते समय डर लगता है कि सहीसलामत घर पहुंच सकेंगे कि नहीं. वर्तमान माहौल और महिलाओं के प्रति लोगों के व्यवहार के कारण महिलाओं का घर से बाहर निकलना व सड़क पर चलना असुरक्षित हो गया है.

डर के साए में

आईएचडी के सर्वे के मुताबिक, पटना में 66.8 प्रतिशत लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 16.3 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्हें कभीकभार सुरक्षा को ले कर डर होता है जबकि 16.5 फीसदी लोग खुद को पूरी तरह से असुरक्षित मानते हैं. दूसरी तरफ पटना के स्लम इलाके में रहने वाले लोगों में से 35.4 फीसदी ही खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 33.3 फीसदी लोगों को कभीकभी सुरक्षा का डर सताता है और 31.2 फीसदी लोग हमेशा असुरक्षा के साए में जिंदगी गुजार रहे हैं.

पटना की सामाजिक कार्यकर्ता अनिता सिन्हा कहती हैं कि महिलाएं और लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. सरकार, कानून और सामाजिक संगठन भले ही महिलाओं की सुरक्षा को ले कर कितने भी दावे करें लेकिन महिलाओं को कदमकदम पर यौनउत्पीड़न, छेड़छाड़, छींटाकशी, गंदे इशारों आदि से सामना करना पड़ता है. करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों से महिलाओं को खतरा बना रहता है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट को देख कर हैरत और अफसोस होता है कि बलात्कार के कुल मामलों में 47.2 फीसदी में पीडि़त लड़की के परिचित ही शामिल थे. इन में पिता, चाचा, मामा, भाई, दादा जैसे नजदीकी रिश्तेदार और पड़ोसी जैसे लोग ही शामिल हैं. बलात्कार के कुल 1,127 मामलों में से 532 में कोई न कोई परिचित ही आरोपी था. इन में 4 ऐसे मामले थे जिन में दादा, पिता या भाई को आरोपी पाया गया, 36 ऐसे मामले थे जिन में परिवार का कोई नजदीकी सदस्य ही आरोपी था. इस के अलावा 44 रिश्तेदारों और 182 पड़ोसियों को आरोपी पाया गया है.

करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों, नौकरों, ड्राइवरों आदि द्वारा बच्चियों के अंगों से छेड़छाड़ करने व उन के साथ जबरन सैक्स संबंध बनाने की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसी वारदातों के बढ़ने की सब से बड़ी वजह पारिवारिक व सामाजिक लिहाजों, संस्कारों व मर्यादाओं का तेजी से टूटना है.

समाजसेवी किरण कुमारी कहती हैं कि पहले परिवार के करीबी रिश्तेदारों के बीच कुछ मर्यादा, सीमाएं और लिहाज होता था, जो आज की भागदौड़ की जिंदगी में खत्म होता जा रहा है. रिश्तेदारों और पड़ोसियों की गंदी नजरों का शिकार मासूम बच्चियां बन रही हैं. इस से बच्चियों को बचाने के लिए उन के गार्जियन को ही एहतियात बरतने की जरूरत है.

पटना में 35.4 फीसदी लोगों की राय है कि महिलाएं पहले की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हुई हैं, जबकि 49.4 फीसदी लोगों को इस दिशा में कोई भी बदलाव या सुधार नजर नहीं आया. दिल्ली वालों का मानना है कि महिलाओं की सुरक्षा को ले कर दिल्ली महफूज नहीं है. 11 फीसदी लोग ही मानते हैं कि दिल्ली में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं.

रहना होगा सचेत

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील संजीव कुमार सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार ने महिला यौनउत्पीड़न सुरक्षा कानून-2010 तो बना दिया, पर उस के बाद भी महिलाओं का यौनशोषण कम नहीं हुआ है. इस कानून में किसी भी तरह के यौनउत्पीड़न को बलात्कार के बराबर माना गया है. कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौनउत्पीड़न यानी छेड़खानी, भद्दे इशारे, घूरना, टटोलना, गंदे जोक्स सुनाना, बारबार सामने आना, शारीरिक संबंध बनाने की पेशकश करना, शादी का झांसा दे कर सैक्स करना, अश्लील फिल्म दिखाना या कोई भी अशोभनीय शारीरिक, मौखिक या अमौखिक यौनाचार को इस कानून के दायरे में रखा गया है.

