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उम्र के 64वें पड़ाव पर मां बनी एक महिला की कहानी

मानव जीवन के चक्र में जब कभी कुछ आश्चर्यजनक व सुखद घटित हो जाता है, तब जीवन में इंद्रधनुषी रंग बिखर जाते हैं. ऐसा ही कुछ हुआ 65 वर्षीय जगदीश प्रसाद मीणा और उन की पत्नी चमेली मीणा के जीवन में. 64 वर्षीय चमेली ने इस उम्र में एक पुत्र को जन्म दिया.

इस सब के बारे में जानने के लिए जब हम राजधानी दिल्ली के शकरपुर इलाके में स्थित उन के निवास पहुंचे, तो जगदीश प्रसाद और चमेली दोनों ही बच्चे को खिला रहे थे. बड़ा प्यारा बच्चा है, पूरी तरह स्वस्थ है.

जगदीश प्रसाद से पूछने पर कि उम्र के इस मोड़ पर बच्चे को पैदा करने का ध्यान कैसे आया, तो वे कहते हैं, ‘‘जीवन का घटनाक्रम कुछ ऐसा रहा कि हम बहुत ही हताश हो गए. दरअसल, हमारा बेटा 31 वर्ष का था. संदिग्ध परिस्थितियों में उस की अचानक मृत्यु हो गई. हम दुख के सागर में डूबे हुए थे.

‘‘कुछ समय बाद हम दोनों पतिपत्नी ने हिम्मत जुटाई और एक नई सोच को जन्म दिया जो हट कर थी. पहले तो हम ने सोचा कि क्यों न हम सरोगेसी द्वारा एक बच्चे को प्राप्त करें परंतु यह सोच मेरी थी, जिसे पत्नी मान नहीं रही थी. उस का मन था कि वह स्वयं ही इस दिशा में आगे बढ़े. हम इस बाबत कई जगहों गए पर वहां पर सफलता हाथ नहीं लगी. हमारे अंदर लगन थी, हम दोनों ही हिम्मत नहीं हारे. पत्नी चमेली चाहती थी कि अपने बच्चे को वही जन्म देगी.

‘‘फिर हम डा. अनूप गुप्ता से मिले. उन्होंने हम दोनों का चैकअप किया. उन्होंने बताया कि हम दोनों ही बिलकुल फिट हैं. हारमोनल टैस्ट से स्पष्ट हो गया था कि मेरे स्पर्म ठीक थे और पत्नी चमेली भी एकदम फिट थी. वह बच्चे को जन्म दे सकती थी.’’

इस आयु में चमेली को स्वयं गर्भधारण कर के बच्चे को जन्म देना हिम्मत का काम है. कैसा रहा गर्भधारण का दौर? यह पूछे जाने पर जगदीश प्रसाद बताते हैं, ‘‘गर्भधारण के दौरान चमेली को हाइपरटैंशन और डायबिटीज हो गई थी. इस का हर तरह से खयाल मुझे ही रखना था. इसे जरा सी परेशानी न हो, इस का पूरा ध्यान रखता था. मुश्किल तब आती थी जब इस का मीठा खाने का बहुत दिल करता था. अंतत: सब कुछ मैनेज हो गया.’’

बातचीत के दौरान जगदीश प्रसाद की बेटी व नातिन भी आ गईं और वे बच्चे से खेलने लगीं. घर के नजदीक ही रहने से इन की बेटी ललिता व उस की बेटी हर रोज ही आ जाती हैं और बच्चे के लालनपालन में मदद करती हैं.

जगदीश प्रसाद मीणा बीएसएनएल में उच्च पद पर थे. अब रिटायर्ड हैं. वे आगे बताते हैं, ‘‘हमारी बेटियां हैं पर बड़े बेटे के न रहने के बाद अपने स्वयं का बेटा पैदा करने का अरमान हम पतिपत्नी दोनों को था. और हम ने यह अरमान पूरा भी कर लिया और हां, इसीलिए हम ने अपने बेटे का नाम अरमान ही रखा है. इस का पूरा नाम केशव अरमान है.’’

वहीं बैठी चमेली, जोकि हिंदी ज्यादा नहीं बोलतीं, ने राजस्थानी मिश्रित हिंदी में बताया, ‘‘वे एक बार और गर्भधारण कर के एक और बेटा चाहतीं हैं ताकि अरमान के साथ खेलने वाला आ जाए.

जगदीश और चमेली से मुलाकात करने के बाद यह लगा कि यदि हिम्मत हो और विश्वास हो तो बहुतकुछ हासिल किया जा सकता है.

आईवीएफ प्रक्रिया के जानकार

डा. अनूप गुप्ता बताते हैं, ‘‘जब दोनों पतिपत्नी हमारे पास आए तो ये सरोगेसी के लिए सोच रहे थे. हम ने चमेली का हारमोनल टैस्ट किया तो पता चला कि वह गर्भधारण करने के लिए पूरी तरह सक्षम है. वह मैडिकली फिट थी. इन के पहले बच्चे भी पूरी तरह ठीक हुए थे. जगदीश प्रसाद भी फिट थे. ऐसे में हम ने कृत्रिम गर्भधारण करवा दिया.’’

