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जल्दी करें, घर खरीदने पर मिल रहा है लाखों रुपये का डि‍स्काउंट

आप अगर घर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो यह आपके लिए सही समय हो सकता है, क्योंकि त्‍योहार के इस सीजन में कई बिल्‍डर्स जीएसटी के लागू होने का फायदा घर खरीदने वालों तक पहुंचा रहे हैं. ऐसे में कई रियल इस्‍टेट ग्रुप आपको खास आफर्स दे रहे हैं.

जिसमें आपको लोन प्रोसेसिंग फीस से लेकर मेंटेनेंस तक पर काफी ज्‍यादा छूट दी जा रही है. ग्राहकों को लुभाने के लिए बिल्‍डर्स माड्युलर किचन, फ्री पार्किंग समेत स्‍मार्टफोन जैसे कई उपहार भी दे रहे हैं.

9 लाख रुपये तक की छूट

दिल्‍ली स्‍थित पैसिफिक ग्रुप 9 लाख रुपये तक की छूट दे रही है. अगर आप देहरादून स्‍थ‍ित पैसिफिक गोल्‍फ इस्‍टेट में बुकिंग करवाते हैं, तो आपको गोल्‍फ मेंबरशिप नहीं देनी होगी और आप अगर आप आगरा स्‍थित ग्रुप के अंसल टाउन में बुकिंग करते हैं, तो अगले 10 सालों के लिए आपको होम लोन पर सिर्फ 3.99 फीसदी ब्‍याज ही भरना होगा.

माड्युलर किचन-फ्री वार्डरोब का गिफ्ट

दिल्‍ली एनसीआर की रियलिटी कंपनी साया ग्रुप घर खरीदने वालों को माड्युलर किचन, हर बेडरूम में वार्डरोब, वीडियो डुअर फोन जैसे कई उपहार दे रही है इसी के साथ ही यह आपको हर यूनिट की खरीदारी पर 5 हजार रुपये से 50 हजार रुपये का सरप्राइज गिफ्ट भी देगी.

इसके अलावा अपने दूसरे प्रोजेक्‍ट के लिए ग्रुप बुकिंग के दौरान सिर्फ 10 फीसदी पेमेंट करने के बाद आपको 5 किश्‍तों में पेमेंट करने का विकल्‍प भी दे रही है.

गुलशन होम्‍ज भी अपने ग्राहकों को माड्युलर किचन का उपहार दे रही है. इसके अलावा वह 32 इंच एलईडी स्‍मार्ट टीवी भी हर बुकिेंग पर दे रही है. ग्रुप की तरफ से यह आफर नोएडा में स्‍थित प्रोजेक्‍ट्स के लिए है.

बुकिंग पर सोने के सिक्के का उपहार

टीडीआई इंफ्राटेक ग्रुप मोहाली, पानीपत स्‍थि‍त अपने प्रोजेक्‍ट्स में बुकिंग के लिए ग्राहको को सोने का सिक्‍के दे रही है. इसके अलावा विदेश यात्रा का आफर भी है. वहीं, सशस्‍त्र बलों से जुड़े लोगों के लिए ग्रुप 50 हजार रुपये का विशेष डि‍स्‍काउंट दे रही है. यह आफर राज्‍य और केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए भी है.

आसान होगा भुगतान

सिक्‍का ग्रुप नोएडा स्‍थित अपने प्रोजेक्‍ट्स पर ग्राहकों को फर्निस्‍ड होम का तोहफा देकर जीएसटी का लाभ पहुंचा रही है. इसके अलावा नो लोन प्‍लान के तहत आप बुकिेंग के समय 10 फीसदी पेमेंट कर सकते हैं और बाकी 90 फीसदी आपको पसेसन पर देनी है. पैरामाउंट ग्रुप ग्रेटर नोएडा स्‍थित अपने विला रोयल प्रोजेक्‍ट में हर बुकिंग पर सोने का सिक्‍का भी दे रही है.

जन्मदिन विशेष : आखिर क्यों देव साहब को नहीं पहनने दिया गया था काला कोट

हिंदी सिनेमा में अपने खास अंदाज के लिए जाने जाने वाले अभिनेता धर्मदेव आनंद उर्फ देव आनंद साहब का आज जन्मदिन है. वो एक ऐसे अभिनेता रहे हैं जो वक्त के हिसाब से नहीं बल्कि अपने हिसाब से सिनेमा के समय को ढाल लेते थे. कहते हैं जब वे मुंबई आए थे, उनकी जेब में सिर्फ 30 रुपये थे, इसके बाद उन्होंने अपनी मेहनत और काम के प्रति निष्ठा से इन 30 रुपये को लाखों में बदल दिया. आइए देव साहब के जन्मदिन पर उनके जीवन से जुड़े ऐसे ही कुछ पहलुओं से रू-ब-रू होते हैं.

भारतीय सिनेमा जगत में लगभग छह दशक से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले सदाबहार अभिनेता देवानंद को अदाकार बनने के ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा था. पंजाब के गुरदासपुर में 26 सितंबर, 1923 को एक मिडिल क्लास फैमिली में जन्मे धर्मदेव पिशोरीमल आनंद उर्फ देवानंद ने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर के मशहूर गवर्नमेंट कालेज में पूरी की. देवानंद इसके आगे भी पढ़ना चाहते थे लेकिन उनके पिता ने साफ शब्दों में कह दिया कि उनके पास उन्हें पढ़ाने के लिये पैसे नहीं है और अगर वह आगे पढ़ना चाहते है तो नौकरी कर लें.

30 रुपए लेकर आए थे मुंबई

देवानंद ने निश्चय किया कि यदि नौकरी ही करनी है तो क्यों ना फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाई जाये. साल 1943 में अपने सपनों को साकार करने के लिये जब वह मुम्बई पहुंचे तब उनके पास मात्र 30 रूपये थे और रहने के लिये कोई ठिकाना नहीं था. देवानंद ने यहां पहुंचकर रेलवे स्टेशन के समीप ही एक सस्ते से होटल में कमरा किराये पर लिया. उस कमरे में उनके साथ तीन अन्य लोग भी रहते थे जो देवानंद की तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्ष कर रहे थे.

जब काफी दिन यूं ही गुजर गये तो देवानंद ने सोचा कि यदि उन्हें मुंबई में रहना है तो जीवन-यापन के लिये नौकरी करनी पड़ेगी चाहे वह कैसी भी नौकरी क्यों न हो. काफी मशक्कत के बाद उन्हें मिलिट्री सेन्सर औफिस में लिपिक की नौकरी मिल गयी. यहां उन्हें सैनिको की चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगो को पढ़कर सुनाना होता था.

मिलिट्री सेन्सर औफिस में देवानंद को 165 रूपये मासिक वेतन मिलना था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिये भेज देते थे. लगभग एक साल तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद वह अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गये जो उस समय भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा से जुड़े हुये थे. उन्होंने देवानंद को भी अपने साथ इप्टा मे शामिल कर लिया. इस बीच देवानंद ने नाटकों में छोटे मोटे रोल किये.

हम एक हैं फिल्म से किया था डेब्यू

बता दें कि 26 सितंबर 1923 में जन्में देवानंद ने बड़े पर्दे पर 6 दशक तक काम किया है. उन्होंने बौलीवुड में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत 1946 में फिल्म ‘हम एक हैं’ से की थी, लेकिन इस फिल्म में उन्हें काम करने का मौका बाबू राओ ने दिया था.

दरअसल, बाबू राओ प्रभात फिल्म स्टूडियो के डिस्ट्रीब्यूटर थे और जब वह देवानंद से पहली बार गलती से टकराए थे तो वह उन्हें देखते ही रह गए थे. बाबू राओ को देवानंद की स्माइल, आंखे और उनका आत्मविश्वास सब भा गया और उन्होंने अपनी फिल्म में देवानंद को काम करने का मौका दिया.

सुरैया से किया मोहब्बत का इजहार

फिल्म ‘विद्या’ की शूटिंग के दौरान ही उन्हें सुरैया से प्यार हुआ. फिल्म के गाने ‘किनारे किनारे चले जाएंगे’ में दोनों नाव पर सवार रहते हैं और नाव डूब जाती है. हीरो की तरह देव आनंद सुरैया को बचाते हैं और उसी वक्त उन्होंने सुरैया से शादी का फैसला कर लिया. देव साहब ने उन्हें फिल्म के सेट पर तीन हजार रुपये की एक अंगूठी देकर प्रपोज किया, लेकिन सुरैया की नानी इस शादी के खिलाफ थीं. नतीजा ये हुआ कि सुरैया सारी उम्र कुंवारी रहीं.

कल्पना कार्तिक से की शादी

गुरु दत्त की पहली फिल्म ‘बाजी’ में देव आनंद और कल्पना कार्तिक की जोड़ी को लोगों ने खूब पसंद किया. इसके बाद दोनों ने कई फिल्में साथ की, जैसे ‘आंधियां, टैक्सी ड्राइवर नौ दो ग्यारह.’ इसी दौरान दोनों के बीच प्यार हुआ और फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ के बाद दोनों ने शादी कर ली.

जीनत अमान से भी हुआ प्यार

देव साहब को उम्र के उस पड़ाव पर तीसरी बार मुहब्बत हुई जिस समय उनके बेटे की उम्र 12 साल थी. फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में साथ काम करते करते देव साहब को जीनत अमान की खूबसूरती भा गई. फिल्म ने सारे रिकार्ड तोड़े, लेकिन जीनत ने देव साहब के दिल में जगह बना ली. लेकिन इस बार भी उनकी मुहब्बत परवान नहीं चढ़ पायी.

जिस दिन उन्होंने अपना हाल ए दिल जीनत से इजहार किया उन्हें ना का जवाब मिल गया. लेकिन उन्होंने अपने इस रिश्ते को दोस्ती के रिश्ते में तब्दील कर लिया जिसका नतीजा यह हुआ कि इस जोड़ी ने कई कामयाब और यादगार फिल्में बौलीवुड को दीं. जिन्हें लोग आज भी बड़े चाव से देखते है.

काला कोट पहनने से रोका गया

देव साहब की हिट फिल्म ‘काला पानी’ में उन्हें काले रंग का कोट पहनने से रोका गया. काले रंग के कोट में वे इतने हैंडसम लगते थे कि कहीं लड़कियां उन्हें देखकर छत से कूद न जाए.

डायरेक्शन-प्रोड्क्शन में भी रहे सफल

बतौर निर्माता देवानंद ने कई फिल्में बनायी. इन फिल्मों मे वर्ष 1950 मे प्रदर्शित फिल्म अफसर के अलावा हमसफर, टैक्सी ड्राइवर,  हाउस न. 44, फंटूश, कालापानी, काला बाजार, हम दोनो, तेरे मेरे सपने, गाइड और ज्वैल थीफ आदि कई फिल्में शामिल हैं.

साल 1970 मे फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देवानंद ने निदेर्शन के क्षेत्र मे भी कदम रख दिया. हालांकि, यह फिल्म बौक्स आफिस पर बुरी तरह से नकार दी गयी. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. इसके बाद साल 1971 मे फिल्म हरे रामा हरे कष्णा का भी डायरेक्शन किया जिसकी कामयाबी के बाद उन्होंने हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला और अव्वल नंबर समेत कुछ फिल्में बनाईं.

पद्म भूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित

भारतीय सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान देने वाले देवानंद वर्ष 2001 में प्रतिष्ठित पद्म भूषण सम्मान से विभूषित किए गए और 2002 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया. देव साहब का लंदन में दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ था.

फेसबुक ने फर्जी खबरों को लेकर शुरू की यह खास मुहिम

सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर हर दिन कोई ना कोई अफवाहों और गलत खबरों को फैलाया जाता है, जिसे लेकर फेसबुक ने हाल ही में एक खास मुहीम की शुरूआत की है. इसके अन्तर्गत कंपनी ने फर्जी खबरों के खिलाफ प्रमुख अखबारों में पूरे पन्ने का एक विज्ञापन छपवाया है, जिसे उनके अभियान और उसको लेकर लोगों को जागरूक बनाने की पहल के रूप में देखा जा रहा है.

फेसबुक इससे पहले भी फर्जी समाचार को लेकर कदम उठा चुकी है. इसके अन्तर्गत फेसबुक ने गलत खबरों को लेकर अपने यूजर्स को होने वाली परेशानियों को देखते हुए फैसला किया था कि लगातार फर्जी खबरों को प्रकाशित करने वाले लोग फेसबुक पर विज्ञापन नहीं कर सकेंगे. इसका मतलब कि अब अगर किसी पेज से लगातार फर्जी और झूठी खबरें शेयर की जाएगी तो ऐसे पेज को फेसबुक पर विज्ञापन देने का इजाजत नहीं होगी. उसने यह कदम नए कंटेंट को प्रकाशित करने के साथ उनकी क्वालिटी को बनाये रखने के लिए उठाया था, जिससे झूठी खबरों के द्वारा पैसे कमाने वाले लोगों पर लगाम लगायी जा सके साथ ही फर्जी खबरों के शेयर होने पर भी रोक लगाई जा सके.

बताते चलें कि फेसबुक दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट है. जिसका इस्तेमाल मुख्य तौर पर लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता है. लोगों की सुविधा के लिए समय समय पर इसमें नए नए फीचर्स जोड़े गए है. जिसमे पोस्ट शेयर करने के साथ आप चेटिंग, वाइस कालिंग और वीडियो कालिंग भी कर सकते है. ऐसे में इसे और गुणवत्ता पूर्ण बनाये जाने के लिए फेसबुक ने यह नया कदम उठाया है, जिससे फर्जी खबरों के शेयर पर रोक लग सके.

बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने में बेहद काम आएंगे ये तरीके

राहुल ने घेरे में से गेंद उठाने की बहुत कोशिश की पर नाकाम रहा और फिर हताशा में रोने लगा. उसे रोते देख मां भाग कर आईं और उसे उठा कर गले से लगा लिया. फिर कहा कि लगातार कोशिश करते रहो. जरूर गेंद उठाने में कामयाब होगे. उन्होंने राहुल को उन दिनों की भी याद दिलाई जब वह अपना नाम तक नहीं लिख पाता था. यह उस के ही प्रयासों का नतीजा था कि वह अपना नाम लिखने में कामयाब रहा.

इस तरह का प्रोत्साहन और सकारात्मकता एक बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए अहम है. बच्चे की अपने और दुनिया के प्रति धारणा कम उम्र में ही विकसित होती है. एक बच्चा कैसे सोचता है, वह क्या देखता है, वह क्या सुनता है, वह अपने आसपास के हालात पर कैसे प्रतिक्रिया देता है आदि बातें उस की पूरी छवि का निर्माण करती हैं. यदि एक बच्चे में चिंता, तनाव, असंतोष और भय की भावना आने लगती है, तो वह चिड़चिड़ा रहने लगता है. उस का आत्मविश्वास भी कमजोर हो जाता है.

कई शोध अध्ययनों से पता चला है कि बड़ी संख्या में बच्चे कम उम्र में ही तनाव और चिंता का शिकार हो जाते हैं. बचपन के नकारात्मक अनुभवों के चलते उन की सेहत पर जीवन भर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है.

बच्चे के तनाव और चिंता ग्रस्त होने की कई वजहें हो सकती हैं, जिन में किसी मुश्किल कार्य को करने के दौरान विपरीत स्थितियों का सामना करना भी शामिल है. बच्चा जब अपने स्कूल और ट्यूशन का काम समझने या पूरा करने में नाकाम रहता है तब भी उस में तनाव पैदा होने लगता है. वह प्रदर्शन करने व बेहतर बनने में खुद को असफल पाता है, क्योंकि उस की तुलना में उस के साथियों के लिए ऐसा करना आसान होता है. इस से वह आत्मविश्वास खोने लगता है.

बच्चे के कमजोर आत्मविश्वास को उस की शर्म या चुप्पी से समझा जा सकता है. ऐसे में मातापिता को ऐसे संकेतों को पहचानने की जरूरत होती है. ऐसी रणनीतियां अपनानी होती हैं, जिन से बच्चे को अपनी समस्याओं का सामना करने में मदद मिले और उस का आत्मविश्वास बढ़े. मातापिता की भूमिका यह सुनिश्चित करने के लिहाज से भी अहम है कि घर का माहौल दोस्ताना रहे ताकि बच्चा सुरक्षित महसूस करे और उसे बिना डांट के डर के अपनी बात को खुल कर रखने का मौका मिले.

संवाद कायम करें: बच्चे में अपने परिवार के सदस्यों के साथ जुड़ाव और संवाद के साथ बचपन से ही सामाजिक कौशल विकसित होने लगते हैं. इसलिए बच्चे के साथ प्रभावी संवाद स्थापित करें. सहयोगी, सहज और स्नेहशील बनें. इस से संबंध विकसित करने में मदद मिलेगी और बच्चे में खुल कर बोलने का आत्मविश्वास बढ़ेगा.

अपनी पसंद चुनने का मौका दें: अपनी पसंद चुनने, विकल्प और हालात पेश करने में बच्चे की मदद करने में अभिभावकों की भूमिका खासी अहम है, लेकिन अपनी पसंद उसे खुद चुनने दें. यह आत्मविश्वास विकसित करने का सब से अच्छा तरीका है, क्योंकि इस से फैसले लेने और ऐसी पसंद के बारे में समझने में वह ज्यादा सक्षम होता है, जिस से उसे खुशी मिल सकती है.

तारीफ और पुरस्कार: अपने बच्चे को बताएं कि आप उसे प्यार करते हैं. मातापिता को बच्चे को बताना चाहिए कि हर कोई अपनेआप में खास है और हरेक की अपनी विशेष क्षमता और प्रतिभा होती है. बच्चे के लिए सकारात्मक यादों का निर्माण करें और छोटेछोटे संकेतों के माध्यम से उस की सफलता की तारीफ करें. प्रोत्साहित करने के लिए स्टिकर, कुकी या छोटी वस्तुओं के माध्यम से उन्हें पुरस्कृत करें. उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने की स्थिति में डांटने से परहेज करें. बच्चे को अगली बार अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रोत्साहित करें.

तुलना कभी न करें: अपने बच्चे की क्षमताओं की तुलना दूसरे बच्चों के साथ कभी नहीं करनी चाहिए. सभी बच्चों के मन के भाव अलगअलग होते हैं. बच्चे की उस के साथियों से तुलना से उस में हीनभावना पैदा होती है. तुलना से बच्चे में प्रतिद्वंद्विता की भावना पैदा होती है, जिस के चलते उस में ईर्ष्या हो सकती है और यह बच्चे की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

काम करने के प्रति दृढ़ होना: बच्चा जब किसी दिए गए काम को पूरा करता है तो उसे अपने भीतर आत्मविश्वास महसूस होता है. उसे प्रोत्साहन मिलता है. उदाहरण के लिए जब विवेक ने अपने जूतों के फीते बांधने की कोशिश तो वह लगातार नाकाम हो रहा था. वह निराश होने लगा. ऐसे में उस के मातापिता ने उसे कोशिश जारी रखने और हार न मानने का सुझाव दिया कि वह जरूर कामयाब होगा और वह सच में कामयाब रहा. बच्चे को इस तरह के उदाहरण देने की जरूरत होती है, जिन से उसे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिले.

शिक्षकों से बात करें: मातापिता के लिए अपने बच्चे का अपने साथियों और शिक्षकों के प्रति व्यवहार को समझना काफी अहम है, जिस से उन्हें बच्चे के सामाजिक जीवन को समझने में मदद मिले. यह जानना भी जरूरी है कि उन का बच्चा बाहरी वातावरण में कैसा व्यवहार कर रहा है, जैसे यदि वह घर पर अश्वस्त है, तो क्या वह ऐसा स्कूल में भी करने में सक्षम है?

इस से मातापिता को यह समझने में मदद मिलती है कि क्या बच्चे को कुछ सीखने में समस्या आ रही है या उस पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. बच्चे के शिक्षकों और दोस्तों से बात करें ताकि उस की दिलचस्पी जानने मेंमदद मिले.

काल्पनिक खेल का इस्तेमाल करें: काल्पनिक खेलों के माध्यम से बच्चे आसपास के लोगों और वस्तुओं से काल्पनिक हालात तैयार करते हैं और उस में अपनी भूमिका निभाते हैं. ऐसे खेलों से उन्हें बड़ा सोचने में मदद मिलती है और वे जैसा बनना चाहते हैं, जैसी दुनिया चाहते हैं, उस के बारे में पता चलता है. ऐसे खेलों में भाग लेने से मातापिता को बच्चे की कल्पनाओं में झांकने और उन्हें आत्मविश्वासपूर्वक प्रेरित करने का मौका मिलता है.

सब से अहम बात यह है कि बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए संबंधों में भरोसा होना चाहिए. अपने बच्चे से प्यार करें, एक मजबूत संबंध का निर्माण करें और उसे विकसित करें. बच्चे को मालूम होना चाहिए कि जब भी उस का आत्मविश्वास कम होगा, आप उस की मदद करने के लिए मौजूद हैं.

बच्चे के साथ भरोसेमंद और सहज संबंध विकसित करें ताकि जब भी उसे कोई समस्या हो तो वह आप के पास आए. इस से बच्चा आप की बात को सुनेगा और आप की सलाह का सम्मान करेगा. प्रमाण दे कर उसे अपनी राय विकसित करने में मदद करें. उस का आत्मविश्वास और समझ का दायरा बढ़ेगा. इस से उसे अपने साथियों के सामने अपनी बात रखने, उन की बातों को सुनने और दूसरों की राय को सम्मान देने में मदद मिलेगी. उस के लिए विभिन्न लोगों के बीच एक पहचान और आवाज हासिल करने के लिहाज से यह अहम है.

– ऋचा शुक्ला, सीसेम वर्कशौप इंडिया

जब एक बच्चे की खुशी के लिये धोनी ने उतारी अपनी टीशर्ट

2002 चैंपियंस ट्रौफी में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद कप्तान सौरव गांगुली ने लौर्ड्स की बालकनी में अपनी शर्ट उतारकर जश्न मनाया था इसके ठीक पांच साल बाद पहले टी20 विश्व कप के फाइनल मुकाबले में मिली ऐतिहासिक जीत पर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने जश्न मनाने के दौरान एक युवा प्रशंसक की मांग पर उन्होंने अपनी टी शर्ट उसे गिफ्ट कर दी.

जहां पूरी टीम जीत का जश्न मना रही थी वहीं माही उस समय एक बच्चे के साथ अपनी खुशी साझा कर रहे थे. इस दौरान धोनी ने न सिर्फ उस लड़के को टी शर्ट गिफ्ट की बल्कि उसे जीत के इस जश्न में भी शामिल किया. धोनी के स्ट्रिपिंग एक्ट ने गांगुली की याद दिला दी थी लेकिन माही का अंदाज काफी कूल दिखाई दिया था जबकि दादा काफी आक्रामक थे.

गौरतलब है कि भारत ने आज ही के दिन 10 साल पहले पहला टी20 वर्ल्ड कप जीत इतिहास रचा था और यहीं से भारतीय टी20 क्रिकेट के एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत हुई क्योंकि मीडिया रिपोर्ट्स की मानें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पहले टी20 क्रिकेट को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं था, लेकिन इस टूर्नामेंट के बाद उसने आईपीएल जैसी बड़ी लीग तक शुरू कर दी और बीसीसीआई ने सब किया फाइनल मैच में भारत की पाकिस्तान पर शानदार और ऐतिहासिक जीत के बाद.

साउथ अफ्रीका के वौन्डर्स मैदान पर आज ही के दिन टीम इंडिया ने पाकिस्तान को हरा कर वर्ल्ड टी20 का खिताब अपने नाम किया था. साल 2007, 24 सितंबर को जोहन्सबर्ग में भारत ने पाकिस्तान को रोमांचक मुकाबले में पांच रन से हराकर पहला वर्ल्ड टी20 मैच जीता था और इस ऐतिहासिक मैच में जीत के हीरो थे धाकड़ बल्लेबाज गौतम गंभीर जिन्होंने महज 54 गेंदों पर तूफानी पारी खेलते हुए शानदार 75 रन बनाकर टीम को 157/5 का मजबूत स्कोर देने में अहम भूमिका निभाई.

 

वहीं रोहित शर्मा ने महज 16 गेंदों पर ताबड़तोड़ 30 रन बनाए थे. इसके अलावा बाएं हाथ के तेज गेंदबाज रुद्र प्रताप सिंह ने मोहम्मद हफीज और कामरान अकमल को आउट कर भारत को शुरुआती कामयाबी दिलाई, जबकि इरफान पठान ने 16 रन देकर तीन विकेट झटके.

शुरुआत में मैच एक तरफा नजर आ रहा था और भारत का पलड़ा भी भारी दिखाई दे रहा था लेकिन हरभजन सिंह के 17वें ओवर में तीन छक्के लगाकर मिसबाह ने पाकिस्तानी की उम्मीद जगा दी और मैच में आखिरी ओवर तक मिसबाह टिके रहे. मैच के आखरी पलों का वो रोमांचक और शानदार नजारा हर क्रिकेट फैंस को याद हो जिसमें शर्मा की गेंद पर मिसबाह ने फाइन लेग की ओर पैडल किया. इस शौट के बाद गेंद हवा में गई और श्रीसंत ने फाइन लेग पर उसे कैच कर लिया. श्रीसंत के कैच लपकते ही टीम इंडिया सहित पूरा देश खुशी से झूम उठा था.

वायरलेस चार्जिंग कैसे करता है काम, यहां जानिए

वायरलेस चार्जिंग टेक्नोलोजी आईफोन और सैमसंग सीरीज के मौडलों के आने के बाद ज्यादा पौपुलर हो गई है. लेकिन इस नई टेक्नोलौजी के स्मार्टफोन्स में आने के बाद कई लोगों के मन में सवाल उठे होंगे की आखिर वायरलेस चार्जिंग है क्या और इसका इस्तेमाल कैसे होता है. आखिर ये चार्ज कैसे करता है जब ये किसी तार से जुड़ा नही है फिर भी ये कैसे चार्ज करता है.

अधिकतर वायरलेस चार्जर मैग्नेटिक इंडक्शन का इस्तेमाल करते हैं. इसके अंतर्गत यूजर्स को डिवाइस चार्ज करने के लिए किसी वायर की जरुरत नहीं होती. डिवाइस को चार्जर पर रखते ही चर्जिंग शुरू हो जाती है.

वायरलेस चार्जिंग काम कैसे करता है

वायरलेस चार्जिंग असल में वायरलेस नहीं होती. हालांकि, आपके स्मार्टफोन, स्मार्टवौच, वायरलेस हेडफोन्स या किसी भी अन्य डिवाइस को चार्ज होने के लिए वायर की जरुरत नहीं होगी. लेकिन वायरलेस चार्जर को काम करने के लिए वौल से प्लग करना पड़ेगा ताकि वो काम कर सके.

इसको बेहतर तरीके से समझने के लिए आपको यह समझना होगा की वायरलेस चार्जर किस तकनीक पर कार्य करता है. यह चार्जर मैग्नेटिक इंडक्शन पर कार्य करते हैं. इसका मतलब उर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान भेजने के लिए ये चुम्बकत्व या मैग्नेटिज्म का प्रयोग करते हैं.

उदाहरण के लिए

आप अपने स्मार्टफोन को वायरलेस चार्जर पर रखेंगे

दीवार से आ रहा करंट वायरलेस चार्जर में मौजूद वायर में आ कर मैग्नेटिक फील्ड पैदा करेगा.

यह मैग्नेटिक फील्ड वायरलेस चार्जर पर रखी डिवाइस में मौजूद कोइल में करंट पैदा करेगा.

यह मैग्नेटिक एनर्जी इलेक्ट्रिकल एनर्जी में बदल जाएगी, जिसे बैटरी चार्ज करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

डिवाइस में वायरलेस चार्जर को सपोर्ट करने के लिए सही हार्डवेयर का होना जरुरी है. जरुरी कोइल के बिना डिवाइस को वायरलेस चार्ज नहीं किया जा सकता.

एप्पल ने बनाया नया प्लान

आईफोन 5 के रिलीज के समय उसमे वायरलेस चार्जिंग सपोर्ट मौजूद नहीं था. उस समय प्रतिद्वंदी एंड्रौयड और विंडोज फोन में यह सुविधा उपलब्ध थी. तब एप्पल के अधिकारियों ने यह कहा था की -एक डिवाइस को चार्ज करने के लिए आपको दूसरी डिवाइस को दीवार से प्लग करना होगा. अधिकतर परिस्थितियों में यह कामगर नहीं होगा.

पांच साल बाद, एप्पल ने अपनी सोच में बदलाव किया और Qi वायरलेस चार्जिंग को अपने नए हैंडसेट आईफोन 8, 8 प्लस एयर आईफोन X में पेश किया.

Qi वायरलेस चार्जर में क्या है अलग

वैसे तो Qi चार्जर मैग्नेटिक इंडक्शन तक ही सीमित थे, लेकिन अब यह मैग्नेटिक रेजोनेन्स भी सपोर्ट करता है. यह भी ऊपर दिए गई विधि की ही तरह कार्य करता है. इसमें अंतर केवल इतना ही है की इसमें सरफेस से सीधे टच में रहने की जरुरत नहीं होती. यह 45mm की दूरी से भी कार्य कर सकता है. इसकी खासियत यह है की इसे आप टेबल या किसी और जगह रख कर भी आसानी से अपनी डिवाइस को चार्ज कर सकते हैं. इसी के साथ सिंगल चार्जिंग पैड पर मल्टीपल डिवाइस चार्ज की जा सकती हैं.

किस तरह करें इस्तेमाल

वायरलेस चार्जर के काम करने की तकनीक को छोड़ दिया जाए तो वायरलेस चार्जिंग का इस्तेमाल करना बेहद आसान है. अगर आपको अपना स्मार्टफोन वायरलेस चार्ज करना है तो आपको ऐसे स्मार्टफोन की जरुरत होगी जो वायरलेस चार्जिंग को सपोर्ट करता हो. इसी के साथ आप फोन में वायरलेस चार्जिंग एड करने के लिए आप सपोर्टिंग अडेप्टर्स भी खरीद सकते हैं.

किसमें करता है यह सपोर्ट

एप्पल आईफोन 8, आईफोन 8 प्लस और आईफोन X

सैमसंग गैलक्सी नोट 8 और सैमसंग गैलक्सी नोट 5

सैमसंग गैलक्सी S8, S8+, S8 Active, S7, S7 Edge, S7 Active

एलजी G6 (US and Canada versions only) और एलजी V30

मोटोरोला मोटो Z, मोटो Z Play, मोटो Z2 Force, मोटो Z2 Play (केवल वायरलेस चार्जिंग Mod के साथ)

शौचालय और दलित : इस ओर भी ध्यान दे सरकार

देशभर में शौचालयों का जम कर निर्माण हो रहा है और खुले में शौच को बंद कराने में सरकार जुटी है, पर सरकार शौचालयों के लिए जरूरी सीवर लाइनों और चालू पानी के पाइपों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही. यह साफ है कि नीति निर्धारक सोच रहे हैं कि शौचालयों को साफ करने के लिए दलित तो हैं ही.

तमिलनाडु में रामेश्वरम में एक स्कूल में शौचालय तो बनवा लिया गया, पर उसे साफ करने के लिए कोई नहीं मिला, तो दलित छात्रों को ही सैप्टिक टैंक में उतरने को मजबूर किया गया. वहां पैदा हुई विषैली मिथेन गैस से वे छात्र बीमार हो गए. यह सारे देश में हो रहा है. हर रोज नाले साफ करते हुए दलितों की मौत की खबरें छपती हैं.

असल में शौचालयों ने पिछड़ों व दलितों के बीच एक नई खाई पैदा कर दी है. भाजपा सरकार ने घरों में शौचालय बनाने पर मजबूर तो कर दिया, पर उन को साफ करने के लिए उसी घर के लोग तैयार नहीं हैं. जहां सैप्टिक टैंक बने हैं, वहां तो कठिनाई है ही, पर जहां केवल ड्राई लैट्रिन हैं, वहां मुसीबत और ज्यादा है. खुले में शौच का निबटान प्रकृति करती थी, पर घर, दफ्तर या स्कूल में बना शौचालय यदि सीवर से नहीं जुड़ा, तो उसे साफ कौन करे?

सारे देश में दलितों को इस काम में लगाया जा रहा है और इस से दलितपिछड़ा भेदभाव हर रोज बढ़ रहा है. दलित अब वह कोई काम करने को खुद ब खुद तैयार नहीं, जो पहले ऊंची सवर्ण जातियां नहीं करती थीं. पिछड़े 50 साल पहले ऐसे काम दलितों से कराते नहीं थे, क्योंकि उन की हैसियत ही नहीं थी. अब ऊंचे सवर्ण तो पाइप से आए पानी और गंद ले जाने वाले सीवर का सुख भोग रहे हैं, पर पिछड़ों को सवर्णों की तरह दलितों का मैला साफ करने की सेवा चाहिए. क्योंकि खेती, नौकरियों और छोटे धंधों से उन की आमदनी बढ़ गई है.

आज का दलित यह करने को तैयार नहीं है तो उसे अब मजबूर किया जा रहा है. हिंदू समाज में यह दोफाड़ तो हमेशा ही था, पर अब शौचालयों के कारण और अधिक सुर्ख होने लगा है. और जब तक लाखों गांवों के करोड़ों घरों तक अच्छेबड़े सीवर और बहते पानी के पाइपों का इंतजाम नहीं हो जाता, यह होता रहेगा. गांवगांव में दलितपिछड़ा झगड़ा बढ़ता रहेगा.

जैसे आज का पिछड़ा झाड़ू उठाने तक को तैयार नहीं है, वहीं आज का दलित मरे जानवर और ऊंचों के शौच को उठाने को तैयार नहीं है. राजनीति में जो नई करवट आई है, वह शौचालयों जैसी छोटी चीज से आ रही है और फिलहाल न ऊंचोंपिछड़ों के नेता इस का दूरगामी परिणाम देख पा रहे हैं, न दलितों के नेता इस की गहराई समझ पा रहे हैं.

शौच प्रकृति की देन है, पर सफाई करना तो हरेक को खुद सीखना होगा. पर यह पाठ पढ़ाए कौन?

मेट्रो में सफर करना हुआ महंगा, फिर से बढ़ने जा रहा है किराया

मेट्रो का सफर करने वाले यात्रियों को जेब और ढीली करनी पड़ेगी. पहले फेज के बाद दूसरे फेज में किराया बढ़ाने की तैयारी चल रही है. अभी तक मेट्रो में सफर करने का न्यूनतम 10 रुपए जबकि अधिकतम 50 रुपए देने पड़ते हैं. अब इसपर विचार किया जा रहा है.

इससे पहले दिल्ली मेट्रो रेल कौरपोरेशन (डीएमआरसी) मई में किराया बढ़ा चुका है. मई में बढ़े किराए के बाद डीएमआरसी के आंकड़ों से पता चलता है कि मेट्रो से सफर करने वाले यात्रियों की संख्या में कमी आई है. अब डीएमआरसी दूसरे फेज में फिर से किराया बढ़ाने जा रहा है.

क्या होगा किराया

बढ़े हुए किराए की नई दरें 1 अक्टूबर से लागू हो जाएंगी. अब मेट्रो से सफर करने पर 2 किमी तक के लिए 10 रुपये, 2 से 5 तक के लिए 15 की जगह 20 रुपयें, 5 से 12 तक के लिए 20 की जगह 30 रुपये, 12 से 21 तक के लिए 30 की जगह 40 रुपये 21 से 32 तक के लिए 40 की जगह 50 रुपये और 32 किमी से अधिक के सफर के लिए 50 की जगह 60 रुपये देने होंगे.

एक सर्वे में सामने आया है कि बढ़े हुए किराए के कारण ज्यादातर यात्री मेट्रो की बजाए बस से जाना पसंद कर रहे हैं. जिन लोगों की सेलरी 10 से 30 हजार रुपए प्रतिमाह वे बस से जाना पसंद कर रहे हैं. जबकि 50 हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाले लोग कम ही मेट्रो में सफर करते हैं.

दरअसल, बीते दस मई को मेट्रो का किराया बढ़ाया गया था. इसके बाद मेट्रो में रोजाना करीब 1.50 लाख यात्री कम हो गये थे. मेट्रो मुसाफिरों ने डीटीसी का रूख किया. इससे मई में डीटीसी में अप्रैल महीने की तुलना में करीब एक लाख यात्री बढ़ गये. यह इजाफा डीटीसी की सर्विस खराब होने के बावजूद हुआ. बसों की संख्या के पर्याप्त न होने व टाइम टेबल खराब होने से यात्री डीटीसी के साथ रूके नहीं. अगले ही माह जून 2017 में फिर डीटीसी यात्रियों की संख्या घटकर अप्रैल जितनी हो ही गयी.

यही वजह है कि बीते चार महीनों में पास बनवाने वालों की संख्या में 25 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.

खुशखबरी : एसबीआई ने घटाई न्यूनतम राशि की सीमा, जानें अब कितना पैसा रखना जरूरी

स्टेट बैंक औफ इंडिया (एसबीआई) ने अपने ग्राहकों को राहत देते हुए बचत खाता के लिए न्यूनतम बैलेंस घटा दिया है. अभी तक न्यूनतम बैलेंस 5,000 रुपए था, जिसे अब 3,000 रुपये कर दिया गया है. देश के सबसे बड़े बैंक ने इसके साथ ही इस सीमा का अनुपालन नहीं करने पर जुर्माने में भी कटौती की है. संशोधित सीमा अनिवार्यता और शुल्क अक्टूबर से लागू किया जाएगा.

अप्रैल महीने में लागू किया था शुल्क

सार्वजनिक क्षेत्र के इस सबसे बड़े बैंक ने पेंशनभोगियों, सरकार की सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों तथा नाबालिग खाताधारकों को बचत खाते में न्यूनतम बकाये की सीमा से छूट दी है. इस साल अप्रैल में एसबीआई ने 5 साल बाद नए सिरे से न्यूनतम मासिक शेष और शुल्क को फिर से लागू किया था.

महानगरों के लिए न्यूनतम राशि सीमा 5,000 रुपये रखी गई थी, वहीं शहरी और अर्द्धशहरी शाखाओं के लिए यह सीमा क्रमश: 3,000 और 2,000 रुपये तथा ग्रामीण शाखाओं के लिए 1,000 रुपये रखी गई थी. बैंक ने कहा कि हमने महानगरों ओर शहरी केंद्रों को एक श्रेणी में रखने का फैसला किया है. इन क्षेत्रों में अब 3,000 रुपये की सीमा लागू होगी.

जुर्माना राशि में भी कटौती

पिछले सप्ताह बैंक के प्रबंध निदेशक राष्ट्रीय बैंकिंग समूह रजनीश कुमार ने कहा था कि बैंक न्यूनतम शेष की समीक्षा कर रहा है. खाते में न्यूनतम राशि न रखने पर जुर्माने को भी घटा दिया गया है. बैंक ने जुर्माना राशि को 20 से 50 फीसदी तक कम किया है. बैंक ने कहा कि अर्द्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह शुल्क या जुर्माना राशि 20 से 40 रुपये के दायरे में होगी. वहीं शहरी और महानगर के केंद्रों के लिए यह 30 से 50 रुपये होगी.

अभी तक महानगरों के लिए बैंक न्यूनतम राशि 75 प्रतिशत से नीचे आने पर 100 रुपये और उस पर जीएसटी वसूला जा रहा था. अगर न्यूनतम राशि 50 फीसदी या उससे कम पर आता है तो इसके लिए जीएसटी के साथ 50 रुपये का जुर्माना वसूला जा रहा था. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में न्यूनतम शेष न रखने पर 20 से 50 रुपये (साथ में जीएसटी) का जुर्माना लगाया जा रहा था.

पेंशनर्स, अव्यसकों और सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों को पूरी छूट

एसबीआई ने पेंशनर्स, सरकार की सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों, अव्यस्कों के खातों को मिनिमम एवरेज बैलेंस की जरूरत से बाहर रखने का भी फैसला किया है. अभी तक प्रधानमंत्री जन धन योजना और बेसिक सेविंग बैंक डिपाजिट एकाउंट्स (BSBD) को इससे छूट मिली हुई थी.

एसबीआई के पास 42 करोड़ बचत खाता ग्राहक हैं. इनमें से लगभग 13 करोड़ खाता प्रधानमंत्री जन धन योजना और BSBD के तहत हैं और इन्हें पहले ही मिनिमम एवरेज बैलेंस की जरूरत से छूट मिली है. अब बहुत सी अन्य कैटेगरी में भी यह छूट मिलने से करीब पांच करोड़ और खाता होल्डर्स को फायदा होगा.

एसबीआई ने यह भी स्पष्ट किया है कि कस्टमर्स के पास अपने रेगुलर सेविंग्स बैंक खाता को BSBD खाता में तब्दील करने का विकल्प मौजूद है और इसके लिए कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा.

नवजात की देखभाल से संबंधित मिथक जानना आपके लिए जरूरी है

किसी भी महिला के जीवन में मातृत्व दुनिया का सब से अद्भुत अनुभव होता है. जब कोई महिला पहली बार मां बनती है, तो अपनी इस अनमोल खुशी का ध्यान रखने के बारे में उसे अपने करीबियों से ढेरों सलाहें मिलना स्वाभाविक है. मगर एक समझदार मां होने के नाते यह जरूरी है कि वह विशेषज्ञ की राय के अनुसार ही चले, क्योंकि एक छोटा सा निर्णय भी बच्चे के बढ़ने की उम्र पर असर डाल सकता है.

मांओं में नवजातों की देखभाल को ले कर निम्न मिथक पाए जाते हैं:

नवजात की दिनचर्या तय करना अच्छा होता है: हर मां का अपने बच्चे के जीवन में थोड़ा अनुशासन लाने की कोशिश करना स्वाभाविक है. हालांकि बच्चे को दिनचर्या के लिए दबाव डालना आसान नहीं है. बड़ों से सलाह लेने और किताबें पढ़ने के बावजूद आमतौर पर शिशु के सोने का पैटर्न मांओं के लिए सब से अधिक परेशानी का सबब बनता है.

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि कुछकुछ घंटों के अंतराल पर सोने के कारण हर 3-4 घंटे में स्तनपान कराना होता है. बच्चे के बड़े होने के साथसाथ इस में धीरेधीरे बदलाव आने लगता है.

दांत आने पर बुखार होता है: हर मां को यह गलतफहमी होती है कि जब भी नवजात को बुखार आता है, तो वह दांत आने की वजह से हो रहा होता है, लेकिन सामान्यतौर पर दांत 6 से 24 महीने के बीच निकलते हैं. यह एक ऐसा समय होता है जब बच्चों में भी संक्रमण होने की आशंका होती है. इसलिए मांओं के लिए यही बेहतर है कि अनुमान लगाने के बजाय कुछ दिन शिशु पर निगरानी रखें और यदि लक्षण बने रहते हैं, तो फिर डाक्टर को दिखाएं.

बहुत अधिक स्तनपान कराना अच्छा नहीं होता: एक नवजात शिशु की मां को हर डाक्टर की ओर से सब से पहली सलाह यही होती है कि वह अपने नवजात को स्तनपान कराए. स्तनपान करवाना प्राकृतिक रूप से सब से बुनियादी चीज होती है, जो नवजातों की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. मां का दूध सिर्फ शिशु का पेट भरने के लिए भोजन ही नहीं है, बल्कि इस में बढ़ने और विकास करने के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्त्व भी मौजूद होते हैं. स्तनपान कराने के कई फायदे हैं, जिन में से कुछ इस प्रकार हैं- यह बच्चों में बारबार बीमार पड़ने को कम करता है, इस से मांओं को गर्भावस्था के बाद रिकवर, वजन कम करने, ब्रैस्ट कैंसर और ओवेरियन कैंसर के खतरे को कम करने में मदद मिलती है.

मां का दूध बच्चों की प्यास नहीं बुझाता: नवजातों को ले कर सब से बड़े मिथकों में से एक यह है कि खासकर गरमी के मौसम में यह जरूरी है कि बच्चों को हाइड्रेट बनाए रखने के लिए सही मात्रा में पानी दिया जाए. बहुत कम लोगों को पता है कि मां के दूध में 88% तक पानी होता है और बच्चों के स्वास्थ्य के हित में यह जरूरी है कि जब तक बच्चा 6 महीने का न हो जाए, उसे सिर्फ मां का दूध ही दिया जाना चाहिए.

आमतौर पर नवजातों को शहद पिलाने की आदत होती है, यह माना जाता है कि मां के दूध की तुलना में यह पोषक तत्त्वों का बेहतर स्रोत होता है. यह पूरी तरह से आधारहीन है. ऐसा साबित हुआ है कि शिशुओं के लिए यह अधिक नुकसानदायक होता है, क्योंकि इस से कई गंभीर संक्रमण हो सकते हैं.

शिशु के 6 माह का होने तक उसे सिर्फ मां का दूध ही पिलाया जाना चाहिए. 6 महीनों के बाद उसे कुछ सेहतमंद पूरक आहार देने की शुरुआत की जा सकती है जैसेकि पकी रागी, चावल, उबली सब्जियां, अंडे, अनाज आदि.

– डा. लीना एन. श्रीधर, अपोलो क्रैडल

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