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मैं 19 वर्षीय युवती हूं. मेरे चेहरे पर पिंपल्स के दाग हैं, जिन की वजह से बहुत परेशान रहती हूं. कृपया उपाय बताएं.

सवाल
मैं 19 वर्षीय युवती हूं. मेरे चेहरे पर पिंपल्स के दाग हैं, जिन की वजह से बहुत परेशान रहती हूं. इस के अलावा मेरे चेहरे पर निखार भी नहीं है और दिनोंदिन काला पड़ता जा रहा है, साथ ही मेरे बाल भी बहुत ज्यादा झड़ रहे हैं. कृपया बालों को लंबा व घना बनाने का भी उपाय बताएं?

जवाब
सामान्यतया पिंपल्स के दाग तभी रह जाते हैं जब उन के साथ छेड़छाड़ की जाती है. पिंपल के दागों को हटाने के लिए आप चेहरे पर पुदीने का पेस्ट बना कर लगाएं. ऐसा 1 माह तक करें. इस के अतिरिक्त आप कपूर को नारियल तेल में मिला कर भी चेहरे पर लगा सकती हैं. चेहरे पर निखार लाने के लिए आप संतरे के  छिलकों को सुखा कर पीस लें. उस में थोड़ा सा नारियल का तेल व गुलाबजल मिला कर चेहरे पर लेप की तरह लगाएं. इस से चेहरे पर निखार भी आएगा व त्वचा कोमल भी हो जाएगी.

बालों को झड़ने से बचाने के लिए प्याज के रस को बालों में लगाएं. फिर आधे घंटे बार शैंपू कर लें. प्याज का रस बालों को पतला होने से रोकता है व झड़ने से भी बचाता है.

इसी तरह आप आंवले के रस को भी बालों में लगा कर बालों को घना व लंबा बना सकती हैं. आंवले में मौजूद पोषक तत्त्व बालों की ग्रोथ बढ़ाने में मदद करते हैं.

उत्सव में हो घर घर पार्टी, रिश्तों में मिठास बढ़ाने का ये है आसान तरीका

पार्टी में किसी तरह के जातीय और धार्मिक भेदभाव को जगह न दे कर सभी मित्रों को बुलाया जाए. त्योहार का मकसद धार्मिक न हो कर सामाजिक होने से ज्यादा लोग इस में हिस्सा ले सकते हैं.

उत्सव में पार्टी का आयोजन मिलजुल कर करने से न सिर्फ प्यार बढ़ता है, बल्कि रिश्तों में मिठास भी आती है.

आज के दौर में सभी पर काम का बोझ अधिक है. ऐसे में औफिस या बिजनैस से त्योहार के दिन भी छुट्टी मिलनी मुश्किल होती है. दीवाली या दशहरा में 1-2 दिनों की छुट्टी ही मिल पाती है. ऐसे में सभी का आपस में मिलना संभव नहीं होता.

अगर पूरे फैस्टिवल सीजन में अलगअलग जगहों पर पार्टियों के आयोजन हों तो बहुत सारे लोग आपस में मिल सकते हैं. एक ही जगह पर पार्टी होने से लोगों की संख्या ज्यादा हो जाती है. पार्टी का बोझ भी बढ़ जाता है. अगर छोटीछोटी पार्टियां घरघर में आयोजित हों तो ज्यादा लोगों के आपस में मिलने का अवसर मिलता है.

त्योहारों में कई तरह के संगठनों में मुलाकातें हो जाती है. परेशानी की बात यह है कि ये संगठन जातीय समुदाय के नाम पर बने होते हैं. ऐसे में बाहरी लोगों का इन के साथ तालमेल नहीं रहता. जरूरत इस बात की है कि बिना जातीय या समुदाय की सोच के केवल आपसी दोस्ती के आधार पर यह पार्टी आयोजित की जाए.

अलगअलग आयोजनों के होने से एक लाभ यह होता है कि दोस्तों और रिश्तेदारों से बारबार मुलाकात होने लगती है, जिस से कई बार बिगडे़ हुए रिश्ते भी सहज हो जाते हैं.

हर घर पार्टी

आज के दौर में घरों में इतनी जगह रहती है कि वहां पर छोटी पार्टी का आयोजन हो सके. ऐसे में बहुत खर्च भी नहीं आता. घर वालों को इस में लगने की जरूरत नहीं होती. खाना बनाने वाले या ऐसे काम करने वाले लोग खाने से ले कर सजावट तक सब मैनेज कर देते हैं.

अगर त्योहार में केवल एक बार पार्टी का आयोजन होता है तो आपसी मुलाकात भी एक बार ही हो पाती है. अगर बारबार ऐसे आयोजन होते हैं तो आपसी मुलाकातें बारबार होने की संभावना रहती है.

बारबार मिलने से एकदूसरे के दुखदर्द का ज्यादा पता चलता है. आज के समय में आपस में मिलनाजुलना बेहद कम हो गया है. ऐसे में फैस्टिवल पार्टी के बहाने एकदूसरे से जल्दीजल्दी मिलना हो जाता है. जब बारबार मिलना होता है तो केवल औपचारिक बातें नहीं होतीं, और भी बातें होती हैं.

इस से आपसी संबंध मजबूत होते है. एकदूसरे के घरपरिवार, बच्चों का भी पता चलता है. जिस से केवल दोस्तीभरे रिश्ते ही मजबूत नहीं होते बल्कि कई बार आपस में रिश्तेदारी करने में भी मदद मिल जाती है. आपसी मेलजोल से यह भी पता चलता है कि किस के बच्चे शादी के लायक हो गए हैं, कौन किस से शादी कर सकता है.

कारोबार ही नहीं, नातेरिश्ते भी

मेलजोल से कारोबार की संभावनाएं भी पनपने लगती हैं. आज के समय में कारोबार में भरोसेमंद लोगों का मिलना मुश्किल होता है. ऐसे में अगर आपसी मेलजोल अधिक होता है तो बिजनैस पार्टनर के साथ करीबी रिश्ते बनाने में मदद मिलती है. देखने में यह फैस्टिवल पार्टी केवल सामान्य पार्टी जैसी ही दिखती है पर असल में यह आपसी तालमेल को लंबे समय तक बनाए रखने का काम कर सकती है. ऐसी पार्टियों में आपसी औपचारिकता को न रखा जाए ताकि इस में शामिल होने वाले को किसी भी तरह की हिचक न हो.

पार्टी को रोचक बनाने के लिए कुछ गेम्स तैयार किए जा सकते हैं. ये हर उम्र को ध्यान में रख कर तैयार किए जाएं. कोशिश हो कि इस में हर उम्र के लोग शामिल हो सकें. कुछ गेम्स ऐेसे भी हों जिन में महिला और पुरुष एकसाथ हिस्सा ले सकें. इस से आपस में एक अलग किस्म का भरोसा बढ़ता है.

आज के समय में महिलाएं बड़ी संख्या में बिजनैस में हैं. वे केवल बिजनैस में रहती ही नहीं, उस का पूरा हिस्सा होती हैं. उन के फैसलों को पूरा सम्मान मिलता है. अब बिजनैस में महिलाओं की भूमिका रबरस्टैंप से अधिक की हो गई है. ऐसे में महिलाओं को पार्टी में जरूर शामिल किया जाए. महिलाओं को धूम्रपान और ड्रिंक से परेशानी होती है इसलिए पार्टी में इस का प्रयोग न ही किया जाए.

