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‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ से जुड़े विवादों पर क्या है कुशान नंदी की राय

कांट्रैक्ट किलिंग यानी कि पैसे लेकर किसी की हत्या करने के पेशेवर लोगों की जिंदगी को रेखांकित करने वाली फिल्मकार कुशान नंदी की फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ इन दिनों काफी चर्चा में है. 25 अगस्त को प्रदर्शित हो रही इस फिल्म को सेंसर बोर्ड के अलावा भी कई तरह की समस्याओं से जूझना पड़ा. कुशान नंदी के अनुसार उनकी यह फिल्म यथार्थ के धरातल पर सच को पेश करती है और आज की तारीख में वास्तविकता कोई देखना नहीं चाहता. इसी के चलते उनकी फिल्म को लोगों का कोपभाजन बनना पड़ा.

फिल्म की विषय वस्तु की प्रेरणा और लोगों की नाराजगी झेलने की चर्चा करते हुए हमसे खास बातचीत करते हुए कुशान नंदी ने कहा, ‘‘हमारी फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली फिल्म है. मेरी फिल्म में जिस तरह के किरदार हैं, इनमें से ज्यादातर किरदार मैंने देखे हैं. मुझे बचपन से ही घूमने का शौक रहा है. इतना ही नहीं जब मेरे पास काम नहीं था, जब लोगों को मुझ पर यकीन नहीं था, तब मैं छोटे छोटे गांवों में, ढाबों पर जाता था, वहां पर रीयल लोगों से बातें करता था. देखिए, मुंबई शहर में हम नकली लोगों के बीच नकली जिंदगी जीते हैं. मगर गांवों व कस्बों में आपको वास्तविक इंसान व वास्तविक कहानियां मिलती हैं. मुझे वहीं से मेरी फिल्म के लिए कहानी की प्रेरणा मिली.’’

फिल्म ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ के इंटीमेसी के दृश्यों पर सेंसर बोर्ड ने 48 कट लगाए थे. बाद में कुशान नंदी ने इस फिल्म को त्रिब्यूनल से पारित कराया. मगर इस फिल्म के लिए कुछ दिन शूटिंग करने के बाद इस फिल्म से अलग हो जाने वाली अदाकारा चित्रांगदा सिंह का दावा है कि उन्होंने अश्लील व गर्मागर्म इंटीमेट दृश्यों को करने की बजाय इस फिल्म से खुद को अलग कर लेना बेहतर समझा था.

मगर फिल्म के निर्देशक कुशान नंदी, चित्रांगदा के बयान से असहमति जताते हुए कहते हैं, ‘‘यह फिल्म और इसकी पटकथा चित्रांगदा के पास एक साल से थी. उन्हें मैंने 125 पन्नों की विस्तृत पटकथा दी थी. इतना ही नहीं चित्रांगदा सिंह ने वह सारे इंटीमेट दृश्य नवाजुद्दीन के साथ फिल्माए भी थे, जिनकी वह बात कर रही है. तो इस वजह से फिल्म नहीं छोड़ी. उनकी फिल्म छोड़ने की वजह कुछ और है, जिसका जिक्र मैं फिल्म रिलीज के बाद करुंगा. वह पटकथा बदलवाना चाहती थीं. उनकी समस्या कुछ और थी, जो कि हमारी बातचीत में हल नहीं हुई. चित्रांगदा सिंह के फिल्म से अलग होने के बाद मैंने बिदिता बाग को चुना. मुझे लगता है कि यह सही हुआ. बिदिता बाग ने जो कमाल दिखाया है, वह कोई और नहीं दिखा सकता. पर चित्रांगदा के जाने और बिदिता के साथ पुनः शूटिंग करने से हमें बहुत आर्थिक व मानसिक नुकसान हुआ.’’

नफरत की आंधियों के बीच प्रेम के ये दीए दे रहे हैं मन को सुकुन और शांति

समाज में जब चारों तरफ नफरत, निष्ठुरता और हिंसा की आंधी चल रही हो, इस के बीच कहींकहीं प्रेम के टिमटिमाते दीए मन को सुकुन का एहसास देते प्रतीत होते हैं. राजधानी दिल्ली के अखबार आजकल रिश्तों में फैल रही कड़वाहट के कारण होने वाले झगड़े, हिंसा की खबरों से भरे रहते हैं. देखिए, रिश्तों में अपराध की कैसीकैसी अजीबोगरीब, अकल्पनीय, अविश्वसनीय खबरें सुर्खियों में हैं.

नोएडा में औरत द्वारा औरत की घर में घ़ुस कर गोली मार कर हत्या, औरत पति को छोड़ कर दूसरे पुरुष के साथ लिव इन में रह रही थी. अमेरिका में रह रहे बेटे का मुंबई पहुंचने पर मां का फ्लैट में कंकाल मिला, इंजीनियर बेटे की मां से एक साल पहले टेलीफोन पर बात हुई थी. साइड न देने पर कार सवार युवक की लाठीडंडों से पीटपीट कर हत्या, खाना लगाने में देरी पर होटल मालिक और बेटे की ग्राहकों ने गोली मार की जान ले लीं, खून की कमी के कारण पत्नी द्वारा फ्रूट्स मांगे जाने पर हुए झगड़े में पति ने पत्नी को मार डाला. रोहिणी में दोस्ती का प्रस्ताव ठुकराने पर युवक  द्वारा सहपाठी युवती की गला दबा कर हत्या,  बड़े भाई द्वारा छोटे भाई की हत्या, शराब के पैसे न देने पर बेटे द्वारा मां की हत्या, पिता द्वारा बेटे की हत्या, पत्नी द्वारा पति का कत्ल, पति द्वारा पत्नी की जान लेना जैसे घटनाएं किसी भी संवेदनशीन इंसान को झकझोर देती हैं.

ऐसी ही खबरों के बीच झारखंड के जशपुर में 75 वर्षीय रतिया राम और 70 वर्षीय जिमना बरी के बीच पनपे प्यार और शादी तथा मणिपुर की नागरिक अधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला और उन के ब्रिटिश प्रेमी डेसमंड कोटिंहो के विवाह बंधन में बंधने की खबरें ठंडी बयार के समान हैं. इन दोनों दंपतियों की अखबारों, टेलीविजन चैनलों पर फोटो और वीडियो दिखाए जा रहे हैं. इन्हें लोग ताज्जुब की तरह देख रहेहैं. सचमुच यह प्रेम चारों ओर नफरतों के बीच आश्चर्य ही है.

जशपुर के झग्गरपुर गांव निवासी रतिया राम की पत्नी की 20 साल पहले मृत्यु हो गई थी. उन की 2 बेटियां थीं जिन की शादी हो गई. एक महीने पहले वह बेटी के गांव झिक्की गया. वहीं उस की मुलाकात जिमनी बरी से हुई. वह भी अकेली रह रही थी. उस के कोई संतान नहीं थी. उस के पति की भी 20 साल पहले मौत हो गई थी. फिर कोई सहारा नहीं रहा. कोई संपत्ति भी नहीं थी. दोनों ने मुलाकात के बाद एकदूसरे का दुखदर्द सुना तो परस्पर सहानुभूति के बाद दोस्ती हो गई.

एक माह तक चला यह रिश्ता प्यार में बदल गया.दोनों ने एकदूसरे का अकेलापन दूर करने का निर्णय लिया. दोनों को सामाजिक बंदिशों का भी ख्याल आया पर दोनों ने एकदूसरे को समाज का सामना करने का हौसला दिया. दोनों एक सप्ताह तक एक ही घर में रहे. बाद में बगडोल पंचायत सरपंच के पास पहुंचे और अपना फैसला बता कर मदद मांगी. पंचायत सहित समूचे गांव ने मिल कर इस बुजुर्ग दंपती की धूमधाम से शादी करा दी. उन्हें कई गिफ्ट दिए गए. शादी के जोड़े में दोनों बुजुर्गों के चेहरे की खुशी देख कर हर किसी को शकुन मिल रहा था.

दूसरी घटना इरोम शर्मिला की है जो अपने ब्रिटिश प्रेमी डेसमंड कोटिंहो के साथ विवाह बंधन में बंध गई. 17 अगस्त को दोनों ने सब रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंच कर  एकदूसरे को पुष्पमाला पहना कर आजीवन एकदूसरे के हो गए. यह अंतरधार्मिक विवाह था इसलिए उन्होंने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत आवेदन किया. मणिपुर की शर्मिला इरोज ने आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट के खिलाफ 16 वर्षों से भूख हड़ताल कर रही थीं. पिछले दिनों मणिपुर में चुनाव हारने के बाद वह तमिलनाडु के कोडइकनाल आ गई थीं. कुछ समय से वह अपने इस दोस्त के साथ ही रह रही थीं.

इन दिनों प्रेमप्यार की खबरें कम ही आ रही हैं. इस तरह का प्यार निश्छल होता है. जहां स्वार्थ, चालाकी, त्याग नहीं, वहां प्रेम नहीं है. इन दोनों जोड़ों के बीच धर्म, जाति की बात कहीं नहीं है. इस के विपरीत रिश्तों में स्वार्थ सर्वोपरि हो गया है. बातबात पर समाज हिंसा पर उतारू दिखता है.

किसी भी सभ्य समाज में क्या कभी ऐसा होता है? लोग वहशी बनते जा रहे हैं. रिश्तों में जरा भी गंभीरता नहीं दिखती. लगता है समाज धैर्य खो चुका है. बातबात में लोग घर, परिवार, सार्वजनिक जगहों पर भिड़ पड़ते हैं, एकदूसरे की जान ले लेते हैं.