आईवीएफ विधि द्वारा कृत्रिम गर्भाधारण में कितना खर्चा आता है, यह पूछे जाने पर उन्होंने बताया, ‘‘आमतौर पर डेढ़ लाख से 2 लाख रुपए तक खर्र्च होता है. थोड़ाबहुत और भी हो सकता है. दरअसल, सब कुछ निर्भर करता है ट्रीटमैंट पर.

इस तरह, आज विज्ञान और तकनीक ने सिर्फ यही नहीं साबित किया है कि जब न चाहें बच्चा न पाएं, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि जब चाहें, बच्चा पाएं.

जीवन की मुसकान

बात उन दिनों की है जब मेरे एक सहकर्मी की तैनाती दुर्गापुर में हुई थी. त्योहार व छुट्टियों में अपने मांबाबा से मिलने के लिए वह सपरिवार कोलकाता आया करता था. एक बार लौटते समय ट्रेन पकड़ने की हड़बड़ी और गोद की बच्ची संभालने के चक्कर में उस की पत्नी ने अपना वैनिटी बैग टैक्सी में ही छोड़ दिया.

वैनिटी बैग की याद उन्हें तब आई जब ट्रेन में टीटीई ने टिकट देखना चाही. अब तो उन लोगों के शरीर में काटो तो खून नहीं. उस बैग में जरूरी चीजों के अलावा रेल का टिकट, 3 हजार रुपए नकद तथा कान के एक जोड़ी टौप्स थे. सारी बात उन्होंने टीटीई को बताई. किसी तरह पौकेट में पड़े पैसों से वे दुर्गापुर पहुंचे.

2 दिनों बाद कोलकाता से एक महिला का फोन उन के पास आया और उस ने बताया कि हावड़ा से टैक्सी पकड़ते समय टैक्सी में उसे वैनिटी बैग मिला था, जिस में पड़े विजिटिंग कार्ड से उन का टैलीफोन नंबर मिला.

उस महिला ने अपना नाम तथा पता बताया और कहा कि आप कोलकाता आएं, अपना वैनिटी बैग ले जाएं.

अगले शनिवार को जब वह उस महिला से मिला तो उस ने आवभगत भी की और वैनिटी बैग ज्यों का त्यों लौटा दिया. तब मेरे सहकर्मी का सिर कृतज्ञता से झुक गया.

राधेश्याम गुप्ता

*

मैं व्यापार के सिलसिले में कोलकाता से इंदौर गया था. वहां से कोलकाता के लिए मुझे रात में ट्रेन पकड़नी थी. स्टेशन पहुंच कर मैं ने आटो वाले को भाड़ा दिया. मैं ने ट्रेन में चढ़ कर अपनी पैंट की पौकेट चैक की तो पाया कि मेरा मोबाइल नहीं था, शायद आटो में गिर गया था. ट्रेन चल पड़ी थी.

मैं ने एक सहयात्री से मोबाइल ले कर अपने एक मित्र को फोन किया, कहा, ‘‘मेरा मोबाइल स्टेशन आते वक्त आटो में गिर गया है. आप मेरे मोबाइल पर कौल करें. अगर रिसपौंस मिले तो ठीक है, वरना मोबाइल कंपनी में फोन कर के नंबर ब्लौक करवा दें.’’ रास्तेभर मेरा मन खिन्न रहा.

दूसरे दिन जब अपने घर कोलकाता  पहुंचा तो इंदौर वाले मित्र का फोन पर यह संदेश पा कर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि वह ईमानदार आटो वाला मेरा मोबाइल मेरे मित्र को उन के फोन करने पर उन के घर दे आया था.

सतीश शर्मा

जियो की भाषा में डिजिटल लाइफ की ABCD जानते हैं आप!

रिलायंस जियो ने मार्केट में आने के बाद टेलिकाम बाजार में तहलका मचा दिया है. जियो सिम के बाद अब मुकेश अंबानी की कंपनी जियो फीचर फोन भी ले कर आ चुकी है. जियो के इतने फीचर आने के बाद से ही इसके बाद से ही मार्केट में प्राइस वार छिड़ा हुआ है. कंपनियां लगातार नए नए प्लान्स लेकर आ रही हैं. अब जियो ने लोगों को डिजिटल लाइफ की ABCD पढ़ाई है. आइये हम आपको बताते हैं कि जियो की भाषा में डिजिटल लाइफ की ABCD के क्या मायने हैं.

