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पश्चिम बंगाल : फर्जी और चिटफंड कंपनियों का केंद्र

कई वर्षों से फर्जी और चिटफंड कंपनियों का केंद्र रहा है पश्चिम बंगाल. दूसरे राज्यों से ज्यादा, चिटफंड कंपनियों ने बंगाल को अपना आशियाना बनाया और परवान चढ़ने के साथसाथ जनता को लूटने का काम किया. पश्चिम बंगाल में फर्जी कंपनियों की शुरुआत वास्तव में वाम मोरचा के शासनकाल में हुई.

वाम मोरचा सरकार के ढीले रवैए के कारण ज्यादातर चिटफंड कंपनियों ने यहां अपना डेरा जमाया और लालच दे कर जनता को लूटने का काम शुरू कर दिया. यहां की जनता को एक के बाद एक सब्जबाग दिखाए गए और उन की जेबें खाली कर दी गईं. ये चिटफंड कंपनियां अभी परवान चढ़ ही रही थीं कि पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो गया.

चिटफंड कंपनियां पसोपेश में थीं कि नई सरकार के आने से उन का धंधा कहीं मंदा न पड़ जाए, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, बल्कि चिटफंड कंपनियों का धंधा और भी चोखा हो उठा. फिर तो तमाम चिटफंड कंपनियों की पांचों उंगलियां घी में सन गईं.

तृणमूल कांग्रेस की नई सरकार ने उन्हें रोकने के बजाय उन का हौसला बढ़ाया. परिणामस्वरूप चिटफंट कंपनियों का कारोबार इतनी तेजी से बढ़ा, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. दरअसल, सत्तासीन पार्टी के नेताओं और मंत्रियों ने चिटफंड कंपनियों के कार्यक्रमों में धड़ल्ले से जाना शुरू कर दिया. लिहाजा, फर्जी और चिटफंड कंपनियों का सीना इतना चौड़ा हो गया कि पूछिए मत. इन कंपनियों के लोग दिनदूनी रातचौगुनी तरक्की करने लगे. साथ ही, सत्तासीन पार्टी के मंत्रियों और नेताओं को भी भरपूर फायदा होने लगा. पार्टी फंड गुलजार रहने लगा.

उधर प्रदेश की भोलीभाली जनता का विश्वास भी इन कंपनियों पर तेजी से बढ़ने लगा, क्योंकि उन के जनप्रतिनिधि भी चिटफंड कंपनियों के कार्यक्रमों में खुलेआम जाने लगे. यहां तक कि प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्र्जी भी इन कंपनियों के समारोहों में जाने लगीं. इस से जनता का भरोसा और भी दृढ़ हो गया.

बंगाल की जनता को लगने लगा कि जब उन की मुख्यमंत्री तक चिटफंड कंपनियों के साथ हैं, तो उन का पैसा बिलकुल सुरक्षित है. मगर, उन्हें यह नहीं पता था कि ये तमाम चिटफंड कंपनियां उन्हें धोखा दे रहीं हैं. सच तो यह है कि ममता बनर्जी के शासनकाल में बंगाल फर्जी कंपनियों का एक बड़ा केंद्र बन गया.

ममता बनर्जी ने भले ही इन कंपनियों का बहुत ज्यादा फायदा नहीं उठाया हो मगर उन के सिपहसालारों ने तो अति ही कर दी. जांच के बाद अब एक के बाद एक परत उघड़ रही है. कई चेहरे बेनकाब हुए. अभी और चेहरे बेनकाब होने बाकी हैं.

लुट गई जनता

अफसोस की बात यह भी है कि जब तक इन चिटफंड कंपनियों का चेहरा सामने आया, तब तक जनता पूरी तरह लुट चुकी थी. करोड़ों रुपए बाजार से उठा लिए गए थे. लोग करें भी तो क्या करें. चिटफंड कंपनियों के दफ्तरों के बाहर लटके ताले बुरी तरह उन का मुंह चिढ़ा रहे थे. कंपनियों के एजेंट और अधिकारी तक फरार. बंद पड़े दफ्तरों के सामने महज शोरशराबा कर के लौट आने के सिवा और कोई रास्ता भी नहीं बचा था लुटेपिटे लोगों के पास.

पुलिस को रिपोर्ट कर के भी कोई फायदा नहीं और सत्तासीन पार्टी के वे नेता व मंत्री भी ऐसे पल्ला झाड़ने लगे मानो उन कंपनियों से उन का कोई संबंध ही नहीं था. भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का कहना है, ‘‘तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों ने चिटफंड कंपनियों से जम कर फायदा लिया. छोटेछोटे कार्यक्रमों के लिए बड़े डोनेशन लिए गए. ममता सरकार ने

इन कंपनियों को शह दी. इसी का नतीजा है कि आज लोगों के करोड़ों रुपए डूब गए. पाईपाई जोड़ कर लोगों ने हजारोंलाखों रुपए जमा किए लेकिन मिला कुछ भी नहीं.’’ गौरतलब है कि सारदा घोटाले के बाद ममता सरकार ने लोगों को उन के पैसे लौटने का वादा भी किया. मजे की बात तो यह है कि प्रदेश के कुछ हिस्सों में टीएमसी के नेताओं और मंत्रियों ने लोगों में चैक भी बांटे. मगर तकरीबन सारे चैक बाउंस हो गए. इस के बाद भी बेशुमार वादे और दावे किए गए मगर सभी बेकार साबित हुए.

आज भी यहां के लोग उस घड़ी को कोस रहे हैं जब ज्यादा पाने के लालच में उन्होंने अपने जीवन की गाढ़ी कमाई तक चिटफंड कंपनियों को दे दी. आखिर, मिला कुछ भी नहीं.

एक सर्वेक्षण के मुताबिक, बंगाल में बीसियों चिटफंड कंपनियों ने अपने पैर जमाए और यहां की जनता को खूब सब्जबाग दिखाए. कमाल की बात है कि मां, माटी व मानुष का नारा देने वाली ममता सरकार ने चिटफंड कंपनियों को इतनी शह दे दी कि उन के प्रदेश में मानुष कंगाल हो गए. लोगों ने बेटियों की शादी तक के लिए रखे रुपए चिटफंड कंपनियों में लगा दिए ताकि उन्हें मोटी रकम मिल सके. मगर कंपनियों ने तो उन्हें लूट ही लिया.

टीएमसी के शासन में औद्योगिक विकास की दिशा में कोई सार्थक निवेश तो नहीं हुआ, फर्जी कंपनियां कुकुरमुत्ते की तरह जरूर बढ़ीं. एक दौर था जब इन फर्जी कंपनियों का इतना बोलबाला था कि लोग बैंक और पोस्टऔफिस तक जाना भूल गए थे. याद था तो बस चिटफंड कंपनियों का दफ्तर.

दरअसल, लोगों को इतने ऊंचेऊंचे सपने इन फर्जी कंपनियों ने दिखा दिए कि उन की आंखों पर लालच का मोटा परदा पड़ गया. ऊपर से सत्तासीन पार्टी के नेताओं ने उन के कार्यक्रमों में जाजा कर उन के परदे को और मोटा कर दिया.

मजे की बात तो यह है कि करोड़ोंअरबों रुपए बाजार से उठाने वाली इन कंपनियों के पास आज लौटाने को कुछ भी नहीं है. सरकार के पास लोगों ने लगातार शिकायतें भी कीं लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. बस, जांच चल रही है. आप को बताता चलूं यहां ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी जिंदगीभर की कमाई इन कंपनियों में लगा दी. उन का रुपया मिल पाएगा या नहीं, इस का जवाब किसी के पास नहीं.

