व्हाट्सऐप का डिलीट हुआ डाटा वापस से मिल जाए तो कितना अच्छा हो. आप भी कभी अभी ऐसा महसूस करते होंगे नहीं…तो अब परेशान मत होइये क्योंकि ऐसा हो गया है, जी हां, व्हाट्सऐप अब अपने यूजर्स के लिए नया फीचर लेकर आया है जिसकी मदद से आप डिलीट किए गए फोटो, वीडियो और मैसेज वापस से डाउनलोड कर पाएंगे. हालांकि आप इसके जरिए केवल मीडिया फाइल ही डाउनलोड कर सकेंगे, टेक्स्ट मैसेज नहीं.
बता दें कि इससे पहले भी कंपनी व्हाट्सऐप ऐप पर शेयर किए गए फोटो, GIFs, वीडियो, डौक्यूमेंट, औडियो क्लिप आदि को अपने सर्वर पर 3० दिनों तक स्टोर करके रखता था, लेकिन कुछ दिन पहले व्हाट्सऐप ने ऐसा करना बंद कर दिया था, वहीं अब कंपनी ने एक बार फिर से सर्वर पर डाटा को स्टोर करना शुरू कर दिया है.
कैसे डाउनलोड करें डिलीट हुए डाटा?
WhatsApp के एंड्रायड ऐप के 2.18.113 पर यह फीचर आ गया है. वहीं iOS यूजर्स को अभी इंतजार करना पड़ेगा. अगर आप भी डिलीट हुए फोटो, वीडियो और औडियो फाइल को फिर से डाउनलोड करना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे पहले अपने ऐप को अपडेट करें.
इसके बाद उस चैट में जाएं जिसमें से आप मीडिया फाइल को डाउनलोड करना चाहते हैं. यहां पर यूजर्स के नाम पर टैप करें. अब आपके ठीक नीचे Media लिखा मिलेगा, उसमें से जिस फाइल को डाउनलोड करना है, उस पर क्लिक करें और डाउनलोड का विकल्प द्वारा फाइल डाउनलोड कर लें. उदाहरण के लिए- मान लीजिए कि आपके दोस्त का नाम दिनेश है. आप दिनेश की चैट में से डिलीट किए गए फोटो और वीडियो डाउनलोड करना चाहते हैं तो इसके लिए दिनेश के चैट में जाएं और फिर नाम पर टैप करें. अब आपको नाम के ठीक नीचे मीडिया फाइल्स दिख जाएंगी. यहां से जो भी फाइल चाहिए उसे डाउनलोड कर लें. बता दें कि आप 2 महीने पहले डिलीट किए गए डाटा को भी डाउनलोड कर सकेंगे.
VIDEO : नेल आर्ट
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मैदान पर हेलिकौप्टर शौट के लिए महेंद्र सिंह धोनी के लिए आईपीएल 2018 की शुरुआत फिर से शानदार रही है. उनकी टीम ने अपने पहले दो मुकाबले जीत लिए हैं. वैसे भी आईपीएल के इतिहास में वह सबसे कामयाब कप्तान हैं. उनकी टीम दो साल के बैन के बाद आईपीएल में लौटी है. इस बार भी उनकी टीम शानदार प्रदर्शन दिखा रही है. ये तो हम सभी जानते हैं कि क्रिकेट के अलावा भी धोनी दूसरे खेलों में रुचि रखते हैं.
आईपीएल के इतर उन्होंने अपने फैंस को दूसरा रूप दिखाया. टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने अपने औफिशियल ट्विटर अकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया. इसमें वह एक शूटिंग रेंज में निशाने साधते दिख रहे हैं. वीडियो पोस्ट करते हुए महेंद्र सिंह धोनी ने लिखा… एड की शूटिंग करने के मुकाबले गन से शूटिंग करना ज्यादा मजेदार है.
30 सेकंड के इस वीडियो में धोनी ने 15 फायर किए हैं और इनमें से कुछ फायर निशाने पर जाकर भी लगे हैं. 15 अप्रैल को धोनी की टीम चेन्नई का मैच पंजाब की टीम से है. मजेदार बात ये है कि अब तक चेन्नई की टीम में धोनी की कप्तानी में खेलते रहे आर अश्विन की टीम से उनका मुकाबला होगा.
शूटिंग के अलावा धोनी फुटबौल जैसे गेम्स भी अक्सर खेलते हुए दिखाई देते हैं. धोनी को अक्सर ऐसे साहसिक कारनामे करते देखा जाता है. घुड़सवारी से लेकर धोनी के बाइक प्रेम के बारे में तो हर कोई जानता ही है. भारतीय सेना ने धोनी को लेफ्टिनेंट कर्नल की उपाधि से नवाजा है. अभी हाल में उन्हें जब पद्मभूषण से सम्मानित किया गया तो धोनी ने सेना की ड्रेस में ही ये सम्मान लिया था.
VIDEO : नेल आर्ट
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महंगाई के दौर में अपने घर की तलाश कर रहे लोगों के लिए अच्छा मौका है. सिर्फ 5-7 लाख रुपए में बढ़िया फ्लैट आप अपने नाम कर सकते हैं. देश के कई शहरों में आपके लिए मौके बन रहे हैं. फ्लैट खरीदने का मन बना रहे लोगों के लिए यह बिल्कुल सही वक्त है. हालांकि, इतनी कम कीमत पर मिलने वाले फ्लैट को लेकर आपके मन में कई सवाल उठ रहे होंगे, लेकिन यह सच है. फ्लैट किसी छोटे शहर नहीं बल्कि बड़े शहरों में बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. इसमें गड़बड़ी या धोखा होने की संभावनाएं भी कम हैं, क्योंकि सरकार इस स्कीम पर नजर बनाए हुए है. सरकार और बिल्डर की स्कीम क्या है और इस स्कीम का फायदा कैसे उठा सकते हैं. आइये जानते हैं.
कहां मिल रहे सस्ते फ्लैट
सिर्फ 5 से 7 लाख रुपए में फ्लैट खरीदने की बात सुनकर हैरानी होती है. लेकिन, फ्लैट लेना हैं तो आपको दिल्ली के आसपास शहरों यानी एनसीआर के गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद, ग्रेटर नोएडा, सोनीपत, राजस्थान के अलवर, बहादुरगढ़, मेरठ जैसे शहरों में इस तरह के औफर हैं.
रहेजा, गोदरेज जैसे बिल्डर दे रहे मौका
सस्ते फ्लैट औफर करने वाले कोई छोटे बिल्डर नहीं बल्कि नामी-गिरामी बिल्डर्स हैं. रहेजा से लेकर गोदरेज के प्रोजेक्ट में फ्लैट आप अपने नाम कर सकते हैं. गुड़गांव के सेक्टर 109 में रहेजा अर्थवा प्रोजेक्ट के तहत करीब 6.4 लाख रुपए में फ्लैट मिल रहा है. इसके अलावा, सेक्टर 67A गुड़गांव में इरिओ डेवलपर्स 6 लाख रुपए में फ्लैट औफर किया है. गुड़गांव के ही सेक्टर 104 में गोदरेज समिट सोसायटी में 5.5 लाख रुपए में फ्लैट बिक रहा है.
ग्रेटर नोएडा में भी मिलेगा सस्ता फ्लैट
गेटर नोएडा के सेक्टर एमयू 2 में बीएचएस 16 स्कीम के तहत 7 लाख रुपए में फ्लैट मिल रहा है. यमुना एक्सप्रेस वे डेवलपमेंट अथॉरिटी के अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम के तहत यमुना एक्सप्रेस-वे से सटी सोसायटी में 7 लाख रुपए का फ्लैट मिल रहा है. इनके अलावा भी आप अपने शहर में 5 से 7 लाख रुपए की कीमत के फ्लैट तलाश सकते हैं.
क्या है सस्ते घर की स्कीम?
केंद्र और राज्य सरकार लगभग हर बड़े शहर में अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स बना रही हैं. इसका मकसद लोगों को सस्ते में घर मुहैया कराना है. स्कीम के तहत सरकार उन बिल्डर्स को इन्सेंटिव देती है, जो सस्ते घर बनाते हैं. हर फ्लैट के लिए 1.5 लाख रुपए तक की ग्रांट भी दी जाती है. स्कीम के तहत बिल्डर्स ने ईडब्ल्यूएस फ्लैट की कीमत 5 से 7 लाख रुपए रखी है.
किन बातों का रखें ख्याल?
फ्लैट्स की बुकिंग कराने से पहले कुछ बातें जानना जरूरी है. फ्लैट लेने से पहले बिल्डर्स का रियल एस्टेट रेग्युलेशन एक्ट (रेरा) के तहत रजिस्ट्रेशन है या नहीं. बिल्डर को राज्य की अफोर्डेबल हाउसिंग पौलिसी के तहत सर्टिफिकेट मिला हुआ है या नहीं. बिल्डर के प्रोजेक्ट की पूरी पड़ताल जरूर करें. बिल्डर के पजेशन टाइम को रेरा को पजेशन टाइम से मैच जरूर करें. अगर यह दोनों अलग हैं तो इसके लिए आप पूछ सकते हैं. साथ ही रेरा में भी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं.
फ्लैट लेने के लिए क्या है शर्त?
अगर आप इस स्कीम के तहत फ्लैट लेना चाहते हैं तो आपकी इनकम सालाना 3 लाख रुपए होनी चाहिए. इसके लिए आपको इनकम प्रूफ और एफिडेविट देना होगा. तब ही आप इस स्कीम के तहत बन रहे फ्लैट्स के लिए अप्लाई कर सकते हैं. हालांकि, कुछ राज्यों में बिल्डर्स को यह अधिकार दिया गया है कि वह एक तय सीमा के बाद ईडब्ल्यूएस वर्ग के अलावा भी सामान्य वर्ग को फ्लैट्स बेच सकते हैं.
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BHIM ऐप को लौन्च किए हुए एक साल हो गया है, भीम ऐप को पिछले साल डा. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर लौन्च किया गया था. इस बार इसका इस्तेमाल करने वाले यूजर्स के लिए सरकार ने खास औफर पेश कर दिया है. भीम ऐप के कैशबैक औफर में ग्राहकों को एक महीने में 750 रुपए तक का कैशबैक मिलेगा. वहीं व्यापारियों को एक महीने में 1,000 रुपए तक का कैशबैक मिल सकता है.
नए यूजर्स को पहले ही ट्रांजेक्शन पर 51 रुपए का कैशबैक मिलेगा. ट्रांजेक्शन न्यूनतम कितने रुपए का हो, यह तय नहीं है. यानी 1 रुपए के ट्रांजेक्शन पर भी 51 रुपए का कैशबैक मिलेगा. भारत इंटरफेस फौर मनी (भीम) को भारत सरकार का नेशनल पेमेंट्स कौरपोरेशन औफ इंडिया चलाता है.
यह दो एमबी की ऐप है. कुछ सेकंड में ही ऐप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है. भीम ऐप इस्तेमाल करने के लिए बैंक अकाउंट का मोबाइल नंबर से जुड़ा होना जरूरी है. इसके बाद पहली बार इसे एक्टिवेट करने के लिए ये जरूरी है कि आपके पास आपका डेबिट कार्ड मौजूद हो. ऐप डाउनलोड करते ही आपको 4 डिजिट का एक पासवर्ड बनाना पड़ता है. उसके बाद डेबिट कार्ड पर दी गई जानकारी डालनी होगी. भीम ऐप को हिंदी और अंग्रेजी के अलावा तमाम भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है.
पेमेंट एड्रेस क्या है : पेमेंट एड्रेस किसी भी बैंक खाता धारक की अगल पहचान का प्रमाण है. उदाहरण के लिए इसका लेआउट “abc@upi” इस प्रकार होता है. इसी एड्रेस को शेयर कर आप पेमेंट ले सकते हैं जिसके लिए आपको बैंक खाते का नंबर या IFSC कोड देने की जरूरत नहीं. वहीं इसी एड्रेस पर आप किसी को पैसे भेज भी सकते हैं.
UPI क्या होता है : Unified Payment Interface(UPI) एनपीसीआई द्वारा बनाया गया एक इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम प्लैटफौर्म है. दरअसल इसी के जरिए दो पार्टियों के बीच पैसे का तुंरत लेनदेन हो पाता.
क्या कई बैंक खातों को भीम ऐप से लिंक किया जा सकता है : अभी आप भीम ऐप से सिर्फ किसी एक बैंक खाते को ही जोड़ सकते हैं. वहीं अगर आप दूसरे अकाउंट का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो मेन मेन्यू में जाकर सेटिंग्स चेंज कर सकते हैं. आपको अपना डिफौल्ट अकाउंट सिलेक्ट करना होगा.
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‘‘आशिकी 2’’ जैसी सफल फिल्म के निर्देशिक मोहित सूरी के सितारे अभी भी गर्दिश में हैं. मोहित सूरी पिछले दो वर्ष से दो फिल्में शुरू करने के लिए बेताब हैं, मगर उनकी यह दोनों फिल्में शुरू नहीं हो पा रही हैं. मजेदार बात यह है कि मोहित सूरी फिल्म ‘आशिकी 2’ के ही अभिनेता आदित्य राय कपूर के संग पिछले आठ माह से एक फिल्म पर काम कर रहे हैं. मगर यह फिल्म भी शुरू नहीं हो पा रही है.
इसकी मूल वजह यह है कि इस फिल्म में आदित्य राय कपूर के साथ कोई भी हीरोईन काम करन को तैयार नहीं है. बड़ी मुश्किल से मोहित सूरी ने इस फिल्म को आदित्य राय कपूर के साथ दिशा पाटनी व सनी सिंह को लेकर शुरू करना चाहा, तो अब आदित्य राय कपूर ने इस फिल्म में काम करने से मना कर दिया है.
वास्तव में मोहित सूरी की इस फिल्म में दो हीरो हैं. आदित्य राय कपूर नहीं चाहते हैं कि महज एक फिल्म ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’ कर चुके सनी सिंह उनके साथ इस फिल्म में सेकंड हीरो बनें. इतना ही नही आदित्य राय कपूर, दिशा पाटनी के साथ भी फिल्म नही करना चाहते हैं. आदित्य राय कपूर ने मोहित सूरी के सामने शर्त रख दी है कि जब वह किसी ए ग्रेड की अभिनेत्री को हीरोईन लेंगे, तभी वह इस फिल्म से जुड़ेंगे.
सूत्रो के अनुसार आदित्य राय कपूर के साथ कोई भी सफल अभिनेत्री काम नही करना चाहती है. क्योंकि 2014 में प्रदर्शित असफल फिल्म ‘‘दावत ए इश्क’’ के बाद आदित्य राय कपूर की ‘फितूर’, ‘डिअर जिंदगी’, ‘ओ के जानू’, ‘वेलकम टू न्यूयार्क’ सहित सभी फिल्में लगातार बौक्स आफिस पर धराशाही होती रही हैं. अब कोई भी अभिनेत्री उनके जैसे असफल कलाकार के साथ काम नही करना चाहती.
उधर मोहित सूरी के अति नजदीकी सूत्रों का दावा है कि आदित्य राय कपूर द्वारा इस फिल्म से अलग होने के बाद अब मोहित सूरी नए कलाकारों के साथ इस फिल्म को शुरू करने के बारे में विचार कर रहे हैं.
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उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के भोलानगर की रहने वाली सकीना का बेटा जब सरकारी राशन की दुकान पर गया तो कोटेदार ने उस से कहा कि जब तक कार्डधारक सकीना नहीं आएगी और यहां पर बायोमीट्रिक मशीन में उस की उंगली का निशान नहीं लगेगा तब तब राशन नहीं मिलेगा.
सकीना की तबीयत ठीक नहीं थी. भूख से तड़पती मां को बेटा राशन की दुकान तक नहीं ला सका तो उसे राशन नहीं मिला.
बेटे को कई महीने से राशन नहीं दिया जा रहा था क्योंकि उस की मां का राशनकार्ड उंगली के निशान के साथ आधार कार्ड से लिंक नहीं हो पाया था. ऐसे में बीमार सकीना को किसी न किसी तरह से राशन की दुकान पर जाना होता है.
यह बात केवल सकीना की नहीं है, बल्कि गांवदेहात में तमाम ऐसी औरतें और मर्द हैं जो राशन लेने खुद राशन की दुकान तक नहीं जा पाते हैं. ऐसे में उन को राशन नहीं मिल पाता.
राशनकार्ड घर के मुखिया के नाम पर ही बनता है. ज्यादातर घरों के मुखिया बूढ़े होते हैं. वे ज्यादातर बीमार भी रहते हैं, चलनेफिरने में लाचार होते हैं. कई बार तो उन की उंगलियों की चमड़ी इतनी खराब हो जाती है कि बायोमीट्रिक मशीन तक में फिंगर प्रिंट मैच नहीं करते हैं. ऐसे में आधार कार्ड और बायोमीट्रिक मशीन उन के लिए मुसीबत बन गई है.
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और कुछ पहाड़ी इलाकों में यह परेशानी ज्यादा है. यहां राशन की दुकानें दूर हैं. रास्ता अच्छा नहीं होता. ऐसे में बीमार बूढ़े आदमी को ले कर राशन लेने जाना आसान नहीं होता है. अगर किसी और वजह से भी बायोमीट्रिक मशीन में फिंगर प्रिंट मैच नहीं होता तब भी राशन नहीं मिलता है.
सरकार ने यह आदेश जारी कर दिया है कि बिना आधार कार्ड से लिंक वाले राशनकार्ड के धारक को राशन नहीं मिलेगा.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शहरी इलाके में राशन की 682 दुकानें हैं और गांवदेहात के इलाकों में राशन की 525 दुकानें हैं. इन दुकानों में तकरीबन 7 लाख, 50 हजार लोगों को राशन दिया जाता है. 2 रुपए प्रति किलोग्राम गेहूं व 3 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बाकी चीजें दी जाती हैं.
एक सरकारी आदेश के मुताबिक, राशनकार्ड में दर्ज हर सदस्य के नाम के साथ आधार कार्ड लिंक होना जरूरी है. अगर किसी सदस्य का नाम आधार कार्ड से लिंक नहीं है तो उस कार्ड पर राशन नहीं मिलेगा. सरकार ने अप्रैल महीने से पहले इस काम को पूरा करने का टारगेट रखा है.
इस टारगेट को तय समय में पूरा कर लिया जाएगा, ऐसा मुश्किल लगता है. गरीब और गांव में रहने वाली जनता को इस की ज्यादा जानकारी नहीं है. आधार कार्ड को लिंक कराने और बाद में बायोमीट्रिक मशीन को चलाने के लिए साधन नहीं हैं. इंटरनैट की स्पीड का बुरा हाल है. बहुत सी जगहों पर बिजली की समस्या है.
सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन को पारदर्शी बनाने के लिए यह फैसला लिया जा रहा है जिस के तहत 1 अप्रैल, 2018 से बिना आधार कार्ड से लिंक वाले राशनकार्ड के धारक को राशन नहीं मिलेगा.
तेजी में सरकार
एक तरफ आधार योजना की वैधता को ले कर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता में 5 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकार आधार कार्ड को ले कर तेजी में है. वह स्कूल में बच्चों के दाखिले से ले कर खाने के लिए राशन तक में आधार कार्ड को जरूरी बनाती जा रही है. सरकार को अदालत के फैसले तक का इंतजार नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट के वकील श्याम दीवान ने कहा कि सरकार आधार कार्ड से चाबी अपने हाथ में ले रही है. इस से सिविल डैथ के हालात बनेंगे. बुनियादी सुविधाओं को आधार कार्ड से लिंक किया गया है. बिना इस के कोई समाज में नहीं रह सकता है. यह लोगों की निजता को खत्म कर रहा है. क्या भारत का संविधान इस बात की इजाजत देता है कि लोगों की हर गतिविधि रिकौर्ड पर हो?
इनकम टैक्स रिटर्न भरने के लिए आधार कार्ड को जरूरी बनाया गया है. मोबाइल फोन को आधार कार्ड से लिंक करना जरूरी है. इसी तरह से बैंक खाता खोलने, बीमा पौलिसी लेने, म्यूचुअल फंड जैसी बचत योजनाओं के लिए आधार कार्ड को जरूरी बना दिया गया है.
देश में अभी भी बहुत सारे लोग, जिन में मजदूर, कामगार खास हैं, के आधार कार्ड नहीं बने हैं. आधार कार्ड में फिंगर प्रिंट को ले कर भी कई परेशानियां सामने आ रही हैं.
आधार कार्ड बनाने वाली संस्था यूआईडीएआई द्वारा आधार कार्ड के लिए सभी लोगों की दसों उंगलियों के फिंगर प्रिंट समेत तमाम डेटा लिया जाता है. कई बार फिंगर प्रिंट से 100 फ ीसदी मिलान नहीं होता है. ऐसे में लोग अपने जायज हकों से महरूम रह जाते हैं.
परेशानी की बात यह है कि आधार होने के बाद भी सरकार इस को महफूज नहीं रख पा रही है. आधार कार्ड से लिंक होने के बाद भी लोगों को दूसरे सर्टिफिकेट लेने पड़ रहे हैं.
उदाहरण के लिए अगर आप बैंक खाता खुलवाने जा रहे हैं तो आधार कार्ड होने के बाद भी आप को अपने घर के पते का सर्टिफिकेट देना होता है. आधार कार्ड के फिंगर प्रिंट मिलान को ले कर परेशानी वाली बात यह है कि 15 साल तक की उम्र और 60 साल से ज्यादा की उम्र के लोगों के फिंगर प्रिंट मैच नहीं करते हैं. सरकार चाहती है कि 31 मार्च तक हर योजना में आधार लिंक हो जाए जो पूरी तरह से मुमकिन नहीं लग रहा. अदालत में सुनवाई के पूरा होने का सरकार इंतजार नहीं करना चाहती.
झमेला बना आधार कार्ड
वैसे तो आधार कार्ड भारत सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला एक पहचानपत्र है पर सरकार ने जिस तरह से आधार कार्ड का इस्तेमाल हर जगह करना शुरू किया है उस से यह आम नागरिकों के अधिकारों का हनन करता नजर आ रहा है. आधार कार्ड को ले कर सरकार की जबरदस्ती है कि वह बैंक खाते से ले कर राशनकार्ड तक आधार कार्ड को जोड़ रही है.
सरकार का काम जनता को सहूलियत देना है, जबकि आधार कार्ड के जरीए वह जनता के सामने तमाम तरह की मुश्किलें खड़ी करती जा रही है. जनता को यह बताया जा रहा है कि इस से भ्रष्टाचार रुकेगा जिस से महंगाई कम होगी.
आधार कार्ड का सब से अधिक इस्तेमाल रसोई गैस में किया गया. रसोई गैस के आधार कार्ड से लिंक होने का जनता को क्या फायदा मिला?
आधार कार्ड से रसोई गैस के लिंक होने की योजना के बाद अगर रसोई गैस की कालाबाजारी रुक गई होती तो रसोई गैस के दाम कम होने चाहिए थे. रसोई गैस के दामों में किसी भी तरह की कमी नहीं आई है. आज भी गैस सिलैंडरों की कालाबाजारी हो रही है. आधार कार्ड के रसोई गैस कनैक्शन से लिंक होने का क्या फायदा मिला?
कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने आधार को ले कर राजग सरकार पर हमला करते हुए कहा है, ‘‘आधार योजना को ले कर सरकार नागरिकों को कमजोर बनाने में लगी हुई है. आधार सरकार का हथियार बन गया है.’’
पहचानपत्र की मारामारी
आधार कार्ड भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को जारी किया जाने वाला पहचानपत्र है. इस में 12 नंबर की संख्या छपी होती है जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण जारी करता है. यह संख्या भारत में कहीं भी उस शख्स की पहचान और पते का सुबूत होती है.
भारत का रहने वाला हर नागरिक इस कार्ड को बनवा सकता है. इस में हर शख्स केवल एक बार ही अपना नामांकन करा सकता है. यह कार्ड सरकार द्वारा बिना पैसे लिए बनाया जाता है.
कानूनी रूप से आधार कार्ड एक पहचान मात्र है. यह भारत की नागरिकता का प्रमाणपत्र भी नहीं है. इस के बाद भी यह जिस तरह से आधार कार्ड को ले कर सरकार जनता पर दबाव बना रही है, वह जबरदस्ती जैसा है.
मतदाता पहचानपत्र की जगह आधार कार्ड को मान्यता देने का काम खतरनाक है. जनता के पास कई तरह के पहचानपत्र हैं. इन में राशनकार्ड, ड्राइविंग लाइसैंस, केंद्र सरकार के कर्मचारी का परिचयपत्र प्रमुख हैं. अब सरकार आधार कार्ड को पहचानपत्र से भी ऊपर रख रही है.
आधार कार्ड को खास बनाने के लिए सरकार ने उस को रसोई गैस, पैन नंबर, मोबाइल नंबर और बैंक खाता नंबर से जोड़ने का काम किया है. बिना आधार कार्ड के इनकम टैक्स की रिटर्न दाखिल नहीं हो रही है. इस के साथ ही जमीनजायदाद की खरीदफरोख्त में रजिस्ट्री के समय भी आधार कार्ड जरूरी किया जा रहा है.
जायदाद और बैंक से आधार कार्ड के जुड़ने से जनता की डोर सरकार के हाथों में चली जा रही है. इस से एक जंजीर बन रही है. यह जंजीर जनता के लिए ऐसी हथकड़ी बनती जा रही है जिसे वह खुद अपने गले में डालने को मजबूर है.
दरअसल, वोट देने के सिस्टम में सरकार कोई सुधार नहीं करना चाहती. सरकार को पता है कि वोटर कार्ड में सुधार से फर्जी वोटिंग रुक सकती है जो नेताओं के फायदे की बात नहीं है. सरकार सुधार के सारे काम जनता के लिए करना चाहती है. जनता से पाईपाई का हिसाब मांगने वाली सरकार खुद को ऐसी जवाबदेही से मुक्त रखना चाहती है.
निजी जानकारी को खतरा
पहले बैंक खाता, पैन कार्ड को आधार कार्ड से लिंक करने के बाद अब मोबाइल नंबर को आधार नंबर से लिंक किया जाएगा. सरकार ने फरवरी, 2018 तक इस काम को पूरा करने का टारगेट रखा है.
असल में सरकार जनता को यह बता रही है कि मोबाइल फोन के आधार से लिंक होने से फर्जी मोबाइल नंबर बंद हो जाएंगे, जिस से तमाम तरह के अपराध खत्म हो जाएंगे. आधार कार्ड बैंक और पैन नंबर से लिंक है. साथ में खाताधारक की निजी जानकारी उस में है. ऐसे में अपराधियों के लिए बैंक के खाते से पैसा निकालने के लिए मोबाइल फोन पर ओटीपी कोड हासिल करना आसान हो जाएगा, जिस से बैंक से पैसा बहुत आराम से निकल जाएगा और खाताधारक को पता ही नहीं चलेगा.
यही नहीं, किसी साइबर अपराधी को किसी आदमी का केवल आधार नंबर मिल जाए तो वह उस की पूरी निजी जानकारी हासिल कर सकता है.
जनता को आधार कार्ड के फायदा बताने के लिए सरकार कहती है कि आधार कार्ड जिंदगीभर की पहचान है. आधार कार्ड को हर सब्सिडी के लिए जरूरी बना दिया गया है.
यही नहीं, सरकार ने तमाम तरह के कंपीटिशन के लिए फार्म भरने से ले कर मार्कशीट तक में इस को जोड़ा जा रहा है. ट्रेन में टिकट में छूट पाने के लिए आधार का ही सहारा है. अब यह जन्म प्रमाणपत्र से ले कर मृत्यु प्रमाणपत्र तक में जरूरी हो गया है. रिटायर होने वाले मुलाजिमों के लिए पीएफ लेने में यह जरूरी हो गया है. सरकार ने जिस तरह से आधार कार्ड का महिमामंडन किया है उस से यह उपयोगी कम और सिरदर्द ज्यादा बन गया है.
अपराधियों के घेरे में आधार
उत्तर प्रदेश की स्पैशल टास्क फोर्स यानी एसटीएफने कानपुर में ऐसे गिरोह को पकड़ा जो आधार कार्ड बनाने वाली संस्था यूआईडीएआई के सर्वर में सेंधमारी कर के आधार कार्ड बनाता था. इन लोगों ने एक ऐसा सौफ्टवेयर बना लिया था जो इस काम में मदद करता था.
यूआईडीएआई के डिप्टी डायरैक्टर ने इस बात की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी. पुलिस को जांच में पता चला कि यह काम कानपुर की विश्व बैंक कालोनी में रहने वाले सौरभ सिंह और उस के साथियों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है.
विश्व बैंक कालोनी, कानपुर जिले के बर्रा थाना क्षेत्र में आती है. पुलिस ने 9 सितंबर, 2017 को सौरभ को पकड़ा तो उस ने अपने पूरे गिरोह का खुलासा किया, जिस के आधार पर पुलिस ने 10 और लोगों का पकड़ा.
इन में शुभम सिंह, सत्येंद्र, तुलसीराम, कुलदीप, चमन गुप्ता और गुड्डू गोंड शामिल थे. ये लोग कानपुर, फतेहपुर, मैनपुरी, प्रतापगढ़, हरदोई और आजमगढ़ के रहने वाले हैं. ये लोग यूआईडीएआई के बायोमीट्रिक मानकों को बाईपास कर के फर्जी आधार कार्ड बनाने का काम करते थे.
एसटीएफ के आईजी अमिताभ यश ने बताया कि आधार कार्ड बनाने वाले गिरोह के सदस्य बायोमीट्रिक डिवाइस से औथराइज्ड औपरेटर से फिंगर प्रिंट ले लेते थे. उस के बाद बटर पेपर पर लेजर से प्रिंट आउट निकालते थे और क्लोन फिंगर प्रिंट निकालते थे.
इस क्लोन फिंगर प्रिंट का इस्तेमाल कर के आधार कार्ड की वैबसाइड पर लौगइन कर के इनरोलमैंट की प्रक्रिया की जाती थी. जब हैकरों द्वारा क्लोन फिंगर प्रिंट बनाए जाने लगे तो यूआईडीएआई ने फिंगर प्रिंट के साथ ही साथ आईआरआईएस यानी रैटिना स्कैनर को भी प्रोसैस का हिस्सा बना दिया. तब गिरोह ने इस के भी क्लाइंट एप्लीकेशन बना दिए जिस से फिंगर प्रिंट और आईआरआईएस दोनों को बाईपास करने में कामयाबी मिल गई. यह सौफ्टवेयर 5-5 हजार रुपए में बेचा जाने लगा. इस तरह एक औपरेटर की आईडी पर कई मशीनें काम करने लगीं.
इस गिरोह के पास से पुलिस को 11 लैपटौप, 12 मोबाइल फोन, 18 फर्जी आधार कार्ड, 46 फर्जी फिंगर प्रिंट, 2 फिंगर प्रिंट स्कैनर, 2 रैटिना स्कैनर और साथ में आधार कार्ड बनाने वाला दूसरा सामान भी मिला.
यूआईडीएआई से मिली जानकारी के मुताबिक, पूरे देश में तकरीबन 81 लाख आधार कार्ड खत्म किए गए हैं. सरकार जिस आधार कार्ड पर भरोसा कर के देश की हर बीमारी का हल तलाश रही है वही आधार कार्ड इतनी बड़ी तादाद में फर्जी निकल रहे हैं.
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‘कौआ चला हंस की चाल, भूल गया अपनी भी चाल’. यह कहावत उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के इम्तिहानों पर पूरी तरह से खरी उतरती है. खुद को सीबीएससी बोर्ड की तरह बदलने के चक्कर में यह बोर्ड अपनी ही जड़ों से कटता जा रहा है. ऐसे में उस का यह दावा भी खोखला लगता है कि वह इम्तिहान कराने वाला सब से बड़ा शिक्षा बोर्ड है.
केवल सीबीएससी बोर्ड से एक महीना पहले इम्तिहान कराने और उन का नतीजा लाने से हालात नहीं बदलने वाले. असल सुधार तो तब होगा जब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड अपने स्कूलों, इम्तिहानों में पूछे जाने वाले सवालों और पढ़ाने के तौरतरीकों में बदलाव लाएगा. नेताओं के विदेशों में दौरा करने और इम्तिहान दिलाने के अपने सिस्टम का गुणगान करने से हालात नहीं बदलेंगे.
छात्रों का इम्तिहान छोड़ने वाला मुद्दा खुशी की नहीं शर्म की बात है. इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, नहीं तो आने वाले दिनों में इम्तिहान पास करने वाले छात्र भी केवल ‘पकौड़ा कारोबार’ करने के ही लायक ही रहेंगे.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड का दावा है कि वह दुनिया में सब से बड़े इम्तिहान का आयोजन करता है. इस वाहवाही की हकीकत यह है कि दुनिया में यह पहला इम्तिहान होगा जहां पर 10 लाख, 62 हजार, 506 छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार इस को अपनी वाहवाही से जोड़ कर देख रही है. सरकार का कहना है कि इस बार इम्तिहानों में नकल पर रोक लगी तो इस वजह से नकल करने वाले छात्रों ने इम्तिहान छोड़ दिया है. सवाल उठता है कि छात्र नकल करने के लिए मजबूर ही क्यों होते हैं?
उत्तर प्रदेश में सरकारी शिक्षा सिस्टम पूरी तरह से खोखला हो चुका है. प्राइमरी से ले कर 12वीं जमात तक एकजैसा हाल है. बिना पढ़े हुए बच्चों को प्रश्नपत्र का हर सवाल मुश्किल लगता है. ऐसे में वे नकल की तरफ भागने लगते हैं.
हमारे देश में एकजैसा शिक्षा सिस्टम नहीं है. अमीर के लिए बेहतर और गरीब के लिए बदतर शिक्षा सिस्टम है. 12वीं जमात के बाद नौकरी की रेस में दोनों को एकजैसे इम्तिहान और इंटरव्यू से गुजरना पड़ता है, जिस में गरीब शिक्षा सिस्टम में पढ़ने वाला छात्र तरक्की की रेस से बाहर हो जाता है.
देश में कुछ सालों के अंदर ही सीबीएससी यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन और आईसीएसई यानी इंडियन सर्टिफिकेट औफ सैकेंडरी ऐजूकेशन का दबदबा बढ़ा है. केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अलगअलग राज्यों में वहां के शिक्षा बोर्डों की हालत खराब हो चुकी है. उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड से मंजूरी मिले स्कूल लगातार बंद होते जा रहे हैं. उन में पढ़ने वाले बच्चों की तादाद कम होती जा रही है.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे कमजोर घरों के हैं. वे सरकार से मिल रही मदद के लिए इन स्कूलों में पढ़ने आते हैं. सरकार भी चाहती है कि समान शिक्षा ले कर ये बच्चे अमीर बच्चों से मुकाबला न कर पाएं इसलिए यहां सुधार होता नहीं दिखाया जाता है.
उत्तर प्रदेश के पुराने शिक्षा बोर्ड के मुकाबले सीबीएससी और आईसीएसई लोकप्रिय इसलिए हुए हैं, क्योंकि ये प्रतियोगी इम्तिहानों के लैवल को ध्यान में रख कर अपने कोर्स को तैयार कर इम्तिहान कराते हैं.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड में जब ज्यादा से ज्यादा हासिल किए गए अंक 75 फीसदी होते थे तो सीबीएससी में 90 से ज्यादा फीसदी नंबर मिलते थे. पिछले कुछ सालों से उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की लगातार बुराई हो रही है. ऐसे में वहां भी बच्चों को ज्यादा नंबर देने का सिलसिला शुरू हो गया है.
पहले जहां केवल साइंस सब्जैक्ट में ही प्रैक्टिकल होते थे अब हाईस्कूल में हिंदी सब्जैक्ट में 30 नंबर का प्रैक्टिकल होने लगा है. ऐसे में बच्चों को बिना किसी तैयारी के ही ज्यादा नंबर मिलने लगे हैं.
इन सब्जैक्ट के प्रैक्टिकल के लिए बच्चों को केवल सब्जैक्ट से संबंधित फाइल तैयार कर लिखना होता है. पहले से तैयार इस फाइल पर ही हाईस्कूल के बच्चों को 30 में से कम से कम 25 नंबर मिलने लगे हैं. ऐसे में बच्चे अच्छे नंबरों से पास होने लगे हैं. अब उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के छात्र भी 80 फीसदी से ऊपर नंबर पा कर सीबीएससी के बच्चों से मुकाबला करने लगे हैं.
खोखली नींव पर…
उत्तर प्रदेश में हर साल तकरीबन 26 लाख बच्चे हाईस्कूल यानी 10वीं जमात और 14 लाख बच्चे इंटर यानी 12वीं जमात के इम्तिहानों में हिस्सा लेते हैं. इन आंकड़ों को देखें तो साफ है कि 10वीं जमात से 12वीं जमात तक पहुंचने के बीच ही ज्यादातर छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं.
गरीब घरों के ये छात्र 10वीं जमात के बाद मेहनतमजदूरी करने में लग जाते हैं. वे सरकारी मदद के बाद भी अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते हैं.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड ने अपनी खामियों को छिपाने के लिए ‘नकल कारोबार’ को बढ़ाने का काम किया. नेताओं ने भी इसे वोट बैंक से जोड़ दिया.
यह सिलसिला साल 1980 के बाद से धीरेधीरे पनपने लगा जो समय के साथ एक बड़े कारोबार में बदल गया. कल्याण सिंह जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने नकल करने को संज्ञेय अपराध बना दिया था. नकल करने वाले बच्चों को जेल भेज दिया था. उस समय भी यह नहीं सोचा गया था कि बच्चे नकल करते क्यों हैं?
बाद की सरकारों ने इस कानून को खत्म कर बच्चों को जेल जाने से बचाया पर इस से सिस्टम में सुधार नहीं आया. ‘नकल कारोबार’ संगठित हो कर आगे बढ़ने लगा. नकल वाले इम्तिहान कराने के अलग स्कूल खुलने लगे. वहां नकल कराने के नाम पर महंगी फीस वसूल होने लगी. बच्चे ही नहीं उन के मांबाप, शिक्षा विभाग के अफसर, नेता, समाज के लोग सब इस में शामिल हो गए.
उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षा मित्रों की भरती शुरू की. राजनाथ सिंह उस समय उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे. शिक्षा मित्रों की भरती में मैरिट को बेस बनाया गया. मैरिट में वही बच्चे आगे आए जिन्होंने नकल के सहारे ज्यादा नंबर पाए थे.
सरकारी नौकरी में मैरिट को बेस बनाने के बाद नकल कारोबार बहुत तेजी से आगे बढ़ने लगा. अब बिना पढ़े ही बच्चे 75 से 85 फीसदी नंबर पाने लगे. मैरिट में यही बच्चे आगे आ कर नौकरी के दावेदार हो गए.
सरकारी नौकरी में मैरिट का यह खेल आगे भी जारी रहा, जो गले की हड्डी बन गया. शिक्षा मित्रों के रूप में स्कूलों में पढ़ाने वाले टीईटी यानी शिक्षक पात्रता इम्तिहान पास करने में फेल होने लगे.
दिखावा हैं सुधार के कदम
सरकारी स्कूलों में शिक्षा सिस्टम में सुधार के नाम पर सरकार के दावों और उन की हकीकत में बहुत फर्क है. कई बार ऐसे मसले सामने आए जब छात्रों को पढ़ाने वालों का टैस्ट हुआ तो वे ही पूछे गए सवालों के सही जबाव नहीं दे पाए. ऐसे में प्रदेश में शिक्षा सिस्टम की पोल खुलने लगी. प्रदेश में सामूहिक नकल, प्रश्नपत्र का लीक होना, परीक्षा केंद्रों में गलत प्रश्नपत्र पहुंचना, कौपियां ले कर भाग जाना जैसी घटनाएं होने लगीं.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने शिक्षा में सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं उन में सब से पहले इम्तिहानों को सीबीएससी से पहले कराने की वाहवाही लूटने का काम हुआ. 10वीं और 12वीं जमात के जो इम्तिहान हर साल मार्च महीने में होते थे, इस बार फरवरी महीने में ही करा दिए गए. लिहाजा, इस साल बच्चों को पढ़ने का पूरा समय भी नहीं मिला.
साल 2017-18 के शिक्षा सत्र की शुरुआत अप्रैल, 2017 से हुई थी. गांवों में अप्रैलमई महीने में खेतीकिसानी होती है. ज्यादातर मातापिता इस काम में लगे होते हैं. ऐसे में वे अपने बच्चों को समय से स्कूल में दाखिले के लिए नाम नहीं लिखवा पाते.
जुलाई में जब स्कूल खुलते हैं तो बच्चों का दाखिला फिर से शुरू होता है, जो 15 अगस्त तक चलता है. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई 15 अगस्त के बाद ही शुरू होती है.
अगस्त से फरवरी महीने के बीच साल के 6 महीने बच्चों की पढ़ाई के लिए मिले. इस में दशहरा, दीवाली, क्रिसमस और जाड़ों की छुट्टियों समेत शनिवार और रविवार की छुट्टी कोे निकाल दें तो आधा समय ही बचता है.
ऐसे में केवल 90 दिन ही सही तरह से बच्चों को पढ़ाई हो पाई. 11 महीने की पढ़ाई का बोझ 3 महीने में पूरा होगा तो बच्चे नकल के लिए मजबूर हो जाएंगे न?
नाम न छापने की शर्त पर हाईस्कूल के इम्तिहान आयोजित कराने वाले एक प्रिंसिपल ने बताया कि सरकार अपनी वाहवाही के लिए तुगलकी फैसले करती है. 10वीं और 12वीं जमात के बच्चों ने इम्तिहान छोड़ा वह शर्म की बात है. नकल इसलिए होती है क्योंकि शिक्षा में सुधार का फैसला शिक्षाविद नहीं अफसर करते हैं.
कभी यह नहीं सोचा जाता कि उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड के अलावा बाकी इम्तिहानों में नकल क्यों नहीं होती है? सीसीटीवी, बायोमीट्रिक्स अटैंडैंस वगैरह सिस्टम में सुधार का हिस्सा हैं, शिक्षा में सुधार का नहीं.
आज इन स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचरों की अलगअलग परेशानियां हैं. सरकार के हर काम में स्कूल टीचर ही आसानी से मुहैया होते हैं. उन के पास पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम हैं, जिस की वजह से वे पढ़ाने के काम को छोड़ कर दूसरे काम करते हैं.
जो मांबाप अपने बच्चों की पढ़ाईलिखाई के लिए सचेत हैं वे प्राइवेट स्कूल में जाना चाहते हैं. सरकार को शिक्षा और सिस्टम दोनों में सुधार करना होगा केवल सिस्टम सुधारने से कोई हल नहीं निकलेगा.
नहीं होती बेहतर तैयारी
स्कूली इम्तिहानों में छात्रों से जिस तरह से मुश्किल सवाल पूछे जाते हैं टीचर क्लास में उन की तैयारी नहीं कराते. गांवों में पढ़ने वाले बच्चे इतने अमीर नहीं होते हैं कि वे ट्यूशन ले सकें. ऐसे में नकल के भरोसे इम्तिहान देना उन की मजबूरी हो जाती है.
बच्चों को लगता है कि अगर वे अच्छे नंबरों से इम्तिहान पास कर लेंगे तो उन को रोजगार मिल जाएगा, इसलिए वे ऐसे स्कूलों की तलाश में रहते हैं, जहां नकल की सुविधा होती है.
नकल की सुविधा देने के लिए शिक्षा विभाग से ले कर नेता तक जिम्मेदार होते है. ज्यादातर स्कूल ऐसे ही नेताओं के होते हैं जो पार्टी को चंदा देते हैं, अफसरों को घूस देते हैं. इस पैसे को कमाने के लिए वे बच्चों को नकल करा कर पैसे वसूल करते हैं.
उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के हर अफसर को यह पता है कि कहां पर नकल का कारोबार चलता है. साल 2017-18 के शिक्षा सत्र के इम्तिहान के नतीजे अप्रैल महीने में आएंगे. इस साल पास होने वालों की तादाद और उन को मिलने वाले नंबर पिछले सालों के मुकाबले कम होंगे. ऐसे में एक बार फिर से नकल पर चर्चा शुरू होगी.
दरअसल, जब तक शिक्षा सिस्टम में सुधार की बात नहीं होगी तब तक नकल रोकने की बात करना बेमानी है. कोई बच्चा नकल करना सीख कर नहीं आता, हमारी शिक्षा का सिस्टम और पढ़ाई का ढंग उस को नकल करना सिखाता है.
कैसे कैसे सवाल
– हिंदी
‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना कब हुई?
‘आन का मान’ नाटक के कथानक पर प्रकाश डालिए.
‘राजमुकुट’ नाटक की कथा संक्षेप में लिखिए.
उत्तर प्रदेश शिक्षा बोर्ड की 12वीं जमात के इम्तिहान में सामान्य हिंदी के प्रश्नपत्र से ये कुछ सवाल हैं. इन सवालों से इम्तिहान देने वालें को क्या हासिल होगा? सामान्य हिंदी के सलेबस में ऐसे सवाल होने चाहिए जिन से बच्चे को ठीक से हिंदी व्याकरण सिखाई जा सके. उस की हिंदी पढ़ने में दिलचस्पी बढ़ सके.
50 नंबर के प्रश्नपत्र को हल करने के लिए 3 घंटे का समय दिया जाता है. हिंदी के प्रश्नपत्र में पूछे जाने वाले सवाल ही ऐसे होते हैं कि 15 मिनट तो छात्र को समझने में लगते हैं. यह केवल हिंदी के प्रश्नपत्र का हाल नहीं है, हर सब्जैक्ट की यही हाल है. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवाल होते हैं जिन का छात्र के भविष्य से कोई मतलब नहीं होता है.
– राजनीतिशास्त्र
दबाव समूह एवं राजनीतिक दल का एक अंतर लिखिए?
सवैधानिक उपचारों के अधिकारों को समझाएं?
समानता के 2 प्रकार बताएं?
साल 2006 में राजनीतिशास्त्र में पूछे गए इन सवालों से पता चलता है कि इन की क्या उपयोगिता है. प्रश्नपत्रों की बात तो जाने दीजिए ‘दवाब समूह’ क्या है यह आम आदमी भी नहीं बता सकता. हर सब्जैक्ट में ऐसेऐसे सवालों की भरमार होती है. ऐसे सवाल ही बच्चों में नकल को बढ़ावा देने का काम करते हैं.
प्राइमरी स्कूल से ही शुरू हों सुधार
समाजसेवी और ‘मैग्सेसे अवार्ड’ विजेता डाक्टर संदीप पांडेय कहते हैं, ‘‘10वीं और 12वीं जमात के बच्चे नकल इसलिए करते हैं क्योंकि प्राइमरी जमातों से ही उन की पढ़ाई का लैवल बहुत नीचा होता है. सरकारी स्कूलों की हालत खराब है. वहां गरीब घरों के बच्चे पढ़ते हैं इसलिए उन स्कूलों के सुधार में किसी की दिलचस्पी नहीं रह गई है. हालत यह है कि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाले बहुत से टीचर तक अपने बच्चों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते. जब स्कूल टीचर को ही अपने स्कूल पर भरोसा नहीं तो दूसरे लोगों की बात कौन करे.
‘‘कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि सरकारी नौकरी करने वालों के लिए जरूरी नियम बनाया जाए कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं. सरकार ने इस आदेश को दरकिनार कर दिया. जब तक असरदार लोगों का ध्यान इन स्कूलों की तरफ नहीं जाएगा यहां सुधार नहीं होगा.
‘‘सरकार ने शिक्षा अधिकार कानून बना कर प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को पढ़ाने का हक दिया पर इस का सही से पालन नहीं हो रहा है. आज जरूरत इस बात की है कि देश में एकसमान शिक्षा व्यवस्था लागू हो, तभी छात्रों का भला होगा.’’
VIDEO : नेल आर्ट
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लंदन से हमें एडिनबर्ग, स्कौटलैंड के लिए ट्रेन पकड़नी थी. हम चाय व हलके नाश्ते के बाद घर से निकल पड़े. टैक्सी ठीक 8 बजे आ गई. 10 बजे दिन में लंदन क्रिसक्रौस स्टेशन से हम ने ट्रेन पकड़ी. यह 150 मील प्रति घंटे की गति से चल कर अबरडीन तक जाती है. ढाई बजे दोपहर को हमारा गंतव्य एडिनबर्ग आ गया. रास्ते में पड़ने वाली टाइन नदी बाईर्ं ओर पीलेपीले बड़ेबड़े खेत, हरभरे वृक्ष, साथसाथ चलता उत्तरी सागर ट्रेन में हमारी चाय व स्नैक्स का स्वाद दोगुना करते रहे.
ग्रेट ब्रिटेन के उत्तर में स्थित पहाडि़यों से घिरे लगभग 5,78,000 जनसंख्या वाला देश स्कौटलैंड बुद्धि, चेतना और क्रिया का अद्भुत संयोग है. उद्योग, कृषि, झीलों, पहाडि़यों व हरेभरे जंगलों का अकूत सौंदर्य अपने में समेटे हुए स्कौटलैंड ने साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, कवियों, उपन्यासकारों व कलाकारों को जन्म दिया. यहां बेन नेविस सब से ऊंची चोटी है. इस की ऊंचाई 4,406 फुट है. एडिनबर्ग इस की ऐतिहासिक राजधानी है. यातायात के लिए यहां सुंदर सड़कें, रेलमार्ग और मोटर बोट सुलभ हैं. स्कौटलैंड लगभग 400 वर्षों तक फ्रांस, स्पेन जैसे शक्तिशाली देशों के मध्य युद्ध में फंसा रहा, इस के बावजूद यहां के आर्टिस्ट, विद्वान, कवि, साहित्यकार और वैज्ञानिक गरीबी व अभावों के बीच भी अपना प्रभाव छोड़ते हैं.
इस स्थान को रैस्टिंग प्लेस औफ नौवेलिस्ट भी कहते हैं. स्कौटलैंड का नैशनल एनिमल यूनिकौर्न है.
एडिनबर्ग
छठी शताब्दी के किंग एडविन के नाम पर इस नगर का नाम एडिनबर्ग पड़ा. 12वीं शताब्दी से 20वीं शताब्दी तक के किले, महल व सैन्यबल की झलक देता है यह शहर. यहां प्राचीन इमारतें हैं. शहर के दोनों ओर कलात्मक पार्लियामैंट हाउस व अन्य भवन दर्शकों के आकर्षण हैं. होटल पहुंच कर तनिक विश्राम के बाद हम हौपऔन हौपऔफ बस द्वारा एडिनबर्ग की जानकारी लेने चल पड़े. ओल्ड टाउन, नैशनल म्यूजियम, एडिनबर्ग कैसेल, जौर्जियन न्यू टाउन, होलीरूड हाउस पैलेस इत्यादि भी देख सकते हैं.
वापस होटल पहुंच भोजनोपरांत हम ने रात्रिविश्राम किया. सुबह दैनिकक्रिया के बाद जलपान कर टैक्सी से आगे की यात्रा प्रारंभ की. टैक्सी ड्राइवर सज्जन व्यक्ति था. कार चलाने के साथसाथ वह हमें स्कौटलैंड की जानकारी भी दे रहा था. हम इन्वरनैंस शहर की तरफ जा रहे थे. हम नदी पर बने पुल पर चल रहे थे. नदी की बाईं ओर एक नया पुल बन रहा है. पुराने पुल के मार्ग पर हमें सलमान खान की फिल्म ‘किक’ का एक दृश्य याद आ रहा था. उस की शूटिंग यहीं हुई थी.
हरभरे जंगल के बीच से हम गुजर रहे थे, मौसम अत्यंत अनुकूल था. हमारी यात्रा काफी सुखदायी थी. हम ब्रीमर गांव की ओर हाईवे से अलग बढ़ रहे थे. नितांत पतली सड़क, इक्कादुक्का गाडि़यां. एक कार को दूसरी कार को रास्ता देने के लिए आगेपीछे होना पड़ रहा था किंतु अत्यंत शांतिपूर्वक, न कोई हायहाय न कोई किचकिच. हम ड्राइवर के साथ स्कौटलैंड की भाषा व वेशभूषा पर चर्चा करते चल रहे थे. वह इंगलिश के साथसाथ गेलिक भाषा का भी प्रयोग करता रहा. यहां लोगों को अपनी भाषा से बहुत पे्रम है.
स्कौटलैंड का यह गांव साफसुथरा, शांत और स्वादिष्ठ ताजे फलों से भरपूर है. हम ने यहां स्ट्राबेरी खरीदे जोकि बड़े ही स्वादिष्ठ थे. ब्रीमर गांव में हम ने चाय की चुस्कियां लेते हुए वातावरण का आनंद लिया. गांव वालों को अपने रीतिरिवाज व परंपरा पर गर्व है. स्कौटलैंड आतिथ्य सत्कार का विशेष ध्यान रखता है.
वातावरण की शांति और आबोहवा की शुद्धता ने मन को खुश कर दिया. हम ने महसूस किया स्कौटिश लोग समूह में रहना पसंद करते हैं, समूह चाहे छोटा ही क्यों न हो.
इन्हें फुटबौल खेलना और नृत्य व संगीत प्रिय है. गांव के लोग आग के चारों ओर बैठ कर भारतीय समूह की ही तरह अपना मनोरंजन नृत्य व संगीत के साथ करते हैं. फुटबौल इन का राष्ट्रीय स्तर का शौक है. यहां लोग गोल्फ भी काफी खेलते हैं. रगबी (कबड्डी की भांति) यहां का मशहूर खेल है. नाचगाना, शक्तिप्रदर्शन और आर्टक्राप्ट इन के व्यवसाय व मनोरंजन के अंग हैं. मेरी बहू साथ में कुछ स्नैक्स व शुद्ध पेय लाई थी, उन से हमारी स्कौटलैंड की यात्रा व आपस की बातचीत और भी सरस बन गई थी.
स्कौटलैंड में जौ की खेती बहुतायत में होती है. वहां यह आय का प्रमुख स्रोत है. अब क्षुधापूर्ति भी आवश्यक थी, सो, हम दोपहर के भोजन हेतु एक रैस्टोरैंट में गए और स्वादिष्ठ भोजन का आनंद लिया.
अब हम इन्वरनैस के मार्ग पर फिर चल पड़े थे. शाम होने वाली थी. हम अपने गंतव्य पर पहुंचने वाले थे. राह में हमें एक स्थान मिला जिस का नाम पर्थ है. यहां हम एक होटल में ठहरे. कमरे की खिड़की से दिखती नदी व नदी के जल में झिलमिलाती रोशनी मन को मोह रही थी. हम ने थोड़ा विश्राम किया और एक दक्षिण भारतीय रैस्टोरैंट में स्वादिष्ठ भोजन किया. काफी थकान हो गई थी. नींद अच्छी आई. सुंदर सुबह ने हमारा स्वागत किया. सुबह की नित्यक्रिया के बाद हम ने होटल में ही जलपान किया और लौकनैस झील देखने निकल पड़े. झील का पानी पहाडि़यों से निकलता है जो पहले गड्ढों में इकट्ठा होता है और फिर धीरेधीरे झील का रूप ले लेता है. यह झील अधिकतम 900 फुट गहरी, 24 मील लंबी व 1 मील चौड़ी है.
मनोरम स्थल
स्कौटलैंड का सब से रोमांटिक कैसल है- एलन डोनन कैसल. लोग इसे वैवाहिक कार्यक्रम के लिए भी बुक कराते हैं. यहां की सीनिक ब्यूटी अद्भुत है. यहां काफी सारी पहाडि़यां हैं.
यहां की पहाडि़यों की ऊंचाई बहुत अधिक नहीं है, सो पहाडि़यां चढ़ना यहां के लोगों के लिए फन है.
अब हम स्कौटलैंड में प्रकृति के सर्वोत्तम व अद्भुत नजारे देखने वाले थे. दाहिनी ओर झरने और बाईं ओर पहाडि़यां. हम आइल औफ स्काई पहुंचने ही वाले थे. हम स्कौटलैंड के पश्चिम के अंतिम छोर तक पहुंच गए थे. बस, जल ही जल, अथाह महासागर का प्रसार दिख रहा था.
आइल औफ स्काई में अटलांटिक महासागर का वह छोर और प्रवाहित होती तीव्र हवा हमारे वस्त्र व बालों को उड़ा रही थी. यहां तक कि हमारे बाल एरियल की भांति खड़े हो गए थे और ऐसी स्थिति में फोटो खिंचवाने का मोह हम संवरण न कर सके.
हमारे ड्राइवर हमें दिन के भोजन के लिए एक ऐसे स्थान पर ले गया, जहां हमें समुचित आवभगत के साथ स्वादिष्ठ भारतीय भोजन करने का अवसर मिला. यह एक महिला का रैस्टोरैंट था. वह महिला बंगलादेश की थी. हम ने रात के भोजन हेतु यहीं से कुछ स्वादिष्ठ खाना पैक करा लिया. दिनभर की थकान के बाद हम होटल पहुंचे, वहां हम सब ने विश्राम किया, स्वादिष्ठ भोजन के बाद सो गए. सुबह तैयार हो कर हम आगे की यात्रा पर निकल पड़े.
स्कौटलैंड का व्यावसायिक शहर ग्लासगो हमारी यात्रा का अगला लक्ष्य था. लंदन के बाद इसे ब्रिटेन के सैकंड बैस्ट प्लेस के नाम से जाना जाता है हम लौकनैस के बाईं ओर चल पड़े थे. सड़क के बाईं तरफ हरेभरे जंगल थे. दृश्य सुंदर व मनोरम थे. ड्राइवर की कमैंट्री चालू थी. अरे, यह क्या, सड़क के दोनों ओर जंगल. अब हम पोर्ट आगस्टस पहुंच गए थे. यहां एक नहर है जो ‘कोलिडोनियन’ नहर के नाम से जानी जाती है. यह पश्चिम में अटलांटिक महासागर और पूर्व में उत्तरी सागर को जोड़ती है.
अलौकिक सौंदर्य
समुद्र की पहचान देते अटलांटिक महासागर के बैकवाटर में छोटीछोटी मोटरबोट दिखाई दीं. वहां टूटाफूटा एक छोटा सा महल था. उरूक्वार्ट नामक यह महल लौकनैस के पश्चिमी किनारे पर स्थित है. अपनी इस अवस्था में भी यह किला उस समय की वास्तुकला की कहानी बयां करता है.
प्रकृति का सुंदर करिश्मा, हरीतिमा ही हरीतिमा. आश्चर्य होता है कि अंगरेज इतने क्रूर क्यों थे? उन की महत्त्वाकांक्षाएं बड़ी तीव्र थीं जिन्होंने उन से क्याक्या करवा डाला. साम्राज्यवादी नीति ने उन्हें क्रूरतम बना दिया. अब तो वे बड़े सरल व सभ्य लगते हैं. सड़क के दोनों तरफ हरियाली ही हरियाली थी, झील में छोटेछोटे जहाज इस पल को अलौकिक बना रहे थे.
रास्ते में फोर्ट विलियम कसबे को देख कर हम आगे बढ़े. यहां पर सेनानियों की प्रतिमाएं थीं, लोग उन के फोटो ले रहे थे. हम लोग एक शौप में गए. वहां हम ने वूलन मफलर और बहुत सी अन्य वस्तुएं भी लीं लेकिन हमें भारतीय करैंसी के अनुपात में काफी कीमती लग रही थीं. हम ने एक रैस्टोरैंट में खाना खाया. अब हम आगे बढ़े. मौसम बहुत सुहावना था. लगातार वर्षा हो रही थी, सबकुछ अच्छा लग रहा था.
झीलों का नजारा
लौंक लोमंड झील काफी सुंदर व लंबी दिख रही थी. लौकनैस के बाद यह झील दूसरे स्थान पर है. वहां गाय की नाक जैसी मछलियां देखने का मौका मिला. बच्चों ने खूब दौड़ लगाई. थोड़ीथोड़ी धूप भी निकल आई थी. कुछ ही देर में मौसम का तेवर बदलने लगा था. हलकीहलकी बूंदें पड़ने लगी थीं.
हम कौफी शौप की ओर चल पड़े. ऐसे मौसम में कौफी पीना अच्छा लगा. कौफी शौप से झील का दृश्य अद्भुत लग रहा था. मोटरबोट से झील का भ्रमण अत्यंत आनंददायी रहा. शार्क मछली का खेल, उन्हें देखना, कुछ खिलाने का साहस कर पाना, उस से मिला आनंद अतुलनीय होता है.
कहीं पहाडि़यां, कहीं जंगल. कभी वर्षा होती, कभी थम जाती. बच्चों के साथ काफी आनंद आता था. लगभग 5 बजे शाम हम ग्लासगो पहुंच गए. क्लाइड नदी के किनारे बसा यह शहर छठी शताब्दी में धार्मिक समुदाय के रूप में था. 12वीं शताब्दी में इस ने व्यावसायिक शहर का रूप ग्रहण किया. लगभग 5 लाख की आबादी वाले इस शहर में वर्ष 2014 में कौमनवैल्थ गेम्स हुए.
औद्योगिक परंपरा से जुड़ा यह शहर स्कौटलैंड का सब से सुंदर शहर है. यहां का आर्किटैक्चर अद्भुत है. कौटन मिल्स, आइरन वर्क्स, शिप बिल्डिंग, लोनार्कशायर कोल के क्षेत्र में भी यह संपन्न है. यह आर्ट गैलरी और विज्ञान के क्षेत्र में भी संपन्न है.
यहां बहुमंजिली इमारतें हैं. 18वीं शताब्दी में स्थापित विक्टोरियन जौर्ज स्क्वायर तथा 19वीं शताब्दी की व्यावसायिक समृद्धि को दर्शाती इमारतें, रैस्टोरैंट्स, व्यस्ततम वीकैंड मार्केट्स, दक्षिण की ओर ग्लासगो विश्वविद्यालय व अन्य दर्शनीय स्थल हैं. पूरे शहर का भ्रमण हेतु अंडरग्राउंड ट्रेनें, बस तथा ट्राम चलती हैं.
हम ग्लासगो के लिए निकल पड़े. हम उस स्थान पर पहुंचे जो कैथेड्रल एरिया कहलाता है जहां से वस्तुत: ग्लासगो शुरू होता है.
प्रसिद्ध स्थल
हम जौर्ज स्क्वायर पहुंचे, यह एक सुंदर पार्क है. यहां सैलानी विश्राम करते हैं, खेलते हैं. इस के चारों ओर द्वितीय विश्वयुद्ध के उन नायकों की मूर्तियां हैं जिन्होंने युद्ध में अपना सक्रिय योगदान दिया. पार्क के दोनों ओर ऊंचीऊंची बिल्डिंग्स, होटल्स, शौप्स व रैस्टोरैंट्स हैं.
जौर्ज स्क्वायर ऐसा प्रसिद्ध स्थल है जहां से सिटी के विषय में पूरी जानकारी हासिल की जा सकती है. यहां क्रिसमस व न्यू ईयर के समय जश्न जैसा माहौल होता है. सफेद बर्फ के बीच मनोरंजन मन को भा जाता है, यहां सेंट एंड्रयूज डे भी मनाया जाता है. किंग जौर्ज (द्वितीय) नाम पर इस पार्क का नाम जौर्ज स्क्वायर पड़ा.
ग्लासगो यूनिवर्सिटी काफी प्रसिद्ध है. यहां अधिकांश वैज्ञानिकों, साहित्यकारों व उपन्यासकारों ने अपना जीवन संवारा व विश्व को अपनी पहचान दी. अधिकांश वैज्ञानिकों और साहित्यकारों, उपन्यासकारों ने नोबेल पुरस्कार जीते. यूनिवर्सिटी में ‘ग्लासगो साइंस सैंटर’, ‘ग्लासगो सिटी सैंटर’, ‘विलो टी रूम’ इत्यादि दर्शनीय स्थल हैं.
ग्लासगो यूनिवर्सिटी 1451 में स्थापित की गई थी. 1870 में इसे नया रूप दिया गया. वैज्ञानिक जेम्स वाट इसी यूनिवर्सिटी के 1461 के स्कौलर थे.
अब हमारी कार एडिनबर्ग की ओर दौड़ रही थी. हम हरमिंसटन गेट नं. ए-720 से आगे बढ़ रहे हैं. हम ने जू देखा. बारिश हो रही थी, हम नीचे नहीं उतरे.
हम नौर्थ सी के पास पहुंचते हैं. पोर्ट पर हमें शिप दिखाई देता है. यह रानी एलिजाबेथ का प्रिय शिप है, जिस का नाम ‘ब्रिटेनिका’ है. यह टूटीफूटी अवस्था में है किंतु रानी को यह अत्यंत प्रिय है. इसीलिए प्रिंस चार्ल्स उसे चाह कर भी नष्ट न कर सके. अब यह पर्यटकों के आकर्षण केंद्र बन गया है. शिप से रानी की जुड़ी हुई पुरानी मधुरकटु यादों के लोग सहभागी बनते हैं, ऐसा प्रतीत होता है. यह किनारे पड़ा हुआ भी अपनी शोभा बढ़ा रहा है.
वर्ष 1707 की संधि के अनुसार स्कौटलैंड व इंगलैंड की संसद एक ही गवर्निंग बौडी (प्रशासन) के अधीन थी. वर्ष 1997 में स्कौटिश लोगों ने अपने पृथक प्रशासन की मांग की. वर्ष 1999 से इस पर कार्य शुरू भी हुआ किंतु अधिकांश प्रशासन वैस्ट मिनिस्टर के अधीन है.
अविस्मरणीय यात्रा
हमारी स्कौटलैंड की यात्रा लगभग समाप्ति पर थी. खाना खाने के लिए हम ने एक सुंदर रैस्टोरैंट ढूंढ़ा. शुद्ध शाकाहारी भारतीय भोजन कर के हम संतुष्ट हुए और अब हमारा लक्ष्य है स्टेशन. नियत समय 2:30 बजे हम वेवर्ली, एडिनबर्ग से ट्रेन पकड़ कर 6:30 बजे किंग क्रौस, लंदन पहुंच गए. स्कौटलैंड की सुंदरसुखद अविस्मरणीय यात्रा की स्मृतियों के साथ हम लंदन के एजवेयर बरी लेन स्थित स्वीट होम में प्रवेश करते हैं.
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आप वन्यजीवों को नजदीक से देखने के शौकीन हैं और जंगल का सन्नाटा आप को रोमांचित करता है तो मध्य प्रदेश आप के इस रोमांच को पूरा कर सकता है. आप यहां वन्यजीवों को करीब से देखने के साथ ही वनों के प्राकृतिक सौंदर्य, चिडि़यों की चहचहाहट, टाइगर की शान के रोमांच को महसूस कर सकते हैं. इस के लिए आप को वहां के करीबी किसी रिजोर्ट या सफारी कैंप में ठहरना होगा.
मध्य प्रदेश में 9 नैशनल पार्कों के अलावा 11 वाइल्ड लाइफ सैंचुरीज हैं जिन्हें एकसाथ घूम पाना संभव नहीं है लेकिन बाघ देखने वाले घुमंतू लोग एक सफारी कौरिडोर बना कर यहां के सब से विशाल और बाघ की अधिकतम संख्या वाले नैशनल पार्कों को देख सकते हैं. आप जबलपुर से शुरू कर के कान्हाकिसली, बांधवगढ़, पन्ना नैशनल पार्क होते हुए खजुराहो, ओरछा जा कर अपना पर्यटन टूर खत्म कर सकते हैं.
