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बर्थडे स्पेशल : कभी बिग भी से भी ज्यादा फीस लेता था साउथ का यह सुपरस्टार

अभिनेता चिरंजीवी आज अपना 62वां जन्मदिन मना रहे हैं. उनका जन्म 22 अगस्त 1955 में हुआ था. चिरंजीवी साउथ इंडियन फिल्मों के साथ-साथ बौलीवुड में हाथ आजमा चुके हैं. उनकी फिल्मों में जबरदस्त एक्शन रहता है और साथ ही रोमांस का भी अलग अंदाज दिखाया जाता है.

चिरंजीवी नाम से मशहूर इस स्टार का असल नाम कोनिदेला शिव शंकर वरा प्रसाद है. लेकिन फिल्मों में एंट्री का फैसला लेने के बाद उन्होंने अपना नाम चिरंजीवी रख लिया. 90 के दशक में चिरंजीवी भारत के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले स्टार्स में से एक थे.

एक बार उन्होंने इस मामले में अमिताभ बच्चन को भी पीछे छोड़ दिया था. अमिताभ की एक फिल्म की फीस जहां 1 करोड़ थी, वहीं चिरंजीवी 1.5 करोड़ रुपए लेते थे.

चिरंजीवी वो पहले भारतीय एक्टर हैं जिनके नाम पर एक वेबसाइट बनाई गई थी. इतना ही नहीं वो पहले साउथ के स्टार हैं जिन्हें आस्कर (1987) में शामिल होने के लिए बुलाया गया था.

चिरंजीवी के फिल्मी प्रोजेक्ट्स की बात करें तो हाल ही में वह फिल्म कैदी नंबर-150 में नजर आए थे. इसके अलावा वह फिलहाल फिल्म ‘उय्यलावडा नरसिम्हा रेड्डी’ (Uyyalawada Narasimha Reddy) को लेकर बिजी हैं.

आ गया गूगल का लेटेस्ट ऐंड्रौयड वर्जन ओरियो, जानें इसकी खासियत

गूगल का लेटेस्ट ऐंड्रौयड वर्जन ओरियो आखिरकार लौन्च हो गया है. वैसे तो डेवलेपर प्रिव्यूज में सब बताया ही जा चुका है, लेकिन आपको इससे क्या फायदे मिलने वाले हैं और किन डिवाइसेज के लिए यह अपडेट उपलब्ध है, हम आपको बताते है आगे.

  • ऐंड्रौयड 8.0 ओरियो के आने के बाद डिवाइस का बूट अप टाइम दो गुना तेज हो जाएगा, फोन के कौनफिगर होने से लेकर स्विच औन होने तक का टाइम काफी कम हो जाएगा.
  • बैकएंड में चलने वाले फालतू के ऐप्स से छुटकारा मिल सकेगा. नया ऐंड्रौयड वर्जन डाउनलोड होने के बाद बैकएंड में चलकर डिवाइस का पावर खाने वाले ऐप्स को यह खुद बंद कर देगा ताकि आपकी बैटरी सेव रहे.

  • अलग-अलग ऐप्स के लिए आपके अलग-अलग लौगइन और पासवर्ड याद रखने का काम नया ऐंड्रौयड करेगा. औटोफिल से किसी भी ऐप में लौगइन करना आसान हो जाएगा.
  • मसलन, आपके घर से विडियो कौल आया है और मम्मी पूछ रही हैं कि घर कब आएगा तो आप अपना कैलेंडर खोलकर कौल पर बात करते-करते ही तारीख देखकर बता सकते हैं. इसी तरह दोस्त ने कोई मजेदार वीडियो वाट्सऐप की है और तुरंत आपसे रिऐक्शन मांग रहा है, तो आप वीडियो देखते-देखते चैट पर उसे बता सकते हैं कि आपको वीडियो कैसा लगा.
  • अब तक अगर किसी ऐप का कोई नोटिफिकेशन आता था, तो उसके आइकन पर वन, टू, थ्री यानी नोटिफिकेशन्स का नंबर लिखा होता था जिन्हें आपको ऐप खोलकर देखना पड़ता था लेकिन, अब आइकन के ऊपर 3 डौट्स बने होंगे जिनपर टैप कर आप पूरा नोटिफिकेशन देख सकेंगे. और अगर काम का नहीं है, तो उसे स्वाइप करके हटा भी सकेंगे.
  • गूगल का प्ले प्रोटेक्ट फीचर इसमें प्रीलोडेड मिलेगा और आपके ऐप्स को मैलवेयर के लिए स्कैन करेगा. यह आपके डेटा को भी चोरी होने से सुरक्षित रखेगा.
  • ऐंड्रौयड OS के नए वर्जन में बैटरी औप्टिमाइजेशन फीचर होगा जो बैटरी का फालतू इस्तेमाल घटाएगा और बैटरी लंबी चलेगी.

  • गूगल के वे चपटे ईमोजी हटकर अब गोल चेहरे वाले ईमोजी आ जाएंगे. यही नहीं 60 से ज्यादा नए ईमोजी भी आएंगे.

  • नए ऐंड्रौयड वर्जन का अपडेट सबसे पहले गूगल के डिवाइसेज पर आएगा. गूगल की पिक्सल और नेक्सस सीरीज के स्मार्टफोन्स को यह अपडेट सबसे पहले मिल रहा है. वैसे गूगल का प्लान है कि दिसंबर 2017 तक वह अपने प्रमुख पार्टनर्स सैमसंग, एचटीसी, मोटोरोला वगैरह के प्रीमियम डिवाइसेज के लिए रोल आउट कर देगा.

कहीं GST के नाम पर रेस्तरां में ज्यादा पैसे तो नहीं दे रहे हैं आप!

जीएसटी (गुड्स एंड सर्विसिज टैक्स) को लेकर लोगों में अभी भी उलझन बनी हुई है. जीएसटी को लागू हुए लगभग 50 दिन हो गए हैं, पर लोग अभी भी इस परेशानी में हैं कि जीएसटी अलग-अलग चीजों पर कैसे लागू किया जाता है. बता दें कि जीएसटी 1 जुलाई, 2017 को लागू किया गया था.

आमतौर पर लोग जब होटल या रेस्तरां में खाने-पीने जाते हैं तो बिल पर ज्यादा ध्यान नहीं देते. लेकिन जीएसटी लागू होने के बाद भी आप ऐसा करते हैं तो हो सकता है कि आपसे जीएसटी के नाम पर अधित पैसे वसूल लिए जाएं. अभी भी बहुत से रेस्तरां ऐसे है जो अपनी मर्जी के अनुसार टैक्स चार्ज लगाते हैं.

सेवा शुल्क

किसी भी रेस्तरां में सेवा शुल्क का भुगतान करना अनिवार्य नहीं है. ग्राहक सेवा शुल्क का भुगतान करने से इनकार करने का हकदार है. इसे सरकार द्वारा नहीं लगाया गया है.

जानें रेस्तरां में लागू जीएसटी की दरें

विभिन्न खाने के आउटलेट या रेस्तरां में अलग-अलग जीएसटी दरें हैं.

– नान एसी रेस्तरां या नान-एल्कोहल सेवारत होटल के लिए, यह 12% है.

– एसी या एल्कोहल-सेवारत होटल के लिए, यह 18% है.

– 5 सितारा होटलों के लिए, यह 28% है.

क्या है एसजीएसटी और सीजीएसटी

कई उपभोक्ता एसजीएसटी और सीजीएसटी के बीच उलझन की स्थिती में हैं. एसजीएसटी राज्य के माल और सेवा कर के लिए है, जबकि सीजीएसटी केन्द्रीय माल और सेवा कर के लिए है. इसका मतलब ये भी है कि आप जो टैक्स देते हैं, उसका आधा राज्य के खजाने में जाता है जबकि अन्य आधा केंद्र सरकार के राजकोष में जाता है.

ऐसे रेस्तरां में जीएसटी नहीं लगती

यह बात आपको चैंका सकती है लेकिन सभी रेस्तरां में जीएसटी देना जरूरी नहीं है. बिना रजिस्टर व्यवसायों को जीएसटी पर शुल्क लगाने की अनुमति नहीं है. यह पता करने के लिए कि आप जिस रेस्तरां में खा रहे हैं, वो रजिस्टर है. आप बिल पर दिए गए जीएसटी नंबर की जांच कर सकते हैं.

वैट v/s जीएसटी

शराब को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है इसलिए आप रेस्तरां में अगर खाने के साथ शराब लेते हैं तो जीएसटी केवल खाने पर ही लगेगा, शराब पर नहीं. शराब पर पहले की तरह वैट ही लगेगा और वह अलग होगा.

जैसे, यदि उपभोक्ता के भोजन के लिए 500 रुपये का शुल्क है, तो सेवा शुल्क 50 रुपये का है और शराब के लिए 1000 रुपये का भुगतान होता है तो जीएसटी केवल 550 रुपये पर लागू होगा, जबकि वैट 1000 रुपये पर लागू होगा.