धूम्रपान और ड्रिंक से दूरी

महिलाओं के साथ पार्टी में गलत व्यवहार धूम्रपान और ड्रिंक से ही शुरू होता है. ऐसे में इस को पूरी तरह से पार्टी से बाहर किया जाना जरूरी होता है. पार्टी में खाने का मैन्यू भी इस तरह से तैयार हो कि सभी को पसंद आए. यह न हो कि कुछ खाने की चीजें ऐसी हों जो लोग  पसंद न करें.

आमतौर पर आज के समय में लोग अपनी हैल्थ को ले कर ज्यादा जागरूक हो गए हैं. जिस से वे तलाभुना या ज्यादा मसालेदार चीजें कम खाते हैं. ऐसे में इन बातों का पूरा ध्यान रखना जरूरी होता है.

मसला परिवार का होता है, ऐसे में युवा और बच्चे भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं. बच्चे बडे़ लोगों के साथ सही से एंजौय नहीं कर पाते. ऐसे में उन के लिए कुछ गेम्स की तैयारी कर के रखनी जरूरी होती है. छोटे बच्चे भी अपने हिसाब से खेलते हैं.

उन के लिए भी कुछ मनोरंजन का अलग से इंतजाम हो ताकि उन के पेरैंटस बिना किसी चिंता के आपस में भेंटमुलाकात का मजा ले सकें.

पार्टी का समय इस तरह से रखा जाए जिस में ज्यादा से ज्यादा लोग शामिल हो सकें. कई बार समय का चुनाव ठीक से नहीं होता तो लोग पूरी संख्या में शामिल नहीं हो सकते. बेहतर होता है कि छुट्टी के दिन इस को रखें. इस से सभी लोग पार्टी का हिस्सा बन सकते हैं.

खर्चा घटाएं, मजा बढ़ाएं

मिलजुल कर त्योहार मनाने से त्योहार में होने वाला खर्च घटता है जबकि मजा बढ़ता है. अपने घरपरिवार से दूर रह कर भी घर जैसे मजे लिए जा सकते हैं.

आज के समय में ज्यादातर लोग अपने शहर और घर से दूर कमाई के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं. अपने घर जाने के लिए उन को छुट्टी लेनी होती है. कई बार छुट्टियों में घर जाने के लिए रेलवे, बस और हवाई जहाज के महंगे टिकट लेने पड़ते हैं. मुसीबत उठा कर अपने घर जाना कई बार परेशानी का सबब बन जाता है.

ऐसे में त्योहारों की पार्टी घरघर होने से सब आपस में मिल लेते हैं. इन का आयोजन मिलजुल कर भी कर सकते हैं. इस से सभी लोगों की हर तरह से भागीदारी रहती है और कोई अपने को बोझ नहीं समझता. कम खर्च में अच्छा आयोजन हो जाता है. परिवार के साथ रहने से पति भी दोस्तों के साथ शराब और जुए जैसे खेलों से परहेज करता है.

ऐसे आयोजन होेने से त्योहार का मजा दोगुना हो जाता है. सभी धर्मों के बीच रहने वाले लोग भी इस का हिस्सा बन जाते हैं. इस से अलगअलग जगहों की संस्कृति व खानपान का मजा भी मिलता है.

जिस तरह से आज आपस में दूरियां बढ़ रही हैं उसे कम करने का यह सब से अच्छा माध्यम है कि त्योहारों की खुशियां मिलजुल कर मनाएं. केवल रैजीडैंशियल कौंप्लैक्स में ही नहीं, कसबों, महल्लों, शहरों और गांवों में भी उत्सव के आयोजन मिलजुल कर किए जाने चाहिए. इस से समाज में एक नया प्यार और सौहार्द्र का माहौल बनेगा.

व्यापारियों को भुगतना पड़ रहा जीएसटी की खामियों का हरजाना

जीएसटी के पोर्टल में खराबी को लेकर अब अदालतों ने सरकार से जवाब तलब करना शुरू कर दिया है. आल इंडिया फेडरेशन आफ टैक्स प्रैक्टिशनर्स के जनरल सेक्रटरी संजय शर्मा ने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद से तकनीकी और वैधानिक दिक्कतों को लेकर जैसे-जैसे अपीलें आ रही हैं, अदालतें सवाल उठाती जा रही हैं. दो महीने के भीतर जीएसटी की तारीख तीन बार बढ़ाई जा चुकी है, तारीख का बढ़ना इस बात की तरफ इशारा करता है कि सरकार और उसके सिस्टम की तैयारी ठीक नहीं थी.

रजिस्ट्रेशन और माइग्रेशन फार्म में खामियों, ब्याज और जुर्माना, कंपोजिशन विंडो बंद करने, क्रेडिट के फार्म ट्रान-1 में गड़बड़ियों, एक्सपोर्टर्स का रिफंड रोकने सहित कई मसलों पर दिल्ली सहित कई राज्यों के उच्च न्यायालयों में रोजाना कोई न कोई शिकायत दाखिल कराई जा रही है.

दिल्ली हाई कोर्ट में भी लगातार तकनीकी खामियों के चलते व्यापारियों को हो रहे नुकसान को लेकर याचिकाएं दाखिल हो रही हैं. जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस एम प्रतिभा सिंह की बेंच ने निर्यातकों की इन दाखिल याचिका पर सरकार से जवाब मांगा है कि जीरो रेटेड सप्लाई पर टैक्स नहीं चुकाने के लिए कोई कारोबारी बैंक गारंटी या बौन्ड क्यों जमा करे? कारोबारियों की ओर से इस बात पर भी आपत्ति जताई गई है कि इस नियम के दायरे में 1 करोड़ टर्नओवर से कम के असेसी को ही रखा गया है, जबकि बड़े कारोबारियों को छूट दी गई है.

राजस्थान हाई कोर्ट ने इस अपील पर केंद्र से एक हफ्ते में जवाब मांगा है कि कंप्लायंस में आ रही तकनीकी दिक्कतों का नुकसान कारोबारी क्यों सहें? जब आपका सिस्टम तैयार नहीं था तो कारोबारियों पर ‘क्लिनिकल ट्रायल’ क्यों थोपा.

कन्फेडरेशन के प्रेसिडेंट बी सी भरतिया ने बताया कि देश भर से पोर्टल हैंग होने और एरर की शिकायतें अब भी मिल रही हैं. हमने वित्तमंत्री से मिलने का फैसला किया है. हम सरकार को बताना चाहते हैं कि जीएसटी बड़े चुनौती पूर्ण ढंग से लागू हुई है और सिस्टम से कारोबारियों का भरोसा नहीं उठना चाहिए.

कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने जीएसटी पोर्टल तकनीकी खामियों को लेकर सरकार को आगाह किया. पोर्टल में दिक्कतों की लगातार शिकायतों के बाद संगठन अब वित्तमंत्री से मिलकर इसे गंभीरता से लेने की अपील भी करेगी.

सीमेंट-कंक्रीट से बनेंगी सड़कें, दुर्घटना रोकने का प्रयास

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का यह विज्ञापन आजकल जगहजगह देखने को मिल रहा है कि सड़क दुर्घटनाओं में हर साल लाखों युवा मारे जाते हैं. इस में कहा गया है कि हर साल करीब 3 लाख युवा सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं.

