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‘द फिल्म स्टार’ के साथ संगीत की दुनिया में आगाज करेंगी माधुरी दीक्षित

डांसिंग क्वीन माधुरी दीक्षित अब इंटरनेशनल सिंगर बनने जा रही हैं. माधुरी ‘द फिल्म स्टार’ नाम के एल्बम के साथ संगीत की दुनिया में आगाज करने जा रही हैं. अभिनेत्री ‘तू है मेरा’ गीत से अपने संगीत करियर की शुरुआत करेंगी. आपको बता दें कि ‘तू है मेरा’ भारतीय शास्त्रीय लोक संगीत और पश्चिमी पौप लिरिक्स व धुनों का सम्मिश्रण है और यह एकल गीत उनके प्रशंसकों को समर्पित है.

इस गाने का विचार पिछले साल माधुरी, उनके पति श्रीराम नेने और सैट बिसला के बीच हुई बैठक के बाद तय हुआ. अलग अलग भाषाओं में गाया गया साउंड ट्रैक रिलीज करने का आइडिया माधुरी दीक्षित और उनके पति को पिछले साल तब आया था जब दोनों लास एंजलिस में थे. बिसला लास एंजेलिस के बेवरली हिल्स में ‘ग्लोबल आर्टिस्ट डिस्कवरी’ और ‘ए एंड आर’ (डिवेलपमेंट फर्म) के संस्थापक हैं.

माधुरी ने अपने बयान में कहा, संगीत शुरू से ही मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है और मैं अपनी जिंदगी के इस नए चैप्टर की शुरुआत अपने फैन्स को धन्यवाद देते हुए करना चाहती हूं. मैं इस बात को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट थी कि मुझे इस नए अध्याय की शुरुआत जश्न और मेरे प्रशंसकों जिन्होंने मुझे बहुत ज्यादा समर्थन और बेशर्त प्यार दिया है के आभार भाव के साथ करना है, इसलिए उनकी प्रशंसा के सफर का जश्न मनाने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता था.

गायकी के क्षेत्र में अपने डेब्यू पर बात करते हुए माधुरी ने बताया कि प्रतिभावान लोगों के साथ काम करना शानदार अनुभव रहा. हम कुछ ऐसा बनाने में कामयाब रहे हैं जो सीधे आत्मा को छूता है. हमें लगता है कि दर्शक हमारी टीम के मेहनत की सराहना करेंगी और ये गाना उन्हें उतना ही प्रभावित करेगा जितना इसने हमें किया है.

अगले साल की शुरुआत में एल्बम के रिलीज होने की संभावना है. माधुरी ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया है और वह एक मराठी फिल्म का निर्माण करने जा रही हैं.

उत्तर कोरिया-अमेरिका तनाव से कमजोर हुआ बाजार

अगस्त के पहले सप्ताह के दौरान बौंबे शेयर बाजार यानी बीएसई में कम उत्साह का माहौल रहा और निवेशकों ने जम कर लिवाली की. नतीजतन, बीएसई का सूचकांक 32 हजार तथा नैशनल स्टौक एक्सचेंज का निफ्टी 10 हजार के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे उतर आया.

कंपनियों के परिणाम ठीकठाक रहने के बावजूद बाजार में दबाव बना रहा जिस के कारण लगातार 4 सत्रों तक बाजार में गिरावट रही.

बाजार की यह गिरावट सामान्य थी, फिर भी निवेशकों में उत्साह नजर नहीं आया. इस की वजह देश के राजनीतिक माहौल में तेजी से परिवर्तित होते घटनाक्रम के साथ उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का माहौल बताया गया.

इस से पहले सप्ताह यानी जुलाई के आखिर में भी बाजार पर दबाव रहा और आईटी तथा फार्मा क्षेत्रों के शेयरों में गिरावट आई, जिस से सूचकांक लगातार 3 दिनों तक गिरावट पर रहा.

इस दौरान बीएसई तथा निफ्टी मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर ही बने रहे मगर रुपए में गिरावट रही.

 

नेपोटिज्म पर ये क्या बोल गईं बेबो

नेपोटिज्म पर छिड़ी बहस फिल्म इंडस्ट्री में थमने का नाम नहीं ले रही है. बौलीवुड में नेपोटिज्म के मुद्दे पर तब से चर्चा जोर पर है जब करन जौहर के शो ‘कौफी विद करन’ में कंगना रनौत ने शिरकत की. फिर कंगना के हाल में ही दिए एक इंटरव्यू के बाद इस मसले पर चर्चा और गरम हो गई है.