हालांकि, विमुद्रीकरण के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से एक टास्क फोर्स का गठन किया गया. टास्क फोर्स ने इन चिटफंड कंपनियों पर लगाम लगाते हुए कार्यवाही शुरू की. टास्क फोर्स के मुताबिक, नवंबर-दिसंबर, 2016 के दौरान ऐसी कंपनियों की ओर से 1,238 करोड़ रुपए बैंकों में जमा हुए हैं. इस में कुछ विशेषज्ञों की मदद ली गई है. लगभग 54 सौ करोड़ रुपए ठिकाने लगाए गए.

इस मामले में ईडी कोलकाता

90 फर्जी कंपनियों की जांचपड़ताल में जुटा हुआ है. इस में टीएमसी के कुछ नेताओं की भी मिलीभगत है. सीबीआई इस मामले को ले कर काफी सक्रिय है और जल्दी ही जांच की कार्यवाही में और भी तीव्रता आने की आशा है. सीबीआई पूर्ण जांच कर के मुकदमा दायर करने वाली है.

बंगाल में 2011 से 2015 के बीच 17 हजार चिटफंड कंपनियों का रजिस्ट्रेशन हुआ. दरअसल, भारत में कुल 15 लाख कंपनियां रजिस्टर्ड हैं, जिन में से लगभग

6 लाख कंपनियां ही नियमित आय का रिटर्न फाइल करती हैं. इन में से लाखों कंपनियां महज कागजों पर ही हैं, जिन्हें फर्जी कंपनी कहा जाता है.

गौरतलब है कि चिटफंड कंपनियों की तरह ही फर्जी कंपनियां भी सब से ज्यादा पश्चिम बंगाल में हैं. इन का इस्तेमाल काली कमाई को सफेद और सफेद को काला करने के लिए किया जाता है. पश्चिम बंगाल में पनप रही फर्जी कंपनियों की चर्चा एसआईटी ने भी की है. एसआईटी की नजर कालेधन पर रहती है. एसआईटी ने इस का खुलासा किया है, मगर इस पर उचित कार्यवाही भी होनी चाहिए. हालांकि, सेबी के रडार पर दर्जनों चिटफंड कंपनियां हैं.

फर्जी कंपनियां बंगाल में ही क्यों

पश्चिम बंगाल, विशेषकर कोलकाता शहर और आसपास के शहरों में चिटफंड से संबंधित काम करने वाले प्रोफैशनल्स और ऐक्सपर्ट्स काफी हैं. दरअसल, पश्चिम बंगाल में व्यापारिक एवं औद्योगिक विकास का ग्राफ बहुत कम हो गया है. यही कारण है कि सीए तथा अकाउंट्स ऐक्सपर्ट्स व प्रोफैशनल्स के पास काम नहीं है और वे काफी सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं.

1 करोड़ रुपए पर 24 प्रतिशत टैक्स देने के हिसाब से 24 लाख रुपए लगते हैं, लेकिन कोलकाता में किसी भी अकाउंट्स कंपनी के औपरेटर को 50 हजार रुपए दीजिए, वह आप के टैक्स के 24 लाख रुपए बचा देता है. एक सर्वेक्षण के अनुसार, कोलकाता में ऐसी हजारों कंपनियां हैं, जिन के लिए 6 हजार से ज्यादा चार्टर्ड अकाउंटैंट्स गैरकानूनी तरीके से काम करते हैं.

जब ऋषि कपूर को आया गुस्सा और सबके सामने जड़ दिया रणबीर को थप्पड़

आज बौलीवुड के सदाबहार स्टार ऋषि कपूर का जन्मदिन है. 4 सितम्बर 1952 को पैदा हुए ऋषि कपूर आज 65 वर्ष के हो गये हैं. उन्होंने इस बार अपना जन्मदिन रात 12 बजे पत्नी नीतू और नातिन समारा के साथ घर पर बनाया हुआ केक काटकर मनाया. दोनों की तस्वीर नीतू कपूर ने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर की है. समारा अभिनेता रणबीर कपूर की बड़ी बहन रिद्धिमा की बेटी हैं.

उनके बर्थडे के इस मौके पर हम आपको बता रहे हैं ऋषि कपूर की लाइफ से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें-

ऋषि को नेशनल फिल्म अवार्ड मिला

ऋषि ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट पहली बार पापा राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) में काम किया था. इसके लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवार्ड भी मिल चुका है. हालांकि ऋषि की बतौर हीरो पहली फिल्म ‘बौबी’ (1973) रही, जिसने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया था.

फ्लर्ट करने का मौका नहीं छोड़ते थे ऋषि

ऋषि की लाइफ में नीतू सिंह के आने के बाद भी वह अन्य एक्ट्रेसेस के साथ फ्लर्ट करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते थे. ऋषि की लाइफ में नीतू के आने से पहले उनका अफेयर एक्ट्रेस यास्मिन के साथ 5 साल तक चला और फिर ब्रेकअप हो गया. इसके बाद उन्हें डिंपल कपाड़िया से प्यार हुआ.

नीतू को ऋषि के अफेयर्स के बारे में पता था और जब वो पकड़े जाते थे तो साफ मना कर देते थे. एक इंटरव्यू में नीतू ने बताया था कि मैं इतनी भोली थी इसलिए उनकी बातों में आ जाती थी. वो जानते थे कि मैं एक सिंपल लड़की हूं और उन्हें संभाल लूंगी.’ नीतू का कहना था कि ऋषि मुझे भोली समझ कर डोमिनेट करने की पूरी कोशिश करते थे.

स्ट्रिक्ट ब्वायफ्रेंड थे ऋषि

ऋषि काफी स्ट्रिक्ट ब्वायफ्रेंड थे. जब नीतू उनकी गर्लफ्रेंड बनीं तो वो उन्हें रात 8.30 के बाद शूटिंग की इजाजत नहीं देते थे.

ऋषि को छोड़ने के बाद सैलून चलाने लगी थीं उनकी पत्नी नीतू

ऋषि और नीतू 1973 से 1981 तक एकसाथ 12 फिल्मों में काम किया. इसी बीच दोनों में प्यार हुआ और लंबे टाइम तक डेटिंग के बाद 22 जनवरी 1980 में उन्होने शादी कर ली. शादी के बाद दोनों के दो बच्चे बेटी रिद्धिमा और बेटा रणबीर हुआ. लेकिन 1990 से इनके रिश्तों में काफी सारी परेशानियां आने लगीं, जिसकी वजह ऋषि की शराब बनीं. खबरें आईं कि शराब के नशे में उन्होंने नीतू पर कई बार हाथ भी उठाया. इस वजह से परेशान होकर नीतू ने लीगल कदम उठाया और अपने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस दर्ज करा दिया. यही नहीं नीतू, ऋषि से इतना परेशान हो गई थीं कि उन्होंने घर छोड़ दिया.

नीतू ने शादी के बाद फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था, ऐसे में उन्होंने खुद का सैलून खोलकर पैसे कमाना शुरू कर दिया था. कुछ टाइम बाद दोनों के रिश्तों में परेशानियां थोड़ी कम हुईं और नीतू ने वापस आकर पति ऋषि और बच्चों को संभालना बेहतर समझा.

संजय को शक था कि उनकी गर्लफ्रेंड के साथ ऋषि का अफेयर है

ऋषि कपूर ने ‘खुल्लम खुल्ला: ऋषि कपूर अनसेंसर्ड’ में संजय दत्त और टीना मुनीम (उस दौरान संजय की गर्लफ्रेंड) से जुड़ा एक चौंकाने वाला खुलासा किया है.