समाज कहां जा रहा है? मीडिया में सामाजिक, पारिवारिक संबंधों के बिगड़ते माहौल पर कोई बहस नहीं हो रही. राजनीति और दूसरे गैरजरूरी मुद्दे टेलीविजन चैनलों के लिए ज्यादा अहम हो गए हैं.

समाज को अगर सही दिशा नहीं मिलेगी तो पतन निश्चित है. यह दिशा कौन देगा? धर्म समाज में शांति, प्रेम, भाईचारा, अहिंसा, क्षमा प्रदान करने का दावा करता है. देश भर में हजारों धर्मगुरु अच्छी सीख देते सुनाई पड़ रहे हैं पर वह अच्छाई धरातल पर है कहां?

समाज में बेकाबू होते इस अमानुष व्यवहार की जिम्मेदारी किस की है?

धर्म  ‘कलियुग है’ कह कर पल्ला झाड़ लेता है. सियासत को समाज में झांकने की फुर्सत ही नहीं है? आज की सियासत तो समाज को ही नहीं, परिवार को बांट कर रखने में विश्वास रखती है. आखिर जिम्मेदारी समाज सुधारकों पर आती है पर समाज सुधारक भी कहां हैं? नफरत, वहशीपन की यह आग घर तक पहुंच गई है. यह समाजशास्त्रियों, विचारकों को सोचने का समय है.

झारखंड के हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन ने खोली नक्सलवाद की पोलपट्टी

झारखंड के हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन ने आत्मसमर्पण करने के बाद माओवादियों और नक्सलियों की पोलपट्टी खोल कर रख दी है. कुंदन पाहन ने पुलिस को बताया कि माओवादी संगठन के ज्यादातर नक्सली नेता खुद ही नए जमींदार बन बैठे हैं. वे सूद पर पैसा लगाने से ले कर ठेकेदारी का काम करने लगे हैं.

करोड़पति नक्सली कुंदन पर 128 मामले दर्ज हैं. उस के सिर पर 15 लाख रुपए का इनाम था. गौरतलब है कि कुछ समय पहले खुफिया विभाग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी कि सरकारी योजनाओं में कई नक्सली पेटी कौंट्रैक्टर के तौर पर काम कर रहे हैं. वे सरकारी योजनाओं के ठेके हासिल करने वाली बड़ीबड़ी कंपनियों को धमका कर छोटेछोटे कामों के ठेके अपने हाथ में ले लेते हैं.

बड़ी कंपनियां इस डर से नक्सलियों को ठेके दे देती हैं कि काम आसानी से हो सकेगा और दूसरे अपराधियों की ओर से कोई परेशानी खड़ी नहीं की जाएगी. खुफिया विभाग ने कुछ साल पहले ही राज्य सरकार को बताया था कि पेटी कौंट्रैक्टर के काम में लग कर कई नक्सली करोड़पति बन बैठे हैं.

पुलिस महकमे से मिली जानकारी के मुताबिक, कुछ समय पहले पटना, बिहार में पकड़े गए नक्सलियों के पास से 68 लाख रुपए बरामद हुए थे. जहानाबाद में गिरफ्तार नक्सलियों के पास से 27 लाख, 50 हजार रुपए और 5 मोबाइल फोन जब्त किए गए थे.

औरंगाबाद में नक्सलियों के पास से 3 लाख, 34 हजार रुपए और एक बोलैरो गाड़ी, गया में 15 लाख रुपए, मुंगेर में एक कार, 50 हजार रुपए, पिस्तौल वगैरह सामान बरामद किए गए थे. कुंदन पाहन ने बताया कि माओवादी संगठन के ऊंचे पदों पर बैठे नक्सलियों के बच्चे बड़ेबड़े अंगरेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और छोटे नक्सलियों से गांवों के स्कूलों को बम से उड़ाने को कहा जाता है. जहां एक ओर बड़े नक्सली शानोशौकत की जिंदगी गुजारते हैं, वहीं दूसरी ओर जंगल में दिनरात बंदूक ढोने वाले नक्सलियों के परिवार दानेदाने को मुहताज रहते हैं.

पुलिस हैडर्क्वाटर के सूत्रों पर भरोसा करें, तो बिहार के कई नक्सलियों की करोड़ों की दौलत पता लगाने का काम शुरू किया गया है. उस के बाद उन की गैरकानूनी तरीके से बनाई गई जायदाद को जब्त करने का काम शुरू किया जा सकता है. हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन का पुलिस ने 14 मई को आत्मसमर्पण कराया था. 77 हत्याएं करने की बात कबूलने वाले कुंदन ने पुलिस को कोई हथियार नहीं सौंपा था.

कुंदन करोड़पति है और उस ने झारखंड के बुंडू, तमाड़, अड़की, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम जिलों के कारोबारियों समेत ओडिशा के दर्जनों कारोबारियों को सूद पर रकम दे रखी है. कुंदन किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़ने का मन बना रहा है. वह इस की पूरी तैयारी भी कर चुका है. उस ने साफतौर पर कहा है कि वह जेल से ही चुनाव लड़ेगा और चुनाव जीतने के बाद अपने इलाके की तरक्की करेगा.

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी), झारखंड की क्षेत्रीय समिति के सचिव कुंदन ने साल 2008 में स्पैशल ब्रांच के इंस्पैक्टर फ्रांसिस इंडवर की हत्या की थी. उसी साल सरांडा के जंगल में डीएसपी प्रमोद कुमार की हत्या की थी. आईसीआईसीआई बैंक के 5 करोड़ रुपए और सवा किलो सोना लूटने के बाद संगठन में उस की तूती बोलने लगी थी. उस के बाद उस ने सांसद सुनील महतो और विधायक रमेश मुंडा को मार डाला था. कुंदन के खिलाफ रांची में 42, खूंटी में 50, चाईबासा में 27, सरायकेला में 7 और गुमला जिले में एक मामला अलगअलग थानों में दर्ज है. उस से पूछताछ के बाद मिली जानकारी के बाद झारखंड पुलिस रांची, खूंटी, लोहरदगा, गुमला, सरांडा, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिम बंगाल से सटे इलाकों में जम कर छापामारी कर रही है.

बैंक से करोड़ों की लूट के बाद रुपए के बंटवारे को ले कर कुंदन और उस के करीबी दोस्त राजेश टोप्पो के बीच तीखी झड़प हो गई थी. कुंदन लूट की रकम में ज्यादा हिस्सा लेना चाहता था और राजेश बराबरबराबर बांटने की जिद पर अड़ा हुआ था. दोनों के बीच का झगड़ा इतना बढ़ा कि उन्होंने अपने रास्ते अलगअलग कर लिए.

राजेश ने अपना अलग दस्ता बना लिया. उस के बाद वह संगठन में कुंदन को नीचा दिखाने की ताक में रहने लगा. कुछ दिनों के बाद ही उसे बड़ा मौका मिल भी गया. राहे इलाके में राजेश की अगुआई वाले दस्ते ने 5 पुलिस वालों की हत्या कर दी और उन से हथियारों को लूट लिया. इस के बाद संगठन में राजेश की हैसियत रातोंरात काफी बढ़ गई. उसे संगठन में काफी तवज्जुह मिलने लगी.

संगठन के बड़े नक्सली नेताओं द्वारा राजेश को ज्यादा तरजीह देने से कुंदन नाराज रहने लगा. उस ने राजेश को अपने रास्ते से हटाने की साजिश रचनी शुरू कर दी. उस ने झांसा दे कर राजेश को अड़की के जंगल में बुलवाया और वहीं उस की हत्या कर दी. पहले तो नक्सली नेता यह समझ बैठे कि पुलिस की मुठभेड़ में राजेश की जान गई है, पर बाद में उन्हें पता चला कि कुंदन ने उसे धोखे से मार डाला है, तो संगठन के सभी नक्सली नेता उस से नाराज हो गए. संगठन ने कुंदन के पर कतर डाले और उसे अलगथलग कर दिया. इस के बाद से ही उस ने आत्मसमर्पण करने की प्लानिंग शुरू कर दी थी.

रांचीटाटा हाईवे पर कुंदन की दहशत पिछले कई सालों से कायम थी. शाम ढलते ही हाईवे पर सन्नाटा पसरने लगता था. बुंडू और तमाड़ इलाकों के बाजार शाम होते ही बंद हो जाते थे. नेताओं और सरकारी अफसरों के बीच उस का खौफ इतना ज्यादा था कि अगर उन्हें शाम के बाद हाईवे से गुजरना होता था, तो पूरे रास्ते पर सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती कर दी जाती थी.

खूंटी जिले का रहने वाला कुंदन साल 1998-99 में अपने 2 बड़े भाइयों डिंबा पाहन और श्याम पाहन के साथ नक्सली दस्ते में शामिल हुआ था. उस समय कुंदन की उम्र महज 17 साल थी. कुंदन और उस के परिवार वालों के पास अड़की ब्लौक के बाड़गाड़ा गांव में 27 सौ एकड़ जमीन है. उस में से तकरीबन 1350 एकड़ जमीन पर उस के एक चाचा ने कब्जा जमा रखा है. तमाड़ में आल झारखंड स्टूडैंट यूनियन के विधायक विकास मुंडा कुंदन के आत्मसमर्पण करने के तरीके को गलत बताते हुए सरकार से नाराज हैं. कुंदन ने ही लैंडमाइंस ब्लास्ट कर के उन के पिता रमेश मुंडा की हत्या कर दी थी.