121 साल पहले आज ही के दिन इस बल्लेबाज ने जड़े थे दो शतक

क्रिकेट में रोज ही रिकार्ड बनते हैं और टूटते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसे रिकार्ड बन जाते हैं जो हमारे जहन में बस जाते हैं. इन रिकार्ड्स को भुला पाना मुश्किल हो जाता है. क्रिकेट इतिहास में आज से 121 साल पहले एक भारतीय दिग्गज द्वारा एक ऐसा ही रिकार्ड कायम किया गया था. जानें आखिर क्या था वह रिकार्ड.

रणजीत सिंह क्रिकेट जगत का एक जाना माना नाम है. रणजीत को भारतीय क्रिकेट का जन्म दाता माना जाता है. भारत के महान क्रिकेटरों में शुमार रणजीत सिंह के नाम एक अद्भुत कीर्तिमान है.

अंग्रेजों की तरफ से खेलने वाले इस भारतीय दिग्गज ने आज से 121 साल पहले आज ही के दिन (22 अगस्त, 1896) क्रिकेट के खेल में इतिहास रचा था. दरअसल, उन्होंने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में एक ही दिन दो शतक लगाने का करनामा किया था.

इस मैच से एक महीने पहले ही रणजीत ने इंग्लैंड की ओर से टेस्ट (जुलाई 1896) में पदार्पण करते हुए नाबाद 154 रन बनाए थे और उसी फार्म को जारी रखते हुए इंग्लैंड के शहर होव में ससेक्स की ओर से खेलते हुए यौर्कशायर के खिलाफ एक ही दिन में दो शतकीय (100 और नाबाद 125 रन) पारियां खेली थीं.

ससेक्स की ओर से खेलते हुए किया था कारनामा

यौर्कशायर ने पहले खेलते हुए अपनी पहली पारी 407 रन बनाए. जवाब में ससेक्स की टीम तीसरे दिन रणजीत सिंजी के शतक (100 रन) के बावजूद 191 रनों पर सिमट गई और फालोआन नहीं बचा पाई. इसके बाद फालोआन पारी में एक बार फिर रणजीत सिंह ने नाबाद 125 रन बना डाले और एक ही दिन दो शतक लगाने का करिश्मा कर दिखाया. रणजीत सिंह के शतक की बदौलत ससेक्स ने 2 विकेट के नुकसान पर 260 रन बना मैच बचा लिया.

इसके साथ ही रणजीत एक ही मैच में दो शतक लगाने वाले ससेक्स के तीसरे बल्लेबाज बनें. इसके साथ ही वह फर्स्ट क्लास क्रिकेट में एक ही दिन दो शतक जमाने वाले एकमात्र क्रिकेटर बनें.

आज भी कायम है यह रिकार्ड

रणजीत सिंह के बाद किसी बल्लेबाज ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में ऐसा कारनामा नहीं किया है. हालांकि वेस्टर्न आस्ट्रेलिया की ओर से खेलते हुए मैथ्यू एलियट ने 31 दिसंबर 1995 को 104 रन और उसके बाद फालोआन पारी में 135 रन बनाए थे. तब एलियट ने पहली पारी में एक दिन पहले 98 रन बनाकर नाबाद रहे थे. इस वजह से एलियट के शतकों की तुलना रणजीत सिंह से नहीं की जा सकती.

टेनिस खिलाड़ी बनना चाहते थे रणजीत

बचपन में रणजीत की क्रिकेट के प्रति कोई रूचि नहीं थी, बल्कि वह एक टेनिस खिलाड़ी बनना चाहते थे. लेकिन पढ़ाई करने के लिए जब वह इंग्लैंड गए तो क्रिकेट के प्रति उनका प्यार बढ़ता गया. उस वक्त इंग्लैंड में टेनिस से ज्यादा क्रिकेट खेला जा रहा था.

इंग्लैंड में क्रिकेट के प्रति लोगों का प्यार देखते हुए रणजीत ने खुद एक क्रिकेट खिलाड़ी बनना चाहा. उस वक्त इंग्लैंड में ससेक्स क्लब काफी नामी क्लब था. ग्रेजुएशन के बाद रणजीत ने ससेक्स के लिए क्रिकेट खेलना शुरू किया और अच्छा प्रदर्शन करने लगे.

रणजीत सिंह का करियर

प्रथम श्रेणी क्रिकेट में रणजीत का काफी अच्छा रिकार्ड है. रणजीत ने 307 प्रथम श्रेणी मैच खेलते हुए करीब 56 के औसत से 24692 रन बनाए, जिसमें 72 शतक और 109 अर्धशतक शामिल है. रणजीत ने ससेक्स के लिए चार साल तक कप्तानी भी की.

रणजीत ने आस्‍ट्रेलिया के खिलाफ इंग्‍लैंड की तरफ से 15 टेस्‍ट खेले, भारत के लिए कभी कोई मैच नहीं खेला. वे भारत के पहले क्रिकेट खिलाड़ी थे, जिन्होंने इंग्लैंड की तरफ से अपना क्रिकेट करियर शुरू किया. उस वक्त भारत में अंग्रेजों का शासन था और रणजीत का इंग्लैंड टीम में चयन हुआ था. रणजीत के इंग्लैंड टीम में चयन को लेकर काफी विवाद भी हुआ.

जब 1896 में रणजीत का इंग्लैंड की टीम में चयन हुआ तब लार्ड हारिस इस चयन के खिलाफ थे. उनका कहना था कि रणजीत का जन्म इंग्लैंड में नहीं बल्कि भारत में हुआ है, तो इंग्लैंड टीम में उनका चयन नहीं होनी चाहिए.

पहले भारतीय के रूप में इंग्लैंड टीम में चयन

इन सब विवादों के बाद भी आस्ट्रेलिया के खिलाफ रणजीत का चयन हुआ. आस्ट्रेलिया के खिलाफ खेले गए पहले टेस्ट मैच में रणजीत को मौका नहीं मिला था. लेकिन मैंचेस्टर में खेले गए दूसरे टेस्ट मैच में रणजीत को मौका मिला. अपने करियर के पहले ही मैच में रणजीत ने शानदार प्रदर्शन किया. आस्ट्रेलिया के खिलाफ अपनी पहली पारी में रणजीत ने इंग्लैंड की तरफ से 62 रन बनाए. दूसरे पारी में भी रणजीत ने शानदार प्रदर्शन किया, जहां इंग्लैंड के दूसरे बल्लेबाज एक के बाद एक पवेलियन लौट रहे थे, वहीं रणजीत ने एक छोर संभाल रखा था.

अपने पहले मैच में बनाए कई रिकर्ड

अपने पहले मैच में 23 चौकों की मदद से 154* रन बनाए और दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए जिन्हें अपने पहले टेस्ट मैच में पहली पारी में अर्धशतक और दूसरे पारी में शतक बनाने का गौरव हासिल हुआ. सिर्फ इतना ही नहीं रणजीत टेस्ट क्रिकेट के पहले खिलाड़ी थे, जो अपने करियर के पहले टेस्ट मैच में शतक ठोकते हुए नाट आउट रहे. अगर अपने पहले मैच में शतक मारने की बात की जाए तो यह रिकार्ड विल्लम ग्रेस के नाम है. ग्रेस ने पहले खिलाड़ी के रूप में अपने करियर का पहले टेस्ट मैच में शतक ठोकते हुए रिकार्ड कायम किया था, लेकिन इस मैच में ग्रेस 152 रन बनाकर आउट हो गए थे. रणजीत पहले खिलाड़ी थे जिन्होंने मैंचेस्टर के ओल्ड ट्रेफ्फोर्ड मैदान पर 150 से भी ज्यादा रन बनाए.

रणजीत सिंह के नाम से शुरू हुई रणजी ट्राफी

रणजीत ने अपने क्रिकेट करियर का पहला और आखिर मैच आस्ट्रेलिया के खिलाफ और मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रेफ्फोर्ड मैदान पर खेला. आखिरी मैच में रणजीत कुछ खास नहीं कर पाए. इस मैच में रणजीत कुल मिलाकर सिर्फ छह रन बना पाए थे.

1904 में रणजीत भारत वापस आ गए. रणजीत का क्रिकेट के प्रति इतना प्यार था कि 48 साल के उम्र में वह प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलना चाहते थे. 1907 में रणजीत नवानगर के महाराजा बने. वह एक अच्छे क्रिकेटर के तरह वह एक अच्छे ऐडमिनिस्ट्रेटर भी थे.

1934 में रणजीत के नाम पर भारत ने रणजी ट्राफी शुरू हुई. रणजीत भारत के पहले क्रिकेट खिलाड़ी थे, जिन्हें अंतराष्ट्रीय मैचों में मौका मिला था.