इस तरह की हरकतों पर केवल कानून के डंडे से रोक नहीं लगाई जा सकती है. महिलाओं को खुद सचेत रहने व किसी झांसे में फंसने से बचना होगा. अगर किसी महिला से उस का किसी तरह का कोई संबंधी विवाह से पहले सैक्स संबंध बनाने की बात करे तो महिला को उस से इनकार करना होगा. नौकरी देने, विवाह करने, कर्ज दिलाने, इम्तिहान में पास करा देने, फर्जी डिगरी दिला देने आदि के नाम पर महिलाएं यौनशोषण का शिकार होती रही हैं. ऐसे मामलों में उन्हें सचेत होना होगा.

यह सच है कि ज्यादातर लड़कियां और औरतें यौनशोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाती हैं. समाज में बदनामी होने के डर से वे चुप रह जाती हैं. कुछेक लड़कियां जब अपने अभिभावकों को इस बारे में बताती हैं तो वे भी इज्जत का हवाला दे कर चुप रहने की और अपने काम से मतलब रखने की सलाह दे कर मामले को रफादफा करने की कोशिश करते हैं. बलात्कार, छेड़छाड़ या किसी भी तरह के शारीरिक शोषण के खिलाफ पुलिस थाने में जब शिकायत ही दर्ज नहीं  कराई जाती है, तो गलत सोच वाले लोगों का हौसला बढ़ेगा ही.

पटना के पत्रकारनगर थाने के तहत आने वाले न्यू चित्रगुप्त महल्ले में एमबीए की 21 साल की छात्रा रोशनी ने पिछले साल 25 अक्तूबर को दोपहर में फांसी लगा कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली. प्यार के चक्कर में फंस कर उस ने यौनशोषण, दगाबाजी और ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर मौत को गले लगा लिया.

सुसाइड नोट में रोशनी ने लिखा था कि जब वह इंटरमीडिएट में पढ़ती थी तब एक सहेली की शादी में शरीक होने उस के घर गई थी. वहीं सहेली के भाई हीरा से मुलाकात हुई. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई. 3 सालों के बाद उसे पता चला कि उस का आशिक धोखेबाज है. वह इंजीनियरिंग पास भी नहीं था. वह अपराधी, शराबी और बदमाश है एवं कई बार जेल की हवा खा चुका है. जब रोशनी ने हीरा से रिश्ता तोड़ने की कोशिश की तो वह इंटरनैट पर नग्न युवती के शरीर पर उस के चेहरे का फोटो लगाने और उस के प्रेमपत्रों को घर वालों को देने और अखबार में छपवाने की धमकी दे कर ब्लैकमेलिंग करने लगा. इतना ही नहीं, हीरा और उस के दोस्तों ने उस के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया था.

अपनों से खतरा

10 साल की लड़की सोनी रोज की तरह तैयार हो कर स्कूल पहुंची. उस की क्लास के मौनीटर ने उस से कहा कि उस के हाथ के नाखून काफी बढ़े हुए हैं, इसलिए डायरैक्टर साहब ने उसे अपने चैंबर में बुलाया है. सोनी के साथ उस की एक सहेली भी डायरैक्टर के चैंबर में पहुंची. डायरैक्टर ने उस की सहेली को क्लास में भेज दिया और सोनी के साथ बलात्कार किया. स्कूल की छुट्टी होने पर सोनी को स्कूल की गाड़ी से उस के घर पहुंचा दिया गया. सोनी की मां को बताया गया कि स्कूल में ही सोनी बेहोश हो गई थी. जब सोनी को होश आया तो उस ने सारी बात बताई. उस के बाद सोनी के परिवार वाले और आसपास के लोग स्कूल पहुंच गए व जम कर तोड़फोड़ की.

पटना के पुराने इलाके पटनासिटी के पटना सिटी सैंट्रल स्कूल (दर्शन विहार) के डायरैक्टर पवन कुमार दर्शन की इस घिनौनी करतूत ने जहां स्कूलटीचर और स्टूडैंट के रिश्तों पर कालिख पोत दी है, वहीं मासूम बच्चियों की सुरक्षा पर एक बार फिर कई सवाल खड़े कर

दिए हैं. स्कूलटीचर, प्रिंसिपल, ड्राइवर, खलासी, नौकर, चापरासी, पड़ोसी समेत करीबी रिश्तेदारों की ओछी मानसिकता की शिकार मासूम बच्चियां हो रही हैं.