डूम्सडे क्लौक : प्रलय के आकलन की घड़ी की कहानी क्या आपने पढ़ी

इसी साल जनवरी में प्रलय की प्रतीकात्मक घड़ी ‘डूम्सडे क्लौक’ को आधा मिनट और आगे खिसका दिया गया. इस बदलाव के साथ अब प्रतीकात्मक रूप से प्रलय का वक्त आने में सिर्फ ढाई मिनट का समय ही बचा है. इस से पहले वर्ष 2015 में यह बदलाव किया गया था और तब यह दूरी 3 मिनट की थी. नए परिवर्तन के पीछे एटमी हथियारों के इस्तेमाल और जलवायु परिवर्तन पर अमेरिकी रुख के बारे में अमेरिका के राष्ट्रपति डौनल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के बयान हैं. खासतौर से ट्रंप जो क्लाइमेट चेंज के मुद्दे को फर्जी तक कह चुके हैं, हालांकि बीचबीच में वे यह भी कहते हैं कि वे इस मामले पर खुले मन से बातचीत करने को तैयार हैं.

जहां तक परमाणु क्षमता के इस्तेमाल की बात है, तो इस संबंध में ट्रंप कह चुके हैं कि मौजूदा हालात को देखते हुए अमेरिका को अपने एटमी हथियारों की संख्या में और बढ़ोतरी करनी चाहिए. असल में उन का बयान रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के बयान का जवाब था, जिस में उन्होंने कहा था कि उन के देश को परमाणु ताकत के मोरचे पर और ताकतवर होने की जरूरत है. इस के जवाब में ट्रंप ने ट्वीट किया था कि अमेरिका को अपनी एटमी क्षमता का विस्तार करते हुए इसे मजबूत बनाना चाहिए. ऐसा तब तक किया जाए, जब तक दुनिया को परमाणु हथियारों को ले कर अक्ल न आ जाए. ट्रंप के इन बयानों के असर में ही डूम्सडे क्लौक को आगे खिसकाने की नौबत आई है.

ट्रंप और पुतिन हैं मुख्य कारण

ऐसा पहली बार हुआ है जब ऊंचे पद पर बैठे व्यक्तियों के बयानों के आधार पर डूम्सडे क्लौक के समय में परिवर्तन किया गया है. जनवरी में जब वाशिंगटन स्थित नैशनल प्रैस क्लब में इस बारे में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया, तो बुलेटिन औफ द एटौमिक साइंटिस्ट्स के प्रवक्ता लौरेंस क्रौस ने कहा, ‘‘डूम्सडे क्लौक की सूई आधी रात के समय के इतने करीब पहुंच चुकी है, जितनी कि यहां कमरे में मौजूद किसी भी शख्स के पूरे जीवनकाल में नजदीक नहीं थी.

आखिरी बार ऐसा 63 साल पहले 1953 में हुआ था, जब सोवियत संघ ने पहला हाइड्रोजन बम फोड़ा था और जिस की वजह से हथियारों की आधुनिक होड़ का आगाज हुआ था. उल्लेखनीय है कि इस प्रतीकात्मक घड़ी की सूइयों को धरती पर मौजूद खतरों के अनुसार आगे या पीछे खिसकाया जाता रहा है. इस के विभिन्न कारण रहे हैं, पर कोई व्यक्ति इस से पहले इस में बदलाव की वजह नहीं बना था.

लेकिन इस बार जिस तरह पहले (अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक) चुनाव में ट्रंप की जीत सुनिश्चित करने के लिए कथित तौर पर साइबर हैकिंग का इस्तेमाल किया गया, इस के बाद ट्रंप और पुतिन ने एटमी हथियारों और क्लाइमेट चेंज पर जो बयानबाजी की, उस से वैश्विक खतरों में बढ़ोतरी तय मानी जाने लगी. प्रवक्ता और बुलेटिन तैयार करने वाले एक साइंटिस्ट डेविड टिटले के अनुसार, ‘‘इस के लिए विशेष रूप से ट्रंप ही अहम वजह हैं, क्योंकि उन के बयानों के बड़े गहरे अर्थ हैं. घड़ी का समय बदलने वाली टीम में 15 नोबेल विजेता वैज्ञानिक भी शामिल थे, जिस से स्पष्ट है कि उन की आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं.

किस ने बनाई प्रलय घड़ी

वर्ष 1945 में जब अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के 2 बड़े शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराए और भारी विनाश किया था, तब दुनिया के वैज्ञानिकों को इस की चिंता हुई कि कहीं ऐसी घटनाएं पूरी धरती के विनाश का सबब न बन जाएं. इसी विचार के तहत उन्हें एक आइडिया आया कि वे एक घड़ी बना कर धरती के समक्ष मौजूद विनाश की चुनौतियों को दर्ज करें और दुनिया को इस बारे में आगाह करें कि इंसानों के कौन से कार्य पृथ्वी के खात्मे का कारण बन सकते हैं.

इस उद्देश्य से 15 वैज्ञानिकों के एक दल ने जिस में मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग भी शामिल हैं, नौन टैक्निकल एकैडमिक जर्नल के रूप में एक संगठन, ‘द बुलेटिन औफ द अटोमिक साइंटिस्ट्स’ बनाया जो ऐसे खतरों का आकलन कर के समयसमय पर आगाह करता है कि मानवता इस ग्रह को खत्म करने के कितने नजदीक है.

इस से जुड़े वैज्ञानिक परमाणु हथियारों की बढ़ती संख्या के अलावा नरसंहार के दूसरे हथियारों के विकास, जलवायु परिवर्तन, नई तकनीक और बीमारियों आदि की वजह से वैश्विक सुरक्षा पर पड़ने वाले खतरों का अध्ययन करते हैं और उस के आधार पर बताते हैं कि प्रलय अब धरती से कितनी दूरी पर है.

कबकब हुए बदलाव

हिरोशिमा नागासाकी पर एटमी हमले से हुए भारी विनाश के 2 साल बाद 1947 में पहली बार डूम्सडे क्लौक को आधी रात यानी 12 बजे से सिर्फ 7 मिनट की दूरी पर सैट किया गया था. माना गया कि इस घड़ी में 12 बजने का अर्थ होगा कि अब पृथ्वी पर मानवनिर्मित प्रलय का समय आ गया है. इस के बाद इस में अब तक 22 बार परिवर्तन किए जा चुके हैं. इन बदलावों के पीछे परमाणु युद्ध, जलवायु परिवर्तन, जैव सुरक्षा, जैव आतंकवाद (बायो टैरररिज्म), साइबर टैरर, हैकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलीजैंस जैसे कई खतरे और उच्च पदस्थ लोगों की बयानबाजी को कारण बताया गया है.

वर्ष 1947 के बाद डूम्सडे क्लौक की सूइयां 1949 में आधी रात से सिर्फ 3 मिनट की दूरी पर दर्शाई गई थीं, क्योंकि उस वर्ष सोवियत संघ ने अपने पहले परमाणु हथियार का परीक्षण किया था. इस के बाद वर्ष 1953 में जब अमेरिका ने पहले हाइड्रोजन बम का टेस्ट किया, तो प्रलय का वक्त सिर्फ 2 मिनट दूर माना गया. हालांकि वर्ष 1969 में जब परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए गए, तो इस घड़ी की सूइयां पीछे हटा कर आधी रात से 10 मिनट की दूरी पर ले जाई गईं.

भारत और पाकिस्तान में परमाणु हथियारों के परीक्षण पर ये सूइयां 1 मिनट आगे बढ़ा कर प्रलय के वक्त से 9 मिनट की दूरी पर सैट की गई थीं. इन में बड़ा परिवर्तन तब आया जब, 1991 में शीतयुद्ध को समाप्त मान लिया गया और रूसअमेरिका ने अपने परमाणु हथियारों में कटौती शुरू कर दी. उस समय यह घड़ी प्रलय से 17 मिनट की दूरी पर सैट कर दी गई थी. ट्रंपपुतिन के बयानों के आधार पर हुए ताजा बदलाव के साथ डूम्सडे क्लौक में अब तक कुल 22 पर बदलाव हो चुके हैं.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ एटमी हथियारों की होड़ ही प्रलय जैसी स्थितियों के लिए जिम्मेदार है, बल्कि जलवायु परिवर्तन को भी धरती के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है.

प्रलय की भविष्यवाणियां

इंसान की सदियों से यह कल्पना रही है कि दुनिया में पहले कई बार प्रलय आई है और एक बार फिर प्रलय इस पर जीवन को नष्ट कर सकती है. कई बार उन तारीखों का दावा भी किया गया, जब प्रलय आ सकती थी. नास्त्रोदमस नामक भविष्यवक्ता की बातों को प्रलय से कई बार जोड़ा गया है पर प्रलय की ऐसी धार्मिक और ज्योतिषीय आशंकाएं हर बार निराधार ही साबित हुईं.

पिछले साल पश्चिमी देशों में यूट्यूब पर एक वीडियो लाखों लोगों ने देखा, जिस में यह दावा किया गया था कि 29 जुलाई, 2016 को दुनिया का अंत होने वाला है. पश्चिमी देशों के अखबारों में इस की बड़ी चर्चा भी रही, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. असल में यह भविष्यवाणी एक धार्मिक विश्वास और एक वैज्ञानिक तथ्य का मिश्रण थी, जिसे पेश करने के लिए कंप्यूटर से स्पैशल इफैक्ट वाला वीडियो बनाया गया था.