बसपा के पोस्टर में एक साथ दिखे अखिलेश यादव और मायावती

बसपा के नाम से बने ट्विटर अकाउंट से जारी किए गए एक पोस्‍टर में अखिलेश यादव और मायावती को एक साथ दिखाया गया था. विपक्षी एकजुटता को दिखाने की कवायद के तहत इस पोस्‍टर को जारी किया गया था. दरअसल 27 अगस्‍त को लालू यादव की पार्टी राजद की पटना में रैली होने जा रही है. उसी कड़ी में विपक्षी एकजुटता को दिखाते हुए यह पोस्‍टर जारी किया गया था. उसको तेजस्‍वी यादव जैसे राजद नेताओं ने रिट्वीट भी किया था. अब इस पोस्‍टर को बसपा ने फर्जी करार दिया है.

बीएसपी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने आधिकारिक बयान जारी कर इस पोस्टर को फर्जी बताया है. इसके साथ ही मिश्रा ने स्पष्ट किया है कि बीएसपी का आधिकारिक ट्विटर अकाउंट नहीं है. सतीश चंद मिश्रा ने बयान जारी कर कहा, ‘बीएसपी का कोई आधिकारिक ट्विटर अकाउंट नहीं है. बीएसपी के ट्विटर हैंडल के नाम से पोस्टर जारी करने का प्रश्न ही नहीं उठता है.’ इस पोस्‍टर में राजद नेताओं लालू प्रसाद यादव और तेजस्‍वी यादव, नीतीश कुमार के बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद बगावती तेवर अपनाने वाले शरद यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी की तस्‍वीरें हैं.

शरद यादव ने नीतीश कुमार के खिलाफ बगावत कर दी है. जदयू ने धमकी दी है कि यदि वह लालू प्रसाद की रैली में शिरकत करेंगे तो उनको पार्टी से भी निकाला जा सकता है. जदयू पहले ही उनको राज्‍यसभा में पार्टी के नेता पद से हटा चुका है. नीतीश ने सीधा हमला बोलते हुए कहा भी है कि यदि आपमें हिम्‍मत है तो पार्टी को तोड़ दीजिए और यदि राजद की रैली में शामिल होते हैं तो अपनी राज्‍यसभा सीट खोने के लिए भी तैयार रहिए.

देखिए वीडियो.

अगर रूठे मंगेतर को मनाना चाहती हैं तो इन आसान तरीकों को अपनाएं

आप की सगाई हो चुकी है और शादी होने में कुछ वक्त बाकी है, तो ऐसे में आप मोबाइल पर एकदूसरे से बात भी करते होंगे या व्हाट्सऐप के जरिए संदेशों का आदानप्रदान करते होंगे. यदि मंगेतर उसी शहर में है, तो व्यक्तिगत रूप से मुलाकात भी होती होगी. यहां तक तो सब सामान्य है, लेकिन जब आप घंटों आपस में बतियाते हैं या रूबरू होते हैं तो जानेअनजाने कोई बात बुरी भी लग सकती है, जिस की वजह से मंगेतर रूठ सकता है.

यदि आप का मंगेतर आप से रूठ गया है तो क्या किसी बिचौलिए का इंतजार करेंगी या स्वयं इस की पहल करेंगी? कैसे मनाएंगी रूठे मंगेतर को?

रूठे मंगेतर को मनाना आसान भले ही न हो, लेकिन मुश्किल भी नहीं है. उस का आप से रूठना, नाराज होना थोड़े समय के लिए ही होता है, क्योंकि लंबे समय तक वह भी बात किए बिना नहीं रह सकता. हां, पुरुष होने का अहम उसे हो सकता है, इस के चलते वह सोचता है कि आप उसे मनाएंगी.

यदि आप दोनों के बीच असंवाद की स्थिति बनी हुई है, तो इसे लंबा न खींचें. कई बार यह रिश्ता टूटने का कारण भी बन जाती है. इसलिए सौरी कहने में देर न करें.

जब आप अकेली होती हैं और मोबाइल पर उस से बात करते नहीं थकतीं, तो कई बार कोई ऐसी बात निकल जाती है, जो उसे चुभ जाती है. यही नहीं फोन पर या व्हाट्सऐप पर आप झगड़ भी लेती हैं. इस लड़ाईझगड़े को आप तूल देती हैं तो रिश्ता टूटते देर नहीं लगती.

यदि छोटीमोटी बात को ले कर तकरार हुई भी हो तो उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं. आप को लगता है कि गलती उस की है और उसे लगता है कि आप गलत हैं. इस का फैसला कौन करेगा? बेहतर होगा कि आप ही झुक जाएं ताकि उस का ईगो शांत हो जाए.

कई बार गलतफहमी की वजह से अर्थ का अनर्थ हो जाता है, जिस से बात का बतंगड़ बन जाता है. इस स्थिति से बचने और गलतफहमी दूर करने के लिए संवाद स्थापित करना बहुत जरूरी है.

रूठे मंगेतर को मनाना भी एक कला है और यदि यह कला आप को आती है तो आप को उसे मनाने में देर नहीं लगेगी. आप की एक मुसकराहट से उस का सारा गुस्सा काफूर हो जाएगा. बस, प्यार भरी दो बातें कर के तो देखिए, वह घुटनों के बल आप के सामने नतमस्तक न हो जाए तो कहिएगा, लेकिन यदि आप यह सोचती हैं कि मैं उसे क्यों मनाऊं? तो बैठी रहिए उस के इंतजार में. यह इंतजार कब खत्म होगा, कह नहीं सकते?

याद रहे, मानमनौअल से प्यार बढ़ता है और रिश्ते में मजबूती आती है. आप चाहें तो उसे मनाने के लिए किसी कवि, गीतकार की प्यार भरी कोईर् कविता, गजल उसे व्हाट्सऐप कर दें या फिर सुंदर खिला गुलाब या गुलदस्ता व्हाट्सऐप कर दें. हां, यदि व्यक्तिगत रूप से मिलना संभव हो तो उस के लिए गुलाब के साथसाथ कोई अच्छा तोहफा भी ले जाएं. और हां, उसे आई लव यू कहने में कोताही न बरतें.

दो बातें युवकों से

आप उस के होने वाले पति हैं. यदि वह आप से नाराज है, तो उस की नाराजगी दूर होने तक इंतजार करें. यदि आप की मंगेतर किसी बात पर आप से रूठ जाती है तो क्या आप उसे नहीं मनाएंगे? अपने पुरुष अहम को छोड़ कर उसे मनाने की कोशिश करें. सौरी कह कर देखिए, वह मान जाएगी. एक सौरी सारे गिलेशिकवे दूर कर देती है.

युवतियां स्वभाव से काफी भावुक होती हैं. यदि मंगेतर रूठ जाए तो उन की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं लेते. क्या आप उस के आंसू पोंछने नहीं जाएंगे? उसे मनाने के लिए एक चौकलेट ही काफी है. युवतियां इस की दीवानी होती हैं तथा इसे प्रेम का प्रतीक भी मानती हैं. यदि व्यक्तिगत तौर पर मुलाकात हो तो चौकलेट के साथ कोई अच्छा सा तोहफा और प्यार का प्रतीक गुलाब देना न भूलें.

कुंडली मिलान है एक ढकोसला, इसके चक्कर में आप भी न पड़ें

भारतीय परंपरागत हिंदू विवाह पद्धति में कुंडली मिलान को बहुत आवश्यक समझा जाता है. कई बार बहुत से योग्य युवक या युवतियां इसी कारण बड़ी उम्र तक अविवाहित रह जाते हैं, क्योंकि उन की कुंडली नहीं मिलती. कभीकभी तो 3-4 भाईबहनों वाले परिवार में यदि सब से बड़े बच्चे की कुंडली नहीं मिलती तो सभी की शादी में रुकावट आ जाती है.

समाज में हमें अपने आसपास कई बेमेल दंपती भी सिर्फ कुंडली मिलान के कारण ही दिखते हैं. हमारे पड़ोस में एक सुशिक्षित युवक जो कि ऊंचे पद पर कार्यरत था, का विवाह एक कम पढ़ीलिखी युवती से इसलिए कर दिया गया, क्योंकि उन की कुंडली के 36 गुण आपस में मिलते थे, लेकिन विवाह के बाद दोनों का जीवन परेशानियों से घिर गया, क्योंकि बौद्धिक स्तर पर दोनों का कोई मेल नहीं था.

इसी प्रकार कई बार उच्च शिक्षा प्राप्त किसी बुद्धिमान युवती का विवाह किसी मामूली युवक से इसलिए कर दिया जाता है कि दोनों की कुंडली बहुत अच्छी तरह मिल गई है.