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का यह विज्ञापन आजकल जगहजगह देखने को मिल रहा है कि सड़क दुर्घटनाओं में हर साल लाखों युवा मारे जाते हैं. इस में कहा गया है कि हर साल करीब 3 लाख युवा सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं. यह आंकड़ा निश्चितरूप से चिंता का विषय है. सरकार इस पर नियंत्रण के लिए नियमित कदम भी उठा रही है. मोटर वाहन विधेयक संसद में आया जिसे लोकसभा ने पारित कर दिया लेकिन राज्यसभा में इस में कुछ सुधार किए जाने की बात कही गई है.

इसलिए विधेयक को सुझाव के लिए संसदीय समिति के पास भेजा गया है. सरकार की योजना सड़कों को कंक्रीट तथा सीमेंट की बनाने की भी है. हमारे यहां सिर्फ 2 प्रतिशत सड़कें ही सीमेंटकंक्रीट की हैं, जबकि जरमनी जैसे विकसित देशों में 40 फीसदी सड़कें सीमेंटकंक्रीट से बनी हैं.

दावा किया जा रहा है कि ये सड़कें टिकाऊ होंगी और मरम्मत पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा. साथ ही, सीमेंटकंक्रीट की सड़कें हर मौसम के लिए उपयुक्त होती हैं. इस दिशा में काम करना अच्छा है लेकिन सवाल है कि क्या इस व्यवस्था से सड़क दुर्घटनाएं कम होंगी?

अच्छी सड़कों पर कम दुर्घटना की संभावना जरूर है लेकिन हम लोग सड़क पर चलते समय जब गति नियंत्रण में नहीं रखेंगे और जल्दबाजी के चक्कर में दूसरों की जान से खिलवाड़ करते रहेंगे तथा मानसिकता नहीं बदलेंगे, तो सड़क दुर्घटनाएं कम नहीं होंगी.

सड़कों पर नियम तोड़ना हमारे लिए शान का मामला होता है. हैल्मैट पहन कर दोपहिया वाहन चलाने का नियम है लेकिन हम नियमों की परवा नहीं करते. इसलिए सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा बढ़ रहा है. जरूरत नियमों का पालन करने की भी है, तब ही हम दुर्घटनाओं से बच पाएंगे.

कहीं डुप्लिकेट एसडी कार्ड तो नहीं खरीद रहे हैं आप!

स्मार्टफोन हो या फिर कैमरा माइक्रो एसडी कार्ड का इस्तेमाल दोनों ही डिवाइस में होता है. केवल इस्तेमाल ही नहीं यह फोन और कैमरा दोनों के लिए ही बेहद जरुरी भी है. यह आपके डिवाइस की मैमोरी है, जिसके बिना आपका डिवाइस अधूरा है. इसलिए माइक्रो एसडी कार्ड की डिमांड बढ़ती जा रही है और कई छोटी बड़ी कंपनियां माइक्रो एसडी कार्ड पेश कर रही हैं.

अपने फोन के लिए या कैमरे के लिए माइक्रो एसडी कार्ड खरीदने से पहले आप उस कार्ड के बारे में अच्छी जानकारी ले लें. एक खराब एसडी कार्ड की वजह से आपके डिवाइस में भी दिक्कतें आ सकती हैं.

आज हम आपको बता रहें वो जरुरी बातें जो आपको एक अच्छे माइक्रोएसडी कार्ड को खरीदने से पहले जाननी चाहिए.

तीन फार्मेट

माइक्रो एसडी कार्ड तीन फार्मेट में मौजूद हैं. एसडी, एसडीएचसी एंड एसडीएक्ससी. ये तीनों ही अलग होते हैं और सभी स्लौट्स में काम नहीं करते हैं.

ये है अंतर

एसडी- इसमें 2जीबी तक की स्टोरेज होती है और ये किसी भी स्लौट में प्रयोग किया जा सकता है.

एसडीएचसी- यह 2जीबी से 32जीबी स्टोरेज तक आते हैं.

एसडीएक्ससी- यह 32जीबी से शुरू होकर 2 टीबी तक होते हैं और यह केवल एसडीएक्ससी में सपोर्ट होते हैं.

अलग होती हैं क्लास

एसडी कार्ड अलग अलग क्लास में उपलब्ध हैं, क्लास 2, 4, 6 और 10. यह नंबर इनकी स्पीड बताती है. यानी कि कितनी स्पीड से ये फाइल्स ट्रान्सफर कर सकते हैं.

खरीदते हुए ध्यान रखें

जब आप कार्ड खरीद रहे हों तो आपको ध्यान देना चाहिए कि एस डी कार्ड आपके फोन के लिए सही हो. ज्यादा स्पीड और मैमोरी का कार्ड आपके लिए बेकार है यदि उसे आपका डिवाइस सपोर्ट न करे.

कहीं डुप्लिकेट कार्ड तो नहीं ले रहे हैं आप!

कार्ड खरीदते हुए आपको थोड़ी सावधानी बरतने की जरुरत भी है. ऐसा अक्सर होता है कि हमारा पल्ले डुप्लिकेट कार्ड पड़ जाता है. मार्केट में उपलब्ध हर तीसरा कार्ड फेक हो सकता है.

अवैद्य संबंधों के चक्कर में न बहकें कदम, वरना चुकानी पड़ेगी बड़ी कीमत

पिछले दिनों एक समाचारपत्र में खबर आई थी कि एक विवाहित महिला का एक युवक से प्रेमसंबंध चल रहा था. दुनिया की आंखों में धूल झोंक कर दोनों अपने इस संबंध का पूरी तरह से आनंद उठा रहे थे. महिला के घर में सासससुर, पति और उस के 2 बच्चे थे. पति जब टूअर पर जाता था, तो सब के सो जाने पर युवक रात में महिला के पास आता था. दोनों खूब रंगरलियां मना रहे थे.

एक रात महिला अपने प्रेमी के साथ हमबिस्तर थी, तभी उस का पति उसे सरप्राइज देने के लिए रात में लौट आया. आहट सुन कर महिला और युवक के होश उड़ गए. महिला ने फौरन युवक को वहां पड़े एक खाली ट्रंक में लिटा कर उसे बंद कर दिया. पति आ गया. वह उस से सामान्य बातें करती रही. काफी देर हो गई. पति को नींद नहीं आ रही थी. महिला को युवक को ट्रंक से बाहर निकालने का मौका ही नहीं मिला. बहुत घंटों बाद उस ने ट्रंक खोला. ट्रंक में दम घुटने से युवक की मृत्यु हो चुकी थी.

उस के बाद जो हुआ, उस का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. चरित्रहीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण, तानेउलाहने, पुलिस, कोर्टकचहरी, परिवार, समाज की नजरों में जीवन भर के लिए गिरना. क्या कुछ नहीं सहा उस महिला ने. बहके कदमों का दुष्परिणाम उस ने तो सहा ही, युवक का परिवार भी बरबाद हो गया. बहके कदमों ने 2 परिवार पूरी तरह बरबाद कर दिए.

कभी न भरने वाले घाव

ऐसा ही कुछ मेरठ में हुआ. 2 पक्की सहेलियां कविता और रेखा आमनेसामने ही रहती थीं. दोनों की दोस्ती इतनी पक्की थी कि कालोनी में मिसाल दी जाती थी. दोनों के 2-2 युवा बच्चे भी थे. पता नहीं कब कविता और रेखा के पति विनोद एकदूसरे की आंखों में खोते हुए सब सीमाएं पार कर गए. कविता के पति अनिल और रेखा को जरा भी शक नहीं हुआ. पहले तो विनोद रेखा के साथ ही कविता के घर जाता था. फिर अकेले भी आने लगा.

