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जीएसटी का पंडा राज और आम व्यापारियों की परेशानियां

जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर से आम व्यापारियों की परेशानियां दिखाई दे रही हैं. सरकार का दावा, इस से वस्तुओं पर लगने वाला दोहरातिहरा कर और कर पर कर लगना बंद हो जाएगा व देश में सामान आसानी से इधर से उधर जा सकेगा, निरर्थक साबित हो रहा है.

कुछ चीजों के दामों में चाहे मामूली फर्क आया हो पर ज्यादातर वस्तुओं के दाम वही हैं और बहुतों पर तो ज्यादा कर मांगा जा रहा है. एक देश का व्यापार उस के जंगलों की तरह अपनेआप उगता है. जंगलों को मनमरजी से उगाएंगे तो न जाने कितनी प्रजातियां मर जाएंगी, जंगल मरुस्थल बन सकते हैं या विषैले.

जीएसटी एक ऐसी ही प्रणाली है, जो थोपी जा रही है.  व्यापार को स्वत: अपनाने की छूट नहीं दी जा रही. इस में लचीलापन नहीं है. जीएसटी काउंसिल भाग्यविधाता बन गई है. वह कुंडलीनिर्धारक सी दिख रही है. आप से कहा जा रहा है कि यह तो आप का भाग्य है, डैस्टिनी है, कर्मों का फल है, और जो है, उसे मान लो. जो कुछ नया तय होगा, वह आम जनता नहीं, सरकार के पंडित देखेंगे और तय करेंगे. और यह जनता के दिए चढ़ावे पर निर्भर करता है कि कहां, क्या छूट दी जाए.

जैसे पंडित, मौलवी और पादरी कोई छूट नहीं देता, वैसे ही काउंसिल में कोई दलील नहीं चलेगी. दाम वही रहेंगे जो बोर्ड पर लिखे हैं. गौदान मरने पर भी करना होगा, मृत्युभोज देना ही होगा. जो चाहे मरजी कर लो, कफन से भी कर वसूला जाएगा.

दाम इसलिए नहीं घट रहे क्योंकि व्यापारी नहीं चाहते कि अगर 4 पैसे बच रहे हैं तो वे ग्राहकों को दे दिए जाएं क्योंकि कल को न जाने रिटर्न भरते समय क्या अड़चन आ जाए, असैस्मैंट कराते समय कितना अतिरिक्त पैसा मांग लिया जाए. उस समय ग्राहक से मांगने तो नहीं जाएंगे.

स्टूडेंट्स के क्रेडिट स्कोर को खराब कर सकता है सिबिल एजुकेशन लोन

सब्सिडी या कम ब्याज पर दिए गए एजुकेशन लोन में बढ़ रहे डिफाल्ट के मामलों को देखते हुए क्रेडिट इंफार्मेशन कंपनी सिबिल (CIBIL) ने कहा, कि इस तरह की डिफाल्ट हिस्ट्री स्टूडेंट के क्रेडिट स्कोर पर असर डाल सकती हैं, जो कि उनके द्वारा भविष्य में लिए जाने वाले किसी अन्य लोन में मुसीबतें पैदा करेगी.

सिबिल ने यह भी बताया कि एजुकेशन लोन पर करीब 90 दिनों से ज्यादा का ड्यूज है और इस तरह के डिफाल्ट मामले करीब 5 फीसदी हैं. इनमें कम ब्याज दरों पर 4 लाख से कम राशि के लोन के डिफाल्ट के मामलें (8.1 फीसद) लंबी राशि के लोन के मुकाबले ज्यादा हैं.

अन्य श्रेणियों के लिए तुलनात्मक डिफाल्ट दरें

अन्य श्रेणियों के लिए तुलनात्मक डिफाल्ट दरें हैं, 4 से 5 लाख के लिए 4.8 फीसद और 5 से 15 लाख के लिए 2.1 फीसद डिफाल्ट दरें हैं. वहीं 15 लाख के ऊपर की राशि के बड़े लोन पर डिफाल्ट के मामले करीब 1 फीसद हैं.

क्या है क्रेडिट स्कोर

आपका क्रेडिट स्कोर दरअसल आपकी ओर से पूर्व में लिए गए लोन और उसके चुकाने का ब्यौरा है. बैंक आपके लोन की अर्जी को आपका क्रेडिट स्को‍र चेक करने के बाद ही मंजूर करती है. अगर, अपका क्रेडिट स्कोर बेहतर है तो बैंक आपको आसानी से लोन मुहैया करा देती हैं.

क्रेडिट स्कोर तीन अंको की एक संख्या है, जो 300 से 900 के बीच होती है. क्रेडिट स्कोर जितना अधिक होता है, उसे उतना ही बेहतर माना जाता है. एक गलती करने पर भी क्रेडिट स्कोर कमजोर हो सकता है. 750 से ज्यादा के स्कोर पर ही 79 फीसदी व्यक्तिगत लोन अप्रूव किए जाते हैं. क्रेडिट इन्फार्मेशन ब्यूरो (इंडिया) लिमिटेड (CIBIL) यह क्रेडिट स्कोर देता है.

सिबिल की वेबसाइट www.cibil.com/online/credit-score-check पर आप एक फार्म भरकर और शुल्क के रुप में 470 रुपए का भुगतान करके घर बैठे अपना सिबिल चेक कर सकते हैं. शुल्क का भुगतान करने के बाद औथेन्टिकेशन के लिए आपसे पांच सवाल पूछे जाएंगे जिनमें से कम से कम तीन सवालों के सही जवाब आपको देने अनिवार्य होंगे. यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आप अपना क्रेडिट स्कोर देख सकते हैं.

ब्लू वेल गेम ने ली जान, 12 साल के बच्चे ने कहा वे मुझे मार देंगे, कोई बचाओ

सूसाइड गेम ब्लू वेल के शिकंजे में अब एक 12 साल बच्चा आया है. तमिलनाडु के तिरुपुर में रहने वाले इस बच्चे ने राज्य की 104 हेल्पलाइन नंबर पर काल किया और काउंसलर से कहा, ‘वे मुझे और मेरे परिवार को मार देंगे’ जब काउंसलर ने पूछा कि कौन मार देंगे, तब बच्चे ने यह कबूल किया कि वह ब्लू वेल गेम खेल रहा है लेकिन अब इससे बाहर आना चाहता है.

आपको बता दें कि 30 जुलाई 2017 को, मुंबई शहर के अंधेरी (पूर्व) में एक 14 वर्षीय लड़के ने ब्लू वेल गेम की वजह से सातवीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली थी. 13 अगस्त को, बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में एक १५ साल के लडके ने भी आत्महत्या कर ली थी.

सूइसाइड प्रिवेंशन सेंटर ‘स्नेहा’ की फाउंडर डाक्टर लक्ष्मी विजयकुमार कहती हैं कि इस खतरनाक गेम की वजह से देश में बच्चों की आत्महत्या के मामले बढ़ते देख अब जो किशोर इस गेम को खेल रहे हैं, वे किसी भी तरह इससे बाहर निकलने के रास्ते ढूंढ रहे हैं. अधिकतर बच्चे गेम से बाहर निकलने से डरते हैं क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें उनके माता-पिता, भाई-बहन या किसी करीबी को मारने की धमकी दी जाती है.

मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों ने बताया कि उन्हे हर तीन में से एक दिन ऐसे बच्चे मिलते हैं जो इस गेम का हिस्सा बनने की बात मान रहे हैं. शुरुआती स्तर पर बच्चे सिर्फ जिज्ञासा की वजह से चैलेंज का सामना करने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन बाद में उन्हें 50 ऐसे टास्क दिए जाते हैं जिनसे वे खुद को नुकसान पहुंचाएं. आखिरी टास्क में आत्महत्या करने के लिए कहा जाता है.

आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाला आनलाइन गेम ब्लू व्हेल का मामला अब अदालत में पहुंच गया है. ब्लू व्हेल मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने हैरानी जताई है. कोर्ट ने कहा कि यह कैसा खेल है जिसकी चपेट में बच्चे तो बच्चे, बालिग लोग भी आ जाते हैं. बच्चों का तो समझ में आता है लेकिन बालिग लोग कैसे बिल्डिंग से कूद जाते हैं. इस गेम के खिलाफ अदालत में एक याचिका दायर की गई है. ब्लू व्हेल चैलेंज ने अचानक लोकप्रियता पाई है. इसके मद्देनजर सरकार ने इस खतरनाक गेम के लिंक हटाने के लिए इंटरनेट की दिग्गज कंपनियों को निर्देश जारी किए हैं. कल ही इलेक्ट्रानिक्स एवं आईटी मंत्रालय ने प्रमुख इंटरनेट कंपनियों- गूगल, फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, माइक्रोसॉफ्ट और याहू को इस गेम के लिंक हटाने के तत्काल निर्देश जारी किए. याचिका के अनुसार भारत के अलावा, रूस, चीन, सउदी अरब, ब्राजील, अर्जेंटीना, बुल्गारिया, चिली और इटली में बच्चों की खुदकुशी की रिपोर्टें मिली हैं.

