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बाढ़ के दौरान होने वाली गंभीर बीमारियां का ऐसे करें मुकाबला

बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों, वहां के रहवासियों के साथ देश की संपदा को भी नुकसान पहुंचता  है. इतना ही नहीं, बाढ़ के चलते जलजनित और वैक्टर संबंधी बीमारियां पनपती भी हैं. इन में मलेरिया, डेंगू, बुखार, हैजा, हैपेटाइटिस ए और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां शामिल हैं.

बाढ़जनित बीमारियां

संक्रामक रोगों का फैलाव और प्रकोप बाढ़ आने के कुछ ही दिनों, सप्ताहों या महीनों के भीतर नजर आने लगता है. बाढ़ के दौरान और इस के बाद सब से आम है जलस्रोतों का प्रदूषण. ऐसे पानी के संपर्क में आने या इसे पीने के कारण जलजनित बीमारियां फैलने लगती हैं. इन में मुख्य हैं- दस्त और लैप्टोस्पायरोसिस. इस के अलावा खड़े पानी में मच्छरों को प्रजनन करने और पनपने का मौका मिलता है. इस प्रकार से वैक्टरजनित रोग फैलते हैं, जैसे कि मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया.

बाढ़ के बाद जो रोग एक महामारी का रूप ले सकता है वह है लैप्टौस्पायरोसिस. चूहों की संख्या में वृद्धि से कीटाणुओं का विस्तार होता है. चूहों के मूत्र में बड़ी मात्रा में लैप्टोस्पाइरा होते हैं जो बाढ़ के पानी में मिल जाते हैं. इस के अलावा, घटते जल स्तर के साथ मच्छरों की वापसी भी हो जाती है.

स्थिति से कैसे निबटें

बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए प्रशासनिक और व्यक्तिगत दोनों स्तर पर काम किया जाना चाहिए. प्रशासनिक स्तर पर जरूरी है कि प्राथमिक स्वास्थ्य की देखभाल और सेवाएं दुरुस्त रहें. स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों को सही प्रकार से प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे किसी भी खतरे की स्थिति में सक्रिय हो कर कारकों की पहचान व आकलन कर सकें और तत्काल उचित कार्यवाही कर सकें.

स्वच्छता और हाथ धोने के सही तरीकों के बारे में जनता को जागरूक किया जाना चाहिए. प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पीडि़तों को रोगों से सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल, सफाई की सुविधाएं और जरूरत पड़ने पर शरण लेने के उपयुक्त ठिकाने मुहैया रहें.

बरतें सावधानी

  • कुछ सावधानियां हैं जिन का लोग खुद भी ध्यान रख सकते हैं, ताकि महामारी के प्रकोप से बचाव हो सके.
  • बाढ़ के पानी में चलना नहीं चाहिए क्योंकि उस में मलमूत्र और कचरा मिला होता है.
  • त्वचा पर कोई चोट या घाव हो तो उसे बाढ़ के पानी से बचा कर रखना चाहिए, वरना इन्फैक्शन हो सकता है. इस के अलावा ऐसे घावों को स्वच्छ जल से साफ  करें और पट्टी बांध कर रखें.
  • यदि आप को बाढ़ के पानी या कीचड़ के संपर्क में आना ही पड़े या इस में डूबी चीजों को छूना पड़े तो साबुन और पानी से अपने हाथ धोने जरूरी हैं. शौचालय जाने के बाद भी हाथ धोएं. गंदे हाथों से भोजन न छुएं.
  • जो भी खाद्य सामग्री या दवाइयां बाढ़ के पानी के संपर्क में आई हों, उन्हें फेंक दें, प्रयोग न करें. इन से आप को इन्फैक्शन हो सकता है.
  • यदि आप के पास डब्बाबंद भोजन है तो डब्बे को अच्छी तरह से साफ कर के जल्द से जल्द इस सामग्री का प्रयोग कर लें.
  • स्थानीय जल आपूर्ति में किसी भी संभावित प्रदूषण के बारे में पता कर लें. प्रयोग करने से पहले उस पानी को उबाल लें.
  • वैक्टरजनित बीमारियों से बचने के लिए त्वचा पर मच्छर भगाने वाली क्रीम लगाएं और सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें. सड़क पर कचरा न फेंकें, यह चूहों को आकर्षित कर सकता है.

दरअसल, प्राकृतिक शक्तियों को रोकना तो संभव नहीं है, लेकिन बाढ़ के रूप में आई प्राकृतिक आपदा के बाद रोगों को फैलने से रोकने के उपाय अवश्य किए जा सकते हैं. इस के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय एजेंसियों को संयुक्त प्रयास करने  की आवश्यकता है. नागरिकों को अपने स्तर पर भी जरूरी उपाय करने चाहिए ताकि वे अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के साथ दूसरे रोगों के होने वाले नुकसान को कम कर सकें.

– डा. राजीवा गुप्ता, जनरल फिजीशियन, लाइब्रैट प्लेटफौर्म

कब्रिस्तान में भाषाएं, लिपियों का अभाव और फंड का फेर

कहावत है कि किसी संस्कृति को खत्म करना हो तो उस की भाषा नष्ट कर दीजिए. यह जुमला कुछ हद तक सही ही है क्योंकि भाषा किसी समुदाय की प्रमुख पहचान होती है, जो कि तेजी से नष्ट हो रही है. वैश्वीकरण ने दुनिया को सिर्फ फायदे पहुंचाए हों, ऐसा नहीं है. इस ने हम से बहुतकुछ छीना भी है.

छोटीछोटी संसकृतियां वैश्वीकरण की आंधी में तिनके की तरह बह रही हैं. उन की बोलीभाषा, उन की सांस्कृतिक पहचान आदि पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. कुछ अरसे पहले एक सर्वेक्षण में कहा गया कि पिछले 50 वर्षों में भारत में 250 भाषाएं खत्म हो गईं. भाषाएं अलगअलग वजहों से बड़ी तेजी से मर रही हैं. ऐसे में यह कहा जाने लगा है कि भारत क्या भाषाओं का कब्रिस्तान बनता जा रहा है.

काफी समय से लुप्त होती भाषाओं की चिंता करने वालों के बीच में यह सवाल उठ रहा है. यह मुद्दा काफी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत दुनिया का सब से ज्यादा भाषाओं वाला दूसरा देश है. पिछले 50 वर्षों में भारत की करीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो गई हैं. पीपुल लिंगुइस्टिक सर्वे के मुख्य संयोजक गणेश देवी ने कुछ अरसे पहले यह खुलासा किया था. उन का दावा है कि भारत से ‘लोक’ की जबान काटने की सुनियोजित साजिश की जा रही है.

50 वर्षों से पहले 1961 की जनगणना के बाद 1,652 मातृभाषाओं का पता चला था. उस के बाद ऐसी कोई सूची नहीं बनी. उस वक्त माना गया था कि 1,652 नामों में से करीब 1,100 मातृभाषाएं थीं, क्योंकि कई बार लोग गलत सूचनाएं दे देते थे. वड़ोदरा के भाषा शोध और प्रकाशन केंद्र के सर्वे से यह बात सामने आई है. 1971 में केवल 108 भाषाओं की सूची ही सामने आई थी क्योंकि सरकारी नीतियों के मुताबिक किसी भाषा को सूची में शामिल करने के लिए उसे बोलने वालों की तादाद कम से कम 10 हजार होनी चाहिए. यह भारत सरकार ने शर्त के तौर पर रखा था.

इस बार भाषाओं के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए 1961 की सूची को आधार बनाया गया. इस से पहले ब्रिटिश शासनकाल में अंगरेज अफसर जौन अब्राहम ग्रियर्सन की अगुआई में 1894-1928 के बीच इस तरह का भाषाई सर्वे हुआ था. उस के 100 वर्षों बाद भाषा रिसर्च ऐंड पब्लिकेशन सैंटर नामक संस्था की ओर से भारतीय भाषाओं का लोक सर्वेक्षण यानी पीएलएसआई किया गया.

सर्वेक्षण में कहा गया है कि 1961 में भारत में 1,100 भाषाएं बोली जाती थीं. पिछले 50 वर्षों के दौरान इन में से 250 भाषाएं लुप्त हो गई हैं और फिलहाल 850 भाषाएं जीवित हैं.

सर्वेक्षण की प्रासंगिकता के सवाल पर उन के प्रवक्ता ने कहा कि हर शब्द एक अलग विश्वदृष्टि पेश करता है. मिसाल के तौर पर, हम कितने लाख बार रोए होंगे तो एक शब्द पैदा हुआ होगा आंसू, यह शब्द गया तो हमारी विश्वदृष्टि भी गई.

हालांकि, इस सर्वे में बोली और भाषा में वर्गीकरण नहीं किया गया है. इस विषय पर विद्वानों का कहना है कि यह विवाद ही फुजूल है. भाषा सिर्फ भाषा होती है. हम इस धारणा को सिरे से खारिज करते हैं कि जिस भाषा की लिपि नहीं है वह बोली है. विश्व की ज्यादातर भाषाओं के पास लिपि नहीं है.

लिपियों का अभाव

दुनिया में कुल 6 हजार भाषाएं हैं और 300 से ज्यादा के पास अपनी कोई लिपि नहीं है, लेकिन वे बहुत मशहूर भाषाएं हैं. यहां तक कि अंगरेजी की भी अपनी लिपि नहीं है. वह भी उधार की लिपि यानी रोमन में लिखी जाती है. हिंदी देवनागरी में लिखी जाती है. देवनागरी में ही संस्कृत, मराठी, नेपाली आदि भाषाएं भी लिखी जाती हैं. यानी भाषा की अपनी लिपि होनी जरूरी नहीं है.

कुछ विद्वान इस की परिभाषा देते हैं कि जो भाष कराए, वही भाषा है, उस का लिखा जाना जरूरी नहीं है. वेदों के बारे में भी कहा जाता है कि वह बोला हुआ ज्ञान है. श्रुति है. वह पढ़ा अथवा लिखा हुआ ज्ञान बाद में बना.

सैकड़ों भाषाओं के करोड़ों शब्दों की विश्वदृष्टि को अगली पीढ़ी को सौंपने के उद्देश्य से सर्वे किया गया. सर्वे के मुताबिक, करीब 400 भाषाएं ऐसी हैं जो घुमंतू, आदिवासी और गैरअधिसूचित जातियों द्वारा बोली जाती हैं.

सर्वेक्षण में जिन 780 भाषाओं का अध्ययन किया गया, उन में से 400 भाषाओं का व्याकरण और शब्दकोश भी तैयार किया गया है.

अध्ययन में पाया गया कि दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद जैसे शहरों में 300 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं. अरुणाचल में 90 भाषाएं बोली जाती हैं. दादर और नागर हवेली में गोरपा नाम की एक भाषा मिली जिस का अब तक कोई रिकौर्ड नहीं है. हिंदी बोलने वालों की संख्या लगभग 40 करोड़ है, जबकि सिक्किम में माझी बोलने वालों की संख्या सिर्फ 4 है.

सर्वेक्षण में उन भाषाओं को भी शामिल किया गया जिन्हें बोलने वालों की संख्या 10 हजार से कम है. सर्वेक्षण में इन भाषाओं को शामिल करने के पीछे देवी ने तर्क दिया कि बंगलादेश युद्घ के बाद भाषाई संघर्ष की संभावनाओं को खत्म करने के लिए रणनीति के तहत उन भाषाओं को जनगणना में शामिल करना बंद कर दिया गया, जिन्हें बोलने वालों की संख्या 10 हजार से कम हो. यही वजह है कि 1961 की जनगणना में 1,652 भाषाओं का जिक्र है, जबकि 1971 में यही घट कर 182 हो गई और 2001 में 122 रह गई.

सर्वेक्षण में ऐसा माना गया कि 1961 की जनगणना में जिन 1,652 भाषाओं का जिक्र है, उन में से अनुमानतया 1,100 को भाषा का दरजा दिया जा सकता है. भारत सरकार की तरफ से 2006-07 में भारतीय भाषाओं पर सर्वेक्षण कराए जाने की पहल हुई थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी.

भाषाओं का विमर्श केवल प्रमुख भाषाओं तक सीमित है. जैसे, हाल ही में कर्नाटक और तमिलनाडु में हिंदी थोपने के खिलाफ आंदोलन हुआ. इसी तरह कई हिंदीभाषी राज्यों में अंगरेजी को निशाना बनाया जाता है क्योंकि कुछ लोगों को लगता है कि अंगरेजी की लोकप्रियता भारतीय भाषाओं की कीमत पर बढ़ रही है.