बायोग्राफी में ऋषि बताते हैं, एक एक्ट्रेस के तौर पर टीना मुनीम ने परदे पर अपना एक अलग आकर्षण बनाया था. मैंने उनके जैसी किसी दूसरी माडर्न और खूबसूरत को-एक्ट्रेस के साथ कभी काम नहीं किया. लोग कहते थे कि हम स्क्रीन पर अच्छे लगते हैं. फिल्म ‘कर्ज’ में हमने स्क्रीन शेयर की और यह फिल्म मेरे दिल के काफी करीब है. हमारी बढ़ती दोस्ती और साथ आ रही फिल्मों की वजह से सीक्रेट अफेयर की खबरें उड़ीं. उस दौर में मीडिया एक्टिव नहीं थी, लेकिन लोगों ने कहानियां बनानी शुरू कर दी थी. तब मैं शादीशुदा नहीं था और टीना का अफेयर संजय दत्त के साथ था. संजय इन खबरों से वाकिफ थे. उस दौरान में वे ड्रग्स लेते थे और एक दिन गुलशन (ग्रोवर) के साथ नीतू कपूर के पाली स्थित अपार्टमेंट में उनसे झगड़ने पहुंच गए.

बुक में ऋषि लिखते हैं, गुलशन ने मुझे बाद में बताया कि ‘रौकी’ की शूटिंग के दौरान संजय नीतू के घर झगड़ने पहुंच गए थे. लेकिन नीतू ने इस सिचुएशन को बेहतरीन तरीके से संभाला. उन्होंने संजू को समझाया कि वे बातें महज अफवाहें हैं. टीना और चिंटू के बीच ऐसा कुछ नहीं है. वे सिर्फ अच्छे दोस्त हैं. इंडस्ट्री में रहते हुए तुम्हें अपनों पर भरोसा करना सीखना चाहिए.

जब रणबीर को ऋषि ने जड़ दिया था थप्पड़

डायरेक्टर राज कपूर की फिल्म ‘प्रेम रोग’ 31 जुलाई 1982 को रिलीज हुई थी. फिल्म में ऋषि कपूर के अपोजिट पद्मिनी कोल्हापुरे नजर आई थीं. इस फिल्म की रिलीज के दो महीने बाद यानी 28 सितंबर 1982 को रणबीर कपूर का जन्म हुआ था. रणबीर अपने पापा ऋषि के फैन हैं.  रणबीर ने एक इंटरव्यू में बताया था, पापा के अलग-अलग तरह के किरदारों को देखना मुझे काफी अच्छा लगता है. पापा कभी मुझ पर नहीं चिल्लाए लेकिन बचपन में जब मैं करीब 12 साल का था तब पापा ने मुझे एक बार बहुत जोरो का चांटा मारा था, क्योंकि मैं जूते पहनकर पूजा रूम में चला गया था.

फिल्मी हस्तियों ने उन्हें ट्विटर पर जन्मदिन की बधाई दी

अमिताभ बच्चन : जन्म दिन मुबारक चिंटू जी. प्यार और खुशी हमेशा, चिंटू. हमने साथ में कुछ बड़ी फिल्में की हैं.

अभिषेक बच्चन :जन्मदिन मुबारक हो. आपका दिन बढ़िया रहे, ढेर सारा प्यार.

हुमा कुरैशी : जन्मदिन मुबारक ऋषि कपूर. आपको दुनियाभर की खुशियां मिले.

साजिद खान :जन्मदिन मुबारक हो ऋषि कपूर जी. एक ऐसे मित्र, जिनकी मैं हमेशा प्रशंसा करता हूं.

रितेश देशमुख :जन्मदिन मुबारक ऋषि सर. आपसे सीखने के लिए बहुत कुछ है. आपके साथ काम करने का मौका मिलने पर खुश हूं, बहुत प्यार.

इस क्रिकेटर के प्यार में क्लीन बोल्ड हुईं परिणीति चोपड़ा

क्रिकेट और बौलीवुड का रिश्ता काफी पुराना है. कई दिग्गज खिलाड़ी फिल्मी हसीनाओं के हुस्न में क्लीन बोल्ड हो चुके हैं. चाहे विराट कोहली हों, हरभजन सिंह या युवराज सिंह हों.

अब बहुत जल्द इस लिस्ट में एक नया नाम जुड़ने वाला है. जी हां अगर सोशल मीडिया पर चल रही खबरों की मानें तो हार्दिक पांड्या और परिणीति चोपड़ा आपको चौंका सकते हैं.

दरअसर परिणीति चोपड़ा ने सोशल मीडिया पर एक फोटो शेयर की है जिसके साथ उन्होंने कैप्शन लिखा-सबसे अमेजिंग पार्टनर के साथ परफेक्ट ट्रिप, प्यार हवाओं में है.

इसके जबाव में हार्दिक ने ट्वीट किया, क्या मैं अनुमान लगा सकता हूं? लगता है यह अगला बौलीवुड और क्रिकेट लिंक है. वैसे फोटो अच्छी खींची है.

परिणीति ने हार्दिक को जवाब देते हुए लिखा, ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी. वैसे ये राज इस फोटो में ही छुपा है.

हालांकि हार्दिक को लोगों ने ट्रोल भी किया और लिखा ये सब करने से अच्छा है अपने खेल पर ध्यान दो. हार्दिक इन दिनों भारतीय टीम के साथ श्रीलंका दौरे पर हैं.

हालांकि बाद में परिणीति ने बाद में साफ किया कि जिस पार्टनर की चर्चा उन्होंने की थी वह कोई और नहीं, बल्कि श्याओमी का आना वाला फोन 5x है.

बेटा जब विदेश चला जाए तो न हों अवसाद के शिकार

समाज में एक नई पीड़ा इस तथ्य से पैदा हो रही है कि बेटा पढ़लिख कर विदेश चला जाता है और देश में मातापिता अकेले रह जाते हैं. ऐसे अकेले रह जाने वालों की संख्या अब इतनी बढ़ गई है कि वे नजर आने लगे हैं. बेटे के फोन की प्रतीक्षा करते हुए वे यह सोच कर परेशान रहते हैं कि उन के मरने पर उन का अंतिम संस्कार करने के लिए बेटा समय पर आएगा या नहीं. इस से उन के मन में अवसाद का गंभीर भाव बराबर बना रहता है.

विदेशों में काम करने वाले कुछ बेटे सालदोसाल में एकाध बार देश आते हैं और मातापिता को देख जाते हैं, तो कुछ मातापिता को वहीं बुला लेते हैं लेकिन कुछ बेटे कईकई साल नहीं आते और लगने लगता है कि वे अब वहीं बस जाएंगे. यह विचार इतना पीड़ादायक होता है कि मातापिता इसे सह नहीं पाते और समय से पहले ही मर जाते हैं.

हकीकत चाहे जो भी हो, दुख का बोझ मातापिता को ही ढोना पड़ता है. छुट्टी ले कर बेटा लौटता है और देश में 2-4 हफ्ते रह कर वापस चला जाता है तो बिछोह का दुख मातापिता में और बढ़ जाता है. मातापिता बेटे के पास खुद जाते और कुछ दिनों उस के साथ रह कर देश लौटते हैं तो भी वे इसे सहन नहीं कर पाते हैं. फिर खर्च का सवाल तो उठता ही है. कुछ विदेशी सरकारों को भी यह रास नहीं आता कि लोग आते रहें और उन के यहां बसते रहें.