भारतीय विवाह पूरी उम्र साथ निभाने की एक स्वस्थ परंपरा है, जिस से पैदा होने वाले बच्चे भी सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों को स्वयं ही अपना लेते हैं. यदि पतिपत्नी के बीच बौद्धिक समानता है तो परिवार का वातावरण भी सकारात्मक रहता है. ऐसे ही परिवार स्वस्थ समाज तथा स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं.

गौर से विचार किया जाय तो कुंडली मिलान के स्थान पर वरवधु की शैक्षिक योग्यता, रुचियों तथा विचारों का मिलान किया जाना चाहिए.

हमें इस बात का भी ज्ञान होना चाहिए कि विश्व के अनेक देशों में जहां कुंडली मिलान नहीं होता वहां भी सफल वैवाहिक जीवन देखने को मिलता है.

एक समय ऐसा था जब समाज वैवाहिक रिश्तों के लिए पंडितों और विचौलियों पर निर्भर था. उस समय लोग शिक्षित नहीं थे तथा संचार माध्यमों का भी अभाव था. पंडित लोग एक गांव से दूसरे गांव आतेजाते रहते थे और अपने पास विवाह योग्य युवकयुवतियों की सूची रखते थे. वे घरघर जा कर कुंडली मिला कर रिश्ते करवाते थे. यह कार्य उन की आजीविका का मुख्य साधन था.

वर्तमान समय में युवकयुवतियां शिक्षित हैं. अपना व्यवसाय अथवा कैरियर स्वयं चुनते हैं. ऐसे समय में वे अपना जीवनसाथी भी अपनी योग्यता के अनुसार स्वयं चुन लेते हैं. बड़ेबुजुर्गों का यह कर्तव्य है कि वे उन के द्वारा पसंद किए गए जीवनसाथी से मिलें उस की जांचपड़ताल करें ताकि आने वाले समय में उन के साथ धोखाधड़ी न हो.

वर्तमान में समाचारपत्रों में वैवाहिक विज्ञापनों तथा इंटरनैट के द्वारा भी उचित जीवनसाथी का चुनाव किया जाता है. अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार रखना चाहिए ताकि वे अपनी पसंदनापसंद मातापिता को बता सकें.

अकसर यह तर्क दिया जाता है कि वर्तमान में हो रहे प्रेमविवाह असफल हो रहे हैं, जबकि कुंडली मिलान द्वारा किए गए विवाह सफल रहते थे, परंतु ऐसा नहीं है. पुराने समय में युवतियां शिक्षित नहीं होती थीं और अपने साथ हो रहे अत्याचार अथवा अन्याय का विरोध नहीं कर पाती थीं. परंतु आज समय बदल रहा है. कुंडली मिलान के बाद होने वाले विवाहों में अधिक तलाक देखने को मिलते हैं.

अनुराधा ने अपनी बेटी कल्पना का विवाह अच्छी तरह कुंडली मिलान के बाद एक संपन्न व्यावसायिक परिवार में किया. लेकिन विवाह के एक महीने के बाद ही युवती वापस घर आ गई. काफी छानबीन के बाद पता चला कि युवक पहले से किसी अन्य युवती को चाहता था. क्या ही अच्छा होता कि युवक के परिवार वाले उसे इतनी छूट देते कि वह पारिवारिक दबाव में आ कर विवाह न करता और कल्पना का जीवन बरबाद होने से बच जाता.

यदि अनुराधा केवल कुंडली मिलान से विवाह संबंध न जोड़ कर युवकयुवती को विवाह से पहले मिलनेजुलने का मौका देतीं तो शायद युवक यह बात पहले ही बता देता और दोनों परिवार मानसिक तनाव से बच जाते.

दूसरी ओर शालिनी ने अपनी बेटी की कुंडली कई जगह दी पर कहीं भी ठीक से मिलान न होने पर उन्होंने बेटी को ही वर चुनने की इजाजत दे दी. शालिनी की बेटी डाक्टर है. उस ने अपने साथ ही काम कर रहे एक अन्य डाक्टर से अंतर्जातीय विवाह कर लिया. अब उन की बेटी बहुत खुश है और शालिनी भी.

अकसर देखा जाता है कि कुंडली मिलान के पूरे खेल में परिवार के सदस्यों को ग्रहनक्षत्रों की कोई जानकारी नहीं होती, जिस का कारण रिश्ता कराने वाले पंडित मोटी कमाई कर जाते हैं. कई बार तो पैसे ले कर पूरी कुंडली ही बदल दी जाती है.

मांगलिक होने अथवा नाड़ी दोष होने पर तो युवकयुवती का विवाह पेड़ अथवा घड़े से करने की परंपरा भी है. अनेक कर्मकांडों को संपन्न करने के बाद उन्हीं युवकयुवती का विवाह आपस में कर दिया जाता है जिन की कुंडली आपस में नहीं मिल रही होती.

कुंडली के दोष निवारण के नाम पर परिवारों को एक मोटी रकम पंडितों के हवाले करनी पड़ती है.

कई बार एक ही कुंडली का मिलान अलगअलग पंडित अलगअलग तरह से करते हैं. सब से बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि हर प्रकार के दोष का निवारण भी संभव है. बस पैसा खर्र्च करो उपाय करा लो, ले दे कर पंडितों की जेब भरती है.

पढ़ेलिखे लोग भी अकारण ही आंख बंद कर इस परंपरा का निर्वाह करते चले आ रहे हैं, जिस के पीछे कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. कुंडली मिलाने के लिए अनेक जगह भेजा जाता है और बारबार न मिलने पर युवक और युवती के जीवन में तनाव भी बढ़ जाता है. अच्छा तो यह हो कि घर के सदस्य कुंडली मिलान के ढकोसले से बच कर युवकयुवती की पसंद को सही रूप में जांचपरख कर ही वैवाहिक संबंध स्थापित करें.

पैसे और शोहरत के लालच में फंसती देश की युवा पीढ़ी

कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो सफलता की राह तक पहुंचते हैं और दूसरों के लिए मिसाल बन जाते हैं जबकि कुछ मंजिल तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं. ऐसा ही कुछ काम किया है इंडोनेशिया के युवक हेंडी ने. उस के पिता कतर में काम करते थे. हेंडी को बचपन से ही पैसे कमाने की ललक थी.

एक बार वह छुट्टियों में पिता के पास कतर गया था. वहां उस ने कबाब खाया, जो उसे बहुत अच्छा लगा. तभी उस के दिमाग में एक आइडिया आया और वह सोचने लगा कि इतनी बेहतरीन चीज आखिर उस के देश में क्यों पौपुलर नहीं है. अगर वह इसे अपने देश में ही बना कर बेचे तो बहुत अच्छा पैसा कमाएगा.

इंडोनेशिया में उस समय तक कबाब लोगों को ज्यादा पसंद नहीं था. घर वापस आ कर हेंडी ने सीमित साधनों के साथ कबाब को जनजन तक पहुंचाने की ठान ली. 2003 में उस ने एक ठेला गाड़ी ली और कबाब बेचने के लिए अपने एक दोस्त को भी साथ ले लिया, लेकिन जब काम ज्यादा अच्छा नहीं चला तो उस दोस्त ने भी साथ छोड़ दिया, लेकिन हेंडी ने हिम्मत नहीं हारी.

तब वह कालेज में द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा था. उस ने सोचा कि ऐसे तो काम नहीं चलेगा इसलिए उस ने पढ़ाई भी छोड़ दी. परिवार वालों ने इस का काफी विरोध किया.

लेकिन हेंडी ने किसी की नहीं सुनी और अपने काम में लगन से जुट गया. धीरेधीरे काम ने रफ्तार पकड़ ली. आज वह दुनिया की सब से बड़ी कबाब चेन ‘कबाब टर्की बाबा रफी’ को सफलतापूर्वक चला रहा है. आज हेंडी की कंपनी इंडोनेशिया के अलावा फिलीपींस और मलयेशिया तक फैल चुकी है. उस की कंपनी में काम करने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है और वह 2 हजार को पार कर चुकी है. उस के हजार से ज्यादा आउटलेट्स हैं. इस काम के लिए हेंडी को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं. इस तरह उस ने साबित कर दिया कि मेहनत के बल पर इंसान किसी भी ऊंचाई को छू सकता है.

लालच से बचें

आज सभी पैसा कमाने की अंधी दौड़ में लगे हैं. युवा भी इस के दीवाने हैं. वे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में रहते हैं. लोगों के पास आज जितना पैसा आता जा रहा है उतना ही उन का लालच भी बढ़ रहा है. कभीकभी पैसा तो मिल जाता है, लेकिन उस के चक्कर में अपने दूर हो जाते हैं. कई बार अधिक पैसा कमाने की चाह भी इंसान को गलत रास्ते पर ले जाती है.