फंड का फेर

हिंदी बनाम अंगरेजी से या हिंदी बनाम कन्नड़ की बहस से एक महत्त्वपूर्ण बहस यह भी चल रही है कि छोटी आदिवासी भाषाएं कैसे राज्यों की अधिकृत भाषाओं के सामने टिक पाएंगी. कागजों पर सरकारें लुप्त हो रही भाषाओं की मदद करते बहुतकुछ दिखाती हैं. 2014 के बाद आई सरकार ने उन भाषाओं का डौक्युमैंटेशन और संरक्षण का काम शुरू किया है जिन्हें बोलने वाले 10 हजार से कम हैं. यह काम सैंट्रल इंस्टिट्यूट औफ लैंग्वेजेज द्वारा किया जा रहा है. जिस के बारे में वहां के कर्मचारियों का कहना है कि उस के पास फंड कम है और योग्य कर्मचारियों की कमी भी है.

इस के अलावा सरकार ने 9 विश्वविद्यालयों में विलुप्त भाषाओं के केंद्र स्थापित किए हैं. अंतर्राष्ट्रीय संस्था फाउंडेशन औफ एनडैंजर्ड लैंग्वैजेज के अध्यक्ष निकोलस औस्टलर का कहना है कि इस मामले में सरकार का समर्थन जरूरी है, मगर लंबे समय में समुदाय तभी फलतेफूलते हैं जब वे मामलों को अपने हाथों में लेते हैं.

वैश्विक स्तर पर देखें तो वहां भी अंगरेजी के वर्चस्व के आगे सैकड़ों भाषाओं पर अस्तित्व का संकट है. संयुक्त राष्ट्र की ओर से 2009 में जारी आंकड़ों के मुताबिक, सब से खराब हालत भारत में है जहां 196 भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं. इस के बाद अमेरिका का स्थान है, जहां 192 भाषाएं विलुप्तप्राय हैं. इंडोनेशिया में 147 भाषाएं मिटने वाली हैं.

दुनिया में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या 10 से भी कम है. 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या 150 लोगों से भी कम है. एक अनुमान के मुताबिक, दुनियाभर में 6,900 भाषाएं बोली जाती हैं, जिन में से 2,500 भाषाओं की स्थिति चिंताजनक है. यदि भाषा संस्कृति का आधार है तो इन भाषाओं के नष्ट होने के साथ ये संस्कृतियां भी नष्ट हो जाएंगी.

गणेश देवी के मुताबिक, दुनिया की 6 हजार भाषाओं में से 4 हजार भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है, जिन में से 10 फीसदी भाषाएं भारत में बोली जाती हैं. दूसरे शब्दों में, कुल 780 भाषाओं में से 400 भारतीय भाषाएं विलुप्त हो सकती हैं.

उल्लेखनीय है कि दुनिया की सब से ज्यादा भाषाएं पापुआ न्यू गिनी में हैं. इन की संख्या 838 है. तीसरा नंबर इंडोनेशिया का है जहां 707 भाषाएं हैं. चौथे नंबर पर नाइजीरिया है 526 भाषाओं के साथ. उस के बाद क्रमश: अमेरिका (422), चीन (300), मैक्सिको (289), कैमरून (281), आस्ट्रेलिया (245), ब्राजील (229) के नंबर आते हैं. मगर भारत में अन्य देशों की तुलना में ज्यादा भाषाएं विलुप्त हो रही हैं. पापुआ न्यू गिनी में 98, इंडोनेशिया 143, अमेरिका 191, चीन 144, मैक्सिको 143, आस्ट्रेलिया 108, ब्राजील 190 और कनाडा में 87 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं.

भारत में 2 तरह की भाषाएं लुप्त हुई हैं. एक तो तटीय इलाकों के लोग ‘सी फार्मिंग’ की तकनीक में बदलाव होने से शहरों की तरफ चले गए. उन की भाषाएं ज्यादा विलुप्त हुईं. दूसरे, जो डीनोटिफाइड कैटेगरी है, बंजारा समुदाय के लोग, जिन्हें एक समय अपराधी माना जाता था. वे अब शहरों में जा कर अपनी पहचान छिपाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे 190 समुदाय हैं, जिन की भाषाएं बड़े पैमाने पर लुप्त हो गई हैं.

गणेश देवी के अनुसार, बंजारों, आदिवासी या अन्य पिछड़े समाजों की भाषाएं पूरे विश्व में लगातार नष्ट हो रही हैं. यह आधुनिकता की सब से बड़ी विडंबना है. ऐसे लोग देश के लगभग हर हिस्से में फैले हैं. ऐसा नहीं है कि ये लोग जीवित नहीं हैं. ये जिंदा हैं और इन की संख्या लाखों में हैं, लेकिन ये अपनी भाषा भूल चुके हैं.

जानकारों का एक समूह मानता है कि ग्लोबलाइजेशन की वजह से मातृभाषाओं की मौत हो रही है. लोग जहां जाते हैं वहीं की भाषा अपना लेते हैं और अपनी भाषा को छोड़ देते हैं.

वैसे, ग्लोबलाइजेशन को कितना ही कोस लीजिए, वह वक्त का तकाजा है. उस में छोटे समुदायों के आपस में जुड़ने से दुनिया एक गांव बनती जा रही है. माइग्रेशन, परिवहन और संचार के साधन लोगों को पास ला रहे हैं. इस में पुरानी भाषाओं और बोलियों का क्षय होना स्वाभाविक है. मगर उस में से जो प्रमुख भाषाएं उभर कर आ रही हैं उन में से करोड़ों लोग जुड़ते हैं.

गुरमीत राम रहीम कथा : आस्था और ऐशोआराम का धंधा

लाखों अनुयायियों के गुरु माने जाने वाले गुरमीत राम रहीम को बलात्कार के मामले में अदालत द्वारा दोषी करार दिया गया तो उपद्रव, हिंसा से कई शहर जल उठे. इस घटना से स्तब्ध देश में बाबाओं की बढ़ती भीड़ को ले कर प्रश्न उठ रहे हैं. क्यों बाबाओं की जमातें बढ़ रही हैं. उन के पीछे लाखों अंधभक्त क्यों पागल हो रहे हैं?

असल में बाबाओं की यह खरपतवार हमारे देश की भेदभावपूर्ण सामाजिक, धार्मिक व्यवस्था की देन है. बाबाओं ने हमारे सामाजिक विभाजन का पूरा फायदा उठाया. सदियों से दलित, पिछड़े, वंचित लोग हाशिए पर थे, ये लोग उन के लिए अवतार, भगवान बन गए. लाखों, करोड़ों लोग उन के चरणों में झुकने लगे. बाद में राजनीतिबाजों ने उन्हें लपक लिया.

पंथ के नामों पर बने हुए डेरे, आश्रम, मठ, मंदिर अलगअलग धर्म, जाति, विभाजित समाज को मुंह चिढ़ाते नजर आते हैं. इन के बीच आपसी प्रेम, सौहार्द नहीं है. आएदिन झगड़े, खूनखराबा, पुलिस, अदालती मामले सामने आते रहते हैं. कभीकभी लगता है कि देश में गृहयुद्ध सा चल रहा है.

देश के हर हिस्से में बाबा विराजते हैं. बाबागीरी का लबादा ओढ़े ज्यादातर बाबा जमीन हथियाने, राजनीतिक दलाली करने में जुटे हैं. इन के कालेधंधे भी चलते हैं. इन की करतूतों का अकसर परदाफाश होता भी रहा है.

ऐशोआराम का धंधा

हैरानी की बात है कि हर डेरा, आश्रम, मठ पांचसितारा से कम नहीं दिखता. बाबा लोग सोनेचांदी के सिंहासनों पर विराजते हैं. ये एअरकंडीशंड आश्रमों में रहते हैं और  महंगी लक्जरी गाडि़यों में घूमते हैं. इन के यहां ऐशोआराम के सभी साधन उपलब्ध हैं. आश्रमों में अप्सराएं भी थोक में उपलब्ध रहती हैं.

राम रहीम के लाखों अनुयायी देशविदेश में फैले हुए हैं. इन में अधिकतर निचले, दलित, पिछड़े वर्ग के स्त्रीपुरुष हैं. आसाराम, रामपाल जेल में हैं. इन गुरुओं के भक्त भी बड़ी तादाद में निचले तबके के हैं.

राम रहीम के उदय की कहानी 1990 से शुरू होती है. उस समय वह 23 साल का ऐयाश आदमी था. 1948 में डेरा सच्चा सौदा, सूफी गुरु माने जाने वाले बाबा मस्ताना महाराज ने स्थापित किया था. बाद में शाह सतनाम सिंह ने गद्दी संभाली. सतनाम सिंह ने 1990 में राम रहीम को डेरा का मुखिया बनाया. डेरा की कुरसी मिलने के बाद राम रहीम ने खूब दौलत और शोहरत बटोरी. उस ने तेजी से अपने समर्थक बनाए, बढ़ाए और राजनीतिक संबंध बढ़ाए. देशभर में करोड़ों अनुयायी बना लिए. हरियाणा के 9 जिलों में 30 से अधिक विधानसभाई सीटों में उस का दखल है. पंजाब की दर्जन से अधिक विधानसभा सीटों पर डेरा निर्णायक की हैसियत रखता है.

राम रहीम ने कुछ समय पहले अपना पहला म्यूजिक अलबम ‘लव चार्जर’ जारी किया था. उस के अधिकतर खरीदार उस के भक्त ही थे. फिर ‘एमएसजी’ (मैसेंजर औफ गौड) फिल्म बनाई. बाबाओं, गुरुओं की परंपरागत पोशाक के बजाय राम रहीम चमकीले, भड़कीले कपड़ों में अधिक रहता है. वह नई महंगी गाडि़यों और मोटरबाइकों का शौकीन है.

चमकीला बाबा

गुरमीत राम रहीम की यह चमकदमक समर्थकों को खूब पसंद आई. सदियों से भेदभावपूर्ण सामाजिक, धार्मिक, जातीय व्यवस्था से पीडि़त लोग तथाकथित गुरुओं के पास इसलिए पहुंच जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऊंची जाति वालों और उन के वर्चस्व वाली राजनीति ने उन के लिए कुछ नहीं किया, उन के साथ हमेशा भेदभाव बरता गया.

अमीरों और गरीबों के बीच बड़े फासलों वाली जातीय, धार्मिक व्यवस्था में सवर्ण धर्मगुरुओं ने उन्हें जानबूझ कर न्यूनतम स्तर पर रखा. उन्हें जलालत की जिंदगी जीने को मजबूर किया गया. मानसम्मान देने की जगह उन्हें अपमानित किया गया.

यह गैरबराबरीपूर्ण व्यवहार निचली जातियों को आसाराम, रामपाल, राम रहीम, रामवृक्ष यादव जैसे बाबाओं के पास ले जाता है. स्पष्ट है कि बाबाओं और पंथों का उदय यह बताता है कि हमारा देश अंदरूनी तौर पर कितना बंटा हुआ है और किस कदर गैरबराबरी व्याप्त है.

समाजशास्त्रियों के मुताबिक, राम रहीम जैसे बाबाओं का उत्थान हमें यह बताता है कि किस तरह से सरकारें, राजनीति और धर्म लोगों की एक बड़ी संख्या को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे लोग सम्मान और बेहतर जिंदगी की आस में सतलोक आश्रम, डेरा सच्चा सौदा जैसे, हिंदू धर्म की सनातन परंपरा से अलग बने, पंथों की ओर चल पड़ते हैं. ये पंथ जाति, वर्ग, धर्म की बात नहीं करते, न कोई भेदभाव बरतते हैं. ये लाखों भक्तों को एक जगह इकट्ठा कर के उन्हें समानता का एहसास दिलाते हैं. विदेशों में गए दलित, पिछड़े इन डेरों को खूब पैसा भेजते हैं. इस के अलावा, भक्त दानदक्षिणा देते रहते हैं.

अंधभक्तों का दुस्साहस

राम रहीम की करतूतों का परदाफाश होने के बाद बाबाओं पर बहुत सवाल उठ रहे हैं और राम रहीम के अंधभक्तों के दुस्साहस की आलोचना हो रही है. सच यह है कि अंधभक्ति प्रवचनों, सत्संगों, भाषणों, पुस्तकों, टीवी कार्यक्रमों से रातदिन लोगों के दिमागों में भरी जा रही है. हां, फर्क इतना है कि जब ऊंची जातियों के शंकराचार्यों, रविशंकरों, रामदेवों के प्रति भक्ति का पाठ पढ़ाया जाता है तो हिंदू धर्मग्रंथों का हवाला दे कर इसे महान संस्कृति माना जाता है.