आखिर क्या है ब्लू व्हेल गेम

ब्लू व्हेल चैलेंज गैम, एक इंटरनेट “खेल” है जिसका कई देशों में मौजूद होने का दावा किया गया है. खेल कथित तौर पर एक श्रृंखला मे होते हैं जिसमें खिलाड़ियों को 50-दिन की अवधि में कई कार्य दिये जाते हैं, जिसकी अंतिम चुनौती में खिलाड़ी को आत्महत्या करने को बोला जाता है.

यह खेल चैलेंजर्स (प्रतिभागी) और प्रशासकों के बीच के रिश्ते पर आधारित होता है. इसमें कर्तव्यों की एक श्रृंखला शामिल होती है जिसे खिलाड़ियों को पूरा करना होता है, आमतौर पर प्रति दिन एक कार्य करना होता है, जिनमें से कुछ आत्म विकृति से जुडे होते है. कुछ कार्य अग्रिम में दिया जा सकता है, इस खेल का अन्तिम कार्य में आत्महत्या करने को कहा जाता है. कार्यों की सूची को 50 दिनों के भीतर पूरा किया जाना होता है, जिसमें शामिल है- सुबह 4:20 जागना, क्रेन पर चढ़ाई, एक विशिष्ट वाक्यांश या चित्र व्यक्ति के अपने हाथ या बांह पर गुदवाना, गुप्त कार्य करना, एक सुई को अपने हाथ या पैर पर चुभोना, एक पुल या छत पर खडा होना, व्यवस्थापक द्वारा भेजे गये संगीत सुनना और वीडियो देखना.

भज्जी का भावुक कर देने वाला ये वीडियो सोशल मीडिया पर हो रहा है वायरल

आफ स्पिनर हरभजन सिंह भी टीम इंडिया के दूसरे क्रिकेटरों की तरह सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं. हरभजन ने सोशल साइट ट्विटर पर भावनाओं से भरा एक वीडियो पोस्‍ट किया है. यह बेहद ही भावुक करने वाला वीडियो है. वीडियो में दो भाइयों के बीच के आपसी संबंध को दर्शाया गया है. जिसे देखने के बाद आपकी आंखे भर आएंगी. इसमें नवजात शिशु रोता हुआ नजर आ रहा है और उसकी चुसनी उससे कुछ दूरी पर है. बड़ा भाई जिसकी दोनों बांहें नहीं हैं को अपने छोटे भाई का यह रोना देखा नहीं जाता. दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद वह थोड़ा सा खिसकते हुए चुसनी को अपने मुंह में लेता है और सावधानी से अपने छोटे भाई के मुंह में दे देता है. मुंह में चुसनी आते ही छोटे वाले बच्‍चे का रोना रुक जाता है और वह रोना छोड़कर शान्ति से अपनी चुसनी में व्‍यस्‍त हो जाता है.

भज्‍जी का यह भावुक कर देने वाला पोस्ट सोशल मीडिया पर जल्‍द ही वायरल हो गया और अबतक 5009 से अधिक लोग इसे देख चुके हैं और लाइक भी कर चुके हैं. 1200 से अधिक लोगों ने इसे रीट्वीट किया था. हरभजन ने अपने वीडियो के साथ कैप्‍शन दिया, ‘आंखों में आंसू आ गए. भावनाओं को व्‍यक्त करने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं. इससे बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

हरभजन ने अपने क्रिकेट करियर की शुरुवात 1998 में की. एक आफ स्पिनर  के तौर पर सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले ये  दुनिया के तीसरे और इंडिया के पहले गेदबाज है. जो अपने आप में एक बड़ा रिकार्ड है. ये मुम्बई इण्डियन टीम के कप्तान के साथ ही  पंजाब टीम के भी कप्तान रह चुके है. इसमें कोई शक नहीं है की हरभजन एक बेहतरीन क्रिकेट प्लेयर है.

इंडियन क्रिकेट टीम में इन्हे भज्जी के नाम से जाना जाता है. इन्होने 100 से भी ज्यादा टेस्ट मैच खेले है. हरभजन सिंह कई सालों तक भारतीय क्रिकेट टीम के टाप गेंदबाज रह चुके है. इसके साथ साथ कई ऐसे नाजुक मौके पर इन्हो अपने कमाल की गेंदबाजी से भारत को जीत दिलाई है.

गौरतलब है कि 37 वर्ष के आफ स्पिन गेंदबाज हरभजन सिंह टीम इंडिया को कई यादगार जीतें दिला चुके हैं. वनडे 2007 में टी20 वर्ल्‍डकप और 2011 का वर्ल्‍डकप जीतने वाली भारतीय टीम के सदस्‍य रहे हैं. मौजूदा समय में वे भारतीय टीम से बाहर हैं. हरभजन ने अपना आखिरी वनडे 25 अक्‍टूबर 2015 को और आखिरी टेस्‍ट अगस्‍त 2015 में श्रीलंका के खिलाफ गाल में खेला था. आईपीएल में हरभजन मुंबई इंडियंस टीम के लिए खेलते हैं. इस टीम ने इस साल आईपीएल चैंपियन बनने का श्रेय हासिल किया था.

आर्थिक आजादी से हम अब भी दूर, कैसे खुलेंगे तरक्की के रास्ते

आजादी के बाद देश को केवल राजनीतिक आजादी मिली, आर्थिक आजादी नहीं. इसलिए हम आर्थिक विकास के मामले में पिछड़ गए. लाइसैंस, कोटा, परमिट राज के कारण देश में उद्योगधंधों और व्यापार करने पर कई तरह की पाबंदियां लगी हुई थीं. हम ने आर्थिक नीतियों के नाम पर वह रास्ता चुना जो विकासविरोधी था.

उन दिनों साम्यवाद और समाजवाद वैचारिक फैशन थे. साम्यवाद से प्रभावित पंडित जवाहरलाल नेहरू इस भेड़चाल में शरीक हो गए और उन्होंने देश के लिए समाजवाद का रास्ता चुना.

विकास के इस मौडल ने देश की प्रगति के सारे रास्ते अवरुद्ध कर दिए. देश की उत्पादक शक्तियों को परमिट, कोटा राज की जंजीरों में जकड़ दिया गया. इसलिए, देश को राजनीतिक आजादी तो मिली, मगर आर्थिक आजादी एक दूर का सपना बनी रही.

नोबेल पुरस्कार विजेता अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन (1912-2006) उन  गिनेचुने अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने अपने समय के आर्थिक चिंतन को बहुत गहरे तक प्रभावित किया. भारत जब आजादी के बाद आर्थिक नियोजन के जरिए 5वें दशक में अपनी आर्थिक विकास की राह तय कर रहा था तब 1963 में मिल्टन फ्रीडमैन को सलाहकार के तौर पर बुलाया था. इस के बाद फ्रीडमैन ने एक लेख ‘इंडियन इकोनौमिक प्लानिंग’ लिखा था. उस में वे भारत के आर्थिक विकास की अपार संभावनाओं को पुरजोर तरीके से उजागर करते हैं.

आर्थिक नीति का अभाव

फ्रीडमैन के विश्लेषण से भारत की आर्थिक बदहाली के कारण की शिनाख्त करने के नाम पर पिछले कई दशकों में जो कई मिथक पैदा किए गए हैं, वे ध्वस्त हो जाते हैं. और असली कारण सामने आ जाता है. उन्होंने कहा था कि भारत की निराशापूर्ण धीमी विकास दर की वजह धार्मिक और सामाजिक व्यवहार या लोगों की गुणवत्ता में नहीं, बल्कि भारत द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीति में मिलेगा. भारत के पास आर्थिक विकास के लिए जरूरी किसी चीज का अभाव नहीं है. अभाव है तो सही आर्थिक नीति का.

इसलिए 1991 में नरसिंहा राव ने लाइसैंस, कोटा, परमिट राज खत्म किया तो लोगों को पहली बार लगा कि देश को दूसरी आजादी मिली है या देश को पहली बार आर्थिक आजादी मिली है.

भारत की आजादी के आसपास कई देश स्वतंत्र हुए थे. उन में से जो नियंत्रणमुक्त अर्थव्यवस्था के रास्ते पर चले, वे कहां के कहां पहुंच गए. जापान, इसराईल, मलयेशिया, इंडोनेशिया जैसे देश शून्य से उठ कर खड़े हो गए और विकास की दौड़ में बहुत आगे निकल गए. दूसरी ओर, भारत आज भी अविकसित देशों की कतार में खड़ा है.

जुलाई 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहा राव की अल्पमत सरकार ने स्पष्ट उदारीकरण की नीति की घोषणा की.

हालांकि 1991 के बाद के सुधार धीमे, अधूरे और हिचकिचाहटभरे थे लेकिन फिर इन्होंने भारतीय समाज में कई आधारभूत और गंभीर परिवर्तनों की प्रक्रिया को शुरू किया. यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण पड़ाव है जितनी कि दिसंबर 1978 में चीन में हुई डेंग की क्रांति.