ऐसे मामलों का बढ़ना परिवार और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है. अपनों और आसपड़ोस की खूंखार निगाहों की सौफ्ट टारगेट बनी हुई हैं मासूम बच्चियां.

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील अशोक कुमार कहते हैं कि पहले लोग करीबी रिश्तेदारों व पड़ोसियों के पास अपनी बच्चियों को छोड़ कर बड़े ही आराम से किसी काम से बाहर चले जाते थे, आज ऐसा नहीं के बराबर हो रहा है. अपनों द्वारा ही भरोसा तोड़ने के बढ़ते मामलों की वजह से परिवार और पड़ोस के लोगों के पास बच्चियों को छोड़ने से लोग कतरानेघबराने लगे हैं.

परिवार और पड़ोस में बैठे लोगों की कुंठित मानसिकता और गंदी नजरों का आसान शिकार परिवार व पड़ोस की मासूम बच्चियां बन रही हैं. बच्चियों के जिस्म से खिलवाड़ कर उन के अपने ही लोग अपनी सैक्स की कुंठा को शांत करते हैं. पुलिस अफसर राकेश दूबे कहते हैं कि अपने आसपास खेलतेकूदते, स्कूल आतेजाते और छोटीमोटी चीज खरीदने महल्ले की दुकानों पर जाने वाले बच्चियों के साथ छेड़छाड़ करना उन के अपनों के लिए काफी आसान होता है. परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच व साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और मासूम बच्चियों को वह अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले. ऐसे में हरेक मांबाप को अपने बच्चों पर खास ध्यान रखने की जरूरत है. मासूम बच्चियों की सुरक्षा को ले कर मांबाप को किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

समाज की टूटती मर्यादाओं व घटिया सोच की वजह से ही बच्चियों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है. अब इंसान अपने भाई, चाचा, मामा, दोस्तों समेत अपनों से लगने वाले पड़ोसियों पर भरोसा न करे, तो फिर किस पर करे? आज की हालत यह है कि लोगों की नीयत बदलते देर नहीं लगती. अपने ही अपनों के भरोसे का खून कर रहे हैं. यह रिश्तों और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक बन चुका है.

झाड़फूंक के बहाने खिलवाड़

ओझा और तांत्रिकों की कारगुजारियों को अगर गौर से देखा जाए तो पता चल जाता है कि वे झाड़फूंक और टोटका के बहाने औरतों के जिस्मों को अपने हाथों से टटोलटटोल कर अपनी वासना की प्यास बुझा रहे हैं. कोई भी ओझा औरतों के घरवालों के सामने बड़ी ही चालाकी व बेशर्मी से बीमार औरत के कपड़ों के भीतर अपना हाथ घुसेड़ देता है और आंखें बंद कर मंत्र पढ़ने का ढोंग करता रहता है. औरत के घरवाले बाबा की अश्लील हरकतों को इलाज करने का तरीका समझ कर चुपचाप देखते रहते हैं और बाबा बेरोकटोक वासना का गंदा खेल खेलता रहता है. झाड़फूंक के नाम पर औरतों को चूमना व उन के जिस्मों को सहलाना बाबाओं का पुराना शगल है.

खुद की सैक्स की भूख को शांत करने के लिए ढोंगी और पाखंडी बाबा इस तरह का हथकंडा अपनाते हैं. आएदिन यह सुननेपढ़ने को मिलता है कि फलां जगह फलां बाबा ने इलाज के नाम पर औरतों को नशा दे कर बलात्कार किया या उस के अंगों से खिलवाड़ किया. इस के बाद भी औरतों और उन के परिजनों की आंखें नहीं खुल पा रही हैं क्योंकि बहुत सी औरतों को इस खिलवाड़ में प्राकृतिक आनंद भी आता है.

डायन के नाम पर जुल्म

डायन होने के आरोप में गरीब और बेसहारा औरतों, खासकर विधवाओं को तंग, तबाह और प्रताडि़त करने की वारदातें आज की मैडिकल साइंस, टैक्नोलौजी और तरक्की के दावों पर तगड़ा तमाचा की तरह हैं. आज भी देश के कई हिस्सों में औरतों को डायन करार दे कर उन के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जा रहा है. सरकार, प्रशासन, पुलिस और कानूनों को ठेंगा दिखा कर गांवों में उन्मादी लोग जिसे चाहते हैं, डायन करार दे कर अपना मतलब साधते रहते हैं. समूचे देश में हर साल डायन बता कर करीब 3 हजार औरतों को परेशान किया जाता है.