हमारे देश में सदियों से गुरु की परंपरा रही है. गुरु को ईश्वर का अवतार, उस तक पहुंचने का मार्ग बताने वाला माध्यम माना गया है. धर्म में गुरु को बहुत सम्मानजनक और सर्वाेपरि स्थान दिया गया है. गं्रथों में गुरु की महिमा का खूब गुणगान किया गया है. गुरुभक्ति, गुरुसेवा को बहुत महत्त्व दिया गया है. इस का दिनरात प्रचारप्रसार भी हो रहा है.

गुरु का महिमामंडन

पुराण, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता जैसे ग्रंथों में गुरु की महत्ता का खूब वर्णन है. गुरु वशिष्ठ (राम के गुरु), विश्वामित्र, सांदीपनि (कृष्ण के गुरु), महर्षि वेदव्यास, द्रोणाचार्य (पांडवों के गुरु), कृपाचार्य (कुरुवंश के गुरु), गौतम, भारद्वाज, च्यवन, कृपाचार्य की महिमा गाई गई हैं. बाद में, गुरु गोरखनाथ, गुरुनानक, नामदेव, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद, धीरेंद्र ब्रह्मचारी, चंद्रास्वामी जैसे गुरुओं की लंबी शृंखला है.

धर्मगं्रथों के अनुसार पैल, जैमिनी, वैशंपायन, समंतुमुनि, रोमहर्षण महर्षि वेदव्यास के शिष्य थे. गुरुपूजा के लिए दिन भी तय किया गया है. भविष्योत्तर पुराण में गुरुपूर्णिमा के बारे में लिखा है-

मम जन्मदिने सम्यक् पूजनीय. प्रयत्नत:,
आषाढ़ शुक्ल पक्षेतु पूर्णिमायां गुरौ तथा.
पूजनीयो विशेषण वस्त्राभरणधेनुभि:,
फलपुष्पादिना सम्यगरत्नकांचन भोजनै.
दक्षिणाभि: सुपुष्ठाभिर्मत्स्वरूपरूप प्रपूजयेत.

अर्थात, आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मेरा जन्मदिन है. इसे गुरुपूर्णिमा कहते हैं. इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ गुरु को सुंदर वस्त्र, आभूषण, गाय, फल, पुष्प, रत्न, स्वर्ण मुद्रा आदि समर्पित कर उन का पूजन करना चाहिए. ऐसा करने से गुरुदेव में मेरे ही स्वरूप के दर्शन होते हैं.

ग्रंथों में बारबार कहा गया है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं, गुरु के बिना मोक्ष नहीं. गुरु ही मनुष्य के समस्त पापों का हरण करने वाला होता है. गुरु का पद ईश्वर से ऊपर बताया गया है.

गुरु गोविंद दोऊ खड़े,
काके लागूं पांव
बलिहारी गुरु आप ने
गोविंद दियो बताए.

गुरु बिन ज्ञान न उपजे,
गुरु बिन मिलै न मोक्ष,
गुरु बिन लखै न सत्य को,
गुरु बिन मिटै न दोष.

अर्थात, गुरु के बिना ज्ञान मिलना कठिन है. गुरु के बिना मोक्ष नहीं है. गुरु के बिना सत्य को पहचानना असंभव है और गुरु बिना दोष का, मन के विकारों का मिटना मुश्किल है.

गुरु समान दाता नहीं,
याचक सीष समान,
तीन लोक की संपदा,
सो गुरु दिन्ही दान.

यानी, गुरु के समान कोई दाता नहीं है. शिष्य के समान कोई याचक यानी मांगने वाला नहीं है. ज्ञानरूपी अनमोल संपत्ति, जो तीनों लोकों की संपत्ति से बढ़ कर है, शिष्य के मांगने पर गुरु उसे यह ज्ञानरूपी संपदा दान में दे देते हैं.

गुरु शरणगति छाडि़ के,
करै भरोसा और,
सुखसंपत्ति को कह चली,
नहीं नरक में ठौर.

अर्थात, जो व्यक्ति सतगुरु की शरण छोड़ कर, उन के बताए रास्ते पर न चल कर अन्य बातों में विश्वास करता है उसे जीवन में दुखों का सामना करना पड़ता है और उसे नरक में भी जगह नहीं मिलती.

और देखिए-

सतगुरु महिमा अनंत है,
अनंत किया उपकार,
लोचन अनंत उघारिया,
अनंत दिखावा हार.

अर्थात, सतगुरु की महिमा अनंत है. उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किए हैं. उन्होंने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिए और मुझे अनंत यानी ईश्वर के दर्शन करा दिए.

सब धरती कागद करूं,
लिखनी सब बनराय,
सात समुद्र का मसि करूं,
गुरु गुण लिखा न जाए.

यानी, सारी धरती को कागज बना लिया जाए, सारे वनों की लकडि़यों को कलम बना लिया जाए, सात समुद्र को स्याही बना लिया जाए तो भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते, गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता क्योंकि गुरु की महिमा अपरंपार है. गुरु की महिमा में इस तरह के सैकड़ों श्लोक रचे गए हैं.

आधुनिक गुरु सतपाल महाराज अपने प्रवचनों की पुस्तक ‘अपने आप को जानो’ में लिखते हैं, ‘‘शिष्य के जीवन में आज्ञा का ही सब से बड़ा महत्त्व है. जो शिष्य अपने गुरु की आज्ञा नहीं मानता, दरबार की पवित्रता की तरफ ध्यान नहीं देता, वह इस मार्ग में सफल नहीं हो सकता.’’

एक जगह लिखा है-

‘‘माया ही मनुष्य को संसार के जंजाल में उलझाए रखती है. संसार के मोहजाल में फंस कर मनुष्य मन में अहंकार, इच्छा, राग और द्वेष के विकारों को उत्पन्न करता रहता है. विकारों से भरा मन माया के प्रभाव से ऊपर नहीं उठ सकता. वह जन्ममृत्यु के चक्र में फंसा रहता है. सतगुरु की कृपा से मनुष्य मोहमाया के जाल से छूट सकता है. जो मनुष्य गुरु की आज्ञा नहीं मानता और गलत मार्ग पर चलता है वह दुनिया और धर्म दोनों से ही पतित हो जाता है, साथ ही दुख व कष्टों से घिरा रहता है.’’

भेदभावभरी बाबाओं की दुनिया

अब मामला राम रहीम का है जिस के समर्थकों में ऊंची जातियों के कम ही लोग हैं. और इसीलिए बाबा के खिलाफ सही व उचित माहौल पैदा हो गया. काश, यह पहले ही हो गया होता और धर्म के इन दुकानदारों को चप्पेचप्पे पर आश्रम खोलने की इजाजत न होती.

हमारे गुरुओं की दुनिया भेदभाव से भरी हुई है. ऊंची जातियों के धार्मिक संगठन व गुरु निचलों को अपने यहां घुसने नहीं देते. राधास्वामी सत्संग, श्रीश्री रविशंकर का आर्ट औफ लिविंग, शंकराचार्यों के मठ, रामदेव के योग आश्रम अमीर सवर्णों की जागीर माने जाते हैं.

ऐसे में दलितों, पिछड़ों को जातीय, धार्मिक भेदभाव रहित राम रहीम, आसाराम, आशुतोष महाराज, रामपाल, रामवृक्ष, निरंकारी, साईं बाबा जैसों की शरण में जा कर अपने दुखों का निवारण खोजना पड़ता है.

डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम पर जैसे ही आरोप तय हुए, हरियाणा, पंजाब सहित दिल्ली, राजस्थान में अनुयायियों का गुस्सा भड़क उठा. चारों ओर उपद्रव, आग, अराजकता और चीखपुकार मच गई. पंचकूला और सिरसा जल उठे. हिंसा में 38 लोग मारे गए. सैकड़ों वाहन आग के हवाले कर दिए गए. शासनप्रशासन राम रहीम के अनुयायियों के सामने बेबस दिखा. इस हिंसा से समूचा देश स्तब्ध रह गया पर सरकार और समर्थक इसे कलंक मानने को तैयार नहीं. वे तो इसे लीला समझ रहे थे.

राम रहीम के काफिले में 400 विदेशी एयूवी कारें, 120-140 तक की स्पीड से सड़क पर दौड़ रही थीं, हजारों लोग हाथ जोड़े सड़क पर बैठे थे. पुलिसअर्धसैनिक बल मानो स्वागत में खड़े थे. पूरा देश धड़कते दिल से बाबा के अंधभक्तों का शक्तिप्रदर्शन देख रहा था. सत्ता लाभहानि के अनुमान में लगी नतमस्तक थी. उस वक्त एक जज, सीधेसादे कपड़े पहन कर, कोर्ट पहुंचा, कुछ वीरोचित नहीं, शक्तिप्रदर्शन नहीं, उसी जज ने साहसिक फैसला सुनाया.

अदालत द्वारा राम रहीम को दोषी करार दिए जाने के बाद आक्रोशित भक्तों द्वारा हिंसा किए जाने का ऐसा वीभत्स दृश्य दिखाईर् दे रहा था मानो कुरुक्षेत्र में गदर छिड़ गया हो. 800 से अधिक गाडि़यों के काफिले और अन्य साधनों से पहुंचे लाखों अनुयायियों से पूरा पंचकूला शहर पट गया था. शहरवासी दहशत में आ कर घरों में कैद हो गए. सुरक्षा बलों और सेना के हजारों जवान शहर के चप्पेचप्पे पर तैनात थे.

हिंसा की आंच राजधानी दिल्ली समेत 6 राज्यों तक पहुंच गई. दिल्ली के आनंद विहार रेलवेस्टेशन पर खड़ी रीवा ऐक्सप्रैस की 2 बोगियां फूंक दी गईं. दर्जनभर बसों में आग लगा दी गई. हिंसा को देखते हुए स्कूलों की छुट्टी कर दी गई. राजधानी की सीमाएं सील करने के साथसाथ धारा 144 लागू कर दी गई.

सरकार को एहतियात के तौर पर बिजली, इंटरनैट बंद करने पड़े. पंजाब, हरियाणा, जम्मूकश्मीर, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जाने वाली कई रेलगाडि़यां रद्द करनी पड़ीं.

आस्था के नाम पर ढोंग और ऐयाशी का बाजार देशभर में खूब फूलाफला है. इस बाजार में लाखों ढोंगी गुरु, बाबा, संत, साधु उतरे और वे अनुयायियों की बड़ी भीड़ को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे हैं. दरअसल, गैरबराबरी की व्यवस्था वाले समाज को गुरुओं और गुरुओं को समाज की जरूरत रही है. वहीं, गुरुओं के बीच आपसी मतभेद, कलह, हिंसा समयसमय पर सामने आती रही हैं.

निरंकारी और अकाल तख्त के बीच विवाद रहा है. अकाल तख्त को निचले वर्गों के लिए आध्यात्मिक रास्ता दिखाने वाला निरंकारी पंथ कभी रास नहीं आया. लंबे समय तक उस के प्रमुख रहे बाबा गुरबचन सिंह की जरनैल सिंह भिंडरावाले के लोगों ने यह कह कर हत्या कर दी थी कि वह खुद को गुरु बताता है.

सिख पंथ और डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों के बीच कई बार हिंसक झड़पें हुई हैं, एकदूसरे के समागमों पर हमले किए गए हैं.

भिंडरावाला के चेलों ने 1978 में बैसाखी के दिन निरंकारियों के धार्मिक जलसे के सामने प्रदर्शन किया. उस में  16 लोग मारे गए थे. उस के बाद स्वर्ण मंदिर स्थित अकाल तख्त से हुक्मनामा जारी हुआ कि निरंकारियों के साथ कोई संबंध न रखा जाए. सिख परिवार न उन्हें अपनी बेटी दें, न उन के घर का खानापानी करें.

अपराध के अड्डे

पंजाब के नूरमहल में आशुतोष महाराज के अनुयायियों और सिख गुरुओं के समर्थकों के बीच हिंसक टकराव रहा है. आशुतोष के अनुयायियों की तादाद भी लाखों में है और वे अधिकतर निचले वर्गों के हैं. जनवरी 2014 में आशुतोष की मौत हो गई थी. डाक्टरों की टीम ने उसे क्लिनिकली डैड करार दे दिया था पर अनुयायी मानते हैं कि आशुतोष महाराज समाधि में हैं और लौट आएंगे.

रामदेव अमीर ब्राह्मण और बनियों से  मोटी फीस ले कर योग शिविरों में प्रवेश देते हैं. लोग बारबार आवाज उठाते हैं कि रामदेव गरीबों को मुफ्त में योग क्यों नहीं सिखाते.