देश के कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि 1991 में नरसिंहा राव सरकार द्वारा लाइसैंस, कोटा राज खत्म करने के बाद देश आर्थिक आजादी की बयार को अनुभव कर पाया. इसे हमें आर्थिक सुधारों के जरिए ज्यादा कारगर बनाना चाहिए. कुछ आर्थिक सुधार हुए भी, मगर हम दुनिया के बाकी देशों से काफी पीछे हैं.

आर्थिक आजादी का मतलब होता है देश में उद्योगधंधे, व्यापार, व्यवसाय करना सुगम हो. उन पर बेवजह की पाबंदिया न लगाई जाएं. मगर भारत में उद्योगधंधे करना आज 2017 में भी काफी मुश्किल काम है. यह बात आर्थिक आजादी सूचकांक में झलकती भी है.

वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित आर्थिक आजादी के एक सूचकांक में भारत  पिछड़ कर 143वें पायदान पर पहुंच गया है. जबकि पिछले साल इस सूचकांक में भारत 123वें पायदान पर था. खास बात यह है कि अमेरिका के एक थिंकटैंक हैरिटेज फाउंडेशन द्वारा तैयार किए जाने वाले इस सूचकांक में पाकिस्तान सहित अनेक दक्षिण एशियाई पड़ोसी देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं. रपट में भारत के खराब प्रदर्शन के लिए आर्थिक सुधारों की दिशा में समानरूप से प्रगति न हो पाने को जिम्मेदार ठहराया गया है.

हैरिटेज फाउंडेशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भले ही पिछले 5 वर्षों में भारत की औसत सालाना विकास दर करीब 7 फीसदी रही है लेकिन विकास को गहराईपूर्वक नीतियों में जगह नहीं दी गई है. और यह बात जो आर्थिक आजादी को सीमित करती है. थिंकटैंक ने भारत को ‘अधिकांश रूप से अस्वतंत्र’ अर्थव्यवस्था की श्रेणी में रखा है और कहा है कि बाजारोन्मुख सुधारों की दिशा में प्रगति समानरूप से नहीं हो पा रही है.

दावों की खुलती पोल

सरकार सरकारी क्षेत्र के उद्योगों के जरिए बहुत से  क्षेत्रों में व्यापक रूप से मौजूदगी बनाए हुए है. रिपोर्ट के मुताबिक, रैगुलेटरी माहौल उद्योगिकता को हतोत्साहित कर रहा है. यही नहीं, भारत को इस सूचकांक में मिले कुल 52.6 अंक गत वर्ष के मुकाबले 3.6 अंक कम हैं, जब भारत 123वें पायदान पर था.

आर्थिक आजादी सूचकांक में हौंगकौंग, सिंगापुर और न्यूजीलैंड अव्वल रहे हैं. दक्षिण एशियाई देशों में सिर्फ अफगानिस्तान 163 पायदान और मालदीव 157 पायदान के साथ भारत के नीचे हैं. 125 पायदान के साथ नेपाल, 112वें पर श्रीलंका, 141 पर पाकिस्तान, 107वें पर भूटान और 128वें पर बंगलादेश ने आर्थिक आजादी के मामले में भारत को पीछे छोड़ दिया है.

भारत में अकूत संपत्ति और दरिद्रता दोनों समानरूप से विद्यमान हैं. भारत एक ओर तेजी से अपना विकास कर रहा है, वहीं, दूसरी ओर अपनी विशाल व विविधतापूर्ण आबादी के लिए हरेक के लायक विकास का रास्ता भी ढूंढ़ रहा है.

यह रपट मोदी सरकार के सुधार के दावों पर पूरी तरह सवालिया निशान लगाती है. देश के बहुत सारे राजनीतिक पंडित और अर्थशास्त्री चुनाव होने से पहले नरेंद्र मोदी के बारे में कह रहे थे कि वे भारत के लिए मार्गेट थैचर या तेंग सियाओ पिंग साबित हो सकते हैं. इन दोनों नेताओं की खासीयत यह थी कि उन्होंने अपने देशों को समाजवादी मकड़जाले से मुक्त किया और बाजार द्वारा तय विकास के रास्ते पर आगे बढ़ा कर संपन्न बनाया.

विकास की धीमी रफ्तार

गुजरात मौडल का सपना देश में जम कर बेचा गया और उस की अद्भुत सफलता के बाद नरेंद्र मोदी से भी यह उम्मीद की जाने लगी कि वे आर्थिक सुधारों के रास्ते पर चल कर भारत को तरक्की के रास्ते पर ले जाएंगे. लेकिन 3 साल में ज्यादातर उद्योगपति, अर्थशास्त्री इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मोदी जिस कछुआ चाल से आर्थिक सुधार कर रहे हैं उन से किसी बुनियादी सुधार करने की उम्मीद करना बेकार है. पिछले कुछ वर्षों से कोई भी कार्य करना आसान नहीं रहा. उल्टे, और कठिन हो गया है.

बेशक, भारत ने दुनिया के सब से तेज विकास दर वाले देश के तौर पर हाल ही अपना मुकाम बनाया है. लेकिन देश में बुनियादी परिवर्तन के मामले में आर्थिक सुधारों की दृष्टि से मोदी सरकार की कोशिशें नाकाफी हैं. तो क्या इस सरकार ने आर्थिक सुधार नहीं किए? यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन मोदी सरकार यह नहीं जान पाई कि कितने बड़े पैमाने पर सुधार जरूरी हैं. मोदी की कोशिश ऐसे फलों को तोड़ने की है जिन तक आसानी से हाथ पहुंच सके.

भारत में व्यवसाय करना कठिन है. विदेशी कंपनियों की यह आम राय है. यह राय केवल विदेशी कंपनियों की ही नहीं है बल्कि देशी उद्योगपति भी यही शिकायत कर रहे हैं.

बजाज आटो के प्रबंध निदेशक राजीव बजाज ने देश में नए प्रयोगों को ले कर सरकारी रवैए पर बड़ा करारा व्यंग्य किया. अपनी क्वाड्रिसाइकिल को बाजार में उतारने में आ रही अड़चनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश की रैगुलेटरी संस्थाएं और सरकारी मंजूरी से जुड़ी शर्तें नवाचारों का गला घोंटने का काम कर रही हैं.

अगर ऐसा ही रहा तो ‘मेक इन इंडिया’ की पहल ‘मैड इन इंडिया’ में बदल जाएगी.

बजाज आटो के प्रबंधक निदेशक ने यह भी कहा कि देश में क्वाड्रिसाइकिल की बिक्री शुरू करने के लिए उन्हें 5 वर्षों से इंतजार करना पड़ रहा है, जबकि यूरोपीय, एशियाई और लैटिन अमेरिकी देशों में इस चौपहिया गाड़ी का चलन बढ़ रहा है. उन्होंने इस पर आश्चर्य जताया कि प्रदूषणमुक्त, ईंधन के मामले में किफायती और सुरक्षित होने के बावजूद क्वाड्रिसाइकिल को मंजूरी नहीं दी जा रही. शायद इसलिए मंजूरी नहीं मिल रही कि कुछ लोगों को लगता है कि चारपहिया वाहन खतरनाक होते हैं और लोगों को तीनपहिया वाहनों की सवारी करनी चाहिए. ये दोनों बयान इस बात के सुबूत हैं कि भारत में आर्थिक स्वतंत्रता की अब भी बेहद कमी है. यहां नए उद्योगधंधे चलाना अब भी लोहे के चने चबाने जैसे हैं.

पर्याप्त आर्थिक सुधारों की हिमायत करने वाले ये लोग भले ही उद्योगपति हों मगर आर्थिक स्वतंत्रता का उपयोग केवल अमीरों के लिए नहीं  है. इस की जरूरत उन के लिए ज्यादा है जो समाज के सब से ज्यादा निम्न आर्थिक वर्ग में गिने जाते हैं.

एक गरीब फेरीवाले से बड़ा मुक्त उद्यम का हिमायती कोई नहीं हो सकता. आर्थिक स्वतंत्रता के लिए विभिन्न लाइसैंसों और निरर्थक कानूनों को हटाना भी जरूरी है जिन के दायरे में लोग जीते हैं. स्वतंत्रता के अभाव और अत्यधिक नियंत्रण से गरीब लोग ही सब से ज्यादा शिकार बनते हैं. अमीर लोग तो सरकारी नियंत्रण के बावजूद अपना रास्ता निकाल लेते हैं जबकि गरीबों के पास आर्थिक स्वतंत्रता के अलावा कोई चारा नहीं है. इस मामले में भी हम पिछड़े हुए हैं.

आर्थिक विकास में नाटकीय वृद्धि लाखों भारतीयों को गरीबी से मध्यवर्ग की समृद्धि में ले गई. इस से भारत की गरीबी की दर में कमी आई. उन्हें आर्थिक उदारवाद का लाभ मिला. दूसरी तरफ बड़ी संख्या में कृषि पर निर्भर भारतीयों को इस का लाभ नहीं मिल पाया क्योंकि कृषि का क्षेत्र सुधारों से अछूता है.