विदेशों में जा कर पढ़ने, नौकरी करने और वहीं बस जाने वाले बेटों में अधिकतर मध्यवर्गीय परिवारों के होते हैं. उन के पारिवारिक संबंध बहुत गहरे होते हैं. वे देश में मातापिता के संग बिताए गए दिनों को भूल नहीं पाते, इसलिए देश लौटने की इच्छा उन के मन में बराबर बनी रहती है. नौकरी या किसी और मजबूरी के चलते लौट नहीं पाते, इस कारण वे तनावग्रस्त भी रहते हैं. इधर मातापिता को भी इस बात का आभास रहता है कि विदेश में उन का बेटा उन्हें याद करता रहता है. इस से उन का दुख बढ़ता है. वे किसी से कुछ कह नहीं पाते और भीतर ही भीतर घुटते रहते हैं.

मध्यवर्गीयों की पीड़ा बहुतकुछ उन की बंद मानसिकता से भी पैदा होती है. इस बात को वे पचा नहीं पाते कि उन का बेटा विदेश चला गया है. वे खुश होते हैं कि उन का बेटा वहां डौलर या पाउंड कमा रहा है. शान से लोगों को सुनाते भी हैं पर मन ही मन वे दुखी रहते हैं. जो खुशी व गर्व वे यह बताने में महसूस करते हैं कि उन का बेटा अमेरिका, कनाडा या इंगलैंड में है, वह जल्दी ही काफूर हो जाती है. बस, एक असलियत यह बाकी रह जाती है कि वे उस से अलग हैं और ऐसी उम्र में अलग हैं जब उन को उस की सब से अधिक जरूरत है.

फिर अपने को सुखी दिखाने का एक ढोंग भी वे करने लगते हैं जिस से उन की भीतरी पीड़ा और बढ़ जाती है. घर आनेजाने वालों को वे अपने बेटेबहू के विदेश से भेजे गए फोटो और उपहार आदि दिखा कर यह बताने की कोशिश करते हैं कि वे वहां कितने सुखी हैं. बातबात में यह भी बता देते हैं कि बेटेबहू वहां हमारे पोतेपोती को बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ा रहे हैं. घर खरीद लिया है या बनवा लिया है. 2 कारें हैं, एक बहू चलाती है, दूसरी बेटा.

जाहिर है, वे जब यह सब कहते हैं तो उन का दिल धकधक करता है और वह न जाने कितनी आशंकाओं से भर जाता है. तब उन की बस, एक ही इच्छा रह जाती है कि बेटा लौट आए, चाहे वह यहां गरीबी ही में रहे पर हमारे पास तो रहे.

सचाई को समझें

बेटा जब विदेश में कुछ साल रह लेता है और उस के बालबच्चे हो जाते हैं तो उस के परिवार का संपर्क देश की भाषा व संस्कृति से टूटने लगता है. कुछ दिनों में उन का उच्चारण, खानपान और पहनावा आदि भी बदलने लगता है. इसे आप बहुत शान की चीज न समझें और इस की वजह से न कोई हीनभावना ही मन में पनपने दें. स्वाभाविक प्रक्रिया में होने वाले ये बदलाव आप के भीतर कोई ग्रंथि न पैदा करें, इस का आप पूरा ध्यान रखें.

वे कभी कुछ दिनों के लिए देश वापस आएं और लोग उन के विदेशीपन या अंगरेजियत पर छींटाकशी करें तो समझ लें कि लोगों के मन में कोई और बात नहीं, बस, जलन है और इसे ले कर कहीं कोई तनाव न पैदा होने दें. नतीजा तब महज यह होगा कि बच्चे आप के अपने देश, देश की बोली और देश के लोगों से कतराने व देश के खानपान को बुरा समझने लगेंगे.

झूठ न बोलें कि विदेश में आप का बेटा क्या करता है. बढ़ाचढ़ा कर की गई बात पीठपीछे मजाक का कारण बन सकती है. राहुल गुप्ता अपने मिलने वालों से बताते कि उन का बेटा नौर्वे में एक डिपार्टमैंटल स्टोर का मालिक है. बाद में पता चला कि वह वहां सेल्समैन है. फिर झूठमूठ यह भी न बताएं कि वह कितना कमाता है और आप को हर महीने कितने सौ डौलर या पाउंड भेजता है. जो भेजता है वह आप के चेहरे पर लिखा होता है और आप के रहनसहन में झलक जाता है. नहीं भेजता या नहीं भेज पाता तो वह शर्म की बात न समझें. इसे जीवनक्रम के एक अनिवार्य सत्य के रूप में लें तो आप ढेर सारी उलझनों से बच जाएंगे.

ध्यान रहे कि बेटा विदेश में नौकरी कर रहा है तो वह हमेशा सुख नहीं भोग रहा है. वहां उस की अपनी परेशानियां होती हैं. उन से वह जूझ रहा होता है. वहां के लोग पैसा देते हैं तो कड़ी मेहनत कराते हैं, काम में जरा सी भी कमी आई कि नौकरी गई.

बच्चे की पढ़ाई, छुट्टी का न मिलना, अस्पताल आदि का खर्च, इंश्योरैंस का प्रीमियम, टैक्स, गाड़ीमकान की किस्तें आदि इतने आर्थिक झंझट रहते हैं कि पैसे की कमी बनी रहती है. फिर भी अगर आप को शिकायत है कि वह आप का ध्यान नहीं रखता तो यह महज मायामोह है, न कि यथार्थवादी दृष्टिकोण.

आप ने बेटे को पढ़ालिखा कर विदेश में काम करने और पांव जमाने के लायक बनाया. यही आप का सब से बड़ा पुरस्कार है. व्यर्थ में चिंता करना कि वह बहुत दिनों से आया नहीं या आया तो चला जाएगा, बढ़ती उम्र में आप को बीमारियों की ओर ले जाएगी जिस से आप तो परेशान रहेंगे ही, विदेश में बसे बेटे के कामधंधे की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी.

सुहास दंपती का लड़का अमेरिका से छुट्टी पर आया. वह ड्राइंगरूम को जिस तरह सजा कर वापस चला गया, वह कई महीने बीत जाने पर भी वैसा का वैसा ही सजा पड़ा है. कुशन और तकिए वह जहां रख गया था, उसे वहीं तब तक रहने दिया जाएगा जब तक वह दोबारा आ कर उसे फिर से न सजा जाए. सुहास दंपती चाहते हैं कि उस की याद बनी रहे. दरअसल, यह स्वस्थ स्नेह नहीं, मायामोह की पराकाष्ठा है जो कभी किसी आकस्मिक रोग में भी बदल सकती है.

बेटे विदेश चले जाते हैं तो इस के कई कारण हैं. देश में उन की योग्यता के अनुसार काम और वेतन नहीं मिलता. वे देख चुके हैं कि उन के मातापिता को कितना झेलना और जूझना पड़ा है. जो निकम्मापन और भ्रष्टाचार उन्हें यहां सरकारी विभागों में दिखाई देता है उस से भी बच कर निकल जाना उन के जीवनदर्शन का एक हिस्सा हो जाता है. उन का मतलब यह कदापि नहीं होता कि वे अपने मातापिता को रोताबिलखता छोड़ जाएं. जमाने की इस सचाई से आप समझौता कर लें तो बेटे का विदेश जाना आप को नहीं खलेगा.