राधास्वामी सत्संग के प्रमुख रेलिगरे, फोर्टिस और रैनबैक्सी जैसी विख्यात कंपनियों के मालिक हों, तब क्या कोई दलित, शूद्र उन के सत्संग, आश्रमों में जाने का साहस कर सकता है?

रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, शंकराचार्य जैसे ब्राह्मणवादी साधुसंतों के खिलाफ भी गैरकानूनी कई मामले सामने आए हैं. यमुना किनारे श्रीश्री रविशंकर के कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के कारण एनजीटी, जिस की सुप्रीम कोर्ट के समकक्ष हैसियत है, के आदेश को दरकिनार कर श्रीश्री रविशंकर की संस्था आर्ट औफ लिविंग ने जुर्माने के 50 लाख रुपए देने से इनकार कर दिया. आज तक कोई भी अदालत, सरकार या संगठन श्रीश्री रविशंकर के खिलाफ कुछ नहीं कर पाए.

रामदेव के कैंसर, अस्थमा, टीबी जैसी लाइलाज बीमारियों को योग से मुक्त कर देने के भ्रमित दावे, उन की दिव्य पुत्र जीवक बीज पर विवाद के बावजूद उन का बाल बांका नहीं हो सका.

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा साईं बाबा की हिंदू मंदिरों में मूर्तिस्थापना के खिलाफ मुहिम चलाने और उन्हें अवतार न मानने के बावजूद उन पर धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने का कोई मामला दर्ज नहीं कराया गया.

हैरत है कि सिखों के जुलूसों में पंचप्यारों की पोशाक पहनने पर किसी की धार्मिक भावना को ठेस नहीं पहुंचती जबकि राम रहीम पर गुरु गोविंद सिंह की पोशाक पहनने पर मामला दर्ज करा दिया जाता है.

इसीलिए, राम रहीम, आसाराम, आशुतोष, रामपाल, जयगुरु देव निचले तबकों में अधिक लोकप्रिय हैं. लेकिन ऊंचे समझे जाने वाले पंथों अकाल तख्त, शंकराचार्य, श्रीश्री रविशंकर जैसे बाबा इन बाबाओं की निंदा करते हैं. वे इन्हें धर्मी मानने से इनकार करते हैं और अधर्मी करार देते हैं. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साईंबाबा को अवतार मानने से मना कर दिया. शंकराचार्य सवर्णों में मान्य हैं जबकि साईं बाबा के यहां जाति, धार्मिक, अमीरगरीब का कोई भेद नहीं माना जाता. उन के अधिकतर अनुयायी निचले, पिछड़े तबकों के हैं.

गुरुवाद का यह संघर्ष सवर्ण साधुओं, गुरुओं, शंकराचार्यों बनाम निचलों, दलितों, पिछड़ों के गुरुओं के प्रति भेदभाव की उपज है.

यह भेदभाव है. सवर्ण बाबाओं में अपराध के बावजूद बच निकलने की कूवत है. निचलों के बाबा शुरुआती जांच से ही अदालतों में मात खा रहे हैं.

सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, वे ऐसे बाबाओं का इस्तेमाल अपने वोटबैंक के तौर पर तो करती आई हैं पर उन्हें संरक्षण नहीं देतीं, वह चाहे कांग्रेस की हो, अकाली दल की, शिवसेना या भाजपा की हो. डेरा सच्चा सौदा के वोटबैंक का उपयोग इन तीनों पार्टियों ने किया है. पंचकूला में हुई हिंसा एक बार फिर जाहिर करती है कि राम रहीम जैसे बाबा किस तरह से अपनी समानांतर सत्ता चला  सकते हैं और सरकारें इन के आगे नतमस्तक दिखाई देती हैं.

गैरबराबरी के शिकार

पिछले चुनाव में राम रहीम ने भाजपा की मदद इसलिए की थी ताकि वह हत्या, बलात्कार मामले में सीबीआई से बच सके लेकिन सरकार ने नहीं बचाया. ये बाबा बेशक ढोंगी हैं, अपराधी हैं, भारतीय कानून के अनुसार सजा के लायक हैं. वहीं, सच यह भी है कि ये सामाजिक भेदभाव का दंश झेल रहे लोगों के तारणहार बने दिखते हैं. हालांकि ये खुद भी गैरबराबरी के शिकार हो रहे हैं.

यही वजह है कि राम रहीम की सजा का किसी भी राजनीतिक दल ने स्वागत नहीं किया है. हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार तो सन्नाटे में चली गई. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली भाजपा की केंद्र सरकार की भी बोलती बंद है. न तो कानून मंत्री और न ही महिला एवं बाल कल्याण मंत्री की ओर से, हरियाणा की 2 युवतियों का यौन शोषण किए जाने के मामले में, राम रहीम को मिली सजा पर किसी तरह का बयान जारी किया गया.

देश के हर क्षेत्र में ऐसे बाबाओं की उपज और फूलनेफलने के पीछे वजह यही है. यह भूमि बाबाओं के लिए अत्यधिक उपजाऊ है.

सवाल यह भी है कि बड़ी तादाद में महिलाएं गुरुओं की शरण में क्यों जाती हैं? गुरु से आशीर्वाद पाने के लिए गुरुभक्ति, सेवा के नाम पर महिलाएं कुछ भी करने को तैयार रहती हैं. गुरु भी आखिर इंसान होते हैं. ऐसा नहीं है कि उन के भीतर कामवासना जागृत नहीं होती. मौका देख कर गुरु अपनी चेलियों को धीरेधीरे बिस्तर तक ले आते हैं. सबकुछ आपसी रजामंदी से चलता रहता है. मामला तब बिगड़ता है जब दूसरी औरतों को गुरुशिष्या के बीच के संबंधों का पता चल जाता है. फिर अपनेआप को बचाने के लिए चीखनाचिल्लाना शुरू होता है.

समाज विज्ञानियों का मानना है कि हर धर्म भेदभाव की नींव पर खड़ा है. धर्म व्यक्तियों के बीच ऊंचनीच, छुआछूत, भेदभाव, शोषण, लैंगिक दुराचार पर आधारित हैं.

निचले तबकों की धार्मिक भूख, बराबरी का सम्मान पाने की लालसा इन बाबाओं के आश्रमों, डेरों में पूरी हो रही है. बाबाओं ने उन्हें बराबरी का स्पेस उपलब्ध कराया.

कौन हैं पीडि़त?

लोगों को दुख, गरीबी, बीमारी और विपरीत हालात के समय ऐसे किसी ईश्वरीय अवतार की जरूरत महसूस होती है. इन बाबाओं ने इस मनोविज्ञान को समझा और अपनीअपनी दुकानें खोल लीं. इन दुकानों पर दलितों, पिछड़ों की इच्छानुसार बातें होने लगीं. उन्हें दिमागी संबल मिला, अपना गुरु बनाने की इच्छा पूरी होने लगी. मुफ्त में खाना, पढ़ाई मिलने लगी. और सब से बड़ी बात, हजारों लोगों के बीच उन्हें इकट्ठा हो कर बराबरी का एहसास मिला. इस से वे खुद को सम्मानित समझने लगे. सवर्णों के गुरुओं के पास फटकने की उन में हिम्मत नहीं.

इन बाबाओं की चमकदमक ने उन्हें प्रभावित किया, उन के कई तथाकथित चमत्कारों ने असर किया हालांकि वे फरेब थे. पर, ये भोलेभाले लोग समझ नहीं पाते और चमत्कार मान बैठते हैं.

इस के अलावा निचला वर्ग सब से अधिक त्रस्त रहा है. वह नशा, मांसाहार, गालीगलौज की भाषा, औरतों के साथ मारपीट जैसी बुराइयों से पीडि़त रहा है. ये बाबा उन्हें इस तरह की बुराइयां छोड़ने की सीख देते हैं. लोगों पर खासतौर से महिलाओं पर बाबाओं की सीख वाले इस तरह के प्रवचन असर डालते हैं क्योंकि इन बुराइयों से गरीब, दलित तबके की महिलाएं ही अधिक पीडि़त होती हैं.

सवाल यह भी है कि आसाराम, राम रहीम, रामपाल जैसे निचलों के गुरु ही एक के बाद एक जेलों में जा रहे हैं. श्रीश्री रविशंकर, रामदेव, शंकराचायर्ोें के खिलाफ गैरकानूनी मामले सामने आने के बाद भी उन का साम्राज्य ज्यों का त्यों चमक रहा है. बाबाओं की यह दुनिया गैरबराबरी की है.

गुरुओं, बाबाओं के प्रति लोगों की अंधभक्ति से ऐसी घटनाएं होती रहेंगी. सुधार केवल कानून से नहीं होगा, न सरकार कुछ कर पाएगी. समाज को स्वयं अपने भीतर झांकने की क्षमता विकसित करनी होगी. उसे किसी भगवान, अवतार या गुरु का अवलंबन छोड़ना होगा. उसे समझना होगा कि समस्याएं, कष्ट दूर करने के उपाय उसे खुद करने होंगे. उसे खुद में विवेक, व्यावहारिकता, तर्क और नैतिकता की स्थापना करने की जरूरत है.

बाबा रे बाबा

सालडेढ़ साल पहले की बात है. मौर्निंग वाक के लिए निकली तो एक अनोखा सा नजारा देखने को मिला. सैकड़ों लोग मुंह पर कपड़ा बांधे, हाथों में बड़ीबड़ी झाड़ू लिए सड़कों की साफसफाई में जुटे थे. मेरे महल्ले में ही नहीं, बल्कि पूरे शहर में ये लोग फैले थे. उत्सुकतावश मैं ने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘यह क्या हो रहा है, आप लोग किस संस्था से जुड़े हैं?’’

वह बोला, ‘‘हम डेरा सच्चा सौदा वाले गुरु गुरमीत राम रहीम इंसा के अनुयायी हैं और यह हमारा मिशन है. इस के तहत हम किसी एक शहर को चुनते हैं और सब मिल कर कुछ ही घंटों में पूरे शहर की सड़कोंगलियों आदि की सफाई कर देते हैं.’’ यह सुन कर दिल को लगा कि कुछ अच्छा हो रहा है, साथ ही मुझे उस बाबा के बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ी.

संयोग से कुछ ही दिनों बाद एक औफिशियल टूर पर कोलायत जाना हुआ. रास्ते में दियातरा के पास ड्राइवर ने एक बड़ा सा आश्रम दिखाते हुए कहा, ‘‘यह बाबा गुरमीत राम रहीम का आश्रम यानी डेरा सच्चा सौदा है.’’ बस, फिर क्या था, मैं ने ड्राइवर से गाड़ी रोकने और आश्रम देखने की बात कही.

आश्रम के बाहर एक छोटा सा होटल बना हुआ था और सड़क के दूसरी तरफ डेरे की कई एकड़ जमीन थी जिस पर बेरों से लदी झाडि़यां थीं. वहां काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने सरकारी गाड़ी देख कर हमें चायनाश्ता औफर किया. हम ने आश्रम देखने की इच्छा जाहिर की. यों तो आश्रम में किसी अनजान को जाने की इजाजत नहीं थी मगर शायद यह सरकारी गाड़ी की ताकत थी कि इच्छा न होते हुए भी वह हमें अंदर ले गया.

अंदर का दृश्य सचमुच देखने लायक था. एक बड़ा सा टीनशेड लगा था. वहां बेर के ढेर लगे थे और बहुत से सेवादार उन्हें छांटछांट कर बोरियों में भर रहे थे. खुली जमीन पर अन्य सब्जियां और खासतौर से एलोवेरा के पौधे लगे थे. मेरे पूछने पर बताया गया कि ये सब बेर और सब्जियां भक्तों को पहुंचाए जाएंगे. मुझे जान कर आश्चर्य हुआ कि भक्त यहां मुफ्त में काम कर रहे हैं और यहां पैदा होने वाली फलसब्जियां मूल्य दे कर खरीदते हैं.

उन्हीं दिनों मेरी एक रिश्तेदार ने मुझे अपने यहां बाबा गुरमीत राम रहीम के सत्संग में आमंत्रित किया. मैं इस तरह के ढकोसले जरा कम ही पसंद करती हूं, इसलिए मैं ने टाल दिया. मगर शाम को जब उन्होंने प्रसाद भिजवाया तो मुझे और भी आश्चर्य हुआ कि प्रसाद के नाम पर बाबा की फैक्टरी के बने बिस्कुट थे. जिन्हें भक्त ‘पिताजी’ कह कर संबोधित करते हैं, के प्रति भक्तों की अंधश्रद्धा देखते ही बनती थी. मैं ने अपनी रिश्तेदार को बहुत समझाया मगर वे ‘पिताजी’ के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं होतीं. यहां तक कि अपने छोटे बच्चों को भी जन्मदिन पर आशीर्वाद दिलाने के लिए डेरे पर ले कर जाती हैं. यही नहीं, अपनी नई खरीदी गाड़ी भी सब से पहले सिरसा ले कर गईं ताकि ‘पिताजी’ का आशीर्वाद उसे मिल सके.