वितरण क्षेत्र में छोटे क्रोनीज की भरमार है जो उदारवाद को रोकते हैं. वे किसानों और उपभोक्ताओं के बीच बाधा बन कर खड़े हो जाते हैं और दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं. लेकिन किसानों को गंभीररूप से नुकसान पहुंचाते हैं. शहरी क्षेत्रों में आर्थिक उदारवाद के अभाव के कारण अवैध और अनौपचारिक क्षेत्र बरकरार हैं. इस कारण रेहड़ी वाले जैसे हाशिए के व्यवसायी, कानून का शासन न होने के कारण, परेशानी झेलने को मजबूर हैं.

आर्थिक सुधार उन तक पहुंचने चाहिए ताकि वे कानून और मार्केट पूंजीवाद का लाभ उठा सकें. जहां आर्थिक स्वतंत्रता ज्यादा होती है वहां भ्रष्टाचार कम होता है. यह पता चलता है कि श्रेष्ठ भ्रष्टाचार विरोधी अभियान केवल बयानबाजी या कठोर दंडों पर आधरित नहीं होते, बल्कि खरीदने व बेचने के आर्थिक एजेंटों को मिलने वाले प्रोत्साहनों को कम करने और ऐसे फेवर करने के  अधिकार को खत्म करने पर निर्भर करते हैं.

बिगड़ती कानून व्यवस्था

मोदी समर्थकों और विरोधियों की यह शिकायत रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 2 कदम आगे, 3 कदम पीछे की चाल से ही सुधार हो रहे हैं.

वैसे, मोदी धड़ाकेदार सुधारों या बिगबैंग सुधारों पर नहीं, नारों पर विश्वास करते हैं. इस के बावजूद मोदीभक्त अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि मोदी ने बाकी प्रधानमंत्रियों की तुलना में ज्यादा आर्थिक सुधार किए.

जानेमाने मोदीभक्त अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला कहते हैं, ‘‘मोदी के 2 वर्षों के शासन में पिछले 22 वर्षों के मुकाबले ज्यादा सुधार हुए हैं.’’ जबकि, इस दौरान नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्योग में और व्यापारियों को करारी लात मारी है. गौरक्षकों ने पशु व्यापार को पंगु बना दिया है. बिगड़ती कानून व्यवस्था उद्योगों को चलाने में कठिनाई पैदा कर रही है.

पिछले वर्षों में हम ने भले ही कई आर्थिक बदलाव किए हों मगर इस मोरचे पर सुधार करना बाकी है. कालाबाजारी खत्म करने का नारा काफी नहीं है.

बैंकों में बढ़ते एनपीए से स्पष्ट है कि बैंकिंग सैक्टर में किस तरह सरकार की नाक के नीचे बेईमानी हो रही है. इस क्षेत्र में सुधारों की सख्त जरूरत है.

लंबे समय से जिस सुधार की सब से ज्यादा जरूरत है और कई सरकारें आने के बावजूद वह लटका हुआ है वह है – श्रम सुधार.  कम्युनिस्ट विचारधारा की देन के कारण रोजगार वृद्धि रुक रही है. मेक इन इंडिया की सफलता के लिए भी यह सुधार बेहद जरूरी है. इस के बगैर हमारी विशाल आबादी हमारी ताकत बनने के बजाय हमारे लिए बोझ बन जाएगी.

चाहे कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा की सरकार, दोनों ने तय किया है कि वे श्रम सुधार करेंगे तो ब्राह्मणों द्वारा संचालित यूनियनों की सहमति से जो कभी काम को महत्त्व ही नहीं देते और आसानी से इस के लिए तैयार नहीं हो रहे. इस से पहले जरूरत है प्रशासनिक सुधारों की भी. इस के बारे में वीरप्पा मोईली की रपट मौजूद होने के बावजूद उस पर अमल नहीं किया गया.

दरअसल, लोगों को तेज गति से सुधारों की उम्मीद थी जो पूरी नहीं हो पाई है. जब तक आर्थिक सुधार लागू नहीं होते, देश आर्थिक आजादी सूचकांक के पायदान पर सब से नीचे के देशों के साथ रहेगा. झंडा फहराना और वंदे मातरम का नारा या भारत माता की जय कहने से आर्थिक विकास नहीं होगा.

व्यवसाय करने में आसानी

देश की अर्थव्यवस्थाओं को उन के यहां व्यवसाय करने की सहूलियतों के आधार पर रैंक दिया जाता है. जिस देश की अर्थव्यवस्था का यह रैंक जितना ज्यादा होता है, वहां स्थानीय फर्म को व्यवसाय करने के लिए सहूलियतें उतनी ही ज्यादा होती हैं. यहां दुनिया की चुनिंदा अर्थव्यवस्थाओं के रैंक दिए जा रहे हैं जो वर्ष 2016 में की गई गणना पर अधारित हैं.

हौकी का गेम और ऊन सलाइयां

जमाना गया जब खेलों के महंगे शौकों पर पुरुषवर्ग का आधिपत्य था और खूबसूरत लिबासों में उन की पत्नियां या दोस्त सिर्फ उन का साथ देती नजर आती थीं. हौकी की दीवानी मिशेल मिलर जैसी महिलाएं आज खेल के मैदानों में हर कीमत के टिकट वाली सीटों पर बैठी, खिलाडि़यों को चियरअप करती हैं. अमेरिकन नैशनल हौकी लीग के किसी भी मैच में पेन स्टेट की टीम का मनोबल बढ़ाने के लिए 44 वर्षीया कंप्यूटर सिस्टम ऐडमिनिस्टे्रटर मिशेल 500 मील तक ड्राइव कर के भी पहुंचती हैं.

दर्शक दीर्घा में मिशेल की उपस्थिति एक अनोखे कारण के लिए मशहूर है. हाथों में ऊनसलाइयां पकड़े वे कभी मोजे, कभी शौल, बेबी ब्लैंकेट या स्वेटर उतनी ही तन्मयता से बुन रही होती हैं जितनी एकाग्रता से वे अपनी चहेती टीम की हौसला अफजाई करती हैं. जितना तनावपूर्ण मैच, उतनी ही तेज उन की सलाइयां और खेल पर उतना ही गहरा उन का फोकस. साथसाथ उन की बुनी हुई चीजों का बढ़ता हुआ अंबार जिसे वे प्रियजनों पर न्योछावर करती हैं. कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें अचरज होता है कि तेज रफ्तार खेल के दौरान कोई बुनाई चालू कैसे रख सकता है.

मिशेल का कहना है कि बुनाई में वर्षों की दक्षतावश उन्हें सलाइयों पर नजर डालने की भी जरूरत नहीं पड़ती. खेल की प्रगति पर उन का फोकस रंचमात्र भी कम नहीं होता. खेल के जानकार अकसर उन से पैने सवाल पूछ कर उन के खेलज्ञान से आश्चर्यचकित रह जाते हैं. किसी कारणवश मिशेल यदि खेल के मैदान में नहीं पहुंच पातीं तो टीवी के आगे खेल की क्षणक्षण प्रगति पर निगाहें टिकाए वे खटाखट सलाइयां चलाती रहती हैं.

जिस चतुराई से खिलाड़ी हौकी स्टिक से गेंद को गोल की तरफ ले जाते हुए विरोधी दल के चक्रव्यूह से बचने की रणनीति रचता चलता है, वैसे ही मिशेल की सलाइयां सीधे और उलटे फंदों के हेरफेर से बुनाई में नमूने रचती चलती हैं. तकनीक समान है, खेल के मैदान में भी और सलाइयों में झूलते बुनाई के पल्लों में भी.

मिशेल मिलर के पति माइकल ने तकरीबन 15 वर्षों पहले प्रणय निवेदन के दौरान उन्हें हौकी का चस्का लगा दिया. माइकल का जनून मिशेल के सिर पर ऐसा चढ़ा कि खुद पर काबू रखने के लिए बुनाई ही सब से कारगर उपाय साबित हुई.

उत्तेजनावश खिलाडि़यों, रेफरियों या खेल के प्रशिक्षकों पर तेज आवाज में खीझ निकालने और बगल में बैठे पति माइकल के कान के परदे फाड़ने के बजाय वे ऊनसलाइयों पर जोरआजमाइश कर डालती हैं. पतिपत्नी मैच को सब से नजदीक वाली सीटों से देखना पसंद करते हैं जिन की कीमत 600 डौलर तक हो सकती है.

बुनाई वे हमेशा चालू रखती हैं- फिल्म देखते हुए, रेस्तरां में टेबल खाली होने के इंतजार में, बल्कि यों कहिए कि उन के पर्सनल टाइम में कहीं भी. उन की बुनाई बोरियत की निशानी नहीं, उन की एकाग्रता की द्योतक है. बुनाई की एक लेखिका और प्रशिक्षिका पर्ल मेक्फी भी मिशेल मिलर के कौशल की सराहना करती हैं. उन के अनुसार, ‘‘मिशेल की बुनाई उन की उत्तेजना पर अंकुश रखती है, धैर्य बढ़ाती है और उन के फोकस को पैना करती है.’’

हाल ही में मिशेल के दाहिने हाथ की कनिका में चोट लगने के कारण उन के हौकी मैच दर्शन रूटीन में बाधा पड़ी. लेकिन अब वे मोरचे पर वापस डटी हैं. बुनाई के कम से कम 20 प्रोजैक्ट उन के जेहन में हैं.