कालोनी में सुगबुगाहट शुरू हुई तो दोनों ने बाहर मिलना शुरू कर दिया. बाहर भी लोगों के देखे जाने का डर रहता ही था. दोनों हर तरह से सीमा पार कर एक तरह से बेशर्मी पर उतर आए थे. अपने अच्छेभले जीवनसाथी को धोखा देते हुए दोनों जरा भी नहीं हिचकिचाए और एक दिन कविता और विनोद अपनाअपना परिवार छोड़ घर से ही भाग गए.

रेखा तो जैसे पत्थर की हो गई. अनिल ने भी अपनेआप को जैसे घर में बंद कर लिया. दोनों परिवार शर्म से एकदूसरे से नजरें बचा रहे थे. हैरत तो तब हुई जब 10 दिन बाद दोनों बेशर्मी से अपनेअपने घर लौट कर माफी मांगने का अभिनय करने लगे.

रेखा सब के समझाने पर बिना कोई प्रतिक्रिया दिए भावशून्य बनी चुप रह गई. बच्चों का मुंह देख कर होंठ सी लिए. विनोद को उस के अपने मातापिता और रेखा के परिवार ने बहुत जलील किया पर अंत में दिखावे के लिए ही माफ किया. सब के दिलों पर चोट इतनी गहरी थी कि जीवन भर ठीक नहीं हो सकती थी.

कविता को अनिल ने घर में नहीं घुसने दिया. उसे तलाक दे दिया. बाद में अनिल अपना घर बेच कर बच्चों को ले कर दूसरे शहर चला गया. लोगों की बातों से बचने के लिए, बच्चों के भविष्य का ध्यान रखते हुए रेखा का परिवार भी किसी दूसरे शहर में शिफ्ट हो गया. रेखा को विनोद पर फिर कभी विश्वास नहीं हुआ. दोस्ती से उस का मन हमेशा के लिए खट्टा हो गया. उस ने फिर किसी से कभी दोस्ती नहीं की. बस बच्चों को देखती और घर में रहती. विनोद हमेशा एक अपराधबोध से भरा रहता.

क्षणिक सुख

दोनों घटनाओं में अगर अपने भटकते मन पर नियंत्रण रख लिया जाता, तो कई घर बिखरने से बच जाते. कदम न बहकें, किसी का विश्वास न टूटे, इस तरह के विवाहेत्तर संबंधों में तनमन को जो खुशी मिलती है वह हर स्थिति में क्षणिक ही होती है. इन रिश्तों का कोई वजूद नहीं होता. ये जितनी जल्दी बनते हैं उतनी ही जल्दी टूट भी जाते हैं.

अपनी बेमानी खुशियों के लिए किसी के पति, किसी की पत्नी की तरफ अगर मन आकर्षित हो तो अपने मन को आगे बढ़ने से पहले ही रोक लें. इस रास्ते पर सिर्फ तबाही है, जीवन भर का दुख है, अपमान है. परपुरुष या परस्त्री से संबंध रख कर थोड़े दिन की ही खुशी मिल सकती है. ऐसे संबंध कभी छिपते नहीं.

यदि आप के वैवाहिक रिश्ते में कोई कमी, कुछ अधूरापन है तो अपने जीवनसाथी से ही इस बारे में बात करें, उसे ही अपने दिल का हाल बताएं. पति और पत्नी दोनों का ही कर्तव्य है कि अपना प्यार, शिकायतें, गुस्सा, तानेउलाहने एकदूसरे तक ही रखें.

स्थाई साथ पतिपत्नी का ही होता है. पतिपत्नी के साथ एकदूसरे के दोस्त भी बन कर रहें तो जीने का मजा ही और होता है. अपने चंचल होते मन पर पूरी तरह काबू रखें वरना किसी भी समय पोल खुलने पर अपनी और अपने परिवार की तबाही देखने के लिए तैयार रहें.

तवायफ को बीवी बनाने के लिए इस शख्स ने उठाया बड़ा कदम

पेशे से ड्राइवर विपिन पांडे मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले का रहने वाला था. अकसर उसे सवारियां ले कर नागपुर जाना पड़ता था. यह रास्ता महज ढाई घंटे का था.

नागपुर में सवारियां छोड़ कर वापस छिंदवाड़ा की सवारियों की बाट जोहता विपिन खाली समय में सैक्स की जरूरत को पूरा करने के लिए कोठे पर जाने लगा था. गंगाजमुना गली ‘संतरों का शहर’ कहे जाने वाले नागपुर की बदनाम गली है, जहां कोठों पर इफरात से देह धंधा होता है. अब से कुछ महीने पहले विपिन ऐसे ही एक कोठे पर गया, तो कोठे की मालकिन परवीन ने उसे पिंकी के पास भेज दिया.

जब विपिन पिंकी के पास पहुंचा, तो उसे ठगा सा देखता रह गया. चौड़ा माथा, बड़ीबड़ी आंखों के अलावा दुनियाभर की मासूमियत पिंकी के चेहरे पर उस ने देखी, तो वह अपने आने का मकसद ही भूल गया.

पिंकी ने आने वाले इस तगड़ेरोबदार नौजवान ग्राहक की हिचकिचाहट देखी, तो वह चौंक गई. वह तो यह मान कर चल रही थी कि अब यह ग्राहक अपने पैसों की कीमत वसूलने के लिए दूसरे ग्राहकों की तरह उस पर टूट पड़ेगा.

दोनों की नजरें मिलीं और ऐसी मिलीं कि वे एकदूसरे की आंखों से होते हुए दिलों में बस गए. प्यार का इजहार होते देर न लगी. दोनों ने बहुत देर तक कुछ इस तरह दिल की बातें कीं, मानो पहले से एकदूसरे को जानते हों.

विपिन जब वहां से जाने लगा, तो पिंकी अपने दिल और जज्बातों को काबू में नहीं रख पाई और उस का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘दोबारा आइएगा.’’ इस पर विपिन ने दरवाजे से पलटते हुए पिंकी को अपनी बांहों में भरा और जल्द ही आने का वादा भी किया.

पिंकी के दिल में हलका सा शक था कि कहीं विपिन बाहर जा कर उसे भूल न जाए और मुमकिन है कि यह उस की कोरी हमदर्दी रही हो. उधर विपिन के दिल का हाल भी बेहाल था. पहली मुलाकात में ही पिंकी उस के दिलोदिमाग पर छा गई थी.

वादे के मुताबिक विपिन दोबारा परवीन के कोठे पर गया और इस दफा भी पिंकी की फरमाइश की तो बुढ़ाती परवीन चौंकी नहीं, क्योंकि कोठों पर आने वाले ग्राहकों की इस तासीर को वह खूब समझती थी कि कई दफा ग्राहक जिस लड़की से संतुष्ट हो जाते हैं, फिर बारबार उसी की मांग करते हैं. परवीन को कतई अंदाजा नहीं था कि उस के पिंजरे में बंद पिंकी नाम की मैना को इस तोते से इश्क हो गया है, जिस की इजाजत कोठों के सख्त उसूल नहीं देते हैं.

दर्द से भरी दास्तां

दूसरी बार जब विपिन पिंकी के पास आया, तो उस की कहानी ने विपिन को भीतर तक झकझोर दिया. राजस्थान के बूंदी जिले के गांव शंकरपुरा के कंजर समुदाय में पैदा हुई पिंकी जब महज 15 साल की थी, तब उस के मांबाप की मौत हो गई थी. चूंकि उस के पिता ने 2 शादियां की थीं, इसलिए उस की सौतेली मां उसे अपने भाई राजा उर्फ ठेला के यहां ले आई.