A – Apps (ऐप्स)

B – Binge Watching

C – CAPTCHA (कैप्चा)

D – DISPLAY PICTURE (डिस्प्ले पिक्चर)

E – EMOJI (इमोजी)

F – FILTERS (फिल्टर्स)

G – 2G, 3G, 4G

H – HASHTAG (हैशटैग)

I – INBOX (इनबौक्स)

J – JUST SCROLING AROUND (अपने आसपास)

K – K, OK (ओके)

L – LOGIN (लौगिन)

M – MEMES (फनी फोटोज)

N – NOTIFICATION (नोटिफिकेशन)

O – ONLINE ALWAYS (हमेशा औनलाइन)

P – PASSWORD (पासवर्ड)

Q – QR CODE (क्यूआर कोड)

R – RECHARGE (रिचार्ज)

S – SWIPE (स्वाइप)

T – TEXTING (चैटिंग)

U – UPGRADE (अपग्रेड)

V – VIRTUAL REALITY (वर्चुअल रिएलिटी)

W – WEB (वेब)

X – XOXO (जोजो)

Y – YOUTUBING (यूट्यूबिंग)

Z – ZZZZZZZ

आखिर क्यों शोएब अख्तर ने कहा कि सचिन मुझसे डर गये हैं

क्रिकेट में भारत पाकिस्तान का मैच किसी जंग से कम नहीं होता. ऐसा ही कुछ फौर्मर क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर शोएब अख्तर के आमने सामने होने पर होता था. फैंस में दोनों की की टक्कर आज तक मशहूर है. कभी कहा गया कि सचिन की धाकड़ बल्लेबाजी से अख्तर खौफ खाते थे.

वहीं एक बार अख्तर ने ही खुलासा कर दिया था कि सचिन उनसे डर गए थे. आपको बता दें कि अख्तर दुनिया के सबसे तेज गेंदबाज रहे हैं. उनकी धारदार गेंदों जैसी कौन्ट्रोवर्शियल उनकी औटोबायोग्राफी भी है. नाम- ‘कंट्रोवर्शियल योर्स’  है. उसमें उन्होंने कुछ साल पहले खुलासा किया था कि सचिन उनसे डर गए थे. वह उनके लिए न तो भगवान हैं और न ही महान.

रावलपिंडी एक्सप्रेस ने इस बारे में एक टीवी शो में कहा था कि उन्हें लगा कि तब सचिन की टेनिस एलबो खराब थी, हुक पुल करना मुश्किल था. शौर्ट पिच गेंद खेलने में तब उन्हें दिक्कत हो रही थी. यह बात हमें पता थी. ऐसे में उन्होंने उन्हें डरा कर आउट करने की बात सूझे. सचिन विकेट देकर जाने वालों में से नहीं थे लेकिन उस दिन वह खुद ही चले गए थे. इस पर उन्हें लगा कि वह डर गए थे क्योकि उन्हें तकलीफ हो रही थी.

शोएब के मुताबिक  उन्होंने अगले मैच में सचिन के सिर पर गेंद मार दी थी. उस सीरीज में भी मास्टर ब्लास्टर से रन नहीं बने. दुनिया में हर प्लेयर का बुरा दिन होता है. शोएब ने कहा कि सचिन आपके भगवान हैं, मेरे नहीं है. भगवान को सिर पर गेंद लगती है, तो बुरा मानने वाली बात नहीं है. क्रिकेट है यहां सब कुछ होता है.

शोएब की लिखी बातों से बेशक हिंदुस्तान के क्रिकेट फैंस आहत हुए थे. इस पर सवाल पूछा जा रहा था, तभी बीच में शोएब ने एक बयान में कहा कि क्या चाहते हैं कि मैं माफी मांगू. बीसीसीआई भी कौन होती है, मुझसे कहने वाली कि मै माफी मांगू. न मैं माफी मांगूंगा और न ही स्पष्टीकरण दूंगा. मैंने जो महसूस किया, वह लिखा है.

मेरी उम्र 24 साल है. मेरे हाथ और गरदन के कुछ हिस्से में टैनिंग हो गई है. कृपया बताएं मैं क्या करूं.

सवाल
मेरी उम्र 24 साल है. मेरे हाथ और गरदन के कुछ हिस्से में टैनिंग हो गई है. कई ऐंटीटैनिंग क्रीम यूज कर चुकी हूं, लेकिन ठीक नहीं हो रही है. कृपया बताएं मैं क्या करूं?

जवाब
आप 20 दिन में 1 बार ब्लीच करवा सकती हैं. इस के इस्तेमाल से टैनिंग तो दूर होती ही है, साथ ही स्किन भी सौफ्ट हो जाती है. वैसे घरेलू उपाय के तौर पर 1 कप ओट्स में पाइनऐप्पल जूस व स्ट्राबैरी पल्प मिला कर हाथों व गरदन पर स्क्रब करें. इस स्क्रब में शामिल पाइनऐप्पल जूस से कलर फेयर होगा और स्ट्राबेरी से त्वचा में ब्राइटनैस आएगी.