शारीरिक सक्रियता से दिमाग तेज होता है. इस का यह मतलब नहीं कि कामकाजी महिलाएं कार्यस्थल पर अपनी निजी कढ़ाईबुनाई करें. कंप्यूटर सिस्टम ऐडमिनिस्ट्रेटर मिशेल अपनी बुनाई केवल निजी समय में अपनी विश्रांति के लिए करती हैं, दफ्तर में नहीं.

कौर्पोरेट कल्चर का स्ट्रैस निजी जिंदगी पर हावी न होने देने के लिए पेंटिंग, म्यूजिक बल्कि खाना बनाना भी एक जबरदस्त थेरैपी साबित हो रहा है. अत्याधिक व्यस्तता में राहत के लिए काम से बिलकुल अलग कुछ भी करना दिमाग की बैटरीज को रीचार्ज करने जैसा है, गाड़ी चलाते हुए खबरें सुनना या खुद को डिक्टेट किए हुए जरूरी नोट्स दुहरा लेना, सुमधुर संगीत या किसी चर्चित किताब का औडियो टेप सुन कर तनाव कम करना आदि.

आज की जिंदगी चूहादौड़ जैसी है जिस में बहुकार्य वांछित ही नहीं, जरूरत हैं. खाना बनाते हुए बच्चों का होमवर्क करवाना, टीवी देखते हुए कपड़े प्रैस कर डालना आदि. बहुत से छोटेमोटे या मामूली काम तक थेरैपी साबित हो सकते हैं. समय का इस से उत्तम सदुपयोग नहीं हो सकता.

युवा भारत : युवा नेता हैं कहां और जो हैं वो बन बैठे हैं लकीर के फकीर

भारत आज विश्व में सब से अधिक युवा आबादी वाला देश है. भारत के मुकाबले चीन, अमेरिका बूढ़ों के देश हैं. चीन में केवल 20.69 करोड़ और अमेरिका में 6.5 करोड़ युवा हैं. हमारे यहां 125 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या में 65 प्रतिशत युवा हैं. इन की उम्र 19 से 35 वर्ष के बीच है. लेकिन देश के नेतृत्व की बागडोर 60 साल से ऊपर के नेताओं के हाथों में है. केंद्रीय मंत्रिमंडल में तीनचौथाई नेता सीनियर सिटीजन की श्रेणी वाले हैं. राजनीतिक संगठनों में भी युवाओं से अधिक बूढे़ नेता पदों पर आसीन हैं.

मौजूदा संसद में 554 सांसदों में 42 साल से कम उम्र के केवल 79 सांसद हैं. इन की आवाज संसद में न के बराबर सुनाई पड़ती है. युवाओं की अगुआई कहीं नजर नहीं आती. उन की ओर से कहीं कोई सामाजिक, राजनीतिक  बदलाव या किसी क्रांति की हुंकार भी सुनाई नहीं पड़ रही है.

देश के आम युवाओं की बात करें तो उन का हाल यह है कि वे भेड़ों की तरह हांके जा रहे हैं. चारों ओर युवाओं की केवल भीड़ है. हताश, निराश और उदास युवा. एसोचैम के अनुसार, आज 78 करोड़ युवा सोशल मीडिया पर तो सक्रिय हैं पर उन में राजनीतिक व सामाजिक रचनात्मकता नदारद है.

देश में नई चेतना का संचार करने वाली युवा राजनीतिक पीढ़ी कहीं नहीं दिखाई दे रही है. भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद, बसपा जैसे दलों में बड़ी उम्र के नेता अगुआ बने  हुए हैं. कांग्रेस में 47 साल के राहुल गांधी हैं पर उन में नेतृत्व की क्षमता का साफ अभाव उजागर हो चुका है. केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा में कोई लोकप्रिय युवा नेता दिखाई नहीं देता.

लकीर के फकीर बन बैठे हैं युवा नेता

अन्ना आंदोलन से अरविंद केजरीवाल उभर कर आए. देश को उन की सोच परिवर्तनकारी लगी. उन्हें अवतारी पुरुष बताया जाने लगा पर 2-3 साल गुजरतेगुजरते वे असफल साबित होने लगे. वे मैदान में विरोधियों को झेल नहीं पाए. उन्हें विपक्ष ने असफल साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. विरोधी उन पर भारी साबित हुए और वे उन के हाथों शिकस्त खा गए दिखते हैं.

राहुल गांधी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए. अपने कामों से उन की हंसी ज्यादा उड़ रही है. 47 साल के ज्योतिरादित्य सिंधिया, 40 वर्षीय सचिन पायलट अपने परिवारों की राजनीतिक विरासतों को ही आगे बढ़ा रहे हैं. वे भी लकीर के फकीर बने नजर आते हैं. इन्होंने राजनीति में आ कर कोई नई सोच या दिशा नहीं दी.

समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव कोई चमत्कार नहीं कर पाए. हालांकि पिछली बार उत्तर प्रदेश की जनता ने उन्हें युवा जान कर सत्ता सौंपी थी पर वे पारिवारिक झगड़े में ही उलझ कर रह गए. इस बार प्रदेश की उसी युवा पीढ़ी ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया.

आज की राजनीति में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट से ले कर अखिलेश यादव तक कई युवा हार्वर्ड जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों से पढ़ कर आए हुए हैं. गांधी, नेहरू, पटेल भी युवावस्था में विदेश से पढ़ कर देश का राजनीतिक नेतृत्व किया था. उन नेताओं ने देश को धर्मनिरपेक्ष, संप्रभु समाजवादी लोकतांत्रिक स्वरूप प्रदान कराने में अपना योगदान दिया.

पाकिस्तान जैसे कितने देश आजाद होने के दशकों बाद भी लोकतंत्र की स्थापना में नाकाम, कोसों दूर खड़े देखे जा सकते हैं. राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश में श्यामाचरण शुक्ला और विद्याचरण शुक्ला के परिवार से युवाओं में उभर कर कोई नहीं आ पाया. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के बाद कोई नहीं दिख रहा.

ओडिशा में नवीन पटनायक भी किसी युवा को आगे नहीं ला पाए. तेलंगाना में चंद्रशेखर राव का परिवार धर्र्म की लौ जगाने में ज्यादा भरोसा रखता है.

दक्षिण भारत में रजनीकांत और अब कमल हासन दोनों ही 60 से ऊपर की अवस्था में आ कर राजनीति में उतरने की सोच रहे हैं और अभी भी वहां 85 साल से अधिक उम्र के हो चुके करुणानिधि का दबदबा है और एस एम कृष्णा जैसे नेता कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आ रहे हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे, अपने भाषणों में कई बार देर तक खामोश बैठे या खड़े रह जाते थे. एच डी देवगौड़ा को मीटिंगों में सोने में महारत थी, महत्त्वपूर्ण बैठकों में उन्हें नींद आ जाती थी. अब भी कई मंत्री टैलीविजन चैनलों में कैमरों के सामने सोए हुए देखे जा सकते हैं.

एक दौर था युवा नेताओं का    

इतिहास का एक दौर था जब महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, सुभाष चंद्र बोस से ले कर विवेकानंद तक युवावस्था में देश के लिए आदर्श नेता के रूप में अगुआ थे. उस समय जनक्रांति में अनगिनत युवाओं ने खुद को समर्पित कर दिया था.

महात्मा गांधी 1888 में 18 साल की उम्र में वकालत पढ़ने इंगलैंड चले गए थे. 3 साल लंदन में रहने के बाद 1891 में वापस लौट आए. फिर 1893 में साउथ अफ्रीका चले गए. 23-24 साल की उम्र में उन्होंने रंगभेद को देखा और महसूस किया और फिर 25 साल की उम्र में उन्होंने रंगभेद के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था. 1906 में अवज्ञा आंदोलन के बाद से वे देश की आजादी के लिए लोहा लेते रहे. राजनीतिक आंदोलन को नेतृत्व देते रहे.

महात्मा गांधी ने 1919 से 1931 तक यंग इंडिया नामक पत्रिका निकाली जो अपने विचार और दर्शन की बदौलत देश की युवा पीढ़ी को पे्ररित करती रही. उस में गांधी के देश, समाज और परिवार के प्रति वो विचार होते थे जिन से लोगों को प्रेरणा मिलती थी.

नेहरू 27 वर्ष में ही कैंब्रिज से पढ़ कर होम रूल लीग में शामिल हो चुके थे. सरदार पटेल युवावस्था में ही बाहर से वकालत कर लौटे और खेड़ा सत्याग्रह व बारदोली किसान आंदोलन के नेतृत्व से जल्दी ही प्रसिद्ध हो गए.

1975 में इंदिरा गांधी की ज्यादतियों के विरुद्ध संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंकने वाले जयप्रकाश नारायण की उम्र भी अधिक नहीं थी. समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर उन्होंने दलित, पिछड़े युवा नेताओं की एक मजबूत टोली खड़ी कर दी. उन के आंदोलन ने पिछड़ों को संगठित और जाग्रत करने में अहम भूमिका निभाई. संपूर्ण क्रांति में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने और शिक्षा में क्रांति लाने जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे थे.

