श्वेता का कालेज में पहला साल था. ऐडमिशन के 2 महीने बाद ही फ्रैशर पार्टी होनी थी. सीनियर छात्रों ने श्वेता को फ्रैशर पार्टी की सारी जिम्मेदारी दे दी. श्वेता को तो ना कहने की आदत ही नहीं थी. ऐसे में वह हर काम के लिए हां कहती गई. फ्रैशर पार्टी की जिम्मेदारी निभाते श्वेता को इस बात का खयाल ही नहीं रहा कि इस काम के चक्कर में उस की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है. वह क्लास में पूरी अटैंडैंस भी नहीं दे पाई.

फ्रैशर पार्टी पूरी होने के बाद सब ने श्वेता के काम की काफी तारीफ की. श्वेता के कालेज में हर 6 महीने में अटैंडैंस चैक की जाती थी. श्वेता की अटैंडैंस सब से कम निकली. इस का नोटिस श्वेता के घर भेज दिया गया. घर वाले परेशान हो गए. कालेज मैनेजमैंट ने फैसला लिया कि जिस स्टूडैंट की अटैंडैंस कम होगी, उसे परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा. ऐसे में दूसरे स्टूडैंट्स के साथ श्वेता भी परीक्षा नहीं दे पाई. उस का एक साल बरबाद हो गया.

श्वेता और उस के घर वालों ने कालेज प्रबंधन से काफी रिक्वैस्ट की, लेकिन कालेज प्रबंधन ने कम अटैंडैंस वाले स्टूडैंट्स को परीक्षा ही नहीं देने दी. अपना बहुमूल्य एक साल खोने के बाद श्वेता को समझ आया कि यदि उस ने इस काम के लिए पहले ही ना कह दिया होता तो उसे इस तरह की परेशानी में नहीं पड़ना पड़ता.

इस तरह के हालात से न केवल कालेज में बल्कि कई बार जिंदगी में भी रूबरू होना पड़ता है. पढ़ाई पूरी करने के बाद दिनेश ने औफिस में काम शुरू किया. वह मेहनत और लगन से अपना काम करना चाहता था.

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