बच्चे जब छुट्टियों में घर आएं तो उन्हें न समझें मेहमान

पढ़ाई व नौकरी के सिलसिले में काफी बच्चे घर से बाहर रहने चले जाते हैं. मातापिता बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उन्हें भेज तो देते हैं लेकिन उन्हें हमेशा बच्चों के आने का इंतजार रहता है खासकर मां को. जब वे आते हैं तो मातापिता उन के लिए तरहतरह की तैयारियां करते हैं. बच्चों की हर इच्छा पूरी की जाती है.

कभीकभी तो ऐसा भी होता है कि जब बच्चे आते हैं तब मातापिता इतना ज्यादा ध्यान रखने लगते हैं कि बच्चे को घर में ऊबन होने लगती है. वे चिड़चिड़ा व्यवहार करने लगते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली सपना कहती हैं, ‘‘जब मैं घर जाने वाली होती हूं तब 3-4 दिनों पहले से ही मेरी मम्मी फोन पर पूछने लगती हैं, क्या बनाऊं, तुझे क्या खाना है, कब आ रही है. जब मैं घर पहुंचती हूं तो हर 10 मिनट पर कहती रहती हैं ये खा लो, वो खा लो, अभी ये कर लो. 1-2 दिनों तक तो मुझे अच्छा लगता है, लेकिन फिर मुझे गुस्सा आने लगता है. गुस्से में कईर् बार मैं कह भी देती हूं कि क्या मम्मी, आप हमेशा ऐसे करती हैं, इसलिए मेरा घर आने का मन नहीं करता.’’

बच्चों के आने की खुशी में मांएं अकसर ऐसा करती हैं. यह ठीक है कि आप अपने बच्चे से बहुत प्यार करती हैं, घर आने पर उसे हर सुखसुविधा देना चाहती हैं लेकिन कईर् बार इस स्पैशल अटैंशन की वजह से बच्चे बिगड़ भी जाते हैं. उन्हें लगने लगता है कि वे घर जाएंगे तो उन की हर इच्छा पूरी होगी तो वे इस बात का फायदा उठाने लगते हैं. कभीकभी तो वे झूठ बोल कर चीजें खरीदवाने लगते हैं. बात नहीं मानने पर वे मातापिता से गुस्सा हो जाते हैं और घर नहीं आने की धमकी देने लगते हैं. इसलिए, जरूरी है कि आप संतुलन बना कर रखें. बच्चों के साथ सामान्य व्यवहार करें ताकि उन्हें यह न लगे कि वे अपने घर के बजाय किसी गैर के यहां मेहमान के रूप में रहने आए हैं.

क्या न करें

हर समय इर्दगिर्द रहने की कोशिश न करें :  जब बच्चे घर आएं, उन से चिपके न रहें. हर समय उन के आसपास रहने की कोशिश न करें. इस बात को समझने की कोशिश करें कि अब आप के बच्चे अकेले रहते हैं, उन्हें अपने तरीके से जिंदगी जीने की आदत हो गई है. ऐसे में अगर आप रोकाटोकी करेंगी और हर बात के लिए पूछती रहेंगी कि क्या कर रहे हो, किस से चैट कर रहे हो, कौन से दोस्त से मिलने जा रहे हो, तो उन्हें अजीब लगेगा. वे आप के साथ रहना पसंद नहीं करेंगे. आप से कटेकटे रहेंगे. इसलिए उन्हें थोड़ा स्पेस दें. लेकिन हां, इस बात का ध्यान जरूर रखें कि वे आप से छिपा कर कोई गलत काम न कर रहे हों.

गुस्से के डर से न भरें हामी :  कई बच्चे ऐसे भी होते हैं कि जब पेरैंट्स उन की बात नहीं मानते तो वे गुस्सा हो जाते हैं, खानापीना छोड़ देते हैं. बच्चों की इन आदतों के चलते मातापिता उन की हर बात मान लेते हैं. वे नहीं चाहते कि छुट्टियों में बच्चे आए हैं तो किसी बात के लिए वे नाराज हों या गुस्सा करें और घर का माहौल खराब हो.

कई बार तो गुस्से के डर से मातापिता वैसी चीजों के लिए भी हामी भर देते हैं जो उन्हें पता है कि उन के बच्चे के लिए सही नहीं है. अगर आप ऐसा करते हैं तो करना बंद कर दें क्योंकि आप के ऐसा करने से बच्चे इस का फायदा उठा कर अपनी मनमानी करने लगते हैं.

हर वक्त खाना न बनाते रहें :  बच्चे जब घर आते हैं तो मांएं सोचती हैं कि ज्यादा से ज्यादा चीजें बना कर खिलाएं. इसी वजह से वे अपना पूरा समय किचन में खाना बनाने में बिता देती हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि वे कई तरह की डिशेज बनाती हैं लेकिन बच्चे कुछ भी नहीं खाते. ऐसे में वे उदास हो जाती हैं कि पता नहीं, क्यों नहीं खा रहा है, पहले तो रोता था ये चीजें खाने के लिए. लेकिन आज एक भी चीज नहीं खा रहा है.

उन का इस तरह से सोचना गलत है क्योंकि बाहर रहने पर बच्चों की खाने की आदत में थोड़ा बदलाव आ जाता है. वे एक बार में कई तरह की चीजें नहीं खा पाते हैं. इसलिए, बहुत सारी डिशेज बनाने के बजाय एक ही डिश बनाएं ताकि सब खा भी पाएं और वे अपने बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकें.

गलतियां कर के सीखने दें :  घर आने पर बच्चों को राजकुमार या राजकुमारी की तरह न रखें, बल्कि उन्हें तरहतरह के काम करने दें ताकि गलतियां करें और सीखें. यह न सोचें कि 4 दिनों के लिए आए हैं और आप ऐसी चीजें करवा रही हैं, बल्कि अगर वे आप के सामने काम करते हुए गलतियां करते हैं तो आप उन्हें सिखा सकती हैं. जरा सोचिए अगर वे अकेले में ऐसी गलतियां करेंगे तो क्या होगा. इसलिए, बेहतर है कि उन्हें छोटेछोटे काम करना सिखाएं.

तारीफ न करते रहें  :  अगर आप का बच्चा किसी कालेज में पढ़ाई कर रहा है या किसी अच्छी कंपनी में जौब करता है तो इस का यह मतलब नहीं है कि आप सब के सामने हमेशा उस की तारीफ करते रहें. ऐसा करने से बच्चों के अंदर घमंड आ जाता है.

भावनाएं न दिखाएं बारबार  :  बच्चे से कभी भी न कहें कि हम सब तुम्हें बहुत याद करते हैं, तुम्हारी मां तुम्हारे जाने के बाद रोती रहती है, कोई नहीं होता जिस से वे बात कर सकें. अगर कभी बच्चा भी अपनी किसी समस्या के बारे में बताता है तो उस से न कहें कि घर वापस आ जा, क्या जरूरत है परेशान होने की. इस से बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाते हैं. ऐसा करने से आप भी दुखी होती हैं और बच्चे भी.

समय को ले कर न हों पाबंद  :  घर में हर काम समय पर किया जाता है लेकिन जरूरी नहीं है कि बच्चे भी वही टाइमटेबल अपनाएं. इसलिए उन पर ऐसा कोई दबाव न डालें कि सुबह 6 बजे उठना है, देररात में घर से बाहर नहीं निकलना है, रात में टीवी नहीं देखना है आदि. बल्कि, उन्हें घर पर रिलैक्स होने दें.