डायन के आरोप लगने के बाद गांव वालों की पिटाई के बीच जान बचा कर भाग निकलने वाली मालती उस वारदात के बाद चुप सी हो गई है. बहुत कुरेदने पर थोड़ा बोलती है. पटना से सटे दानापुर प्रखंड के रूपसपुर पीपलतल गांव की रहने वाली 56 साल की मालती और उस की 10 साल की बेटी सुनिंदा को 3 साल पहले डायन बता कर गांव वालों ने पिटाई शुरू की थी कि वह किसी तरह भाग निकली. उस का बेटा रंजन पटना के ए एन कालेज में बीए की पढ़ाई कर रहा है.

काफी कुरेदने पर मालती बताती है कि वह दोपहर में अपने पति के लिए खाना पहुंचाने के लिए सैलून जा रही थी, तभी उस के पड़ोसी सुनील और उस के परिवार वालों ने उसे डायन कह कर मारनापीटना शुरू कर दिया. पिटाई करने के साथ सुनील चिल्ला रहा था कि उस ने उस की बेटी को कालाजादू कर के मार दिया है. कुछ दिन पहले ही उस की बेटी की किसी बीमारी से मौत हो गई थी.

मालती कहती है, ‘‘मैं 20 साल से गांव में रह रही हूं. कभी किसी से झगड़ाफसाद नहीं हुआ. पति सुरेंद्र ठाकुर सैलून चला कर पविर को पाल रहे हैं. एक बेटा पौलिटैक्निक की पढ़ाईर् कर रहा है और दूसरा बीए में पढ़ रहा है. मेरे भी बालबच्चे हैं, किसी दूसरे के बच्चे को मारने के बारे में कभी सोचा भी नहीं. उस के बाद भी मुझ पर डायन होने और लड़की को मारने का आरोप लगाया गया.’’ इतना कह कर मालती सिसकने लगती है.

बिहार के कटिहार जिले के कुरसैला इलाके की रहने वाली राजकुमारी कुछ ऐसे ही दबंगों की सताई हुई है और गांव से भाग कर पटना जंक्शन के पास के महावीर मंदिर के गेट पर भीख मांग कर जिंदगी गुजार रही है. 65 साल की चंपा से जब गांव छोड़ने के बारे में पूछा गया तो उस की आंखें शून्य में कुछ घूरने लगती हैं, फिर आंखों से टपटप आंसू बहने लगते हैं. वह बताती है कि उस के पति की मौत 12 साल पहले हो गई. और उस के 2 बेटे हैं, दोनों पंजाब में मजदूरी करते हैं. पति की मौत के बाद वह गांव में अकेले रहने लगी थी. गांव में ही उस का छोटा सा पक्का घर था और 18 कट्ठा खेत थे. गांव के कुछ अपराधी स्वभाव के लोग उस से खेत बेचने के लिए कहते थे. उन की बात नहीं मानने पर वे लोग धमकाने लगे.

राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात और महाराष्ट्र के 50 से ज्यादा जिलों में औरतों को डायन बता कर उन पर अत्याचार किया जाता है. काला जादू, टोनही, टोटका जैसे अंधविश्वास से भरे आरोप लगा कर किसी औरत को डायन करार दे कर उसे मार दिया जाता है. डायनप्रथा की ओट में कई संगीन अपराधों को अंजाम दिया जाता है. इलाके के दबंग ओझा, तांत्रिक, बाबाओं के साथ मिल कर साजिश रचते हैं और किसी औरत को डायन करार दे देते हैं. विडंबना यह है कि अगर किसी औरत को डायन करार दे दिया गया तो उस के नातेरिश्तेदार भी सामाजिक दबाव से उस का साथ देना छोड़ देते हैं.