आए दिन हर कोई इस शांत पड़े मुद्दे को फिर से छेड़कर चला जाता है. इस विवाद में अब करीना कपूर भी कूद पड़ी हैं. करीना ने बेबाकी भरे अंदाज में कहा कि अगर इंडस्ट्री में रणबीर कपूर है तो रणवीर सिंह भी है और अगर आलिया भट्ट है तो कंगना रनौत भी है.

हाल ही में फिल्मफेयर को दिए इंटरव्यू में बेबो ने नेपोटिज्म पर खुलकर बात की. उन्होंने कहा, इस विषय पर जरूरत से ज्यादा चर्चा हो चुकी है. मेरे ख्याल से हर फील्ड में नेपोटिज्म है. लेकिन वहां कोई कुछ नहीं कहता. बिजनेस फैमिलीज में बेटा बिजनेस को टेकओवर करता है. एक नेता का बेटा उसकी जगह मंत्री बनता है. लेकिन वहां किसी को नेपोटिज्म नहीं दिखता, सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री में यह बहस हो रही है.

आज तक किसी भी स्टार किड ने अपने माता-पिता के बराबर मुकाम हासिल नहीं किया है. इसलिए मुझे समझ नहीं आता कि लोग क्यों इस मुद्दे को इतना तूल दे रहे हैं. फिल्म इंडस्ट्री में सिर्फ टैलेंट चलता है.

करीना कपूर ने कहा, अगर फिल्म जगत में रणबीर कपूर है तो रणवीर सिंह भी है जो कि इंडस्ट्री से नहीं हैं. इसलिए मैं इसे ओवररेटेड मानती हूं. यहां सिर्फ टैलेंट और मेहनत ही सफलता तक पहुंचाती है. कंगना फिल्म इंडस्ट्री से नहीं हैं और अपने टैलेंट के दम पर ही वह आज इस मुकाम पर हैं. अगर आलिया भट्ट है तो कंगना रनौत भी है. यह सिर्फ स्टार किड्स के बार में नहीं है.

दरअसल, नेपोटिज्म का विवाद कंगना रनौत से शुरू हुआ था. करण जौहर के टौक शो ‘काफी विद करण’ में कंगना रनौत ने उन्हें बौलीवुड का माफिया बताया था और कहा था कि करण नेपोटिज्म या भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देते हैं. इसके बाद आईफा 2017 के मंच पर करन जौहर ने सैफ अली खान और वरुण धवन के साथ मिलकर कंगना का मजाक उड़ाया था.

अधिकार और विश्वास को समझना है बेहद जरूरी

सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल में अपने एक फैसले में केरल के डायरैक्टर जनरल औफ पुलिस को 2 साल से पहले मुख्यमंत्री का विश्वास खो जाने के कारण हटाए जाने पर एतराज जताया है और उन्हें फिर से उस पद पर तैनात किए जाने की बात कही है.

मुख्यमंत्री का तर्क था कि 2 मामलों में पुलिस की असफलता के कारण जनता में अधिकारी के खिलाफ रोष व असंतुष्टि थी, सो, उसे हटाया जाना प्रशासनिक कारणों से जरूरी था. सरकार का कहना था कि पुलिस अधिकारियों पर मुख्यमंत्री का विश्वास होना जरूरी है और उस विश्वास को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.

पुलिस अधिकारी टी पी सेन कुमार पद से हटाए जाने के बाद पहले प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में गए थे. वहां उन की याचिका रद हो गई तो वे उच्च न्यायालय गए थे जिस की अपील फिर सर्वोच्च न्यायालय में की गई थी.

सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि पुलिस की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए जरूरी है कि पुलिस बिना डरे कानून को लागू करे और वह इस दौरान ज्यादती कर रहे राजनीतिक हुक्मरानों की भी चिंता न करे. यह कुशल प्रशासन के लिए जरूरी है.