25 अगस्त को जब अदालत ने बाबा को दोषी करार दिया तो मैं ने अपनी उसी रिश्तेदार को फोन किया. मगर घोर आश्चर्य  कि इतना सबकुछ साबित होने के बाद भी वह राम रहीम के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार न थी. उसे अब भी भरोसा था कि वे निर्दोष हैं और बहुत जल्दी वे कोई चमत्कार करेंगे और उन्हें दोषी साबित करने वाले वकील और जज को सजा मिलेगी.

वाह रे अंधभक्ति, इन्हें कहां ले कर जाएगी, पता नहीं. कैसे इन की आंखों पर बंधी अंधभक्ति की पट्टी खुलेगी और इन्हें सचाई नजर आएग

– आशा शर्म

इन्होंने जो कहा

हम कब जागेंगे

  • पाखंड की दुकानें जब अपनी शैशव अवस्था में रहती हैं तभी उन के फन कुचलने चाहिए न कि उन के तक्षक बनने की राह देखनी चाहिए. हम सभी को अपने कानआंख खोल कर रखने होंगे ताकि समाज की कोई फुंसी, फोड़ा न बन जाए. अन्याय को सहना भी तो अन्याय करने की तरह होता है.दुखद है कि खबरिया चैनल भी एयरकंडीशंड कार्यालय में बैठ खबरों की रचनाएं करना चाहते हैं. जब सबकुछ इतना उजागर था तो उंगली पहले ही उठानी थी.

    ठगी के धंधे के अलावा जनता को धर्म और आस्था के नाम पर गुमराह और मतिभ्रष्ट किया जा रहा है. बेहतर है कि जल्दी से जल्दी आवाज उठाई जाए ताकि कट्टरपंथी पाखंड और ठगी का कोई और बाबा लोगों को मानसिक गुलामी की जंजीरों में न जकड़ ले. इस के लिए आम जनता और हम जैसे लोगों को आवाज उठानी चाहिए.

    – रीता गुप्ता

    धर्म का डर

    धर्म से डरना हम ने बचपन से सीखा है, इसलिए बाबा के प्रति भी लोग अपना मुंह बंद कर लेते हैं.

    – पद्मा

    डर की जड़ें

    हम सचाई को कुबूल करना नहीं चाहते. कुछ दिन गुजरेंगे और सब भूल जाएंगे. फिर एक नया बाबा और उस के अनुयायी पैदा हो जाएंगे. यही हमारी कमजोरी है जिस का फायदा ये लोग खूब उठाते हैं. धर्म हमारी जड़ों में डर के साथ इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है कि ‘ऐसा नहीं किया तो, यह अनिष्ट, वह नुकसान हो जाएगा…’ वाली सोच से उबर पाना बेहद मुश्किल है.

    – मीनू परियानी

    विरासत की भक्ति

    इतना अंधाविश्वास है कि मातापिता अपने बेटेबेटियों को भी बाबाओं की सेवा में, कृपा, आशीर्वाद लेने भेज देते हैं कि सबकुछ आसानी से मिल जाए, जीवन सफल हो जाए मिनटों में. धर्म में और गुरुओं में आस्था, श्रद्घा, भक्ति विरासत में मिली, जो चली ही आ रही है.

    – नीरजा श्रीवास्तव

    दस जन्मों की सजा होती

    काश, कोई ऐसी तरकीब होती

    काश, कोईर् ऐसा कानून होता

    खुद को देवता बताने वाले को

    काली करतूत करने वाले को

    दस साल की नहीं,

    दस जन्मों की सजा होती

    हर जन्म में पीछा करती उस का

    उस के करतूतों की काली छाया

    शायद तब समझ में आता

    कैसा लगता है उस लड़की को

    जो उठाती है हर पल, हर घड़ी

    साधुमहात्माओं की

    मौजमस्ती का बोझ

    और जब उस के साथसाथ

    उम्रभर चलता है

    बलात्कार का काला धब्बा…

    – कविता

    मानसिकता बदलें

    महिलाओं को अपनी सोच बदलनी होगी क्योंकि महिलाएं इन से बहुत अधिक प्रभावित होती हैं. उन का एक ही कथन होता है कि इतने बड़े बाबा हैं, कुछ तो बात होगी.

    महिलाएं एक व्रत करती हैं-ऋषि पंचमी, इसे इसलिए रखा जाता है कि रजस्वला स्त्री घर के बरतन आदि छूती है तो इस व्रत के करने से वह पापमुक्त हो जाती है. उत्सुकतावश, इस से संबंधित एक पुस्तक पढ़ी. उस में लिखा है, ‘जो महिला इसे नहीं करती है वह कुतिया की योनि को प्राप्त होती है और उस के शरीर में कीड़े पड़ते हैं.’

    इस व्रत को करने वाली अशिक्षित ही नहीं, बल्कि एमबीए पास महिलाएं भी हैं. मैं ने उन से पूछा तो उन का उत्तर था, ‘‘अब इतने बड़े ऋषियों ने पुस्तक में लिखा है तो सचाई होगी ही.’’

    ऐसी महिलाएं क्या सिखाएंगी अपने बच्चों को?

    – प्रतिभा अग्निहोत्री

    राजनीतिक संरक्षण

    बाबाओं की दिनदूनी रातचौगुनी तरक्की का मुख्य कारण उन्हें प्राप्त राजनीतिक संरक्षण है. उन की संपत्ति पर टैक्स नहीं लगता. आम नागरिकों से खून चूस कर टैक्स वसूलने वाली सरकारें बाबाओं और मंदिरों या धार्मिक संस्थाओं की संपत्ति को टैक्स के दायरे में क्यों नहीं लातीं? दूसरे, बाबाओं के अनुयायी पार्टियों के वोटबैंक भी होते हैं.

    वोटों की राजनीति ने बाबाओं को राजनीतिक दलों के लिए बड़ा वोटबैंक उपलब्ध कराने वाला साधन भी बना दिया है. इसीलिए बाबाओं के दामन पर कोई राजनीतिक दल हाथ नहीं डालता है.

    ऐसे माहौल में देश के भविष्य के प्रति कोई आशा या उम्मीद नहीं महसूस होती.

    – गीता यादवेंदु

    ठगी का कारोबार

    हमें डर और अंधभक्ति विरासत में मिली है. इस का फायदा राम रहीम जैसे पाखंडी उठाते हैं. मेरी बड़ी ननद मध्य प्रदेश में रहती हैं. पिछले साल वे हमारे यहां आईं. उन्हें देख कर एक पंडित आ गया.

    पंडित ने कहा कि आप अपने बेटे की शादी कर के परेशान हैं. मैं कुछ उपाय आप को लिख कर देता हूं. इस से आप के घर में शांति आएगी. जबकि, ऐसा कुछ नहीं था. उस ने एक कागज पर लिख कर दिया और बीचबीच में यह लिख दिया कि आप गुलाब का फूल लिखेंगी, आप गंगा का नाम लिखेंगी आदिआदि. यह पाखंडी पंडित की चाल है. कागज देने के बाद वह सब से पूछता है कि आप को कौन सा फूल अच्छा लगता है, कौन सी नदी को आप मानते हैं?

    ज्यादातर लोग गुलाब और गंगा ही बताते हैं और उस की धाक जम जाती है. उस ने मेरी ननद से भी पूछा. उन्होंने बताया कमल का फूल और साबरमती नदी. वह कुछ नहीं बोला लेकिन दक्षिणा में हजार रुपए ऐंठ ले गया. मैं ने उन से कहा भी कि आप ने अलग नाम बताया. वह ठग है. लेकिन मेरी ननद ने जवाब दिया, ‘‘साबरमती को गंगा भी बुलाते हैं. मुझे गुलाब ही पसंद है. हम ने ही उन्हें गलत बताया था.’’

    – कविता कुमारी

    अंधविश्वास से अंधभक्ति

    अज्ञानता से भय पैदा होता है, भय से अंधविश्वास पैदा होता है और अंधविश्वास से अंधभक्ति पैदा होती है. अंधभक्ति से मनुष्य का विवेक शून्य

    हो जाता है. जिस का विवेक शून्य हो जाता है वह इंसान तर्क नहीं कर सकता, तर्क सुन भी नहीं सकता और फिर यहीं से शुरू होती है मानसिक गुलामी और शुरू होता है बाबाओं का खेल. भारत में करोड़ों लोग इस समस्या से पीडि़त हैं.

    – मोनिका

    सार्थक संदेश की जरूरत

    दिल्ली प्रैस की पत्रिकाएं जिस प्रकार ढोंगी बाबाओं की पोल खोलती आ रही हैं, वह संदेश अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे तो निश्चय ही लोगों के सोचनेसमझने का दृष्टिकोण बदलेगा.

    जब मैं बहुत छोटी थी, पढ़लिख भी नहीं सकती थी. उस समय मेरी मम्मी ने मुझे सरिता में प्रकाशित एक कहानी ‘उड़ने वाले बाबा’ सुनाई थी. उस में एक ढोंगी बाबा गुब्बारे को मानवाकृति का रूप दे कर रात में धागे से बांध कर उड़ाते थे. मम्मी ने समझाया था कि ऐसे लोगों और उन के तथाकथित चमत्कारों पर कभी विश्वास मत करना. संभव है कि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में यदि बाबाओं का विरोध न हुआ होता तो अंधविश्वासी लोगों की संख्या कहीं अधिक होती.

    – मधु शर्मा

    सच स्वीकार नहीं

    मेरे घर में झाड़ूपोंछा करने के लिए जो महिला आती है वह राम रहीम की भक्त है. वर्षों से वह राम रहीम के आश्रम जाती रही है. राम रहीम की करतूतों का परदाफाश हुआ तो वह अब रो रही है, कहती है, ‘‘बाबा ऐसे नहीं हैं, उन पर इल्जाम लगाया गया है.’’ मेरी सास ने उसे समझाने की कोशिश की तो उसे उन पर भी गुस्सा आ गया. लोगों में इतनी अंधभक्ति भरी हुई है कि वे सच को सामने देख कर भी स्वीकार नहीं कर रहे.

     – पारुल

    आखिर धर्म है क्या?

    कई धर्मों व कई धार्मिकस्थलों के होने के बावजूद हम इंसानों को एक बाबा की जरूरत पड़ ही जाती है. आम इंसान ही नहीं, खास इंसान भी इन के चक्करों में पड़ते हैं.

    इंदिरा गांधी न तो अनपढ़ थीं, न ही गरीब, फिर भी धीरेंद्र ब्रह्मचारी को गुरु मानती थीं. आज भी कई राजनेता, अभिनेता, उद्योगपति, खिलाड़ी ऐसे हैं जो किसी बाबा या माता के चरणों में सिर झुकाते हैं. गरीब जनता की तो बात ही छोड़ दीजिए.

    इस सब के व्यावहारिक कारण कई हैं. भक्तों के मन में सुख पाने की लालसा रहती है, बाबा के मन में भी यही सब रहता है. सभी सांसारिक सुखों को भोगना चाहते हैं. इस के लिए माध्यम बनता है धर्म, जिसे कोई नहीं जानता कि आखिर है क्या? ऐसे में होता है जन्म नए बाबा का और यह सिलसिला रुकता ही नहीं.

    भक्तों को सोचना होगा कि वे किस के पीछे, क्यों भाग रहे हैं. काम करो और आगे बढ़ो. वरना समझ लो, बाबा गुरमीत तो एक मास्क है, कितने ही बाबा और हैं जो आप को बेवकूफ बनाने को आमंत्रण देने को तत्पर हैं.

    – श्वेत

अगले महीने से एक बार फिर छोटे पर्दे पर लौट रहे हैं कपिल

हास्य कलाकार और बौलीवुड अभिनेता कपिल शर्मा का शो ‘द कपिल शर्मा शो’ को पिछले कुछ वक्त से टीवी पर प्रसारित नहीं किया जा रहा है. कुछ समय पहले ही इस बात की घोषणा की गई थी कि अब इसे बंद किया जा रहा है. हालांकि इसके बाद उनके और शो के फैंस काफी निराश हो गए थे. लेकिन अब कपिल अपने दर्शकों के लिए खुशखबरी लेकर आए हैं.

दरअसल पिछले दिनों बार बार कपिल की तबियत खराब होने की वजह से शूटिंग कैंसिल करनी पड़ रही थी, जिसके बाद इसे बंद करने का फैसला लिया गया था. हालांकि कपिल ने यह वादा किया था कि वह जल्द ही अपने शो के वापसी करेंगे और लगता है कि वह अपने इस वादे को अब पूरा भी करने वाले हैं.