गुजरबसर के लिए सौतेली मां देह धंधा करने लगी और राजा अपनी बहन की दलाली कर ग्राहक ढूंढ़ढूंढ़ कर लाने लगा, तो पैसों की बरसात होने लगी. पिंकी को यह सब अच्छा नहीं लगता था. वह चाहती थी कि गुजारा तो मेहनतमजदूरी कर के भी किया जा सकता है, फिर यह गंदा धंधा क्यों?

जवान होती पिंकी पर हर किसी की नजर ठहर जाना कुदरती बात थी, पर सौतेली मां के पास आए ग्राहकों की नजरों का वह सामना नहीं कर पाती थी, जो सीधे उस के नाजुक अंगों पर जा पड़ती थीं. पिंकी अब इस बात से डरने लगी थी कि कहीं मां और मामा उस से भी यह पेशा न कराने लगें. लेकिन खामोशी से यहां रहते हुए सबकुछ देखने और सहने के अलावा उस के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था.

एक दिन सौतेले मामा ने पिंकी को बताया कि अब उसे ग्वालियर में रहने वाले मौसा के यहां जाना है, तो पिंकी की खुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि इस गंदगी से उसे आजादी जो मिल रही थी.

लेकिन पिंकी का यह खयाल गलत निकला. दरअसल, सौतेले मामा ने उसे मौसा के हाथों 9 लाख रुपए में बेच दिया था. मौसा पान सिंह ग्वालियर के रेशमपुरा इलाके में रहता था, जो देह धंधे के लिए बदनाम है. जल्द ही अपने 9 लाख रुपए वसूलने के लिए पान सिंह ने उस से धंधा कराना शुरू कर दिया, तो मासूम पिंकी समय से पहले ही सयानी हो गई.

कुछ महीने पिंकी अपने जिस्म के जरीए मौसा का कर्ज चुकाती रही, फिर एक दिन उसे पता चला कि अब उसे नागपुर जाना है, क्योंकि मौसा पान सिंह ने उसे वहां की मशहूर तवायफ परवीन के हाथों 15 लाख रुपए में बेच दिया है. इस तरह पिंकी गंगाजमुना गली में आ कर वहां की रौनक बन गई. चूंकि वह कम उम्र और कसे बदन की थी, इसलिए उस के पास ग्राहकों की भीड़ उमड़ने लगी थी.

फिर मचा हंगामा

विपिन ने पिंकी की कहानी सुनी, तो वह और भी जज्बाती हो उठा. एक दिन मौका देख कर वह पिंकी को ले कर कोठे से भाग गया. दोनों बैतूल जिले के मुलताई इलाके में आ गए, जहां विपिन ने 3 मार्च, 2017 को उस से कोर्ट मैरिज कर ली.

किसी की बीवी बनने का पिंकी का सपना तो पूरा हो गया था, पर वह जानती थी कि परवीन के गुरगे उन्हें छोड़ेंगे नहीं. बात सच भी थी. पिंकी के भागने की खबर से तिलमिलाई परवीन ने बड़े पैमाने पर उसे ढूंढ़ने के लिए अपने आदमी लगा दिए थे.

पिंकी को ले कर विपिन भोपाल आ गया. वहां शिवाजी नगर इलाके में उस के मौसा प्रकाश शर्मा पुलिस महकमे में थे. मौसामौसी के सामने विपिन ने यह तो मान लिया कि उस ने नागपुर की रहने वाली पिंकी से लव मैरिज कर ली है, पर उस की पूरी हकीकत नहीं बताई. प्रकाश शर्मा ने कुछ सोचसमझ कर दोनों को अपने घर पर रहने की इजाजत दे दी, तो दोनों की खुशी दोगुनी हो गई.

विपिन को भरोसा था कि कुछ दिनों की नाराजगी के बाद घर वाले भी पिंकी को बतौर बहू मंजूर कर लेंगे और इस तरह वह और पिंकी इज्जत की जिंदगी गुजारेंगे. उस का मौसेरा भाई गौरव अभी कालेज में पढ़ रहा था, जो नई भाभी को देख कर खुशी से फूला नहीं समाया था.

पिंकी अपने मौसा ससुर के यहां दिल लगा कर काम करती थी. उस का मकसद इन लोगों का दिल जीतने के अलावा खुद को एक अच्छी बहू साबित करना भी था. महज 15 दिनों में ही पिंकी अपनी गुजरी जिंदगी को भूल चली थी. विपिन ने भी एक टै्रवल एजेंसी में ड्राइवर की नौकरी कर ली थी, ताकि वे दोनों मौसा पर बोझ न बनें.

23 मार्च, 2017 की सुबह थी. प्रकाश शर्मा के घर 2 बड़ी गाडि़यां आ कर रुकीं और उन में से 16 लोग उतरे और घर में घुस कर पिंकी को ढूंढ़ने लगे. पिंकी उस वक्त गौरव का टिफिन तैयार करने के लिए रसोईघर में काम कर रही थी. उन 16 लोगों में से कुछ आवाजें उसे जानीपहचानी लगीं, तो वह पीछे के दरवाजे से भाग खड़ी हुई. वे सब उस के पुराने नातेरिश्तेदार और परवीन के गुरगे ही थे.

उन लोगों ने गौरव और उस की मां को खूब मारा. प्रकाश अपने दफ्तर और विपिन नौकरी पर जा चुका था. एक पुलिस वाले के यहां दिनदहाड़े मारपीट की वारदात होने से पड़ोसी बाहर आए, तो गुंडों ने उन्हें भी धमकाया और गौरव को अपने साथ गाड़ी में यह कहते हुए ले गए कि विपिन और पिंकी को दे कर इसे ले जाना. इस वारदात की खबर से भोपाल में हड़कंप मच गया. गुंडे गौरव को ले कर ब्यावराराजगढ़ के रास्ते राजस्थान की तरफ भाग रहे हैं, यह जानकारी पुलिस वालों को गौरव के मोबाइल फोन की लोकेशन से मिलती रही, जिस पर गुंडों का ध्यान नहीं गया था.

मामला चूंकि पुलिस महकमे में काम कर रहे मुलाजिम के बेटे को अगवा किए जाने का था, इसलिए पुलिस वालों ने चीते सी फुरती दिखाई और इस पूरे गिरोह को ब्यावरा के पास घेर कर सभी को गिरफ्तार कर लिया. इन में पिंकी के मामा और मौसा भी शामिल थे. भोपाल में जब हकीकत खुली, तो सुनने वाले हैरान रह गए कि विपिन ने एक तवायफ से शादी की है, जिस की वजह से गौरव को अगवा किया गया था.

मुजरिम गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए, पर पिंकी को ले कर तरहतरह की चर्चाएं होती रहीं. किसी ने विपिन की इस पहल को उस की बेवकूफी और नादानी बताया, तो कइयों ने उसे शाबाशी दी कि मर्द हो तो ऐसा, जिस ने जिंदगी और प्यार के सही माने समझे और एक मिसाल पेश की.

विपिन अभी भी इस बात पर टिका हुआ है कि वह पिंकी का साथ किसी भी सूरत में नहीं छोड़ेगा और उस से शादी की है तो निभाएगा भी. वहीं पिंकी को डर है कि जेल से बाहर आते ही परवीन के गुरगे उसे और विपिन को मार डालेंगे, इसलिए वे दोनों अब अलग कहीं रहने लगे हैं.