जिस देश में पुलिस अधिकारियों को सत्ताधारी राजनेता अपना चाटुकार मानते हैं वहां इस प्रकार का फैसला ठीक है और संतोष देने वाला है. देशभर में नेताओं और पुलिस अधिकारियों के बीच सांठगांठ रहती है. ऊपरी कमाई में नेताओं, अफसरों और पुलिस में चोरचोर मौसेरे भाई सा संबंध रहता है.

नेता लोग पुलिस का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों के खिलाफ भी करते हैं और अपने ही दल में अपनों के खिलाफ भी. नेताओं के चारों ओर जो भीड़ जमा रहती है उस में से आधे लोग तो पुलिस से अपना काम कराने की दुहाई ले कर आते हैं.

यदि कोई पुलिस अधिकारी सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं के हिसाब से न चले, तो मुख्यमंत्री के पास शिकायतों का ढेर लग जाता है.

इन शिकायतों को ही जनता की असंतुष्टि कहा जाता है और सर्वोच्च न्यायालय पुलिस अधिकारियों को राजनीतिज्ञों के कहर से बचाने की कोशिश कर रहा है.

टी पी सेन कुमार के बारे में तो सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दे दिया है पर वह अधिकारी अपना आदर क्या प्रशासन से पा सकेगा, इस में शक है. उसे खरदिमाग ही माना जाएगा और फालतू के कामों में ही लगाया जाएगा.

दूसरा पक्ष, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने नहीं देखा है, वह यह है कि पुलिस अधिकारियों के निक्कमेपन, भेदभाव, रिश्वतखोरी, हिंसा, दुर्व्यवहार के खिलाफ जनता, जनप्रतिनिधियों और मातहतों के पास क्या उपाय है? इन बातों को सुबूतों से सिद्ध नहीं किया जा सकता.

दरअसल, जो ताकत रखता है उस के खिलाफ मौखिक शिकायत की जा सकती है, लिखित नहीं.

मुख्यमंत्री को ऐसे अधिकारियों के खिलाफ मिली शिकायतों पर बिना जांच किए, बिना कारण बताओ नोटिस दिए, फैसला लेना होगा. उस का अधिकार अगर छीन लिया गया है तो ऐसा फोरम होना चाहिए जहां अपना नाम छिपा कर शिकायतें की जा सकें, हालांकि ऐसा फोरम बनाना तकरीबन असंभव है.

यह फोरम जनप्रतिनिधि ही हो सकते हैं और उन के पर कतरने का अर्थ है पुलिस को निरंकुशता का लाइसैंस देना.

क्या सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाने से पहले परिणामों पर भी विचार किया?

जानिये आखिर कौन देख रहा है आपकी व्हाट्सऐप प्रोफाइल

अगर आप सोशल मीडिया का प्रयोग करते हैं तो आप कभी ना कभी ये तो जरूर जानना चाहते होंगे कि आखिर कौन कौन आपकी प्रोफाइल चुपके से देख रहा है. अब तक सोशल मीडिया के सभी प्लेटफौर्म पर ये फीचर मौजूद था, सिवाय व्हाट्सऐप के जिससे पता लगाया जा सके कि कौन हमारी प्रोफाइल या तस्वीर देख रहा है.

हम आपको बता दे कि एक ऐसा ऐप मौजूद है, जो आपको ये फीचर उपलब्ध करवाता है. इस ऐप को व्हाट्स ट्रैकर  के नाम से जाना जाता है. एंड्राइड यूजर्स इसे प्ले स्टोर से फ्री में इन्स्टौल कर सकते हैं. यह ऐप प्रो और पेड वर्जन में आता है. प्रो वर्जन में केवल यह जानकारी मिलती है कि 7 दिन पहले आपकी प्रोफाइल किसने देखी थी, जबकि पेड वर्जन में आप इसकी रियल टाइम डिटेल जान सकते हैं. हालांकि इसके लिए आपको 1.99 डौलर (लगभग 130 रुपए) खर्च करने होंगे.

इस ऐप को टैमाजौन द्वारा डिज़ाइन किया गया है, इससे पहले इस कंपनी ने व्हाटस वेब नाम का ऐप भी बनाया था. इस ऐप को एंड्राइड 4.1 या उससे ऊपर के एंड्राइड पर इन्स्टौल किया जा सकता है. हर स्मार्टफोन में यह अलग स्पेस लेता है. इस ऐप के इस्तेमाल के लिए फोन में जीपीएस का होना जरूरी है. कुछ व्हाट्सऐप स्टेटस बड़े होते हैं, जिन्हें पढ़ने के लिए प्रोफाइल पर जाना पड़ता है. इसलिए इस ऐप की ज़रूरत पड़ती है.

