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फिल्म ‘‘जीनियस’’ का अजीब संयोग

‘‘श्रृद्धांजली’’ व ‘‘गदरः एक प्रेम कथा’’ सहित कई सफल फिल्मों के मशहूर फिल्मकार अनिल शर्मा इन दिनों काफी खुश हैं. उन्हें लगता है कि उन्होने एक पिता का धर्म निभाते हुए अपने बेटे को किसी भी सभा में पहली पंक्ति में बैठने लायक बना दिया है. अपनी इस खुशी को बांटने के लिए अपने जन्मदिन सात मार्च को मुंबई में जुहू स्थित पांच सितारा होटल ‘‘नोवाटेल’’ में उन्होने शानदार जश्न का आयोजन कर डाला. अनिल शर्मा के इस जश्न का मकसद अपना जन्म दिन मनाने के साथ ही अपनी नई फिल्म ‘‘जीनियस’’ की शूटिंग पूरी होने का ऐलान करने के साथ ही फिल्म के हीरो/नायक व अपने बेटे उत्कर्ष शर्मा के बौलीवुड में प्रवेश करने के ऐलान करने के साथ ही फिल्म की नायिका/हीरोईन से लोगो को परिचित कराना भी था.

इस शानदार जश्नरूपी समारोह में आम लोगों से उत्कर्ष शर्मा को परिचित कराने की जिम्मेदारी निभायी अभिनेता सनी देओल ने यूं तो जब उत्कर्ष महज सात वर्ष के थे, तब उन्होंने अपने पिता अनिल शर्मा के ही निर्देशन में फिल्म ‘‘गदरः एक प्रेम कथा’’ में सनी देओल के बेटे जीत का किरदार निभाया था. पर इस बात को सत्रह वर्ष बीत चुके हैं. इन सत्रह वर्षों में उत्कर्ष शर्मा न सिर्फ बड़े हो चुके हैं, बल्कि अभिनय की बारीकी भी सीख चुके हैं.

एक युवा प्रेम कहानी प्रधान, जिसमें भरपूर एक्शन व रोमांच है, को आधुनिक तकनीक के साथ फिल्माया गया है. फिल्म की टैग लाइन है- ‘‘दिल की लड़ाई दिमाग से’’.

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फिल्म ‘‘जीनियस’’ के निर्माता, लेखक व निर्देशक अनिल शर्मा ने सबसे पहले सभी का स्वागत करते हुए कहा- ‘‘मेरे लिए खुशी का दिन है कि मैं अपने बेटे उत्कर्ष शर्मा को बतौर हीरो बौलीवुड में लौंच कर रहा हूं. मैने अपनी इस फिल्म ‘जीनियस’की शूटिंग की शुरूआत अपने बेटे उत्कर्ष के जन्मदिन यानी कि 22 मई को की थी और आज पूरे चार माह बाद मैं अपने जन्म दिन पर फिल्म की शूटिंग पूरी होने का ऐलान कर रहा हूं.

यह एक संयोग है कि बेटे के जन्म दिन पर फिल्म शुरू हुई थी और मेरे जन्म दिन पर फिल्म पूरी हो गयी. हमारी फिल्म के निर्माण के साथ जुड़ने के लिए मैं सोहम रौकस्टार, कमल मुकुट व दीपक मुकुट का आभारी हूं. इसी के साथ मैं अपनी फिल्म की पूरी टीम का भी आभारी हूं.’’

फिल्म ‘‘गदर एक प्रेमकथा’’ के क्लायमैक्स में तारा सिंह (सनी देओल) अपने बेटे जीत (उत्कर्ष शर्मा) को अपनी गोद में लेकर भागते हुए नजर आते हैं. अब सत्रह वर्ष बाद नोवाटेल के खास हाल में फिल्मी हस्तियो की मौजूदगी में सनी देओल, उत्कर्ष का हाथ पकड़कर मंच पर लेकर गए और लोगों से उत्कर्ष का परिचय कराते हुए ‘गदरःएक प्रेम कथा’ की शूटिंग के दौरान की कुछ घटनाओं का भी जिक्र किया.

इस अवसर पर उत्कर्ष शर्मा ने कहा कि,‘‘उस वक्त मैं बहुत छोटा था. मगर मैने सेट पर सनी देओले जी को काम करते हुए देखकर बहुत कुछ सीखा था. और वह सीख फिल्म ‘जीनियस’ करते समय मेरे काम आयी. बचपन में मैने देखा था कि सनी जी सेट पर अपने किरदार व फिल्म के दृश्यों को लेकर मेरे पापा से कितनी बहस करते थे. मैने भी वही किया. इससे फिल्म अच्छी बनी. हर रचनात्मक काम में जितनी अधिक बहस होती है, काम उतना ही अच्छा होता है.’’

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इस पर अनिल शर्मा ने कहा – ‘‘सेट पर कई बार मुझे लगता था कि यह मेरा बेटा नहीं, बल्कि खुद सनी देओल आकर मुझसे बात कर रहे हैं. उत्कर्ष के सवाल करने का अंदाज बिलकुल सनी जैसा होता था.’’

उसके बाद अनिल शर्मा ने खुद फिल्म की हीरोईन इशिता चैहाण को मंच पर बुलाकर लोगों से परिचित कराया. अनिल शर्मा ने कहा- ‘‘हमने अपनी फिल्म की नायिका की तलाश में पूरा एक वर्ष लगा. हमने वेबसाइट बनाकर भी कलाकारों का आव्हान किया था. अंततः हमें पुणे की रहने वाली इशिता चैहाण मिली. इशिता खूबसूरत हैं और इनका भोला भाला चेहरा हमारी फिल्म ‘जीनियस’ के किरदार के लिए एकदम उपयुक्त लगा.’’

फिल्म ‘‘जीनियस’’ में इशिता चैहाण की मां के किरदार को निभाकर आयशा जुल्का ने पूरे सात वर्ष बाद फिल्मी परदे पर वापसी की है.

इस अवसर पर अनिल शमो के पिता के सी शर्मा, कमल मुकुट, दीपक मुकुट, सनी देओल, बौबी देओल, सावन कुमार टौक, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, अरूणा ईरानी, चंपक जैन, हिमेश रेशमिया, सुमन शर्मा, डी जे शेजवुड, सब्बीर अहमद, बिजौन दास गुप्ता सहित कई हस्तियां मौजूद थीं.

सिर्फ मोबाईल से ही नहीं बल्कि जूते से भी और्डर कर सकेंगे पिज्जा

पिज्जा हट ने एक ऐसा जूता लांच किया है जिसके जरिए पिज्जा और्डर किया जा सकता है. इस जूते के लौंच होने के बाद आपको पिज्जा खाने के लिए न तो कौल करने की जरूरत होगी, और न ही वेबसाइट पर और्डर बुक करना होगा. इस जूते में एक बटन दिया गया है जिसे दबाते ही आपके लिए पिज्जा और्डर हो जाएगा.

करीब एक साल पहले पिज्जा हट ने Pie Tops स्नीकर्स को लौंच किया था. उस जूते में इस तरह के फीचर दिए गए थे. ये दुनिया का पहला जूता था जिसकी मदद से पिज्जा और्डर किया जा सकता था. पिज्जा हट कंपनी ने उसी जूते का नया वर्जन Pie Top-2 लौंच किया है.

ब्लूटूथ के जरिए और्डर होगा पिज्जा

दरअसल, पिज्जा हट के इस जूते में ब्लूटूथ लगा हुआ है जो आपके स्मार्टफोन से कनेक्टेड होगा. आपको अपने स्मार्टफोन में केवल पाय टौप्स ऐप डाउनलोड करना होगा. यूजर जब जूते में लगे बटन को दबाएगा तो ब्लूटूथ की मदद से आपके फोन में मौजूद पाय टौप्स एप आपके लिए पिज्जा और्डर कर देगा.

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NCAA के साथ पिज्जा हट ने की पार्टनरशिप

इस जूते को लेकर पिज्जा हट कंपनी ने NCAA से पार्टनरशिप की है. इस जूते को लौंच करने को लेकर जो जानकारी सामने आ रही है उसके मुताबिक, ऐसा आने वाले टूर्नामेंट्स को ध्यान में रख कर किया गया है. कंपनी का मानना है कि अगर जूते में लगे एक बटन को दबाने से पिज्जा और्डर हो जाता है तो दर्शक आसानी से पिज्जा और्डर कर पाएंगे और मैच का भरपूर लुत्फ उठाएंगे.

मैच के दौरान पिज्जा खाना पसंद करते हैं दर्शक- डेनियल

जूते को लांच करने के बाद पिज्जा हट के एडवर्टाइजिंग वाइस प्रेसिडेंट डेविड डेनियल ने कहा कि हम जानते हैं NCAA कौलेज बास्केटबौल टूर्नामेंट की जबरदस्त लोकप्रियता है. मैच के दौरान दर्शक पिज्जा खाना बहुत पसंद करते हैं. वे मस्ती में होते हैं. इसी वजह से स्पेशल फीचर के साथ जूते लौंच किए गए हैं.

एक बटन से लाइव टीवी भी पौज होगा

जूते की बात करें तो यह आमलोगों के लिए कितना उपयोगी है, इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई है. ऐसा माना जा रहा है कि Pie Tops-2 स्नीकर्स बतौर प्रमोशन लांच किया गया है. Pie Tops-2 पुराने वर्जन से कितना बेहतर है इसको लेकर कहा जा रहा है कि नए वाले मौडल में एक और फीचर जोड़ा गया है. इस जूते में एक और बटन दिया गया है जिसके जरिए लाइव टीवी को पौज किया जा सकता है.

केवल 50 जोड़ी प्रीमियम जूते लांच किए गए

खास बात यह है कि इस जूते के जरिए केवल पिज्जा हट का ही पिज्जा और्डर किया जा सकता है. इस जूते को भारतीय बाजार के लिए लांच नहीं किया गया है. सभी जूते लिमिटेड एडिशन में लांच किए गए हैं. कस्टमर्स के लिए केवल 50 जोड़ी जूते लांच किए गए हैं.

फ्लर्ट लाए लाइफ में फन और उदासीन जिंदगी को बनाए खुशनुमा

‘‘कैसी हो निधि? तुम्हारी तबीयत कैसी है? जल्दी से ठीक हो जाओ…मैं तुम्हारी पसंद की सब्जी बना कर लाई हूं. तुम्हें परवल पसंद हैं न?’’ निधि की पड़ोसिन चित्रा ने घर में घुसते हुए कहा.

‘‘यार, तुम कब तक मेरी पसंद की चीजें बना कर लाती रहोगी. अब मैं ठीक हूं, खाना बना लूंगी. तुम अब मेरे लिए और परेशान मत हो,’’ निधि ने बिस्तर से उठते हुए मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं चित्राजी, मैं तो तुम्हारी सहेली के हाथ का बेस्वाद खाना खाखा कर बोर हो गया हूं. कृपया 2 दिन निधि को और आराम करने दो ताकि मैं आप के हाथों का बना स्वादिष्ठ खाना और खा सकूं,’’ निधि के पति निर्मल ने चित्रा को बैठने के लिए इशारा करते हुए कहा.