डायनप्रथा को रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं, पर इस के बाद भी औरतों को डायन करार दे कर उन्हें प्रताडि़त करने के मामलों में कमी नहीं आई है. कानून कहता है कि किसी औरत को डायन करार देना अपराध है और इस के लिए 3 महीने की जेल या 1 हजार रुपया जुर्माना हो सकता है. किसी औरत को डायन बता कर उसे जिस्मानी और दिमागी यातना देने वाले को 6 महीने की जेल और 2 हजार रुपया जुर्माना या दोनों सजा हो सकती हैं. किसी महिला को डायन करार दे कर उस के खिलाफ समाज के लोगों को भड़काने पर 3 महीने की कैद और 1 हजार रुपया जुर्माना के तौर पर वसूला जा सकता है. कानून यह भी कहता है कि डायन बता कर उस के साथ झाड़फूंक या टोटका करने वाले को 1 साल की जेल और 2 हजार रुपए के जुर्माने की सजा हो सकती है. सारे कानून फाइलों में बंद हैं और  डायन का आरोप लगा कर विधवाओं व गरीब औरतों की हत्या का खुलाखेल जारी है.

एसिड अटैक से जलते सपने

21 अक्तूबर, 2012 की उस काली रात ने चंचल और उस की बहन सोनम की जिंदगी में घुप अंधेरा भर दिया था. आधीरात को जब गांव में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ था तो चंचल को छत पर कुछ आवाजें सुनाई दीं. उस की नींद खुल गई. उस ने देखा कि 3 लड़के उस की छत पर खड़े हैं और मुसकरा रहे हैं. अंधेरे में जब तक उन्हें पहचानने की कोशिश करती तब तक उन्होंने तेजाब भरी बोतल उस के सिर पर उड़ेल दी. दर्द और तेज जलन से बिलबिलाती चंचल की आवाज सुन कर सोनम की नींद भी खुल गई. बदमाशों ने उस के ऊपर भी बोतल से भरा तेजाब उलट दिया. वह भागने लगी. चंचल दर्द से तड़प कर बेहोश हो चुकी थी. उस के बाद तीनों बदमाश छत से कूद कर भाग गए.

यह बताते हुए चंचल की आंखों में आंसू भर आते हैं और उस के साथ उस की बहन सोनम भी सिसकने लगती है. पटना शहर से 30 किलामीटर दूर मने प्रखंड छिनावां गांव की रहने वाली दोनों बहनों का कुसूर इतना ही था कि उन्होंने छेड़खानी करने वाले लफंगों को जम कर फटकार लगाई थी. कालेज आतीजाती लड़कियों के साथ छेड़खानी करने वाले बदमाशों के खिलाफ आवाज उठाना चंचल को इतना महंगा पड़ा कि उस पर तेजाब फेंका गया, जिस से उस का शरीर का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जल गया. उसे मांस का चलताफिरता लोथड़ा बना कर रख दिया गया.

चंचल कहती है कि जब भी वह कंप्यूटर की कोचिंग के लिए घर से निकलती थी तो रास्ते में अनिल राय, राजकुमार और धनश्याम नाम के 3 लड़के उस के साथ छेड़खानी करते थे और अंटशंट बातें बोलते थे. शुरू में तो कई दिनों तक वह चुपचाप सब सहती रही और उन की अनदेखी करती रही. इस से उन बदमाशों के हौसले काफी ज्यादा बढ़ गए. बदमाश लोग उस का दुपट्टा तक खींचने लगे और गंदे इशारे करने लगे. सड़क पर ही उस के सामने खड़े हो जाते और साथ भाग चलने की बातें करते थे. मोटरसाइकिल से घरों के चक्कर लगाना, घर के खिड़कीदरवाजों के परदे फाड़ देना और खिड़कियों पर पत्थर मारना आएदिन की बात हो गई थी. एक दिन चंचल ने गुस्से में आ कर बदमाशों को फटकार लगा दी और खूब खरीखोटी सुनाई.

एसिड अटैक ने दोनों लड़कियों समेत उन के पूरे परिवार की जिंदगी की राह को बदल दिया है. समूची जिंदगी पुलिस, कोर्ट, अस्पताल में उलझ कर रह गईर् है. चंचल और उस की बहन सोनम के इलाज पर अब तक 8 लाख रुपए से ज्यादा की रकम खर्च हो चुकी है. अभिनेता जौन अब्राहम समेत कई एनजीओ की मदद से इलाज की रकम इकट्ठी की गई.