कंपनी ने अपने ब्लौग पर ऐसी कोई जानकारी शेयर नहीं की है जिससे पता चले कि व्हाट्सऐप में यह फीचर क्यों नहीं जोड़ा गया है. कंपनी की दलील है कि, कोई यूजर किसी दूसरे यूजर की फोटो या स्टेटस इस एप के जरिये बदल नहीं सकता है.

कंपनी की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन पौलिसी है, मतलब कंपनी भी किसी की चैट या शेयर डाटा को देख नहीं सकती है. अब हम यहां बता रहे हैं कि कैसे आप इस ऐप का इस्तेमाल करके इस फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं.

सबसे पहले व्हाट्स ट्रैकर ऐप इन्स्टौल करें.

ऐप को ओपन करने के बाद एक एग्रीमेंट आता है उसे पढ़कर एग्री एंड कंटिन्यू करें.

अब यहां अपने देश का नाम, व्हाट्सऐप नंबर और जेंडर की जानकारी भरें.

इसके बाद डाटा लोड होने लगेगा जो 30 सेकंड का वक़्त लेगा.

इसके बाद आपके पास तीन कैटेगरी शो होंगीं, कौन्ट्रैक्ट, विजिटेड और विज़िटर.

विजिटेड कैटेगरी में वो लिस्ट होती है, जिन प्रोफाइल्स पर आपने विजिट किया है.

विजिटर लिस्ट में जाकर आप उन लोगों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, जिन्होंने आपकी प्रोफाइल पर विजिट किया है.

इस ऐप के द्वारा आप व्हाट्सऐप, फेसबुक या अन्य चैटिंग प्लेटफार्म पर मैसेज भी कर सकते हैं.

दवा उद्योग तथा उपभोक्ता को होगा फायदा

देश के हर नागरिक को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के मकसद से सरकार स्वास्थ्य योजना शुरू कर चुकी है. योजना के तहत कम मूल्य पर लोगों को बेहतर सुविधा दी जाएगी. इस का फायदा अभी जमीन पर तो नजर नहीं आ रहा है लेकिन इस दिशा में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं.

इसी क्रम में सरकार ने नई दवाओं को डेढ़ माह के भीतर मंजूरी देने की व्यवस्था की है. इन में वे दवाएं शामिल हैं जिन्हें पहले ही जापान, आस्टे्रलिया और यूरोपीय यूनियन के देशों से मंजूरी मिल चुकी है. इस का सीधा मतलब है कि जो दवाइयां इन विकसित देशों में प्रचलन में हैं उन्हें भारत में क्लीनिकल परीक्षण से नहीं गुजरना पड़ेगा.

दवा महानिदेशालय का कहना है कि सरकार के इस फैसले से प्रमाणित दवाएं समय पर देश के बाजार में आ जाएंगी.

क्लीनिकल प्रमाणिकता के चक्कर में कई बार दवाओं को बाजार में उतारने के लिए अनावश्यक देरी का सामना करना पड़ता है. लेकिन इस फैसले से दवा उद्योग तथा उपभोक्ता दोनों को फायदा होगा.

बड़ी दवा कंपनियों का रिकार्ड देखने पर साफ पता चलता है कि उनका एकमात्र एजेंडा सिर्फ मुनाफा होता है। इसके लिए ये कंपनियां पेटेंट को सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। यह उन्हें बाजार में एकाधिकार का ऐसा कवच प्रदान करता है, जिसके जरिए दवाओं की मनमाफिक काफी ऊंची कीमतें तय की जाती हैं।

नीतियां सरल हों, सरकार का यह फैसला अच्छा है लेकिन सरकार की सरल नीतियों का निजी लाभ के लिए दवा कंपनियां फायदा उठाएं, इस पर ध्यान देने की जरूरत है.

नकली दवाओं से बाजार पटा पड़ा है. कोई भी दवा विक्रेता डाक्टर की परची के आधार पर बिल के साथ दवा नहीं देता है. इस का सीधा मतलब है कि बाजार में घोटाला चल रहा है. सो, व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए बुनियाद पर अंकुश लगाना आवश्यक है.