हमारी बेड़ियां

मेरे पड़ोसी की पत्नी बहुत ही अंधविश्वासी है. उस का ज्यादातर समय पूजापाठ व धार्मिक टोटकों को पूरा करने में गुजर जाता है. बरसात का मौसम था. वह पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने गई. उस दिन भीषण बारिश हो रही थी. फिसलन होने की वजह से वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ी और उस के घुटनों पर गंभीर चोटें आईं. धार्मिक अंधता के चलते उसे कई महीनों तक पीड़ा झेलनी पड़ी.

सुनंदा गुप्ता

*

मैं अपने मित्र जगदीश के साथ कार में ब्रह्मपुखर से बिलासपुर की ओर जा रहा था. तभी एक साधु ने हाथ दे कर कार रुकवाई और कहा, ‘‘भक्त, जब गाड़ी में जा रहे हो तो इस महात्मा को भी साथ ले चलो.’’

मेरा मित्र गाड़ी ड्राइव कर रहा था. मैं ने उसे इशारे से मना किया, परंतु मेरे मित्र ने साधु को लिफ्ट देना समाजसेवा का काम समझा.

उस ने साधु से पूछा, ‘‘महात्माजी, आप को कहां तक  जाना है?’’ साधु ने कहा, ‘‘भक्त, बस थोड़ा सा आगे.’’

बस, थोड़ा सा आगे कहकह कर वह  महात्मा बिलासपुर पहुंच गया. कार से उतरते वक्त साधु ने मेरे मित्र से कहा, ‘‘भक्त, तुम्हारा भविष्य अच्छा है, जिन की गाड़ी में हम महात्मा लोग बैठते हैं उन को धन की कोई कमी नहीं रहती है. लाओ, अब कुछ दक्षिणा निकालो, महात्मा को भोजन भी करना है.’’

मेरे मित्र ने उसे 50 रुपए का नोट दिया. इस प्रकार वह साधु मुफ्त यात्रा करने के साथ मेरे मित्र से रुपए भी झटक कर ले गया.

प्रदीप गुप्ता

*

मारवाड़ी समाज में घर के किसी भी सदस्य की मृत्यु पर 92 दिनों तक किसी के भी मिलने आने पर रोने का रिवाज है. घर के व्यक्ति की मौत पर वैसे ही सब की हालत बिगड़ी होती है, ऐसे में बारबार रोने से हालत और बिगड़ जाती है.

कुछ वर्षों पहले मेरी सहेली के पति की शादी के 10 वर्षों के बाद मौत हो गई. मेरी सहेली की हालत ज्यादा बिगड़ गई. उस से बैठा भी नहीं जा रहा था. ऐसे में घर के लोगों ने उस को रिवाज के अनुसार, मिलने आने वालों के सामने बैठा दिया. मेरी सहेली बेहोश हो गई. भला यह कैसा रिवाज कि दूसरे की जान पर बन आए.

उमा गोपालजी मुंगड

अकेले हैं तो क्या गम है, जिंदगी को हमेशा मुस्कुराते हुए जिएं

दो दिनों पहले आए एक फोन ने मुझे चौंका दिया. मेरे दूर के एक बुजुर्ग रिश्तेदार का फोन था. उन्होंने कहा, ‘‘एक सरप्राइज पार्टी है कल. होटल अंश में तुम सब चले आना शाम 7 बजे तक और खाना मेरे संग खाना.’’

शाम तक पता चला कि शहर में रहने वाले अन्य रिश्तेदारों के पास भी उन का फोन आया है. अचानक भूलेबिसरे से हमारे ये बुजुर्ग चाचाजी हमारी चर्चा में आ गए. वर्षों पहले चाचीजी का निधन हो चुका था. चाचाजी पैंशन पाते थे और एक सामाजिक संस्थान से जुडे़ थे. पहले तो कई महीने चाचीजी के गम में बीमार ही पड़े रहे थे. बाद में उन के ही एक मित्र ने उन्हें उस संस्थान से जुड़ने को प्रेरित किया. धीरेधीरे वे उस संस्थान के क्रियाकलाप में व्यस्त रहने लगे थे.

नियत समय से कुछ पहले ही मैं होटल पहुंच गई थी, चाचाजी अकेले ही बैठे होटल मैनेजर से कुछ बातें करते दिखे. पता चला उन्होंने खुद ही अपना 80वां जन्मदिन मनाने का फैसला किया और सभी जीवित दोस्तों व रिश्तेदारों को आमंत्रित किया है. यहां तक कि दूसरे शहरों में रहने वाले उन के बच्चे भी मेहमान की ही तरह पहुंचे थे. उन्हें भी भनक नहीं लगने दी थी चाचाजी ने.

मैनेजर ने बताया कि अंकलजी 2-3 महीने से तैयारी कर रहे हैं. कभी कोई सुझाव देते हैं, कभी कोई बदलाव करते हैं.