‘‘कैसी बात करते हैं निर्मलजी, सुबह से कोई मिला नहीं क्या? जैसे मैं ने निधि के हाथों का बना खाना कभी खाया नहीं.. इस के हाथों का खाना खा कर किट्टी पार्टी में सब अपनी उंगलियां चाटती रह जाती हैं.’’

इतना सुनते ही निर्मल खिलखिला कर हंस पड़ा. चित्रा ने निधि के चेहरे के कठोर भाव पढ़ लिए थे. जब भी निर्मल चित्रा के साथ इस तरह की चुहल करता तो निधि के चेहरे के भाव ऐसे ही हो जाते थे, यह वह पिछले 10 दिनों में भांप चुकी थी और यह देख कर उसे महसूस हुआ कि वह निर्मल के इस व्यवहार से अपनेआप को असुरक्षित महसूस करती है.

थोड़ी देर इधरउधर की बातें होती रहीं, उस के बाद चित्रा अपने घर लौट आई. आज उस का मन निधि के चेहरे के तने हुए भाव को देख कर कुछ कसैला सा हो गया था. उस ने सोचा कि अब तो निधि काफी ठीक हो गई है और थोड़ाबहुत खाना बना सकती है. फिर निधि भी तो यही चाहती थी, इसलिए उस ने उस के लिए खाना न देने में ही भलाई समझी.

उस के जाते ही निधि ने अपने पति को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘क्यों मेरी बीमारी का फायदा उठा कर चित्रा से बहुत फ्लर्ट करने की कोशिश हो रही है. दूसरे की बीवी सब को प्यारी लगती है, लेकिन काम मेरा बेस्वाद खाना ही आएगा, उस का स्वादिष्ठ खाना नहीं,’’ निधि ने एक ही सांस में सारा आक्रोश उगल दिया.

‘‘अरे यार, तुम तो बुरा मान गईं. मैं ने तो उस की इसलिए बटरिंग की ताकि वह खाना देती रहे और तुम्हें 2 दिन और आराम मिल जाए, कितनी संकीर्ण सोच है तुम्हारी. तुम औरतों की ईर्ष्या की भावना का कोई जवाब नहीं…’’ निर्मल ने निधि से प्रतिवाद करते हुए उसे ही अपराधी साबित किया. हमेशा की तरह निधि के इस रवैए से उस का मन कड़वा हो गया.

अगले दिन चित्रा खाना ले कर निधि के घर नहीं आई तो निधि को जैसे सुकून मिला. लेकिन निर्मल का माथा ठनका कि जरूर निधि के बरताव से बुरा मान कर ही चित्रा नहीं आई होगी. उस ने निधि से कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह जानता था कि उस के बारे में पूछते ही वह व्यंग्यात्मक रूप से बोल कर उसे आहत करेगी.

कितना जरूरी है सकारात्मक सोच

निधि और चित्रा दोनों के विवाह को अभी 2 साल ही हुए थे और दोनों परिवार विवाह होते ही बैंगलुरु में आ कर बस गए थे. पड़ोसी और समान परिस्थितियां होने के कारण दोनों में बहुत जल्दी दोस्ती हो गई थी. लेकिन उन के पतियों का मिलनाजुलना बहुत कम होता था, क्योंकि जहां निधि का पति बहुत बातूनी और सहज था, वहीं चित्रा का पति अंतर्मुखी और उदासीन स्वभाव का था.

उन का अपने पतियों के औफिस जाने के बाद ही मिलना होता था. अकसर बाजार के काम के लिए या कहीं भी जाना होता था तो वे साथसाथ जाती थीं, लेकिन इन दिनों निधि की बीमारी के कारण चित्रा का निधि के घर में समयअसमय आना होने लगा. उस ने निधि को डेंगू बुखार से ग्रस्त होने के बाद पूरा आराम देने के लिए सुबहशाम खाना देना आरंभ कर दिया. निर्मल के भी औफिस से छुट्टी ले कर घर पर रहने के कारण और उन दोनों के स्वभाव एकजैसे होने से वे बहुत जल्दी घुलमिल गए और अकसर उन में नोकझोंक होने लगी.

निर्मल को निधि के विपरीत उस का बिंदास स्वभाव बहुत अच्छा लगता था. छोटीछोटी बातों पर खुल कर हंसना और जीवन के प्रति उस की सकारात्मक सोच वातावरण को खुशनुमा बना देती थी, निधि के डेंगू से पीडि़त होने के बाद घर पर एक सन्नाटा सा छाया रहता था. चित्रा ने उस समय उन लोगों की बहुत मदद की और उस के प्रतिदिन आने से वे लोग थोड़ी देर के लिए उस से बातें करने में बीमारी को भूल जाते थे.

असुरक्षा की भावना क्यों

लेकिन निधि को यह सब नहीं सुहाता था. वैसे भी वह निर्मल की औरतों से फ्लर्ट करने की आदत से उस के प्रति हमेशा आशंकित ही रहती थी. वह था भी सुदर्शन और सुगठित व्यक्तित्व का मालिक. कोई उस की तारीफ करता तो निधि उसे ले कर असुरक्षा की भावना से घिर जाती थी, जबकि वह निधि को बहुत प्यार करता था और एक अच्छे पति की तरह उस का ध्यान भी रखता था.

निर्मल निधि की इस शक करने वाली आदत से कई बार आहत हो जाता था. उस ने उसे कई बार समझाने की कोशिश भी की कि वह अपनी संकीर्ण सोच से बाहर निकले. लेकिन निर्मल के समझाने का उस पर रत्ती भर भी प्रभाव नहीं होता था. निर्मल भी बिना कारण अपना स्वभाव बदलने में कोई औचित्य नहीं समझता था, इसलिए आए दिन उन दोनों में मनमुटाव हो जाता था.

उदासीन बरताव

15 दिन हो गए. चित्रा ने उस से कोई संपर्क नहीं किया. निर्मल भी अपनी औफिस की दिनचर्या के कारण व्यस्त हो गया था. निधि की तबीयत तो ठीक हो गई थी, लेकिन कमजोरी बहुत महसूस हो रही थी. घर में अकेले होेने के कारण सारा दिन बिस्तर पर पड़ेपड़े वह ऊब जाती थी, इसलिए उसे चित्रा की बहुत कमी महसूस होने लगी थी.

उस की अनुपस्थिति से उसे एहसास हुआ कि उस के साथ समय कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था. इतना तो वह समझ गई थी कि उदासीन बरताव के कारण ही उस ने उस के घर आना छोड़ा था. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि निर्मल सही कहता है कि उस की इस संकीर्ण सोच के चलते वह अकेली रह जाएगी.

आखिरकार उसे अपनी गलती पर पश्चात्ताप होने लगा कि उस ने अपने शक्की स्वभाव के कारण एक अच्छी सहेली को खो दिया. एक दिन निर्मल के औफिस जाते ही उस ने चित्रा के घर जाने का मन बना लिया. निधि को अचानक अपने घर के बाहर देख कर चित्रा हत्प्रभ रह गई.

अंदर दाखिल होते हुए निधि ने कहा, ‘‘यार, तुम नाराज हो जाओगी तो मेरा क्या होगा? इतने दिन तुम नहीं आईं तो मुझे तुम्हारी अहमियत पता चली. प्लीज, मुझे माफ कर दो,’’ कहते हुए वह चित्रा के गले से लग कर फफक पड़ी.

चित्रा ने उस की पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम जैसी सहेली से कभी नाराज कैसे हो सकती हूं भला? जितना तुम्हें मुझ से दूर रह कर बुरा लगा, उतना ही मुझे भी लगा. एक तुम ही तो हो, जिस के साथ के कारण इस अनजान शहर में मैं जी पा रही हूं. चिंतन तो हर समय अपने औफिस के काम में व्यस्त रहते हैं. आए दिन टूअर पर जाते हैं या घर पर रहते हैं तो लैपटौप से चिपके रहते हैं, लेकिन यह निश्चित है कि मैं जानबूझ कर तुम्हारे घर नहीं आई, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि तुम दोनों पतिपत्नी के रिश्ते में मेरे कारण कोई वादविवाद हो, दूसरा तुम्हें मेरी कमी का एहसास हो. मैं तुम्हारी जिंदगी में इतनी घुसपैठ करने की अधिकारिणी तो हूं नहीं कि तुम्हें समझा सकूं कि कोई भी रिश्ता विश्वास की नींव पर ही टिकता है, खासकर पतिपत्नी का.

‘‘तुम अपने पति पर शक कर के अपने वैवाहिक जीवन में जहर घोलने का काम कर रही हो. पति यदि अपनी पत्नी की बहन से या भाभी से मजाक करे तो सामाजिक रूप से स्वीकार्य है, चाहे इन रिश्तों की आड़ में कितने भी अनैतिक संबंध कायम हो जाएं, लेकिन यदि किसी ऐसी महिला से मजाक करे, जिस से उस का कोई रिश्ता नहीं है तो क्यों उसे शक के घेरे में कैद कर लिया जाता है? तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारा पति इतने खुले विचारों का स्वामी है. एक चिंतन है, जो किसी से बात ही नहीं करता और घर में सन्नाटा सा पसरा रहता है.

‘‘एक बात और है, जिन पतियों की नीयत खराब होती है, वे अपनी पत्नी के सामने तो बहुत शरीफ रहते हैं और उन के पीछे औरतों से फ्लर्ट करते हैं. मुझे लगता है वैवाहिक जीवन में थोड़ाबहुत फ्लर्ट करना मिठास घोल देता है, नहीं तो पतिपत्नी आपस में एकदूसरे के साथ ही चिपके रह कर बोर होने लगते हैं और जीवन नीरस हो जाता है.’’

चित्रा के इतना कहते ही निधि ने प्रत्युत्तर में कहा, ‘‘तुम सच कहती हो चित्रा. कितना अच्छा घर का वातावरण हो जाता था, जब निर्मल तुम से नोकझोंक करता था. अब तो घर काटने को दौड़ता है. तुम ने मेरी आंखें खोल दीं.’’

‘‘सोच लो. ऐसा न हो कि मैं तुम्हारे पति को पटा लूं और तुम देखती रह जाओ,’’ चित्रा ने जैसे ही आंखें बड़ीबड़ी कर के यह कहा, दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं और वातावरण खुशनुमा हो गया.

यह कैसा प्यार : लड़कियों की जान और इज्जत दोनों पर भारी पड़ता प्यार

एकसाथ 2 लोगों से प्यार होना बड़ी बात नहीं है. प्यार… दुनिया का सब से खूबसूरत शब्द है. जब यह होता है तो सबकुछ सुंदर और अच्छा लगने लगता है. और जब नहीं होता तो सबकुछ हो कर भी दुनिया उदास व बेरंग नजर आती है. यह स्थिति प्यार होने और न होने की है, लेकिन तब क्या होगा जब 2 लोगों से एकसाथ प्यार हो जाए और दोनों में से आप किसी से अलग नहीं होना चाहें? इस सवाल को सुन कर आप के मन में सवाल आया होगा कि क्या 2 लोगों से एकसाथ प्यार होना मुमकिन है? तो इस का जवाब हां है.

आज के दौर में लव ट्राएंगल के किस्से काफी बढ़ गए हैं. पिछले कुछ सालों में लव ट्राएंगल की लोकप्रियता बढ़ी है. यह तब होता है जब आप अपने वर्तमान पार्टनर से खुश नहीं होते और प्यार व इमोशनली सपोर्ट के लिए किसी और को खोजने लगते हैं. ऐसी स्थिति में आकर्षण होना लाजिमी है. जब यह होता है तो लव ट्राएंगल कहा जाता है, लेकिन इसी ट्राएंगल में लड़कियां बुरी तरह फंस जाती हैं.

