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योगी सरकार ने बदल दिया डौक्टर अंबेडकर का नाम

बसपा की दलित राजनीति को कुंद करने और डौक्टर अंबेडकर को भाजपा की विचारधारा के करीब दिखाने की कोशिश करते उत्तर प्रदेश सरकार ने उनका नाम बदल दिया है. इस संबंध में प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शासन जीतेन्द्र कुमार ने सभी अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव उत्तर प्रदेश शासन के साथ ही साथ सभी विभागों के प्रमुख और उच्च न्यायलय इलाहाबाद लखनऊ के निबंधक को 28 मार्च 2018 पत्र लिख कर इस बारे में जानकरी दी है.

अपने पत्र में प्रमुख सचिव ने लिखा है कि भारत के संविधान की अष्ठम अनुसूची (अनुच्छेद 344(1) और 351) भाषायें में ‘डौक्टर भीमरावअंबेडकर’ का नाम ‘डौक्टर भीमराव रामजी अंबेडकर’ लिखा है. शासन द्वारा विचार करने के बाद सभी अभिलेखों में अंकित ‘डौक्टर भीमरावअंबेडकर’ का नाम संशोधित कर ‘डौक्टर भीमराव रामजी अंबेकर’ करने का निर्णय लिया गया है.

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अपने पत्र में प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शासन जीतेन्द्र कुमार ने सभी को लिखा है कि संबधित अभिलेखों में ‘डौक्टर भीमराव अंबेडकर’ का नाम‘डौक्टर भीमराव रामजी अंबेडकर’ करने के संबंध में कार्यवाही करने का कष्ट करें. सरकार के इस फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. इसे उत्तर प्रदेश सरकार के दलित कार्ड के रूप में देखा जा रहा है. बसपा डौक्टर अंबेडकर को लेकर पार्टी को उनका अनुयाई बताती है. भाजपा नहीं चाहती कि बसपा ही डौक्टर अंबेडकर के नाम पर दलित वोट ले जाये. ऐसे में उसने डौक्टर अंबेडकर के नाम को मुद्दा बनाने का काम किया है.

भाजपा इसके पहले महात्मा गांधी और सरदार पटेल को लेकर भी अपने अलग दावे कर चुकी है. जिससे कांग्रेस केवल उनके नाम का लाभ न ले सके. डौक्टर अंबेडकर के पूरे नाम को सामने लाकर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में दलित कार्ड खेलने की कोशिश में है जिससे सपा-बसपा के गठबंधन का मुकाबला किया जा सके.

वीडियो : स्मिथ के एयरपोर्ट पहुचते ही धोखेबाज कह कर हूटिंग करने लगी भीड़

बौल टैम्‍परिंग विवाद ने औस्‍ट्रेलियाई क्रिकेट टीम की प्रतिष्‍ठा को करारा आघात पहुंचाया है. इस मामले में टीम के दिग्‍गज खिलाड़ी स्‍टीव स्मिथ और डेविड वार्नर की छवि क्रिकेट प्रेमियों के बीच ‘विलेन’ की बन चुकी है. क्रिकेट औस्ट्रेलिया ने पहले से ही दोषी खिलाड़ियों पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उनपर एक-एक साल का बैन लगाने के साथ ही दोनों खिलाड़ि‍यों को औस्‍ट्रेलिया लौटने के निर्देश भी दे दिए गए हैं.

बौल से छेड़छाड करने के मामले को लेकर और इतनी फजीहत झेलने के बाद दक्षिण अफ्रीका से वापस औस्ट्रेलिया लौटते समय स्मिथ को जोहान्सबर्ग एयरपोर्ट पर अपने प्रशंसको की नाराजगी का सामना भी करना पड़ा. एयरपोर्ट पर स्टीव स्मिथ ने पत्रकारों के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया. लेकिन इस दौरान एयरपोर्ट पर मौजूद लोगों ने ‘धोखेबाज-धोखेबाज’ के नारे लगाए.

एयरपोर्ट पर लोगों की भीड़ धोखाबाज कह कर हूटिंग कर रही थी और स्टीव स्मिथ किसी तरह वहां से जल्दी से जल्दी निकलने की कोशिश में थे. स्मिथ को पत्रकारों और लोगों से बचाने के लिए एयरपोर्ट पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी.

गौरतलब है कि केपटाउन टेस्‍ट के दौरान औस्ट्रेलिया के कैमरन बैनक्राफ्ट को पीले रंग की पट्टी से गेंद को रगड़ने का दोषी पाया गया था. हालांकि उनकी यह हरकत मैदान में मौजूद कैमरामैन की नजरों से नहीं बच पाई. कैमरे ने उन्‍हें गेंद से छेड़खानी की कोशिश करते पकड़ लिया और इस मामले ने तूल पकड़ लिया. स्टीव ने खुद गेंद से छेड़छाड़ करने की बात भी स्वीकार की थी. जिसके बाद स्मिथ को टीम की कप्‍तानी से भी हटा दिया गया. इतना ही नहीं इन इस वाकये के बाद से यह सभी खिलाड़ी आलोचकों के निशाने पर हैं.

लेने जा रहे हैं होम इंश्योयरेंस? रखें इन बातों का ख्याल

अगर आप घर और घर में रखे सामान के नुकसान का हर्जाना चाहते हैं तो होम इंश्‍योरेंस कराना जरूरी है. होम इंश्योरेंस लेने से पहले आपको इस बात की पूरी जानकारी होनी चाहिए कि होम इंश्योरेंस कितने प्रकार के होते हैं और वह किस तरह से आपके लिए आर्थिक रूप से सहायक है.

होम इंश्योरेंस दो प्रकार के होते हैं-

पहला, फायर इंश्योरेंस पौलिसी (एफआईपी)

दूसरा, कौम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस पौलिसी (सीआईपी)

एक तरफ एफआईपी यानी फायर इंश्योरेंस पौलिसी, आग, आंधी-तूफान, बाढ़ इत्यादि से होने वाले नुकसान से आर्थिक सुरक्षा देता है तो दूसरी तरफ सीआईपी यानी कौम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस पौलिसी बिल्डिंग के स्‍ट्रक्‍चर और घर में रखी चीजों के नुकसान से आपको आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है. ऐसे में, अगर होम इंश्‍योरेंस लेने जा रहे हैं तो इन प्रमुख बातों का ध्‍यान अवश्‍य रखना चाहिए. जैसे कि –

कितने का होम इंश्‍योरेंस कराएं?

अपने घर के स्‍ट्रक्‍चर के लिए इंश्योरेंस की जरूरत का अनुमान लगाते समय इसी तरह का घर बनाने के लिए वर्तमान में होने वाले खर्च के साथ अपने घर के मूल्य की तुलना करें. प्रौपर्टी के इंश्योरेंस में आपका सामना आर्थिक जोखिम के साथ हो सकता है. इसी तरह अपने घर के सामानों का इंश्योरेंस कराने पर विचार करते समय अपने घर में मौजूद सभी सामानों पर ध्यान दें और उनकी एक लिस्ट तैयार करें, उनके वर्तमान मूल्य का अनुमान लगाएं और उसके हिसाब से पर्याप्त इंश्योरेंस कवर लें.

किस तरह का कवर लें?

अपने मकान के स्‍ट्रक्‍चर के लिए इंश्योरेंस लेते समय आपके पास घटती कीमत (डेप्रिशिएसन) के हिसाब से इंश्योरेंस का कवरेज लेने का विकल्प होता है. घटती कीमत के हिसाब से इंश्योरेंस लेने पर प्रौपर्टी की कुल कीमत का अनुमान कम पड़ सकता है क्योंकि घटती कीमत के कारण कवर की रकम कम हो सकती है.

आपके लिए आवश्यक कवर

कभी-कभी होम इंश्योरेंस पौलिसी आपको इतना ज्यादा कवर दे सकती है जिसकी आपको जरूरत ही न हो. यदि आप ऐसे अतिरिक्त कवर को छोड़ देते हैं तो पौलिसी का प्रीमियम कम हो सकता है. उदाहरण के लिए यदि आप बाढ़ संवेदनशील क्षेत्र में रहते हैं तो आपको बाढ़ से सुरक्षा की जरूरत पड़ सकती है. इसी तरह आप अपनी जरूरत के हिसाब से उस तरह की पौलिसी को छोड़ने पर विचार कर सकते हैं जिसमें ऐसे-ऐसे कवर के लिए अतिरिक्त पैसे लिया जा रहा हो जिसकी आपको जरूरत ही न हो.

अलग-अलग इंश्योरेंस बनाम सिंगल इंश्योरेंस

आप किस तरह के सामानों के लिए सुरक्षा पाना चाहते हैं और आप उन्हें एक सिंगल पौलिसी में इंश्योर करना चाहते हैं या नहीं, इसके आधार पर आप सिंगल संयुक्त पौलिसी या अलग-अलग पौलिसी लेने पर विचार कर सकते हैं.