एक अंग्रेजी वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक कपिल अपने शो के साथ अगले महीने यानी की अक्टूबर में एक बार फिर से वापसी कर रहे हैं.

फिलहाल कपिल शर्मा बेंगलुरू में अपना आयुर्वेदिक इलाज करा रहे हैं. बताया जा रहा है कि फिलहाल वे फिट हैं. कपिल ने एक इंटरव्यू में कहा है, मुझे एक अच्छे कमबैक के लिए अपनी शरीर को दुरुस्त करना जरूरी था. उम्मीद है कि मैं सितंबर के अंत तक मुंबई आ जाऊंगा. मैं कहना चाहता हूं कि जो कुछ भी मेरे या मेरे शो के बारे में कहा जा रहा है वह गलत है. मैं पिछले दस साल से बिना कोई ब्रेक लिए काम कर रहा था. मुझे एक्जायटी, ब्लड प्रेशर, अनबेलेंस्ड डाइट और शुगर जैसी समस्याओं से निपटने के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत थी.

अपनी फिल्मों के प्रमोशन के लिए कपिल के शो में पहुंचे सेलेब्स भी कई बार उनका इंतजार कर सेट से ही वापस लौट चुके हैं. सोनी चैनल के एक प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा था कि, “कपिल पिछले काफी वक्त से बीमार चल रहे हैं. इस कारण हम दोनों ने मिलकर यह फैसला लिया किया है कि शो को कुछ समय के लिए बंद कर देना चाहिए. जैसे ही कपिल पूरी तरह से ठीक हो जाएंगे हम इस शो की शूटिंग फिर से शुरू कर देंगे.” बता दें कि अपने इस शो के अलावा कपिल जल्द ही अपनी आगामी फिल्म ‘फिरंगी’ में भी नजर आने वाले हैं.

जानिए क्यों दो गुना हो जाता है पेट्रोल और डीजल का दाम

क्या आप जानते हैं कि आपके द्वारा चुकायी गई पेट्रोल या डीजल की कीमतों में कई किस्म के टैक्स शामिल रहते हैं. विदेशों से कच्चा तेल आयात करने में सरकार को प्रति लीटर लगभग 21 रुपये प्रति लीटर का खर्च पड़ता है. अब अगर आप एक लीटर पेट्रोल के लिए लगभग 71 रुपये तक की किमत चुका रहे हैं तो ये जानना जरूरी है कि बाकी पैसे सरकार आपसे किन किन मद में और क्यों वसूल रही है.

बता दें कि एक बैरल में 159 लीटर पेट्रोल होता है. इस लिहाज से एक लीटर कच्चे तेल का मू्ल्य लगभग 21 रुपये 65 पैसे होता है.

भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय कीमत बुधवार 13 सितंबर को 53.83 डालर प्रति बैरल दर्ज की गई थी. अगर देखा जाए तो रुपये में इसकी कीमत 3443 रुपये 89 पैसे होती है. कच्चे तेल की रिफाइनिंग शुरू होती है. इस प्रक्रिया में प्रति लीटर लगभग 9 रुपये 34 पैसे का खर्च आता है. इस तरह से रिफाइनिंग के बाद पेट्रोल की कीमत हो जाती है 30 रुपये 99 पैसे. इस कीमत पर डीलर्स सरकारी तेल कंपनियों से पेट्रोल खरीदते हैं. डीलरों को पेट्रोल की बिक्री पर लगभग प्रति लीटर 3 रुपये 24 पैसे का कमीशन मिलता है.

अब इस प्रक्रिया के बाद केन्द्र सरकार इस पर प्रति लीटर 21 रुपये 49 पैसे का उत्पाद शुल्क लगाती है. अब राज्य सरकार इसी कीमत पर वैट लगाती है. देश के 26 राज्यों में पेट्रोल पर वैट की दर लगभग 25 प्रतिशत है. मुंबई में वैट की दर सबसे ज्यादा 49.98 प्रतिशत है. इसलिए मुंबई में पेट्रोल सबसे महंगा मिलता है. लेकिन यहां हम अन्य शहरों की बात कर रहे हैं. जहां पर लगभग 26 फीसदी वैट राज्य सरकार लेती है. इस हिसाब से प्रति लीटर वैट की रकम लगभग 15 रुपये 04 पैसे तक पड़ती है. इसके बाद खुदरा बाजार में पेट्रोल की कीमतें लगभग 72 रुपये 78 पैसे प्रति लीटर हो जाती है. बता दें कि ये सभी गणना अनुमानित मूल्यों और अनुमानित कर दरों के आधार पर की गई है.

अमेजन-फ्लिपकार्ट ला रहे हैं फेस्टिव सेल, ऐसे करें बुकिंग

फेस्टिव सीजन शुरू होने वाला है. ऐसे में ई-कामर्स वेबसाइट्स फ्लिपकार्ट और अमेजन इंडिया धमाकेदार डिस्काउंट व औफर लाने की तैयारी कर रही है. अमेजन इंडिया की ‘ग्रेट इंडियन फेस्टिवल’ सेल 21 सितंबर से 24 सितंबर तक चलेगी. वहीं, फ्लिपकार्ट की ‘बिग बिलियन डेज’ का आयोजन 20 सितंबर से 24 सितंबर तक किया जाएगा. दोनों ही कंपनियों की सेल एक ही समय पर शुरू होगी. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों में से कौन सी कंपनी सेल रिकार्ड के मामले में पहले पायदान पर रहती है.

अमेजन इंडिया ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल

सेल के दौरान ग्राहकों को हर घंटे करीब 40,000 औफर और नई डील उपलब्ध कराई जाएगी. अमेजन की मानें तो स्मार्टफोन्स पर 500 से ज्यादा औफर और इलेक्ट्रानिक आइटम पर करीब 2500 से ज्यादा औफर दिए जाएंगे. इसके अलावा अलग-अलग कैटेगेरीज पर भी डिस्काउंट समेत कई औफर दिए जाएंगे. साथ ही कंपनी ने यह भी बताया कि सेल के दौरान ग्राहकों को ऐपल, सैमसंग, वनप्लस, लेनोवो, एलजी समेत कई ब्रैंड्स पर 40 फीसद तक का औफ दिया जाएगा.

एचडीएफसी डेबिट और क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करने पर 10 फीसद का कैशबैक मिलेगा. वहीं, अगर ग्राहक अमेजन पे के जरिए भुगतान करते हैं तो उन्हें 10 फीसद तक का कैशबैक दिया जाएगा जिसकी अधिकतम सीम 500 रुपये होगी.

फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डेज

बिग बिलियन डेज के दौरान ग्राहकों को स्मार्टफोन, इलेक्ट्रानिक आइटम, एक्सेसरीज, फैशन, टीवी अप्लायलेंसेस समेत कई प्रोडक्टस पर भारी डिस्काउंट दिया जाएगा. कंपनी एक लकी ड्रा कान्टेस्ट भी आयोजित करेगी जिसके विजेताओं को कैश रिवार्ड्स दिए जाएंगे. इसके अलावा बिड एंड विन भी आयोजित किया जाएगा.

अगर ग्राहक एसबीआई के डेबिट या क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करते हैं तो उन्हें 10 फीसद का इंस्टैंट डिस्काउंट दिया जाएगा. साथ ही बजाज फाइनेंस की ओर से नो कौस्ट ईएमआई औफर भी उपलब्ध होगा. वहीं, अगर ग्राहक फोनपे के जरिए भुगतान करते हैं तो उन्हें 10 फीसद तक का कैशबैक दिया जाएगा.

कैसे करें फास्ट बुकिंग

अगर आप सेल के दौरान अपना प्रोडेक्‍ट जल्‍दी बुक करना चाहते हैं तो यहां आपको थोड़ा स्‍मार्ट बनना पड़ेगा. इसके लिए किसी भी सेल के शुरू होने से पहले कुछ बातों का ध्‍यान रखें.

प्रोडक्ट सेव करें

अपने एकाउंट में प्रोडेक्‍ट को जितना जल्‍दी हो सके सेव कर लें सेल के दौरान अगर उसके बारे में पूरी डिटेल पढ़ने में समय लगाएंगे उतनी देर में उसे हजारो लोग खरीद चुके होंगे. अक्‍सर सबसे कम दाम उन्‍हीं प्रोडेक्‍ट के रखे जाते हैं जिनकी सेल की संभावना ज्‍यादा होती है या फिर उनका स्‍टाक हटाना होता है.

 क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड डिटेल

अपनी क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड डिटेल सेव करके रखें. इससे कार्ड की डिटेल को भरने में लगने वाला समय बच जाएगा और पेमेंट फास्‍ट हो जाएगा. एक बार प्रोडेक्‍ट का पेमेंट होने के बाद उसे कोई दूसरा नहीं ले पाएगा इसलिए अक्‍सर प्रोडेक्‍ट सेव करने के बाद पेमेंट के दौरान हमें ये मैसेज मिलता है कि प्रोडेक्‍ट खाली हो चुका है.

एड्रेस सेव कर लें

अपने अमेजन और फ्लिपकार्ट एकाउंट में पहले से एड्रेस सेव करके रखें ताकि एड्रेस भरने में टाइम न जाए. वरना इतनी देर में प्रोडेक्‍ट विशलिस्‍ट से सेव करने के बाद खाली हो सकती है.

खेलों पर नरेंद्र मोदी के मन की अधूरी बात

रेडियो कार्यक्रम मन की बात 27 अगस्त, 2017 के संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खेल की बात की. यह बात महज एक सूचना भर थी कि खेल मंत्रालय 28 अगस्त को एक पोर्टल लौंच करने वाला है और इस दिन इस पोर्टल का लौंच कर दिया गया.

इस पोर्टल के जरिए देश के हर कोने से खेल प्रतिभाओं को ढूंढ़ा जाएगा, जिस में कोई भी बच्चा या उस के मातापिता, कोच या शिक्षक इस पोर्टल में अपना बायोडाटा या वीडियो अपलोड कर सकता है. खेल मंत्रालय प्रतिभावान खिलाडि़यों को चुनेगा और उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण के केंद्रों में प्रशिक्षण देगा.

लेकिन खेल प्रतिभा पोर्टल तक वही खिलाड़ी पहुंच पाएंगे जो तकनीक और मुख्यधारा से जुडे़ हैं. गांवदेहात और जिला स्तर तक लोग अभी तकनीकी तौर पर इतने उन्नत या जागरूक नहीं हुए हैं कि अपने खेल प्रदर्शन का वीडियो बना कर पोर्टल पर डाल पाएं.

परंपरागत खेलों के खिलाड़ी कैसे अपनी प्रतिभा खेल मंत्रालय तक पहुंचाएंगे, यह प्रधानमंत्री के मन की बात से स्पष्ट नहीं हुआ और न ही यह किसी को समझ आया कि इस बात की क्या गारंटी है कि चयन निष्पक्ष होगा.

समय के साथ तकनीक को अपनाना अच्छी बात है बशर्ते उस से सभी लोग जुड़े हों और ईमानदारी का आश्वासन देती हो. खेल दिवस पर मन की इस बात पर गंभीरता से किसी ने ध्यान दिया हो, ऐसा लगता नहीं क्योंकि इस तरह की बात और आश्वासन लोग सुनते आए हैं.

खेल प्रतिभाएं सुविधाओं और प्रोत्साहन के अभाव में दम तोड़ रही हैं. यह बात सब को मालूम है. यह पोर्टल सिर्फ शहरी अभिजात्य वर्ग के लिए उपयोगी होगा जो इंडोर गेम्स खेलते हैं. इस वर्ग के लिए खेल एक शौक और कैरियर भर है.

बैडमिंटन, शतरंज, टैनिस वगैरा के खिलाड़ी इस पोर्टल का लाभ ले सकते हैं पर कुश्ती, कबड्डी और दूसरे ऐथलैटिक्स खेलों के मेहनती खिलाड़ी जो मूलतया गांवकसबों से निकलते हैं, वे कैसे इस तक पहुंचेंगे, यह बात जब तक साफ नहीं होगी तब तक ऐसे पोर्टल के कोई माने नहीं.

बड़ा सवाल : क्या भारत में फुटबौल के लिए रैफरी हैं ही नहीं

6 अक्तूबर से भारतीय सरजमीं पर पहली बार अंडर 17 फुटबौल विश्वकप शुरू हो रहा है. मेजबान होने के नाते हमारे खिलाड़ियों को अपना हुनर दिखाने का अच्छा मौका है. खिलाड़ियों के लिए और फुटबौल प्रेमियों के लिए भी यह खुशी का मौका है पर गम यह है कि संचालन के लिए जिन 63 रैफरियों, जिस में 7 महिलाएं भी हैं, को चुना गया है उन में एक भी भारतीय नहीं है.