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कुछ दिनों पहले रोहतक में एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार और उस के बाद उस की निर्ममता से जो हत्या हुई, उस की जैसेजैसे परतें खुल रही हैं वे बहुत ही भयानक हैं. बलात्कारी और हत्यारे कोई और नहीं बल्कि लड़की का पुराना प्रेमी और उस के दोस्त ही हैं, जिन्होंने सोनीपत से जबरदस्ती उस का अपहरण किया. उस के बाद उस के साथ सामूहिक बलात्कार, फिर उस की निर्ममता से हत्या कर दी.

उस के हर अंग को बुरी तरह से कुचल दिया. उस के बाद उस की बौडी को झाडि़यों में फेंक दिया. जहां उस को कुत्ते खाते रहे. लड़की को ईंट से बुरी तरह कुचला गया, उस को गाड़ी से भी कुचला गया. उस के गुप्तांग में लोहे की छड़ घुसेड़ दी गई. यह अमानवीयता की हद है. अब वह लड़का कहता है कि वह उस लड़की से बहुत प्यार करता था. उस से शादी करना चाहता था, लेकिन जब लड़की ने शादी से मना कर दिया तो उस ने ऐसा किया.

प्यार का जादू

ऐसा जरूरी नहीं कि जिसे हम प्यार करें वह भी बदले में हमें प्यार दे. हम जिसे प्यार करते हैं अगर  वह भी हमें प्यार करे तो वे दोनों लव कपल कहलाते हैं, पर ऐसा न हुआ तो इसे हम एकतरफा प्यार कहते हैं. दिल टूटना, सपने टूटना आदि एकतरफा प्यार की निशानियां हैं.

संसार में ऐसा कोई नहीं जो प्यार के जादू से वंचित हो. प्यार एक नशे की तरह है जिस के बिना जिंदगी संभव नहीं. प्यार का जादू सिर चढ़ कर बोलता है और हां, प्यार का नाम सुनते ही न जाने हमारे दिल को क्या हो जाता है कि वह बीते हुए कल की तरफ या फिर आने वाले कल को  हसीन पलों में संजोए रखता है.

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आज आप उम्र के उस कगार पर खड़े हैं जब प्यार का नशा अपनेआप ही चढ़ जाता है. जी हां, 16 साल की उम्र ऐसी ही होती है. कोई भी अनजान अपना सा लगने लगता है, जिस को सिर्फ देख कर ही दिल को सुकून मिलता है.

लड़कों के साथ ऐसा कई बार होता है. वे जिस लड़की को पसंद करते हैं वह उन के बारे में वैसा नहीं सोचती है. जिस के कारण वह उन के प्यार को स्वीकार नहीं कर पाती है और लड़कों को उस की न का सामना करना पड़ता है. ऐसे में लड़कों के लिए इस स्थिति का सामना करना मुश्किल हो जाता है. कई बार वे कुछ गलत कदम भी उठा लेते हैं जो दोनों के लिए बहुत नुकसानदेह हो जाता है. ऐसे में लड़कों व लड़कियों दोनों को संयम से काम लेना चाहिए.

न सुनने के लिए भी रहें तैयार

आप जब किसी से अपने दिल की बात कहते हैं तो ‘हां’ की उम्मीद के साथसाथ उस की ‘न’ सुनने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. जब आप ने उसे अपनी भावनाओं के बारे में बता दिया तो आप का इजहार करने का काम खत्म हो गया. अब इस के आगे आप कुछ नहीं कर सकते. आप को हमेशा मानसिक रूप से तैयार रहना होगा कि अगर सामने वाला आप के प्यार को अस्वीकार भी कर देगा तो आप टूटेंगे नहीं.

आप किसी से प्यार करते हैं तो इस में बुराई नहीं है, लेकिन अपने प्यार का नकारात्मक प्रभाव अपनी पढ़ाई या कैरियर पर न पड़ने दें. यह आप के जीवन को बरबाद कर देगा. किसी के इनकार के बाद भी आप के जीवन में बहुतकुछ है जिसे आप पा सकते हैं. उस में आप की कोई गलती नहीं थी, इसलिए जितनी जल्दी हो सके उसे भूल जाएं, क्योंकि वह आप के बिना ज्यादा खुश है. वह आप को नहीं चाहती.

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अगर आप उस की ‘न’ सुनने के बावजूद उस पर अपना प्यार थोपेंगे तो यह उस की भी खुशियां छीन लेगा. इसलिए उस के रास्ते से हट जाएं इस में ही आप दोनों खुश रहेंगे.

सही कदम उठाएं

किसी के बहकावे में आ कर कोई भी गलत कदम न उठाएं. इस से आप को कुछ हासिल नहीं होने वाला. इस से लोग आप पर हंसेंगे. आप के जीवन पर भी इस का बुरा प्रभाव पड़ सकता है. इसलिए इस घनचक्कर से निकलने की कोशिश करें. प्यार के अलावा भी आप के जीवन में बहुतकुछ है. इन सब को भुलाने के लिए खुद को काम में, पढ़ाई में या दोस्तों के साथ व्यस्त रखें.

समय हर जख्म को भर देता है. कुछ समय के बाद आप जिंदगी में नई शुरुआत कर पाएंगे. जिसे आप पसंद करते हैं उस के प्रति अपने मन में कोई मैल न रखें, न ही उस से बदला लेने की सोचें और न ही उस की जिंदगी को बरबाद करने की कोशिश करें.

अकसर लड़के प्यार में ‘न’ सुनने के तुरंत बाद किसी से भी प्यार करने के चक्कर में पड़ जाते हैं. यह पूरी तरह से भावुकता में लिया गया गलत फैसला है. ऐसे में खुद को थोड़ा समय दें और सोचसमझ कर किसी नए रिश्ते की शुरुआत करें.

सिर्फ इसलिए क्योंकि आप को अपना प्यार नहीं मिला, आप भी किसी और के साथ ऐसा करें, यह ठीक नहीं है. असल जिंदगी में फिल्मी तरीके न अपनाएं क्योंकि फिल्मों की कहानी काल्पनिक होती है जो जिंदगी की वास्तविकता से हमेशा मेल नहीं खाती है. गम दूर करने के नाम पर कभी नशे का सहारा न लें. यह आप की जिंदगी को बरबाद कर देगा.

त्रिकोणीय प्रेम से रहें दूर

दिल पर किसी का वश नहीं चलता. यह बहुत चंचल है, लेकिन कभीकभी यह चंचलता हमें ऐसी मुसीबत में डाल देती है जिसे हम जान कर भी अनदेखा कर देते हैं. त्रिकोणीय प्रेम का एक कारण यह भी होता है कि जब आप का अपने रिश्ते पर से भरोसा उठ जाता है और आप एक नए रिश्ते में बंधने की कोशिश करते हैं, जब ऐसे मुश्किल हालात सामने होते हैं तो यह समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि यह प्यार है या महज आकर्षण.

प्यार एक भावनात्मक रिश्ता

कोई कैसे अपने भावनात्मक रिश्तों के साथ खिलवाड़ कर सकता है. ऐसे ही रिश्तों की वजह से आज हमारे देश में लिवइन रिलेशन बढ़ता जा रहा है. सदियों से चली आ रही परंपराओं के अनुसार भी यह गलत है, क्योंकि एक रिश्ते के होते हुए दूसरा रिश्ता बनाना गुनाह है. भारत में इस तरह की परंपरा कभी नहीं रही, लेकिन अब यह हो रहा है. जिसे झुठलाया नहीं जा सकता.

यह मुमकिन है कि हम एक समय में 2 लोगों के प्रति एकजैसी भावनाएं महसूस करें, लेकिन जिंदगी भर दोनों रिश्तों का एकसाथ निभा पाना मुश्किल है. समय रहते अगर इसे सुलझाया नहीं गया तो आगे जा कर आप एक बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं. दरअसल, त्रिकोणीय प्रेम केवल एक आकर्षण के अलावा और कुछ भी नहीं है. इसलिए इस के चक्कर में न ही फंसे तो ज्यादा अच्छा है.

सोच बदलने की जरूरत

सवाल यह है कि अगर मामूली सा भी लड़के को किसी लड़की से कभी प्यार हो जाता है तो वह बलात्कार तो दूर की बात है, उस की मरजी के बिना उस को छूता भी नहीं है. हत्या करना तो दूर, उस को खरोंच भी नहीं आने देना चाहता. क्या कोई सच्चा प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ ऐसा करेगा. चाहे वह एकतरफा ही प्यार क्यों न हो, वह ऐसा कभी भी नहीं करेगा. अगर कोई भी सिरफिरा प्रेमी ऐसा करता है तो वह मानसिक रूप से बीमार है. उस का इलाज तो मनोचिकित्सक ही कर सकता है.

लेकिन ऐसी घटनाएं दिनोदिन क्यों बढ़ रही हैं, इस के पीछे कारण क्या है. इस का सब से बड़ा बुनियादी कारण है पुरुषवादी सोच जो महिला को दोयम दर्जे का मानती है. जो मानती है कि महिला पुरुष से कमजोर है, महिला का रक्षक पुरुष होता है, महिला को पतिव्रता होना चाहिए, महिला को पुरुष की सत्ता के अधीन रहना चाहिए, महिला को घर में चूल्हेचौके तक सीमित रहना चाहिए, बाहर निकलेगी तो ये घटनाएं होंगी ही.

पिछले दिनों राष्ट्रीय पार्टी के एक नेता ने बयान भी दिया था कि गाड़ी बाजार में आएगी तो ऐक्सीडैंट तो होगा ही. इसलिए तो 70 साल आजादी के बाद भी लड़कियां अपने को गुलाम महसूस कर रही हैं. इसी सोच को आज बदलने की जरूरत है.

प्यार की आखिरी मंजिल

यही प्रश्न हर प्रेमी से है, क्या प्यार की आखिरी मंजिल शादी है? अगर किसी कारण से शादी न हो तो आप उसे मार देंगे? आप उस से सामूहिक बलात्कार करेंगे? आप उस के चेहरे पर तेजाब डाल देंगे? अगर प्यार की आखिरी मंजिल सिर्फ शादी है तो आप उस से प्यार नहीं करते बल्कि उस पर कब्जा जमाना चाहते हैं. उसे आप अपना गुलाम बनाना चाहते हैं. उस पर आप अपना एकाधिकार चाहते हैं. वह किस से बात करे, कहां बैठे, कहां जाए, क्या खाए, क्या पहने, ये सब आप तय करना चाहते हैं.

यह प्यार नहीं गुलामी है. अगर वह आप की गुलामी का विरोध करे, आप के एकाधिकार का विरोध करे तो आप उस को सजा दोगे.

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यह आप की दबंगई नहीं तो और क्या है. क्या अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना अपराध है? इस में रूढि़वादी मातापिता भी साथ नहीं देते. अब तो हालात ये हैं कि अगर किसी लड़की ने प्यार करने की गलती की तो उस का अपने शरीर पर भी अधिकार नहीं रह जाता. उस का अपने दिमाग पर भी कोई अधिकार नहीं रहता. अगर वह अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेगी तो उस को इस की सजा भुगतनी पड़ेगी. यह सजा कभी मांबाप की तरफ से तो कभी प्रेमी की तरफ से मिलेगी. इसलिए अब प्रेम करना भी जान को जोखिम में डालना है.