सच, हम सब ने चाचाजी को बिसरा ही दिया था. पिछले साल मेरे बेटे की शादी में ही उन से मिलना हुआ था. मैं ने पूछा, ‘‘चाचाजी, आप के उस संस्थान में क्या और कैसी गतिविधियां चल रही हैं?’’ तो चाचाजी ने बताया, ‘‘मैं जिस सामाजिक संस्थान से जुड़ा हूं वह बेसहारा और गरीब बुजुर्गों के लिए कार्य करता है. उस से जुड़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि सच में मेरा गम बहुत कम है. दूसरों को देख मुझे महसूस हुआ कि मेरे पास जो मौजूद है वह खुश रहने के लिए काफी है.’’

नियत समय पर पार्टी शुरू हुई. केक पर बड़ा सा 80 लिखा था जिसे उन्होंने काटा. धीमे संगीत पर हम सब के साथ उन्होंने भी थोड़ा कदम मिलाया. उन्हें देख मैं सोच रही थी कि ‘कोई मेरे लिए करे’ की जगह इन्होंने खुद ही अपने लिए सारा आयोजन कर लिया था. दोस्तोंरिश्तेदारों के संग हंसतेबोलते चाचाजी जीवन का कितना बड़ा सबक हमें सिखा रहे थे कि खुद के लिए भी जीना चाहिए. मेहमानों में उन के संस्थान से आए बुजुर्ग भी थे.

जीवनसाथी का साथ

चाचाजी की बड़ी सी मित्रमंडली भी बड़ी कमाल की दिखी, कोई बचपन का मित्र था तो कोई सहकर्मी तो कोई मिल्कबूथ का सुबह का साथी. सभी बेहद खुशमिजाज और जीवन से भरपूर दिखे. जीवन के प्रति उन की सकारात्मकता देख बहुत ही अच्छा लगा. सभी मित्रों को बच्चों की तरह पोज दे, उन का सैल्फी लेते देखना सुखकर था.

बुढ़ापा और तिस पर अकेलापन अकसर लोगों के लिए दुखदायी बन जाता है. जब उम्र की फसल पकने लगती है और उसी समय किसी एक का चले जाना दूजे के लिए बेहद कष्टमय हो जाता है. यही वह समय होता है जब जीवनसाथी या संगिनी की सब से ज्यादा जरूरत है. परंतु मृत्यु पर किस का वश है. कभी न कभी एक को अकेले जीने को विवश होना ही होता है.

मेरी एक सहेली है ताप्ती, बेहद चुस्तदुरुस्त और फुरतीली. घरबाहर के सारे काम करती, पति को दैनिक कार्यों से बिलकुल मुक्त रखती. परंतु पति की असमय मृत्यु से उसे ऐसा सदमा पहुंचा कि उबर ही नहीं पाई. वह कहते हैं न, कि मरने वाले के संग कोई थोड़े चला जाता है पर ताप्ती ने सच में जीतेजी मानो दुनिया छोड़ दी. लोगों से खुद को काट लिया. जीवन के हर रंग से मुंह मोड़ लिया. आज सालों बीत गए हैं पर उस की दुनिया वहीं ठहरी हुई है. उदास, बेजार, बीमार… अफसोस होता है उस जिंदा लाश को देख जिस के बच्चे उस के जीतेजी अनाथ हो गए.

मुझे नेहा की याद आ रही है जो पति के दुनिया से जाने के बाद बदहवास सी हो गई थीं. घर उन्हें मानो काटने को दौड़ने लगा था. फिर एक दिन बेटे के साथ अपने गांव गईं, जहां पहले 2-4 सालों पर ही जाती थीं. इस बार उन्हें वहां की ठहरी हुई जिंदगी सुकूनदायी लगी और जिद कर के वहीं रुक गईं. बेटे ने भी सोचा कि स्थानपरिवर्तन से शायद मां को अच्छा महसूस हो.

अधबना सा घर था और थोड़े खेत. पहले खेत को बटाई पर दिया करती थीं, इस बार उन्होंने मजदूर रख खुद ही धान लगवाया और अधबने घर को पूरा करवाने लगीं. गांव में रहने वाले उन के रिश्तेदार उन की मदद कर दिया करते थे. 2 महीने बीततेबीतते बेटा वापस आने की जिद करने लगा. पर नेहा कभी कहा कि खेतों में दवा का छिड़काव करवाना है तो कभी कहा कि कमरे की छत ढलवानी है. आजकल करते वे 7-8 महने वहां रह गईं.

इस बीच वे इतना व्यस्त रहीं कि पति के गुजरने के बाद की बदहवासी से वे उबर गईं. अब उन्हें एक मकसद मिल गया. हर साल धान लगवाने के मौसम में वे गांव चली जातीं और कुछ महीने वहां रहतीं. कुछ न कुछ निर्माण और रचनात्मक कार्य करवा कर सालभर खाने लायक चावल व अन्य फसल रख, कुछ बेच कर ही वापस लौटतीं. 60 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार आर्थिकरूप से आत्मनिर्भरता व आत्मबल का अनुभव हुआ.