इस बात को एक वैज्ञानिक तथ्य को मसालेदार बना कर पेश करते हुए दावा किया गया था कि उस दिन धरती के चुंबकीय धु्रवों की स्थिति बदल जाएगी और इस से भूकंप आएंगे, आसमानी किरणों का आक्रमण होगा. बिजली के उपकरण और तमाम आधुनिक यंत्र नष्ट हो जाएंगे. विदित हो कि धरती के चुंबकीय धु्रवों की स्थित बदल जाना या ‘पोल फ्लिपिंग’ एक वास्तविक घटना है, लेकिन यह अचानक नहीं होती. धरती के लंबे जीवनकाल में ऐसा कई बार हुआ है जब चुंबकीय धु्रवों की स्थिति पलट जाती है, लेकिन इस से प्रलय कभी नहीं आई.

इस माया समुदाय ने करीब 1,300 साल पहले एक मंदिर के पत्थरों पर 21 दिसंबर, 2012 की तारीख को एक संदेश के रूप में सहेज कर रखा था. इसे पढ़ कर कुछ लोगों ने इसे दुनिया की समाप्ति की भविष्यवाणी मान लिया और कई साल तक इस के लिए उलटी गिनती करते रहे. खासतौर से माया समुदाय के पुजारियों ने उलटी गिनती शुरू करते हुए विशेष धार्मिक कर्मकांड किए.

दूसरी ओर विशेषज्ञों ने यह बताया कि यह तारीख असल में माया कलेंडर के एक युग के अंत को दर्शाने वाली एक गणना मात्र है. उन के मुताबिक, उस दिन माया सभ्यता के प्राचीन पंचांग के अनुसार 5वीं सहस्राब्दि समाप्त हुई थी, जबकि कुछ लोगों ने माया पंचांग के अनुसार युगांत को दुनिया के समाप्त होने की भविष्यवाणी मान लिया.

इस तारीख के करीब 5 साल बाद अब कहा जा सकता है कि ऐसी भविष्यवाणियां कुछ ज्योतिषियों का अपना धंधा चलाने का आधार भले हों, लेकिन उन के पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य नहीं होता. ऐसे ज्योतिषी अपने कर्मकांडी आडंबर के बल पर दुनिया को यह कह कर भयभीत करते रहे हैं कि अब धरती पर पाप इतना बढ़ गया है कि इस का अंत निश्चित है और इसीलिए धरती के अंत की भविष्यवाणियां और तारीख पर तारीख की घोषणा होती रहती है. ऐसी अफवाह फैला कर वे समाज में भय और अंधविश्वास पैदा करते हैं. इसलिए जरूरी है कि पहले ऐसे ज्योतिषियों का सफाया हो.

दिलचस्प यह है कि सिर्फ 21 दिसंबर, 2012 का आकलन ही गलत साबित नहीं हुआ है, बल्कि इस से पहले 90 के दशक में ऐसे छह मौके आए जब दुनिया के खात्मे की भविष्यवाणियां की गईं और वे गलत साबित हुईं.

एक आकलन के अनुसार वर्ष 1840 के बाद से ही हर दशक में 2-3 बार दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणियां होती रहीं, इस बात के सुबूत मिलते रहे हैं कि प्राचीन रोमकाल से ही दुनिया के अंत की गलत अफवाहें होती ही हैं.

वैज्ञानिकों और खगोलविदों का अनुमान है कि पृथ्वी के पास कम से कम 7.5 अरब साल और हैं जिस के बाद पृथ्वी सूर्य में समा जाएगी. हालांकि अपनी हरकतों के कारण इंसान उस से पहले ही इस पृथ्वी से गायब हो चुका होगा जिस का सुबूत डूम्सडे क्लौक से मिल ही रहा है.

दिखावे की यारी जेब पर भारी न पड़ जाए, जानिए क्या होंगे फिर नुकसान

टीनएजर्स दिखावे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. खुद के स्टेटस के लिए ऐसे फ्रैंड्स बनाते हैं जो अमीर होते हैं ताकि ग्रुप में सब उन्हें भी पूछें. तभी तो रिंकू ने प्रिया, जो उस की बैस्ट फ्रैंड थी, की खातिर अपनी सारी पौकेटमनी उड़ा दी. यहां तक कि प्रिया पर अपना इंप्रैशन जमाने के लिए अपने बर्थडे गिफ्ट्स तक उसे दे दिए. भले ही पौकेट में पैसे नहीं थे, लेकिन प्रिया की खुशी के लिए दोस्तों से उधार मांग कर उसे महंगे रैस्टोरैंट में डिनर करवाया, मौल्स से शौपिंग करवाई, यहां तक कि उस के लिए अपना कैरियर तक चौपट कर दिया और प्रिया ने एक पल भी नहीं लगाया उस से दोस्ती तोड़ने में.

ऐसा रिंकू के साथ ही नहीं, बल्कि अधिकांश किशोरों के साथ होता है. वे दिमाग से नहीं बल्कि दिल से काम लेते हैं और बेवकूफ बन जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि दिखावे के चक्कर में न फंसें और ऐसे फ्रैंड्स बनाएं जो आप की तरह ही हों और शोऔफ के चक्कर में न पड़ते हों.

क्या क्या करते हैं दिखावे के लिए

  • घर की जगह बाहर पार्टी

फ्रैंड्स की देखादेखी कि पिछली बार उन्होंने अपने बर्थडे पर सभी फ्रैंड्स को मूवी दिखाने के साथसाथ महंगे होटल में लंच भी करवाया था तो इस बार हम भी पीछे क्यों रहें. हम इस बार अपना बर्थडे कुछ अलग अंदाज में सैलिब्रेट करेंगे, भले ही इस के लिए मम्मीपापा से लड़ाई करनी पड़े.

इस के लिए वे कई दिन पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं और यहां तक कि कई बार तो पार्टी के लिए ड्रैसकोड तक रखते हैं ताकि उन की शान में कोई कमी न आने पाए. पार्टी एकदम धांसू करते हैं कि देखने वाले देखते रह जाएं. भले ही इस के लिए उन की पेरैंट्स से बोलचाल बंद हो जाए. बस, किसी भी कीमत पर उन की इमेज डाउन नहीं होनी चाहिए.

  • महंगे व ब्रैंडेड गिफ्ट्स

भले ही किसी छोटी शौप से गिफ्ट अच्छा व सस्ता मिल जाए, लेकिन वे ब्रैंडेड चीजें ही फ्रैंड्स को गिफ्ट देना पसंद करते हैं. उन की सोच यही होती है कि गिफ्ट पर ब्रैंड नेम होने से ही दोस्त पर इंप्रैशन पड़ेगा और उसे लगेगा कि देखो, मेरे स्पैशल दिन मेरे दोस्त ने कितना कीमती तोहफा दिया है और देखने वालों के बीच भी उस की खूब वाहवाही होगी. ऐसा करते वक्त वे एक बार भी यह नहीं सोचते कि ऐसा कर के सिर्फ उन की जेब ही ढीली होगी.

  • ब्रैंडेड कपड़े

जब फ्रैंड सर्किल हाईफाई हो तो लोकल मार्केट से कपड़े खरीदने का सवाल ही नहीं उठता, तभी तो उन का हमेशा ब्रैंडेड कपड़े खरीदने पर जोर रहता है ताकि जब भी फ्रैंड्स के बीच जाएं तो सब कहें, ‘वाउ क्या शर्ट पहनी है, वाट अ यूनीक शर्ट’ कहे बिना कोई रहे और साथ ही यह भी कहे कि राहुल के ब्रैंडेड कपड़ों का तो जवाब नहीं. इसी तारीफ की खातिर वे ब्रैंडेड कपड़े ही खरीदते हैं.

  • सोशल स्टेटस मैंटेन करने के लिए बार जाना

जब फ्रैंड्स अकसर ग्रुप में यह कहते मिलते हैं कि हम तो कल अपने कजिंस के साथ बार गए थे, ऐसा पहली बार नहीं बल्कि हम तो महीने में 2-3 बार चले ही जाते हैं तो यह सुन कर अकसर टीनएजर्स खुद का सोशल स्टेटस मैंटेन करने के लिए वहां जाना शुरू कर देते हैं, जिस के लिए भले ही उन्हें बाकी चीजों के साथ समझौता करना पड़े, क्योंकि वे अपने फ्रैंड्स से किसी भी कीमत पर यह सुनना पसंद नहीं करते कि यार, बार वगैरा नहीं जाते. यह बात उन की पर्सनैलिटी पर भी विपरीत प्रभाव डालती है.

  • झूठी शान की खातिर सब की हैल्प को तैयार

भले ही जेब में पैसे न हों, लेकिन फिर भी झूठी शान दिखाने के लिए वे सब की हैल्प करने को तैयार रहते हैं और मना करना नहीं जानते. यदि किसी फ्रैंड ने कहा कि यार, मेरा पर्स चोरी हो गया है और आज मुझे शौपिंग करना भी बहुत जरूरी है तो झट से उस की हैल्प के लिए अपनी ट्यूशन फी में से उसे पैसे दे देते हैं ताकि दोस्तों में शान बनी रहे. इस चक्कर में वे अपना ही नुकसान कर बैठते हैं.