चूंकि आपके पास मकान और सामानों को अलग से इंश्योर करने का विकल्प है, इसलिए आपको कम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस लेने या दोनों के लिए अलग-अलग पौलिसी लेने का विकल्प मिलता है. इंश्योरेंस लेते समय आपको कम्प्रीहेंसिव पौलिसी के तहत कवर किए जानेवाले सामानों और उसकी लागत को पढ़ना चाहिए. आपको एक सिंगल कवर की तुलना में अधिक सामानों को शामिल करने के लिए अलग-अलग इंश्योरेंस कवर मिल सकते हैं लेकिन इससे आपका प्रीमियम बढ़ सकता है और क्लेम करते समय उनका सेटलमेंट भी अलग-अलग होगा. एक संयुक्त सामान और बिल्डिंग इंश्योरेंस पौलिसी में आपको कम प्रीमियम देना पड़ सकता है और नुकसान का क्लेम करते समय क्लेम का सेटलमेंट उसी इंश्योरेंस कंपनी द्वारा एक साथ किया जाता है.

सही जानकारी दें

होम इंश्योरेंस पौलिसी खरीदते समय आपको बिल्कुल सही जानकारी देनी चाहिए. क्लेम सेटलमेंट के समय आपको अपने सामानों या उसके मूल्य का प्रमाण देना पड़ सकता है. इसलिए क्लेम सेटलमेंट के समय सामानों के मूल्य को प्रमाणित करने के लिए उनका बिल रखने की कोशिश करें. इसके अलावा आपको सबसे अच्छे व्यवहार्य तरीके से बिल्डिंग का रखरखाव भी करना चाहिए और नियमित रूप से उसकी मरम्मत भी करनी चाहिए. बिल्डिंग का ठीक से रखरखाव न करने पर क्लेम रिजेक्ट भी हो सकता है.

औनलाइन इंश्योरेंस टूल्स का इस्तेमाल करें

आपको स्थानीय इंश्योरेंस एजेंट से आकर्षक औफर मिल सकते हैं, लेकिन कोई भी पौलिसी लेने से पहले आपको औनलाइन तुलना टूल्स का इस्तेमाल करके विभिन्न इंश्योरेंस कंपनियों की अनगिनत पौलिसियों की तुलना करनी चाहिए. इससे आपको इंश्योरेंस की लागत और उसमें कवर की जाने वाली चीजों का पता लगाने में मदद मिलेगी और उसके बाद आप स्थानीय एजेंट को बुलाकर उसके दाम देख सकते हैं और अपने अनुसार इंश्योरेंस ले सकते हैं.

फोन बंद होने पर भी गूगल ट्रैक कर रहा है आपकी लोकेशन

अगर आप स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं और आपको ऐसा लगता है की अपने स्मार्टफोन को औफ कर देने या उसकी बैटरी निकाल देने पर कोई भी आपके लोकेशन को ट्रैक नहीं कर पाएगा तो आपकी यह सोच बिल्कुल गलत है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गूगल आपकी लोकेशन तब भी ट्रैक कर रहा होता है जब आपने बैटरी फोन से निकाल दी हो और अपना फोन बन्द कर दिया हो.

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्मार्टफोन के मदरबोर्ड के टौप पर एक मिनी IRC बैटरी लगी होती है. यह बैटरी कभी स्विच औफ नहीं होती. यही बैटरी आपकी लोकेशन को हर वक्त ट्रैक करती रहती है. जब आप अपने फोन को इंटरनेट से दोबारा कनेक्ट करते हैं तो यह बैटरी आपके पूरे दिन का लोकेशन गूगल को बता देती है.

फोन में सिम ना होने पर भी होती लोकेशन ट्रैक : कुछ महीनों पहले, Quartz ने यह खुलासा किया था की गूगल एंड्रायड स्मार्टफोन्स से लोकेशन सेवा को औफ कर देने के बाद या फिर फोन में सिम कार्ड निकाल देने के बाद भी वह आपके लोकेशन की जानकारी एकत्रित करता रहता है. डाटा एन्क्रिप्शन और प्राइवेसी पर चल रही तमाम बहस के बाद भी गूगल की लोकेशन डाटा कलेक्शन की यह खबर हैरान करने वाली है. Quartz की आई रिपोर्ट के अनुसार, एंड्रायड सौफ्टवयेर पर चल रहे फोन्स का डाटा एकत्रित कर के यूजर लोकेशन को गूगल को भेजा जा सकता है.

2017 से गूगल कलेक्ट कर रहा डाटा : रिपोर्ट में पाया गया की गूगल लोकेशन डाटा को 2017 की शुरुआत से ही एकत्रित कर रहा है. Quartz का कहना है की कंपनी ने डाटा कलेक्शन की इस रिपोर्ट को सत्य कहा है. कंपनी के प्रवक्ता ने कहा है की इसे जल्द से जल्द खत्म करने के लिए अहम कदम उठाए जाएंगे.

आपका मोबाइल भी ले सकता है आपकी जान

आपका मोबाइल फोन हर समय आपके साथ रहता है. इसके बिना तो अब जिंदगी की कल्पना करना ही मुश्किल है. ये बात कहना भी गलत नहीं होगा कि आप फोन को ऐसे चिपका के अपने साथ रखते हैं जैसे कि वो कोई खजाना हो. शायद आप इस बात से अनजान हैं कि अपने फोन को हमेशा यूं अपने साथ रखने का मतलब है किसी बड़े खतरे को बुलावा देना है.

क्या आप जानते हैं मोबाइल फोन या मोबाइल के टावर्स से निकलने वाला रेडिएशन आपकी सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा है. गेम्स और नेट सर्फिंग के लिए अगर आप अपने मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं तो लगातार ऐसा करना बहुत खतरनाक है.

मोबाइल का रेडिएशन कब होता है ज्यादा खतरनाक

अपने मोबाइल को तकिए के नीचे रखकर नहीं सोना चाहिए. इसका सीधा असर आपके दिमाग पर पड़ता है. कई लोग अपनी शर्ट की जेब में मोबाइल रखा करते हैं. ये आदत आपके दिल के लिए नुकसानदेह है और इसके कारण आपको दिल की बीमारियां होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसके अलावा पेंट के पास जेब में मोबाइल रखने से, गहरा असर स्पर्म्स पर असर होता है, जो काफी खतरनाक साबित हो सकता है.

रेडिएशन से क्या हैं नुकसान

अगर लिस्ट बनाई जाए तो आपके मोबाइल फोन से होने वाले नुकसानों की एक लम्बी लिस्ट बन सकती है. इनमें से कुछ ऐसे हैं जो आपको ज्यादा परेशान कर सकते हैं. जैसे,

1. आपको लगातार थकान महसूस होना.

2. हमेशा ही सिरदर्द की शिकायत होना.

3. सिर में एक अजाब सी झनझनाहट का अनुभव होना और नींद न आना.

4. समय समय पर चक्कर जैसा आना. इसके अलावा मोबाइल फोन रेडिएशन्स से आपके डिप्रेशन में चले जाने की संभावनाऐं भी बढ़ जाती है.

5. अगर आपका ध्यान, आपके काम में बिल्कुल नहीं लग रहा है तो इसका मतलब यही है कि आपको अपने फोन से जल्दी ही दूरी बना लेनी चाहिए.

6. मोबाइल से रेडिएशन से आपके कानों की सुनने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है.

7. इसके अलावा याददाश्त कमजोर होना और आपकी पाचन में गड़बड़ी रहना भी मोबाइल के बड़े नुकसानों में से हैं.

8. आपको बता दें कि मोबाइल रेडिएशन के प्रभाव में लंबे समय तक रहने से प्रजनन क्षमता में कमी, कैंसर, ब्रेन ट्यूमर और गर्भपात की आशंकाऐं भी हो सकती है. ये बात तो सभी जानते हैं कि हमारे शरीर में 70 से 80 फीसदी तक पानी होता है. रेडिएशन्स के कारण यह पानी धीरे-धीरे अब्जॉर्ब होता जाता है, जो आगे सेहत के लिए काफी नुकसानदेह है.

9. सबसे महत्वपूर्ण बात जो आपको जाननी बेहद जरुरी है कि मोबाइल फोन का ज्यादा इस्तेमाल करने से आपको कैंसर जैसी बड़ी और गंभीर बीमारी भी हो सकती है.

10. एक रिपोर्ट के मुताबिक हर दिन आधे घंटे या उससे ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल करने पर कुछ ही सालों के अंदर आपको ब्रेन ट्यूमर होने की आशंका बढ़ जाती है.

कुछ सावधानियां बरतकर आप मोबाइल रेडिएशन से होने वाले खतरों से बच सकते हैं.

मोबाइल फोन के रेडिएशन्स को आप कर सकते हैं कम :

1. अगर आप अपने फोन का रेडिएशन कम करना चाहते हैं तो आपको अपने फोन के साथ फेराइट बीड, जो कि एक रेडिएशन सोखने वाला यंत्र है, लगा लेना चाहिए. आजकल आसानी से इन्हें प्राप्त किया जा सकता है.

2. तकनाकी के विकसित हो जाने और लगातार विकासशील रहने के कई फायदे भी हैं. तकनीकी खुद से होने वाले नुकसान के लिए भी कई तरह के उपाय ले कर आती है. कहने का मतलब है कि आप रेडिएशन से बचने के लिए रेडिएशन ब्लॉक ऐप्लिकेशन का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. यह एक खास तरह का सॉफ्टवेयर होता हैं, जो एक खास समय तक के लिए वाईफाई, ब्लू-टूथ, जीपीएस या ऐंटेना जैसी चीजों को ब्लॉक कर सकता हैं.

3. आपको एक अच्छी बात बता दें कि मोबाइल फोन रेडिएशन शील्ड का इस्तेमाल करना भी एक अच्छा तरीका है. आजकल कई बड़ी-बड़ी फोन कंपनियां मार्केट में इस तरह के उपकरण ले कर आ रही हैं.

खून के रिश्ते

देश के विभाजन के समय मची तबाही पाकिस्तान और हिंदुस्तान के लोगों की आत्मा को बरसोंबरस कंपाती रही. इतिहास के इस स्याह दौर के कहानीकारों को इंसानी जज्बे से जुड़ी कहानियां लिखने के लिए सच्ची घटनाएं मिल गई थीं. यह ऐसी सच्चाई थी कि जिन की कहानियों का कभी अंत नहीं हो सका.

इन कहानियों पर तमाम फिल्में बनीं, बड़ेबड़े पुरस्कार बटोरने वाले उपन्यास लिखे गए. इतना ही नहीं, गाहेबगाहे सत्यकथाओं के रूप में पत्रपत्रिकाओं ने भी कहानियां छाप कर अपने पाठकों के दिलों पर राज करती रहीं.

इस सच्चाई को कभी झुठलाया नहीं जा सकता कि ये सच्ची कहानियां हमेशा लोगों की पहली पसंद रहीं. हर किसी के मन को इन कहानियों ने भीतर तक बांधा.

पंजाब का एक कस्बा है खमाणो. इसी के पास बसा है एक छोटा सा गांव बरवाली खुर्द. इसी गांव में कभी रहते थे सरदार उग्र सिंह, जो अपने समय के संपन्न जमींदार थे. अमीर भी थे और साहसी भी. उन का अच्छाखासा दबदबा था फिर भी वह निहायत ही नेकदिल इंसान थे. मजबूत इरादे वाले अपने वचन के पक्के. अगर किसी की मदद के लिए कह दिया तो कितनी भी और कैसी भी परेशानी आ जाए, जुबान से निकले वादे को पूरा कर के ही दम लेते थे.

देश के बंटवारे से पहले हिंदूमुसलिम में ज्यादा फर्क नहीं था. गांवोंकस्बों में एक घर हिंदू का था तो उस के बगल वाले घर में मुसलिम परिवार रहता था. दोनों ही घरों में रहने वालों के मन में किसी तरह के भेदभाव की भावना नहीं होती थी. कहीं किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती थी. एक परिवार की तरह सभी रहते थे.

उग्र सिंह ने कभी किसी मुसलमान को हिकारत की नजरों से नहीं देखा था. गांव के सभी मुसलमान उन के लिए अपने परिवार की तरह थे. अन्य लोगों की तरह वह उन के भी काम के लिए खड़े रहते थे. क्योंकि सभी हमेशा से एक साथ रहते आ रहे थे.

लेकिन जब पाकिस्तान की घोषणा हुई तो मुसलमानों को इधर से खदेड़ा जाने लगा. इस के बाद मुसलमान और हिंदू एकदूसरे के दुश्मन बन कर एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए. हिंदुस्तान के जिस हिस्से को काट कर पाकिस्तान बनाया गया था, वहां रहने वाले हिंदुओं का सहीसलामत इस तरफ आना आसान नहीं था. ठीक यही हाल हिंदुस्तान के रहने वाले मुसलमानों का भी था. इन के लिए भी मौत के अजगर मुंह बाए खड़े थे. जहां देखो वहीं मारकाट हो रही थी. इंसानियत जैसे पूरी तरह मर चुकी थी. चारों तरफ पशुता ही नजर आ रही थी.

एक ओर मुसलमान हिंदू के खून का प्यासा था तो दूसरी तरफ हिंदू भी मुसलमान के सामने पड़ते ही उसे काट डालने को आमादा था. बहूबेटी की इज्जत की भी किसी को परवाह नहीं थी.

इन हालातों में भी उग्र सिंह ने अपने यहां के मुसलमानों की रक्षा करने की ठान ली थी. उन्हें न केवल सुरक्षित पाकिस्तान पहुंचाने की व्यवस्था की, बल्कि जो मुसलमान पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे, उन की भावना को ध्यान में रख कर उन की सुरक्षा की व्यवस्था की.

प्रशासन काफी सख्त था. यहां रहने वाले मुसलमानों की सूची तैयार कर के उन्हें जबरदस्ती पाकिस्तान भेजा जा रहा था.

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उग्र सिंह ने कुछ दिनों तक सब को इधरउधर छिपाए रखा, पर पुलिस प्रशासन से कब तक बैर लेते. सगे भाइयों जैसे मुसलमान दोस्त और पड़ोसी एकएक कर के गांव को छोड़ कर जाने लगे. लेकिन वे किसी भी तरह अपने इस गांव से और यहां के रहने वाले यारों से अपना संबंध खत्म नहीं करना चाहते थे. वे चाहते थे कि किसी भी तरह इस गांव से उन का संबंध बना रहे.

इस के लिए सब ने आपस में सलाह कर के तय किया कि क्यों न वे चोरीछिपे अपनी कुछ लड़कियों का निकाह गांव के लड़कों से करवा दें. निकाह के बाद वे लड़कियां धर्म बदल कर सिख बन जाएंगी. यह बात कभी किसी पर जाहिर नहीं होने दी जाएगी.

ऐसा इसलिए सोचा गया था कि पुलिस और प्रशासन इस बात पर कभी आपत्ति न करे. बात सभी को जंच गई. इस तरह कुल 8 लड़कियों का निकाह गांव के 8 सिक्ख लड़कों से पढ़वा दिया गया. यह सब बहुत ही चोरीछिपे किया गया था. कुछ ही लोगों को इस बात की जानकारी हो सकी थी. उग्र सिंह की भी उस समय तक शादी नहीं हुई थी. जबकि यह शादी लायक हो चुके थे. उन्हीं 8 लड़कियों में से एक सकूरा बीबी थीं. सकूरा ने जब से होश संभाला था, वह उग्र सिंह को ही आदर्श व्यक्ति के रूप में देखती आ रही थी. जवान होने पर उग्र का मोहक रूप उस की आंखों के दिल में उतर गया था. यही नहीं, वह हर रात उस के सपनों में भी आने लगा था. सकूरा यही दुआ करती थी कि कोई ऐसा चमत्कार हो कि उस का निकाह उग्र सिंह से हो जाए.

और सचमुच यह चमत्कार होने जा रहा था. गांव की 8 मुसलिम लड़कियों का जब 8 जाट सिख लड़कों से निकाह कराया जाने लगा तो उन में से उग्र सिंह सकूरा के हिस्से आया था. और वैसे सकूरा बीबी भी किसी से कम नहीं थी. उग्र सिंह के साथ उस की जोड़ी इस कदर जंची कि देखते ही हर कोई उठउठ कर बलाएं लेने लगा.

निकाह के बाद सकूरा का नाम रख दिया गया था दलीप कौर. निकाह के बाद आठों मुसलिम लड़कियों के परिवार के लोग अपनी इन बेटियों को सुरक्षित छोड़ कर अपने नए देश पाकिस्तान चले गए थे. यह उग्र सिंह के अपने दबदबे का नतीजा था कि किसी को भनक तक नहीं लगी. गांव वालों ने इस मामले में ऐसी जुबान बंद रखी कि शादियों वाली बात पुलिस और प्रशासन तक पहुंच नहीं सकी.

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा. सकूरा को तो जैसे मनचाही मुराद मिल गई थी. उग्र सिंह भी उसे पाकर खुद को कम खुशनसीब नहीं समझ रहा था. अकसर वह यही सोचा करते थे कि शायद उन के अछे कामों का फल था कि ऐसी समझदार मेहनती और हर लिहाज से समर्पण की भावना रखने वाली बीवी उन्हें मिली है.

सकूरा ने अपनी तरफ से भी कोई शिकायत का मौका उन्हें नहीं दिया था. पति के अलावा घर के अन्य कामों का भी वह पूरी निष्ठा से ध्यान रखती थी.

गांव में एक साथ रहने की वजह से सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों के रहनसहन में कोई ज्यादा फर्क नहीं था. हां, धर्मकर्म और पूजापाठ को ले कर सकूरा ने उग्र सिंह के यहां आ कर अगर कोई परिवर्तन महसूस भी किया था तो उस ने खुद को उसी रूप में ढाल लिया था. शादी के सालभर बाद सकूरा ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया मुख्तयार कौर.

बेटी को पा कर उग्र सिंह जैसे निहाल हो गया था. अब उन की यही इच्छा थी कि खानदान का नाम बढ़ाने के लिए एक बेटा और पैदा हो जाए, पर सकूरा फिर मां नहीं बन सकी. मुख्त्यार के पैदा होने के बाद उस में न जाने क्या कमी हो गई कि उसे गर्भवती होने में दिक्कत आने लगी. काफी इलाज के बाद सकूरा एक बार फिर से गर्भवती हुई. यह सन 1952 की बात है. तब तक मुख्तयार कौर पूरे 4 साल की हो चुकी थी.