देश के हर हिस्से में आएदिन महिलाओं के साथ होने वाली, इंसानियत को तारतार करने वाली ये बर्बर घटनाएं सिर्फ खबर ही नहीं, बल्कि सभ्य समाज पर एक करारा तमाचा सरीखी हैं. दिल को दहला देने वाले राजधानी दिल्ली के निर्भया कांड को पूरे 4 साल हो गए हैं लेकिन इन बीते 4 सालों के दौरान बलात्कार के मामलों में कमी नहीं हुई है. हाल के दिनों में पूरे देश में महिलाओं

पर यौनहिंसा सहित विभिन्न तरह के अत्याचार के मामले काफी हद तक बढ़ गए हैं. महिलाओं, नाबालिग लड़कियों तथा छोटीछोटी बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है.

हर जगह यही कहानी

महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएं किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं हैं. दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश सभी राज्यों में बलात्कार तथा छेड़छाड़ की बर्बर घटनाएं सिर चढ़ कर बोल रही हैं. घर हो या बाहर, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. हैरानी की बात है कि दरिंदे न महिला की उम्र देखते हैं न जगह. वह मासूम बच्ची हो या बुजुर्ग महिला, वे सभी को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं. ऐसे समाज को हम किस आधार पर सभ्य व सुसंस्कृत समाज कह सकते हैं.

एक तरफ जहां देश सामंती, रूढि़वादी मानसिकता की राह पर चल रहा है जहां लड़कियां पहले के मुकाबले ज्यादा पढ़लिख रही हैं, बड़ेबड़े मुकाम हासिल कर रही हैं, वहीं उन के खिलाफ अपराध भी उसी गति से बढ़ रहे हैं. पहले उन्हें घर की चारदीवारी में कैद कर के रखा जाता था. अब वे घर की चौखट लांघ कर अपने पंखों को उड़ान देने की कोशिश कर रही हैं तो समाज के वहशी दरिंदे उन के पंख कतरने को तैयार बैठे हैं. उन्हें वे अपने मनोरंजन का खिलौना समझ कर रौंद रहे हैं.

समाज की सामंती और रूढि़वादी ताकतें लड़कियों के अधिकारों व उन की आजादी पर हमले का कोई मौका नहीं छोड़ रहीं. कोईर् महिलाओं के मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक का आदेश देता है तो कोई कहता है उन्हें खुले कपड़े नहीं पहनने चाहिए. वहीं, कोई फरमान जारी करता है कि महिलाएं घर से बाहर अकेले न निकलें तो कोईर् कहता है कि देररात में बाहर न निकलें. कुल मिला कर सारे सामंती फरमान महिलाओं के लिए हैं. खाप पंचायत तो यहां तक कहती हैं कि रेप से बचने के लिए लड़कियों का वयस्क होने से पहले ही विवाह कर दिया जाए. ऐसा लगता है समाज महिलाओं की स्वतंत्रता को पचा नहीं पा रहा है. स्त्रियों के मसले पर आधुनिक और रूढि़वादी परंपराओं के बीच सीधा टकराव दिखता है.

मैट्रो में आत्मरक्षा के लिए महिलाएं रख सकेंगी चाकू

महिलाओं के साथ बढ़ते अपराधों को देखते हुए हाल ही में सीआईएसएफ ने एक अहम फैसला लिया है. सीआईएसएफ के  फैसले के अनुसार, अब महिलाएं अपनी  आत्मरक्षा के लिए अपने साथ 4 इंच तक का चाकू रख सकेंगी. सीआईएसएफ का यह फैसला दिल्ली में रहने वाली महिलाओं पर ही लागू होगा, खासकर उन महिलाओं पर जो मैट्रो में सफर करती है. एक सर्वे के मुताबिक, तकरीबन 30 लाख पैसेंजर रोजाना मैट्रो में सफर करते हैं. इस में एकतिहाई संख्या महिलाओं की होती है. महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए सीआईएसएफ ने मैट्रो में माचिस और लाइटर ले जाने पर पाबंदी को भी हटा दिया है.

हैरानी की बात है कि निर्भया कांड के बाद बढ़े सुरक्षा उपायों के बावजूद रेप के मामले घटने के बजाय बढ़ क्यों रहे हैं? गैरसरकारी संगठनों का कहना है कि देश की जटिल न्याय प्रणाली की वजह से लंबे खिंचते मामले और ज्यादातर मामलों में सुबूतों के अभाव में अभियुक्तों का बरी हो जाना इस की प्रमुख वजह है.