राममनोहर लोहिया भी इसी आंदोलन के एक मजबूत स्तंभ थे. युवा उम्र में वे भी जाग्रति फैलाने में आगे रहे. 57 साल की अवस्था में उन की मृत्यु हो गई थी.

भीमराव अंबेडकर ने 1927 में छुआछूत के खिलाफ व्यापक आंदोलन छेड़ा, उस समय वे युवा ही थे. वे महज 36 वर्ष के थे. 1857 से 1947 तक के लंबे स्वतंत्रता संघर्ष में देशवासियों के दिलों में देशभक्ति एवं क्रांति की लौ जलाने वालों में युवाओं की भूमिका सर्वोपरि रही है. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई 26 वर्ष की थीं. तात्या टोपे, मंगल पांडे युवा ही थे. भगत सिंह ने खुद के नास्तिक होने के क्रांतिकारी विचार युवावस्था में ही जाहिर कर दिए थे. चंद्रशेखर, खुदीराम बोस ने देश के सुख के लिए अपने यौवन का बलिदान कर दिया था.

शो पीस बन कर रह गए हैं युवा नेता

लेकिन, पिछले 3-4 दशकों में ऐसा देखने को नहीं मिला. ऐसा नहीं कि देश से समस्याएं मिट गई हों और किसी बदलाव या क्रांति की जरूरत न रही हो. भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी के बाद दूसरी कतार के नेताओं को नेतृत्व सौंपे जाने के प्रयास हुए तो पार्टी में आपसी कलह, टांगखिंचाई शुरू हो गई थी. नेताओं में कुरसी हथियाने की होड़ शुरू हो गई थी. हालांकि उस समय भी वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज, अनंत कुमार, उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता युवा नहीं रहे थे.

राजनीति में युवाओं को आगे लाने की बात होती है, युवा नेतृत्व की बात चलती है पर पार्टी या सरकार का नेतृत्व किसी बड़ी उम्र के नेता को ही सौंपा जाता है. 2008 में राहुल गांधी ने युवा शक्ति से जनाधार बढ़ाने के लिए देशभर से युवाओं के इंटरव्यू किए थे. उस में 40 युवाओं का चयन किया गया. पर वे आज कहां हैं, उन की हट कर कोई अलग पहचान नहीं दिखती.

पिछले लोकसभा चुनावों में युवाओं का चुना जाना अच्छा संकेत था पर ये युवा ज्यादातर अपनी खानदानी विरासत संभालने आए. कुछ बंधनों को छोड़ दें तो इन युवाओं में  जोश और जज्बा तो नजर आता है पर नई सोच नहीं. विचारों में क्रांति लाने का काम नहीं हो रहा है. संसद में सचिन तेंदुलकर जैसे युवा केवल शोपीस बने हुए हैं. वे न खेलों को भ्रष्टाचार, बेईमानी से मुक्त करने के लिए कोई बात करते हैं, न किसी अन्य सुधार की.

दलगत राजनीति हो या छात्र राजनीति, दोनों की दशा डांवाडोल है. राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने छात्र राजनीति में भी अपनी घुसपैठ बना रखी है. इन्हीं के सहयोगी संगठन छात्र राजनीति का खेल खेलते हैं. छात्र राजनीति में अपराधों व अपराधियों का बोलबाला है.

ऐसी विकट स्थिति के कारण ही मई 2005 में राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर खंडपीठ को विश्वविद्यालयों सहित सभी शिक्षण संस्थानों में छात्र संघों और शिक्षक संघों  के चुनाव पर रोक लगाने का फैसला सुनाना पड़ा था. इस के पीछे बताई गई वजहें गौर करने लायक थीं. खंडपीठ का कहना था कि नेतागीरी की धाक जमाने के लिए छात्र नेता शिक्षकों का अपमान करते हैं और राजनीतिक दल छात्र एकता को विभाजित कर रहे हैं.

कुछ समय पहले व्यवस्था के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाला कोई युवा नहीं था, 80 साल के वृद्ध अन्ना हजारे थे. उन के पीछे युवाओं की भीड़ जरूर थी पर नेतृत्व में वह पीछे थी. क्या हमारे युवाओं में राजनीतिक चेतना का विकास नहीं हो रहा है? जो युवा नेता हैं उन में देश की दिशा और दशा बदलने की कूवत नहीं है. ज्यादातर युवा नेता परिवार की राजनीतिक विरासत को ढो रहे हैं.

अन्ना आंदोलन के बाद लगता है कि देश के युवा का बदलाव की राजनीति और वैचारिक क्रांति में भरोसा कम होता जा रहा है. वह यथास्थितिवादी होता जा रहा है. वह परंपरा को तोड़ने के बजाय परंपरापूजक होता जा रहा है. आमतौर पर माना जाता है कि युवा का मतलब है परंपराओं को चुनौती देने वाला और बदलाव में विश्वास रखने वाला. समाज का यह तबका किसी देश में बदलाव का अगुआ होता है.

हाल के समय में लगता है युवा खासतौर से मध्यवर्गीय युवा धारा के विरुद्ध नहीं, धारा के साथ बहने लगा है. बदलाव के बजाय परंपराओं में, यथास्थिति में भविष्य देख रहा है. युवा सामाजिक, राजनीतिक जकड़बंदी से टकराने के बजाय उस से समझौता करने के मूड में दिखाई देने लगा है.

यह बात भी सही है कि सत्ता की ओर से युवाओं को बदलाव की चेतना, आंदोलन से दूर रखने और इन आंदोलनों को कमजोर करने की योजनाबद्ध कोशिशें हुईं और उसे काफी हद तक कामयाबी भी मिली है. असल में मौजूदा व्यवस्था युवाओं की बेचैनी, उस के जोश, उस की क्रिएटिविटी को कुचलने का काम कर रही है. भीड़ की सोच ही युवाओं की सोच बनती जा रही है.  युवा पीढ़ी अतीत की जंजीरों की जकड़न उतार फेंकने में हिचकिचा रही है.

युवा आजादी का लुत्फ उठा रहे हैं. युवाओं ने मान लिया है कि अब उन की देश, समाज के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है. आजादी ही हमारा लक्ष्य नहीं था. वास्तविक जिम्मेदारियां तो बाद में शुरू हुई हैं. गांधी, नेहरू के बाद देश को बहुत सुधारों की जरूरत है. देश संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. हमारे नेता सोच रहे हैं कि देश में सड़कें,

पुल, हाईवे, मौल, मैट्रो, मोबाइल फोन, कंप्यूटर जैसी चीजें तरक्की की निशानिया हैं. भ्रष्टाचार, निकम्मापन, बेरोजगारी, व्यक्ति की आजादी, धार्मिक, जातीय, लैंगिक भेदभाव, अंधविश्वासों से मुक्ति, नौकरशाही में कर्तव्य का अभाव, सरकार की जवाबदेही जैसी चीजों में बड़े सुधारों की जरूरत है.

आजादी बनाम जिम्मेदारी

सरकार का यह दायित्व होता है कि वह प्रशासन, समाज में ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता का माहौल पैदा करे. पर ऐसा दिखाई नहीं पड़ता. वैचारिक क्रांति का अलख सदियों से नहीं हुआ. देश में प्रगति, विकास के एक झूठ का आडंबर फैलाया जा रहा है. अफसोस इस बात का है कि युवा तर्क नहीं कर रहा, सवाल नहीं उठा रहा कि विकास कहां है, कैसा विकास हो रहा है? बस, हां में हां मिलाए जा रहा है.

युवा वर्ग की पहचान है उस की  बेचैनी, उस का आक्रोश, उस की सृजनात्मकता और स्थापित व्यवस्था को चुनौती देने वाला उस का मिजाज. यही मिजाज उसे बदलाव के लिए व्यवस्था से टकराने का हौसला व हर जोखिम उठाने का साहस देता है.

जेल भेज दिया जाता है युवाओं को

पिछले दिनों कन्हैया कुमार, हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, चंद्रशेखर जैसे युवा नेता उभर कर सामने आए. इन में व्यवस्था में बदलाव का जज्बा दिखाई दिया. ये नेता व्यवस्था से टकराए. इन्होंने भेदभाव, आजादी, बेरोजगारी, असमानता जैसे अहम मुद्दों को ले कर आंदोलन का नेतृत्व किया पर व्यवस्था से टकराने पर उन्हें जेल व जलालत मिली.

कन्हैया कुमार ने विश्वविद्यालयों और समाज में व्याप्त धार्मिक, जातीय भेदभाव और स्वतंत्रता के लिए आंदोलन छेड़ा. देश के विश्वविद्यालयों में दलित, पिछड़े, आदिवासी छात्रों के साथ हो रहे भेदभाव की मुखालफत की थी. उन्हें जेएनयू से निकालने की मांग की गई. केंद्र सरकार ने देशद्रोह का आरोप लगा कर मुकदमा ठोंक दिया और जेल भेज दिया. कोर्ट में पेश किए जाते वक्त उन पर वकीलों के एक समूह ने हमला किया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से डौक्ट्रेट कर रहे कन्हैया कुमार अब भी गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, असमानता के विरुद्ध खड़े हैं पर सत्ता ऐसे युवाओं से भयभीत है और उन्हें झुकाने के हर हथकंडे अपना रही है.