फीफा को भारतीय रैफरियों पर भरोसा नहीं है. फीफा को टीम इंडिया पर भी भरोसा नहीं है. फीफा को मालूम है कि फुटबौल में टीम इंडिया कमजोर है. फीफा रैंकिंग में भी भारत कहीं नहीं है. बावजूद इस के, टीम इंडिया को मेजबानी करने का मौका मिला है. वहीं, कम से कम 1-2 भारतीय रैफरियों को मौका तो मिलना चाहिए था. जब मौका ही नहीं मिलेगा तो फिर भारतीय फुटबौल का विकास कैसे होगा. क्या भारतीय फुटबौल टीम को विदेशी रैफरियों से ही सभी दांवपेच सीखने होंगे.

भारतीय रैफरी समिति के पदाधिकारी कहते रहते हैं कि रैफरियों का स्तर सुधारने के लिए काम हो रहा है पर यदि काम हो रहा है तो फिर फीफा भारतीय रैफरियों पर भरोसा क्यों नहीं कर रहा?

अखिल भारतीय फुटबौल फैडरेशन की रैफरी समिति के मुखिया गौतम कार का कहना है कि वे रैफरियों के स्तर को उठाने के लिए काम कर रहे हैं. इस में समय लगता है. गौतम कार को उम्मीद है कि अगले विश्वकप में भारतीय रैफरियों को संचालन का मौका मिलेगा.

गौतम कार साहब को उम्मीदों पर बहुत भरोसा है जबकि गौतम कार साहब को यह भी मालूम है कि राज्यों के खेलसंघ मात्र डेढ़ सौ रुपए में मैच खिलवाना चाहते हैं. यानी एक रैफरी अगर मैच खिलवाता है तो उस के एवज में उसे 150 रुपए मिलेंगे. ऐसे में भला कौन रैफरी मैच खिलवाने के लिए राजी होगा? यहां खिलाडि़यों को बुनियादी सुविधाएं नहीं दी जाती हैं तो भला रैफरी को कौन पूछता है.

ऐसा नहीं है कि भारत में रैफरियों की कमी है. मैल्विन डिसूजा, के शंकरन जैसे कई रैफरियों ने विश्वभर में नाम कमाए हैं. के पैनल में जगह बनाने में सफल रहे थे.

इस समय भी फीफा के पैनल में 6 रैफरी हैं और 7 सहायक रैफरी हैं पर फीफा को उन की काबिलीयत पर शक है. शायद, तभी उन्हें मौका नहीं मिल रहा.

फीफा को लगता है कि भारतीय रैफरी बड़े मैच खिलाने में सक्षम नहीं हैं. पर ऐसा नहीं है. भारतीय रैफरियों के पास भी तजरबा है, काबिलीयत है, समझ है. वे भी बड़े मैच खिलाने में सक्षम हैं. पर उन्हें मौका तो मिले.

तमिल राजनीति पर संकट, किस करवट बैठेगा सत्ता का ऊंट

तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक का संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा. पहले उस में 2 गुट थे. उन के विलय के बाद दिनाकरन का तीसरा गुट उभरा और अब उस ने बगावत कर दी.  सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के 2 धड़े 6 महीने अलग रहने के बाद पिछले दिनों एक हो गए. इस के बाद अब बहुत जल्द केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए सरकार में अन्नाद्रमुक का प्रवेश होने वाला है.

अन्नाद्रमुक के दोनों गुटों के बीच हुए समझौते के तहत पलानीसामी राज्य के मुख्यमंत्री बने रहेंगे. पार्टी में बगावत का झंडा बुलंद करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री, जो जे जयललिता के समय कई बार मुख्यमंत्री रहे थे, ओ पन्नीरसेल्वम को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है. इस के अलावा जयललिता के बाद पार्टी की महासचिव बनी वी के शशिकला को पार्टी के महासचिव पद से हटाने का फैसला भी लिया गया है.

बगावत का झंडा

पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद उन के विश्वासपात्र समझे जाने वाले पन्नीरसेल्वम को तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनाया गया था. लेकिन, पार्टी महासचिव शशिकला से मतभेदों के चलते उन्हें पद से त्यागपत्र देना पड़ा.

शशिकला खुद मुख्यमंत्री बनना चाहती थीं. लेकिन, भ्रष्टाचार के एक मामले में उन के जेल जाने के चलते पलानीसामी नए मुख्यमंत्री बने. इस के बाद पन्नीरसेल्वम ने शशिकला के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया.

पिछले दिनों चेन्नई में जो हुआ उस की भूमिका कई महीने से दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी द्वारा लिखी जा रही थी. शशिकला को भारतीय जनता पार्टी से बेहद नाराजगी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार उन तक पहुंचने की कोशिश की. केंद्र से भी जितने मंत्री गए, हरेक को शशिकला ने जयललिता से मिलने से रोक दिया. यहां तक कि राज्यपाल तक को जयललिता से भेंट करने का वक्त नहीं दिया गया.

केंद्र के ही निर्देश पर राज्यपाल ने शशिकला के लाख चाहने के बाद भी उन्हें मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं दिलाई. शशिकला को जब सजा हुई तो उन्होंने अपने भतीजे दिनाकरन को पार्टी का उपमहासचिव बना दिया. तमिलनाडु की राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकार बताते हैं कि उस वक्त मुख्यमंत्री तो पलानीसामी थे लेकिन पार्टी और सरकार दोनों दिनाकरन चलाते थे और किसी के सवाल उठाने पर कहते थे कि जेल से चिनम्मा का हुक्म आया है.

चेन्नई से यह खबर दिल्ली पहुंची. इस के बाद दिनाकरन जाल में फं सते चले गए. उन्हें आर्थिक मामलों में फंसा डाला गया. यहां तक कि उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी.

समर्थकों की लामबंदी

अब जेल में बंद शशिकला को महासचिव पद से हटाने के लिए जल्द कदम उठाए जाएंगे. हालांकि, शशिकला के समर्थक और कार्यकर्ता पार्टी के साथ हैं. उन के भतीजे टीटीवी दिनाकरन का भविष्य भी अनिश्चित है.

इस बीच, जेल में कैद अन्नाद्रमुक नेता वी के शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरन के वफादार 19 विधायकों ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानीसामी के खिलाफ  बगावत कर दी. उन्होंने पलानीसामी सरकार को अल्पमत में लाते हुए राज्यपाल से कहा है कि उन्हें अब मुख्यमंत्री पलानीसामी पर विश्वास नहीं. वे अब अपना नया मुख्यमंत्री चुनेंगे. राज्यपाल प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष अमितशाह के आदेश का इंतजार करेंगे. दिनाकरन धड़े ने दावा किया था कि उन के पास 25 अन्नाद्रमुक विधायकों का समर्थन है.

विधानसभा अध्यक्ष को छोड़ कर अन्नाद्रमुक के पास कुल 134 विधायक हैं, जो अब दिनाकरन धड़े के समर्थन के बगैर घट कर केवल 115 रह गए हैं. रामदास ने यह भी दावा किया कि 3 अन्य दलों के विधायकों, जिन्होंने अन्नाद्रमुक के समर्थन में चुनाव लड़ा था, में से 2 ने दिनाकरन धड़े का साथ देने का फैसला किया है. इस लिहाज से अब सरकार के पास केवल 112 विधायक बचे हैं जो कि बहुमत से कम हैं.

राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में अन्नाद्रमुक के पास कुल 134 विधायक हैं. विपक्षी दल द्रमुक के पास 89 सीटें और उन के सहयोगी कांग्रेस की 8 और आईयूएमएल की 1 सीट हैं.

दिनाकरन के समर्थक विधायक थंगा तमिलसेल्वन ने कहा, ‘‘हम अपने समर्थक विधायकों की मदद से नया मुख्यमंत्री लाने की कोशिश शुरू करने जा रहे हैं.’’

कलह का फायदा

अन्नाद्रमुक में मची अंदरूनी कलह का फायदा मुख्य विपक्षी दल द्रमुक उठाने की फिराक में है. अन्नाद्रमुक के 2 धड़ों का मिलन भाजपा के लिए भले अच्छा हो लेकिन तमिल सिनेमा के मेगास्टार रजनीकांत के लिए अच्छी खबर नहीं है. महीनों से उन के सियासत में आने की अटकलें चल रही थीं. पहले

भाजपा रजनीकांत पर ही डोरे डाल रही थी लेकिन जब रजनीकांत ने साफ  संकेत नहीं दिए तो भाजपा ने उन पर भरोसा करना बंद कर अपना रास्ता निकाल लिया.

कमजोर दलील

ऐसा लग रहा है कि जानबूझ कर बहुमत परीक्षण के फैसले को टाला जा रहा है ताकि भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से सत्तारूढ़ दल अपने बागी विधायकों को मना सके. उस से पहले बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग भी अन्ना डीएमके ने की है और स्पीकर ने उन को नोटिस भेजा है.

हो सकता है कि बागी विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया जाए और उस के बाद बहुमत परीक्षण हो. भले विधायक इस फैसले को अदालत में चुनौती दें लेकिन उन की अयोग्यता की अवधि में ही बहुमत परीक्षण करा दिया जाए. तभी इस का फैसला टल रहा है.

चेन्नई में दिनाकरन के समर्थक विधायकों से निबटने के बाद अन्नाद्रमुक के दोनों गुटों को मोदी सरकार में शामिल किया जाएगा. ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं पर ऐसा हुआ नहीं. फिलहाल मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में 9 नए मंत्री बनाए गए हैं. सहयोगी दलों से किसी को भी मंत्री नहीं बनाया गया है. हो सकता है बाद में जब मंत्रिमंडल का विस्तार किया जाएगा उस में अन्नाद्रमुक को 1 कैबिनेट मंत्री और 2 राज्यमंत्रियों के पद मिल जाएं. पार्टी के नेता जल्दी ही शशिकला और उन के भतीजे दिनाकरन को पार्टी से निकालने का ऐलान कर सकते हैं.

द्रमुक की द्रविड़ नीति का होगा क्या?

जयललिता के निधन, शशिकला के जेल जाने के बाद से विपक्षी द्रमुक की वापसी की संभावनाएं बढ़ी हैं. हालांकि द्रमुक के नेता करुणानिधि काफी बुजुर्ग हो गए हैं और बीमार रहते है. मगर द्रमुक इसलिए आश्वस्त है कि अब अन्नाद्रमुक के पास उसे वोट दिलाने वाली नेता जयललिता नहीं रहीं. और कोई भी नेता अन्नाद्रमुक में ऐसा नहीं है जिस के नाम पर वोट मिलें.

अन्नाद्रमुक के वर्तमान नेताओं में से कोई भी द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष और करुणानिधि के वारिस एम के स्टालिन के टक्कर का नहीं है. अन्नाद्रमुक के सरकार बनाने से जिस तरह लगातार राजनीतिक संकट बना हुआ है उस से भी अन्नाद्रमुक की छवि खराब हुई है. इस से भी द्रमुक का ग्राफ बड़ा है.

पिछले चुनाव में एम के स्टालिन अपनी लोकप्रियता साबित कर चुके हैं. अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच सीटों का अंतर भले ही हो मगर वोट प्रतिशत में सिर्फ 1 प्रतिशत का फर्क है. चुनाव 4 साल बाद होना है, इसलिए इस

अंतर को पाटना मुश्किल नहीं होगा. अन्नाद्रमुक के हलके कामकाज को देखते हुए द्रमुक को अपना भविष्य सुनहरा लग रहा है.

रजनीकांत बनाम कमल हासन

फिल्मस्टार से राजनेता बने, मुख्यमंत्री बने एम जी रामचंद्रन और जयललिता की मृत्यु और लोकप्रिय अभिनेता विजयकांत की राजनीतिक पार्टी के नाकाम होने के बाद लगा था कि अब तमिलनाडु में सुपरस्टारों की राजनीति खत्म हो गई मगर लगता है राज्य की राजनीति में सुपरस्टारों का एक और दौर शुरू होगा. इन दिनों 2 सुपरस्टार राज्य की फिल्मस्टार उन्मुख राजनीति पर नजर गड़ाए हैं.

रजनीकांत राजनीति में आने का अपना इरादा खुल कर जाहिर कर चुके हैं. अब कमल हासन भी राजनीति में कूदना चाहते हैं. दोनों तमिल सिनेमा के दिग्गज और लोकप्रिय अभिनेता हैं. उन का मुकाबला राजनीति को दिलचस्प और सनसनीखेज बनाएगा.