  • आउटिंग का प्रोग्राम बनाना

फ्रैंड्स के कहने पर कि इस बार आउटिंग पर बाहर जाएंगे पौकेट अलाउ न करने के बावजूद हामी भर देते हैं और जब पेरैंट्स मना करते हैं तो सीधा सा जवाब देते हैं कि आप तो हमेशा पैसों की कमी का ही रोना रोते रहते हैं. ऐसे में जिद कर के अपना इंप्रैशन जमाने के लिए फ्रैंड्स के साथ आउटिंग पर जाने का प्रोग्राम बना लेते हैं.

  • दिखावे के नुकसान

लेनदेन के चक्कर में रिलेशन पर असर : दिखावे के चक्कर में जब आप दूसरों से लेनदेन कर अपने किसी फ्रैंड को इंप्रैस करने की कोशिश करते हैं तो इस से आप के संबंध मांगने वाले से बिगड़ने लगते हैं, क्योंकि 1-2 बार तो कोई भी खुशीखुशी पैसे दे देता है, लेकिन जब आप उसे आदत बना लेते हैं तो सामने वाला मना करने पर मजबूर हो जाता है जिस से रिश्तों में मनमुटाव आ जाता है.

खुद से ज्यादा दूसरों पर खर्च : हरदम ग्रुप में खुद को अमीर और ऐडवांस्ड दिखाने के लिए किसी ने कहा नहीं कि यार, आज तू पार्टी दे दे या आज तो हम राहुल से ही पार्टी लेंगे. उन की बात मान कर तुरंत अपनी पौकेट ढीली करने के लिए तैयार हो जाएं तो ऐसे में आप दिखावे के चक्कर में खुद से ज्यादा औरों पर खर्च कर बैठते हैं, जिस से अपने बारे में नहीं सोच पाते.

सामने वाले को संतुष्ट करने पर जोर : हरदम सामने वाले को संतुष्ट करने की कोशिश में खुद की पर्सनैलिटी को इंप्रूव करने के बारे में नहीं सोच पाते, जिस से धीरेधीरे हर काम बिगड़ने लगता है, जो भविष्य में आप के लिए घातक साबित होता है.

झूठ का सहारा : अपने दोस्तों को खुश करने के चक्कर में अपनी पूरी पौकेटमनी तो आप पहले ही लुटा बैठे हैं और अब फ्रैंड्स की ख्वाहिशें पूरी करने के लिए यदि आप को घर में झूठ भी बोलना पड़े या फिर पैसों के लिए पापा के पर्स से चोरी की नौबत तक आ जाए तो इस से आप दूसरों के चक्कर में खुद के लिए मुसीबत ही मोल लेते हैं.

लाइफ का मेन पार्ट इग्नोर : हरदम दिखावे में फंसे रहने के कारण आप लाइफ का मैन पार्ट यानी स्टडीज को इग्नोर कर देते हैं और जब समय आप के हाथ से निकलने लगता है तब पछताते हैं कि काश, उस समय कैरियर को संवारने पर ध्यान दिया होता तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता.

बेवकूफ बनाने के ज्यादा चांसेज : सब जानते हैं कि आप से एक बार कहने भर की देर है कि आप झट से किसी भी बात के लिए हामी भर देंगे, तो ऐसे में आप का कोई भी फ्रैंड आप को बड़ी आसानी से बेवकूफ बना देगा. जैसे बाहर जा कर कोई चीज खाने का मन उस का है और नाम आप का लगा कर उसे मंगा ले तो ऐसे में नुकसान हर हाल में आप का ही है.

परिवार से मनमुटाव : जब हम ज्यादा शोऔफ करने लगते हैं तो हमारी इच्छा भी ज्यादा बढ़ जाती है, जिसे पूरा करने के लिए हमारा दबाव हरदम पेरैंट्स पर ही रहता है, जिस से उन की नजरों में गिरने के साथसाथ हमारा उन से मनमुटाव भी हो जाता है.

ऐक्चुअल पर्सनैलिटी नहीं उभरती : हम जो होते हैं वह न दिखा कर खुद को बढ़चढ़ कर दिखाने की कोशिश करते हैं और इस चक्कर में अपने मन की भी नहीं कर पाते, जिस से हमारी ऐक्चुअल पर्सनैलिटी उभर नहीं पाती.

महंगे गैजेट्स का शौक : खुद को बाकी फ्रैंड्स में अलग दिखाने के लिए मार्केट में जो नया गैजेट आया नहीं कि उसे झट से खरीद डालते हैं ताकि फ्रैंड्स के बीच टशन बना रहे और इस चक्कर में खुद की पौकेट पर बोझ पड़ता है.

इंसर्ल्ट के डर से खरीदारी : भले ही आप को बिना ब्रैंड के कपड़े पसंद हों, लेकिन फिर भी फ्रैंड्स क्या सोचेंगे इस चक्कर में आप ब्रैंड्स की चीजें ही खरीदने पर जोर देते हैं, जिस पर लुटते सिर्फ आप ही हैं.

इस तरह दिखावे की यारी आप की जेब पर ही भारी पड़ती है.

हाई लिविंग लो थिंकिंग का जमाना और युवाओं की लग्जरी लाइफ

आज किशोर गैजेट्स के मोह में इस कदर फंसे हैं कि वे ब्रैंडेड से नीचे बात नहीं करते. इस से उन की लिविंग तो हाई हो रही है, लेकिन थिंकिंग लो होती जा रही है. जरूरत है वक्त के साथ थिंकिंग को भी हाई करने की.

आज का यूथ लग्जरी जीवन जीने में विश्वास रखता है. उसे लगता है कि अगर पैसा है तो हर सुखसुविधा खरीदी जा सकती है, खुद की फ्रैंड्स में पैठ जमाई जा सकती है, समाज में अपनी अलग पहचान बनाई जा सकती है, जब चाहे पैसे फैंक कर कोई भी काम निकलवाया जा सकता है. भले ही उन्हें पैसे कमाने व लग्जरी जीवन जीने के चक्कर में अपनों से दूर होना पड़े, वे इस से भी पीछे नहीं रहते, जबकि असल में उन की ऐसी सोच सही नहीं है. क्योंकि आज भले ही पैसों की इंपौर्टैंस कहीं अधिक बढ़ गई है, लेकिन यह भी सचाई है कि जहां अपने काम आ सकते हैं, वहां पैसा नहीं. इसलिए पैसों की अंधीदौड़ में इस कदर न बह जाएं कि जीवन में कभी अपनों का साथ ही हासिल न हो.

क्यों जीते हैं लग्जरी लाइफ

देखादेखी बढ़ा लग्जरी लाइफ का चलन

आज युवा अधिकांश चीजें देखादेखी ही खरीदते हैं. उन्हें लगता है कि उन के फ्रैंड के पास महंगा मोबाइल फोन है जिस के फीचर्स उन के फोन से कही अधिक हैं तो वे भी बिना सोचेसमझे वैसा ही फोन और कई बार तो उस से भी महंगा फोन खरीद लेते हैं, जबकि वे ऐसा करते वक्त एक बार भी यह नहीं सोचते कि इस की उन्हें जरूरत है भी या नहीं. उन का देखादेखी इस तरह चीजें खरीदना सही नहीं है, क्योंकि वे अपनी ऐसी सोच के कारण भविष्य के लिए कुछ जमा नहीं कर पाते, जिस से भविष्य में पछतावे के सिवा उन के पास कुछ नहीं रहता.

जल्दी पैसा कमाने की चाह

आज वे जल्दी ऊंचाइयों तक पहुंचने के लिए स्टैप बाई स्टैप चलना नहीं, बल्कि शौर्टकट रास्ता अपनाना पसंद करते हैं, भले ही ऐसा रास्ता कांटों भरा हो. उन्हें तो हर हाल में जल्दी पैसा कमाना होता है. इस के लिए वे गलत काम करने में भी पीछे नहीं रहते. उन की इस के पीछे ऐसी सोच होती है कि चाहे रास्ता कैसा भी हो पैसा तो हाथ में आ ही रहा है और इस से उन की सारी हाई डिमांड्स भी पूरी हो रही हैं.

खुद को रिच दिखाने के लिए

भले ही अंदर से कितने भी खोखले क्यों न हों, लेकिन सब के सामने यह जताने की कोशिश करना कि हम बहुत रिच हैं, इस के लिए वे महंगे ब्रैंडेड कपड़े, घड़ी, परफ्यूम वगैरा खरीदने पर हजारों रुपए पानी की तरह बहाते हैं. भले ही चीजें खरीदने के लिए उन्हें डांट ही क्यों न खानी पड़े, लेकिन वे इस में भी पीछे नहीं रहते, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उन का स्टेटस डाउन हो.

गर्लफ्रैंड पर इंप्रैशन जमाने के लिए

चाहे खुद की पौकेट में कुछ हो या न हो, लेकिन गर्लफ्रैंड पर तो हर सूरत में इंप्रैशन झाड़ना ही है, जिस के लिए वे उसे लंच या डिनर करवाने के लिए अपनी सारी पौकेट मनी तक उड़ा देते हैं और उसे महंगे गिफ्ट्स देने के लिए वे पापा से उधार मांगने में भी पीछे नहीं रहते, क्योंकि उन का पूरा फोकस सिर्फ गर्लफ्रैंड के सामने खुद को रिच शो करना जो होता है.