प्यार का मतलब जानें

आज के युवक की नजर में प्यार का मतलब है कि वह लड़की सिर्फ उस के लिए बनी है. उस पर सिर्फ उन का हक है. उस को वह अच्छी लगती है. उस का चेहरा देखे बिना नींद नहीं आती है. उस का चेहरा दुनिया में सब से सुंदर है, लेकिन उस बेहतरीन जिस्म को, चेहरे को जब वह हासिल नहीं कर पाता तो वह उसे चाकू से गोद देता है, चेहरे को तेजाब से जला देता और उस के गुप्तांग में लोहे की छड़ घुसेड़ देता है.

ऐसा कैसे करते हैं युवक, कोई भी अपने सब से प्यारे व करीबी इंसान को ऐसे कैसे नष्ट कर सकता है. इस का मतलब वे प्यार नहीं करते. यह प्यार नहीं हवस है. आप प्यार करते समय तो एकदूसरे के लिए चांदतारे तोड़ने की बात करते हो, लेकिन लड़की ने एक इनकार क्या किया आप ने चांदतारों की जगह लड़की के शरीर को ही ईंटों से तोड़ दिया, गाड़ी से कुचल दिया.

वाह, क्या यही प्यार है. जिस ने आप को उस चर्मसुख की अनुभूति करवाई तुम ने उसी को लोहे की छड़ से गोद दिया. क्या किसी भी लड़की के इनकार की इतनी भयंकर सजा हो सकती है. अगर यही सजा वह लड़की तुम्हें दे तो कैसा रहेगा.

निचले तबके की लड़कियों पर ऐश करते रंगीनमिजाज बाबा

आसाराम, रामरहीम व फलाहारी बाबा के बाद रंगीनमिजाजी में एक और नाम वीरेंद्र दीक्षित का सामने आया. 21 दिसंबर, 2017 को पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर दिल्ली में उस की आध्यात्मिक यूनिवर्सिटी पर छापा मार कर दर्जनों लड़कियों को बाहर निकाला. उन में से कुछ लड़कियों ने मीडिया को बताया कि वह बाबा खुद को कृष्ण व उन्हें अपनी गोपियां बता कर गुप्त ज्ञान व प्रसाद देने के नाम पर उन के साथ मुंह काला करता था.

यह असर धर्म की उस अफीम का है, जिस की घुट्टी जीने से मरने तक कदमकदम पर लोगों को पिलाई जाती है. बेकार की बातों को हवा देने वाली तमाम ऊलजुलूल किस्सेकहानियां धर्म की किताबों में भरी पड़ी हैं. बातों की चाशनी चढ़ा कर प्रवचनों में उन्हें दोहराया जाता है. स्वर्ग व मोक्ष मिलने का लालच दे कर लोगों को बहकाया जाता है. सारे दुखों से छुटकारा मिलने का झांसा दे कर उन्हें भरमाया जाता है. इस से ज्यादातर लोग चालबाज बाबाओं की लुभावनी बातों में आ जाते हैं.

इन्हीं बातों के असर से धर्म के दलदल में डूबे लोग सहीगलत में फर्क करना भूल जाते हैं. अपनी बेटियों व पत्नियों को बाबाओं के आश्रमों में ले जा कर कुरबान कर देते हैं.

ऐसी लड़कियां व औरतें बाबाओं के चंगुल में फंस कर जबतब अपनी इज्जतआबरू गंवा देती हैं तो उन्हें बताया जाता है कि वे तो भगवान की हो चुकी हैं, बाहरी दुनिया पाप की गठरी है.

पीडि़त लड़कियों में से ज्यादातर लोकलाज व बलात्कारी बाबाओं व उन के गुंडों के डर से चुप्पी साध जाती हैं. अपनी जबान सिल कर वे हालात से समझौता कर लेती हैं. किसी से कोई शिकायत भी नहीं करतीं. गिरोह की कई मुफ्तखोर सदस्या तो खुद बाहर आने से इनकार कर देती हैं. इतना ही नहीं, उन पाखंडी बाबाओं के हक में बोलने व लड़ने के लिए वे खड़ी हो जाती हैं.

अपने पैर पर कुल्हाड़ी…

देश में तकरीबन 5 फीसदी अमीर, 10 फीसदी मझले व 85 फीसदी गरीब हैं. ये पाखंडी बाबा ज्यादातर निचले व मझले तबके के कम पढ़े लोगों को अपना शिकार बनाते हैं. ज्योतिषी, तांत्रिक व बाबा जानते हैं कि माली तौर परकमजोर लोग ही समस्याओं से ज्यादा घिरे रहते हैं. ऊपर से उन का खुद पर यकीन भी नहीं होता इसलिए वे टोनेटोटके, गंडेतावीज, बाबाओं की मेहरबानी व चमत्कारों में अपने मसलों का हल ढूंढ़ते हैं.

जिस तरह बहुत ज्यादा महंगी गाडि़यां बनाने वाली कंपनियां टैलीविजन पर अपने इश्तिहार इसलिए नहीं देती हैं कि इतनी महंगी गाडि़यां खरीदने वालों के पास टैलीविजन देखने का समय नहीं होता है, उसी तरह पाखंडी बाबा भी ऊंची जाति के रसूखदार व अमीर लोगों को अपना शिकार कम ही बनाते हैं, क्योंकि एक तो वे जल्दी से हर किसी के झांसे में नहीं आते, ऊपर से बाबाओं को भी अपनी पोल खुलने व पकड़े जाने का डर रहता है.

नीचे से ऊपर छलांग

निचले व मझले तबके के ज्यादातर लोग अमीर लोगों की बराबरी के सपने देखते रहते हैं. धर्म के मनगढ़ंत प्रचार से उन्हें लगने लगता है कि करामातों से उन के दुखदर्द मिट जाएंगे. ये बाबा उन की दुनिया बदल देंगे, इसलिए अकसर उपायों के नाम पर वे छलांग लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं, चाहे इस के लिए उन्हें कुछ भी कुरबानी क्यों न देनी पड़े.

बहुत से मक्कार बाबाओं के चेलेचपाटे भोलेभाले भक्तों को पटाने में लगे रहते हैं कि तुम तो बहुत खुशनसीब हो. तुम्हारी लड़की को बाबा ने अपनी सेवा के लिए चुना है. ऐसा तो हजारोंलाखों में से किसी एक के साथ होता है. तुम्हें तो खुश होना चाहिए. तुम्हारा नाम होगा. तुम्हारी सारी पुश्तें तर जाएंगी. तुम पर बाबा की खास कृपा बरसेगी.

कई लोग इसी झूठी शान, भरम व अपने भले की उम्मीद में मौत के कुएं में छलांग लगा लेते हैं. धोखेबाज बाबाओं पर भरोसा कर के वे अपने मासूम बीवीबच्चों को उन की शरण में छोड़ देते हैं.

कई बार बाबाओं की ऐश व दौलत देख कर कुछ निकम्मे लोग खुद भी वैसा बनने के सपने देखने लगते हैं. उन्हें आत्मा व परमात्मा के ज्ञान का दौरा सा पड़ने लगता है. किसी के मिलते ही वे उसे ज्ञान देने लगते हैं. यह बात अलग है कि उन के ये हवाई किले पूरे नहीं हो पाते. सभी लोग बाबा तो नहीं बन पाते, लेकिन उन के पक्के चेले जरूर हो कर रह जाते हैं. ये चेले बाबाओं की दुकानदारी चलाने व उसे आगे बढ़ाने में मदद करते हैं.

कथा, कीर्तन, प्रवचन करने और आश्रम वगैरह चला कर धनदौलत कमाने वालों की गिनती तेजी से बढ़ रही है.

इस की अहम वजह धर्म के धंधों में बढ़ती चकाचौंध है, इसलिए बहुत से लड़केलड़कियां गेरुए कपड़े पहन कर जल्दी पैसा बनाने की ओर बढ़ रहे हैं. कम उम्र के बहुत से लड़केलड़कियां ऊंचेऊंचे स्टेज से कथाप्रवचन और जागरण कर के माल बटोर रहे हैं.

अब पछताए होत क्या…

धर्म का कारोबार करने वाले धंधेबाज बड़े ही शातिर होते हैं. ये भोलेभाले लोगों में से छांटछांट कर अपने चेलाचेली बना लेते हैं. हद से ज्यादा गरीबी, तालीम व जागरूकता की कमी धर्मांधता की आग में घी का काम करती हैं. मसलन माली तंगी होने से

कई लोग लड़की को आज भी बोझ मानते हैं, इसलिए कई मांबाप तो मुफ्त में पढ़ाईलिखाई कराने के लालच में पहले लड़कियों को बाबाओं के आश्रमों में भेज देते हैं, बाद में हंगामा करते हैं.

दरअसल, जवान लड़कियां छांट कर अपनी हवस मिटाने की गरज से पाखंडी बाबाओं ने जाल फैला रखे हैं. धार्मिक तालीम देने के नाम पर उन्होंने अपने आश्रमों में 12वीं जमात तक के कन्या इंटर कालेज खोल रखे हैं.

ज्यादातर निकम्मे, नशेड़ी व गैरजिम्मेदार लोग अब लड़कियों को पालना भी बड़ा मुश्किल काम समझते हैं. इस के बाद उन की शादी करना व दहेज देना उन्हें झंझट लगता है, इसलिए कई बार छुटकारा पाने के लिए भी कुछ लोग अपनी लड़कियों को बाबाओं के आश्रमों में भेज कर बेफिक्र हो जाते हैं.

शिकार की तलाश में मक्कार बाबाओं व उन के चालबाज चेलों का बहुत से घरों में आनाजाना लगा रहता है. भोलीभाली औरतें धार्मिक कर्मकांड, दोष, दुर्भाग्य, नरक व पाप के नाम पर डरीसहमी रहती हैं. वे बाबाओं के दिमाग में घूम रहे शैतान व हैवान को नहीं पहचान पातीं और उन के झांसे में आ कर पैसा व आबरू दोनों गंवा देती हैं.

फैलता जाल

देश के हर हिस्से में शिरडी के सांईं बाबा, वैष्णो देवी, शनि महाराज व बालाजी वगैरह के नाम पर नएनए मंदिर और बाबाओं के आश्रम बढ़ रहे हैं, इसलिए उन के महंतों व पाखंडी बाबाओं की गिनती व उन का जाल भी बढ़ रहा है.

बहुत से शहरोंकसबों में अकसर बाबाओं के कथाप्रवचन होते रहते हैं. खातेपीते घरों की औरतें व मर्द अपने घर में काम छोड़ कर इन बाबाओं के प्रवचन सुनने चले जाते हैं, फिर उन से कान में नाम व मंत्र की दीक्षा लेते हैं.

धर्म की आड़ में बलात्कार करने वाले कई बाबाओं का गिरोह बहुत बड़ा है. शिकायत व जांच के बाद जब ये फंस जाते हैं तो इन के गुंडे शिकायत करने वालों को धमकाते हैं, गवाहों को मार तक देते हैं.