बोडो संघर्ष बयां करती बुनकरी, हुनर से नई इबारत लिख रहे हैं लोग

अकसर हम असम को केवल बोडो समस्या के लिए याद करते हैं, लेकिन इस के अलावा भी वहां बहुतकुछ है. असम के इन्हीं बोडोलैंड इलाकों की बोडो बुनकरों ने अपने हुनर से नई इबारत लिखनी शुरू कर दी है.

असम की इन आदिवासी बोडो औरतों ने बुनकरी की कला के जरीए अपने हाथों का हुनर दुनिया के सामने पेश किया है. असम के चिरांग जिले के रौमई गांव की इन बुनकरों के बनाए कपड़ों की पहचान सात समंदर पार तक है. बोडो बुनकरों के हाथों से बने ये कपड़े केवल कपड़े ही नहीं हैं, बल्कि उन हजारों बोडो औरतों का जुनून है, जो उन्हें अपने दम पर कुछ करने की ओर आगे बढ़ा रहा है.

लेकिन अफसोस की बात यह है कि दुनियाभर की औरतों के लिए साड़ी बुन रहीं ये असमिया औरतें अपना तन भी पूरी तरह से नहीं ढक पाती हैं.

इन बुनकरों के बनाए कपड़े आज अमेरिका, जरमनी और दुबई में बड़ी तादाद में बिक रहे हैं. इन के द्वारा संचालित सब से बड़ा शोरूम बेंगलुरु में खोला गया है. असम में भी कई छोटेछोटे स्टोर चलाए जा रहे हैं. कच्चा माल बेंगलुरु से असम आता है और रंगाई तमिलनाडु में होती है. हालांकि अब असम में ही रंगाई शुरू करने की कोशिशें की जा रही हैं.

कपड़ों पर गंवई सभ्यता

इन औरतों द्वारा बनाई जा रही साडि़यों के डिजाइनों में गांवदेहात की सभ्यता बेहद खूबसूरती से झांकती है. इन में मोर, पत्तियां, कछुए की आकृति जैसे डिजाइन सब से ज्यादा पसंदीदा माने जाते हैं.

तकरीबन 3 सौ से ज्यादा बुनकरों के कपड़ों का यह कारोबार सालाना एक करोड़ रुपए तक पहुंच गया है. खास बात यह भी है कि तकरीबन 3 मीटर का दुकना यानी साड़ी जैसा कपड़ा पहनने वाली ये बुनकर अपने ठेठ और आदिवासी अंदाज को भूलती नहीं हैं.

एक ही मंत्र ‘सहकारिता’

ये बुनकर औरतें सहकारिता के मूल मंत्र को ले कर काम कर रही हैं. रौमई गांव के पास बड़े कसबे बोंगाईगांव के सुदूर गांवदेहात के इलाकों में भी ये औरतें अपने घरों पर ही कपड़ा बनाती हैं. जिस औरत के यहां काम हो रहा होता है, उस की मदद के लिए दूसरी औरतें भी वहां पहुंच जाती हैं.

देशी तकनीक

देशी तकनीक से बनी मशीनों पर धागा और साड़ी बुनने के काम के लिए ये औरतें 7-8 हजार रुपए महीने तक कमा लेती हैं. अमूमन, एक औरत का टारगेट 30 मीटर साड़ी या दूसरा कपड़ा बुनने का होता है. अगर कोई औरत

30 मीटर की साड़ी तय समय में बना पाने में नाकाम रहती है, तो समूह की दूसरी औरतें उस की मदद करने में जुट जाती हैं.

बनाया ‘साइकिल बैंक’

इन बुनकरों को अपने रोजमर्रा के काम जैसे पानी लाना, सब्जी लाना वगैरह के लिए तकरीबन 2 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ता था, जिस में काफी समय बरबाद होता था. इस के लिए संस्था ने औरतों को लोन पर साइकिल मुहैया कराना शुरू किया है. इस के बाद इन औरतों ने आपसी समझ से अक्तूबर, 2013 में खुद का ‘साइकिल बैंक’ बना लिया.

इस बैंक को चलाने वाली रीमा बताती हैं कि 11 ग्रुप बनाए गए हैं. हर ग्रुप में 12 सदस्य शामिल हैं. हर औरत ने 40 से 60 रुपए हर महीना इकट्ठा करना शुरू किया. जिस औरत को बैंक से साइकिल लेनी होती है, उसे अमानत के रूप में 11 सौ रुपए जमा कराने पड़ते हैं. साथ ही, हर महीने किस्त के रूप में सौ रुपए और ब्याज के रूप में 60 रुपए देने पड़ते हैं. अब तक 68 औरतों ने ‘साइकिल बैंक’ से साइकिलें खरीदी हैं.

साइकिल न केवल इन औरतों के लिए जरूरी बन गई है, बल्कि मनोरंजन का साधन भी बन गई है. औरतों के बीच महीने में एक बार धीमी और तेज साइकिल चलाने की रेस भी कराई जाती है.

हाउसिंग फौर औल सब्सिडी स्कीम लौंच, जानिए क्या आपको मिलेगी ये सुविधा

सरकार की ‘हाउसिंग फौर औल-2022’ स्कीम लांच हो चुकी है. इसके तहत होम लोन पर 15 साल की अवधि तक 6.5 फीसदी तक की ब्याज छूट देने की घोषणा की गई है. चलिये जानते हैं कि क्या आपको मिल पाएगी यह सब्सिडी?

सब्सिडी की सौगात

सरकार ने इस योजना की घोषणा वर्ष 2016 में की थी. इसकी घोषणा के बाद से ही ऐसे कई लोग जो घर का सपना पाले हुए थे इसके लागू होने पर टकटकी लगाए हुए थे. अब जब यह योजना लागू हो चुकी है तो लोगों का खुश होना लाजमी है. इस स्कीम के तहत इडब्ल्यूएस  और एलआईजी कैटिगरी के मकानों के लिए 15 साल के लोन पर ब्याज सब्सिडी को मंजूरी दे दी गई है. यही नहीं सरकार ने इन मकानों के होम लोन पर 15 साल की अवधि तक 6.5 फीसदी तक की ब्याज छूट देने की घोषणा की है. इस कदम से प्रभावी ब्याज दर सिर्फ 4 फीसदी रह जाएगा. घटे ब्याज का बोझ बैंकों पर न पड़े, इसके लिए सरकार सब्सिडी देगी. इस से हर एक शहरी गरीब को 2 लाख 30 हजार रुपये का लाभ होगा.

इस तरह से दी जाएगी सब्सिडी

शहरी विकास मंत्रालय के मुताबिक, फिलहाल 6 लाख रुपये के लोन पर 10.50 प्रतिशत की ब्याज दर से 15 साल तक 6,632 रुपये मासिक देने पड़ते हैं, लेकिन सब्सिडी मिलने के बाद इसमें 2,582 रुपये घट जाएंगे और ईएमआई 4,050 रुपये ही देनी पड़ेगी. सरकार ने अगले 7 सालों के भीतर 2 करोड़ नए मकान बनाने का लक्ष्य रखा है. वर्तमान में हुडको और एएचबी को इस कार्य के लिए केंद्र की नोडल एजेंसी बनाया गया है.