खुद की कमी छिपाने के लिए

पता है कि वे प्रैजैंटटेबल नहीं हैं, उन में ढेर सारी कमियां हैं और उन्हीं को छिपाने के लिए वे हाई लिविंग स्टाइल में जीना पसंद करते हैं ताकि उन की कमियों पर परदा पड़ सके. इस चक्कर में वे यह नहीं सोचते कि अगर आज बिना सोचेसमझे इस कदर पैसा बरबाद करेंगे तो उन का कल सुरक्षित नहीं हो पाएगा.

ज्यादा कमाई भी रीजन

कम उम्र में ज्यादा इनकम होने के कारण वे लग्जरी जीवन जीने में विश्वास करने लगे हैं, जिस से अब उन्हें कुछ भी खरीदने से पहले सोचने की जरूरत नहीं पड़ती.

फिल्म पार्टी करना कहीं आपको पड़ न जाए महंगा

रवि का बर्थडे था. क्लास के सभी फ्रैंड्स को उस ने पार्टी देने का प्रौमिस किया था. उस के 5 बैस्ट फ्रैंड थे. उन्हीं दिनों बाहुबली पार्ट-2 रिलीज हुई थी. सब दोस्तों में फिल्म का इतना क्रेज था कि रवि ने सोचा दोस्तों को अपने बर्थडे के दिन यही फिल्म दिखाऊंगा. फिर क्या था, सारे दोस्त रवि के साथ पहुंच गए कनाट प्लेस के ओडियन मल्टीप्लैक्स. जब टिकट विंडो पर रवि ने 6 टिकट मांगे तो उस ने 3 हजार रुपए मांगे. टिकट के इतने महंगे दाम सुन कर रवि सकते में आ गया. कहां तो उस ने सोचा था कि 3 हजार रुपए में वह फिल्म के साथ डिनर पार्टी भी मैनेज कर लेगा.

एक बारगी तो उस का मन हुआ कि वह वापस चला जाए, लेकिन फ्रैंड्स की फिल्म को ले कर ऐक्साइटमैंट देख कर उसे लगा कि उन्हें खराब लगेगा. सो उस ने मन मार कर टिकट खरीद तो लिए लेकिन पूरी फिल्म के दौरान उसे इसी बात की चिंता सताती रही कि पार्टी देने के लिए बाकी पैसे का इंतजाम कहां से होगा.

अकसर किशोर ऐसी समस्या से दोचार होते हैं. उन्हें लगता है कि फिल्म देखना आज की तारीख में सस्ता माध्यम है जबकि ऐसा है नहीं. अब यदि फिल्म देखनी है तो मल्टीप्लैक्स के महंगे टिकट खरीदने पड़ते हैं. इतना ही नहीं जिस मौल में फिल्म देख रहे हैं वहां खानेपीने के सामान के दाम इतने अधिक होते हैं कि किशोरों की महीने की पौकेट मनी एक बार में ही खत्म हो जाती है. इसलिए फिल्म देखने जाने से पहले क बार सोच लें कहीं यह आप की जेब पर रवि की तरह भारी तो नहीं पड़ेगी.

खर्चीले फ्रैंड्स से रहें दूर

किशोरों के बीच दोस्तों को पार्टी देने का चलन कोई बुरी बात नहीं है बस, यह देखना जरूरी है कि कहीं इस चलन और फिल्मी पार्टी के चक्कर में फुजूलखर्ची तो नहीं हो रही है. आज के टीनएजर्स का लाइफस्टाइल और कौन्फिडैंस देख कर अच्छेअच्छों को कौंप्लैक्स हो जाता है. हाथ में हाईटैक गैजेट लिए ये टीनएजर्स मूवी, शौपिंग मौल और रेस्तरां में मीटिंग करते हैं.

कुछ डिस्को बार में जाने से भी गुरेज नहीं करते. फिर चाहे वह न्यू ईयर पार्टी हो, नाइट पार्टी, फेयरवेल पार्टी, ऐग्जाम खत्म होने की खुशी में पार्टी हो या कुछ और इन सब में काफी पैसा खर्च होता है. ऐसे में कई किशोर दोस्तों से दूर रहने में ही भलाई समझते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि टशन मारने के चक्कर में वे काफी पैसा खर्च कर बैठेंगे व बाद में जब पैसों की जरूरत पड़ेगी तो पैसे कहां से लाएंगे.

सीमित बजट में फिल्म पार्टी

पार्टी करना बुरा नहीं है. फिल्म भी सब देखते हैं, लेकिन उस के बजट की प्लानिंग पहले से करना बहुत जरूरी है. मान लीजिए आप को अपने दोस्तों को फिल्म दिखानी है तो पहले अपना बजट देखिए, फिर उसी हिसाब से किसी ऐसे सिनेमाघर जो सस्ता हो के टिकट लें या फिर अच्छा है कि कहीं और मौर्निंग शो के टिकट ले कर फिल्म का मजा लीजिए.

जरूरी नहीं कि फिल्म सिनेमाघर में ही देखी जाए. आप अपने दोस्तों के लिए घर में ही मूवी डे की प्लानिंग कर सकते हैं. इस के लिए आप को ज्यादा कुछ नहीं करना है. बस, अपने दोस्तों से उन की फेवरिट फिल्म का नाम पूछें और मार्केट से उस फिल्म की डीवीडी खरीद लाएं या फिर रैंट पर ले कर दोस्तों के साथ जम कर घर पर ही खाना भी खाएं और मस्ती करें. इस से आप के पैसे तो बचेंगे ही साथ ही घर पर फिल्म देखने के साथसाथ खानाखाने का मजा भी आएगा.

इस तरह से फिल्म की पार्टी आप को महंगी भी नहीं पड़ेगी और दोस्त भी जम कर मजा लेंगे. आजकल तो मोबाइल पर ही फिल्में देखी जाती हैं. दोस्तों में पैनड्राइव में बांटी जाती हैं. ऐसे में फिल्म देखने के लिए हजारों रुपए फूंकने से अच्छा है उन पैसों को अपनी पढ़ाई के काम और उस से संबंधित खर्चे में लगाएं.

जरूरी नहीं कि पार्टी का मजा तभी आए जब आप ढेर सारा पैसा खर्च करें. सीमित बजट में भी बेहतरीन पार्टी मनाई जा सकती है. जरूरी है तो बस, दोस्तों और फैमिली मैंबर्स की सलाह लेना. कोशिश करें कि घर में ही पार्टी और्गेनाइज हो. पार्टी में ढेर सारे दोस्तों को बुलाना भी जरूरी नहीं है. सिर्फ खास दोस्तों के साथ पार्टी मनाने से भी काफी बचत होगी.

दिखावा न करें. महंगे रिटर्न गिफ्ट देना भी जरूरी नहीं है. ऐसे कुछ स्मार्ट तरीकों को अपना कर सीमित बजट में अच्छी बर्थडे पार्टी सैलिब्रेट की जा सकती है. फिल्म के अलावा अन्य खर्चे भी समझदारी से करें. अपनी बर्थडे पार्टी खास अंदाज में मनाने के लिए टीनएजर्स स्पैशल तैयारी करते हैं. शहरों में मौल्स में फूड कोर्ट, फनकोर्ट, रेस्तरां आदि में स्पैशल बर्थडे पैकेज उपलब्ध कराए जाते हैं. पहले से ही बुकिंग कर लें और सजावट से ले कर खानेपीने के इंतजाम जैसे केक, स्नैक्स, लंच या डिनर सब सस्ते में करें.

किशोर बचत करना सीखें

कई बार किशोर पार्टी के चक्कर में अपनी पूरी पौकेट मनी ही खर्च कर देते हैं, जो सही नहीं है. किशोरों को खर्च पर लगाम लगाने के साथ यह भी सीखना चाहिए कि उन के लिए बचत कितनी जरूरी है. किशोरों को पैसे की अहमियत समझने की जरूरत है. बाहर खानेपीने और घूमनेफिरने में बिना वजह होने वाले खर्च के बारे में अच्छी तरह जानें. दिखावे के लिए पैसे उड़ा कर आप को ही पछताना पड़ेगा.

मांबाप किशोरों को पौकेट मनी इसलिए देते हैं कि वे अपने जरूरी खर्च में उस का इस्तेमाल करें. जरा सोचिए, अगर आप पूरी पौकेट मनी दोस्तों को फिल्म दिखाने में ही खर्च कर देंगे तो क्या होगा?

क्रिकेट में कैरियर बनाना चाहते हैं तो ये गुण आप में जरूर होने चाहिएं

दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में अपने स्टार और फेवरिट क्रिकेट प्लेयर्स को चौकेछक्के लगाते देख कर आप ने भी खुद को उस सैलिब्रिटी के रूप में देखने का सपना जरूर देखा होगा. भारत जैसे देश में क्रिकेट के प्रति दीवानगी ने किशोरों में क्रिकेटर के रूप में कैरियर बनाने के सपनों को हवा दी है. क्या आप भी बनना चाहते हैं क्रिकेटर?

क्रिकेटर में क्या क्वालिटीज होनी चाहिए

एक प्रोफैशनल क्रिकेटर का जीवन त्याग, परिश्रम और समर्पण से परिपूर्ण होता है, क्योंकि एक क्रिकेटर के रूप में सक्सैस हासिल करना आसान नहीं होता. ऐसी स्थिति में क्रिकेटर बनने का सपना देखने वाले उम्मीदवार में निम्न गुण अवश्य होने चाहिए :

  • उसे एक अच्छा स्पोर्ट्समैन और एक अव्वल दर्जे का ऐथलीट होना चाहिए.
  • उस में विदेशी कल्चर, फूड, मौसम, भाषा और फैशन जैसी अपरिचित परिस्थितियों के साथ घुलनेमिलने का भी गुण होना चाहिए.
  • क्रिकेट को अपना कैरियर बनाने का सपना देखने वाले उम्मीदवार में बहुत अच्छा फिजिकल फिटनैस होना चाहिए.
  • क्रिकेट के 3 महत्त्वपूर्ण अंग बौलिंग, बैटिंग और फील्डिंग माने जाते हैं. क्रिकेटर को तीनों में मास्टर होना चाहिए.