आसाराम के केस में अब तक कई गवाह मारे जा चुके हैं. आसाराम को सलाखों के पीछे पहुंचाने वाली लड़की को भी बदनाम करने व मार देने की धमकी मिली थी, इसलिए उसे 20 दिसंबर, 2017 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में आसाराम व उस के 11 गुरगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराना पड़ा और सरकार को उस की सिक्योरिटी बढ़ानी पड़ी.

नकेल कसना जरूरी

अपने धन बल व भक्तों की भीड़ वाले वोट बैंक के चलते ज्यादातर नेता इन बाबाओं के तलवे चाटते हैं. भ्रष्ट व कमजोर अफसर इन के खिलाफ सख्त कदम उठाना तो दूर जांच करने से भी कतराते हैं.

ये हैं उपाय

बाबाओं के चक्कर में फंस चुके तमाम लोग आज भी थानाकचहरी के चक्कर काटकाट कर परेशान हैं. उन की बहूबेटियां बरसों से इन दरिंदों के आश्रमों में कैद हैं, मारी जा चुकी हैं या लापता हैं. ये गुनाहगार हत्यारे उन के दस्तखत से जबरन या बहलाफुसला कर लिखाए गए हलफनामों की आड़ में बचने की नाकाम कोशिशें करने में लगे रहते हैं.

पिछले दिनों मेरठ का एक बाबा अपने एक चेले की जवान व बेऔलाद बीवी को औलाद देने का झांसा दे कर अपने साथ ले कर भाग गया.

इतना ही नहीं, पाखंडी बाबा आज भी जेल से बाहर अपना कारोबार धड़ल्ले से चला कर अपनी ऐशगाहों में मौज मार रहे हैं. भोलेभाले भक्त उन पर अंधा भरोसा कर के भेड़ों की तरह मुंड़ रहे हैं.

इस में कुसूर धर्म प्रचार व लोगों की लापरवाही का है. पाखंडी बाबाओं को पकड़ने के ज्यादातर मामले कोर्ट के आदेश से खुले हैं. गैरसरकारी संगठन व महिला आयोग को पहल करनी चाहिए ताकि ढोंगियों व पाखंडियों को उन के किए की सजा मिले, वरना अनगिनत पाखंडी बाबा धर्म की आड़ ले कर अपना घर भरते रहेंगे. वे भोलेभाले लोगों के घर इसी तरह बरबाद करते रहेंगे.

अब तो धर्म का सहारा ले कर कई सालों से सत्ता पाई जा रही है और ऐसे में कौन सी सरकार इन बाबाओं पर नकेल कसेगी? ये तो नेताओं और अफसरों की तरह चाहे जैसे मरजी जनता की जेबें काटेंगे.

भीमा कोरेगांव का दंगल और सहिष्णु भारत में असहिष्णु बनते लोग

भीमा कोरेगांव 2 जगहों के नामों के मेल से बना है. भीमा नदी का नाम है, जो कोरेगांव नाम के एक गांव से गुजरती है, इसीलिए इस गांव को भीमा कोरेगांव कहा जाता है.

यह गांव पुणे से 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. इस गांव में एक स्मृतिस्तंभ है, जिसे अंगरेज सरकार ने बनवाया था. इस स्तंभ को विजयस्तंभ या शौर्यस्तंभ भी कहा जाता है. इस शौर्यस्तंभ को देखने के लिए हर साल 1 जनवरी को महाराष्ट्र के दूरदराज से लोग आते हैं. आजकल तो देश के दूसरे हिस्सों से भी लोग यहां आने लगे हैं.

इस साल भी 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव का शौर्यस्तंभ बनने के 200 साल पूरे होने के मौके पर लाखों लोग आ रहे थे, लेकिन कुछ कट्टर लोगों ने भीमा कोरेगांव को योजना बना कर दंगल का मैदान बना दिया.

ऐसे में भीमा कोरेगांव के वीरता से भरे इतिहास के बारे में जानना बेहद जरूरी है कि आखिर क्यों देश का दलित तबका इस शौर्यस्तंभ को अपनी विजयगाथा के रूप में देख रहा है? क्या है भीमा कोरेगांव का इतिहास?

भीमा कोरेगांव की जड़ें सामाजिक नाइंसाफी और वर्ण?व्यवस्था से जुड़े जोरजुल्म से संबंध रखती हैं. सन 1680 में शिवाजी की हत्या और उन के बेटे संभाजी के 1689 में औरंगजेब द्वारा मारे जाने के बाद उन के राज्य को उन के ब्राह्मण सलाहकार पेशवाओं ने हड़प लिया था. सत्ता में आते ही देशस्थ ब्राह्मण पेशवाओं ने वर्ण व्यवस्था का कड़ाई से पालन करने का हुक्म दिया था.

दलितों को मंदिरों व तालाब में जाने और पढ़ाईलिखाई करने की मनाही थी. दलितों द्वारा किसी ऊंची जाति वाले को छू लेना पाप समझा जाने लगा था. दलितों के रास्ते पर चलते समय थूकने के लिए गले में मटका और रास्ता साफ करने के लिए कमर पर झाड़ू बांधी जाती थी. उन्हें 12 बजे के पहले और 3 बजे के बाद रास्ते से गुजरना मना था. उन्हें गांव के बाहर बदहाली में रहना पड़ता था.

अगर कोई दलित मंदिरों के आसपास भी दिखता था तो उस को सजा देने का पेशवा का हुक्म था. अगर रास्ते में कोई ब्राह्मण मिलता था तो दलितों को पेट के बल जमीन पर लेट कर हाथ जोड़ने का नियम था. बाजीराव के समय अगर कोई भी दलित पेशवा के तालीमखाने के सामने से गुजरता था, तो गुलटेकडी के मैदान में उस दलित के सिर को गेंद और तलवार को डंडा बना कर खेल खेला जाता था.

बांबे गजट 1884-85 में लिखा है कि अगर कोई भी दलित गांवों में कुएं के पास से गुजरेगा तो उस की छाया कुएं पर न पड़े, इस डर से उसे घुटने के बल चलना पड़ता था. दलितों पर कोई भी जुल्म हो, उसे उन्हें सहना पड़ता था. वे किसी के पास गुहार नहीं लगा सकते थे. उन के पास कुछ भी हक नहीं थे. नए किले, इमारत, पुल, तालाब के बनने के समय पायाभरणी में दलितों की बलि दी जाती थी. यह बड़ी दर्दनाक प्रथा थी. लोककथाओं में इस का साफतौर पर जिक्र किया गया है. उस समय उन्हें दलित नहीं कहा जाता था.

लेकिन दलितों के पास जुल्मों को सहन करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वजह, वे मालीतौर पर लाचार थे. पर कोई भी तबका ऐसी बेइज्जती और नाइंसाफी कब तक सहेगा? किसी का साथ मिलने के बाद वह आवाज तो उठाएगा ही. उन के दिमाग में बैठा दिया गया था कि यह दंड उन्हें पिछले जन्म के पापों के कारण मिले हैं.

तब दलितों (महारों) की अपनी अलग फौज थी. वे लड़ाके थे, लेकिन व्यवस्था से पूरी तरह जकडे़ हुए थे. लड़ाई के समय भी उन्हें ऊंची जाति के सैनिकों को छूना मना था. उन के तंबू अलग बने होते थे. उन का खाना अलग पकाया जाता था. राजा अपने राज्य की सीमाएं बढ़ाने के लिए आपस में लड़ाई करते थे. जैसे हिंदू राजाओं के पास मुसलिम सैनिक थे, वैसे ही मुसलिम शासकों के पास हिंदू सैनिक हुआ करते थे. उन्हें जहां इज्जत और अच्छी तनख्वाह मिल जाती थी, वहां वे नौकरी करते थे. धर्मांधता लोगों पर हावी नहीं थी.

1 जनवरी, 1818 को अंगरेजों और बाजीराव पेशवा द्वितीय के बीच नदी के किनारे कोरेगांव में लड़ाई होने वाली थी. लड़ाई से पहले दलितों (महारों) ने पेशवाओं के सामने एक प्रस्ताव रखा था कि अगर हम आप के साथ मिल कर अंगरेजों के खिलाफ लड़ते हैं, तब हमारे सामाजिक हालत में बदलाव होगा और इनाम के तौर पर जमीन देने की पेशकश रखी गई थी. लेकिन पेशवाओं ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था. आखिर में महार सैनिकों ने अंगरेजों के साथ मिल कर पेशवाओं के खिलाफ लड़ने का फैसला किया था.

इस लड़ाई में अंगरेजों के साथ केवल 500 महार सैनिक थे. इन महार सैनिकों ने पेशवा की 25000 सैनिकों की फौज को हराया था. इस लड़ाई में बहुत से महार सैनिक मारे गए थे. इन सैनिकों की याद में अंगरेजों ने भीमा कोरेगांव में एक शौर्यस्तंभ खड़ा किया था, जिस पर 22 महार सैनिकों के नाम लिखे गए थे. इस तरह दलितों ने अपनी बेइज्जती और नाइंसाफी का बदला लिया था.

इन महार सैनिकों को नमन करने के लिए डाक्टर भीमराव अंबेडकर हमेशा 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव जाते थे. उन के बाद उन के अनुयायी हर साल वहां जाने लगे.

पेशवा के राज के बाद वहां के दलितों के सामाजिक और माली हालात में बदलाव आना शुरू हुआ था. अंगरेज शासक भारत में केवल दलितों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बहुजन समाज को आगे बढ़ाने के लिए बेहतर शासक साबित हुए थे. उन के समय से बहुजन समाज में सामाजिक, माली व धार्मिक बदलाव होने शुरू हो गए थे. उन्हें पढ़नेलिखने के मौके हासिल हुए थे. आगे चल कर आजाद भारत में संविधान द्वारा उन्हें वे हक मिलने लगे थे, जिन्हें सदियों से मनुस्मृति ने जकड़ रखा था.

धर्मशास्त्रों से बहुजनों को मिले छुटकारे से धर्म के ठेकेदारों और शास्त्रों की हिमायती जमात को झटका लगा था. उन्हें अपनी पुरानी मनुवादी सोच को मजबूत करना था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बनने को इसी नजरिए से देखना चाहिए.

आज संघ और उस की कई शाखाओं ने देश के सामने वही माहौल खड़ा करने की कोशिश की है. दूसरे दलों के बहुत से नेता भी इसी सोच के हैं, पर वोटों की खातिर चुप रहते हैं.

1 जनवरी, 2018 से 5 दिन पहले वढू गांव में गोविंद गणपत गायकवाड़ की समाधि की छत को शिवप्रतिष्ठान हिंदुस्तान के कार्यकर्ताओं ने तोड़ दिया था. संभाजी भिड़े ने इस संस्था शिवप्रतिष्ठान को बनाया है.

जब औरंगजेब के हुक्म पर शिवाजी महाराज के बेटे संभाजी महाराज को पकड़ कर उन को मार कर नदी में फेंक दिया था तो उसी गोविंद गणपत गायकवाड़ ने नदी में उतर कर संभाजी महाराज के शरीर के टुकड़ों को जमा किया था और उन टुकड़ों को सिल कर उन्हें जलाया गया था. उसी जगह पर संभाजी महाराज की समाधि बनाई गई थी. गोविंद गायकवाड़ की समाधि भी वढू गांव में संभाजी महाराज की समाधि के पास बनी है.

