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आज की जरूरत है शो औफ बिजनैस के तौर पर मशहूर कपल किट्टी

किट्टी शब्द सुनते ही दिमाग में 10-15 महिलाओं का एक ऐसा समूह अपनी छवि बनाता है, जो प्रति माह किसी एक जगह पर इकट्ठा हो कर खातापीता और मनोरंजन करता है. इस किट्टी कल्चर की शुरुआत हाई क्लास सोसाइटी की महिलाओं के द्वारा अपना खाली समय पास करने के लिए की गई, जिस में वे विभिन्न गेम्स खेलतीं. धीरेधीरे यह समाज के अन्य वर्गों में भी प्रचलित होता गया और मध्यवर्गीय महिलाओं ने इसे मनोरंजन के साथसाथ धन संचय का भी एक साधन बना लिया.

हाल ही के कुछ वर्षों में इस ट्रैंड में नया बदलाव आया. अब महिलाओं के साथसाथ उन के पति भी इस में शिरकत करने लगे हैं और इसे नाम दिया गया कपल किट्टी. सामान्य किट्टी की ही तरह इस में भी वे एक जगह पर इकट्ठा हो कर मनोरंजन और खानापीना करते हैं.

बन गई समय की मांग

कपल किट्टी आज समय की मांग भी है, क्योंकि बच्चों के बाहर चले जाने के बाद पतिपत्नी अकेले रह जाते हैं. ऐसे में उन के लिए ऐसे ग्रुप का सदस्य होना बेहद जरूरी होता है, जहां वे अपने हमउम्र लोगों के साथ कुछ समय हंसबोल कर अपनेआप को आनंदित महसूस कर सकें, अपनी समस्याओं को शेयर कर सकें. इस के अतिरिक्त इस प्रकार की किट्टी सर्विस क्लास के लिए भी कई मानों में लाभकारी होती है, क्योंकि उन का प्रत्येक 2-3 वर्ष में स्थानांतरण होता रहता है. नए शहर में उन्हें अपने जीवन की जीरो से शुरुआत करनी होती है, जिस में इस प्रकार की किट्टी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

नए शहर में सहारा

अखिला के पति की पोस्टिंग कुछ दिनों पूर्व ही भोपाल में हुई थी. एक सोसाइटी में उस ने फ्लैट किराए पर लिया. उसे आए कुछ ही समय हुआ था कि एक दिन पड़ोसिन ने सोसाइटी में चल रही कपल किट्टी के बारे में बताया. पति कुणाल से पूछ कर उस ने भी पति के साथ सदस्यता स्वीकार कर ली.

अखिला कहती हैं, ‘‘हम इस शहर और लोगों से एकदम अनजान थे, परंतु इस किट्टी के कारण हमें बहुत अच्छे दोस्त तो मिले ही, साथ ही शहर के साथसाथ निकटस्थ जगहों के बारे में भी जानकारी प्राप्त हो गई, जिस से बच्चों का स्कूल सुनिश्चित करने में काफी सुविधा हो गई. सभी से एकसाथ परिचय होने के कारण हमें यहां कभी अकेलापन नहीं लगा.’’

नीना शुरू में किट्टी को महिलाओं के द्वारा कपड़ों और गहनों का दिखावा मात्र मानती थी. एक दिन उसी शहर में रहने वाली उन की कालेज की दोस्त ने अपने साथ उसे भी एक कपल किट्टी का सदस्य बना दिया.

नीना कहती हैं, ‘‘इसे जौइन करने के बाद मुझे महसूस हुआ कि इस प्रकार के ग्रुप्स तो आज की जरूरत हैं. यहां हम सभी लगभग एक ही उम्र के होते हैं और सभी एकदूसरे से परिचित भी. माह में एक दिन हम सब मिल कर इतना हंसीमजाक और ऐंजौय करते हैं कि पूरे माह की कसर पूरी हो जाती है.’’

विजयजी को रिटायर हुए 12 वर्ष हो गए हैं. तीनों बच्चे विदेश में सैटल हैं. पतिपत्नी दोनों ने इसी प्रकार के कई ग्रुप्स जौइन कर रखे हैं.

वे कहते हैं, ‘‘हम ने ऐसे ही कपल गु्रप्स जौइन किए हैं, जिन में हम दोनों एकसाथ जाते हैं. प्रत्येक ग्रुप की विभिन्न गतिविधियों में भी हम शामिल होते हैं. तीनों बच्चे तो विदेश में हैं. उन के पास तो हमारा मन लगता नहीं, मुसीबत में भी उन का कोई सहारा नहीं है. ऐसे में हमारे यही संगीसाथी जरूरत पड़ने पर मदद के लिए सदैव तैयार रहते हैं.’’

हां, कपल किट्टी के नाम पर कई बार कुछ अनैतिक और पारस्परिक व्यभिचार तथा विवाहेतर संबंधों की बातें भी सुनने को मिलती हैं, परंतु अति हर जगह बुरी होती है. फिर बुराइयां कहां नहीं होतीं. बस जरूरत है इस प्रकार के किसी ग्रुप का सदस्य बनने से पहले कुछ सावधानियां बरतने की. मसलन:

– अपने स्तर के ही ग्रुप को जौइन करें. अंजली ने अपनी एक सहेली के कहने पर कपल किट्टी के एक ग्रुप को जौइन किया. जब वह वहां 2-4 बार अपने पति के साथ गई तो उसे वहां कंफर्टेबल फील नहीं हुआ. उस के अधिकांश सदस्य बड़े बिजनैसमैन थे जो मांसमदिरा में ही व्यस्त रहते. वह और उस का पति पूरे समय मौन साधे बैठे रहते और हीनभावना से ग्रस्त होने लगते.