बच्चों में न करें फर्क  :  ऐसा न करें कि बड़े बच्चे के आते ही छोटे बच्चे को भूल जाएं. वह कुछ भी कहें तो यह न कह दें कि तुम तो घर में ही रहते हो, तुम्हारी बहन इतने दिनों के बाद आई है. आप के ऐसा करने से बच्चों के बीच में दूरी आने लगती है. वे सोचते हैं कि इस के आते ही इसे तो स्पैशल ट्रीटमैंट मिलने लगता है और मुझ पर कोई ध्यान नहीं देता.

क्या करें

गलती करें तो हक से डांटें  :  बच्चे जब गलती करते हैं तब आप की जिम्मेदारी बनती है कि आप उसे अधिकारपूर्ण डांटे, क्योंकि आप की एक छोटी सी भूल या हिचक उस के आगे की जिंदगी खराब कर सकती है. इतना ही नहीं, अगर उस की कुछ गलत आदतों के बारे में आप को पता चले तो सोचने न बैठ जाएं कि आप का बच्चा गलत रास्ते पर चला गया है अब क्या करें. सोचने में समय बरबाद करने के बजाय उसे समझाने की कोशिश करें.

क्वालिटी टाइम दें  :  ऐसा न हो कि आप के बच्चे घर आएं तो भी आप अपने कामों में ही व्यस्त रहें, औफिस से देर से घर आएं, मेड से कह दें कि बच्चों का ध्यान रखें. ऐसा न करें क्योंकि आप के ऐसा करने से बच्चों को लगने लगता है कि घर आने से बेहतर तो वे वहीं रह लेते. इसलिए, बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. बेशक आप 1 घंटा ही समय साथ बिताएं, लेकिन उन के साथ दोस्त की तरह व्यवहार करें ताकि वे आप के साथ एंजौय करें.

जो बने वही खिलाएं  :  हर दिन कुछ स्पैशल बना कर बच्चों की आदत न बिगाड़ें. 1-2 दिन तो ठीक है लेकिन अगर आप हर समय स्पैशल खिलाती रहेंगी तो बच्चे की आदत बिगड़ जाएगी. जब वह वापस जाएगा तो वहां उसे ऐडजस्ट करने में समस्या होगी. उसे वहां का खाना अच्छा नहीं लगेगा.

पति की उपेक्षा न करें  :  बच्चे जब घर आते हैं तो सारा ध्यान इसी बात पर रहता है कि क्या बनाना है, बच्चों को क्या चाहिए. इन सब के बीच अगर पति कुछ कहते हैं तो आप का जवाब होता है कि हमेशा तो आप के लिए ही करती हूं, अभी तो मुझे मेरे बेटे के लिए करने दो. कुछ महिलाएं तो पति को पूरी तरह से इग्नोर कर देती हैं. आप ऐसा करने के बजाय दोनों को समय दें.

अगर आप अपने बच्चे को खास मेहमान समझती हैं तो इस के कई नुकसान हैं जिन के बारे में शायद ही आप का ध्यान कभी जाता होगा.

बच्चे होते हैं भावनात्मक रूप से कमजोर

घर पर मातापिता बच्चों को ढेर सारा प्यार देने की कोशिश करते हैं लेकिन वास्तव में वे ऐसा कर के बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाते हैं. जब बच्चे उन्हें छोड़ कर वापस जाते हैं तब उन का मन नहीं लगता. वे हर समय घर के बारे में ही सोचते रहते हैं. वे हर चीज की तुलना घर से करते हैं. ऐसे में उन्हें ऐडजस्ट करने में समस्या होती है.

बिगड़ता है बजट

बच्चों के आने पर उन के लिए तरहतरह के पकवान बनाती हैं, उन्हें शौपिंग करवाने ले कर जाती हैं, उन की पसंदीदा चीजें खरीदती हैं, लेकिन, इन सब चीजों से आप का बजट बिगड़ता है और बाद में आप को परेशानी होती है. कुछ मातापिता तो ऐसे भी होते हैं जो अपने बच्चों को खास ट्रीटमैंट देने के लिए पैसे उधार ले लेते हैं और बाद में उधार चुकाने में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

कुल मिला कर बच्चे जब बाहर से आएं तो उन्हें समय दें, प्यार दें लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं. उन्हें मेहमान न बनाएं, न उन्हें मेहमान समझें ताकि वे अनुशासित ही रहें और उन में व आप के बीच स्नेह और भी बढ़े.

आज की बचत देगी कल की सुरक्षा, आजमाएं ये आसान तरीके

अर्थशास्त्रियों का मत है कि जितना कमाएं उस में से 20 फीसदी पैसा भविष्य के लिए जमा करें. जो ऐसा नहीं करता वह अंत समय में आई परेशानी या अकस्मात आई मुसीबत के समय दूसरों का मुंह देखता है. ऐसे समय में सुनाने वाले या मदद देने वाले भी यही कहते हैं कि सारी जिंदगी कमाते रहे और खाते रहे. ऐश में सब उड़ाया लेकिन इस वक्त के लिए कुछ न बचाया.

जरूरी है कि शुरू से ही बचत की आदत डाली जाए, हाथ खींच कर पैसा खर्च किया जाए, अपनी कमाई में से जितना अधिक बचा सकें, बचाया जाए ताकि रिटायरमैंट के बाद जेब खाली न रहे. और कल सुरक्षित रहे.

बच्चों पर अंधाधुंध खर्च न करें :  अकसर पेरैंट्स अपने बच्चों के चेहरों पर मुसकान देखने के लिए उन की हर मांग पूरी करने की कोशिश करते हैं. चाहे उन के लिए उन्हें अपनी जमापूंजी खर्च करनी पड़े या फिर किसी से उधार लेना पड़े. ऐसा करने से बच्चे भले ही खुश हो जाएं लेकिन इस से नुकसान आप का ही होता है. एक बार अगर आप ने उन की जिद पूरी की तो अगली बार से वे आप के सामने फरमाइशों की लिस्ट रखनी शुरू कर देते हैं. तब, आप को, न चाहते हुए भी, उन्हें पूरा करना पड़ता है.

शुरू से ही कंट्रोल रखें यानी जब जरूरत हो, चीज तभी दिलवाएं. जैसे, अगर आप ने अपने बच्चे को 2 महीने पहले ही मोबाइल दिलवाया है और

4 महीने बाद बच्चा फिर कोई दूसरे मोबाइल की डिमांड करने लग जाए तो आप उस की इस मांग को पूरा न करें बल्कि शुरू से समझा कर चलें कि अगर हम आज बचा कर नहीं चलेंगे तो कल तुम्हें उच्च शिक्षा कैसे दिलवा पाएंगे. इस से वे आप को समझेंगे. लेकिन ऐसे प्रयास शुरूआत से करने जरूरी हैं.

बाहर के महंगे खाने से बचें :  आप की न्यूक्लियर फैमिली है और आप दोनों पतिपत्नी वर्किंग हैं. ऐसे में लेटनाइट घर आ कर खाना बनाना मुश्किल होता है और आप आएदिन बच्चों के  साथ रात का डिनर करने बाहर पहुंच जाते हैं. इतना ही नहीं, जब कभी भूख लगे तो घर से भी और्डर कर देते हैं. भले ही आप की सैलरी अच्छी है लेकिन आप की यह आदत न तो सेहत के लिहाज से सही है और न ही पौकेट के हिसाब से.