संभाजी भिड़े के शिवप्रतिष्ठान द्वारा इस के विरोध में प्रचार किया जा रहा है. कुछ गांव वालों के मुताबिक, जब समाधि की छत तोड़ी गई तब यहां पर दंगा कराने की धमकी दी गई थी.

भीमा कोरेगांव के शौर्यस्तंभ पर महार सैनिकों को नमन करने के लिए महाराष्ट्र और देश के अनेक राज्यों से 1 जनवरी, 2018 को लोग आने लगे थे. इस साल शौर्यस्तंभ के 200 साल पूरे होने के मौके पर ज्यादा लोग आ रहे थे. इन लोगों पर अचानक मनोहर उर्फ संभाजी भिड़े के शिवप्रतिष्ठान और हिंदू एकता के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे के कार्यकर्ताओं द्वारा पहले से योजना बना कर हमला किया गया. इस हमले में 40 गाडि़यों को तोड़ा और जला दिया गया. पत्थरबाजी में अनेक बच्चे, औरतें और मर्द घायल हो गए. एक आदमी की जान भी चली गई.

इस बवाल की वजह रहे मनोहर उर्फ संभाजी भिड़े और हिंदू एकता के अध्यक्ष मिलिंद एकबोटे. उन के ऊपर एट्रोसिटी ऐक्ट के तहत एफआईआर दाखिल हो गई, लेकिन अभी तक उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है. पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक उन पर पहले भी मामले दर्ज हुए हैं.

संभाजी भिड़े व मिलिंद एकबोटे हिंदुत्व का सहारा ले कर मराठा नौजवानों को मुसलिमों और दलितों के खिलाफ भड़का रहे हैं. उन को झूठा, मनगढं़त इतिहास बताया जा रहा है.

संभाजी भिड़े के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी शामिल हो चुके हैं, इसीलिए शायद उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है. आखिर आतंक फैलाने वाले ऐसे लोगों को क्यों बचाया जा रहा है? क्या दलितों पर हुए हमले को सरकारी समर्थन हासिल है?

आज तक कभी भी भीमा कोरेगांव के लोगों ने 1 जनवरी को अपनी दुकानें बंद नहीं की थीं, लेकिन इस साल गांव में बंद रखा गया. इतना ही नहीं, ग्राम पंचायत द्वारा बाकायदा गांव में बंद रखने का प्रस्ताव पास किया गया. लोगों को मारने के लिए पहले ही पत्थर लाए गए थे. दंगाइयों के हाथों में भगवा झंडे थे. वायरल हुए वीडियो में दंगा करने वाले लोग पुलिस प्रशासन अपने साथ होने का दावा कर रहे थे. ब्राह्मणी व्यवस्था व मीडिया ने इसे दलित बनाम मराठा और दलित बनाम हिंदू का रूप दिया.

दलितों पर हुए हमले के विरोध में और संभाजी भिड़े व मिलिंद एकबोटे को गिरफ्तार करने के लिए दलित संगठनों द्वारा महाराष्ट्र में बंद रखा गया. यह बंद भीमा कोरेगांव के निहत्थे लोगों पर किए गए हमले के विरोध में था, लेकिन पुलिस ने बंद में शामिल लोगों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाला, उन के ऊपर केस दर्ज किए गए. मीडिया ने भीमा कोरेगांव के इस कांड को जानबूझ कर नहीं दिखाया. सच को दबाने की कोशिश की गई. उलटे दलितों को ही इस का जिम्मेदार बताया जाने लगा.

भीमा कोरेगांव दंगे के विरोध में जिन लोगों ने आंदोलन किया, उन्हें कौंबिंग आपरेशन द्वारा पकड़ा जा रहा है, लेकिन जिन्होंने दंगा शुरू किया उन्हें अभी तक पकड़ा नहीं गया है. वे न केवल खुलेआम घूम रहे हैं, बल्कि कुछ को पुलिस प्रोटैक्शन दी गई है.

उत्तर प्रदेश के चंद्रशेखर आजाद ने दंगाइयों के विरोध में अपनी हिफाजत के लिए आवाज उठाई तो उन पर रासुका लगा दिया गया. गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवाणी ने मनुवादियों के खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें देशद्रोही कहा गया.

क्या भारत भी अब धार्मिक तालिबानी सोच की ओर बढ़ रहा है? सहिष्णु भारत में लोग असहिष्णु बन रहे हैं. देश के दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़ा वर्ग को इस स्थिति से निबटने के जवाब ढूंढ़ने होंगे.

देश में होती लड़कियों की कमी, कहीं आपकी शादी भी न अटक जाए

देश बदल रहा है. शहरों में ही नहीं बल्कि गांवों में भी अब शादी के लिए लड़कियों की कमी होने लगी है. इस से लड़कों की शादियां अटक रही हैं. ज्यादातर परिवारों में लड़कियों की तादाद कम होने लगी है. एक लड़की या एक लड़के से ही परिवार पूरा होने लगा है. गांवों में रहने वाले परिवार अब शहरों में पहुंच गए हैं. ऐसे में आम परिवार की लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं.

गांव के किसी स्कूल को देखेंगे तो साफ हो जाएगा कि वहां पढ़ने वालों में लड़कियों की तादाद ज्यादा होती जा रही है. ऐसे में अब मांबाप अपनी लड़कियों की शादियां करने के लिए लड़के को ही नहीं बल्कि उस के परिवार की माली हालत को भीदेखतेपरखते हैं. ऐसे में कम काबिल लड़कों की शादियां नहीं हो रही हैं. उत्तर भारत के कुछ राज्यों खासतौर पर हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लड़कों के सामने ऐसे हालात बनने लगे हैं.

ऐसे में ये लड़के दूर के प्रदेशों से खरीद कर लड़कियां लाते हैं और उन से शादी कर लेते हैं. गैर प्रदेशों से लाई गई लड़कियों में यह सुविधा रहती है कि वे इन के पास गुलामों की तरह रहती हैं.

दरअसल, उत्तर भारत के ये प्रदेश मर्दवादी सोच से प्रभावित होते हैं. वे औरतों को बराबरी का दर्जा नहीं देना चाहते. इस वजह से उन के लिए खरीद कर लाई गई लड़कियां शादी के लिए सब से उपयोगी होती हैं.

खरीद कर लाई लड़कियों से शादी करने वालों में ऐसे लोग भी होते हैं जो कम उम्र में शादी करने के बाद अकेले हो गए. उन में से कुछ का पत्नी से विवाद हो गया या पत्नी छोड़ कर चली गई या फिर पत्नी की मौत हो गई. ऐसे में दूसरी शादी के लिए खरीद कर लाई गई लड़कियां उन्हें सही लगती हैं.

इस तरह के लड़कों में हर जाति और धर्म के लोग हैं. सब से ज्यादा खराब हालत पिछड़ी जातियों की है. पिछड़ी जातियों की रोजीरोटी पहले खेती पर ही टिकी होती थी. आज भी ये परिवार खेती पर ही टिके हैं. पर अब खेती में मुनाफा कम होने लगा है. ये परिवार खेती को छोड़ कर शहरों में बस रहे हैं. ऐसे में ये काफी गरीब होते जा रहे हैं. अब इन परिवारों के लड़कों को लड़की खरीद कर शादी करना आसान लगने लगा है.

हरियाणा और पंजाब में कई सालों से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं. ज्यादातर ऐसे मामले तभी सामने आते हैं जब किसी तरह का कोई झगड़ा हो या फिर मामला पुलिस तक पहुंच जाए.

आमतौर पर खरीदी गई लड़की से शादी करने वाले लोग समाज के सामने इस बात को नहीं मानते हैं कि लड़की खरीदी गई है. ये लोग चोरीछिपे शादी करते हैं. लड़की को अपने घरों में छिपा कर रखते हैं.

ये लोग शादी के लिए ऐसी लड़की पसंद करते हैं जो इन के जैसी दिखती हो. यही वजह है कि दक्षिण भारत के प्रदेशों की लड़कियों को यहां नहीं लाया जाता. पश्चिम बंगाल और असम की जगह बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ की लड़कियां ज्यादा पसंद की जाती हैं. वहां की लड़कियां हिंदी बोल और समझ लेती हैं. उन का रंग भी साफ होता है. ऐसे में कुछ ही दिनों में वे यहां का रहनसहन सीख कर परिवार के बीच हिलमिल जाती हैं. समाज को यह बताना आसान होता है कि वह किसी दूर के रिश्तेदार की लड़की है.

यही वजह है कि लड़की खरीद कर शादी करने के मामले में बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ की लड़कियां ज्यादा डिमांड में होती हैं.

दूसरा पहलू यह भी है कि शादी के नाम पर खरीदी गई लड़कियों में बहुत सी कई बार आगे बेच दी जाती हैं, जो जिस्मफरोशी के बाजार में पहुंच जाती हैं.

जानकार मानते हैं कि पहले बेची गई लड़कियां केवल जिस्मफरोशी के बाजार में ही जाती थीं, पर अब वे शादी कर के दुलहन भी बनने लगी हैं. लड़की के परिवार के लिए यह माने नहीं रखता कि वह कहां जा रही है. वे तो गरीबी से छुटकारा पाने के लिए अपनी लड़की को बेचने की कोशिश करते हैं. ऐसे ज्यादातर मामले सामने नहीं आते.

निशाने पर गरीब प्रदेश

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में कुनकुनी थाने में एक  आदिवासी लड़की ने शिकायत दर्ज कराई कि उसे नौकरी दिलाने के नाम पर ओडिशा ले जाया गया. वहां उस से जबरन शादी कर के बाद में जिस्मफरोशी के धंधे में उतार दिया गया.

पता चला कि यह ऐसी अकेली घटना नहीं है, बल्कि तमाम लड़कियों को नौकरी के नाम पर बाहर ले जाया जाता है और वहां उन को शादी का झांसा दे कर फंसाया जाता है.

छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि ओडिशा, आंध्र प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मध्य प्रदेश और बिहार राज्यों से लड़कियों को किसी न किसी तरह का लालच दे कर दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है, जहां पर वे नौकरी करने जाती हैं. इस के बाद इन लड़कियों को शादी से ले कर जिस्मफरोशी तक के जाल में फंसा दिया जाता है. कई बार ऐसी लड़कियां घरेलू नौकरानी बन कर जोरजुल्म का शिकार होती हैं.

उत्तर भारत के कुछ राज्यों जैसे हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में लड़कियों की कमी है. कई नौजवानों की तो लड़कियों की कमी की वजह से शादियां अटकी होती हैं. ऐसे में वे लोग गरीब और आदिवासी प्रदेशों से लड़कियों की खरीदारी करते हैं.

गरीब और आदिवासी प्रदेशों में कई ऐसी प्लेसमैंट एजेंसियां हैं जो नौकरी दिलाने के नाम पर लड़कियों को दूसरे प्रदेशों में भेजती हैं. ये प्लेसमैंट एजेंसियां अब नौकरी के बजाय शादी के लिए लड़कियों को बाहर भेजने लगी हैं.

ये लोग लड़कियों के घर वालों को समझाते हैं कि लड़की नौकरी के लिए जा रही है. इस के बदले में उन को कभीकभी एकमुश्त और कभीकभी हर महीने पैसे पाने का लालच दिया जाता है.