गुजरात में हार्दिक पटेल ने आक्षरण में भेदभाव को ले कर बड़ा आंदोलन खड़ा किया. लाखों लोग उन के साथ जुड़े. उन पर भी मुकदमा कायम किया गया और प्रदेश निकाला दे दिया गया. हार्दिक पटेल को राजस्थान में कई महीनों तक नजरबंद रखा गया.

गुजरात में ही पिछले साल मरी हुई गाय की खाल उतारने पर 4 दलित युवकों की हिंदू संगठनों के लोगों द्वारा की गई बुरी तरह पिटाई के बाद जिग्नेश मेवानी उभर कर सामने आए. इस घटना के विरोधस्वरूप जिग्नेश ने राज्यभर में आंदोलन की अगुआई की. दलितों को एकजुट कर के सरकार और कट्टर हिंदू संगठनों के खिलाफ आंदोलन किया.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के शब्बीरपुर में दलितों और राजपूतों के बीच हुई हिंसा के मामले में भीम आर्मी के नेता के रूप में चंद्रशेखर उभर कर सामने आए. 35 वर्षीय चंद्रशेखर ने जातीय भेदभाव और हिंसा के खिलाफ लड़ाई शुरू की थी. दिल्ली के जंतरमंतर पर धरना देने के लिए बुलाई गई भीड़ का नेतृत्व किया और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया. चंद्रशेखर के परिवार का भी उत्पीड़न किया गया.

सत्ता और कट्टर राजनीतिक विचारधारा को छोड़ कर देश ने इन युवा नेताओं को हाथोंहाथ लिया, पर आज ये कहां है?

यह तथ्य हैरान करने वाला है कि देश की बहुसंख्यक आम युवा आबादी में बदलाव की कोई हलचल नहीं है. अपवादों को छोड़ दें तो पूरे देश में युवा समुदाय में वह बेचैनी, गुस्सा और आंदोलन दिखाई नहीं दे रहा है जिस के लिए उसे जाना जाता है.

युवा मोबाइल, इंटरनैट, सोशल मीडिया में इतना व्यस्त है कि उसे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा. युवा किसी भी देश व समाज के  कर्णधार माने जाते हैं. वे वह स्तंभ कहलाते हैं जिस पर समाज की मजबूत इमारत का निर्माण होता है. एक आम मानसिकता यह है कि 10वीं की पढ़ाई के बाद इंटर और फिर ग्रेजुएशन किया जाए. शिक्षा के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति भयावह दिखती है.

आज 47 प्रतिशत युवा रोजगार के लिहाज से नाकाबिल हैं. 35 प्रतिशत स्नातक क्लर्क की नौकरी के लायक हैं. कुल मिला कर 15 प्रतिशत युवा ही बेहतर रोजगार के स्तर तक पहुंच पाते हैं. विश्व के 200 विश्वविद्यालयों में भारत की उपस्थिति भी नहीं है.

नई सोच का अभाव

विदेशों से पढ़ कर भारत वापस आ रहे युवाओं में भी नेतृत्व की नई सोच का लगभग अभाव ही नजर आता है. संकट में चुनौतियों का सामना समयसमय पर युवा शौर्य ही करता आया है पर युवा नेताओं में ये बातें नहीं हैं. संसद, विधानसभाएं ऐसे लोगों का जमावड़ा बन गई हैं जहां गंभीरता के साथ बहस या संवाद नहीं होते. केवल चिल्लाने, उत्तेजक भाषण देने और आपस में आरोपप्रत्यारोप में देश का समय बरबाद किया जाता है. संसद में कईकई दिनों तक कामकाज नहीं होता. विधानसभाएं ठप कर दी जाती हैं.

दरअसल राजनीति राष्ट्रीय व्यवस्था एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को सुचारु व सुगम बनाने की प्रणाली है. इस के अपने मूल्य एवं नीतियां हैं जो न्याय, समानता के सिद्धांत से ओतप्रोत हैं. लेकिन चारों ओर भ्रष्टाचार, बेईमानी, स्वार्थ, मौकापरस्ती, भाईभतीजावाद का साम्राज्य विद्यमान है. हमारे नेता शासन तो करना चाहते हैं पर उन का बुराइयों के खात्मे से कोई सरोकार नहीं है. यह काम युवा नेताओं को आगे बढ़ कर करना चाहिए, पर वे उदासीन नजर आते हैं.

हमारे देश में संसद, विधानसभाओं से शासन, प्रशासन, देश, समाज, व्यक्ति की तरक्की की कोई राह निकलती

नहीं दिखती तो इस का मतलब देश को युवा कहने पर धिक्कार है. अभी देश के यौवन में कुछ खोट है. यौवन की तरंग में तरक्की की कोंपलें फूटती दिखनी चाहिए जो युवा नेताओं की कार्यशैली, उन के विचारों में दिखाई नहीं दे रही हैं.

बताओ मुझे..बंधन प्यार का है अपना, बीच में फिर दीवार हो कैसे

मिला दुश्मन कि यार हो जैसे

पर फिर भी एतबार हो कैसे

बंधन प्यार का है अपना

बीच में फिर दीवार हो कैसे

उठ गया तेरे धोखे से जो

तुझ पे अब एतबार हो कैसे

जिस के आने से तू आ जाए

मरुस्थल में वो बहार हो कैसे

पिया न देखें किसी और को

करूं मैं बताओ सिंगार वो कैसे.

– हरदीप बिरदी

धर्मस्थलों में बरबाद होता बुढ़ापा और वृद्धों की उपेक्षा

हर दौर के युवा व्यवस्था, विसंगतियों और भ्रष्टाचार को ले कर आक्रोशित रहते हैं. वे सोचते रहते हैं कि जिस दिन लाइफ सैटल हो जाएगी और वे पारिवारिक व सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाएंगे उस दिन जरूर इन खामियों से लड़ेंगे. युवाओं के पास क्रांतिकारी विचार तो होते हैं पर वे उपकरण नहीं होते जिन से वे समाज व देश को बदल सकें. ये उपकरण पैसा और वक्त होते हैं.

सेवानिवृत्ति और 60-65 वर्ष की उम्र तक खासा पैसा ये कल के युवा कमा चुके होते हैं और घरगृहस्थी के अलावा नौकरी या व्यवसाय के काफीकुछ अनुभव भी हासिल कर चुके होते हैं. यानी सैटल हो चुके होते हैं. लेकिन जवानी का वह आक्रोश और हालात वे भूल जाते हैं जो उन्हें उद्वेलित करता था और कुछ करने को उकसाता रहता था.

आज के बुजुर्ग यानी गुजरे कल के युवा कोई आंदोलन खड़ा न करें, यह हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है इन का बेबस हो कर धर्मस्थलों में जा कर वक्त गुजारना, भजन, कीर्तन, पूजापाठ करना. इस से तो कुछ बदलने से रहा पर धर्म के चक्कर में वे खुद बदल कर सामाजिक विसंगतियों को बढ़ावा दे रहे होते हैं. वे खुद नहीं जानते वे क्या कर रहे हैं और न ही उन्हें यह बताने वाला कोई होता है.

बरबादी क्यों

सामाजिक संरचना हर दशक में बदलती है पर जो एक बात उस में स्थिर रहती है वह है वृद्धों की उपेक्षा. दरअसल, वे अनुपयोगी करार दिए जा चुके होते हैं. दिक्कत यह है कि ये वृद्ध भी खुद को अनुपयोगी मान लेते हैं और सुकून की तलाश में भटकते हुए धर्मस्थलों का कारोबार बढ़ाते देखे जा सकते हैं.

हर धर्म में वृद्धों के लिए निर्देश दिए गए हैं कि यह उम्र भजनपूजन, ईश्वरीय ध्यान और तीर्थयात्राओं के अलावा जिंदगीभर के पापों को पुण्यों में तबदील करने की होती है. चूंकि यह काम धर्मस्थलों में ज्यादा से ज्यादा वक्त बिता कर ही हो सकता है, इसलिए अधिकांश वृद्ध भगवान के चरणों मेें जा कर मोक्षमुक्ति की कामना किया करते हैं. चूंकि बगैर दानदक्षिणा के धर्म में कुछ नहीं मिलता, इसलिए जिंदगीभर मेहनत से कमाई आमदनी का बड़ा हिस्सा वे तथाकथित भगवान के तथाकथित दूतों को देते रहते हैं.

इस में कोई शक नहीं कि पहले के मुकाबले बुजुर्ग अब ज्यादा तनहा हो चले हैं क्योंकि संतानें बाहर नौकरी करने चली जाती हैं जिस के बाबत उन्हें रोका भी नहीं जा सकता क्योंकि सवाल जिंदगी और कैरियर का होता है. बच्चों को भले ही न रोक पाएं पर बुजुर्ग खुद को तो धर्मस्थलों में जाने से रोक सकते हैं. ऐसा वे नहीं करते तो जाहिर है खुद मान लेते हैं कि वे अब वाकई किसी काम के नहीं रहे. यानी धर्म और धर्मस्थल निकम्मों व निठल्लों के विषय हैं.