घूमने का साल में बनाएं एकाध प्रोग्राम :  बच्चों की छुट्टियां पड़ते ही तुरंत कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बना लें या फिर बच्चों की फरमाइश पर ट्रेन का टिकट नहीं मिलने पर फ्लाइट का टिकट बुक करवा लें. बच्चों को यह न लगे कि उन के बाकी फ्रैंड्स घूमने जा रहे हैं और उन्हें घर पर बोर होना पड़ेगा. लेकिन घूमने पर पानी की तरह पैसा बहाने न लग जाएं, भले ही इस पर आप की सेविंग ही क्यों न लग रही हो. इस में कोई समझदारी नहीं है.

निजी वाहन का इस्तेमाल कम करें :  आज हर कोई अपने स्टेटस के लिए घर में गाड़ी रखना पसंद करता है. लेकिन घर में गाड़ी होने का यह मतलब नहीं है कि थोड़ीथोड़ी दूरी पर जाने के लिए भी गाड़ी ही ले जाएं. इस से एक तो आदत बिगड़ती है, दूसरे जो काम सस्ते में हो सकता है वह डबल खर्च में होता है. इसलिए अगर आप अपने खर्चों पर लगाम लगाना चाहते हैं तो थोड़ी दूरी के लिए गाड़ी के इस्तेमाल को अवौइड करें.

दोनों हाथों से कमाएं  :  आज महंगाई व खर्च बढ़ने के कारण परिवार के एक सदस्य का कमाना काफी नहीं होता. जरूरी है कि पति के साथ पत्नी भी कमाए. इस के लिए बाहर जा कर ही कमाना जरूरी नहीं, बल्कि आज महिलाओं के लिए अनेक ऐसे फ्रीलांस वर्क हैं जिन्हें वे घर पर कर के अच्छाखासा पैसा कमाने के साथसाथ अपना आत्मविश्वास भी बढ़ा सकती हैं.

इस से फायदा यह होगा कि एक की सैलरी से जहां जरूरतें पूरी होंगी वहीं दूसरे की सेविंग करने में काम आएगी. लेकिन यह सब निर्भर करेगा आप की स्मार्ट प्लानिंग पर.

मौल से ज्यादा लोकल मार्केट से करें शौपिंग  :  आज यह कहना गलत नहीं होगा कि मौल से शौपिंग करना स्टेटस सिंबल बन गया है. इसी कारण हर पेरैंट्स अपने बच्चों को मौल से ही शौपिंग कराना पसंद करते हैं. हालांकि यह पौकेट पर बोझ पड़ता है. मौल में हमें हर चीज दोगुने दामों पर मिलती है. इस बात से हम वाकिफ भी होते हैं लेकिन फिर भी स्टेटस के चक्कर में ही फंसे रहते हैं. इसलिए जरूरत है समझदार बनने की और इस के लिए आप को चाहिए कि आप ज्यादा से ज्यादा चीजें लोकल मार्केट से ही खरीदें. आप को देखदेख कर आप के बच्चे भी समझदार बनेंगे और बचत भी हो जाएगी.

पैंशन प्लान से करें टैंशन दूर : आप सरकारी नौकरी में हैं तब तो आप को रिटायरमैंट के बाद पैंशन की टैंशन नहीं होगी लेकिन अगर आप प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं तो आप को अभी से पैंशन प्लान लेना होगा. इस के लिए अभी से आप को निश्चित अवधि तक रैगुलर किस्त भरनी होगी. इस से फायदा यह होगा कि जब आप की रिटायरमैंट की उम्र होगी तब आप को हर माह पैंशन मिलनी शुरू हो जाएगी. इस से रिटायर्ड होने के बाद भी आप टैंशन फ्री रह पाएंगे.

पीपीएफ है फायदेमंद  :  आजकल कई कंपनियों में पीएफ नहीं कटता. ऐसे में आप बैंक वगैरा में अपना पीपीएफ अकाउंट (पब्लिक प्रौविडैंट फंड खाता) खोल कर सेविंग कर सकते हैं. इस में आप को अपने अकाउंट को ऐक्टिव रखने के लिए साल में कम से कम 500 रुपए जमा करवाने जरूरी हैं. आप ज्यादा भी जमा करवा सकते हैं.

इस की परिपक्वता अवधि 15 साल है. लेकिन अगर आप अपना पैसा वापस निकालना चाहते हैं तो इस में 5 साल से पहले आप नहीं निकाल सकते.

और भी फायदेमंद स्कीम्स

किसान विकास पत्र  : यह भी सेविंग का एक बहुत अच्छा माध्यम है. इस में मैच्योरिटी पर पैसा डबल हो कर मिल सकता है.

फिक्स्ड डिपौजिट : जब बैंक में किसी खास अवधि के लिए आप अपना पैसा निवेश करते हैं तो उसे फिक्स्ड डिपौजिट कहते हैं. इस में आप को ब्याज ज्यादा मिलता है.

डाकघर रेकरिंग जमा खाता योजना  :  कोई भी व्यक्ति देश के किसी भी डाकघर में आरडी खाता खोल सकता है. यह सिंगल और जौइंट दोनों तरह का हो सकता है. हर महीने इस में निवेश करना होता है. आप को इस में ब्याज मिलता है. इस में एक यह फायदा होता है कि एक साल के बाद आप को 50 फीसदी तक रकम निकालने की अनुमति होती है. इस में आप कितना भी पैसा निवेश कर सकते हैं.

इस के अलावा भी बाजार में कई ऐसे प्लान हैं जो आप के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं. इस के लिए आप को बैंकों या विशेषज्ञों से बात करनी होगी. इस तरह, आप आज बचत कर के अपना कल सुरक्षित बना सकते हैं.

बच्चों को दादी-नानी की कहानियां सुनाएगा ये ऐप

बच्चे 1980-90 के दशक में माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी से कहानियां सुना करते थे. बड़ों के जीवन की आपाधापी में और सिकुड़ते परिवारों के बीच आज के बच्चे उस सुख से दूर होने लगे हैं.

डिजिटल युग में इसका समाधान करने के लिए कहानी सुनाने वाला खिलौना ‘नियो’ पेश किया गया है जो ऐप आधारित है. अभिभावकों के लिए बनाया गया नियो बच्चों को अपने पैरेंट्स की आवाज में भी पुराने समय की कहानियां सुना सकता है. इसके लिए जरूरी नहीं कि वे अपने बच्चों के पास बैठे ही हों.

इस ऐप का इस्तेमाल कर पैरेंट्स कहानियों को रिकार्ड कर सकते हैं और उसे इंटरनेट के जरिए नियो पर भेज सकते हैं और बच्चे अपनी इच्छा के अनुसार जब चाहे उन्हें सुन सकते हैं. दरअसल नियो राक्षस की शक्ल का खिलौना है. इसमें एक GB तक डेटा स्टोरेज की क्षमता है.

इसमें 100 से ज्यादा कहानियां भरी जा सकती है. सोशल टौयज के सह-संस्थापक अमित देशपांडे ने कहा, ‘नियो, माता-पिता का विकल्प नहीं बन सकता है, लेकिन यह माता-पिता को छोटे बच्चों को अपनी आवाज में कहानियां सुनने की अनुमति देता है’.

वर्तमान में एकल परिवारों के दौर में यह दादा-दादी को बच्चों से जोड़ने का अच्छा माध्यम है. उन्होंने कहा, नियो एक खिलौना है, जिसे बच्चे अपने साथ रख सकते हैं. कंपनी ने इस खिलौने की बिक्री अगले साल जनवरी तक शुरू करने की योजना बनाई है. जब इसे जनता के उपलब्ध कराया जाएगा तो इसकी कीमत 3500 रुपये होगी.

मुझे अपने पति से सहवास के दौरान वह सुख नहीं मिल रहा जो मैं चाहती हूं. मैं यह बात उन से कह नहीं पा रही. क्या करूं.