रेप के मामलों में अभियुक्तों को सजा मिलने का राष्ट्रीय औसत 28 फीसदी है लेकिन राजधानी दिल्ली में यह दर महज 17 फीसदी है. इस से अपराधियों के हौसले बुलंद रहते हैं. रेप के बहुत से मामलों की पुलिसिया जांच ठीक से नहीं होती जो पीडि़ताओं को न्याय नहीं मिल पाने की सब से बड़ी वजह होती है. जांच के दौरान हुई खामियों के चलते अभियुक्त अकसर अदालत से बेदाग छूट जाते हैं

लचर कानून व्यवस्था

पुलिस व कानून व्यवस्था पूरी तरह से पंगु हो गई है. अपराधों की रोकथाम व पीडि़ताओं को शारीरिक, मानसिक व आर्थिक सुरक्षा देने के बजाय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग महिलाओं को ही दोषी ठहरा देता है. यह समाज की मानसिक विकृति का परिचायक है. नारी अधिकारों को ले कर समाज में द्वंद्व चल रहा है. संसद में सिर्फ कानून बना कर हम नारी अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते. जब तक लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक कुछ नहीं हो सकता. महिलाओं को भी आजादी से जीने का हक है. पुरुषों की तरह उन्हें भी स्वतंत्र हो कर खुलेआम सड़कों पर घूमने का हक है. महिलाओं पर बढ़ रहे विभिन्न तरह के हमलों को रोकने के लिए सही व वैज्ञानिक सोच के साथ उचित कदम उठाते हुए समाज को इस के लिए जागरूक करना आवश्यक है.

विदेशों में भी सुरक्षित नहीं

भारत ही नहीं, दुनिया में कहीं भी औरत महफूज नहीं है. अमेरिका की जौर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के सर्वे के मुताबिक, 3 में से एक अमेरिकी महिला यौनशोषण या दुर्व्यवहार की शिकार बनती हैं. वहां करीब 19.3 फीसदी औरतें ऐसी हैं जिन्होंने कम से कम एक बार बलात्कार की पीड़ा को झेला है. इस के अलावा 43.9 फीसदी वैसी महिलाएं हैं जो अपनी जिंदगी में यौनहिंसा की शिकार होती हैं. अमेरिका में हर 107 सैकंड पर एक महिला यौनशोषण की शिकार बनती है.

बलात्कार अपराध की सूची में दक्षिण अफ्रीका सब से ऊपर है. वहां हर साल 5 लाख के करीब बलात्कार की घटनाएं होती हैं. वहीं इंगलैंड में हरेक साल 75 हजार महिलाएं बलात्कारियों का शिकार बनती हैं. वहां की राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, इंगलैंड की 5 में से 1 महिला बलात्कार का दंश झेलती है.

पैनिक बटन

रेप के बढ़ते मामलों को ध्यान में रख कर केंद्र सरकार ने अब मोबाइल निर्माताओं को भारत में बिकने वाले मोबाइल फोनों में पैनिक बटन लगाने का निर्देश दिया है. कम कीमत वाले फोन में 5 या 9 का बटन और स्मार्टफोन में 3 बार पावर बटन दबा कर पैनिक बटन को सक्रिय किया जा सकता है. इस से पीडि़ता के परिजनों, मित्र या पुलिस को संकेत मिल जाएगा. सुरक्षा को और अचूक बनाने के 2018 से सभी मोबाइल सैट्स में जीपीएस होना भी अनिवार्य होगा ताकि दुर्घटना की जगह का पता लगाया जा सके. सरकार की दलील है कि मुसीबत की घड़ी में महिला के पास मदद की गुहार लगाने के लिए 1 या 2 सैकंड से ज्यादा समय नहीं होता. ऐसे में पैनिक बटन ही बेहतर विकल्प है.

साथ में ललिता गोयल

चीन-भारत विवाद और आर्थिक असमंजसता का माहौल

भारत के सिक्किम सैक्टर में घुसपैठ कर के चीन सैनिक दबाव बनाने में लगा है. चीन को लगता है कि उस के वन बैल्ट वन रोड सपने में भारत रोड़ा बन रहा है और इसलिए वह उसे सबक सिखाना चाहता है. तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति होने के कारण भारत से चीन की प्रतिस्पर्धा तो स्वाभाविक है पर वह इस स्पर्धा को जलन व शत्रुता में बदल देगा, यह अंदाजा तब नहीं था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में साबरमती के तट पर चीनी नेता शी जिनपिंग का स्वागत किया था. तब लगा था कि नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग भारत-चीन दोस्ती का नया पाठ लिख रहे हैं.