कौन उठा पाएगा फायदा

अब जरा योजना के इन पहलुओं पर नजर डालें तो आपको समझ आ जाएगा कि आखिरकार ये योजना है किसके लिए. दरअसल इस योजना में आर्थिक रूप से कमजोर तबके का ध्यान रखा गया है. इस स्कीम के तहत इडब्ल्यूएस और एलआईजी कैटिगरी के मकानों के लिए ही सब्सिडी दी जाएगी. इसका फायदा उठाने के लिए आपकी एन्युअल हाउसहोल्ड इनकम तीन लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए. इसके अलावा लोअर इनकम ग्रुप जिनकी एन्युअल हाउसहोल्ड इनकम तीन से छह लाख के बीच होगी वह भी एलिजिबिल होंगे. डिसएबल्ड, ट्रांसजेंडर, महिलाएं, विधवा महिला, शेड्यूल कास्ट एंड ट्राइब्स को वरीयता मिलेगी. कोई भी अगर चाहे तो बिल्डर फ्लैट चाहे वो अंडर कंस्ट्रक्शन हो अथवा पूरी तरह से तैयार हो, खुद मकान बनवा रहा हो यो उसमें विस्तार कर रहा हो,  इस योजना का लाभ उठा सकता है.

कट जाएगा पत्ता

ऊपर के प्रावधानों से इतर अगर किसी ने इस योजना का लाभ उठाने की कोशिश की तो उसकी दाल नहीं गलेगी. अगर योजना के लागू होने के वक्त किसी की आयु 70 पार कर जाती है तो उसका पत्ता भी कट जाएगा. इसके अलावा अगर ईडब्लू मकानों का साइज 30 स्क्वायर मीटर (कारपेट) एवं एलआईजी के लिए 60 स्क्वायर मीटर (कारपेट) से ज्यादा होने पर भी योजना का लाभ नहीं मिलना तय है. कोई और मकान भी आपके नाम होने पर बाजी हाथ नहीं लगेगी.

बच्चियों से सैक्स के ये मामले आपको सोचने पर मजबूर कर देंगे

उत्तर प्रदेश राज्य के हसनगंज कोतवाली इलाके का रहने वाला रमेश पेशे से बढ़ई था. कुछ दिन पहले उस ने काम करने का ठेका लिया था, जिस के लिए वह बेंगलुरु गया था.

रमेश की बेटी रीना (बदला नाम) दूसरी जमात में पढ़ती थी. वह डांस करने में अच्छी थी और खूबसूरत भी.

लखनऊ में होने वाले हजरतगंज कार्निवाल में उस ने डांस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. उस समय के डीएम राजशेखर ने उसे 50 हजार रुपए का इनाम दिया था. रीना के परिवार में उस के मातापिता, 2 बहनें और 3 भाई थे.

एक रविवार की सुबह 8 बजे रीना दूध लेने बाजार गई थी. इस के बाद उस की मां काम करने बाहर चली गई थी.

शाम को तकरीबन 4 बजे जब मां वापस आई, तब रीना घर पर नहीं थी. उस ने दूसरे बच्चों से पूछा, तो पता चला कि रीना सुबह से ही बाहर है और अब तक घर नहीं लौटी है.

रीना की तलाश शुरू हुई. महल्ले की हर गली, हर सड़क पर मां और उस के बच्चे उसे तलाश करते रहे.

मां ने पुलिस को 100 नंबर पर फोन कर के बताने की कोशिश की, पर किसी ने फोन नहीं उठाया. जब रीना का कुछ पता नहीं चला, तो वे लोग थाने गए और बेटी के लापता होने की बात बताई. पुलिस वालों ने परिवार के लोगों से कहा कि तुम खोज लो कि लड़की कहां गई थी. इसी बीच एक दिन बीत गया.

सोमवार की दोपहर निरालानगर में कार बाजार में सफाई करने वाला लड़का कार की सफाई कर रहा था, तो उसे कार की पिछली सीट पर एक बच्ची की लाश पड़ी मिली. वहां से पुलिस को सूचना मिली. तब आननफानन लड़की की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखी गई. पुलिस को बच्ची की लाश के नाखूनों में बाल मिले, जिस से लग रहा था कि उस ने खुद को बचाने की कोशिश की थी.

बच्ची की आंखें और जबान बाहर निकली हुई थी और मुट्ठी बंधी हुई थी, जिस से उस के दर्द का एहसास बराबर समझ आ रहा था.   बच्ची के शरीर पर काले रंग की लैगिंग और पीले रंग का कुरता था. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे.

बच्ची की लाश मिलने की जानकारी जब घर वालों को मिली, तो वे भागेभागे आए और चीखतेचिल्लाते जमीन पर गिर पड़े. वह बच्ची रीना थी. उस की मां ने राजुल नामक लड़के पर शक जाहिर किया, क्योंकि एक दिन पहले वह रीना को बहलाफुसला कर उसी कार के पास ले गया था. उस दिन रीना की मां वहां आ गई थी.

पुलिस ने राजुल को पकड़ा. वह साफसफाई का काम करता था. वह रीना को अकसर टौफी भी देता था.

राजुल ने पुलिस को बताया कि उस ने रीना को कार में बिठाया था. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के बाद यह पता चला कि रीना के अंगों पर चोट के निशान मिले. मौत की वजह सिर में लगी चोट को माना गया. रीना का विसरा सुरक्षित रख लिया गया.

यह वारदात लखनऊ शहर की है, जहां हर वक्त भीड़ रहती है. यह वारदात सवाल उठाती है कि बच्ची से सैक्स करने के लिए अपराध क्यों किया जाता है? यह किसी एक शहर की वारदात नहीं है. बहुत सी जगहों पर ऐसे अपराध तेजी से होने लगे हैं.

सैक्स की भूख

मनोचिकित्सक डाक्टर मधु पाठक  का कहना है, ‘‘सैक्स की भूख और दिमागी बीमारी आदमी को अपराधी बना देती है. छोटी मासूम बच्चियों को बहलानाफुसलाना और उन को काबू में करना आसान होता है.‘‘बलात्कार करने वाले आदमी दिमागी रूप से बीमार होते हैं. उन को लगता है कि वे किसी सामान्य औरत के साथ सैक्स संबंध नहीं बना सकते हैं. ऐसे में वे छोटी बच्चियों को अपना शिकार बनाते हैं.

‘‘ज्यादातर मामलों में ऐसे अपराधी बच्चियों के साथ खेलतेखेलते उन को बहलानेफुसलाने का काम करते हैं. इस दौरान वे उन के नाजुक अंगों से खेलते हैं. बच्चियों को इस बारे में पता नहीं होता, इसलिए वे ज्यादा विरोध नहीं कर पाती हैं.

‘‘कई बार तो सैक्स के दौरान ही बच्चियों की मौत हो जाती है और कई बार खुद को बचाने के लिए ऐसे लोग उन की हत्या तक कर देते हैं.’’
अच्छी छुअन की समझ
कुछ लोग सैक्स को ले कर इतने बीमार होते हैं कि वे शरीर को छू कर ही खुश हो जाते हैं. ऐसे लोग दूसरी औरतों के जिस्म को भी छूने की कोशिश करते हैं. राह चलते, बस, ट्रेन और हवाईजहाज तक में सफर के दौरान वे ऐसी हरकतें करने की कोशिश करते हैं. इस को ‘ईव टीजिंग’ यानी छेड़छाड़ कहा जाता है.

रैड ब्रिगेड, लखनऊ की उषा विश्वकर्मा कहती हैं, ‘‘गुड टच और बैड टच यानी अच्छी छुअन और बुरी छुअन की जानकारी बच्चों को देना बहुत ही जरूरी होता है.