सब्सिडी में गरीबों का फायदा सुनिश्चित हो

सब्सिडी हमारे यहां अर्थव्यवस्था के लिए सब से खतरनाक शब्द बन गया है. यह अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डालती है और वास्तविक लोगों या जरूरतमंदों को इस का फायदा भी नहीं मिलता है.

सब्सिडी भी आरक्षण की व्यवस्था की तरह बन कर रह गई है जिस में दशकों से सरकार में मंत्री रहे लोगों के बच्चे भी नौकरियों आदि में दलित होने के नाते आरक्षण मांगते हैं.

यह आरक्षण की व्यवस्था का दुरुपयोग और मजाक है. ऐसा ही मजाक सब्सिडी के नाम पर होता है. गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी का फायदा सब उठा रहे हैं. हाल ही में एक सरकारी आंकड़ा आया जिस में कहा गया है कि आधार नंबर से जुड़ने के बाद करोड़ों राशनकार्ड फर्जी निकले.

इस का सीधा अर्थ है कि करोड़ों लोग गरीबों के राशन पर डाका डाल रहे थे. ऐसी ही हालत रसोई गैस सिलैंडर के बारे में है.

रसोई गैस पर सरकार सब्सिडी देती है और इस के तहत साल में 12 सिलैंडर एक उपभोक्ता को मिलते हैं. सब्सिडी का पैसा अब उपभोक्ताओं के खाते में जाता है. इस से पहले सब्सिडी के सिलैंडर होटलों, रैस्टोरैंट में चल रहे थे. सरकार अब सब्सिडी खत्म करने पर विचार कर रही है.

इस के लिए हर माह प्रति सिलैंडर 4 रुपए बढ़ाए जा रहे हैं और 1 साल में यह दर सामान्य सिलैंडर के स्तर पर पहुंच जाएगी. सरकार यह व्यवस्था पिछले साल से शुरू कर चुकी है.

सरकार का कहना है कि इस पैसे का इस्तेमाल उज्ज्वला योजना के तहत उन लोगों को गैस कनैक्शन देने में किया जाएगा जिन के पास गैस कनैक्शन नहीं हैं.

योजना अच्छी है और इस का फायदा गरीब को मिलेगा लेकिन वर्तमान में जो गरीब सब्सिडी का लाभ ले रहा है उस के लिए यह योजना दुखदायी बन जाएगी. दरअसल, सरकार को सब्सिडी खत्म करने के बजाय जरूरतमंद को ही इस का लाभ मिले, यह सुनिश्चित करना चाहिए.

बिहार कांग्रेस में टूट की आशंका, राहुल गांधी से मिले कई विधायक

बिहार कांग्रेस में टूट की आशंकाओं के बीच करीब एक दर्जन विधायकों ने पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी से अलग-अलग मुलाकात की. इस दौरान महागठबंधन टूटने के बाद पैदा हुई स्थिति और प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन पर चर्चा हुई.

कांग्रेस उपाध्यक्ष ने गुरुवार को भी बिहार के कुछ विधायकों को मिलने के लिए बुलाया है. कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) के नेता सदानंद सिंह भी गुरुवार को राहुल से मुलाकात करेंगे. सिंह ने पिछले सप्ताह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिल चुके हैं. राहुल से मुलाकात के दौरान अधिकतर विधायकों ने राजद के साथ गठबंधन का विरोध किया. कई विधायकों की राय थी कि बिहार में पार्टी को खड़ा करने के लिए यह सबसे बेहतरीन समय है. ऐसे में कांग्रेस को राजद के साथ जाने के बजाय अलग रास्ता अपनाना चाहिए.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मुलाकात के दौरान प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन पर भी चर्चा हुई. ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी जल्द नए प्रदेश अध्यक्ष का ऐलान कर सकती है. विधायकों से मुलाकात के दौरान पार्टी महासचिव और प्रदेश प्रभारी सीपी जोशी भी मौजूद थे.