आज पैसा ही पहचान बन गया है, इसीलिए सारी भीड़ इस के पीछे भाग रही है. सब रिश्तेनाते व संबंधों में पैसे को ही प्रमुखता दी जाती है, पैसे को ही सर्वश्रेष्ठ समझा जा रहा है. यहां तक कि पैसा कमाने के लिए लोग घर से दूर शहरों में रह कर मशीन की तरह काम कर रहे हैं, जिस कारण उन के पास अपनों के लिए भी समय नहीं है.

विदेश जाने की चाहत

विदेश जाने की ललक, वहां रह कर पैसा कमाने की चाह, यह सपना भारत का हर नौजवान देखता है, लेकिन इसे साकार करना सब के बस की बात नहीं होती. विदेश में काम करने की प्रक्रिया इतनी कठिन है कि उस की औपचारिकता पूरी कर पाना काफी कठिन है. इस के बावजूद हजारों युवा सुनहरे भविष्य का सपना ले कर विदेश काम करने जाते हैं, लेकिन वे वहां धोखा खा जाते हैं.

आज यूरोप और अमेरिका में काम के लिए वीजा पाना टेढ़ी खीर है, लेकिन खाड़ी देशों में काम मिलने में आसानी रहती है. यही कारण है कि हमारे हजारों युवा वहां काम करने के लिए जाते हैं, लेकिन उन्हें परेशानी तब होती है जब वे किसी इसलामिक कानून के उल्लंघन में पकड़े जाते हैं.

वहां हमारे युवा ही ज्यादा क्यों पकड़े जाते हैं, इस के कई कारण हैं. एक तो वहां के सख्त इसलामिक कानून की जानकारी इन युवाओं को नहीं होती और दूसरा न ही इन युवकों को शरीअत के बारे में ज्यादा मालूम होता है. वे वहां अनजाने में इन कानूनों का उल्लंघन कर बैठते हैं, जिस से मुसीबत में फंस जाते हैं.

खाड़ी देशों में अधिकतर वे युवक जाते हैं जिन के वहां रिश्तेदार काम करते हैं या कोई परिचित रहता है. ये कम पढ़ेलिखे युवक वहां जा कर कानून की मार झेलते हैं. उन का कम पढ़ालिखा होना ही उन की परेशानी का सबब बन जाता है. वहां साइन बोर्ड अंगरेजी और अरबी में लिखे होते हैं. वे उन्हें समझ नहीं पाते और छोटीछोटी गलतियां करने के कारण पकड़ लिए जाते हैं.

कभीकभी ऐसे मामले भी देखने में आए हैं जिन में बड़े घराने के युवा पर्यटक वीजा पर वहां जाते हैं और गैरकानूनी तरीके से काम करने लगते हैं, फिर पकड़े जाने पर जेल की हवा खाते हैं. ऐसे में भारतीय दूतावासों के सामने 2 तरह की चुनौती खड़ी हो जाती है, एक तो जो लोग अनजाने में अपराध कर बैठते हैं, उन के लिए तो वहां की सरकार से गुहार लगाई जा सकती है, लेकिन जो गैरकानूनी तरीके से वहां काम कर रहे होते हैं उन के फंसने पर मामला बहुत पेचीदा हो जाता है, जिस कारण वे जल्द जेल से निकल नहीं पाते, क्योंकि वहां का कानून बहुत कड़ा है.

विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत से बाहर रहने वाले 2 करोड़ 19 लाख प्रवासी भारतीयों में से 27त्न खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं. इन में सब से ज्यादा मजदूर वर्ग है जो युवा है. संसार के 68 देशों की जेलों में बंद भारतीयों की सब से बड़ी तादाद खाड़ी देशों में ही है, जिन में युवा ज्यादा हैं.

विदेशी जेलों में बंद कुल भारतीयों में से 45 फीसदी खाड़ी देशों में हैं. इसलामिक कानून के उल्लंघन, चोरी, धोखाधड़ी और गैरकानूनी तरीके से काम करने या वहां रहने के आरोप में खाड़ी के 8 देशों में भारतीय युवा बंद हैं.

सऊदी अरब में लगभग 1,470 और संयुक्त अरब अमीरात में करीब 825 भारतीय युवा जेलों में बंद हैं. इराक, कुवैत, ओमान, कतर, बहरीन और यमन की जेलों में करीब 2,900 भारतीय नागरिक आज भी सजा काट रहे हैं.

इन के परिवार के लोग उन्हें छुड़ाने के लिए दूतावासों और विदेश मंत्रालय के चक्कर काटतेकाटते थक जाते हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिलती. कितने मांबाप तो अपनी जिंदगी की पूरी कमाई भी इसी में लुटा देते हैं, लेकिन बेटे को नहीं छुड़ा पाते. इस तरह न जाने कितने युवक विदेश जा कर पैसा कमाने के लालच में अपनी जिंदगी बरबाद कर रहे हैं.

छात्रों और अभिभावकों के सामने मुख्य प्रश्न है शिक्षा द्वारा रोजगार प्राप्ति अहम हो. लेकिन यह भी सत्य है कि रोजगार प्राप्ति के लिए छात्र जो सामान्य शिक्षा हासिल करते हैं, वही काफी नहीं है. अब सामान्य शिक्षा के अतिरिक्त अपने को योग्य साबित करने के लिए विशेष डिग्रियों के लिए युवक प्रयत्न करते हैं.

विशेष शिक्षा प्राप्त करने के लिए छात्रों को अतिरिक्त परिश्रम, समय व धन की आवश्यकता होती है, लेकिन सामान्य शिक्षा में भी परीक्षा में नकल, अंकपत्र में हेराफेरी जैसे हथकंडे अपना कर जबतब वे अपनी अयोग्यता का ही परिचय देते हैं.

जो योग्य छात्र अच्छी शिक्षा हासिल कर भी लेते हैं. वे रोजगार के लिए दरदर की ठोकरें खाते हैं. बड़ीबड़ी डिग्रियां ले कर भी बेरोजगार घूमते हैं या छोटेमोटे प्राइवेट स्कूलों में कम वेतन पर नौकरी करते हैं. अगर इतना भर भी नहीं मिला तो पैसा कमाने के लिए विदेश के रास्ते खोजे जाते हैं. कमाना बुरा नहीं है लेकिन बेइंतहा पैसा कमाने के चक्कर में पनपा लालच व्यक्ति को घोर स्वार्थी बनाता है.

स्कूलों के अलावा अब कोचिंग संस्थानों ने भी शिक्षा को एक अच्छाखासा धंधा बना दिया है. अभिभावकों का भी विश्वास सरकार द्वारा संचालित स्कूलों और कालेजों की अपेक्षा कोचिंग संस्थानों में जमता जा रहा है. अध्यापक कोचिंग संस्थानों को कमाई का अतिरिक्त व मोटा जरिया जान कर इन में पढ़ाने से गुरेज नहीं करते. शिक्षा में प्रायोगिक शिक्षा का पहले ही अभाव है और समाज का अधिकतम हिस्सा शिक्षा के मूलस्वरूप को ही बिगाड़ने में लगा है.

ना कहना भी सीखें, वरना नुकसान सिर्फ आपका ही होगा

श्वेता का कालेज में पहला साल था. ऐडमिशन के 2 महीने बाद ही फ्रैशर पार्टी होनी थी. सीनियर छात्रों ने श्वेता को फ्रैशर पार्टी की सारी जिम्मेदारी दे दी. श्वेता को तो ना कहने की आदत ही नहीं थी. ऐसे में वह हर काम के लिए हां कहती गई. फ्रैशर पार्टी की जिम्मेदारी निभाते श्वेता को इस बात का खयाल ही नहीं रहा कि इस काम के चक्कर में उस की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. वह क्लास में पूरी अटैंडैंस भी नहीं दे पाई.

फ्रैशर पार्टी पूरी होने के बाद सब ने श्वेता के काम की काफी तारीफ की. श्वेता के कालेज में हर 6 महीने में अटैंडैंस चैक की जाती थी. श्वेता की अटैंडैंस सब से कम निकली. इस का नोटिस श्वेता के घर भेज दिया गया. घर वाले परेशान हो गए. कालेज मैनेजमैंट ने फैसला लिया कि जिस स्टूडैंट की अटैंडैंस कम होगी, उसे परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा. ऐसे में दूसरे स्टूडैंट्स के साथ श्वेता भी परीक्षा नहीं दे पाई. उस का एक साल बरबाद हो गया.

श्वेता और उस के घर वालों ने कालेज प्रबंधन से काफी रिक्वैस्ट की, लेकिन कालेज प्रबंधन ने कम अटैंडैंस वाले स्टूडैंट्स को परीक्षा ही नहीं देने दी. अपना बहुमूल्य एक साल खोने के बाद श्वेता को समझ आया कि यदि उस ने इस काम के लिए पहले ही ना कह दिया होता तो उसे इस तरह की परेशानी में नहीं पड़ना पड़ता.