उदासी दूर करें

मेरे ससुरजी बेहद चुस्तदुरुस्त और पेशे से इंजीनियर थे. सासससुर दोनों आराम से अपने शहर में बिना किसी के सहारे रहते थे. फिर जब सास चली गईं 70 की उम्र में, तो ससुरजी को अकेलापन खाने लगा. वे हमारे साथ रहने लगे पर उन की उदासी देखी न जाती थी.

इस बीच, मेरी बेटी आई. वह अपने दादाजी के लिए एक स्मार्टफोन लेती आई, जो उस वक्त नयानया ही निकला था. टैक्निकल आदमी तो वे थे ही, नई तकनीक सीखने की ललक उन्हें व्यस्त रखने लगी. जब तक बेटी रही वह दादाजी को सिखाती रही, कभी जल्दी समझते नहीं तो कभी भूल जाते. पर फिर सीखते और फिर पूछते. फिर तो वे नौजवानों की ही तरह अपने मोबाइल पर व्यस्त रहने लगे.

हम सब की सहायता से उन्होंने न सिर्फ मोबाइल चलाना सीखा बल्कि वे लैपटौप भी चलाने लगे. 74 की उम्र में उन्होंने सोशल नैटवर्किंग, गूगल और डाउनलोडिंग सीख अपने जीवन को काफी रोमांचक व व्यस्त बना लिया था. उन के दोस्त इस उम्र में जहां भजन व पूजापाठ में दिन गुजारते, वे इंटरनैट पर दुनिया में क्या नया हो रहा है, देखतेपढ़ते.

राधिका जब अपने घर एक झबरे पप्पी को ले कर आई थी तो सब से ज्यादा उस की सास ने ही विरोध किया था. परंतु धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के पक्के साथी बन गए. जब सब स्कूल और दफ्तर चले जाते तो राधिका की विधवा सास को टीवी देखने के अलावा कोई चारा नहीं बचता था. पर उस पशु के आने के बाद न चाहते हुए भी वे उस की देखभाल करने लगीं और वह एक सच्चे मित्र की तरह दिनभर उन के साथ डोलता रहता. उस पप्पी ने उन के अकेलेपन की शून्यता को अपनी मूक उपस्थिति से हर लिया था.

खुशी के बहाने ढूंढ़ें

मुग्धा अपने दादाजी के मरने के बाद अपनी दादीजी को अपने साथ बेंगलुरु लेती गई थी. वहां वह एक पब्लिकेशन हाउस में काम करती थी. वह देखती कि दादी अकसर एक डायरी को सीने से लगाए रहती थीं, कभी झुक कर कुछ लिखती हुई भी दिखतीं.

एक दिन उत्सुकतावश मुग्धा ने उस डायरी के पन्ने को पलटना शुरू किया. डायरी क्या, वह तो दस्तावेज था दादादादी की प्रेमभरी गृहस्थी का, जीवन का. उस में उन के विवाह के शुरुआती दिनों में लिखी प्रेम कविताएं थीं तो सासूमां द्वारा दिए दुख भी गीतों की शक्ल में अश्रु अंकित थे. मुग्धा के पापा के जन्म के समय की ममताभरी रचनाएं थीं… तो आखिर में उस के दादाजी की बीमारी की दौरान उन के मन में उठती भावनाएं और जाने के बाद के विछोह का दर्द भी शब्द बन वहां रचेबसे थे.

मेरे दफ्तर में शेषाद्री साहब थे. ठीक रिटायरमैंट के पहले उन की पत्नी लंबी बीमारी के बाद चल बसीं. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी थी और दोनों ही विदेश में रहती थीं. रिटायरमैंट के बाद सुना कि उन्होंने अपनी सैक्रेटरी कुंआरी व अधेड़ मरियम से शादी कर ली. बेटियां ऐसे भी कम ही आती थीं, उस के बाद तो आना ही छोड़ दिया.

लोगबाग कहते कि पहले से ही चक्कर था या सैके्रटरी ने पैसे के लालच में फांस लिया. जितनी मुंह उतनी बातें. परंतु दिल का एक कोना खुश होता उन्हें देख, जब वे रोज सुबह मरियम को कार से औफिस छोड़ जाते, शाम को लेने आते.

बाजार में दोनों साथ खरीदारी करते या टहलते दिख जाते तो लोगों को याद आ जाते विधुर महेश्वरजी, जो बेटी के घर के एक कोने में चुपचाप, सिर्फ मृत्यु के इंतजार में मानो दिन काट रहे हों, पड़े रहते हैं. कम से कम उन से तो बेहतर जीवन चुना शेषाद्रीजी ने.