मछुआरों के लिए कानून बनाए सरकार

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, पार्टी मछुआरों को उनका हक दिलाने के लिए संघर्ष करेगी. ऑल इंडिया फिशरमैन कांग्रेस की कार्यकारणी की बैठक को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने कहा, मछुआरों के अधिकारों की रक्षा के लिए वनवासी कानून की तर्ज पर मछुआरों के लिए कानून बनाया जाना चाहिए. ताकि, उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके. राहुल ने कहा, कांग्रेस ने हमेशा समाज के हर वर्ग का ध्यान रखा है. यूपीए सरकार के दौरान किए गए कार्यो का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए कार्य करती रहेगी. साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने का भी आरोप लगाया.

आखिर क्यों कम उम्र में ही लेनी चाहिए हेल्थ इंश्योरेंस पौलिसी

अच्छी सेहत को भी वरदान माना जाता है. पर इस वरदान को भी सुरक्षा की जरूरत पड़ने लगी है. आज के जमाने में जीवनशैली और खान-पान के तौर-तरीके बदलने से बीमारियां भी बढ़ने लगे हैं. इसके साथ-साथ हेल्थ केयर के खर्चे भी बेतहाशा बढ़ गए हैं. परिवार के एक सदस्य को भी अगर अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है, तो मेडिकल बिल देखकर दिन में तारे नजर आने लगते हैं. ऐसे ही हालात में आर्थिक सुरक्षा देने का काम करता है हेल्थ इंश्योरेंस.

पर लोगों के साथ आमतौर पर एक समस्या आती है कि इसे कब खरीदें? यानी हेल्थ इंश्योरेंस किस उम्र में कराया जाए? इस सवाल के जवाब के लिए सही तरीका ये है कि आप अपनी जीवनशैली और जरूरत को समझें. हर इंसान को खुद यह निर्णय करना होता है कि उसकी जीवनशैली और उसकी पारिवारिक जरूरतों के आधार पर उसकी आवश्यकताएं क्या हैं. वह किस तरह का लाभ चाहता है. उसे कितनी राशि का कवर चाहिए और यह भी कि उसकी लागत क्या है.

कम उम्र में लेने से फायदा आज की उतार-चढ़ाव भरी दुनिया में हेल्थ इंश्योरेंस लेने का फैसला जल्दी करें. सबसे बेहतर तो यह रहेगा कि इसे कम उम्र में ही ले लें. जैसे-जैसे आपकी आयु उम्र बढ़ेगी वैसे-वैसे इसका प्रीमियम भी बढ़ता जाता है. बता दें कि 3 माह से लेकर 60 साल या इससे ज्यादा उम्र का कोई भी इंसान हेल्थ इंश्योरेंस पौलिसी ले सकता है.

अगर आप भी यह सोच रहे हैं कि कुछ सालों के बाद जाकर हेल्थ पौलिसी लेंगे तो अपने विचार को बदल दें. जीवन में देरी से हेल्थ पौलिसी लेना आपकी हेल्थ और जेब दोनों को महंगा पड़ सकता है. जान लें कि हेल्थ पौलिसी उम्र के हिसाब से नहीं लेनी चाहिए. बल्कि हेल्थ पौलिसी तब लेनी चाहिए, जबकि आप आर्थिक रुप से मजबूत हों. जानें ऐसे कौन से कारण है जिनके चलते कम उम्र में ही हेल्थ पौलिसी लेनी चाहिए.

कम उम्र में होने लगी हैं बड़ीं बीमारियां

जिस तरह से लोगों का लाइफस्टाइल बदला है उसके बाद से कैंसर, ट्यूमर, स्थाई पैरालिसिस, हार्ट और फेफड़ों संबंधित आने की संभावनाएं बढ़ी है. इसलिए जरुरी नहीं है कि यह सब बीमारी 50 या 60 की उम्र के बाद है. बल्कि पिछले कई सालों में ऐसे मामले बढ़े है, जिनमें कम उम्र में ही लोगों को बीमारियां होने लगी है. इस तरह की बीमारी में व्यक्ति के पास वक्त कम रहता है और पैसा ज्यादा लगता है. ऐसे में पहले से ही हेल्थ इन्श्योरेंस लेना कम उम्र में ही जरुरी हो गया है.