इस तरह के हालात से न केवल कालेज में बल्कि कई बार जिंदगी में भी रूबरू होना पड़ता है. पढ़ाई पूरी करने के बाद दिनेश ने औफिस में काम शुरू किया. वह मेहनत और लगन से अपना काम करना चाहता था.

औफिस में उसे जो भी काम करने को कहता वह चुपचाप करने लगता. इस कारण उस पर काम का बोझ बढ़ने लगा. वह अपना काम तो करता ही था साथ ही दूसरों का काम भी निबटाता था.

कई बार तो काम ठीक तरह से हो जाता लेकिन कभीकभी काम सही तरीके से नहीं हो पाता या बिगड़ जाता तो लोग उस पर ही पूरी जिम्मेदारी थोप देते. ऐसे में दूसरों का काम कर के भी दिनेश लोगों को संतुष्ट नहीं कर पाता था. दिनेश को दोस्तों ने समझाया कि हर काम के लिए हां करने से कुछ भला नहीं होने वाला, अपना काम ठीक से करो, बेवजह दूसरों के काम करने से मना कर दो.

जब से दिनेश ने काम के लिए ना करना सीखा है, तब से वह अपना काम ठीक से कर पाता है. हर काम को हां करने की आदत असल में अधिकतर लोगों में होती है. उन को लगता है कि काम के लिए मना करने से दूसरों को बुरा लग सकता है.

गुणवत्ता में कमी

‘एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाए’ कहावत का मतलब है कि अच्छे से एक काम करने से सब का भला होता है. सब काम एकसाथ करने से हमेशा काम खराब होने का खतरा रहता है. पर्सनैलिटी डैवलपमैंट की क्लास चलाने वाली रिचा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘कई काम एकसाथ करने से काम की गुणवत्ता में कमी आने का खतरा रहता है.

‘‘ऐसे में जरूरी है कि जिस काम को सही तरीके से समय पर कर सकें उस की ही हामी भरें. कई कामों के लिए हां करने से उन के समय पर पूरा न होने का खतरा रहता है. उसी काम की कीमत होती है जो समय पर सही तरह से पूरा हो जाए. ऐसे में हर काम के लिए हां करने के पहले यह जरूर देखसमझ लें कि आप की क्षमता क्या है और कितना काम कर सकते हैं. केवल वाहवाही लूटने के लिए हर काम के लिए हां न करें.’’

हर काम की हां के पीछे यही सोच होती है कि लोग आप की तारीफ करें. आप को तरक्की और प्रशंसा मिले. परेशानी की बात यह है कि हर काम के लिए हां करने से आप की परेशानियां बढ़ती हैं. इस से काम की गुणवत्ता प्रभावित होती है और आप आलोचना का शिकार होते हैं.

ऐसे में जरूरी है कि हर काम के लिए हां करने की अपनी आदत को सुधारें और ना कहना भी सीखें. यह सोच गलत है कि किसी के बिना कोई काम रुकता है. आप के मना करने पर कोई दूसरा उस काम को कर लेगा. ऐसे में अपनी क्षमता साबित करने के लिए हर काम को करने का बीड़ा उठा कर न केवल आप काम का नुकसान करते हैं बल्कि अपने संगठन का भी नाम खराब करते हैं. ऐसे में आप की अच्छी आदत बुरे परिणाम देती है.

क्षमता का विकास करें

यह सही बात है कि हर किसी को हर काम में दक्ष होना चाहिए. आज का लाइफस्टाइल औलराउंडर पर्सनैलिटी वाला है. ऐसे लोग जल्दी तरक्की की सीढि़यां चढ़ते हैं. सही बात तो यह है कि ऐसे लोगों को देख कर ही दूसरे लोग हर काम के लिए हां करने लगते हैं. हर किसी की क्षमता एक जैसी नहीं होती. आप को औलराउंडर बनना है तो सब से पहले अपनी क्षमता का विकास करना होगा. हर काम को सीखने के बजाय यह देखें कि आप की पसंद के क्या काम हैं और किन कामों की आप को जरूरत है. आप अपनी जानकारी बढ़ा कर अपनी क्षमता का विकास कर सकते हैं.

जब आप की क्षमता का विकास हो जाएगा तो आप एकसाथ कई काम कुशलता से कर सकेंगे. जब तक आप की क्षमता का सही तरह से विकास न हो जाए एकसाथ कई काम करने से बचें.

रिचा श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘यह बात सही है कि आज के दौर में औलराउंडर लोगों की मांग है. हर काम के लिए ना कहना अच्छी बात नहीं है. जरूरत इस बात की है कि आप अपनी क्षमतानुसार मेहनत और लगन से काम करें. काम ठीक ढंग से होना, उस का समय पर होना और एक काम करने से दूसरे काम का नुकसान नहीं होना चाहिए.

‘‘अगर किसी में यह क्षमता है तो वह औलराउंडर की तरह काम कर सकता है. जब तक आप में इस तरह की क्षमता का विकास नहीं हो जाता तब तक आप को अपने काम पर फोकस करना चाहिए. परफैक्ट होने के लिए हर तरह के काम और उस से जुड़ी जानकारी बढ़ाते रहना जरूरी है. कई बार लोग बिना परफैक्ट जानकारी के ओवरस्मार्ट बनते हुए औलराउंडर बनने की कोशिश करते हैं, जो सही नहीं है.’’

ना करें समझदारी से

  • हर काम के लिए हां ही नहीं ना करना भी जरूरी होता है. किसी भी काम के लिए ना करते समय पूरी समझदारी दिखानी चाहिए. सच में जो काम आप नहीं कर पा रहे हों उस के लिए ही ना करें. ना करते समय ऐसा न लगे कि आप इस काम को कर सकते थे, इस के बाद भी ना कर रहे हैं.
  • यह मत सोचिए कि आप के ना करने से दूसरे पर आप की पर्सनैलिटी का बुरा प्रभाव पड़ेगा. काम को खराब करने से अच्छा है कि उस के लिए मना कर दिया जाए. इस से कोई आप से बेहतर व्यक्ति इस काम को कर सकेगा.
  • काम का बोझ तनाव और कार्यक्षमता को बढ़ा देता है. ऐसे में जिस काम को आप सही से करने की हालत में होते हैं वह भी नहीं हो पाता है. उस में तमाम गलतियां होने लगती हैं. काम में गलतियां हों उस से अच्छा है कि आप काम के बोझ को न बढ़ाएं और कुछ काम करने से मना भी करें.
  • कई बार जिन लोगों में क्षमता नहीं होती वे केवल दिखावा करने या चापलूसी करने के लिए हर काम को करने की हां कर देते हैं. ऐसे में काम में देरी और खराब होने का खतरा होता है. अगर आप में काम करने की क्षमता नहीं है तो अपना और दूसरे का समय खराब करने से बेहतर है कि काम के लिए ना कर दें.
  • काम की असल कीमत उस की गुणवत्ता से होती है. औलराउंडर पर्सनैलिटी का अलग ही स्थान होता है. इस के लिए सही माने में अपनी क्षमता का विकास करें. जब तक आप में क्षमता न हो, हर काम के लिए हां करने से बेहतर है कि जो काम कर सकें उसे ही करें.

जेंडर सेंसिटाइजेशन जरूरी है, मिलकर उठाने होंगे ठोस कदम

भारतीय समाज में शुरू से ही युवतियों पर तरहतरह की पाबंदियां लगाई जाती रही हैं. उन्हें युवकों के मुकाबले कमतर आंका जाता रहा है. परिवार में, चाहे वे उच्चवर्ग के हों या मध्यवर्ग के, शिक्षित हों या कम पढ़ेलिखे, बेटी के जन्म पर उतनी खुशियां नहीं मनाते जितनी बेटा होने पर. बेटा होने पर पूरे महल्ले व बिरादरी में मिठाइयां बांटी जाती हैं,

हफ्तों जश्न का माहौल रहता है. लड़का हुआ है शुभ लक्षण है इसलिए ब्राह्मण भोज कराया जाता है, लड़के के हाथ से छुआ कर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाया जाता है. नामकरण से ले कर मुंडन तक सभी अवसरों को पूरे तामझाम के साथ मनाया जाता है. बेटे के जन्म की खुशी के पीछे भावना यह होती है कि वह वंशबेल को आगे बढ़ाएगा. इतना ही नहीं बड़ा हो कर, पढ़लिख कर परिवार का आर्थिक सहारा बनेगा. जबकि बेटी को शुरू से ही पराई अमानत समझा जाता रहा है. वह तो एक दिन ससुराल चली जाएगी, तो फिर उस पर इतना खर्च क्यों किया जाए. लड़की को शुरू से ही यह कह कर दबाया जाता रहा है कि तू तो लड़की है, तू घर में बैठ, चूल्हाचौका कर यही ससुराल में काम आएगा. ज्यादा उड़ने की जरूरत नहीं है.