उसी बीच गांव में एक दुखदाई घटना घट गई. पुलिस के किसी मुखबिर को गांव की उन 8 मुसलिम लड़कियों के बारे में पता चल गया था, जो पाकिस्तान जाने के बजाय जाट परिवारों की बहुएं बन कर बरवाली खुर्द में ही रह रही थीं. इसे गैरकानूनी मानते हुए पुलिस ने छापा मार कर उन्हें पाकिस्तान भेजने की अपनी काररवाई शुरू कर दी.

पुलिस ने मुखबिर की खबर पर एकएक कर के 8 में से 7 लड़कियों को तो पाकिस्तान भिजवा दिया, लेकिन आठवीं दलीप कौर उर्फ सकूरा बीबी के यहां उस के पति उग्र सिंह के दबदबे और उस की प्रतिष्ठा की वजह से पुलिस कोई काररवाई नहीं कर पाई.

लेकिन पुलिसप्रशासन ने उसे यह चेतावनी जरूर दे दी थी कि जितनी जल्दी हो सके, वह सकूरा को पाकिस्तान भिजवा दे.

लेकिन उग्र सिंह ने किसी की कोई परवाह नहीं की. पुलिस प्रशासन से आखिर वह कब तक टक्कर लेते. दरअसल, उस पुलिस अधिकारी का तबादला हो गया था, जो उग्र सिंह के सामाजिक कार्यों की वजह से उन की इज्जत करता था. उस की जगह जो नया अफसर आया, उस की सख्ती के आगे उग्र सिंह की एक नहीं चली और वह पुलिस अधिकारी अदालती आदेश ले कर भारी फोर्स के साथ गांव आया था और सकूरा बीबी उर्फ दलीप कौर को पाकिस्तान पहुंचाने की खातिर अपनी हिफाजत में ले लिया.

सकूरा के गर्भ के दिन पूरे हो चुके थे. वह किसी भी समय बच्चा जन सकती थी. इस बात की कोई परवाह नहीं की गई. बस इतना लिहाज जरूर किया गया कि उसे सीधे सीमा पार पहुंचाने के बजाय जालंधर के शरणार्थी कैंप वालों के हवाले कर दिया गया.

15 मार्च, 1953 को इस शरणार्थी कैंप में सकूरा ने एक स्वस्थ व सुंदर बेटे को जन्म दिया. लेकिन इस की सूचना उग्र सिंह को नहीं दी गई. वह वहां जा भी नहीं सकते थे. एक कड़वी सच्चाई यह भी थी कि उग्र सिंह को यह भी पता नहीं था कि सकूरा को शरणार्थी कैंप में रखा गया है. उन्हें तो यही बताया गया था कि एक विशेष वाहन द्वारा सकूरा को सुरक्षित पाकिस्तान उस के अब्बूअम्मी के पास पहुंचा दिया गया है.

बच्चे के जन्म के बाद सकूरा यह खुशखबरी उग्र सिंह तक पहुंचाने के लिए तड़प रही थी. लेकिन उस की इस छटपटाहट पर किसी को कोई तरस नहीं आया. बच्चा नार्मल डिलीवरी से हुआ था. कुछ दिनों तक शरणार्थी कैंप में रख कर थोड़ीबहुत देखभाल के बाद उसे बच्चे सहित पाकिस्तान पहुंचा दिया गया.

उन दिनों जिस तरह के हालात थे, जैसा तनावभरा माहौल था, दोनों मुल्कों के बीच पाकिस्तान पहुंच कर भी सकूरा उग्र सिंह से संपर्क नहीं कर सकी थी. तब खतोकिताबत तक पर पाबंदी थी.

सकूरा को नियति का ऐसा खेल नजर आ रहा था कि उसे उस के इशारों पर ही चलना था. नियति के उस खेल से आखिर उसे समझौता करना ही पड़ा. इसी के साथ सकूरा ने यह भी तय कर लिया था कि वह अपने किसी रिश्तेदार पर बोझ न बन कर खुद संघर्ष करेगी.

सकूरा अपने परिवार वालों के बीच पहुंच गई थी. सब ने उस की यथाशक्ति मदद करने की कोशिश भी की. हालांकि वे सब फिलहाल खुद ही रिफ्यूजियों की तरह जिंदगी बसर कर रहे थे. कुछ वक्त इन सब की छत्रछाया में गुजार कर सकूरा ने अपना जीवन संघर्ष शुरू कर दिया. इस बीच बच्चे को नाम दिया गया— राणा यासीन अहमद खान.

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यासीन काफी होशियार निकला. अपनी उम्र के बच्चों के मुकाबले वह हर काम में हमेशा आगे रहता. थोड़ा बड़ा होने पर सकूरा ने हिंदुस्तान के उस के घरपरिवार के बारे में बता कर कहा था, ‘‘बेटे, चाहे कितने भी बरस लग जाएं, तुम्हारा कितना भी पैसा क्यों न खर्च हो जाए, तुम्हें एक दिन हिंदुस्तान जा कर अपने घर में सजदा जरूर करना है.’’

इस बीच काफी मेहनत मशक्कत कर के यासीन ने गुजरांवाला में खुद को स्थापित कर लिया था. कहते हैं कि आदमी अपने सही कर्म में लगा रहे तो वक्त बीतते देर नहीं लगती. सकूरा के साथ भी ऐसा ही था. कई तरह के काम करते हुए सकूरा कुछ इस तरह से व्यस्त हो गई थी कि समय कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला.

यह बात अलग थी कि अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद वह अपने पति की यादों को मन से कभी नहीं निकाल पाई.

राणा यासीन अहमद खान पढ़लिख कर अपने कारोबार से लग गया था. फिर भी अपनी मां की नसीहत के अनुरूप वह इस बात को कभी नहीं भूला कि उसे एक दिन हिंदुस्तान जा कर अपने उस गांव का सजदा करना है. जहां न केवल उस की मां का बचपन बीता था, उस की डोली भी उठी थी और वहीं रहते मां ने जिंदगी को खुशियों से भर लेने का सपना भी देखा था. पर एक दिन उसे उस की हर खुशी से मरहूम कर के वहां से निकाल दिया गया था.

सन 2003 में राणा यासीन अहमद खान अपनी मां की इच्छा पूरी करने के लिए हिंदुस्तान आए. उन का सोचना था कि एक बार अपने बिछड़े बाप को तलाश कर वह मां को साथ ले कर फिर वहां आएंगे या फिर पिता को अपने साथ ले जाएंगे. अपने देश पाकिस्तान अपनी मां के पास.

आखिर यासीन अपने गांव बरवाली खुर्द पहुंच गए. पर लोगों से पता चला कि उग्र सिंह नाम का कोई भी आदमी वहां नहीं रहता. 2 दिनों तक वहां रह कर यासीन ने अपनी मर्मस्पर्शी कहानी तमाम लोगों को सुनाई. जल्दी यह दास्तान पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई.

तब गांव के एक बुजुर्ग परगट सिंह ने बताया, ‘‘हां भई हां, उग्र सिंह इस गांव में रहते थे. गांव में वह बडे़ जिगरेवाले आदमी थे. न कभी अंग्रेजों से डरे और न ही बाद में अपनी पुलिस से. मगर पुलिस और अपनी सरकार से भला कब तक टक्कर लेते. उग्र ने कानून के खिलाफ मुसलमान औरत से शादी कर के उसे अपने घर में छिपा रखा था.

‘‘आखिर पुलिस ने उसे उग्र से छीन कर पाकिस्तान भेज दिया था. उस से उग्र को एक बेटी हुई थी, जो यहीं रह गई थी. तब उग्र जवान ही थे. अमीर तो वह थे ही, सब ने जोर दिया कि अच्छी लड़की देख कर दूसरा ब्याह कर लो, लेकिन उन्होंने दूसरी शादी नहीं की. सकूरा की याद में वह भीतर ही भीतर खत्म होते गए. सब कुछ अपनी लड़की के नाम कर एक दिन वह इस दुनिया से कूच कर गए.’’

बुजुर्ग से यासीन को इस बात की जानकारी मिली कि उस की बहन मुखत्यार कौर खन्ना के गांव भरी में ब्याही है. यासीन बहन से मिलने उस गांव में गए, लेकिन मुख्त्यार ने उस की किसी बात पर विश्वास नहीं किया.

मायूस हो कर यासीन पाकिस्तान लौट गए. कुछ अरसा बाद सकूरा बीबी अल्लाह को प्यारी हो गई.

यासीन के पाकिस्तान लौट जाने के कुछ दिनों बाद बरवाली खुर्द आ कर मुख्त्यार कौर ने इस बारे में पता किया तो आखिर उसे पता चल गया कि उस के यहां आने वाला उस का अपना सगा भाई ही था.

पहले यासीन अपने बिछड़े परिवार और अपनी बहन की तलाश में यहां आया था, अब मुख्त्यार कौर उस से मिलने, उस का पता जानने को बेकरार हो उठी थी. आखिर उसे भाई का गुजरांवाला का पता मिल गया. उस ने उसे एक लंबा पत्र लिखा, जिस के जवाब में यासीन की ओर से एक मार्मिक खत आया. इस के बाद दोनों खतोकिताबत के जरिए एकदूसरे के  संपर्क में बने रहे.

आखिर एक दिन 20 दिनों के वीजा पर यासीन हिंदुस्तान आ पहुंचा. इस बार बरवाली खुर्द में बहन ने उस का जोरदार स्वागत  किया. इस बार यासीन को यहां खूब प्यार और सम्मान मिला. वीजा की अवधि समाप्त होने पर यासीन इन तमाम मीठीमीठी यादों को अपने भीतर संजोए पाकिस्तान चला गया.

इस बात को बरसोबरस गुजर गए हैं. फिर कभी यासीन का न इधर आना हुआ, न मुख्त्यार ही कभी पाकिस्तान जा पाई. दोनों के बीच खतोकिताबत भी अब नहीं रही, यदाकदा फोन पर जरूर बात हो जाया करती है. दोनों अब काफी बूढे़ भी हो गए हैं.

– कथा सत्य घटना पर आधारित. कथा पात्रों एवं स्थानों के नाम वास्तविक हैं.

दुष्कर्मियों को सजा

उस लड़की की हिम्मत को अब सराहा जाने लगा है, क्योंकि वह निडरता की ऐसी मिसाल बन गई,

जिस की किसी को उम्मीद नहीं थी. गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली रीना (बदला हुआ नाम) दबंग प्रवृत्ति के युवाओं की दरिंदगी का शिकार हुई थी. प्यार करने वालों को सजा देने के मामले में बदनाम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले की सरजमीं पर उसे 7 हैवानों ने सामूहिक रूप से अपनी हवस का शिकार बनाया था. विरोध करने पर उस के साथ दरिंदगी की गई.

चुप बैठने के बजाय दरिंदगी की शिकार रीना ने सामाजिक शर्म को किनारे रख कर उन्हें सजा दिलाने की ठान ली. लाख तिरस्कार, दबाव, लालच व धमकियों के बावजूद उस ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी लड़ाई लड़ती रही. नतीजतन हैवानियत करने वाले छटपटा कर रह गए. किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन मामूली लड़की निडरता से लड़ाई लड़ कर हैवानियत का खेल खेलने वालों को सजा दिला देगी.

मुजफ्फरनगर की जिला अदालत ने बहुचर्चित गैंगरेप कांड में 31 जुलाई, 2017 को दोपहर 7 युवाओं अब्दुल, राशिद, वासिफ, सोमान, मोनू, राहुल व सलाऊ को उम्रकैद और जुरमाने की सजा सुनाई. इन लोगों ने एक लड़की के साथ न केवल सामूहिक गैंगरेप किया था, बल्कि मोबाइल से उस का एमएमएस भी बना कर वायरल कर दिया था. उन की हनक, हैवानियत और गरीब लड़की की इज्जत को खिलौना समझने की भूल ने उन्हें इस मुकाम पर पहुंचा दिया.

किसी ने पीडि़त लड़की को डरायाधमकाया तो किसी ने उस की लूटी अस्मत को दौलत के तराजू में तौला. पर उन के सारे पैंतरों और दबंगता को उस मामूली लड़की ने चकनाचूर कर दिया. रीना की हिम्मत के सामने उन की सभी कोशिशें व करतूत जवाब दे गईं.

मुजफ्फरनगर के एक गांव की रहने वाली रीना रोंगटे खड़े कर देने वाली हैवानियत से रूबरू हुई. उस के परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी. पिता मजदूरी कर के तथा 2 भैसों को पाल कर किसी तरह परिवार का गुजारा करते थे. रीना खुद शाहपुर कस्बे में एक चिकित्सक के क्लिनिक पर रिसैप्शनिस्ट की नौकरी करती थी. वहीं काम करने वाले एक युवक से उस की दोस्ती हो गई.

17 अगस्त, 2013 को वह अपने दोस्त के साथ बाइक पर सवार हो कर रेस्टोरैंट में खाना खाने के लिए बेगराजपुर जा रही थी. बसधाड़ा गांव के जंगल में वे एक ट्यूबवेल पर रुक कर पानी पीने लगे. इसी बीच 3 युवक वहां पहुंच गए. उन की नजर में इस तरह एक लड़की का किसी लड़के से मिलना गुनाह था.

यह बात अलग थी कि समाज की इस कथित ठेकेदारी की आड़ में उन की खुद की घिनौनी मानसिकता जिम्मेदार थी. उन्होंने रीना के दोस्त के साथ मारपीट की, साथ ही अपने कुछ अन्य साथियों को भी बुला लिया. सभी ने मारपीट कर के रीना के दोस्त को जान से मारने की धमकी देते हुए वहां से भगा दिया और रीना को पीटते हुए खींच कर खेत में ले गए.

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इस के बाद उन सभी लड़कों ने रीना को अपनी हवस का शिकार बनाया. विरोध करने पर उस के साथ मारपीट कर के गालियां दी गईं. एक आरोपी ने ब्लैकमेल करने के लिए मोबाइल से उस की वीडियो भी बना ली, साथ ही धमकी दी कि जब भी बुलाएं आ जाना और अगर पुलिस में जाने की सोची तो उसे बदनाम कर दिया जाएगा.

रीना रोईगिड़गिडाई, पर उन हैवानों पर इस का कोई असर नहीं हुआ. बदनामी के डर से रीना इस घटना के बाद चुप रही. न परिवार को बताया और न ही पुलिस को. अलबत्ता वह घुटन भरी जिंदगी जीती रही. हालात और मजबूरी के आगे परेशान हो कर उस ने गांव छोड़ दिया और गुड़गांव जा कर नौकरी करने लगी.

हैवानियत करने वाले रीना को अपनी मौजमस्ती का साधन बनाना चाहते थे. लेकिन अब वह उन से दूर चली गई थी. इस पर उसे सबक सिखाने के लिए उन्होंने 10 महीने बाद जून, 2014 में वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल कर दी. इस से हड़कंप मच गया. रीना का चेहरा और युवकों की करतूत साफ झलक रही थी. सभी की पहचान से मामला तूल पकड़ गया.

वीडियो क्लिप रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की और रीना को खोज निकाला. इस के बाद रीना ने 24 जून, 2014 को सातों आरोपियों के खिलाफ थाने में तहरीर दे दी. मामला गंभीर था. पुलिस ने गैंगरेप और आईटी एक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया. आरोपी दूसरे संप्रदाय के थे. इस से इलाके में तनाव भी बढ़ा, लेकिन पुलिस ने सभी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया.

पहचान उजागर होने से रीना की जिंदगी दोजख बन गई. समाज ने भी अपनी परंपरागत मानसिकता के चलते उस पर उल्टीसीधी टिप्पणियां कर के अपना रोल बखूबी निभाया. ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी, जो आरोपियों के इस दुष्कर्म पर यह कह कर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे कि अगर रीना दोस्त के साथ उस रास्ते से नहीं जाती तो ऐसी नौबत ही नहीं आती.

कई तरह के लांछन लगाए गए. जिल्लत और तोहमतों से रीना का बेहद करीबी रिश्ता बन गया. तोहमत लगाने वाले लोग ज्यादा थे, जो हर मामले में लडकियों की ही गलती निकालने की मानसिकता का शिकार होते हैं. लेकिन इन सब बातों ने रीना को और भी मजबूत बना दिया था. उस ने इंसाफ की लड़ाई लड़ने की ठान ली.

आरोपियों को सजा दिलाना ही उस की जिंदगी का मकसद बन गया. वक्त बीतता रहा. एक साल बाद 7 में से 6 आरोपियों को जमानत मिल गई. आरोपियों के खिलाफ सबूत मजबूत थे. उन्हें सजा का डर था, लिहाजा वे समझौता करना चाहते थे. रीना द्वारा अदालत में बयान बदलने से पूरा केस उलट सकता था. उन की तरफ से दबाव बनाया जाने लगा.

तरहतरह के लालच दिए गए, लेकिन रीना और उसके मातापिता ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. रीना एक असहनीय दर्द से गुजर रही थी. वह रातों को जाग कर रोती थी. उस का दुख कम हो, इसलिए घर वाले उस की गृहस्थी बसा देना चाहते थे. खतौली कस्बे के नजदीक का रहने वाला एक युवक उस का हाथ थामने को तैयार हो गया. फलस्वरूप दोनों का विवाह हो गया.

एक साल तो रीना का ठीक बीता, लेकिन घटना की परछाईं और वक्त ने खुशियों को उस का दुश्मन बना दिया. आरोपियों के पैरोकार रीना की ससुराल तक पहुंच गए. रीना बताती है कि उन्होंने उस के पति को 25 लाख रुपए देने का लालच तक दे डाला. लालच में आ कर पति व ससुराल वालों ने रंग बदल लिया और उस से बयान बदलने को कहने लगे.

उन का तर्क था कि अब उस की शादी हो गई है, इसलिए ऐसी सभी बातों को बीता हुआ कल मान कर भूल जाना चाहिए, वरना बदनामी के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा. रीना ससुराल वालों के बदले रवैये पर हैरान थी. आरोपी पैसे देने और माफी मांगने को तैयार थे. लेकिन रीना ने किसी की नहीं मानी.

इस मुद्दे पर परिवार में कलह रहने लगी. कई महीनों तक भी जब उस ने ससुराल वालों की बात नहीं मानी तो उसे फरमान सुना दिया गया कि या तो वह बयान बदल कर आरोपियों को बचाने में मदद करे या फिर रिश्ता खत्म कर ले. रीना समझ चुकी थी कि ससुराल में उस का साथ देने वाला कोई नहीं है. यह शर्मनाक हकीकत भी थी कि एक पति जिस ने उसे उम्र भर साथ निभाने का वचन दिया था, वह इंसाफ की डगर पर उस का साथ देने के बजाय उसे कमजोर कर रहा था.