इन 2 सालों में भारत और चीन संबंधों में कड़वाहट आने में चाइना-पाक इकोनौमिक कौरिडोर की अहम भूमिका है जो पाकिस्तान के अधिकार में कब्जाए कश्मीर में से जाता है. भारत इस पर चीनी कदम नहीं देखना चाहता. चीन ने पाकिस्तान से न केवल अपने आर्थिक संबंध मजबूत कर लिए हैं, वह उसे सुझाव देने का वादा भी कर रहा है. इस कौरिडोर की सुरक्षा के नाम पर चीनी सैनिकों का पाकिस्तान आना शुरू हो गया है. पाकिस्तान में चीनी कालोनियां बननी शुरू हो गई हैं. अब तो पाकिस्तान को चीनी साम्राज्य का हिस्सा भी कहा जाने लगा है. आश्चर्य यह है कि पाकिस्तान को इस तमगे पर एतराज नहीं है. भारत तो इस का अनचाहा शिकार बन रहा है.

भारतीय पक्ष को अभी समझ नहीं आ रहा है कि इस गुत्थी को कैसे सुलझाया जाए. पहले दोनों देशों के राष्ट्रप्रमुख जहां मिलते थे, गर्मजोशी से मिलते थे पर अब एकदूसरे से औपचारिक हाथ मिला भर लेते हैं.

चीन का उठना और निरंतर उन्नति करना भारत के लिए सिरदर्द बनेगा, इस का अंदेशा कम था क्योंकि दोनों ही देश दशकों तक गोरे देशों के इशारों पर चलने को मजबूर रहे हैं. भारत ने 1947 से ही चीन का साथ दिया है हालांकि 1962 में भारत पर हमला कर चीन ने कह दिया था कि उसे भारत की जरूरत नहीं है.

चीन ने अब अपने बहुउत्साही प्रोग्राम वन बैल्ट वन रोड का प्लान ऐसा बनाया है जिस से भारत अलगथलग पड़ जाए. 3 खरब डौलर की यह योजना दुनिया के 60 देशों को प्रभावित करेगी. यह यूरोप, अफ्रीका व एशिया के देशों को एकदूसरे से सड़क या जलमार्ग से जोड़ देगी. भारत के लिए यह बहुत अफसोस की बात होगी कि वह इस का हिस्सा नहीं है और उसे इस का आर्थिक नुकसान होगा. चीन नाथूला पहाडि़यों को ले कर जो विवाद खड़ा कर रहा है वह एक तरह से उस की सीमा से सटे देशों को संदेश है कि चीन से सीमा विवाद में न उलझो.

चीन का कायापलट वास्तव में  आश्चर्यजनक है. मानव इतिहास में इतने सारे लोगों को इतने कम समय में इतनी आर्थिक उन्नति करते कभी नहीं देखा गया. भारत ने भी उन्नति की थी पर वह अभी भी उस की 20 प्रतिशत को छू नहीं पाई है. चीन समझता है कि भारत अब एक बारूद के ढेर पर बैठा है और उस का सामाजिक तानाबाना छिन्नभिन्न हो रहा है. यह वह समय है जब बाहरी शक्ति भारत पर जोरआजमाइश कर सकती है.

चीन सिक्किम के छोटे से दर्रे को मुख्यबिंदु बना कर अपने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को जबरन दूसरे देश में भेज रहा है ताकि इस से उसे युद्ध करने का मौका मिल सके. भारत को इस समय फूंकफूंक कर कदम रखना होगा क्योंकि वह युद्ध का जोखिम नहीं ले सकता. हमारी आर्थिक स्थिति प्रतिस्पर्धा के दौर में इस तरह की नहीं कि हम बेबात में चीन से उलझें. अपनी रक्षा के लिए हमें हर बलिदान करने को तैयार रहना होगा पर गरीबी, गंदगी, आर्थिक असमंजस्ता, धार्मिक विद्वेष के माहौल में गुजरते भारत को पश्चिमी एशिया की तरह व्यर्थ के युद्धों में फंस कर महाशक्तियों का मोहरा बन कर फंसना ठीक न होगा.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें