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..तो बढ़ जाएंगे पेट्रोल डीजल के दाम

और्गेनाइजेशन औफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (ओपेक) ने एक मीटिंग में तेल उत्पादन में कटौती को 2018 के अंत तक जारी रखने का फैसला लिया. इस कदम का उद्देश्य लगातार गिर रही क्रूड औइल की कीमतों को रोकना है. इसका सीधा मतलब यह है कि क्रूड औइल की कीमतें आने वाले समय में लगातार बढ़ सकती हैं. भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर इसका असर निश्चित तौर पर देखने को मिल सकता है.

ओपेक के विएना स्थित हेडक्वार्टर में हुई मीटिंग में कई घंटों की चर्चा के बाद इस बात पर सहमति बनी. हालांकि इस बैठक में इस बात पर अभी तक सहमति नहीं बनी है कि लीबिया के औइल आउटपुट को कंट्रोल करने के लिए प्रोडक्शन कट की जरूरत है या नहीं.

आपको बता दें कि लीबिया अभी आंतरिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. 14 सदस्यीय ओपेक नौन-ओपेक मेंबर देशों के साथ संयुक्त रूप से प्रोडक्शन कट को लेकर बैठक करने जा रहा है. नौन ओपेक देशों का नेतृत्व रूस करेगा. रूस ने इसी साल ओपेक देशों के साथ मिलकर प्रॉडक्शन कट किया था. वह खराब दौर से गुजर रहे अंतरराष्ट्रीय क्रूड औइल मार्केट को घाटे से उबारने के लिए लगातार प्रोडक्शन कट की वकालत कर रहा है.

अंतरराष्ट्रीय मार्केट में क्रूड औइल की कीमत प्रति बैरल 60 डौलर से ज्यादा पहुंच चुकी है. प्रोडक्शन कट करने की डील में अमेरिका शामिल नहीं है. रूस को यह डर सता रहा है कि कहीं प्रोडक्शन कट के कारण तेल की बढ़ी डिमांड को पूरा करने के लिए अमेरिका अपने यहां उत्पादन बढ़ा न दे.

इंटरनैशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने की यह कोशिश कितनी सफल होती है यह ओपेक मेंबर कंट्रीज और नौन ओपेक मेंबर कंट्रीज के रवैये पर पूरी तरह से निर्भर करेगा. अगर दोनों पार्टियां इस मामले में आम सहमति बनाने में कामयाब होती हैं तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ना तय है.

क्या आपके भी स्मार्टफोन की इंटनरल मैमोरी फुल हो गई है?

कई बार ऐसा होता है कि जब हम अपने फोन में कुछ इंस्टाल करने की कोशिश कर रहे होते हैं तो उस समय वह इंस्टाल नहीं हो पाता क्योंकि आपके फोन में उतना स्पेस नहीं होता. जब मोबाइल की इंटरनल मैमोरी फुल हो और हमें कुछ बहुत जरूरी इंस्टाल करना हो, तो उस वक्त समझ नहीं आता कि क्या करना चाहिए. आप अपने फोन की मैमोरी खाली करने की सोचते हैं, लेकिन मोबाइल में कुछ ऐसे ऐप होते हैं जिन्हें रखना आपके लिए बहुत जरूरी होता है और उसकी वजह से हम अपने फोन की इंटरनल मैमोरी खाली नहीं कर पाते. तो आइए जानते हैं कि इस स्थिति में कैसे आप अपने फोन में स्पेस बना सकते हैं.

कैशे को करें क्लियर

अपने स्मार्टफोन में आपको स्पेस बनाने के लिए कैशे क्लियर करना होगा. यह एक सुरक्षित और आसान तरीका है, जिसकी मदद से आप फोन में जगह बना सकते हैं. इसके लिए सेटिंग्स में जाकर ऐप पर क्लिक करें. इसके बाद ऐप मे दिये गये विकल्प क्लियर कैशे पर क्लिक करें. ऐसा करने से आपके फोन का काफी स्पेस खाली हो जाएगा.

आनलाइन म्यूजिक सुने

मोबाइल में सबसे ज्यादा कोई चीज स्पेस लेती है, तो वो है म्यूजिक और वीडियो. इस समस्या से निपटने के लिए फोन में म्यूजिक और वीडियो डाउनलोड करने के बजाय आप उन्हें आनलाइन या आफलाइन सुन या देख सकते हैं. आज कल सावन, गाना और हंगामा जैसे कई एप्लिकेशन मौजूद हैं जो आपकी सुविधा के लिए आफलाइन म्यूजिक को स्टोर करती हैं. इसका इक फायदा यह भी है कि यह आफलाइन म्यूजिक फोन की मैमोरी में स्टोर नहीं होते और इससे आपके फोन की इंटरनल मैमोरी खाली रहती है.

गूगल ड्राइव का करें इस्तेमाल

गूगल ड्राइव अनलिमिटेड फोटो सेव करने में आपकी मदद करता है. फोन में स्पेस बनाने के लिए आप अपने एंड्रायड फोन से लिए गए सभी फोटो को गूगल ड्राइव में सेव कर सकते है और अपने फोन से उन फोटो को डिलीट कर स्पेस बना सकते हैं.

एप्लिकेशन अनइंस्टाल करें

ऐसे कई एप्लिकेशन हैं जो आपके फोन में तो होते हैं पर आप उनका इस्तेमाल नहीं करते. ऐसे में आप उन एप्लिकेशन को अनइंस्टाल या डिसेबल कर अपने फोन में स्पेस बना सकते हैं.

माइक्रोएसडी कार्ड का इस्तेमाल करें

अगर इन उपायो के बाद भी आपको आपकी आवश्यकतानुसार स्पेस नहीं मिल पा रहा है तो सबसे अच्छा तरीका है कि आप अपने फोन में माइक्रोएसडी कार्ड का इस्तेमाल करें. आप चाहे तो बड़ी ही आसानी से ऐप्स को माइक्रोएसडी कार्ड मूव कर सकते हैं. ऐप्स को मूव करने के लिए आपको सेटिंग्स में जाना होगा, फिर ऐप सेक्शन में ऐप पर क्लिक करना होगा. इसके बाद आपको ऐप मूव का विकल्प मिलेगा जिस पर जाकर आप किसी भी ऐप को आसानी से माइक्रोएसडी कार्ड मे मूव कर सकेंगे.

ये 5 टेक्नोलाजी बदल देगी दुनिया

दुनिया तेजी से बदल रही है. इंसान की जिंदगी में जितने बदलाव 100 वर्षों में नहीं हुए होंगे, उससे अधिक बदलाव पिछले 20 वर्षों में हो गए और जितने बदलाव पिछले 20 वर्षों में नहीं हुए उससे अधिक बदलाव आने वाले 7-8 वर्षों में हो जाएंगे. और इसका एक ही कारण है, दिन प्रतिदिन बढ़ता टेक्नोलाजी.

तो चलिए आज हम आपको कुछ नई तकनीकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो हमारी जिंदगी को पूरी तरह से बदल सकती है.

3डी प्रिंटिंग

3डी प्रिंटिंग वर्तमान समय की सबसे शानदार नए तकनीक में से एक है. 3डी प्रिंटर, हमारे डिजिटल डिजाइन को ठोस वास्तविक प्रोडक्ट में प्रिंट कर देता है.

3डी प्रिंटर आने वाले समय में दुनिया में अकल्पनीय बदलाव लाएगा क्योंकि इसका उपयोग हमारे जीवन के लगभग हर क्षेत्र में होगा. अभी तक 3डी प्रिंटिंग का उपयोग साईकिल से लेकर हवाई जहाज के पार्ट्स, खिलौने, मेटल की वस्तुएं, खाद्य उत्पाद, मानव अंग, मकान और कई तरह की वस्तुएं बनाने में हुआ है.

यह तकनीक निरंतर रूप से विकसित हो रही है और भविष्य में इसका उपयोग लगभग हर तरह की ठोस वस्तुएं बनाने में किया जाएगा.

फ्लाइंग कार

दुनिया की 19 कंपनियां अलग-अलग प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं. गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट की चीफ एग्जिक्यूटिव लैरी पेज किटी हौक को सपोर्ट कर रहे हैं. किटी हौक एक स्टार्टअप है, जो कि फ्लाइंग कार के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है. इसके अलावा, जौबी एविएशन, उबर और एयरबस भी ऐसा व्हीकल बना रहे हैं, जो कि भारी ट्रैफिक वाली सड़कों के ऊपर उड़ सकें. ऐसी कई तरह की कारों पर काम चल रहा है.

क्वांटम कंप्यूटर

क्वांटम कंप्यूटर आज के कंप्यूटर्स के मुकाबले बहुत पावरफुल होगा. क्वांटम कंप्यूटर चुटकियों में इनक्रिप्शन को क्रैक कर देगा. इनक्रिप्शन दुनिया के सबसे प्राइवेट डेटा को प्रोटेक्ट करता है. हालांकि, ऐसी मशीन्स को बनाना काफी कठिन है, लेकिन बड़ी तेजी से इन पर काम चल रहा है. Google, IBM और इंटेल जैसी कंपनियां क्वांटम कंप्यूटर बनाने में भारी भरकम निवेश कर रही है. वहीं, रिगेटी कंप्यूटिंग जैसे स्टार्टअप भी इस पर काम कर रहे हैं. रिसर्चर्स का मानना है कि क्वांटम मशीन ड्रग डिस्कवरी, फाइनेंशियल मार्केट्स को दुरुस्त करना, ट्रैफिक प्राब्लम्स को सौल्व करने में तेजी ला सकती है.

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस हेल्थकेयर

पिछले पांच सालों में जटिल एल्गोरिदम डीप न्यूरल नेटवर्क्स की मदद से कंप्यूटर्स ने देखना सीख लिया है. अस्पष्ट तौर पर इंसानी दिमाग में न्यूरौन्स की वेब के आधार पर, एक न्यूरल नेटवर्क डेटा के पैटर्न की पहचान करके टौस्क को सीख सकता है. साइकिल की लाखों फोटो का विश्लेषण करके कोई न्यूरल नेटवर्क किसी साइकिल को पहचानना सीख सकता है. इसका मतलब है कि फेसबुक और गूगल फोटोज जैसी सर्विसेज इंटरनेट पर अपलोड की गई इमेज में चेहरों और चीजों की आसानी से पहचान कर सकते हैं. इसी तकनीक का यूज करते हुए मशीनें मेडिकल स्कैन में बीमारियों के संकेतों को पहचान सकती हैं.

कान्वर्सेशनल कंप्यूटिंग

न्यूरल नेटवर्क्स केवल इमेज रिकग्निशन तक सीमित नहीं है. इसका दायरा कहीं व्यापक है. यही तकनीक अमेजन इको जैसे काफी टेबल गैजेट्स में तेजी से सुधार ला रही है, जो कि कमरे में कहीं से बोली गई कमांड को पहचान लेती है. यही तकनीक स्काइप जैसी औनलाइन सर्विसेज को भी इम्प्रूव कर रही है, जो कि एक लैंग्वेज में आने वाली फोन कौल्स को तुरंत दूसरी भाषा में ट्रांसलेट कर देता है. गूगल, फेसबुक और माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनियां इसे मोर्चे पर तेजी से कदम बढ़ा रही हैं, जिससे आगे चलकर फोन, कारों और किसी भी मशीन के साथ हमारे इंटरैक्शन में अहम बदलाव आ सकता है.

क्या हिना खान बनेंगी बिग बौस 11 की विजेता

जब से हिना खान बिग बौस 11 में आई हैं तब से ही उनकी बाते सुनकर लग रहा है कि वो खुद को इस शो का फाइनलिस्ट समझती हैं. इस शो में अब उनकी हरकतें भी इस बात का सबूत पेश कर रहे हैं कि हिना खुद को लेकर कुछ ज्यादा ही कान्फिडेंट हैं. बिग बौस में अक्सर ही उन्हें प्रियांक शर्मा और लव त्यागी के साथ यह बातें करते सुना गया है कि जब वे सब चले जाएंगे तो वह यहां पर बिल्कुल अकेली हो जाएंगी.

बिग बौस के एक एपिसोड में हिना खान लव त्यागी से कह रही थीं कि यहां पर मौजूद हर कोई शुरुआत से ही मुझे अकेला करने की कोशिश कर रहा है. आखिर घर में रहने वाले हर सदस्य मुझे ही क्यों निशाना बनाना चाहते हैं. क्या वे यही चाहते हैं कि हिना खान अकेली हो जाए. आखिर वे ऐसा क्यों चाहते हैं. हिना खान ने फिर लव से कहा कि यार मैं तो यह सोच कर एकदम से डर जाती हूं कि मेरा क्या होगा जब तुम सब चले जाओगे.

हिना की इस बात को लव त्यागी बड़े ही धैर्य के साथ सुन रहे थे और हमेशा की तरह अपना सिर हिलाते हुए उनकी हर बात में हां हां कर रहे थे.

इस घर में रहने वाला का कोई भी सदस्य इतने आत्मविश्वास के साथ बात नहीं करता जितने आत्मविश्वास से हिना खान करती हैं. हिना खान की इस तरह की बातों से तो ऐसी बू आती है कि वे खुद को फाइनलिस्ट मान बैठी हैं या फिर ऐसा भी हो सकता है कि बिग बौस में आने से पहले उन्होंने कोई ऐसा कान्ट्रेक्ट साइन किया हो जहां पर यह लिखा हो कि वे इस शो में फाइनल तक जाएंगी.

अगर वाकई में ऐसा कुछ है तो फिर तो संभवतः विजेता भी पहले से तय किया जा चुका होगा. वैसे भी बिग बौस के 11वें सीजन के शुरू होते ही ऐसी खबरें भी आने लगी थी कि हिना खान इस शो में फाइनल तक जाएंगी और वही इस शो की विजेता होंगी. वैसे आगे क्या होगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बिग बौस में जो हो रहा है, वह रियल में हो रहा है या सबकुछ स्क्रिप्ट पर चल रहा है और हिना खान के साथ ही घर का हर सदस्य केवल एक्टिंग कर रहा है.

ग्लैमर के लिए इंटिमेट सीन नहीं कर सकती : इशिता दत्ता

तेलगू फिल्म से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री इशिता दत्ता को बचपन से इच्छा थी कि उन्हें अभिनय का मौका मिले और ये प्रेरणा उन्हें अपनी अभिनेत्री बहन तनुश्री दत्ता से मिली, जो उन्हें हमेशा अपनी इच्छा से जुड़ी काम करने की सलाह दिया करती थीं. इतना ही नहीं आज भी किसी काम को करने से पहले इशिता अपनी बहन की राय अवश्य लेती हैं. झारखण्ड के जमशेदपुर की रहने वाली इशिता अभी अपने माता-पिता के साथ मुंबई में रहती हैं. हंसमुख और विनम्र स्वभाव की इशिता इन दिनों कौमेडी और ड्रामा फिल्म ‘फिरंगी’ को लेकर व्यस्त हैं, उनसे मिलकर बात करना रोचक था पेश है अंश.

इस फिल्म को करने की वजह क्या है?

इससे पहले मैंने हिंदी फिल्म ‘दृश्यम’ किया था, जिसमें मैंने अजय देवगन की बेटी की भूमिका निभाई थी. उस फिल्म में कास्टिंग डायरेक्टर विकी सदाना ने मेरी कास्टिंग करवाई थी. इसमें भी उन्होंने मुझे मेरी भूमिका के बारे में बताया और औडिशन के लिए तैयार होने को कहा. कई औडिशन के बाद अंत में मैं चुनी गयी. ये फिल्म साल 1920 की कहानी है, जिसमें मैंने पंजाबी लड़की की भूमिका निभाई है. ये लुक मुझसे काफी अलग है और मैं ऐसे अलग चरित्र करने में चुनौती महसूस करती हूं. इसके अलावा जब मैं टीम से मिली, तो पहली मुलाकात में इसकी कहानी मुझे रोचक लगी. साथ ही इतने दिनों तक ब्रेक के बाद मुझे एक अच्छी फिल्म करने का औफर मिल रहा था, जो बड़ी बात थी.

इससे पहले आपने टीवी में भी काम किया है, टीवी से फिल्मों में आना कैसे हुआ? दोनों में क्या अंतर महसूस करती हैं?

दरअसल मैंने पहले फिल्म फिर टीवी में काम किया है. ‘दृश्यम’ फिल्म के बाद मुझे हर कोई वैसी ही छोटी लड़की की भूमिका की औफर दे रहा था और मुझे वैसा नहीं करना था, इसलिए मैं मना करती रही. उसी दौरान मुझे टीवी धारावाहिक ‘एक घर बनाऊंगा’ का औफर मिला, मुझे वह पसंद आई और मैंने कर लिया. मुझे काम करते रहना पसंद है, बैठकर समय का दुरुपयोग नहीं करना चाहती थी और ये सही था मुझे टीवी के जरिये लोगों के घर तक पहुंचने का मौका भी मिला. आजकल फिल्म से टीवी और टीवी से फिल्मों में जाना आम बात है. बड़े-बड़े कलाकार भी टीवी पर आ रहे हैं. इसके अलावा आजकल टीवी की शूटिंग फिल्मों के जैसे ही हो रही है.

दोनों के माध्यम में कोई अंतर नहीं है. टीवी में समय की कमी की वजह से ‘शिड्यूल हेक्टिक’ होता है, जबकि फिल्म में काम आराम से होता है.

क्या अभिनय एक इत्तफाक थी, या बचपन से इच्छा रही है?

मेरे लिए अभिनय जौब नहीं, बल्कि एक इच्छा थी, जिसे बहन ने बल दिया और मैं इस क्षेत्र में चली आई. मैंने मास मीडिया में पढ़ाई पूरी करने के बाद कई जगहों पर अपनी पोर्टफोलियो भेजी और मुझे पहले तेलगू फिल्म में काम करने का मौका मिला, यहीं से मेरे अंदर प्रेरणा जगी और अब मैं इसी क्षेत्र में अच्छा काम करना चाहती हूं. मेरे कैरियर की सपोर्ट सिस्टम मेरी दीदी ही है, जिसने मुझे इस इंडस्ट्री की बारीकियों को समझाया है. दीदी कहती है कि जब भी कोई काम करने की इच्छा हो, तो उसे कर लेना चाहिए, ताकि बाद में अफसोस न हो. अगर वह गलत निकला तो उसे छोड़ आगे बढ़ जाना चाहिए.

यहां तक पहुंचने में परिवार का सहयोग कितना रहा?

उन्होंने बहुत सहयोग दिया है, जमशेदपुर से वे मुंबई रहने चले आये, ताकि हमें सुविधा हो. मैंने हमेशा काम के साथ परिवार का बैलेंस रखा है. समय मिलते ही उनके साथ समय बिताना पसंद करती हूं. काम मेरे ऊपर इतना हावी नहीं होता है कि मैं परिवार और दोस्तों को भूल जाऊं. इसलिए मुझे कभी तनाव नहीं होता.

कितना संघर्ष यहां तक पहुंचने में रहा?

मैंने अधिक संघर्ष नहीं किया. ये सही है कि कोई बड़ा काम नहीं मिला, लेकिन समय-समय पर मुझे जो काम मिला, उसमें मैं धीरे-धीरे ग्रो कर रही हूं और अपने काम से संतुष्ट हूं.

फिल्मों में इंटिमेट सीन्स करने में आप कितनी सहज होती हैं?

अभी तक तो कोई फिल्म ऐसी नहीं की है, लेकिन स्क्रिप्ट की जरूरत अगर है तो करना पड़ेगा, पर मैं सहज नहीं हूं. ग्लैमर के लिए इंटिमेट सीन्स नहीं कर सकती.

आगे किस तरह की फिल्में करने की इच्छा रखती हैं?

मैंने अभी तो शुरुआत की है. एक एक्शन फिल्म करने की इच्छा है. निर्देशक इम्तियाज अली के निर्देशन में फिल्म करना चाहती हूं.

कितनी फूडी और फैशनेबल हैं?

मैं बंगाली हूं और हर तरह का खाना पसंद करती हूं. मिठाई खूब पसंद है. समय मिले तो खाना भी बना लेती हूं. चिकन बिरयानी और आइसक्रीम मैं बना लेती हूं.

कम्फर्ट लेबल को ध्यान में रखकर ड्रेस पहनती हूं. इंडियन और वेस्टर्न हर तरह के पोशाक पहनती हूं. मुझे ब्राइट कलर के परिधान पसंद हैं, जिसमें पीला रंग मेरा पसंदीदा है.

मेकअप कितना पसंद करती हैं?

पहले मुझे मेकअप का शौक था, अब नहीं है, क्योंकि हमेशा लगाना पड़ता है. मौइस्चराइजर हमेशा लगाती हूं. रात को सोने से पहले अच्छी तरह से मेकअप उतरना नहीं भूलती.

खाली समय में क्या करना पसंद करती हैं?

मुझे पेट्स से बहुत लगाव है. मेरे पास एक डौग है, जिसका नाम मैंने ‘हैप्पी’ रख दिया है. उसके साथ मैं खेलती हूं. जब भी मैं काम से घर लौटती हूं, तो वह मेरा सत्कार खुशी से करता है, जिससे मेरी पूरी थकान दूर हो जाती है. इसके अलावा खाली समय में दोस्त और परिवार के साथ समय बिताती हूं.

इस दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज ने जड़ा सबसे तेज तिहरा शतक, बनाया वर्ल्ड रिकार्ड

दक्षिण अफ्रीका के युवा बल्लेबाज मार्को मरैस ने क्रिकेट इतिहास का सबसे तेज तिहरा शतक जड़कर इतिहास रच दिया. 24 साल के मरैस ने दक्षिण अफ्रीका के तीन दिवसीय प्रांतीय प्रतियोगिता में पूर्वी लंदन में बौर्डर की तरफ से खेलते हुए ईस्टर्न प्रोविंस के खिलाफ 191 गेंदों पर नाबाद 300 रनों की पारी खेली.

अपनी रिकार्ड पारी के दौरान मरैस जब बल्‍लेबाजी के लिए पहुंचे तो उनकी टीम 82 रन पर चार विकेट गंवाकर मुश्किल में थी. मैच में उन्‍होंने 35 चौके और 13 छक्‍के जमाए. इस दौरान मरैस ने ब्रेडले विलियम्‍स (नाबाद 113 रन) के साथ नाबाद 428 रन की साझेदारी की. यह मैच बारिश से प्रभावित रहा और ड्रा पर समाप्‍त हुआ.

यह जोरदार पारी खेलने के बाद मरैस ने कहा कि, ‘इस वर्ष में क्‍लब क्रिकेट खेलने के लिए देश से बाहर नहीं गया. मैंने अपनी खास चीजों में सुधार के लिए कड़ी मेहनत की. मुझे लगता है कि इसका अच्‍छा नतीजा मेरी बल्‍लेबाजी में देखने को मिला.’

इससे पहले, सबसे तेज तिहरे शतक का रिकार्ड चार्ली मैकार्टनी के नाम पर था जो उन्‍होंने वर्ष 1921 में 221 गेंदों पर लगाया था. चार्ली ने नौटिंघमशायर के खिलाफ यह तिहरा शतक जमाया था. डेनिस कौम्‍पटन ने एमसीसी की ओर से खेलते हुए नार्थ ईस्‍टर्न ट्रांसवाल के खिलाफ 1948-49 में 181 मिनट में 300 रन बनाए थे लेकिन उनकी ओर से खेली गई गेंदों को उस समय गिना नहीं गया था. क्रिकेट में उस समय आठ गेंदों का ओवर होता था.

आपको बता दें हाल ही में (18 नवंबर) 20 साल के साउथ अफ्रीकी बल्लेबाज शेन डैड्सवेल ने कमाल कमाल किया था. डैड्सवेल ने 50 ओवर के एक क्लब क्रिकेट मैच में 490 रन ठोक डाले थे. मजे की बात तो यह है कि उन्होंने अपने जन्मदिन पर यह कारनामा किया था.

बिल्डर समस्या

देशभर में बिल्डर लौबी बुरी तरह बदनाम है. आम आदमी बिल्डरों पर खलनायक, लुटेरा, सूदखोर, चोर, मुनाफाखोर और न जाने क्याक्या आरोप लगा कर उन्हें बदनाम करता है. गनीमत है कि इतनी बदनामी सहने के बावजूद इस उद्योग में आने वाले बिल्डरों की अभी तक कमी नहीं है और लोग हजारों की नहीं, लाखों की संख्या में देश के हर शहर, कसबे में बिल्डरों के बनाए मकानों में रह रहे हैं या व्यवसाय कर रहे हैं.

यह ऐसा व्यवसाय है जिस के बिना रहा भी न जाए और साथ निभाया भी न जाए. सरकार ने बिल्डरों के खिलाफ बने माहौल का बड़ा लाभ उठाया है और उन पर नए कानून थोपे हैं जो इस धंधे को शायद नष्ट ही कर डालेंगे. नए कानून के लागू होने से पहले ही सैकड़ों प्रोजैक्ट खटाई में पड़ चुके हैं और दिल्ली के कई नामी बिल्डर जेल में हैं या उन्हें भेजे जाने की तैयारी है.

अदालतें ग्राहकों की समस्या का उपाय केवल जुर्माना या जेल समझ रही हैं जबकि ग्राहकों को दोषियों को सजा से नहीं, मकानों के मिलने से संतुष्टि मिलेगी. जुर्माना भरने या जेल में जाने से मकान तो उग नहीं आएंगे पर आम प्रशासकों की तरह अदालतें भी समझती हैं कि सख्ती से हर जीव को नियंत्रित किया जा सकता है. अदालतें यह भूल जाती हैं कि जेल में बंद बिल्डर मकान के प्रोजैक्ट को आगे बढ़ा ही नहीं सकता.

इस उद्योग में मोटा पैसा बना या पैसा लेने के बाद देरी हुईर् तो आमतौर पर कारण सरकारी अड़ंगेबाजी है. सरकारों ने, जिन में बीसियों एजेंसियां होती हैं, बिल्डरों को सोने के अंडे देने वाली मुरगियां तो समझ रखा है पर उन को दानापानी देने का कोई इंतजाम नहीं कर रखा है. बिल्डर अनुमतियों के चक्कर में फंसे रहते हैं. हर अफसर ऐसे नए नियम बनाता रहता है जो कानून में होते ही नहीं हैं. अफसर की कलम का गलत लिखा सिर्फ अदालत हटा सकती है और अदालतें छोटेछोटे मामलों पर फैसला देने के लिए वर्षों का समय लेती हैं. अगर इन वर्षों के कारण ग्राहकों को मकान न मिल पाएं तो भी दोष न अफसर का होता है, न नियमों का, न कानून बनाने वालों का और न ही अदालतों का. दोष बिल्डरों का ही माना जाता है.

इस सब का पैसा ग्राहकों को देना पड़ता है. कानून की एक लाइन मकान की कीमत में 15 प्रतिशत तक वृद्धि कर सकती है. कुछ कानून तो 50 प्रतिशत तक दाम बढ़वा देते हैं. जब से अदालतों ने बिल्डरों को जेल भेजना शुरू किया है, मकान बनने बंद हो गए हैं. दिल्ली के आसपास कमसेकम 60 हजार मकान अधूरे बने पड़े हैं जिन में बिल्डरों, बैंकों और ग्राहकों का पैसा फंसा है. दोष सरकार और अदालतों का भी उतना ही है जितना बेईमान बिल्डरों का. पर पूरी जमात को गुनाहगार मान कर मकान नहीं बन सकते, यह पक्का है. सरकार खुद मकान बना कर देख चुकी है कि उस के बनाए मकानों में तो बेघर भी रहने से घबराते हैं कि वे न जाने कब ढह जाएं.

संग्राहकों के लिए आज भी अमूल्य है एक रुपए का यह नोट

पहले के समय में एक रूपये का नोट बड़े काम का था, उस समय इस नोट का ज्यादातर इस्तेमाल शगुन के पैसे देने के लिए किया जाता था. वैसे एक रुपये के नोट से जुड़े किस्से तो आप सभी को याद ही होंगे.

शादियों का मौसम चल रहा है, इस मौसम में शगुन देने के लिए अब तो एक रुपये के सिक्के लगे लिफाफे आने लगे हैं लेकिन एक दौर ऐसा था जब परिवार के सदस्य एक रुपये के नोट को ढूंढते फिरा करते थे और एक रूपये का नोट लगाकर ही शगुन दिया करते थे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही एक रुपये का नोट अब 100 साल का हो चुका है और इसकी शुरुआत का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है.

हुआ यूं कि जब एक रुपये का नोट आया तो उस समय पहले विश्वयुद्ध का दौर था और देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी. उस दौरान एक रुपये का चांदी का सिक्का चला करता था, लेकिन युद्ध के चलते सरकार चांदी का सिक्का ढालने में असमर्थ हो गई और इस प्रकार 30 नवंबर 1917 में पहली बार एक रुपये का नोट लोगों के सामने आया. इसने उस चांदी के सिक्के का स्थान लिया

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शुरू में ये नोट इंग्लैंड में प्रिंट हुए थे. इस पर किंग जार्ज पंचम के चांदी के सिक्के की तस्वीर बाएं कोने पर छपी थी. नोट पर लिखा था कि ‘मैं धारक को किसी भी कार्यालयी काम के लिए एक रुपया अदा करने का वादा करता हूं, लेकिन बाद के सभी एक रुपये के नोटों पर ऐसा वाक्य नहीं लिखा जाता था, बल्कि उसके पीछे आठ भारतीय लिपियों में एक रुपया लिखा होता है.

एक रुपये की कीमत होने के बावजूद, इसकी छपाई में काफी खर्च आता है. इसी कारण से सरकार ने कई बार इसकी छपाई बंद कर दी और आवश्यकता पड़ने पर पुन: उसे जारी किया गया. भारतीय रिजर्व बैंक की वेबसाइट के अनुसार इस नोट की छपाई को पहली बार 1926 में बंद किया गया क्योंकि इसकी लागत अधिक थी. इसके बाद इसे 1940 में फिर से छापना शुरू कर दिया गया जो 1994 तक अनवरत जारी रहा. इसके बाद इस नोट की छपाई 2015 में फिर से शुरू की गई.

दादर के एक प्रमुख सिक्का संग्राहक गिरीश वीरा ने अपने एक इन्टरव्यू में बताया कि पहले विश्वयुद्ध के दौरान चांदी की कीमत बहुत बढ़ गईं थी, इसलिए जो पहला नोट छापा गया उस पर एक रुपये के उसी पुराने सिक्के की तस्वीर छपी हुई थी. तब से ही एक रुपये के नोट पर एक रुपये के सिक्के की तस्वीर छापी जाने की परंपरा बन गई. शायद यही कारण है कि कानूनी भाषा में इस रुपये को उस समय ‘सिक्का’ भी कहा जाता था. वीरा के मुताबिक एक रुपये के नोट की छपाई दो बार रोकी गई और इसके डिजाइन में भी कम से कम तीन बार बदलाव हुए लेकिन संग्राहकों के लिए यह अभी भी अमूल्य है.

इस नोट की सबसे खास बात यह है कि इसे अन्य भारतीय नोटों की तरह भारतीय रिजर्व बैंक जारी नहीं करता न ही इसपर रिजर्व बैंक के गवर्नर का हस्ताक्षर होता है, बल्कि इसकी छपाई स्वयं भारत सरकार ही करती है और इसपर देश के वित्त सचिव का हस्ताक्षर होता है.

इतना ही नहीं कानूनी आधार पर यह एक मात्र वास्तविक ‘मुद्रा’ नोट (करेंसी नोट) है बाकी सब नोट धारीय नोट (प्रामिसरी नोट) होते हैं जिस पर धारक को उतनी राशि अदा करने का वचन दिया गया होता है.

मालूम हो कि पहले एक रुपये के नोट पर ब्रिटिश सरकार के तीन वित्त सचिवों के हस्ताक्षर थे. ये नाम एमएमएस गुब्बे, एसी मैकवाटर्स और एच. डेनिंग थे. आजादी से अब तक 18 वित्त सचिवों के हस्ताक्षर वाले एक रुपये के नोट जारी किए गए हैं.

जानिए क्या अंतर है 32 बिट और 64 बिट प्रोसेसर में, कौन सा है फायदेमंद

कंप्यूटर और लैपटौप का इस्तेमाल हम सभी करते हैं, लेकिन उसकी कई टेक्निकल टर्म्स के बारे में हमें पूरा ज्ञान नहीं होता.

क्या आप जानते हैं कि कंप्यूटर में 32 बिट और 64 बिट में क्या अन्तर होता है? किस तरह के कंप्यूटर का इस्तेमाल आपके लिए सही रहेगा? इस तरह के प्रश्नों का उत्तर आज हम आपको देने वाले हैं.

32 बिट प्रोसेसर का प्रयोग

1990 तक 32 बिट प्रोसेसर को सभी कम्प्यूटर्स में प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता था. 32 बिट प्रोसेसर पर कार्य करने वाला कंप्यूटर 32 बिट्स चौड़ी डाटा यूनिट्स पर कार्य करता है.

विंडोज 95 ,98 और एक्सपी सभी 32 बिट औपरेटिंग सिस्टम हैं, जो 32 बिट प्रोसेसर्स वाले कंप्यूटर पर आम तौर पर कार्य करते हैं. जाहिर सी बात है की 32 बिट प्रोसेसर पर कार्य करने वाले कंप्यूटर पर 64 बिट वर्जन का औपरेटिंग सिस्टम इनस्टौल नहीं किया जा सकता.

64 बिट प्रोसेसर का प्रयोग

64 बिट कंप्यूटर 1961 से बाजार में आया जब आईबीएम ने IBM7030 स्ट्रेच सुपरकम्प्यूटर पेश किया. हालांकि, इसका इस्तेमाल 2000 से चलन में आया. माइक्रोसौफ्ट ने विंडोज एक्सपी का 64 बिट वर्जन पेश किया था, जिसे 64 बिट प्रोसेसर के साथ इस्तेमाल किया जा सकता था. विंडोज विस्टा, विंडोज 7 और विंडोज 8 भी 64 बिट वर्जन में आती हैं.

64 बिट पर आधारित कंप्यूटर 64 बिट्स चौड़ी डाटा यूनिट्स पर कार्य करता है. 64 बिट प्रोसेसर पर कार्य करने वाले कंप्यूटर पर 64 या 32 बिट वर्जन के किसी भी औपरेटिंग सिस्टम को इनस्टौल किया जा सकता है. हालांकि, 32 बिट औपरेटिंग सिस्टम के साथ 64 बिट प्रोसेसर ठीक से कार्य नहीं कर पाएगा.

32 बिट और 64 बिट में क्या है अंतर?

32 बिट और 64 बिट प्रोसेसर्स में एक बड़ा अंतर यह है की वो प्रति सेकंड कितनी तेजी से कितनी गणना कर सकते हैं. इससे टास्क पूरा होने की स्पीड पर फर्क पड़ता है.

64 बिट प्रोसेसर्स होम कंप्यूटिंग के लिए ड्यूल कोर, क्वैड कोर, सिक्स कोर और आठ कोर वर्जन पर आ सकते हैं. मल्टीपल कोर होने से प्रति सेकेंड गणना करने की स्पीड में इजाफा होता है. इससे कंप्यूटर की प्रोसेसिंग पावर बढ़ सकती है और कंप्यूटर फास्ट काम कर सकता है. जिन सौफ्टवयेर प्रोग्राम्स को कार्य करने के लिए एक ही समय पर कई गणनाएं करनी होती हैं, वो 64 बिट प्रोसेसर पर बेहतर कार्य करते हैं.

32 बिट और 64 बिट प्रोसेसर में दूसरा बड़ा अंतर रैम सपोर्ट करने को लेकर है. 32 बिट कंप्यूटर अधिकतम 3 से 4 GB रैम सपोर्ट करते हैं. वहीं, 64 बिट कंप्यूटर 4GB से अधिक रैम को भी सपोर्ट करते हैं. यह फीचर ग्राफिक डिजाइन, इंजीनियरिंग और वीडियो एडिटिंग जैसे प्रोग्राम्स में महत्वपूर्ण होता है.

32 बिट और 64 बिट में कौन-सा बेहतर?

64 बिट प्रोसेसर्स अब होम कम्प्यूटर्स में भी काफी चलन में आ गए हैं और अधिकतर यूजर्स इसका ही इस्तेमाल करते हैं. यह भी कहा जा सकता है की टेक्नोलौजी के बढ़ते विस्तार के इस दौर में 32 बिट अब पुराना हो गया है. क्योंकि अधिकतर यूजर्स अब 64 बिट का ही इस्तेमाल करने को वरीयता देते हैं इसलिए मैन्युफैक्चरर भी इसे बजट कीमत में पेश करने लगे हैं. आने वाले समय में 32 बिट का इस्तेमाल होना बंद ही होने वाला है. ऐसे में जाहिर तौर पर आपके लिए 64 बिट पर आधारित कंप्यूटर लेना ही बेहतर होगा.

भारत में कितनी है बिटकौइन की कीमत, जानिये इसके बारे में विस्तार से

बिटकौइन, यानी एक ऐसी करेंसी जिसका वजूद रुपए या डौलर की तरह नहीं है. लेकिन, इसे आप वर्चुअली ग्लोबल पेमेंट में इस्तेमाल कर सकते हैं. वर्चुअल करेंसी बिटकौइन में एक दिन का सबसे तेज उछाल देखने को मिला है. उसके बाद एक बिटकौइन की कीमत 10,000 डौलर क पार हो गई है.

अगर भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत की बात करें तो 667214.23 रुपए है. बीते एक साल में इसकी कीमतों में 900 फीसदी से ज्यादा का उछाल देखने को मिला है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक तरह की पोंजी स्कीम है जिसमें निवेशकों के साथ धोखा हो सकता है.

क्या है बिटकौइन

बिटकौइन एक वर्चुअल करेंसी (क्रिप्टो करेंसी) है. इसे एक औनलाइन एक्सचेंज के माध्यम से कोई भी खरीद सकता है. इसकी खरीद-फरोख्त से फायदा लेने के अलावा भुगतान के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. फिलहाल, भारत में एक बिटकौइन की कीमत करीब 667214.23 रुपए है.

ये हैं इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्य

  • पूरे विश्व में कुल 1.5 करोड़ बिटकौइन चलन में होने का अनुमान.
  • इस गुप्त करेंसी पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता. इसे छिपाकर इस्तेमाल किया जाता है.
  • इसे दुनिया में कहीं भी सीधा खरीदा या बेचा जा सकता है.
  • इसे रखने के लिए बिटकौइन वौलेट उपलब्ध होते हैं.
  • बिटकौइन को आधिकारिक मुद्रा से भी बदला जाता है. इसे न तो जब्त किया जा सकता है और न ही नष्ट.
  • यह किसी देश की आधिकारिक मुद्रा नहीं है. ऐसे में इस पर किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगता है.
  • बिटकौइन में ट्रेड करने के लिए कई एक्सचेंज हैं, इनमें जेबपे, यूनो कौइन और कौइन सिक्योर एक्सचेंज शामिल है.
  • अधिकांश एक्सचेंज के पास एंड्रौयड और आईफोन ऐप हैं, जिनके जरिए बैंक अकाउंट से लिंक के बाद तुरन्त ट्रांसफर किया जा सकता है.
  • बिटकौइन के लिए केवाइसी अनिवार्य है. बिटकौइन निवेशकों के लिए पैन और अन्य डिटेल्स के साथ आईडी प्रमाणित कराना जरूरी है.
  • बिटकौइन बेचने पर पैसा तुरंत अकाउंट में क्रेडिट कर दिया जाता है. कई एजेंट्स भी होते हैं जो कैश के लिए क्रिप्टो कंरसी की बिक्री करते हैं.

2009 में हुई थी बिटकौइन की शुरुआत

2008 में पहली बार बिटकौइन को लेकर एक लेख प्रकाशित हुआ था. हालांकि, इसकी शुरुआत 2009 में ओपन सोर्स सौफ्टवेयर के रूप हुई. इसे अज्ञात कम्प्यूटर प्रोग्रामर या इनके समूह ने सातोशी नाकामोटो के नाम से बनाया.

ये भी हैं क्रिप्टो करंसी

बिटकौइन के अलावा इथेरम, रिप्पल, लाइट कौइन, एनईएम, डैश, इथेरम क्लासिक, आईओटीए, मोनेरो और स्टैटस भी क्रिप्टो करंसी की लिस्ट में शामिल हैं.

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