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रीना ने जितनी जिल्लत झेली, उतनी ही वह मजबूत होती गई. रीना ने भी ठान लिया कि वह दुराचारियों को कभी माफ नहीं करेगी. लिहाजा उस ने किसी अनहोनी की आशंका के भय से ससुराल से ही रिश्ता खत्म करने का फैसला कर लिया. ससुराल छोड़ कर आपसी सहमति से पतिपत्नी दोनों अलग हो गए. इस चर्चित कांड में मुकदमे के विचेनाधिकारी सबइंसपेक्टर अजयपाल गौतम ने विवेचना कर के सबूतों सहित अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. अदालत में मामले की सुनवाई शुरू हुई. रीना ने पूरा घटनाक्रम अदालत में बयान किया.

अभियोजन पक्ष की तरफ से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता कय्यूम अली ने इसे गंभीर अपराध बताया, जबकि बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपियों के कैरियर, उम्र व भविष्य की दलीलें दे कर कम से कम सजा की मांग की. अदालत में आरोपियों द्वारा सुनाई गई शर्मिंदा कर देने वाली वीडियो क्लिप को भी देखा गया. उस से उन की वहशत सामने आ गई. अदालत ने वीडियो को अहम सबूत माना.

आरोप तय होने के बाद आखिर 31 जुलाई को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजेश भारद्वाज ने सातों आरोपियों को दोषी करार दिया और उन्हें भादंवि धारा 376 (जी) में उम्रकैद व 10-10 हजार रुपए जुरमाना व आईटी एक्ट में 3 साल का करावास व 25-25 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. आरोपियों में सोमान को छोड़ कर सभी अविवाहित थे. सजा के बाद जब आरोपियों को जेल ले जाया गया तो वे मुंह छिपाते नजर आए.

अदालत का फैसला आने के बाद रीना कहती है, ‘मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती. हैवानों को कभी माफ नहीं किया जा सकता. सजा से दूसरे वहशियों को सीख मिलेगी, ताकि फिर कोई किसी लड़की के साथ ऐसा न कर सके.’

रीना के मातापिता कहते हैं, ‘हम ने बेटी की अस्मत के सामने समझौता नहीं किया. हमें न्याय की पूरी उम्मीद थी.’ हैवानियत करने वाले शायद अपने गुनाह से बच भी जाते, लेकिन अपराध के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली रीना की हिम्मत वाकई काबिलेतारीफ है. उस की हिम्मत ने ही उन्हें उन के गुनाह की सजा दिलाई.

लव, सैक्स और मर्डर

उस दिन तारीख थी 31 जुलाई, 2017. भोर का समय था. नित्य मौर्निंग वौक करने वाले इक्का- दुक्का लोग सड़कों पर आ गए थे. खेतरपाल मंदिर के सामने से गुजरने वाले मेगा हाईवे पर वाहनों की आवाजाही जारी थी. मेगा हाईवे पर बाईं तरफ सड़क किनारे एक युवा महिला की औंधी लाश पड़ी थी. लाश देख कर एक राहगीर ठिठका और स्थिति को समझ कर मोबाइल से थानापुलिस को इस की सूचना दे दी. अज्ञात लाश की सूचना थानाप्रभारी सीआई विजय सिंह को मिली तो वह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

एक राष्ट्रीय अखबार के प्रतिनिधि नरेश असीजा अखबार वितरण व्यवस्था का जायजा ले कर घर लौट रहे थे. उन्हें लाश मिलने की सूचना मिली तो वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस मृतका की पहचान का प्रयास कर रही थी. नरेश ने उस की पहचान कर दी. बरसों पहले मृतका उन की बिल्डिंग में किराएदार के रूप में रही थी. पत्रकार ने मृतका की पहचान समेस्ता पत्नी श्रवण कुमार के रूप में की. पहचान होने के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

प्रथमदृष्टया यह मामला दुर्घटना का लग रहा था. संभवत: मृतका किसी वाहन की टक्कर से हाईवे पर गिर गई थी, जिस से उस का सिर फट गया था. लेकिन घटनास्थल पर मिले हुए साक्ष्य कुछ और ही कह रहे थे.

जिस जगह पर समेस्ता का शव मिला था, उस के पास मिट्टी में छोटे वाहन के टायरों के निशान दिख रहे थे. समेस्ता के शरीर पर टक्कर का कोई निशान नहीं था. पुलिस को लगा कि मृतका की हत्या कहीं और कर के लाश को यहां फेंक दिया गया है, ताकि मामला सड़क दुर्घटना का लगे.

समेस्ता की मौत का मामला संदिग्ध लग रहा था. बाल की खाल निकालने वाले माने जाने वाले सीआई विजय सिंह मीणा ने इस मामले को एक चैलेंज के रूप में लिया. विजय सिंह ने मामले के खुलासे के लिए एसआई छोटूराम तिवाड़ी, कांस्टेबल सुखदेव सिंह बेनीवाल, रीडर अमर सिंह, लक्ष्मीनारायण, अमनदीप व सुभाष को शामिल कर के एक टीम बना ली.

सुखदेव बेनीवाल का शहर में ही नहीं, देहात क्षेत्र में भी मुखबिरों का सशक्त नेटवर्क था. एसआई छोटूराम व सुखदेव ने मेगा हाईवे पर लगे सीसीटीवी कैमरे खंगालने शुरू कर दिए. अथक प्रयासों के बाद एक हार्डवेयर शौप पर लगे कैमरे में समेस्ता दिखाई दी. वह संभल कर सड़क  पार कर रही थी. कैमरे के इस दृश्य को दोनों पुलिसकर्मियों ने जांच अधिकारी से साझा किया. जांच टीम ने विचारविमर्श के बाद यही निष्कर्ष निकाला कि समेस्ता ने जितनी सावधानी से सड़क पार की थी. ऐसे में वह सड़क हादसे की शिकार नहीं हो सकती थी.

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पुलिस टीम ने जांच आगे बढ़ाने के लिए मेगा हाईवे के 2 किलोमीटर के लंबे दायरे को खंगालना शुरू किया. एक वर्कशाप में लगे कैमरे की फुटेज में एक पिकअप गाड़ी दिखाई दी. 10 मिनट के अंतराल में 3-4 बार आनेजाने से पिकअप संदिग्ध के दायरे में आ गई. एक बार पिकअप एक झाड़ी के पास रुकी तो झाडि़यों में छिपा एक शख्स पिकअप के पास आता दिखाई दिया. यह दृश्य भी कैमरे में कैद हो गया था.

सुखदेव का एक मुखबिर जो समेस्ता के ही मोहल्ले में रहता था, ने भी जांच टीम को एक सुराग दिया. सुराग के मुताबिक समेस्ता और उस के पति की जरा भी नहीं बनती थी. उस का पति श्रवण कुमार सूरतगढ़ में रह कर पढ़ाई कर रहा था. वह कभीकभार अपने 2 बच्चों के लिए रावतसर आ जाता था.

उधर दुर्घटनास्थल पर समेस्ता के शव की पहचान करने वाले पत्रकार नरेश असीजा घटनास्थल से सीधे समेस्ता के घर गए. श्रवण और समेस्ता का सगा भाई कालूराम घर में ही मिले. उन्होंने पूछा, ‘‘अरे श्रवण, समेस्ता दिखाई नहीं दे रही, कहां गई है वह?’’

‘‘अंकल, वह मंदिर गई थी, आती ही होगी.’’ श्रवण ने जवाब दिया.

नरेश असीजा समेस्ता के भाई कालूराम को साथ ले कर सीधे मोर्चरी पहुंचे. कालूराम ने मृतका की पहचान अपनी बहन समेस्ता के रूप में कर दी. कालूराम की तहरीर पर थाने में अज्ञात के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया. श्रवण 4 दिनों से रावतसर में ही था, जबकि कालूराम 2 दिन पहले ही रावतसर आया था.

समेस्ता कौन थी और बेमौत क्यों मारी गई, यह जानने के लिए हमें डेढ़ दशक पीछे लौटना पड़ेगा. समेस्ता श्रीगंगानगर निवासी पृथ्वीराज की बेटी थी. सन 2001 में समेस्ता की शादी हनुमानगढ़ जिले के मसीतावाली गांव निवासी हरलाल टाक के बेटे सीताराम टाक से हुई थी. सीताराम का ममेरा भाई था श्रवण कुमार.

श्रवण कुमार रातवसर तहसील के गांव सरदारपुरा खालसा में रहता था. कानून की पढ़ाई कर रहे श्रवण कुमार के परिवार की माली हालत अच्छी थी. श्रवण एक दिन अपने भाई सीताराम से मिलने बाइक से मसीता वाली आया. उस वक्त सीताराम खेतों पर गया हुआ था. दरवाजा समेस्ता ने खोला.

‘‘जी कहिए.’’ समेस्ता ने पूछा.

‘‘सीताराम भैया से मिलना था, मैं सरदारपुरा से आया हूं. मेरा नाम श्रवण है.’’ जवाब में श्रवण ने बताया.

‘‘आइए बैठिए, आप के भैया खेतों पर गए हैं. आते ही होंगे.’’