कमल हासन और रजनीकांत  तमिल सिनेमा में एकदूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे हैं. यह संभव है कि रजनीकांत की काट के लिए कमल हासन को भी इस क्षेत्र में उतारा जा रहा हो.

कोई दोराय नहीं है कि कमल हसन और रजनीकांत दोनों ही साउथ सिनेमा के मील के 2 पत्थर हैं. दक्षिण भारतीय फिल्मों के लिए कमल हासन को दिए गए सम्मानों की सूची बहुत लंबी है. इन्हें 4 राष्ट्रीय पुरस्कार, 10 दक्षिण भारतीय फिल्मफेयर अवार्ड, 2 फिल्मफेयर अवार्ड, 3 नंदी अवार्ड, 9 तमिलनाडु स्टेट नैशनल अवार्ड प्रदान किए गए हैं. इन सब के अलावा कमल हासन को भारतीय सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान भी दिया गया है.

कमल हासन और रजनीकांत दोनों राजनीति में उतरना चाहते हैं, इसलिए दोनों में अभी से  बयानों के जरिए नोकझोंक शुरू हो गई है. फिल्म अभिनेता कमल हासन ने एक और फिल्म अभिनेता रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश को ले कर यह कह कर विवादास्पद बयान दिया कि जहां कहीं कैमरा नजर आ जाए, वहीं रजनीकांत आप को नजर आ जाएंगे.

उल्लेखनीय है कि रजनीकांत पिछले कुछ समय से अपने प्रशंसकों के साथ लगातार बैठकें कर रहे हैं. माना जा रहा है कि अब उन्होंने सक्रिय राजनीति में उतरने का मन बना लिया है. इस मामले को ले कर जहां कई लोगों ने इस की प्रशंसा की है वहीं कुछ लोगों ने इस पर नाराजगी जताई है.

रजनीकांत संकेत दे चुके हैं कि वे सही समय पर राजनीति में प्रवेश कर सकते हैं. पिछले दिनों तमिलनाडु सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों की बौछार किए जाने से राज्य के मंत्रियों का निशाना बने प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता कमल हासन ने तमिल कविता के जरिए अपने प्रशंसकों को चौंकाने वाले संकेत दिए.

बहरहाल, कमल हासन की इच्छा से अन्नाद्रमुक सरकार के मंत्रियों और बीजेपी के नेताओं की त्योरियों पर बल पड़ गए हैं. राज्य के मंत्रियों की आलोचना का पात्र बने कमल हासन के समर्थन में अन्नाद्रमुक (अम्मा) के उपमहासचिव टीटीवी दिनाकरन ने कहा कि कमल हासन को अपने दृष्टिकोण को व्यक्त करने की स्वतंत्रता है और मंत्रियों को सम्मानित ढंग से प्रतिक्रिया देनी चाहिए.

कुछ दिनों पहले कमल हासन ने कहा था कि तमिलनाडु में सिस्टम फेल हो चुका है और सभी विभागों में भ्रष्टाचार फैल चुका है. कमल हासन की इस टिप्पणी को ले कर राज्य सरकार के मंत्रियों ने उन की काफी आलोचना की. दूसरी तरफ विपक्षी दल द्रमुक, कांग्रेस, एमडीएमके, वीसीके, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और नाम तमिझर ने कमल हासन का पक्ष लिया और कहा कि कमल हासन की आवाज जनता की आवाज है.

कमल हासन के बारे में स्पष्ट नहीं है कि वे किसी पार्टी में शामिल होंगे या अपनी अलग पार्टी बनाएंगे. रजनीकांत में भारतीय जनता पार्टी ने काफी दिलचस्पी दिखाई है. दरअसल, भाजपा तमिलनाडु में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है, और इस लक्ष्य को पाने के लिए वह रजनीकांत की लोकप्रियता पर सवारी करना चाहेगी. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा भी कि रजनीकांत भाजपा में शरीक हो सकते हैं.

रजनीकांत राजनीति में कूदने को ले कर अब तक हिचकते रहे हैं, लेकिन केंद्र व राज्य भाजपा के अनेक नेता उन्हें इस के लिए मनाने की कोशिशें कर रहे हैं.

तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास ऐसे नेताओं की कहानियों से भरा पड़ा है जो फिल्मों के जरिए सत्ताशिखर पर पहुंचे, जैसे करुणानिधि, एम जी रामचंद्रन और जयललिता मगर विजयकांत जैसे कई अभिनेताओं को धूल भी चाटनी पड़ी.

रजनीकांत इस जोखिम को बखूबी समझते हैं, और शायद इसीलिए वे फैसला करने से पहले उसे अच्छी तरह से तोल लेना चाहते हैं. उन की दुविधा यह है कि भाजपा इस राज्य में नहीं के बराबर है. करुणानिधि, जयललिता और रामचंद्रन इसलिए सफल हो पाए क्योंकि उन के पीछे द्रविड़ आंदोलन का इतिहास था.

अभी भी राज्य की राजनीति की मुख्यधारा को द्रविड़ पार्टियों ने घेरा हुआ है. द्रविड़ पार्टियां ही सरकार में और विपक्ष में हैं. रजनीकांत को पहले इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा जो आसान काम नहीं है. यह काम फिल्मी बाजीगरी से नहीं हो सकता.

रजनीकांत जिस भाजपा में शामिल हो कर राजनीति करना चाहते हैं उस  भाजपा के लिए तमिलनाडु की राजनीति कांटों की डगर है. तमिलनाडु उस के लिए एक पहेली ही बना हुआ है. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू पूरे देश पर छाया हुआ है, तब भी यह द्रविड़ राज्य एक चुनौती बना हुआ है. इसीलिए भाजपा वहां एक ऐसा चेहरा तलाश रही है. और रजनीकांत इस के लिए सब से उपयुक्त लगते हैं. रजनीकांत एक लोकप्रिय कलाकार हैं. उन की लोकप्रियता का जादू न सिर्फ तमिलनाडु में कायम है, बल्कि पूरे तमिलभाषी समाज में उन की जबरदस्त अपील है.

रजनीकांत उन हस्तियों में से एक थे जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के कदम का स्वागत किया था. साल 2014 के अपने चुनाव अभियान के दौरान नरेंद्र मोदी उन से मिलने उन के घर भी गए थे.

1990 के दशक में रजनीकांत की लोकप्रियता जब अपने चरम पर थी तब जयललिता व करुणानिधि जैसे विरोधी उन के मुकाबले में थे. अब जब जयललिता की मौत हो चुकी है और वयोवृद्ध करुणानिधि अपनी खराब सेहत से जूझ रहे हैं, तब राज्य में नेतृत्व का खालीपन सा दिख रहा है. बहुत सारे लोग इसे राज्य की राजनीति में एक अहम मोड़ के तौर पर देख रहे हैं. तमिल राजनीति की फिल्म का मुकाबला तगड़ा होगा और दिलचस्प भी.

आपके कीबोर्ड पर मौजूद F1 से F12 Keys का होता है ये इस्तेमाल

कम्प्यूटर की-बोर्ड पर सबसे ऊपर मौजूद F1 से F12 कीज (Keys) को फंक्शन कीज कहते हैं. एनसे अक्षर टाइप नहीं होते. लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि कंप्यूटर कीबोर्ड में दी गई F Keys(एफ कीज) किस काम आती हैं? F1 से लेकर F12 तक इन बटनों के पीछे क्या फंक्शन्स छिपे हैं. अगर आप इनके बारे में नहीं जानते तो यह जानने में हम आपकी मदद करेंगे.

F1

अगर कम्प्यूटर को आन करते ही इस ‘की’ (Key) को प्रेस करेंगे तो कम्प्यूटर का सेटअप खुल जाएगा. इसमें कम्प्यूटर की सेटिंग्स को देखा और चेंज किया जा सकता है.

जब भी आप किसी प्रोग्राम में काम कर रहे होते हैं और उसमें आपको किसी भी तरह की मदद चाहिए तो यह Key प्रेस कर सकते हैं. इससे आपकी स्क्रीन पर हेल्प विंडो ओपन हो जाएगी.

F2

अगर आप किसी फाइल या फोल्डर का नाम बदलना चाहते हैं तो उसे सेलेक्ट कर F2  को दबाएं. ऐसा करने से आप फाइल या फोल्डर का नाम बदल पाएंगे.

माइक्रोसाफ्ट वर्ड में ctrl+F2 दबाने पर प्रिंट व्यू पेज खुलेगा, जो दिखाता है कि डाक्यूमेंट प्रिंट होने पर कैसा दिखेगा.

F3

किसी भी एप में सर्च ओपन करने के लिए इस Key का प्रयोग किया जा सकता है.

माइक्रोसाफ्ट वर्ड में सिफ्ट +F3 प्रेस करने पर अंग्रेजी के टेक्स्ट को लोअर और अपर केस में बदला जा सकता है.

माइक्रोसाफ्ट डास या कमांड प्राम्प्ट विंडो में F3 प्रेस करने पर पहले टाइप की गई कमांड दोबारा टाइप हो जाती है.

F4

विंडोज एक्सप्लोरर में इसे प्रेस करने पर एड्रेस बार खुल जाती है. इंटरनेट एक्सप्लोरर में भी एड्रेस बार खुलती है.

माइक्रोसाफ्ट वर्ड में F4 प्रेस करने पर वही काम रिपीट हो जाएगा जो आपने अभी किया था. जैसे अगर कोई शब्द टाइप किया है तो दोबारा टाइप हो जाएगा. टेबल बनाई है तो एक और टेबल बन जाएगी और अगर कोई टेक्स्ट बोल्ड किया है तो फिर से बोल्ड हो जाएगा.

अगर आप किसी विंडो को बंद करना चाहते हैं तो Alt+F4 दबाएं.

F5

यह रिफ्रेश ‘की’  के तौर पर यूज की जाती है. विंडोज में अगर कोई फोल्डर कापी होने के बाद दिखाई नहीं दे रहा, तो इसे दबाइए. इंटरनेट ब्राउजर में वेब पेज को रिफ्रेश और रिलोड करने के लिए यह प्रयोग होती है.

पावरप्वाइंट में F5 प्रेस करने पर स्लाइड शो चालू हो जाता है.

फोटोशाप में इसे दबाने पर कई तरह के ब्रश सामने आ जाते हैं. इनमें आप अपनी पसंद का ब्रश चुन सकते हैं.

F6

इसे प्रेस करने पर विंडोज में खुले फोल्डरों की सामग्री दिखने लगती है.

अगर माइक्रोसाफ्ट वर्ड में कई डाक्युमेंट खुले हैं, तो उन्हें एक-एक करके देखने के लिए कंट्रोल+सिफ्ट+F6 का प्रयोग कर सकते हैं.

F7

माइक्रोसाफ्ट वर्ड में कुछ टाइप करने के बाद अगर F7 प्रेस करेंगे तो उसकी स्पेलिंग चेक होना शुरू हो जाएगी.

इंटरनेट एक्सप्लोरर में इसे प्रेस करने पर वेब पेज का टेक्स्ट सलेक्ट किया जा सकेगा.

F8

कंप्यूटर को आन करते समय अगर आप बूट मेन्यू में जाना चाहते हैं तो F8 दबाएं.

माइक्रोसाफ्ट वर्ड में टेक्स्ट को सिलेक्ट करने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है.

F9

माइक्रोसाफ्ट आउटलुक में ईमेल सेंड व रिसीव करने के लिए इसका प्रयोग करते हैं.

क्वार्क एक्सप्रेस में इसे प्रेस करने से मेजरमेंट टूलबार खुल जाता है.

कुछ लैपटाप में इसे प्रेस कर स्क्रीन की ब्राइटनेस को कंट्रोल किया जा सकता है.

F10

अगर आप किसी ऐप में मेन्यू बार ओपन करना चाहते हैं तो यह Key काम आती है.

Shift+F10 साथ माउस के राइट क्लिक का काम करता है.

Control+F10 का यूज माइक्रोसाफ्ट वर्ड में विंडो को मिनिमाइज और मैक्समाइज करने के लिए किया जाता है.

F11

इंटरनेट एक्सप्लोरर, क्रोम जैसे ब्राउजर में फुल स्क्रीन करने के लिए इसका प्रयोग कर सकते हैं.

F12

अगर आप एमएस वर्ड पर काम कर रहे हैं तो सेव एज डायलाग बाक्स ओपन करने के लिए यह Key दबाएं.

Shift+F12 से माइक्रोसाफ्ट वर्ड में डाक्यूमेंट सेव हो जाता है.सरि

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