बड़े शहरों में जाने वाली लड़कियां घरेलू नौकरी करती हैं या फिर जिस्मफरोशी के बाजार में पहुंच जाती हैं. अब छोटेबड़े शहरों के साथसाथ गांव और कसबों में यहां की लड़कियां जाने लगी हैं. ये लोग शादी के नाम पर लड़कियों को ले जाते हैं. असल में इन जगहों पर अब लड़कियों की कमी होने लगी है.

बेरोजगार, नशेड़ी और बिगड़ैल किस्म के लड़कों को अपने समाज की अच्छी लड़कियां शादी के लिए नहीं मिल रही हैं. ऐसे में गरीब लड़कियों को खरीद कर शादी करना उन की मजबूरी हो गई है.

गरीबी है वजह

शादी के लिए खरीद कर आने वाली लड़कियां गरीब परिवारों से होती हैं. वे शादी के बाद हर तरह का जोरजुल्म सहने को तैयार होती हैं. कम उम्र की लड़कियां बड़ी उम्र के मर्दों के साथ शादी करने को तैयार हो जाती हैं. इन मर्दों को अपने समाज की लड़कियां नहीं मिलतीं.

गरीब प्रदेशों की रहने वाली लड़कियों के मातापिता कुछ हजार रुपयों के लालच में अपनी लड़की बाहर भेज देते हैं. उन को इस बात का सुकून होता है कि उन की लड़की भूखी नहीं मरेगी और उन को भी कुछ पैसे मिल जाएंगे. इस काम में लड़की के परिवार को तैयार करने का काम वहां उन के ही समाज के लोग और नातेरिश्तेदार करते हैं.

असम से आई एक लड़की लखनऊ के एक परिवार में रहती है. वह सही से हिंदी भी नहीं बोल पाती है. पहले यह लड़की एक घरेलू नौकर बन कर आई थी, बाद में वहीं एक आदमी उस से शादी करने को तैयार हो गया.

वह लड़की बताती है, ‘‘मेरे घर में रहने के लिए एक छप्पर भी सही तरह का नहीं था. साल में कुछ महीने ही हम भरपेट खाना खाते थे. मेरी 5 बहनें हैं. मेरी बड़ी बहन कोलकाता गई थी. वहां से जो पैसे मिले उस से एक छप्पर वाला मकान बना था.

‘‘जब मैं बड़ी हुई तो मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे यहां भेज दिया. मैं सालभर में कुछ पैसे अपने घर भेजती थी. 3 साल में मैं ने यहां का रहनसहन सीख लिया. अब कुछकुछ हिंदी बोल लेती हूं.

‘‘जब मैं यहां आई थी तब मेरी उम्र 14 साल थी. मेरे मालिक बहुत अच्छे थे. मेरे पति उन के घर आतेजाते थे. उन्होंने इच्छा जाहिर की थी कि वे मुझ से शादी करना चाहते हैं. इन 4 सालों में मैं अपने घर कभी नहीं गई. मेरे घर वाले शुरू में कभीकभी मेरे बारे में पूछते भी थे, पर अब कोई नहीं आता. जो पैसे मैं उन्हें भेजती थी, यह भी नहीं पता कि वे उन तक पहुंचते भी थे या नहीं. हो सकता है कि अब मेरी छोटी बहन को भी कहीं भेज दिया हो.

‘‘मैं ने शादी की बात मान ली. मैं शादी कर के बहुत खुश हूं. मेरे लिए शादी के साथ घरपरिवार का मिलना ही बड़ी बात है. मेरे लिए पति की उम्र का कुछ साल बड़ा होना माने नहीं रखता. यहां लोग बोलते हैं कि खरीद कर लाई लड़की से शादी हुई है.

‘‘यह सुन कर अजीब लगता है. पर यह उस दुख से काफी बेहतर है जो गरीबी में अपने परिवार में सहन करने पड़े थे. घरेलू नौकर से अब मैं शादीशुदा हो गई. मुझे एक पहचान मिल गई. मैं बाकी बातें भी भूल जाऊंगी और धीरेधीरे बाकी लोग भी शायद भूल जाएंगे.

‘‘गरीब लड़कियों के लिए देह धंधे के दलदल में जाने से बेहतर है कि वे किसी जरूरमंद से शादी कर के उस का घर बसा दें.’’

कई बार बिकती हैं

छत्तीसगढ़ में अपनी संस्था के साथ आदिवासी इलाकों में काम कर रहे समाजसेवी दीनानाथ कहते हैं, ‘‘लड़की के घर वालों को केवल पैसों से मतलब होता है. जहां ज्यादा पैसा मिलता है, वे वहां लड़की भेजने को तैयार हो जाते हैं. हम लोग भी इन बातों को समझते हैं.

‘‘हम लड़कियों के मांबाप को समझाते हैं कि नौकरी के नाम पर भेजने से अच्छा है कि शादी के लिए लड़की को भेज दो. शादी कम से कम 18 साल की उम्र में होती है. मांबाप इस उम्र तक लड़की को घर में रख ही नहीं पाते.

‘‘यहां की लड़कियां ज्यादा से ज्यादा 13 से 15 साल की उम्र में ही बाहर चली जाती हैं. कुछ मांबाप तो 10 साल की उम्र में ही लड़की को बाहर भेजने को तैयार हो जाते हैं.

‘‘ऐसे में कई परिवार अपने लड़के से आधी उम्र की लड़की को ले जाते हैं, फिर कुछ सालों के बाद उन की शादी करा देते हैं. शादी की उम्र होने तक कई बार तो ये लड़कियां कईकई बार बिक चुकी होती हैं.

‘‘सैक्स के नाम पर इन्हें तरहतरह के समझौते करने पड़ते हैं. एक रात में कईकई ग्राहकों को खुश करना पड़ता है. कुछ ही सालों में ये बूढ़ी हो जाती हैं. उन्हें जिंदगी में कभी घरपरिवार का सुख नहीं मिलता, जबकि खरीदी गई दुलहन को शादी के बाद हर सुख मिलता है. ऐसे में शादी के लिए बिकना ज्यादा पसंद किया जा रहा है.’’

छत्तीसगढ़ सरकार ने प्राइवेट प्लेसमैंट एजेंसी ऐक्ट 2013 तैयार किया है. अगस्त, 2014 में इसे लागू भी किया गया. इस के बाद भी अभी तक प्लेसमैंट एजेंसियां अपनी तरह से ही काम कर रही हैं. वे अब मानव तस्करी के अड्डे बन गई हैं.

लड़कियों की खरीदफरोख्त के मामले में पश्चिम बंगाल पहले, ओडिशा दूसरे और छत्तीसगढ़ तीसरे नंबर पर आता है.

एक निजी संस्था द्वारा किए गए सर्वे से पता चलता है कि छत्तीसगढ़ का जशपुर इलाका लड़कियों की खरीदफरोख्त का बहुत बड़ा अड्डा बन गया है. जिले से हर साल तकरीबन 7 हजार लड़कियों को बड़े शहरों में खरीदाबेचा जाता है.

267 गांवों के सर्वे में यह भी सामने आया है कि 70 फीसदी लड़कियां नाबालिग थीं. बाकी भी 18 साल के आसपास थीं. लड़कियों के बेचने में उन के जानपहचान वाले होते हैं. लड़कियों के मांबाप को भी यह पता होता है कि अब लड़की को वापस नहीं आना है.ऐसे में वे एकमुश्त पैसे लेने का काम करते हैं.

शादियों से बदले हालात

समाजसेवी दीनानाथ कहते हैं, ‘‘पहले जहां लड़कियां केवल बिकने के बाद जिस्मफरोशी के बाजार में जाती थीं, वहीं अब वे शादी के लिए भी खरीदी जाने लगी हैं. ऐसे में गरीब लड़कियां इज्जत भरी जिंदगी गुजरबसर करने लगी हैं.’’

कसूर किस का था? (पहला भाग) : राधिका की आखिर क्या थी गलती

‘हैलो राधिका, तुम ठीक 8 बजे होटल पहुंच जाना.’

‘‘ओके… राजन. आप भी टाइम से आ जाना.’’

‘जो हुक्म मेरी मलिका. बंदा समय पर हाजिर हो जाएगा.’

‘‘आप भी न, कुछ भी कह देते हो,’’ शरमा कर, मुसकराते हुए राधिका ने मोबाइल फोन काट दिया.

राधिका ने तैयार हो कर गुनगुनाते हुए, आईने में अपनेआप को गौर से ऊपर से नीचे तक देखा. उस का खूबसूरत बदन अभी तक सांचे में ढला हुआ था, तभी तो राजन उसे बांहों के घेरे में ले कर हमेशा कहते, ‘फिगर से आप की उम्र का पता ही नहीं चलता जानेमन…’ और शरारत से हंसने लगते.

तब राधिका थोड़ा शरमा कर रह जाती और कहती, ‘आप भी न…’

नीले रंग की खूबसूरत साड़ी में चांदी के रंग की कारीगरी का काम, नए जमाने का ब्लाउज, जिस का भार पीछे बंधी डोरी ने संभाल रखा था. बालों को हेयर ड्रैसर ने बड़े ही खूबसूरत ढंग से संवार कर 2 लटों को सामने निकाल दिया था.

राधिका के गोरगोरे रुई से भी नरम हाथों पर लोगों की नजर बरबस ही उठ जाती थी.

राधिका को याद है कि पिछली पार्टी में मेघना भटनागर ने कहा भी था, ‘राधिकाजी, आप को तो फिल्म इंडस्ट्री में होना चाहिए था. आप तो इतनी खूबसूरत हो कि आप को छूने से भी डर लगता है. एकदम कांच की गुडि़या सी लगती हो आप.’

ऐसी बातें पहले राधिका को अंदर तक गुदगुदा जाती थीं, लेकिन अब वह सुन कर केवल मुसकरा देती है.

राधिका ने साड़ी से मैच करती ज्वैलरी पहन कर फाइनल टच और फाइनल लुक दिया और मोबाइल फोन और मैचिंग पर्स ले कर बंगले से बाहर आ गई, जहां ड्राइवर पहले से ही हाथ बांधे अपनी ड्यूटी के लिए खड़ा था.

राधिका मैडम को आते देख ड्राइवर ने गाड़ी का पिछला गेट खोला. राधिका ने बैठते ही कहा, ‘‘होटल ताज चलो.’’

‘‘जी मेम साहब,’’ कह कर ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी. गाड़ी अब बंगले से निकल कर खाली सड़क पर तेज रफ्तार से दौड़ने लगी.

राधिका का दिमाग भी उस दौड़ में शामिल हो गया. बस फर्क इतना था कि गाड़ी की रफ्तार आगे जा रही थी और राधिका का दिमाग पिछली यादों की ओर रफ्तार पकड़ रहा था. बात तब की है, जब राधिका का 12वीं जमात का रिजल्ट निकला था. वह फर्स्ट क्लास से पास हुई थी. वह चाहती थी कि वह आगे और पढ़े. उस ने सीपीटी का फार्म भी ले लिया था, लेकिन घर की माली हालात ठीक नहीं थी.