क्रिकेटर बनने के लिए भारत में खिलाडि़यों का सिलैक्शन बीसीसीआई (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) द्वारा किया जाता है. इस के अतिरिक्त भारत में बीसीसीआई कोच, फिजियोथेरैपिस्ट और क्रिकेट टीम के अन्य मैंबर्स (टीम कू्र) का भी सिलैक्शन करती है.

प्लेयर्स को बीसीसीआई के साथ एक निश्चित समय के लिए कौन्ट्रैक्ट साइन करना होता है. बीसीसीआई ही विश्व के अन्य 9 प्रमुख क्रिकेट प्लेयिंग राष्ट्रों जैसे पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, न्यूजीलैंड, इंगलैंड, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, जिम्बाब्वे और वैस्टइंडीज के साथ विभिन्न मैचों को अरेंज भी करती है.

शुरुआत कहां से करें

इंडिया के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने और क्रिकेट में अपना कैरियर बनाने के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए 2 मुख्य रास्ते हैं, पहला और बेसिक रास्ता आप के स्कूल से शुरू होता है जहां से सीधे आप क्रिकेट की दुनिया में पहुंच सकते हैं. स्कूल मैच में ऐक्टिव पार्टिसिपेशन, इंटरस्कूल मैचों में आप के पार्टिसिपेशन और ऐंट्री का गोल्डन पासपोर्ट माना जाता है. इन मैचों में उत्कृष्ट परफौर्मैंस के आधार पर खिलाड़ी का इंटरकालेज और इंटरयूनिवर्सिटी लैवल के मैचों में ऐंट्री को सुनिश्चित किया जाता है.

इस रास्ते से आप रणजी ट्रौफी के लिए अपने सिलैक्शन का चांस पक्का कर लेते हैं. भारत में रणजी ट्रौफी के मैचों में खिलाडि़यों के अच्छे परफौर्मैंस के आधार पर इंटरनैशनल मैचों के लिए खिलाडि़यों का सिलैक्शन किया जाता है.

दूसरा रास्ता कठिन मेहनत और अदम्य धैर्य का है. यह रास्ता ‘ओपन क्रिकेट’ कहलाता है, जिस का डिफिकल्टी लैवल स्कूल लैवल पर खेले गए क्रिकेट से काफी अधिक होता है. इस के अंतर्गत विभिन्न क्रिकेट एसोसिएशंस द्वारा आयोजित मैचों में खिलाड़ी की परफौर्मैंस के आधार पर सिलैक्शन किया जाता है. भारत में प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन होती है. इन सभी डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन से स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन का निर्माण होता है. डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन खिलाड़ी की परफौर्मैंस के आधार पर उसे डिस्ट्रिक्ट लैवल मैचों के लिए सिलैक्ट करती है. डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन सिलैक्शन कमिटी प्रत्येक खिलाड़ी के परफौर्मैंस का बड़ी बारीकी से अध्ययन करती है और डिस्ट्रिक्ट लैवल की टीम का निर्माण करती है.

इस टीम के प्लेयर्स स्टेट एसोसिएशन के लैवल पर खेलने के लिए चुने जाते हैं. स्टेट लैवल के मैचों और टूरनामैंट्स में प्रदर्शन के आधार पर प्लेयर्स का राष्ट्रीय स्तर पर रणजी मैचों में खेलने के लिए सिलैक्शन किया जाता है. पुन: रणजी मैचों में खिलाडि़यों का परफौर्मैंस अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर टीम के चयन का आधार बनता है.

राष्ट्रीय स्तर के सिलैक्शन कमिटी के 2 स्तर होते हैं, जूनियर सिलैक्शन कमिटी और सीनियर लैवल कमिटी. जूनियर सिलैक्शन कमिटी अंडर-15, अंडर-17 और अंडर-19 टीमों के लिए खिलाडि़यों का चयन करती है जबकि सीनियर लैवल कमिटी अंडर-22 और रणजी ट्रौफी के लिए खिलाडि़यों का चयन करती है.

खिलाडि़यों का सिलैक्शन

रणजी ट्रौफी को इंडिया की नैशनल क्रिकेट टीम में ऐंट्री का एक और गोल्डन पासपोर्ट माना जाता है. रणजी ट्रौफी में सभी राज्यों की क्रिकेट टीमों का रिप्रैजैंटेशन होता है. कुछ रणजी टीमें एक से अधिक राज्यों को रिप्रैजैंट करती हैं.

प्रारंभ में रणजी ट्रौफी की टीमों को 5 जोंस वैस्ट, नौर्थ, ईस्ट, साउथ और सैंट्रल में बांटा गया था. वर्तमान में रणजी ट्रौफी में 28 राज्यों की टीमें हैं. छत्तीसगढ़ इस ऐतिहासिक ट्रौफी को जौइन करने वाली लेटैस्ट क्रिकेट टीम है.

वैसे विभिन्न क्रिकेट एसोसिएशंस और फर्स्ट क्लास क्रिकेट क्लब्स से भी कुछ खिलाडि़यों को रणजी ट्रौफी में खेलने का अवसर मिलता है. रणजी ट्रौफी के लिए प्लेयर्स का सिलैक्शन कैसे होता है? यदि आप क्रिकेट में कैरियर बनाना चाहते हैं तो आप को इस के लिए सब से पहले इस खेल को बचपन से खेलने की शुरुआत करनी पड़ेगी. बेहतर होगा यदि आप लोकल लैवल पर किसी क्रिकेट टीम या क्लब को जौइन कर लें.

यदि कठिन मेहनत और कठोर अभ्यास के बावजूद आप का रणजी टीम के लिए चयन नहीं हो पाता है तो भी आप को निराश होने की जरूरत नहीं है. आप के  लिए अभी भी स्वर्णिम अवसर उपलब्ध है.

ऐसे में आप अंडर-19 वर्ल्ड क्रिकेट टूरनामैंट में कोशिश कर सकते हैं. यदि आप इस टूरनामैंट में अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो चयनकर्ता को आप की प्रतिभा की पहचान हो जाती है और आप इंडिया टीम में खेलने के सपने को बड़ी आसानी से साकार कर लेते हैं. यदि यहां पर भी आप चूक जाते हैं तो भी निराश होने की जरूरत नहीं. मौजूदा समय में क्रिकेट के नए संस्करण आ रहे हैं इस में आईपीएल सब से चर्चित है.

खिलाडि़यों का चयन मुख्य रूप से रणजी ट्रौफी टीम्स से औक्शन के आधार पर किया जाता है. 8 टीमों वाले इस आईपीएल में कुछ खिलाड़ी नैशनल और इंटरनैशनल लैवल के ख्याति प्राप्त और रिकौर्ड होल्डर्स भी होते हैं. आप अपने खेले गए पूर्व के मैचों की परफौर्मैंस के आधार पर आईपीएल में अपनी सीट पक्की कर सकते हैं.

इस के अतिरिक्त इंडियन टीम भी क्रिकेट में कैरियर बनाने के इच्छुक युवाओं को नैशनल लैवल पर क्रिकेट खेलने का मौका देती है. इंडियन टीम में रणजी ट्रौफी के स्टार परफौर्मर खिलाड़ी होते हैं. यह इंडिया की दूसरे दर्जे की टीम होती है.

कितना कमा सकते हैं

1990 के इकनौमिक रिफौर्म्स के बाद से पूरी दुनिया में क्रिकेट के खेल और खिलाडि़यों को मिलने वाले पारिश्रमिक में काफी परिवर्तन आए हैं. बीसीसीआई द्वारा नैशनल और इंटरनैशनल क्रिकेट मैच खेलने वाले खिलाडि़यों को एक बड़ी रकम पारिश्रमिक के रूप में भुगतान की जाती है. यह राशि करोड़ों में दी जाती है. वैसे इस सच से भी कदापि इनकार नहीं किया जा सकता कि पारिश्रमिक की मात्रा प्रत्येक खिलाड़ी की व्यक्तिगत परफौर्मैंस पर निर्भर करती है.

वैसे बीसीसीआई ने सभी प्लेयर्स को पारिश्रमिक भुगतान के लिए 3 श्रेणियों ए, बी और सी में बांट रखा है. खिलाडि़यों के इन श्रेणियों में बांटे जाने का क्राइटेरिया खिलाडि़यों के ऐक्सपीरियंस और पूर्व खेले गए मैचों में परफौर्मैंस के आधार पर निर्धारित किया जाता है. प्लेयर्स की रैंकिंग एक वर्ष के लिए मान्य होती है. यदि कोई प्लेयर वर्ष के बीच में जौइन करता है तो उसे सी कैटेगरी में रखा जाता है.