श्रवण आंगन में पड़ी कुरसी खिसका कर किचन के सामने ही बैठ गया. सुगठित देह, उभरे वक्षस्थल वाली समेस्ता सुंदर लग रही थी. मीठे बोल और सलीके का उच्चारण करने वाली समेस्ता श्रवण के दिल को छू गई. वह बैठाबैठा समेस्ता के सौंदर्य का रसपान करता रहा. तभी समेस्ता 2 प्यालों में चाय ले कर आ गई. ‘‘लीजिए चाय पीजिए.’’

श्रवण चाय पीने लगा. समेस्ता भी प्याला उठा कर पालाथी मार कर श्रवण के सामने बैठ गई. श्रवण चाय समाप्त करते ही बोल पड़ा, ‘‘भाभीजी, आप ने तो बड़ी गड़बड़ कर दी, यह आप के हाथों का कमाल है या आप की भावनाओं का, मैं आप की चाय का मुरीद हो गया हूं. लगता है, अब चाय पीने हर रोज आना पड़ा करेगा.’’

‘‘मना किस ने किया है देवरजी, मेरा दरवाजा आप के लिए 24 घंटे खुला रहेगा.’’ समेस्ता ने कहा.

समेस्ता से उस का मोबाइल नंबर ले कर श्रवण लौट गया. उस से हुई संक्षिप्त मुलाकात के आगे श्रवण ने भाई से मिलना जरूरी नहीं समझा.

एक साल बीततेबीतते समेस्ता बिलकुल बदल गई. प्यारमोहब्बत तो दूर, वह पति सीताराम की उपेक्षा तक करने लगी. नतीजतन घर में कलह रहने लगी. इस कलह में श्रवण की चाहत और उस की वकालत ने आग में घी का काम किया. शादी के 2 साल बाद ही श्रवण के उकसाने पर समेस्ता ने सीताराम के खिलाफ शारीरिक उत्पीड़न व दहेज मांगने का आरोप लगा कर अदालत में मुकदमा दर्ज करवा दिया. इस के बाद समेस्ता अपने मायके लौट गई.

इन हालात में समेस्ता व श्रवण के बीच पनपे प्यार ने अपनी राह पकड़ ली थी. श्रवण की चाहत पर समेस्ता उस के बुलाए स्थान पर पहुंच जाती थी. सामाजिक व पारिवारिक वर्जनाएं उन दोनों के सरेआम मिलन में बाधक बन रही थीं. आखिर श्रवण और समेस्ता एक दिन अपनेअपने घरों से फुर्र हो गए. जब पास का पैसा खत्म हो गया तो 10 दिन बाद दोनों घर लौट आए. लेकिन दोनों के घर वालों ने उन से नाता तोड़ लिया. इसी बीच अदालत से सीताराम और समेस्ता का विधिवत तलाक हो गया. तब तक समेस्ता एक बच्ची की मां बन गई थी.

समेस्ता व श्रवण अब निरंकुश हो गए थे. दोनों लिव इन रिलेशनशिप में पतिपत्नी की तरह रावतसर में रहने लगे. श्रवण बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर घर का खर्च चला रहा था. इस के साथसाथ वह अपनी वकालत की पढ़ाई भी कर रहा था. इसी बीच समेस्ता एक बेटे की मां और बन गई. दूसरी ओर श्रवण ने एलएलबी तथा एलएलएम की डिग्री हासिल कर ली.

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मात्र सैक्स को जीवन का मूलमंत्र मानने वाले श्रवण और समेस्ता का प्यार अब धीरेधीरे ठंडा पड़ने लगा था. बच्चों की ट्यूशन से होने वाली आय में उस के खर्चे मुश्किल से पूरे होते थे. महंगाई के जमाने में तंगहाली से 2-4 हुए समेस्ता और श्रवण खुदगर्ज बन गए थे. तब सन 2014 में श्रवण समेस्ता को रावतसर में ही छोड़ कर सूरतगढ़ चला गया और वहीं रह कर बैंकिंग सर्विस की कोचिंग लेने लगा.

समेस्ता रावतसर में अपने 2 बच्चों के साथ किराए के एक कमरे में तंगहाली में जीवन गुजार रही थी. बाद में मजबूरी में उस ने विवाह शादियों में बरतन साफ करने का काम शुरू कर दिया, साथ ही दोनों बच्चों का दाखिला स्कूल में करवा दिया.

आर्थिक हालात में मामूली सुधार होते ही उस ने घर में ही खाने के टिफिन तैयार करने का काम शुरू कर दिया, साथ ही अकेले रह रहे 2-3 अधिकारियों और कर्मचारियों के यहां दोनों समय का खाना भी बना आती थी. अब तक समेस्ता 35 साल की हो चुकी थी. हालातों से लड़ने के जज्बे ने उसे शालीन बना दिया था.

बता दें कि सूरतगढ़ में रह रहे श्रवण ने समेस्ता से अभी अपने संबंध खत्म नहीं किए थे. वह 2-4 महीने में चक्कर लगा कर समेस्ता को संभाल जाता था. श्रवण को यह पता चला कि समेस्ता अधिकारियों के घर जा कर खाना बनाती है तो वह बिफर पड़ा. समेस्ता के रहनसहन में आए बदलाव ने उस के मन में शक का जहर पैदा कर दिया.

श्रवण ने एक दिन उस से कह ही दिया, ‘‘समेस्ता, अब तू किसी के घर खाना बनाने नहीं जाएगी. मुझे पता चल गया है कि खाना बनाने की ओट में तू अधिकारियों के यहां गुलछर्रे उड़ाती है.’’

गुस्से में कांपते श्रवण ने गालियों के साथ समेस्ता को चेतावनी दे डाली.

‘‘देख श्रवण, तूने मुझे अकेली छोड़ कर डांटने या कोई बंदिश लगाने का अधिकार खो दिया है. तूने कभी जानने की कोशिश की है कि मैं किन हालात में जी रही हूं. और हां, वैसे भी अगर मैं किसी के साथ मस्ती करती हूं तो तू कौन होता है मुझे रोकने वाला? अगर तूने भविष्य में मुझे टोका तो मैं तुझे काट कर फेंक दूंगी.’’ गुस्से में समेस्ता ने श्रवण को खरीखोटी सुना दी.

समेस्ता के तेवर देख कर श्रवण उलटे पैरों सूरतगढ़ लौट गया. यह बात 4-5 महीने पहले की है.

समेस्ता श्रवण की विवाहिता नहीं थी. फिर भी वह उस पर पाबंदी लगाना चाहता था. चूंकि समेस्ता अपने पैरों पर खड़ी हो कर संभल चुकी थी, इसलिए उस ने श्रवण की उपेक्षा करनी शुरू कर दी. जो भी हो, वह श्रवण के बच्चे की मां तो थी ही, वह नहीं चाहता था कि उस के बच्चे की मां पराए मर्दों की रातें गुलजार करे.

इस सब से श्रवण का दिमाग घूम गया. उस ने जुलाई, 2017 में रावतसर के एकदो चक्कर लगाए. वह घर पहुंचता तो बच्चे बताते कि मां फलां अधिकारी के यहां खाना बनाने गई है. श्रवण समेस्ता से बिना मिले ही लौट जाता. उस के मन में स्वयं को मिटाने या समेस्ता को मार डालने के विचार आने लगे.

वकालत की पढ़ाई वह पूरी कर चुका था. अंत में उस ने समेस्ता को मिटाने का मन बना लिया. वह वकील था और उस की सोच थी कि वह फूलप्रूफ योजना के तहत समेस्ता को ठिकाने लगाएगा, ताकि पुलिस या कानून को उस की करतूत का पता नहीं चल सके.

2 दिनों तक योजना बनाने के बाद श्रवण ने समेस्ता को सड़क दुर्घटना में मारने की योजना बना ली. पर इस योजना को हकीकत में बदलने के लिए उसे एक विश्वसनीय साथी की जरूरत थी. उस ने विचार कर के अपने साथी अमरजीत सिंह को राजदार बनाने का निश्चय किया. अमरजीत सिंह मूलरूप से रायसिंनगर क्षेत्र के चक 38 एनपी का निवासी था. वह सूरतगढ़ में रह कर ट्रांसपोर्ट का काम करता था.

अजरजीत सिंह श्रवण का खास दोस्त था. श्रवण ने अपने मन की बात अमरजीत सिंह को बताई. अमरजीत सिंह जानता था कि श्रवण कानून का अच्छा जानकार है, जो भी योजना बनाएगा, वह फूलप्रूफ होगी. वह श्रवण का साथ देने को तैयार हो गया. वह श्रवण की योजना पर सहमत हो गया. यह बात 26 जुलाई, 2017 की है.

योजना के अनुरूप अमरजीत, जो एक कुशल वाहनचालक था, को किराए की गाड़ी ले कर रावतसर आना था. भोर में समेस्ता जब खेतरपाल मंदिर जाती थी, उसी समय उसे मेगा हाईवे पर गाड़ी चढ़ा कर कुचल डालना था. 27 जुलाई की सुबह श्रवण रावतसर आ गया. अमरजीत भी रात में पिकअप ले कर आ गया.