5 भाईबहनों में वह सब से बड़ी थी. उस के बाद पल्लव, जिस ने 10वीं जमात का बोर्ड इम्तिहान दिया था और पल्लवी ने 8वीं जमात का. फिर नकुल और तन्वी थे, जो छठी और चौथी क्लास में पढ़ते थे.

मां घरेलू थीं, सिर्फ कपड़े सीनेपिरोने का काम जानती थीं और पिताजी रेलवे में टीटी थे. जैसेतैसे घर का गुजारा और उन लोगों की पढ़ाई का खर्चा निकल पाता था.

पिताजी की इच्छा थी कि वे राधिका की शादी कर दें, क्योंकि वह इतनी खूबसूरत थी कि जहां भी जाती, वहां कोई भी उस का दीवाना हो जाता था. दोनों पतिपत्नी को रातभर इसी चिंता में नींद नहीं आती थी.

राधिका की खूबसूरती पर फिदा हो कर 3 चावल मिलों के मालिक केतन सहाय ने अपने बेटे मेहुल के लिए बिना दानदहेज के शादी की बात चलाई.

राधिका के पिता ने उसे स्वीकार कर लिया और धूमधाम से शादी हो गई. पैसों की कमी में पलीबढ़ी राधिका इतने ऐशोआराम देख कर दंग रह गई. वह बहुत खुश थी. उस के मांबाप भी अपनी बेटी की खुशियों को सराहने लगे.

मेहुल चूंकि एक बड़ा कारोबारी का लड़का था, विदेश से एमबीए कर के आया था, उस का ज्यादा से ज्यादा समय कामकाज और यारदोस्तों में ही बीतता.

मेहुल को राधिका पहली नजर में ही भा गई थी. जब मेहुल ने प्यार से राधिका को देखा, तो हलकी गुलाबी साड़ी में उस का रंग और भी गुलाबी हो उठा था. वह लाज से सिमटी जा रही थी. सभी दोस्त मेहुल से मानो जल रहे थे.

मेहुल भी स्मार्ट और अच्छे नैननक्श का था, पर राधिका के सामने उन्नीस ही था. पर वह राधिका से प्यार तो बहुत करता था, वह उस की खूबसूरती पर कुछ नहीं बोल पाता था. वह आएदिन पार्टी करता रहता था, जिस में सिगरेटशराब व शबाब का जोर होता था और पार्टियां भी देर रात तक चलती थीं.

हाई सोसाइटी में उठनेबैठने वाले मेहुल के यारदोस्त भी वैसे ही थे. हर समय पीनेपिलाने की ही बातें चलती थीं. शुरुआत में तो राधिका नईनवेली होने के नाते पसंद न होते हुए भी ऐसी पार्टियों में शामिल हो जाती थी, पर उसे ऐसी पार्टियां कभी भी अच्छी नहीं लगी थीं.

धीरेधीरे राधिका ने ऐसी हाई प्रोफाइल पार्टियों में जाना छोड़ दिया. घर की पार्टियों में 2-4 बार अपना चेहरा दिखा कर चली आती. बाहर की पार्टियों में केवल मेहुल जाता था. उसे लौटने में कभी सुबह के 2 बजते, तो कभी 3 या 4. पहले तो वह गुस्सा हो जाती थी, मेहुल से बोलचाल बंद कर देती थी या कुछ शिकायत कर देती थी.

एक बार फिर ऐसा ही हुआ. राधिका मेहुल से नाराज थी, तभी मेहुल ने उस का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा, तो एक पल के लिए वह सकुचाई, मुंह से एक भभका निकला, उस की गंध से उसे उलटी सी होने लगी. वह हटने लगी, तो मेहुल ने उसे झट से अपने बदन से सटा लिया. सीने से लगा कर वह दीवानों की तरह उसे चूमने लगा.

राधिका उस की बांहों से निकलने के लिए छटपटा रही थी. मेहुल कह रहा था, ‘यार, माफ भी कर दो. कल से जल्दी आ जाऊंगा. राधिका, तुम बेहद खूबसूरत हो… मैं वादा करता हूं… कभी लेट नहीं होऊंगा.’

शराबी की जबान और कुत्ते की टेढ़ी पूंछ का जैसे कभी कोई भरोसा नहीं होता, वैसे ही पीनापिलाना मेहुल की आदत में शुमार हो गया था. जितनी नफरत राधिका को शराबसिगरेट, देर रात की पार्टियों से थी, उतनी ही नफरत उसे अपनेआप से भी होने लगी थी.

इधर बंटी के पैदा होने के बाद राधिका उस के पालनेपोसने में लग कर अपने को बिजी रखने लगी.

पहले तो मेहुल सिर्फ बाहर से ही शराब पी कर आता था, पार्टियां करता था, लेकिन सासससुर की मौत के बाद तो जैसे पूरा मैखाना घर में ही खोल लिया. अब वही मेहता ऐंड मेहता संस एकलौता मालिक जो हो गया था.

(क्रमश:)

दलितों के साथ बढ़ते अत्याचार और ऊंचे बिगड़ैल होते बेलगाम

इलाहाबाद के एक रेस्त्रां में ऊंची जातियों के बिगड़ैलों का एक दलित को पीटपीट कर मार डालने का मामला एक भयंकर खतरे का एक और एहसास है. इस से पहले हैदराबाद में रोहित वेमूला की खुदकुशी का मामला हुआ था. ऊना में दलितों को मारने का मामला हुआ था. राजस्थान के राजसमंद में एक लव जेहाद के नाम पर दलित को मारने की घटना हुई थी.

मोबाइलों से बनी ऐसी फिल्मों का अंबार लग चुका है जिन में दलितों को बुरी तरह मारा जा रहा है. औरतों और लड़कियों के बलात्कार के वीडियो भी वायरल होते रहे हैं.

सदियों से अछूतों के नाम से जाने जाने वाले दलित अब बराबरी की मांग कर रहे हैं और पढ़ने व कमाने के मौके पा कर देश की मुख्यधारा में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं पर मंदिर, पूजा, पाखंड की राजनीति ऊंची जाति बनाम नीची जाति की रणनीति बनने लगी है और दलितों को दबानेकुचलने की कोशिशें हो रही हैं. ऊंची जातियां चाहती हैं कि उन्हें सस्ते, असहाय, हुक्म मानने वाले मजदूर लगातार मिलते रहें और उन्हें डर लगता है कि अगर कल को दलित बराबर हो गए तो समाज का सदियों का बना ढांचा टूट जाएगा.

चूंकि इन दलितों के पास वोट का हक है और इन के नेता अपनी पहचान का फायदा उठाने से चूक नहीं रहे हैं और दलित अपने से ऊंची जातियों, चाहे वे बैकवर्ड कहलाती हों या राजपूत, वैश्य और ब्राह्मण, से भी कोई मेलजोल नहीं बना पा रही है.

इलाहाबाद के रेस्त्रां की घटना एक खौलते रुख की निशानी है. ऊंची जातियां चाहे वे सवर्ण हों या गैरसवर्ण सोचती हैं कि दलितों को वैसा ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों रहे. दलित जातियां संख्या, चुनावी राजनीति और अब आरक्षण से मिली नौकरियों और पढ़ाई के बल पर बराबरी की सी मांग कर रही हैं. यह ऊंचों को सहन नहीं हो रहा और हर शहर, कसबे, गांव में इलाहाबाद जैसी घटनाओं की भरमार होने लगी है जिन में से कुछ ही सुर्खियां बनती हैं.

यह नहीं भूलना चाहिए कि देश की कामकाजी जनता मोटेतौर पर दलितों की है. सवर्ण तो कभी भी मेहनत का काम करते ही नहीं थे. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अपने हाथ से काम करना अपमान समझते रहे हैं. पहले पिछड़े वर्गों के लोग खेतों, कारखानों और खानों में मेहनत का काम करते थे पर अब इन की गिनती कम होने लगी है क्योंकि इन के पास जमीन आ गई?है. देश की तरक्की का दारोमदार आज दलितों पर है. उन से मेहनत करा सकते हो तो देश को चीन बना सकते हो. उन्हें जानवर की तरह रखोगे तो सारा देश गरीब बना रहेगा. उन से मारपीट करना अपने हाथों को जख्मी करना है. हो सकता है वे सहम जाएं, हो सकता है आपसी फूट की वजह से वे अपने हक न मांग सकें, हो सकता है पढ़े न होने के कारण वे पाखंडों में फंस जाएं पर इस सब से देश को नुकसान होगा.

देश की हर गली में तूतूमैंमैं हो, हर नुक्कड़ पर 2-4 गुट एकदूसरे को मारने की फिराक में खड़े हों, अदालतें ऊंचेनीचों के झगड़े निबटाने में लगी रहें, संसद में अत्याचारों की आवाजें ज्यादा गूंजें, तो देश आगे बढ़ने से रहा, उन्नति के सपने साकार होने से रहे.

दलितों के साथ बढ़ रहे अत्याचारों के पीछे वह पाखंडी सोच है जिसे हर रोज बढ़ावा दिया जा रहा है. संस्कृति की दुहाई दे कर जो बात हर बार याद दिलाई जाती है वह यही है कि समाज में अलगअलग खेमे भगवान की देन हैं, पिछले जन्मों के पापों के फल हैं. उन पर उंगली न उठाइए क्योंकि यही इस समाज का दस्तूर है. यहां हरेक को बोलने, चलनेफिरने में अपनी पैदाइश का खयाल रखना होगा. सिर्फ पढ़ाई कर लेने से जाति नहीं सुधर जाती. ऊंचों की सेवा करो तभी कल्याण होगा, यह सोच देश को उसी गड्ढे में फिर धकेल देगी जहां से निकलने की कोशिशें हो रही हैं.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘‘हक से’’ का लोकार्पण

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के खास मौके पर मुंबई के जुहू स्थित मिलेनियम क्लब में मीरा भायंदर की समाज सेविका व जागृत महिला चैरीटेबल ट्रस्ट की संस्थापक नीला सोंस के साथ टीवी व फिल्म उद्योग से जुड़ी तमाम महिलाओं ने एक एंथम गीत ‘‘हक से’’ का लोकार्पण करते हुए अपने हक को मांगने का संकल्प लिया और नारा दिया-‘‘हक चाहिए, ना सौगात, ना खैरात, बराबरी का अधिकार चाहिए..’’

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इस अवसर पर नीला सोंस ने 2010 में संसद में पेश किए गए महिला आरक्षण विधेयक की बात की. इसके अलावा इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्र में अपने बलबूते पर अपना एक अलग मुकाम बना चुकी महिलाओं को सम्मानित भी किया गया.

इनमें गायक शिबानी कश्यप, अभिनेत्री दीपशिखा नागपाल, संगीतज्ञ व ज्योतिषाचार्य कामिनी देवी, सुशील जंगीरा, रानी द्विवेदी, श्वेता शालिनी, डौक्टर भारती लवेकर, एडवोकेट आभा सिंह, एडवोकेट व मुंबई की पूर्व महापौर निर्मला सावंत प्रभावलकर, नीरू शर्मा, डाक्टर स्नेहा पाणेकर, वत्सला शुक्ला,राम जाजोदिया, कमल पोद्दार का समावेश है.

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इस कार्यक्रम को मनोरंजक बनाने के लिए नेहा ठाकुर ने मां और महिलाओं को महत्व देने वाले गीत सुनाए. जबकि भारत नाट्यम की प्रस्तुति भी हुई.

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