शुरुआत करते हैं जबलपुर से जो देश के सभी प्रमुख शहरों से रेलमार्ग और वायुमार्ग से जुड़ा है. जबलपुर से 128 किलोमीटर की दूरी पर कान्हाकिसली राष्ट्रीय उद्यान स्थित है. सागौन के घने जंगलों के बीच से गुजरती सड़क पर से चलने से यह एहसास हो जाता है कि हम जंगल के राजा के आशियाने की तरफ बढ़ रहे हैं.
खूबसूरत कान्हा
940 वर्ग किलोमीटर में फैला सदाबहार साल वनों से घिरा हुआ कान्हा क्षेत्रफल और जानवरों की संख्या के लिहाज से मध्य प्रदेश का सब से बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है. इसे 1955 में बनाया गया था और 1974 में इसे टाइगर प्रोजैक्ट के अधीन ले लिया गया था.
मंडला और बालाघाट जिलों में मैकल पर्वत शृंखलाओं की गोद में बसा कान्हा देश के सर्वोत्कृष्ट राष्ट्रीय उद्यानों में एक है. कान्हा महज एक पर्यटन केंद्र ही नहीं, बल्कि भारतीय वन्यजीवन के प्रबंधन और संरक्षण की सफलता का प्रतीक भी है. स्वस्थ व फुरतीले जंगली जानवरों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर कान्हा में प्रतिवर्ष 1 लाख से अधिक सैलानी घूमने आते हैं.
यह अभयारण्य 15 अक्तूबर से 30 जून तक खुला रहता है. लोग बाघ और जंगली जीवजंतुओं को देखने व प्रकृति का आनंद लेने यहां आते हैं. इस के लिए सब से अच्छा तरीका है जिप्सी सफारी. एक जिप्सी में 6 लोगों को भ्रमण की अनुमति दी जाती है जिस से वे प्रकृति का आनंद ले सकें. लोग जानवरों के प्राकृतिक घर में जंगली जानवरों को देख सकते हैं. कान्हा और किसली नैशनल पार्क के 2 गेट हैं जो अलगअलग जिलों में स्थित हैं.
टाइगर को करीब से देखनेसमझने वालों के लिए कान्हा सब से पसंदीदा जगह है. कहा जाता है कि यहां से कोई भी वनराजा से मिले बिना नहीं जाता. कान्हा में बाघदर्शन ने पर्यटन को काफी बढ़ावा दिया है. बाघ के अतिरिक्त कान्हा में बारहसिंघा की एक दुर्लभ प्रजाति पंकमृग (सेर्वुस बांडेरी) भी पाई जाती है. 1970 में यहां इन की संख्या 3,000 से घट कर सिर्फ 66 रह गई थी. बाद में एक विशेष योजना के जरिए इन की संख्यावृद्धि के प्रयास किए गए जो काफी हद तक सफल रहे.
बाघ और बारहसिंघा के अतिरिक्त यहां भालू, जंगली कुत्ते, काला हिरण, चीतल, काकड़, नीलगाय, गौर, चौसिंगा, जंगली बिल्ली और सूअर भी पाए जाते हैं. इन वन्यप्राणियों को हाथी की सैर अथवा सफारी जीप के जरिए देखा जा सकता है.
यहां भी घूम कर आएं
किसली से 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ब्राह्मणीदादर अवश्य जाएं. यहां दिखने वाला सूर्यास्त का मनोरम दृश्य सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देता है. पर्यटक पार्क के निकटवर्ती भीलवानी, मुक्की, छपरी, सोनिया, असेली आदि वनग्रामों में जा कर यहां की प्रमुख बैगा जनजाति के लोगों से मिल सकते हैं. उन की अनूठी जीवनशैली और परिवेश निसंदेह आप की यात्रा की एक और स्मरणीय सौगात होगी.
कान्हाकिसली की यादों के रोमांच को यादों की नोटबुक में संजो कर मार्बल नगरी जबलपुर का रुख करते हैं. यहां एक दिन ठहर कर भेड़ाघाट पर सफेद संगमरमर की चट्टानों के बीच से सर्पिलाकार नर्मदा का विहंगम दृश्य आप की सारी थकान दूर कर देगा.
जबलपुर में एक दिन रुकना काफी है. अगर 2 दिन का प्लान हो तो यहां से 4 घंटे का सफर तय कर जबलपुरनागपुर रोड पर मोगलीलैंड पेंच राष्ट्रीय उद्यान है जहां जंगलबुक के लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने मोगली को देखा था और जंगलबुक के सभी पात्र इसी जंगल में रचे थे. एक दिन में आप इस नैशनल पार्क को घूम कर वापस जबलपुर आ सकते हैं.
बांधवगढ़ के सफेद बाघ
जबलपुर से लगभग 195 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 32 पहाडि़यों से घिरे सफेद बाघों की आरामगाह बांधवगढ़ का रुख करते हैं. सफेद बाघ का एकमात्र ठिकाना पूरे एशिया में सिर्फ बांधवगढ़ ही है. यहां के महाराजा के अथक प्रयासों से सफेद बाघ की प्रजाति जिंदा है.
बांधवगढ़ में बांस के पेड़ बहुतायत में हैं. चरणगंगा यहां की प्रमुख नदी है जो अभयारण्य से गुजरती है. इस क्षेत्र में पहला बाघ महाराज मार्तंड सिंह ने 1951 में पकड़ा था. मोहन नाम के इस सफेद बाघ को अब महाराजा औफ रीवा के महल में सजाया गया है.
राष्ट्रीय उद्यान बनाए जाने से पहले बांधवगढ़ के आसपास के जंगल को महाराजाओं और उन के मेहमानों की शिकारगाह के रूप में कायम रखा गया था.
यहां बाघ के अलावा कई स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं. चीतल, सांभर, हिरण, जंगली कुत्ते, तेंदुए, भेडि़ए, सियार, स्लोथ बियर, जंगली सूअर, लंगूर और बंदर यहां आसानी से देखे जा सकते हैं. सरीसृपों में किंग कोबरा, क्रेट, वाइपर जैसे सांपों की यहां भरमार है. यहां पक्षियों की लगभग 250 प्रजातियां पाई जाती हैं. इन में तोता, मोर, बगला, कौआ, हार्नबिल, बटेर, उल्लू आदि शामिल हैं.
कब जाएं बांधवगढ़
यदि आप बांधवगढ़ बाघ देखने जा रहे हैं तो अक्तूबर से जून के मध्य जाएं. बियर देखने जा रहे हैं तो मार्च से मई के महीने उपयुक्त हैं क्योंकि इस दौरान ही वे महुआ नाम के फूल को खाने के लिए बाहर निकलते हैं.
पन्ना नैशनल पार्क
बांधवगढ़ से सड़कमार्ग से 185 किलोमीटर की यात्रा कर के आप अपनी यात्रा का अंतिम पड़ाव पन्ना नैशनल पार्क पहुंच सकते हैं, लेकिन यहां 3 दिन रुकने का प्लान बनाएं क्योंकि नैशनल पार्क के अलावा भी यहां आसपास देखने को बहुतकुछ है, जो आप की यादों के अलबम में रोमांच के साथ रोमांस के भी रंग भर देंगे.
बाघ देखने वाले पर्यटकों के लिए पन्ना नैशनल पार्क सब से अच्छी जगह है. छतरपुर और पन्ना जिलों में फैला यह नैशनल पार्क 5 साल पहले उस समय काफी चर्चा में रहा जब यह बाघविहीन हो गया था, लेकिन लोगों की जागरूकता और प्रशासन के प्रयास से आज जंगल फिर अपने राजा की दहाड़ से गूंजने लगा है.
1980 से पहले इसे वाइल्ड लाइफ सैंचुरी घोषित किया गया था और 1981 में नैशनल पार्क का दर्जा दिया गया. यहां गरमी में बहुत अधिक गरमी और सर्दी में बहुत ठंड होती है, क्योंकि यहां की जलवायु उष्ण कटिबंधीय है.
पन्ना नैशनल पार्क घूमने के लिए नवबंर से अप्रैल का मौसम उपयुक्त रहता है.
यहां पार्क में आप को टाइगर के अलावा चौसिंगा हिरण, चिंकारा, सांभर, जंगली बिल्ली, घडि़याल, मगरमच्छ, नीलगाय भी दिखाई देंगी. यहां से खजुराहो सब से नजदीक है, जहां रेल और हवाईमार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है. अब तो रेलवे ने भी अपनी लक्जरी ट्रेन महाराजा का रूट खजुराहो से हो कर वाराणसी कर दिया है. खजुराहो से 30 मिनट में पन्ना नैशनल पार्क पहुंचा जा सकता है.
क्या है खास
केन नदी के किनारे का सुरम्य वातावरण और पेड़ के ऊपर बने मचाननुमा रैस्टोरैंट में बैठ कर पहाडि़यों के पीछे डूबते सूरज का मनोरम दृश्य देख कर गरमगरम कौफी के घूंट का एहसास आप को किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाता है.
नैशनल पार्क के अलावा पन्ना यहां निकलने वाले हीरों के लिए भी प्रसिद्ध है. पार्क से थोड़ी दूरी पर एनएमडीसी की मझगंवा डायमंड माइंस है जहां हीरों की खुदाई से ले कर उस की सफाई प्रक्रिया देखी जा सकती है. अगर समय मिले तो रिजोर्ट से 8 किलोमीटर की दूरी पर पन्ना नगर है जिस के यूरोपीय शैली में बने मंदिर देखे जा सकते हैं. इस के अलावा पार्क से हो कर गुजरने वाली केन नदी पार्क की खूबसूरती में चारचांद लगा देती है. यहां नाव में बैठ कर जंगली जीवों को करीब से देखने का आनंद ही कुछ और होता है. पार्क के मुख्य आकर्षणों में एक खूबसूरत पांडव झरना है, जोकि झील में गिरता है. मानसून के दिनों में इस झरने का विहंगम दृश्य बड़ा ही रोमांचकारी लगता है.
रोमांच के बाद रोमांस
पन्ना नैशनल पार्क से 43 किलोमीटर की दूरी पर कला के पारखियों के लिए काम और वास्तुकला के अद्भुत मेल वाली पाषाण प्रतिमाओं के लिए विश्वप्रसिद्ध खजुराहो के मंदिर हैं. यह भारतीय शिल्पकला की नायाब धरोहर है. खजुराहो मंदिरों को 950 से 1050 ई. के बीच मध्य भारत पर शासन करने वाले चंदेल वंश के शासकों द्वारा बनवाया गया था.
खजुराहो में कुल 85 मंदिरों को बनवाया गया था, जिन में से आज केवल 22 ही बचे हैं. पूरी दुनिया का ध्यान यहां के मंदिरों में स्थित मूर्तियों ने आकर्षित किया है जो कामुकता से भरी हैं. इस मंदिर को 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया.
खजुराहो के पास ही ब्रिटिशकाल में बनाया गया गंगऊ डैम स्थित है. इस डैम की वास्तुकला और इंजीनियरिंग देखने लायक है. पास ही रनेह फौल है जिस का वास्तविक रूप मानसून में ही देखने लायक होता है.
धुबेला की शानोशौकत
खजुराहो से 59 किलोमीटर खजुराहोझांसी राजमार्ग पर धुबेला स्थित है. जैसे ही आप धुबेला के समीप आते हैं, 52 फुट की महाराजा छत्रसाल की विशाल प्रतिमा आप का स्वागत करती दिखती है. यह स्थान बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल की कर्मस्थली था. उन की बेटी मस्तानी का जन्म और बचपन धुबेला के महलों में ही बीता.
फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली मस्तानी को ले कर ‘बाजीराव मस्तानी’ फिल्म बना चुके हैं. यहां मौजूद महलों के अवशेष और छत्रसाल का मकबरा आज भी यह याद दिलाने के लिए काफी है कि उस वक्त का इतिहास क्या होगा.
रिजोर्ट से धुबेला संग्रहालय मात्र 5 मिनट की दूरी पर स्थित है. संग्रहालय एक पुराने किले के अंदर स्थित है. इस में प्राचीन और आधुनिक युग की कलाकृतियां और अवशेषों का समृद्ध कलैक्शन है. यहां मुख्यरूप से खजुराहो के प्रसिद्ध बुंदेला वंश के इतिहास, उत्थान और पतन को दर्शाया गया है. अनेक मूर्तियों व कलाकृतियों का समृद्ध और बेहतरीन कलैक्शन बुंदेला राजाओं की जीवनशैली और संस्कृति को समझने में मदद करता है.
एक दिन में ही आप धुबेला घूम कर वापस खजुराहो लौट सकते हैं. खजुराहो वायु और सड़कमार्ग से सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है.
सफारी कौरिडोर कहां से शुरू
कान्हाकिसली : नजदीकी हवाईअड्डा और रेलवे स्टेशन जबलपुर है जो कान्हा से 128 किलोमीटर की दूरी पर है.
पेंच राष्ट्रीय उद्यान : जबलपुर से सड़कमार्ग से 214 किलोमीटर दूर है. 4 से 5 घंटे का समय लगता है.
बांधवगढ़ : जबलपुर से सड़कमार्ग द्वारा 165 किलोमीटर की दूरी पर है.
पन्ना नैशनल पार्क : बांधवगढ़ से पन्ना सड़कमार्ग से 185 किलोमीटर दूरी पर स्थित है.
खजुराहो : पन्ना नैशनल पार्क से 44 किलोमीटर की दूरी पर खजुराहो है. यहां से दिल्ली और वाराणसी के लिए हर दिन फ्लाइट और ट्रेन भी उपलब्ध हैं.
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7 राज्यों में राज्यसभा की 58 सीटों में से 28 सीटें जीत कर भाजपा ने राज्यसभा में सब से बड़ी पार्टी भले ही बन गई हो पर उत्तर प्रदेश में जिस तरह से क्रौसवोटिंग हुई उस ने उस के दामन पर दाग लगा दिया है. चाल, चरित्र और चेहरे के साथ पार्टी विद अ डिफरैंट की बात करने वाली भाजपा के चेहरे पर लगा उबटन उतर चुका है.
क्रौसवोटिंग करने वालों में सब से ज्यादा ऊंची जातियों के विधायक शामिल हैं. ऐसे में दूसरे दल अब आसानी से इन जातियों के विधायकों पर भरोसा नहीं कर सकते. ऐसे विधायकों की निष्ठा संदिग्ध होने के बाद अब भाजपा भी इन को हाशिए पर डाल देगी. विधान परिषद के 5 सदस्यों ने भाजपा के पक्ष में अपनी सीट छोड़ी थी, इन में से केवल एक अशोक वाजपेई को भाजपा ने राज्यसभा पहुंचाया. बचे यशवंत सिंह, सरोजनी अग्रवाल और वुक्कल नवाब जैसे लोग प्रतीक्षा सूची में ही हैं.
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के लिए केवल 400 वोट ही पड़ने थे. 10 सीटों पर 11 उम्मीदवार होने से वोटिंग के हालत बन गए. भाजपा के अनिल अग्रवाल और बसपा के भीमराव अंबेडकर जीत के लिए दूसरे दलों पर निर्भर थे. साफ था कि बिना क्रौसवोटिंग के जीत संभव नहीं है. भाजपा के पास अनिल अग्रवाल को विजयी बनाने के लिए जरूरी 37 वोटों में से केवल 28 वोट थे. बसपा के पास सपाकांग्रेस और लोकदल को मिला कर 34 वोट थे. बसपा के 2 विधायक मुख्तार अंसारी और हरिओम यादव जेल से वोट डालने नहीं आ सके. इस से बसपा के पास 32 वोट ही थे. हर दल का दांव क्रौसवोटिंग करने वालों पर था. भाजपा ने सपा नेता नरेश अग्रवाल को अपने साथ ले कर यह साफ कर दिया था कि यह चुनाव जीतना उस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है. भाजपा गोरखपुर और फूलपुर में हुए लोकसभा उपचुनावों में मिली हार का बदला तो लेना ही चाहती थी, साथ ही वह जनता को यह संदेश भी देना चाहती थी कि सपाबसपा गठबंधन से भाजपा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला.
भाजपा के पास सीधे तौर पर केवल 8 सदस्यों अरुण जेटली, अनिल जैन, विजय पाल सिंह तोमर, कांता कर्दम, जीवीएल नरसिंहा राव, सकलदीप राजभर, हरनाथ सिंह यादव और अशोक वाजपेई को चुनाव जिताने की क्षमता थी. भाजपा ने सपाबसपा और निर्दलीय विधायकों में सेंधमारी कर अपने 9वें सदस्य अनिल अग्रवाल को चुनाव जितवा लिया, विपक्ष में समाजवादी पार्टी के पास अपने एक सदस्य जया बच्चन को चुनाव जिताने के लिए पूरे वोट थे.
बहुजन समाज पार्टी के पास इतने वोट नहीं थे कि वह अपने प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर को चुनाव जिता सके. ऐसे में सपा, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल ने बसपा के प्रत्याशी को वोट देने का संकल्प लिया था. भाजपा के अनिल अग्रवाल और बसपा के भीमराव अंबेडकर के आमनेसामने होने से क्रौसवोटिंग तय हो गई.
राजनीतिक दलों के काफी प्रयासों के बाद भी क्रौसवोटिंग हुई. आरोपप्रत्यारोपों के बीच मतगणना घंटों रुकी रही. राज्यसभा चुनाव उत्तर प्रदेश के अलावा पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तेलगांना, झारखंड, छत्तीसगढ़ और केरल में भी थे. सब से अधिक परेशानी उत्तर प्रदेश में थी. यहीं क्रौसवोटिंग हुई. सोचने वाली बात यह रही है कि राज्यसभा चुनावों में भी जातिगत आधार पर क्रौसवोटिंग हुई. भाजपा के पक्ष में जहां ऊंची जातियों के विधायकों ने क्रौसवोटिंग की, वहीं कुछ पिछड़ी जाति के विधायकों ने बसपा, सपा और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार के पक्ष में क्रौसवोट किया. बसपा के विधायक अनिल सिंह ने खुलेआम भाजपा के पक्ष में वोट करने के बाद कहा कि उन्होंने अंतरात्मा की आवाज पर वोट दिया है.
अपनीअपनी जाति के साथ दलित, पिछड़े और अगड़े
सपा समर्थित निर्दलीय विधायक राजा भैया उर्फ रघुराज प्रताप सिंह ने यह कहा कि उन का वोट सपा की उम्मीदवार जया बच्चन के लिए है. फिर भी राजा भैया के वोट का सस्पैंस बना है. कारण यह कि राजा भैया और उन के साथ विधायक विनोद सरोज ने सपा के पोलिंग एजेंट को बिना दिखाए अपना वोट दिया. निर्दलीय विधायक होने के कारण वे वोट दिखाने के लिए बाध्य नहीं थे. जिस तरह से वोट देने से पहले वे सपा नेता अखिलेश यादव और वोट देने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले, उस से साफ हो गया कि राजा भैया का समर्थन भी भाजपा को था. इस बात की पुष्टि तब हुई जब अखिलेश यादव ने राजा भैया को दिया अपना धन्यवाद ट्विटर से हटा दिया. सपा के साथ रहने वाले विधायक विजय मिश्रा और अमनमणि त्रिपाठी ने भाजपा के पक्ष में वोट दिया.
सपा के नितिन अग्रवाल ने अपने पिता नरेश अग्रवाल के भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा जौइन कर ली और उस के पक्ष में खुल कर वोट दिया. राष्ट्रीय लोकदल से सहेंद्र सिंह रमला ने अपना वोट अवैध करा दिया. उस की निष्ठा पर पार्टी को संदेह है. पार्टी ने सहेंद्र सिंह को दल से बाहर निकाल दिया. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी यानी भासपा भारतीय जनता पार्टी का समर्थन देने वाली पार्टी है. उस के विधायक कैलाश नाथ सोनकर ने बसपा यानी बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में वोट दिया. बसपा प्रमुख मायावती ने इस का धन्यवाद भी दिया. सहेंद्र सिंह का कहना है कि उन की पार्टी ने कोई सीधा निर्देश ही नहीं दे रखा था. भाजपा के पास अपने सहयोगी दलों के साथ मिला कर 324 सदस्य हैं. भाजपा को 329 वोट मिले.
5 लोगों ने भाजपा के पक्ष में क्रौसवोट दिया. इन 5 वोटों में विजय मिश्रा, अमनमणि त्रिपाठी, नितिन अग्रवाल और अनिल सिंह ने खुल कर भाजपा को वोट दिया. 5वां वोट किस ने दिया, इस का कयास ही लगाया जा रहा है. सपाबसपा को 72 वोट मिलने थे पर उन को केवल 71 वोट ही मिले. इस से साफ है कि भाजपा को यहीं से क्रौसवोट मिला है. संदेह के घेरे में भाजपा के विधायक कैलाश नाथ सोनकर का नाम सब से पुख्ता है क्योंकि बसपा नेता मायावती ने उन को धन्यवाद दिया. क्रौसवोटिंग करने वाले नामों को देखें तो साफ हो जाता है कि अगड़ी जातियों के विधायकों ने सब से अधिक भाजपा के पक्ष में वोट किया. भाजपा के पक्ष में क्रौसवोट करने वाले विधायक केवल बसपा के ही नहीं थे, समाजवादी पार्टी के भी कई थे.
टूटता है भरोसा
राजनीति का जाति और धर्म के साथ चोलीदामन का साथ है. ऐसे में राजनीतिक दलों को भी समयसमय पर दलों के विभाजन और क्रौसवोटिंग जैसे दंश झेलने पड़ते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों में जाति का अधिक बोलबाला है. ऐसे में यहां नेता पार्टी के साथ विश्वासघात कर अपनी पसंद की जाति वाले दल को समर्थन देते हैं. भारत के दूसरे राज्यों में भी यही हाल है, पर वहां अभी संकट गहरा नहीं हुआ है. हिंदी बोली वाले प्रदेशों में यह संकट अधिक है. उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के समय हुई क्रौसवोटिंग इस का नमूना है.
यही वजह है कि सपा और बसपा अगड़ी जातियों के विधायकों पर भरोसा नहीं करती हैं. दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘बसपा का जबजब विभाजन हुआ, उस को तोड़ने वालों में अगड़ी जातियों के विधायकों का योगदान सब से अहम रहा. सपा में भी अगड़ी जाति के विधायक अपने को बेचैन अनुभव करते हैं. ऐसे में सपा के सत्ता से बाहर जाते ही ये विधायक पार्र्टी से अलग हो जाते हैं. बसपा में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर ब्राह्मण को पार्टी के साथ माना जाता है. असल में यह ब्राह्मण की चतुराई है, जिस का वह लाभ उठाता है. जमीनी स्तर पर ब्राह्मण और दलित कभी एकजुट नहीं हो सकते.’’
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