सच, चाचाजी की जन्मदिन पार्टी जीवन के प्रति हर हाल में सकारात्मक रवैया बनाए रखने की प्रेरणा दे गई. कुछ लोग मरने के लिए जीते हैं. वहीं, कुछ लोग मरते दम तक जीते रहते हैं.

इस भारतीय बल्लेबाज ने जड़ा ऐसा छक्का, दूसरे शहर में जाकर गिरी गेंद

आज के दौर में क्रिकेट गेंदबाज से ज्यादा बल्लेबाजों का खेल माना जाता है. इस खेल में बदलते नियमों और नई तकनीक की बदौलत बल्लेबाजों के सामने गेंदबाज अब खुद को असहज महसूस करने लगे हैं. कई बार बल्लेबाज उनकी गेंद पर इतना लंबा छक्का जड़ देता है कि गेंद स्टेडियम से बाहर तक चली जाती है. क्रिकेट फैंस इस पर स्टेडियम में खड़े होकर तालियां बजाते हैं लेकिन वह गेंदबाज इसे जिंदगीभर नहीं भूल पाता.

क्रिकेट मैदान पर छक्का लगना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन कभी ये सुना या देखा है कि किसी बल्लेबाज ने ऐसा छक्का लगाया हो, जिसमें गेंद सीधे दूसरे शहर जाकर गिरी. जी हां, ऐसा ही हुआ था भारत-इंग्लैंड के बीच वारविकशायर में खेले गए मैच के दौरान. उस मैच में भारतीय कप्तान सी. के. नायडू ने ऐसा छक्का लगाया कि वो इतिहास में दर्ज हो गया. ये ऐसा रिकार्ड है, जिसे आज तक कोई भी दोहरा नहीं सका है.

हुआ यूं कि वारविकशायर के जिस स्टेडियम में मैच खेला जा रहा था उसके पास एक नदी थी, जिसके एक ओर वारविकशायर था और दूसरी ओर वार्सेस्टरशायर शहर. सी. के. नायडू ने एक गेंद पर इतना लंबा छक्का जड़ा कि गेंद सीधे नदी को पार करते हुए वार्सेस्टरशायर में पहुंच गया. खास बात ये थी कि ये उनके अंतर्राष्ट्रीय करियर का इकलौता छक्का था.

बता दें कि 31 अक्टूबर 1895 को नागपुर में जन्मे भारत के पहले कप्तान कर्नल सी. के. नायडू ने अपने करियर में 7 टेस्ट खेले, जिसकी 14 पारियों में उन्होंने 350 रन बनाए. इस दौरान उन्होंने 2 अर्धशतक भी जड़े. इतना ही नहीं नायडू ने गेंदबाजी में भी हाथ आजमाया और 9 विकेट चटकाए.

भारतीय क्रिकेट टीम के प्रथम टेस्ट कप्तान कोट्टारी कंकैया नायडु उस उम्र तक क्रिकेट खेलते रहे, जिसके बारे में सोचना भी आज के खिलाड़ियों के लिए एक सपने जैसा है. उनके अन्दर कमाल की फिटनेस थी जो आजकल के युवा क्रिकेटरों में बहुत कम देखने को मिलती है.

आज के युवा क्रिकेटर अपने फिटनेस से हमेशा जूझते रहते हैं लेकिन नायडू की उस समय की फिटनेस आज के उन खिलाड़ियों के लिए एक सबक है, जो दूसरे तीसरे मैच के बाद ही चोटिल हो जाते हैं. आज के समय में जब खिलाड़ी 37 साल की उम्र में रिटायर होने लगते है, तब इन्होंने ने टेस्ट मैंच खेलना शुरू किया था और 68 साल तक फिट रहकर क्रिकेट खेलते रहे.

भारत की प्रथम टेस्ट टीम के कप्तान सी. के. नायडू का जन्म 13 अक्टूबर, 1895 को नागपुर, महाराष्ट्र में हुआ था. कर्नल कोट्टारी कंकैया नायडू को प्यार से सभी लोग सी. के. कहकर पुकारा करते थे. भारत के प्रथम टेस्ट मैच में वह भारतीय टीम के कप्तान थे यह मैच 1932 में इंग्लैंड के विरुद्ध खेला गया था. इंग्लैंड की टीम पूरी तरह मजबूत थी, लेकिन सी. के. नायडू की कप्तानी में भारतीय टीम ने जमकर उनका मुकाबला किया.

वर्ष 1926-1927 में उन्होंने सबसे ज्यादा लोकप्रियता प्राप्त की, जब उन्होंने बम्बई में 100 मिनट में 187 गेंदों पर 153 रन बना दिए. यह मैच ‘हिन्दू’ टीम तरफ से ए. ई. आर. गिलीगन की एम. सी.सी. के विरुद्ध चल रहा था. जिसमें इनके 11 छक्के तथा 13 चौके शामिल थे. बम्बई के जिमखाना मैदान पर ‘हिन्दू’ टीम के लिए उनकी आखिरी पारी पर उन्हें चांदी का बल्ला भी भेंट किया गया था.