इतनी कठोर पाबंदियों में लड़कियों की इच्छाओं का दमन हो जाता था, वे इसी को नियति समझ कर घरेलू काम में जुट जाती थीं और बड़ी होने पर किसी के साथ भी ब्याह दी जाती थीं. न ही उन की इच्छा पूछी जाती थी और न ही शादी से पहले लड़के का मुंह तक दिखाया जाता था. ऊपर से यह नसीहत और दे दी जाती थी कि वापस लौट कर मत आना. ससुराल से तुम्हारी लाश ही निकले इसी में सब की भलाई है.

ऐसे कड़े अनुशासन में लड़कियों की परवरिश होती थी. जबकि लड़कों को खुली छूट होती थी कि वे कहीं भी जाएं, कभी भी घर आएं. समय बदला साथ ही समाज की बहुत सी मान्यताएं भी बदलीं. आज लड़कियां कालेज जा रही हैं, नौकरियां कर रही हैं, फैशनेबल कपड़े पहन रही हैं. लेकिन अफसोस की बात यह है कि इतना सब कुछ होते हुए भी कहीं न कहीं लड़कियों को लड़कों के मुकाबले उतनी छूट नहीं है. उन्हें आज भी कमजोर समझा जाता है. लड़की देर से घर लौटे तो घर वालों की चिंता बढ़ जाती है. मातापिता उस की सहेलियों को तुरंत फोन घुमा देते हैं और जब तक वह घर वापस नहीं आ जाती चैन से नहीं बैठते हैं.

मातापिता का लड़कियों के प्रति चिंतित होना तो तब भी समझ में आता है लेकिन हमारा समाज चाहे जितनी तरक्की कर गया हो, लड़की को लड़के के मुकाबले छोटा और कमजोर ही समझता है. करीबकरीब रोज ही अखबार में लड़कियों के साथ बलात्कार की घटनाएं प्रकाशित होती रहती हैं. समाज उन की बेबसी पर दया न दिखा कर चटखारे लेता है और लड़के अपना काम कर के निकल जाते हैं. सारा दोष लड़की पर ही मढ़ दिया जाता है कि जब फैशनेबल कपड़े पहन कर निकलेंगी तो यही होगा, इस में लड़कों का क्या दोष यानी लड़कों को सब कुछ करने का जैसे लाइसैंस मिला हुआ है.

लड़कियों के प्रति समाज का नजरिया आखिर ऐसा क्यों है? यह शोध का विषय है. लेकिन अफसोस तब होता है जब कोई फिल्मी सैलिब्रिटी अपने अभिनय की तुलना बलात्कार पीडि़त किसी युवती से कर डाले.

सलमान खान ने जब फिल्म ‘सुल्तान’ में किए गए अपने अभिनय की तुलना बलात्कार पीडि़त एक लड़की से की, तो उन्हें काफी धिक्कारा गया. पिता सलीम खान को उन की तरफ से माफी भी मांगनी पड़ी. लेकिन ध्यान से उन की बात का विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय समाज में लिंगभेद आज भी विद्यमान है और लड़कियों के साथ संवेदना का अभाव है. सलमान खान जैसे विख्यात व्यक्ति द्वारा इस तरह का उदाहरण देना यही दर्शाता है कि मनुष्य में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है.

ऐसी घटनाएं अकसर सुनने में आती हैं. एक दिन रात में रत्ना के घर से अचानक परेशान कर देने वाली आवाजें आने लगीं. अगले दिन उस की पड़ोसिन मान्यता ने रत्ना के घर जा कर उस की सास से पूछा कि रात में आप के घर से आवाजें क्यों आ रही थीं, तो उन्होंने मुंह बिचकाते हुए कहा, ‘‘अरे, कुछ नहीं, पतिपत्नी के बीच तो लड़ाईझगड़ा, मारपिटाई होती रहती है. बस मोहित ने 3-4 थप्पड़ ही लगाए थे, तो सारी रात बवाल मचाए रखा. ठीक से नहीं रहेगी तो पिटेगी ही.’’

‘‘यह क्या कह रही हैं आप आंटी? लड़ाईझगड़ा तक तो ठीक है, पर मारपिटाई? आखिर पतिपत्नी बराबरी के रिश्ते में बंधे होते हैं.’’ ‘‘बराबरी? यह क्या कह रही है तू? हमेशा से पत्नी दोयम दर्जे की होती है. इस से भला कौन इनकार कर सकता है.’’

एक स्त्री होते हुए भी वह दूसरी स्त्री के बारे में ऐसे तुच्छ विचार रखती थी, जो सरासर गलत ही नहीं, बल्कि समाज के प्रति स्त्री के नजरिए को दर्शाता है.

एक प्रतिष्ठित इलैक्ट्रौनिक कंपनी की सीनियर ऐडवाइजर पल्लवी आनंद ने बताया कि जब वह सिनेमा हौल में फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ देख रही थी, जिस के एक दृश्य में अभिनेत्री आलिया भट्ट रोते हुए बारबार अपने साथ हुए बलात्कार की बात कहती है, तो वहां मौजूद कई लड़के हंस कर ताली और सीटियां बजा रहे थे. एक लड़की की दिल भेद देने वाली तकलीफ पर उन लड़कों को हंसी आ रही थी.

इस से यही स्पष्ट होता है कि समाज स्त्री को मर्द के हाथ का खिलौना समझता है. स्त्री की तकलीफों और उस पर हो रहे अत्याचारों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता. स्त्री के साथ बलात्कार जैसी घटना होने पर स्त्री को ही दोषी ठहराया जाता है. आखिर यह लिंग भेद क्यों है? क्यों समाज स्त्रियों के लिए संवेदनशील नहीं है?

मीना की पड़ोस में राकेश नाम का एक युवक रहता था. उस पर बलात्कार का मामला चल रहा था. इस के बावजूद उस की शादी तय हो गई थी. यह बात मीना ने जब अपने पति को बताई तो वह बोला, ‘‘अच्छी बात है. आखिर क्या कमी है राकेश में? वह मर्द है और मर्द पर कभी कोई लांछन नहीं लगता.’’

यह सुन कर मीना को अपने पति पर गुस्सा तो बहुत आया पर वह खून का घूंट पी कर रह गई. रोजमर्रा की ऐसी छोटीछोटी असंवेदनाएं दर्शाती हैं कि नारी को देवी का स्थान देने वाले हमारे समाज में लिंग संवेदीकरण की कितनी भारी कमी है.

जब रोहन सुमित के घर मिलने आया तो सुमित तथा उस का परिवार साथ बैठ कर गप्पें लड़ा रहा था. तभी रोहन की बेटी ने छोटी सी स्कर्ट पहने घर में प्रवेश किया. सुमित ने अपने मित्र रोहन से कहा, ‘‘आजकल आए दिन कैसी खबरें आ रही हैं समझ रहा है न? लड़कियां ऐसे छोटे कपड़े पहनेंगी तो किसी को क्या दोष दें?’’ ‘‘जी हां, भाईसाहब,’’ सुमित की पत्नी ने साथ दिया, ‘‘ऐसे में लड़कों को क्या कहें जब लड़कियों को ही अपना होश नहीं? हमें तो कोई चिंता है नहीं, हमारे घर में लड़का है. लेकिन जिन घरों में लड़कियां हैं उन्हें तो ध्यान रखना चाहिए कि वे अपनी लड़कियों को रोक कर रखें.’’

उन की ऐसी मानसिकता पर रोहन और उस की पत्नी को आश्चर्य के साथ रोष भी हुआ. जब नैतिक मूल्यों का सारा बीड़ा केवल लड़कियों के सिर होगा तब न तो समाज में लड़कियों की सुरक्षा होगी और न ही समानता. यदि लड़कियों की भांति लड़कों को भी नैतिक मूल्य सिखाए जाएं, उन्हें भी घर लौटने की समय पाबंदी हो, उन के समक्ष भी नैतिकता की चुनौती बचपन से डाली जाए, तब शायद हमारे समाज में लड़की घर से बाहर निकलने में सुरक्षित अनुभव करेगी.

लिंग संवेदीकरण पर विदेशियों के विचार लिंग संवेदीकरण की घटनाएं न केवल भारत में हो रही हैं, बल्कि विदेशों में भी ऐसी घटनाएं आम हैं. अमेरिकी पत्रकार व सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता ग्लोरिया स्टीनेम ने कहा है कि हम ने अपनी लड़कियों को तो लड़कों की तरह पालना शुरू कर दिया है, लेकिन अपने लड़कों को लड़कियों की तरह पालने की हिम्मत बहुत कम में है.

निकलस क्रिस्टोफ, जो अमेरिकी पत्रकार व लेखक हैं और 2 बार पुलित्जर प्राइज के विजेता भी रहे हैं, का कहना है कि कई शताब्दियां गुलामी से लड़ने में निकलीं. 19वीं शताब्दी में अधिनायकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई और वर्तमान सदी में पूरे विश्व में लैंगिक समानता की नैतिक चुनौती सर्वोच्च रहेगी.