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अगली सुबह मेगा हाईवे पर निकली समेस्ता इसलिए बच गई, क्योंकि उसी समय जयपुर से आने वाली वीडियो बस खेतरपाल मंदिर बसस्टैंड पर पहुंच गई. अगले 2 दिनों तक अमरजीत रावतसर आता रहा. पर कभी हाईवे पर यात्रियों के आगमन या मौर्निंग वौक वालों के जमघट के कारण योजना सिरे नहीं चढ़ पाई.

30 जुलाई की रात श्रवण समेस्ता व बच्चों के साथ सो गया. सुबह वह भोर से पहले ही उठ कर मेगा हाईवे पर आ गया. भोर में साढ़े 3 बजे अमरजीत सिंह भी पिकअप ले कर आ गया. 4 बजे के आसपास समेस्ता मंदिर जाने के लिए मेगा हाईवे पर पहुंच गई. झाडि़यों में छिपे श्रवण ने उसी क्षण अमरजीत को घंटी मार दी.

सुनसान गली में खड़ी पिकअप का चालक अमरजीत सिंह जल्दी से मेगा हाईवे पर पहुंच गया. सुनसान मेगा हाईवे पर शिकार नजर आते ही अमरजीत ने एक्सीलेटर पर पैर का दबाव बढ़ा दिया. तेजी से आई पिकअप की टक्कर से समेस्ता हवा में उछल कर सड़क पर औंधे मुंह जा गिरी. समेस्ता की खोपड़ी फट गई थी, जिस से उस का ज्यादा तादाद में खून निकल गया और उस ने उसी समय दम तोड़ दिया.

कुछ दूरी जा कर अमरजीत पिकअप ले कर लौट आया. तब तक झाडि़यों से निकल कर श्रवण भी मेगा हाईवे पर आ गया था. अमरजीत ने श्रवण को गाड़ी में बिठाया और उसे मोड़ कर घटनास्थल पर पहुंच गया. दोनों ने गाड़ी से उतर कर समेस्ता का जायजा लिया. निश्चल पड़ी समेस्ता की मौत हो चुकी थी. श्रवण दबे पांव अपने घर पहुंच कर बिस्तर में दुबक गया. जबकि अमरजीत पिकअप ले कर सूरतगढ़ लौट गया.

फूलप्रूफ योजना के तहत समेस्ता को मौत की नींद सुलाने वाले श्रवण व अमरजीत योजना के क्रियान्वयन से खुश थे. दोनों को उम्मीद थी कि उन का जघन्य अपराध कभी भी जगजाहिर नहीं होगा. लेकिन वकालत की पढ़ाई कर चुका श्रवण इस तथ्य से अनजान था कि उन का कृत्य सीसीटीवी कैमरे में रिकौर्ड हो रहा था.

यह एक ऐसा अकाट्य साक्ष्य था जिसे झुठलाया नहीं जा सकता था. इसी कैमरे की फुटेज से श्रवण के कृत्य का भंडाफोड़ हुआ. समेस्ता व श्रवण के बीच बढ़ी दूरियों से श्रवण संदिग्ध बन कर पुलिस रिकौर्ड पर आ चुका था.

समेस्ता के अंतिम संस्कार के बाद श्रवण भूमिगत हो गया था. पर कांस्टेबल सुखदेव बेनीवाल के मुखबिरों के नेटवर्क के आगे वह बौना साबित हुआ. 10 अगस्त को पुलिस ने श्रवण को अमरजीत के साथ गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में दोनों ने षडयंत्रपूर्वक समेस्ता को मार देने का अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

रावतसर के सीजेजेएम रविकांत सोनी की अदालत ने पुलिस की मांग पर दोनों हत्यारोपियों का 4 दिनों का पुलिस रिमांड दे दिया. पुलिस ने इस केस की प्राथमिकी में भादंवि की धारा 302, 120बी और जोड़ दी. इस अवधि में आरोपी अमरजीत सिंह ने वारदात में प्रयुक्त पिकअप गाड़ी पुलिस को बरामद करवा दी. पूछताछ में पता चला कि अमरजीत का आपराधिक रिकौर्ड रहा है. पूर्व में भी उस के खिलाफ हत्या के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ था. लेकिन अदालत ने सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया था.

16 अगस्त, 2017 को पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. वकालत की पढ़ाई कर चुके नासमझ श्रवण ने समेस्ता को मिटा कर अपना और अमरजीत सिंह का भविष्य तो अंधकारमय बना ही दिया, समेस्ता के दोनों बच्चे भी बेसहारा हो गए.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

वाह उपराष्ट्रपति जी, गुड़ खाएं और गुलगुलों से परहेज करें

न तो बीफ खाना गलत है, न चुंबन लेना गुनाह. यकीन नहीं होता कि यह सचबयानी देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की है जिन्होंने ये कर्णप्रिय उद्गार मुंबई के आर ए पोद्दार कालेज औफ कौमर्स ऐंड इकोनौमिक्स के प्लैटिनम जुबली समारोह में व्यक्त किए. चूंकि ये दोनों ही बातें हिंदुत्व के सिद्धांतों व संस्कारों से मेल खाती नहीं हैं, शायद इसलिए बीफ और किसप्रेमियों को अभयदान देने के लिए उन्होंने शर्त यह जड़ दी कि ये दोनों काम फैस्टिवल मना कर यानी समारोहपूर्वक न किए जाएं.

गुड़ खाएं गुलगुलों से परहेज करें, के साथसाथ यह कहावत भी सहसा याद हो आई कि ऊंट की चोरी नोहरेनोहरे (घुटनों के बल) नहीं होती. वेंकैया नायडू बेहतर जानते हैं कि देश में हर काम समारोहपूर्वक करना धर्म और तीजत्योहारों की देन है. पूजापाठ व यज्ञहवन वगैरा लोग सामूहिक रूप से करते हैं तो इन दो इच्छाओं को चोरी से पूरी करने का मशवरा क्यों?

चर्चा गुणदोषों पर होती तो अच्छा होता

जिंदगी और मौत पर किसी का बस नहीं है. यह पुरानी कहावत है. पर मौत को भुनाना तो अपने बस में है ही न? फिल्मी तारिका श्रीदेवी की सिर्फ 54 साल की उम्र में दुबई के एक होटल के कमरे में बाथटब में हुई मौत ने घंटों टीवी चैनलों को और कई दिनों तक समाचारपत्रों में सुर्खियों को चमकाने का मौका दे डाला. उन की मौत पर इस तरह की आलतूफालतू बातें हुईं मानो देश में कोई भूचाल आ गया हो.

श्रीदेवी की मौत चाहे हादसा थी, प्राकृतिक थी या फिर सुनियोजित, एक व्यक्तिगत मामले से ज्यादा नहीं थी. बोनी कपूर व श्रीदेवी कपूर में अगर अनबन थी भी और उस की मृत्यु में कोई रहस्य छिपा हुआ भी था तो भी इस बात को इतना तूल देने की जरूरत न थी. यह एक खाली बैठे समाज की पहचान है, जिसे दूसरों के गमों और गलतियों में मजा आता है ताकि वह अपने गम भुला सके.

श्रीदेवी मौत के समय एक रिटायर्ड ऐक्ट्रैस थीं. 12 साल बाद घरगृहस्थी के चक्कर से निकल कर श्रीदेवी ने ‘इंग्लिशविंग्लिश’ व ‘मौम’ फिल्मों में बेहतरीन काम किया पर फिर भी वे अपनी पुरानी जगह न ले पाईं. वे न मृत्यु के समय मर्लिन मुनरो थीं और न मधुबाला.

श्रीदेवी ने बहुत सी अच्छी फिल्मों में काम किया पर उन की कम ही फिल्मों ने कोई सामाजिक असर छोड़ा. आखिरी 2 फिल्मों में मांओं और पत्नियों के रोल में वे प्रेमिकाओं और नर्तकियों से अच्छा प्रभाव दिखा सकीं. दोनों फिल्में सामाजिक मामलों पर थीं और मां को अपने विशिष्ठ स्थान दिखाने वाली थीं. उन का प्रभाव था पर ‘चांदनी’, ‘सदमा’, ‘मिस्टर एक्स’ में उन के रोल अच्छे होते हुए भी वे लंबा प्रभाव न छोड़ पाईं. ‘लमहे’ का विषय जरूर चौंकाने वाला था और आशा थी कि उसे दूसरी फिल्मों से ज्यादा सफलता मिलेगी पर उस फिल्म को भारतीय दर्शक पचा न पाए. अपनी मां के प्रेमी से प्रेम करना लोगों को इंसैस्ट की तरह लगा था.

एक अभिनेत्री की मृत्यु उस के काम की समीक्षा करने का एक और मौका होता है और जो चर्चा कई दिनों तक होती रही वह फिल्मों, व्यक्तित्त्व, गुणदोषों पर होनी चाहिए थी पर होती इस बात पर रही कि मौत कैसे हुई?

कोई नकली बाथटब को दिखा रहा है, कोई शराब की बात कर रहा है तो कोई और ऊंची उड़ान उड़ रहा है. फिल्मी तारिका की इतनी चीरफाड़ की गई जितनी शायद पोस्टमार्टम में भी न की गई होगी.

बेहद प्रसिद्ध तारिकाओं के गुजरने के बाद एक जनून सा छाता है और वह स्वाभाविक है पर उसे संयम से देखा जाना चाहिए, गपोड़ी किस्सों के लिए अवसर नहीं.

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