सवाल
मेरे विवाह को 1 वर्ष हो चुका है. लेकिन मुझे अपने पति से सहवास के दौरान वह सुख नहीं मिल रहा जो मैं चाहती हूं. मैं किसी और के बारे में सोचना भी नहीं चाहती, क्योंकि मेरे पति मुझे बहुत प्यार करते हैं. दिक्कत यह है कि मेरे पति का यौनांग बहुत छोटा है और मैं यह बात उन से कह नहीं पा रही. कोई ऐसी दवा बताएं जिस से उन के लिंग की लंबाई बढ़ सके?

जवाब
यौनांग की लंबाई को बढ़ाने के लिए न तो कोई दवा है और न ही इस की आवश्यकता है, क्योंकि लिंग के आकार का सहवास के आनंद से कोई लेनादेना नहीं है. इसलिए सब से पहले अपने दिमाग से यह पूर्वाग्रह निकाल दें. सहवास में प्रवृत्त होने से पहले रतिक्रीड़ा यानी आलिंगन, चुंबन आदि करें. कामोत्तेजित होने के बाद संबंध बनाएंगे तो कोई कारण नहीं कि आप को आनंद प्राप्त न हो.

जीत के जश्न में धोनी बने ड्राइवर, मैदान पर दौड़ाई गाड़ी

टीम इंडिया ने श्रीलंका को कोलंबो में खेले गए पांचवें और आखिरी वनडे में 6 विकेट से मात देकर पांच मैचों की वनडे सीरीज में 5-0 से श्रीलंका का सूपड़ा साफ कर दिया है. इसी के साथ ही भारत, श्रीलंका का उन्हीं की धरती पर वनडे सीरीज में 5-0 से सफाया करने वाली पहली टीम बन गई है.

आपको बता दें कि इस मैच में पहले बल्लेबाजी करते हुए श्रीलंका ने टीम इंडिया को वनडे सीरीज में क्लीन स्वीप के लिए 239 रनों का लक्ष्य दिया.

जवाब में लक्ष्य का पीछा करने उतरी टीम इंडिया ने विराट कोहली के 30वें वनडे शतक (नाबाद 110) और केदार जाधव (63) के अर्धशतक की बदौलत 46.3 ओवर में ही 239 रन बना लिए और ये मैच 6 विकेट से अपने नाम कर लिया.

भुवनेश्वर कुमार को उनके शानदार बौलिंग प्रदर्शन के लिए ‘मैन औफ द मैच’ का अवार्ड मिला. जबकि जसप्रीत बुमराह को सीरीज में सबसे ज्यादा 15 विकेट लेने के लिए ‘मैन औफ द सीरीज’ का अवार्ड दिया गया.

मैच के बाद मैदान पर टीम इंडिया की मस्ती देखने को मिली. जसप्रीत बुमराह को मैन औफ द सीरीज के रूप में गाड़ी तोहफे में मिली. जिसके बाद पूरी टीम ही उस गाड़ी पर सवार हो गई और मैदान के चक्कर लगाने लगी.

पूरी टीम गाड़ी पर थी, ट्राफी गाड़ी की छत पर और ड्राइवर बने थे पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी. पूरी टीम ने इस दौरान जमकर मस्ती की.

पाचवें वनडे के दौरान भी कई रिकार्ड्स बनें और टूटे. आईए नजर डालते हैं उन रिकार्ड्स पर.

कोहली की कप्तानी में तीसरी बार क्लिन स्विप

चार सालों में यह तीसरा ऐसा वनडे सीरीज था जिसमें कप्तान विराट कोहली के नेतृत्व में भारतीय टीम ने 5-0 से क्लीन स्विप के साथ सीरीज पर अपना कब्जा जमाया है.

विराट कोहली की कप्तानी में भारतीय खिलाड़ियों ने अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिखाया. यह भारतीय टीम का छठा क्लीन स्विप था. इसमें विराट कोहली तीन क्लीन स्विप के साथ पहले नंबर पर हैं, 2 क्लीन स्विप महेंद्र सिंह धोनी और एक गौतम गंभीर के नाम दर्ज है. विराट कोहली के नेतृत्व में टीम इंडिया ने सभी मैचों में मेजबान टीम के छक्के छुड़ा दिए थे.

वनडे करियर का 30वां शतक

श्रीलंका के खिलाफ सीरीज के पांचवे और अंतिम वनडे मैच में टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने अपने वनडे करियर का 30वां शतक जड़कर आस्ट्रेलिया के पूर्व वर्ल्ड चैंपियन कप्तान रिकी पोंटिंग की बराबरी कर ली है. इसी के साथ ही विराट कोहली वनडे क्रिकेट में सबसे ज्यादा शतक लगाने वाले बल्लेबाजों की फेहरिस्त में रिकी पोंटिंग के साथ सयुंक्त रूप से दूसरे नंबर पर आ गए हैं.

आपको बता दें कि श्रीलंका के खिलाफ चौथे वनडे में विराट कोहली ने श्रीलंका के पूर्व दिग्गज बल्लेबाज सनथ जयसूर्या का रिकार्ड तोड़ा था. आस्ट्रेलिया को दो वर्ल्ड कप जिताने वाले रिकी पोंटिग ने 375 वनडे की 365 पारियों में 30 शतक लगाए हैं, वही अगर विराट कोहली की बात की जाए तो उन्होंने पोंटिंग से लगभग आधी पारियों में ही 30 शतक जड़ने का कारनामा कर दिया.

अब वनडे में विराट कोहली से ज्यादा शतक सिर्फ सचिन तेंदुलकर (49) के नाम है. विराट कोहली ने सिर्फ 194 वनडे की 186 पारियों में 30 शतक लगाए हैं. अगर इसी तरह विराट कोहली शतक लगाते रहे तो वे वनडे क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर के रिकार्ड को भी तोड़ सकते हैं.

धोनी ने बनाया अनोखा शतक

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की तेज-तर्रार विकेटकीपिंग की दुनिया कायल है. धोनी वनडे में 100 स्टंप करने वाले दुनिया के पहले विकेटकीपर बन गए. श्रीलंका के खिलाफ सीरीज के पांचवें और आखिरी वनडे में उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की. धोनी ने अपने करियर के 301वें वनडे में इस जादुई आंकड़े को छुआ. श्रीलंका के बल्लेबाज अकिला धनंजय धोनी के 100वें शिकार बने. गेंदबाज यजुवेंद्र चहल रहे.

भारत-श्रीलंका सीरीज में 300 रन बनाने वाले पहले खिलाड़ी बनें रोहित

श्रीलंका के खिलाफ वनडे सीरीज में रोहित शर्मा ने एक ऐसा रिकार्ड अपने नाम कर लिया जो अबतक भारत का कोई बल्लेबाज नहीं बना पाया था. रोहित शर्मा श्रीलंका में खेली गई बाइलैट्रल सीरीज में 300 रन बनाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी हैं. आज तक कोई भारतीय बल्लेबाज श्रीलंका में एक सीरीज के दौरान 300 रन नहीं बना सका था लेकिन रोहित ने ये कर दिखाया.

रोहित ने सीरीज के 5 मैचों में 75.50 के औसत से 302 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने दो शतक और एक अर्धशतक भी लगाया. दुनियाभर की बात करें तो सिर्फ इंग्लैंड के बल्लेबाज जो रूट ही 300 रन का आंकड़ा छू सके हैं, मतलब रोहित ये कारनामा करने वाले दूसरे खिलाड़ी हैं.

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