इन विदेशी विचारकों के विचारों से यह स्पष्ट है कि लिंग असमानता न केवल किसी एक देश की समस्या है, बल्कि पूरा विश्व इस से ग्रसित है. नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव में हिलेरी क्लिंटन का डोनाल्ड ट्रंप से हारना भी यह दर्शाता है कि अमेरिका जैसा देश भी लिंग भेद की दलदल में अभी भी फंसा हुआ है. अगर हिलेरी चुनाव जीततीं, तो वे 245 वर्ष पुराने लोकतंत्र की पहली महिला राष्ट्रपति बनतीं.

जब अमेरिका जैसे मौडर्न देश में लिंग संवेदीकरण है और स्त्रियों को कमतर समझा जाता है, तो भारत जैसा देश जो पंडेपुजारियों के प्रवचनों व पूजाअर्चना जैसी कूपमंडूक बातों को प्राथमिकता देता हो, वहां लिंग असमानता न हो यह हो ही नहीं सकता. आज भी दक्षिण व देश के कई हिस्सों में स्थित मंदिरों में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है. आखिर क्यों? वैसे तो पुरुषों को भी इन मंदिरों में जाने से कुछ हासिल नहीं होता पर स्त्रियों पर ऐसी पाबंदियां थोपना क्या सही है?

जिनेवा स्थित विश्व आर्थिक मंच के वार्षिक जेंडर गैप इंडैक्स के अनुसार भारत 114वें स्थान पर है. जबकि पिछले वर्ष भारत का स्थान भाग लेने वाले 136 देशों में 101वां था.

कैसे हो लिंग संवेदीकरण

आज जब विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है और जीवनयापन की परिभाषा ही बदल गई है तो हमें लिंग संवेदीकरण पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और एक समाज को गढ़ना है जहां लिंग संवेदीकरण की भावना हो और स्त्री और पुरुषों के बीच असमानताओं की दीवारें न हों. दोनों को एक ही पलड़े में तौला जाए. स्त्रियों के साथ होने वाली बदसलूकी को खत्म किया जाए.

यदि हम चाहते हैं कि हमारे समाज में लिंग संवेदीकरण हो तो हमें अपने बच्चों में शुरू से ही इस का बिगुल फूंकना होगा और यह कार्य जितना घर के अंदर हो सकता है उतना ही विद्यालय के अंदर भी. पोर्ट ब्लेयर के निर्मला उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाचार्या डा. कैरोलीन मैथ्यु का मत है कि विद्यार्थियों में जागरूकता लाने में अध्यापकों की भूमिका श्रेष्ठ है. सब से पहले अध्यापक को लिंग संवेदीकरण में विश्वास होना चाहिए. एकदूसरे के प्रति समानता और आदर की भावना लड़के व लड़कियों में एक समान होनी चाहिए. दोनों को एकदूसरे की अच्छाइयों व कमियों को जानना और सहना आना चाहिए.

लड़केलड़कियों को बराबर के अवसर प्रदान करने चाहिए, लड़कियों को प्रसिद्ध महिलाओं की जीवनियां पढ़ानी चाहिए व उन्हें उन के अधिकारों की जानकारी के साथ ही आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए.

कालेज से निकल कर जब युवक व युवतियां बराबरी से नौकरी के क्षेत्र में कदम रखते हैं तब भी लिंग संवेदीकरण का पाठ चलता है. आज कारपोरेट दुनिया में भी इस विषय में काफी काम हो रहा है, जो प्रगतिशील है.

कारपोरेट जगत में आए बदलाव

प्रीति कटारिया जो विप्रो में एचआर हैड हैं बताती हैं कि उन की कंपनी में ऐसे प्रश्न जैसे ‘क्या आप शादीशुदा हैं?’ भी नहीं पूछ सकते हैं. कहती हैं कि भारतीयों को महिलाओं से ऐसे सवाल मसलन, विवाह संबंधी या बच्चे संबंधी पूछना स्वाभाविक लगता है. लेकिन ऐसे प्रश्न एक पुरुष आवेदक से नहीं पूछे जाते हैं. ऐसे प्रश्नों को नहीं पूछना चाहिए, क्योंकि ऐसे प्रश्नों से महिलाओं के कैरियर पर असर पड़ता है. महिलाएं भी पुरुषों की भांति अपने काम में अग्रसर होना चाहती हैं.

कुछ ठोस कदम

लाइफ स्किल्स कोच, मंजुला ठाकुर कहती हैं कि अब लोगों को लिंग संवेदीकरण जैसे संवेदनशील विषय पर खुल कर बातचीत करने की जरूरत महसूस होने लगी है, विविधता से परिपूर्ण देश में लैंगिक समानता लाने हेतु कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना होगा:

रूढिवादी मान्यताओं तथा पक्षपातपूर्ण मूल्यों से हट कर दोनों लिंगों के प्रगतिशील अस्तित्व को बढ़ावा देना होगा.  दोनों के कार्यक्षेत्रों के लिए सुलहपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा.

महिलाओं की रक्षा हेतु सफल कदम उठाने होंगे. साथ ही यह भी निश्चित करना होगा कि यह कदम पुरुषों के प्रति किसी प्रकार का भेदभाव न रखे.

मंजुला मानती हैं कि प्रशिक्षण देने और जागरूकता बढ़ाने से हमारे समाज, शैक्षिक संस्थाओं, दफ्तरों आदि से लिंग आधारित भेदभाव अवश्य घटेगा और साथ ही औरतों को आगे बढ़ने के अधिकाधिक अवसर मिलेंगे. इसी आशा के साथ मंजुला चंडीगढ़ के पंचकूला व मोहाली में लाइफ स्किल्स ट्रेनिंग संस्था द्वारा परामर्श व प्रशिक्षण शिविर लगाती रहती हैं.

अक्षुना बक्शी जो केवल 25 वर्ष की हैं, कुछ ऐसा कर रही हैं कि हम सभी को उन से सीखना चाहिए. वैसे तो अक्षुना ट्रैवलिस्ता नामक औनलाइन साइट चलाती हैं. लेकिन समाज में स्त्री का उत्पीडन, स्त्री जाति से द्वेष की भावना से तंग आ कर अक्षुना ने एक संस्था भी आरंभ की है. उन की टीम में केवल महिलाएं हैं, जो महिलाओं को जीवन के कई पहलुओं से अवगत कराती हैं.

संवेदीकरण पर काम करते हुए अक्षुना ने खास पाठ्यक्रम तैयार किया है, जिस में लैंगिक समानता, पुरुषों की जिम्मेदारी, पुरुषों द्वारा बचपन से ही महिलाओं को सम्मान दिलवाना आदि को उन के सभी सत्रों में शामिल किया जाता है.

लिंग संवेदीकरण हेतु हमें छोटीछोटी संवेदनशीलताओं का ध्यान रखना होगा. मुंबई उच्च न्यायालय में वकील, ऐलीन मारकीस का कहना है कि हमें अपने बच्चों के सामने सतर्क रह कर प्रतिक्रिया देनी चाहिए. वे लगातार अपने अभिभावक, अध्यापक आदि के कार्यकलापों को देख रहे होते हैं, इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम उन के समक्ष सही मूल्य रखें.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश को विकास के पथ पर ले जाने में आधी आबादी का भी खासा योगदान है. इस की रफ्तार को बरकरार रखने के लिए हमें लिंग संवेदीकरण के प्रति संवेदनशील होना ही पड़ेगा.

संविधान में लैंगिक समानता का प्रावधान

  • अनुच्छेद 14 में कानून में मर्द व औरत दोनों को समानता प्रदान की गई है.
  • अनुच्छेद 15 में लिंग, जाति या नस्ल इत्यादि के आधार पर भेदभाव निषेध किया गया है.
  • अनुच्छेद 16 में सार्वजनिक रोजगार में अवसर प्रदान करने की समानता की बात कही गई है.

फिर भी इस विषय में हमारा देश अभी काफी पीछे है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य सत्यव्रत पाल के अनुसार इन आंकड़ों से केवल नजरें झुकाने से काम नहीं बनेगा. इतना व्यवस्थित नरसंहार का न होना तभी मुमकिन है जब समाज के साथ सरकार भी इस के लिए ठोस कदम उठाए. देखा गया है कि कुछ परिवारों में बहनों को उन के भाइयों से कम भोजन मिलता है, कम शिक्षा मिलती है. लड़कियों के प्रति हिंसा और लड़कों को दी गई प्राथमिकता शुरू से ही दोनों में इस भावना का बीज बो देती है कि पुरुषों को स्त्रियों की तुलना में सामाजिक वरीयता अधिक मिलेगी.

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