‘‘आमतौर पर बीमार सोच के लोग बच्चियों के नाजुक अंगों पर हाथ फेरते हैं. देखने वालों को यह सामान्य लगता है, पर यह उन को खुशी देता है.

‘‘ऐसे में मांबाप की जिम्मेदारी बनती है कि वे बड़ी होती बच्चियों को यह जानकारी दें कि किस तरह से लोग उन को छूने की कोशिश करते हैं.

‘‘वैसे तो उम्र के साथसाथ बड़ी होती लड़कियों को यह पहले से पता चल जाता है कि उन को छूने वाले की मंशा क्या है, छोटी उम्र खासकर 6 साल से

9 साल की लड़कियों में यह समझ नहीं होती है. उन्हें लगता है कि जिस तरह से उन के घर के लोग लाड़प्यार में उन को छूते हैं, वैसे ही दूसरे लोग भी छू रहे हैं. इसलिए बच्चियों को यह बताना जरूरी है कि लाड़प्यार से छूने और सैक्स की सोच वाले के छूने में फर्क होता है.’’

बच्चियों पर कहर
गरीब भिखारी बच्चियों के बीच काम करने वाली लड़कियों को वहां से हटा कर स्कूल भेजने और उन्हें सही राह दिखाने की कोशिश करने वाली सोनाली सिंह कहती हैं, ‘‘आम समाज में रहने वाली लड़कियों को ही नहीं, बल्कि भीख मांगने वाली लड़कियों को भी ऐसे लोग अपना निशाना बनाते हैं.

‘‘आमतौर पर भीख मांगने में पूरे दिन में उतना पैसा नहीं मिलता, जितना किसी आदमी के साथ सैक्स के दौरान मिल जाता है. ऐसे में केवल मजदूर, रिकशा चलाने वाले ही नहीं, बल्कि ड्राइवर, चपरासी या दूसरे ऐसे लोग भीख मांगने वाली लड़कियों को बहलाफुसला कर ले जाते हैं. 1-2 बार सैक्स करने के बाद ये लड़कियां भी इस की आदी हो जाती हैं.

‘‘ऐसे लोग बड़ी चतुराई से इन लड़कियों को नशा करने की आदत भी डाल देते हैं, जिस के चलते इन को पैसों की जरूरत पड़ती रहती है और ये सैक्स की भूख मिटाने का जरीया बनी रहती हैं. हालत यह होती है कि कईकई लड़कियां तो 12 साल से 14 साल की उम्र में ही मां बन जाती हैं.

‘‘यह बात इन के मांबाप को भी पता  चल जाती है. कुछ दिनों तक तो ये छोटे बच्चे को अपने साथ रखती हैं, बाद में उस को किसी और के हवाले कर खुद फिर उसी दुनिया में चली जाती हैं.

‘‘भीख मांगने वाली गरीब लड़कियां सैक्स का सब से बड़ा जरीया बनती जा रही हैं. हालात ये हैं कि जल्दी मां बनने और दूसरी बीमारियों का शिकार हो कर इन में से ज्यादातर लड़कियां जवान होने से पहले ही मर जाती हैं.’’

किसी को नहीं चिंता

ऐसे ज्यादातर मामले गरीब घरों की बच्चियों के साथ होते हैं. इस मामले में पुलिस और कानून दोनों ही बहुत सुस्ती से काम करते हैं.

रीना की मां जब बेटी के गायब होने पर पुलिस थाने गई, तो पुलिस ने उस से रिपोर्ट तो ले ली, पर रीना को तलाश नहीं किया. अगर पुलिस ने उस दिन अपना काम शुरू कर दिया होता तो हो सकता है कि रीना बच जाती या उस का पता पहले चल जाता.

यही नहीं, ज्यादातर मामलों में अगर गंभीर किस्म की वारदात न हो जाए, तो घरपरिवार के लोग चुप हो जाते हैं. वे अपनी शिकायत कहीं दर्ज नहीं कराते हैं. ऐसे में अपराध करने वालों का हौसला बढ़ता है.

लखनऊ के ही एक स्कूल की घटना है. वहां काम करने वाले एक मुलाजिम ने छोटी बच्ची के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार करने की कोशिश की. बच्ची इस बात से डर गई और उस ने स्कूल जाना ही बंद कर दिया.

उस के मांबाप ने जब पूछा, तो वह कुछ बोली ही नहीं. मांबाप को लगा कि हो सकता है, स्कूल की किसी टीचर ने कुछ कहा हो. ऐसे में जब वे टीचर से मिलने की बात कहने लगे, तो बच्ची ने अपने डर की वजह बताई और तब घर वालों को पता चला कि स्कूल का एक मुलाजिम उसे डरा कर रखता था. स्कूल में शिकायत होने पर उस को हटाया गया.

ऐसे कई मामलों में केवल टीचर ही नहीं, प्रिंसिपल तक पर आरोप लग चुके हैं. यह जरूर है कि बड़े मामलों में लड़की से छेड़छाड़ तक मामला रहता है, पर गरीब बच्चियों के साथ बात बलात्कार और हत्या जैसे मामलों तक पहुंच जाती है.

कई बार लोग बच्चियों के घर वालों को पैसे दे कर मामला दर्ज न कराने का दबाव बनाते हैं. बहुत बार पैसों के दबाव में पुलिस भी आपस में समझौता कराना ठीक समझती है.

निशाने पर गरीब

‘आभा जगत ट्रस्ट’ की अध्यक्ष शिवा पांडेय कहती हैं, ‘‘गरीब बच्चियों के बहुत सारे ऐसे मामले दबा दिए जाते हैं. इन की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती है. ऐसे में कुसूरवार को सजा नहीं मिलती. अपराध करने वाले ज्यादातर शराब के नशे में होते हैं. उन्हें खुद पता नहीं चल पाता कि नशे में वे शैतान बन चुके हैं.

‘‘पुलिस भी तभी काम करती है, जब उस पर दबाव होता है. कई बार तो हत्यारे पकड़े ही नहीं जाते याफिर किसी दूसरे को जेल भेज कर मामले को खत्म कर दिया जाता है. ऐसे मामले ज्यादातर गरीब और दलित जाति की लड़कियों के साथ होते हैं.’’

शिवा पांडेय गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं. वे बताती हैं कि इन के घरों में रहने की जगह नहीं होती. ऐसे में ये बच्चियां किसी दूसरी जगह पर सोने या रहने लगती हैं. वहां आसपास

के लोग इस का फायदा उठाते हैं. गरीब बच्चे भी दूसरे बच्चों की तरह टौफी, चौकलेट, कोल्ड ड्रिंक पीना चाहते हैं. इन के घर वाले पैसे दे नहीं पाते, तो दूसरे लोग खिलापिला कर बहलाफुसला लेते हैं. कई बार तो ये बातें किसी को पता ही नहीं चलतीं. जब कभी कोई वारदात हो जाती है, तो ही बात सामने आ पाती है.

देश में एक तबका कितना भी क्यों न चमक रहा हो, दूसरा तबका बहुत पीछे है. ऐसे में उस का शोषण करना लोग अपना हक समझते हैं. कई बार ऐसे मामले खबरों में आते हैं, जहां बलात्कार की शिकार को पैसे दे कर समझौता करा दिया जाता है. जब तक यह सुधार नहीं होगा, तब तक हालात नहीं बदलेंगे.

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