बुजुगर्ोें की एक बड़ी परेशानी यह है कि वे खाली वक्त कहां जा कर गुजारें कि जिस से वे दिल की बातें किसी से साझा कर सकें. नई दिक्कत यह खड़ी हो गई है कि बढ़ते शहरीकरण ने पासपड़ोस, यारदोस्त और नातेरिश्तेदार तक छीन लिए हैं. ऐसे में बचता है तो धर्मस्थल, जो हर कहीं मिल जाता है.

कहने को धर्मस्थल और मंदिर शांति देते हैं, हालांकि सब से ज्यादा बेचैनी और परेशानी यहीं जा कर महसूस होती है जो दिखती नहीं. यह परेशानी है खाली दिमाग वाले घर में किसी विचार को जगह देने की. ये विचार कर्मकांड के रूप में प्रदर्शित होते हैं. इफरात से मंदिरों में बैठे वृद्ध बेवजह की बातें यानी अज्ञात आशंकाओं को ले कर सोचते, घबराते रहते हैं और अपनी समस्याओं व परेशानियों का हल मूर्तियों यानी पत्थरों में ढूंढ़ने की गलती करने लगते हैं.

विकल्प हैं

इफरात से धर्मस्थल बनाए जाने की वजह यह है कि लोगों, खासतौर से वृद्धों, का पैसा निचोड़ा जा सके. वृद्धों की दयनीय हालत में परिवार और समाज की भूमिका एक अलग बहस का मुद्दा है पर यह बात वृद्धों के सोचने की है कि धर्मस्थलों में जा कर उन्हें क्या हासिल होता है. ‘चूंकि फुरसत है, इसलिए मंदिर चलें’ वाली सोच न केवल उन के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए घातक साबित होती है.

धर्मस्थलों में मोक्ष और मुक्ति का झूठा आश्वासन मिलता है जिस के लिए कीमती वक्त और पैसा बरबाद करने की मानसिकता से किसी को कोई फायदा नहीं होता. उलटे, सामाजिक माहौल और बिगड़ता है. जो वृद्ध खुद को बोझ और अनुपयोगी मान लेते हैं वे एक दफा अगर खुद की ताकत व उपयोगिता पर गौर करें तो वे वाकई समाज और देश के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं. मंदिर के बाहर गिड़गिड़ाते भिखारी को दोचार रुपए दे देना समस्या का हल नहीं है, बल्कि यह पुण्य कमाने का भ्रम या अहंकार भर है.

जवानी और अधेड़ावस्था में जिस वक्त की कमी का रोना वे रोते रहते थे अब जब वह बहुतायत से मिलता है तो क्यों नहीं वे समाजोपयोगी या मनपसंद काम करते. ऐसा नहीं है कि उन की इच्छाशक्ति खत्म हो गई है, बल्कि सच यह है कि धर्मस्थलों में लगातार जाजा कर वे अंधविश्वासों और आशंकाओं की जकड़न में आ जाते हैं.

इस जकड़न से मुक्ति के कई उपाय हैं. इन में से पहला, किसी के लिए कुछ करना और कोई न मिले तो खुद के लिए जीना है. समाज कई जरूरतों का मुहताज है, अधिकांश लोग हैरानपरेशान हैं, ऐसे में बुजुर्ग काफीकुछ कर सकते हैं.

वे गरीब बस्तियों में जा कर बच्चों को पढ़ा सकते हैं, सड़क के किनारे पेड़ लगा कर पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं, जो पैसा दानदक्षिणा में बरबाद करते हैं उस से बीमारों और निशक्तों की मदद कर सकते हैं. लेकिन बजाय ऐसे रचनात्मक और सृजनात्मक काम करने के, वे धर्मस्थलों में वक्त जाया करते हैं. ऐसे में उन पर तरस ही आना स्वभाविक है.

देश में, अपवादस्वरूप ही सही, ऐसे भी वृद्ध हैं जो अपनी उपयोगिता और महत्ता बनाए हुए हैं. ये वे वृद्ध हैं जिन्होंने अनुभव और वक्त का सही इस्तेमाल किया है. रेलवेस्टेशनों पर प्यासों को पानी पिलाना वक्त का सही इस्तेमाल नहीं, तो क्या है. रिटायर्ड लोग अगर रचनात्मक काम और समाजसेवा करने लगें तो देश की हुलिया बदलने में देर नहीं लगने वाली. अगर हरेक वृद्ध वक्त का सही इस्तेमाल करते हुए स्कूलों में जा कर बच्चों को पढ़ाए तो इस से बड़ा पुण्य कोई और हो ही नहीं सकता.

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक पुस्तकालय संचालित करने वाले देवेंद्र शर्मा बताते हैं, ‘‘यह हैरत की बात है कि किताबों और पत्रिकाओं में छिपे और छपे ज्ञान के खजाने को हासिल करने के बजाय वृद्ध मंदिरों में घंटा बजाया करते हैं जबकि पुस्तकालय निशुल्क हैं. मंदिरों में जाने पर कुछ न कुछ पैसा चढ़ाना ही पड़ता है.’’

एक बार दृढ़ और निष्पक्ष हो कर अगर बुजुर्ग अपनी किशोरावस्था व युवावस्था के संकल्पों को याद कर उन पर अमल करने की हिम्मत जुटा पाएं तो देखेंगे कि उन का सपना धर्मस्थल, पूजापाठ और आडंबर तो कतई नहीं थे. उन का सपना भ्रष्टाचार और भेदभावमुक्त देश था जिसे बनाने के लिए यह बेहतर वक्त है. बुढ़ापा  कोई अभिशाप नहीं, बल्कि वह उन्हें कुछ करगुजरने का मौका देता है. यह मौका अगर धर्मस्थलोें में जा कर खुद को दिया जाने वाला धोखा बन रहा है तो सच है कि फिर कोई क्या कर लेगा.

तो इस वजह से बदली गई उमा भारती की कुर्सी

बात भले ही हल्के ढंग से कही गई हो पर है सच्ची. सोशल मीडिया पर वायरल होती पोस्ट की बातों पर यकीन करें तो उमा भारती की कुर्सी उनके बड़बोलेपन की वजह से बदली गई. उमा भारती को जब गंगा संरक्षण विभाग का मंत्री बनाया गया था तो उमा भारती ने बयान दिया था कि वह गंगा को स्वच्छ और निर्मल करके ही दम लेंगी अगर ऐसा नहीं कर पाई तो पहले पद यात्रा करेंगी बाद में अपना जीवन त्याग देंगी.

उमा भारती ने यह बात औन रिकार्ड कही और कई बार कही थी. केन्द्र सरकार के 3 साल बीत चुके हैं. गंगा में पानी के जहाज को चलाने और उसके जरीये यातायात का रास्ता खुलना तो दूर की बात है अभी तक गंगा की सफाई का कोई अतापता नहीं है. पूरे देश में गंगा की सफाई का दावा करने वाला गंगा जल सरंक्षण विभाग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में भी गंगा को पूरी तरह से साफ नहीं कर सका.

गंगा सफाई को लेकर सरकारी दावे और हकीकत में जमीन आसमान का अंतर है. बाकी बचे 2 साल में गंगा कितना साफ होगी यह पता चल रहा है. ऐसे में केन्द्र सरकार को हो सकता है कि इस बात का डर रहा हो कि गंगा सफाई के मुद्दे को विरोधी दल उमा भारती के जीवन देने वाले बयान से जोड़कर केन्द्र सरकार की आलोचना न शुरू कर दें. खासतौर पर जिस तरह से सोशल मीडिया पर इस मुद्दे ने जोर पकड़ा उससे यह साफ हो गया कि गंगा सफाई को लेकर उमा भारती के बहाने केन्द्र सरकार को घेरना सरल हो गया था. विभाग बदले जाने के बाद उमा भारती यह कह सकती हैं कि उनको पूरा मौका नहीं मिला इसलिये वह गंगा को साफ नहीं कर पाईं.

पिछले लोकसभा चुनाव के प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद भी गंगा की सफाई को एक बडा मुद्दा बनाया था. इसके लिये खुद वाराणसी से लोकसभा का चुनाव लडा. प्रधानमंत्री ने उस समय अपने हर चुनावी भाषण में गंगा का जिक्र करते हुए कहा कि उनको मां गंगा ने बुलाया है. वह गंगा को साफ करके ही रहेगे. गंगा के लिये बहुत बड़ी बड़ी योजनाओं का जिक्र हुआ. उमा भारती को गंगा संरक्षण मंत्री बनाया जिससे लोगों को यह लगे कि साध्वी के गंगा मंत्री बनने से गंगा का भला होगा. उमा भारती ने भी उसी तर्ज पर बयान दिया कि अगर वह मंत्री रहते गंगा को साफ नही कर पाई तो गंगा में डूब कर जान दे देंगी. अब गंगा तो साफ हुई नहीं ऐसे में उमा भारती को अपने बयान से बचाने के लिये केन्द्र सरकार ने उनका विभाग बदल दिया.

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