प्रेगनेंसी के दौरान भी काम आ सकती है पौलिसी

हर साल महंगाई बढ़ रही है, ऐसे में अस्पतालों के भी बिल भी बढ़ रहे हैं. आप अगर आज के हिसाब से आने वाले सालों में इलाज के बारे में नहीं सोच सकते हैं. अस्पतालों के बिलों में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है. हेल्थ पौलिसी ऐसी स्थिति में आपको बड़ी फाइनेंशियल दिक्कतों के निकलने में मदद करेंगी. कई कंपनी कम उम्र में पौलिसी लेने पर आपके लिए मददगार हो सकती है. जिसमें से महिलाएं प्रेगनेंसी के समय भी हेल्थ पौलिसी की मदद ले सकते हैं. हालांकि सभी कंपनियां अपने कस्टमर को इस तरह की सुविधाएं नहीं देती हैं.

तुरंत नहीं मिलता है क्लेम का पैसा

पौलिसी लेने के तुरंत बाद अगर आप सोच रहे हैं कि आप क्लेम कर सकते हैं, तो ऐसा नहीं है. आमतौर पर हेल्थ पौलिसी लेने के बाद 30 दिन तक रुकना पड़ता है. वहीं कई स्थिति में 90 दिनों तक भी इंतजार करना पड़ सकता है. इन दिनों के भीतर आप हेल्थ पौलिसी पर इंमरजेंसी होने की स्थिति में भी क्लेम नहीं कर सकता है. इसलिए जरुरी है कि हेल्थ पौलिसी कम उम्र में ले ली जाएं. ताकि कोई भी बड़ी बीमारी होने की सूरत में तुरंत पैसा मिल सके.

चीन द्वारा भारत की घेराबंदी और छटपटा रही युवा जनता

पाकिस्तान में चाइना-पाक इकोनौमिक मार्ग व अफ्रीका के तट पर बसे डिजीबाउटी के बाद चीन ने अब श्रीलंका में 99 साल के पट्टे पर एक बंदरगाह ले लिया है. चीन द्वारा भारत की घेराबंदी तेजी से चालू है. भारत ने बदले में अमेरिका व जापान से सहायता ली है पर ये दोनों देश अपने चरम को पार कर चुके हैं और उन का विकास बंद हो चुका है.

भारत की भारीभरकम युवा जनता छटपटा रही है कि उसे काम के अवसर मिलें पर ये अवसर अब चारों ओर चीन हड़प रहा है. चीनी श्रमिक सब देशों में फैल रहे हैं और वे अफ्रीका में ही नहीं, दक्षिणी अमेरिका तक पहुंच रहे हैं.

चीन ने भारत के उत्तर में डोकला?म में मोरचा खोल कर भारत को सकते में डाल रखा है और हर रोज युद्ध की धमकी दे रहा है. भारत पश्चिमी देशों की ओर समर्थन पाने की निगाहों से देख रहा है पर इस मामले में कोई उलझना नहीं चाहता क्योंकि चीन अधिकांश देशों में भारीभरकम निवेश कर चुका है. चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का स्थायी सदस्य है. वह भारत के किसी भी प्रस्ताव को वीटो कर सकता है.

भारत को फिलहाल चीन से मुकाबला करने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करनी होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रारंभ में जो विदेशी मामलों में उत्साह दिखाया था वह अब फीका पड़ गया है और कहीं से भी उस का लाभ नहीं दिख रहा है. गौरक्षा, नोटबंदी, जीएसटी

और विपक्षियों को तोड़ने की जगह प्रधानमंत्री को भारत की आन बचाए रखने के लिए विदेशी मामलों में सूझबूझ दिखानी होगी. केवल भाषणों और व्यवहार से बात नहीं बनेगी.

भारतीय मूल के विदेशों में बसे लाखों लोगों का इस्तेमाल किया जाना अब बहुत जरूरी हो गया है. भाजपा जब सत्ता में आई थी तो उस ने हिंदू कट्टरपन के कारण बहुत उत्साह दिखाया था पर अब वह उबाल ठंडा पड़ गया है. भाजपाइयों की मानसिकता यह है कि चार पैसे नहीं बन रहे तो वे क्यों भारत के नाम पर मरेंखपें.

चीन-भारत द्वंद्व सदियों चलेगा, इस में संदेह नहीं रह गया है. जैसी यूरोप में जरमनी, फ्रांस और ब्रिटेन में लगातार एकदूसरे से होड़ लगी रही, वैसी ही यहां दिख रही है. भारत को हरगिज चीन का पलड़ा भारी नहीं होने देना है.

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