विभिन्न श्रेणियों में खिलाडि़यों का सैलरी स्ट्रक्चर्स

रिटेनर फीस

यह फीस खिलाड़ी कौंट्रैक्ट और रैंकिंग के आधार पर तय होती है. ए रैंकिंग वाले खिलाडि़यों की रिटेनर फीस 1 करोड़ रुपए होती है जबकि बी कैटेगरी के प्लेयर के लिए यह फीस 50 लाख रुपए और सी कैटेगरी वाले प्लेयर के लिए 25 लाख रुपए सालाना होती है.

मैच फीस

यह फीस इंटरनैशनल मैच खेलने के लिए दी जाती है. यह सभी प्रकार की श्रेणियों के प्लेयर्स के लिए एकजैसी होती है. प्रत्येक टैस्ट मैच में खेलने के लिए प्रत्येक खिलाड़ी को प्रति मैच 5 लाख रुपए का भुगतान किया जाता है, जबकि प्रत्येक वन डे इंटरनैशनल मैच के लिए यह फीस 3 लाख रुपए है. टी20 मैच के लिए मैच फीस डेढ़ लाख रुपए होती है.

इंडिविजुअल परफौर्मैंस बोनस

यह बोनस पर्सनल परफौर्मैंस के आधार पर दिया जाता है. टैस्ट मैच या वन डे मैचों में प्रत्येक सैंचुरी के लिए खिलाड़ी को 5 लाख रुपए का एडिशनल बोनस मिलता है, जबकि इन सभी मैचों में डबल सैंचुरी के लिए 7 लाख रुपए के बोनस का भुगतान किया जाता है.

टैस्ट, वन डे या टी20 मैचों में 5 विकेट के रिकौर्ड परफौर्मैंस के लिए बौलर को 5 लाख रुपए और 10 विकेट के लिए 7 लाख रुपए के अतिरिक्त बोनस का भुगतान किया जाता है.

एक खिलाड़ी का पारिश्रमिक और कमाई का यही अंत नहीं है. आईसीसी टौप 3 के टीम के विरुद्ध टैस्ट मैच में किसी भी जीत के लिए खिलाडि़यों के मैच फीस में 50 प्रतिशत का इजाफा किया जाता है. जबकि इन्हीं 3 टीमों के विरुद्ध टैस्ट सीरीज जीतने पर मैच फीस में 100 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है. आईसीसी और वर्ल्ड कप में जीत मिलने पर खिलाडि़यों की मैच फीस के रूप में 300 प्रतिशत अधिक फीस का भुगतान किया जाता है.

अपने घर से दूर रहने वालों युवाओं की भी सुध ले सरकार

अब अकेलों, विदेशियों और छात्रों को बड़े शहरों में रहने के लिए अच्छे घर किराए पर नहीं मिलते, क्योंकि बहुत सी सोसाइटियों ने इन पर पाबंदियां लगानी शुरू कर दी हैं ताकि परिवारों को असहजता न सहनी पड़े. दूसरे शहर से अपने मातापिता का घर छोड़ कर आए अकेले यदि ढंग का मकान ढूंढ़ते हैं, तो उन से हजार सवाल पूछे जाने लगे हैं ताकि उस कौंप्लैक्स में रहने वाले दूसरों को टेढ़ी स्थिति न सहनी पड़े.

यह टेढ़ी स्थिति निस्संदेह अकेले, छात्र और विदेशी ही पैदा करते हैं. इन के आनेजाने का समय नियत नहीं होता. शराब, सिगरेट जम कर पी जाती है. पार्टियां दी जाती हैं. घर को दोस्तों का अड्डा बना लिया जाता है. गरम खून पड़ोस के फ्लैट वालों, चौकीदारों, सप्लायर्स से लड़ाई करते रहते हैं. ज्यादातर युवा किराएदारों को खुद काम कर के सफाई की आदत नहीं होती. वे दूसरों के काम नहीं आते पर जीजी कर के दूसरों से सहायता मांगने में तेज होते हैं.

आज के युवा वैसे ही खीजे से होते हैं और ऊपर से चाहे आंटीआंटी कहें पर पीछे से खूंसट, काली, मोटी जैसे नामों से ही पड़ोसिनों को नवाजते रहते हैं.

चूंकि ये किराएदार होते हैं, इन्हें सोसाइटियों के लौंग टर्म कार्यक्रमों में कोई शामिल नहीं करता. ये उन से घुलतेमिलते भी नहीं, अगर परमानैंट ओनर इन्हें घुसपैठिया मानते हैं, तो ये पड़ोसियों को अनअवौइडेबल न्यूसैंस मान कर चलते हैं.

सामाजिकता का तकाजा है कि आसपास के लोग हिलमिल कर रहें और एकदूसरे के काम आएं. यही नहीं, व्हैन इन रोम, लिव लाइक रोमनर्स का सिद्धांत अपना कर सब के साथ मिलेंबैठें चाहे किराएदार ही क्यों न हों. पूरी सोसाइटी या कौंप्लैक्स की जिम्मेदारी में बराबरी से हिस्सा लें. पर यह पाठ पढ़ाए कौन?

नतीजा है कि वैसे ही जाति, धर्म, अमीरीगरीबी में बंटे समाज में कुंआरापन और त्वचा का रंग भी एक और विभाजन हो गया है. कुंआरों और छात्रों को अपनी हैसियत से खराब बस्तियों में रहने और बाजार भाव से ज्यादा किराया देने को मजबूर होना पड़ रहा है. यह स्थिति लड़कियों के लिए तो और खतरनाक है, क्योंकि उन्हें पड़ोस में बडे़बूढ़ों का संरक्षण नहीं मिल पाता और उन जगहों पर रहना पड़ रहा है, जो असुरक्षित हैं. बहुत सी लड़कियों को पढ़ाई या नौकरी छोड़ कर मातापिता के पास लौटना पड़ रहा है. बहुत न चाहते हुए भी शादी कर लेती हैं ताकि सिर पर सुरक्षा तो बनी रहे.

अफसोस यह है कि गाय की रक्षा में चिंतित सरकार को इन वर्ग की कोई चिंता नहीं, जो कल देश के लिए काम करेंगे.

स्कूलों की मनमानी पर नकेल जरूरी है और ये वाकया सभी के लिए सबक है

महंगे प्राइवेट स्कूलों को अब न केवल अमीर उद्योगपति चला रहे हैं, वे उन्हें एक आम होटल, रेस्तरां की तरह चला रहे हैं जहां जब तक पैसा मिला ग्राहक राजा है, जैसे ही पैसे नहीं मिले उसे भिखारी की तरह दुत्कार कर निकाल दिया. दिल्ली के निकट बहुत महंगे प्रैजीडियम स्कूल ने ऐसा ही एक कदम उठाया है. स्कूल ने पेरैंट्स से कहा है कि दी गई तारीख तक यदि सारे पैसे नहीं चुकाए गए तो बच्चों को बस में नहीं चढ़ने दिया जाएगा और न ही स्कूल में घुसने.

यह धमकी बच्चों के मन पर क्या प्रभाव डाल सकती है यह सोचे बिना स्कूल को अपनी लाभहानि की चिंता है. बाकी बच्चों में फीस न देने वाले बच्चों के प्रति किस तरह का असर पड़ता है यह बताने की जरूरत नहीं. प्रैजीडियम स्कूल बहुत महंगा है पर गलीगली में खुल गए पब्लिक स्कूलों, इंटरनैशनल स्कूलों, ऐकैडमियों के से नाम वाले स्कूल भी शिक्षा के प्रति एक बड़ा मखौल रच रहे हैं.

मातापिता अपने बच्चों को अच्छा स्कूल दिलाने के नाम पर अकसर हैसियत से ज्यादा फीस देने का प्लान कर लेते हैं पर कहीं भी कभी भी कोई अड़चन आने के बाद जब वे फीस पूरी नहीं दे पाते तो स्कूल उन से सूदखोरों की तरह  व्यवहार करने लगता है.

वयस्कों को बहुतों का देना होता है. कभी देर होती है, कभी नहीं, पर बच्चों को पैसे की कमी की वजह से अपमानित करा जाए यह स्वीकार्य नहीं. स्कूलों को इस देश में धंधों की तरह नहीं चलाया जा सकता. हर स्कूल एक चैरिटेबल ट्रस्ट की तरह नहीं चलाया जाता है और उस के लाभ कमाने पर पाबंदियां हैं. फिर भी अधिकांश स्कूल व्यवसायों की तरह चल रहे हैं और जरा सा नुकसान होते ही ग्राहकों यानी बच्चों के मातापिताओं के साथ गैरों की तरह व्यवहार करने लगते हैं.

यह स्कूलों का काम है कि वे अपने हिसाब से बच्चों को प्रवेश दें पर बाद में केवल फीस देर से देने पर किसी बच्चे का अपमान हो यह नहीं सहा जाना चाहिए. शिक्षा केवल व्यवसाय बन जाए यह किसी तरह से मंजूर नहीं होना चाहिए. अगर स्कूलों के खर्च पूरे नहीं हो पा रहे तो उन्हें भव्य भवनों, स्विमिंग पूलों, एअरकंडीशनरों, विदेश यात्राओं का लौलीपोप देना बंद कर देना चाहिए. समाज में वैसे भी पहले दिन से अमीर और गरीब का पाठ बच्चों को जबरन गले से उतार कर पढ़ाया जाए यह एकदम गलत है.

फीस न दे पाने पर बच्चों और उन के मातापिताओं को किस तरह की मानसिक यातना होती है इस का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है. बच्चों को आज बहुत कुछ देखना पड़ रहा है. स्कूल में अपने साथियों के सामने भी वे अपमानित हों, यह तो कतई नहीं होना चाहिए.

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