क्रिकेट जब राजा महाराजाओं का खेल हुआ करता था, तब उन्हें इग्लैंड जा रही भारतीय टीम का कप्तान बनाया गया. वर्ष 1932 में भारतीय टीम के कप्तान पोरबंदर महाराज थे, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वह नहीं जा पाए और फिर कर्नल सी. के. नायडू को भारतीय टीम का पहला कप्तान बनने का गौरव प्राप्त हुआ.

1932 में इंग्लैंड दौरे के दौरान सी. के. नायडू ने प्रथम श्रेणी के सभी 26 मैचों में हिस्सा लिया था, जिनमें 40.45 की औसत से 1618 रन बनाए और 65 विकेट लिए. इन्हें 1933 में विजडन द्वारा ‘क्रिकेटर औफ द ईयर’ चुना गया था. 1932 में सी. के. नायडू ने कमाल का खेल दिखाते हुए 32 छक्के लगाए थे. उन्हें भारत सरकार द्वारा 1956 में ‘पद्मभूषण’ प्रदान किया गया.

मेरी शादी होने वाली है. मैं संतानोत्पत्ति के चक्कर में अभी नहीं पड़ना चाहती. क्या मंगेतर से बात करना ठीक होगा.

सवाल
मैं बीए फाइनल ईयर की छात्रा हूं. परीक्षा के बाद मेरी शादी होने वाली है. मैं आगे पढ़ना चाहती हूं, इसलिए अभी संतानोत्पत्ति के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. सुहागरात को संबंध बनाने से पूर्व क्या एहतियात बरतनी चाहिए? क्या इस विषय में अपने मंगेतर से बात करना ठीक होगा?

जवाब
आप की सोच सही है. शादी के बाद यदि अपने कैरियर के कारण आप संतानोत्पत्ति से बचना चाहती हैं तो पति से परामर्श कर के कोई गर्भनिरोधक उपाय अपना सकती हैं. यों भी आप की शादी जल्दी हो रही है तो कुछ वर्ष इस तरह की जिम्मेदारी से बच कर अपने वैवाहिक जीवन का भरपूर आनंद उठाएं.

जानिए कंप्यूटर के एफ सीरीज बटन आखिर किस काम आते हैं

औफिस हो या घर आप ईमेल या किसी निजी काम के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल करते ही होंगे. कई लोग कंप्यूटर सीखने के लिए अलग अलग तरह के कोर्स भी करते हैं. ऐसे में जाहिर है कि आपको कंप्यूटर के बारे में लगभग सब कुछ पता होता होगा.

लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि कंप्यूटर की-बोर्ड में दी गई F Keys किस काम आती हैं. F1 से लेकर F12 तक इन बटनों के पीछे क्या फंक्शन्स छिपे हैं. अगर आप इनके बारे में नहीं जानते, तो इसमें आपकी मदद हम कर देते हैं.

F Keys का क्या होता है

F1: जब भी आप किसी प्रोग्राम में काम कर रहे होते हैं और उसमें आपको किसी भी तरह की मदद चाहिए तो यह Key प्रेस कर सकते हैं. इससे आपकी स्क्रीन पर हेल्प विंडो ओपन हो जाएगी.

F2: अगर आप किसी फाइल या फोल्डर का नाम बदलना चाहते हैं तो उसे सेलेक्ट कर F2 Key को दबाएं. ऐसा करने से आप फाइल या फोल्डर का नाम बदल पाएंगे.

F3: किसी भी एप में सर्च ओपन करने के लिए इस Key का प्रयोग किया जा सकता है.

F4: अगर आप किसी विंडो को बंद करना चाहते हैं तो Alt+F4 Key दबाएं.

F5: किसी भी विंडो या प्रोग्राम को रिफ्रेश करने के लिए यह Key काम आती है.

F6: अगर आप इंटरनेट ब्राउजर की एड्रेस बार पर कर्सर ले जाना चाहते हैं तो इस Key को दबाएं.

F7: अगर आप MS Word पर काम कर रहे हैं और spell check and grammar check फीचर का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो यह Key आपके काम आएगी.

F8: कंप्यूटर को औन करते समय अगर आप बूट मेन्यू में जाना चाहते हैं तो यह Key दबाएं.

F9: MS Word डौक्यूमेंट को रिफ्रेश करने और माइक्रोसौफ्ट आउटलुक में ईमेल के “Send and receives” औप्शन के लिए या Key काम आती है.

F10: अगर आप किसी एप में मेन्यू बार ओपन करना चाहते हैं तो यह Key काम आती है.

F11: ब्राउजर को फुल स्क्रीन या इससे बाहर आने के लिए इस Key का इस्तेमाल किया जा सकता है.

F12: अगर आप MS Word पर काम कर रहे हैं तो Save as डायलौग बौक्स ओपन करने के लिए यह Key दबाएं.

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