– चूंकि ऐसी किट्टी में महिलापुरुष दोनों ही होते हैं, इसलिए अपना आचारव्यवहार और रहनसहन संतुलित रखें, क्योंकि कुछ पुरुषों को बहकते देर नहीं लगती. किसी को भी अपनी निजी जिंदगी में झांकने का अवसर कदापि न दें.

– यदि कभी आप को ऐसा लगे कि आप ग्रुप में फिट नहीं हो पा रहे हैं, तो स्वयं को अलग करने में देर न करें, क्योंकि आप ने इसे अपने मनोरंजन के जौइन किया है न कि तनाव के लिए.

– छोटीछोटी बातों को कभी तूल न दें. कभी किसी सदस्य की कोई बात चुभे या पसंद न आए तो उसे हंस कर टाल दें न कि उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लें.

स्पाइसी ट्रीट : बेक्ड अरबी करी

सामग्री

– 1 किलोग्राम अरबी उबली और छिली हुई,

(उबलने के बाद थोड़ा ठंडा होने पर उस पर मैदा डाल कर डीप फ्राई करें और एक तरफ रख दें.)

सामग्री करी बनाने की

– 2 कप दही

– 4 बड़े चम्मच काजू का पेस्ट

– 1 बड़ा चम्मच जीरा पाउडर

– 1 बड़ा चम्मच धनिया पाउडर

– 1 बड़ा चम्मच गरममसाला

– 1 बड़ा चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी

– 1/2 छोटा चम्मच राई पाउडर

– 1/2 कप औयल

– 1/2 कप पुदीनापत्ती कटी

विधि

सारी सामग्री को अच्छी तरह मिक्स कर बेकिंग सांचे में डाल कर पहले से 200 डिग्री सैंटीग्रेड पर पहले से गरम ओवन में 20 मिनट तक पका कर सर्व करें.

स्पाइसी ट्रीट : मिनी चीला रोल

मिनी चीला रोल

सामग्री

– 1/2 कप साबुत मूंग दाल

– 1 बड़ा चम्मच चावल

– थोड़ा सा अदरक कटा

– 1 हरी मिर्च कटी

– चुटकी भर हींग पाउडर

– 100 ग्राम पनीर

– 1/4 छोटा चम्मच कालीमिर्च पिसी

– 2 छोटे चम्मच धनियापत्ती कटी

– चीले सेंकने के लिए थोड़ा सा रिफाइंड औयल

– नमक स्वादानुसार

विधि

दाल और चावलों को 6-7 घंटों के लिए पानी में भिगो दें. फिर पानी से निथार कर अदरक, हरीमिर्च, हींग पाउडर, नमक और चौथाई कप पानी डाल कर पीस लें. पकौड़ों के घोल से थोड़ा पतला घोल तैयार करें. पनीर में कालीमिर्च पाउडर, नमक और धनियापत्ती मिला लें.

एक नौनस्टिक तवे पर थोड़ा सा मिश्रण डाल कर फैलाएं. इस पर थोड़ा पनीर का मिश्रण रखें. चीले के चारों तरफ 1/2 चम्मच तेल  डालें. जब नीचे वाली साइड सिंक जाए तो पलट कर दूसरी तरफ से सेंकें और रोल कर के ऐल्यूमिनियम फौयल में लपेट कर लंच बौक्स में रखें.

यशवंत का यश अंत, अब उन्हें योद्धा कहा जाए या भगोड़ा

वरिष्ठ भाजपाई नेता यशवंत सिन्हा (अब भाजपा में नहीं) को योद्धा कहा जाए या भगोड़ा, यह तय कर पाना मुश्किल काम है पर यह जरूर स्पष्ट हो गया है कि नरेंद्र मोदी से बैर ले कर भाजपा में रह पाना मुश्किल है. हां, खामोश बैठे रहो तो किसी को कोई एतराज नहीं होता.

यशवंत नोटबंदी, जीएसटी और किसानों की दुर्दशा को ले कर लगातार अपनी ही सरकार पर हमले करते रहे थे. इस पर भाजपा ने उन्हें न निगला न उगला. तो वे खुद ही हनुमान की तरह सुरसा के मुंह से बाहर आ गए. उन का पलायन निराशा और हताशा की बात है. उन्हें अपनी लड़ाई जारी रखनी चाहिए थी.

संगठित क्षेत्र में न्यूनतम वेतनसीमा पर सरकार का गैरजिम्मेदार रवैया

अनिवार्य अंशदायी पैंशन और बीमा योजना प्रदान करने वाला सरकारी क्षेत्र का कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन यानी ईपीएफओ दुनिया का सब से बड़ा संगठन है. सदस्य संख्या और वित्तीय लेनदेन के मामले में इस से बड़ा और कोई संगठन दुनिया के किसी भी देश में नहीं है. संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए वेतन की न्यूनतम सीमा 15 हजार रुपए प्रतिमाह से बढ़ा कर 21 हजार रुपए करने की श्रमिक संगठनों की मांग मानने से केंद्र सरकार ने इनकार कर दिया है. सरकार के इस फैसले से करोड़ों कर्मचारियों के हितों को नुकसान पहुंचा है. इस आशय का प्रस्ताव ईपीएफओ ने कर्मचारी संगठनों के माध्यम से केंद्र को सौंपा था, लेकिन सरकार का कहना है कि ईपीएफओ से 5 करोड़ से अधिक कर्मचारी जुड़े हैं और उन का न्यूनतम वेतन बढ़ाने से सरकारी खजाने पर भी बड़ा असर होगा.

इस के साथ ही निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की न्यूनतम पैंशन 1 हजार रुपए से बढ़ा कर 3 हजार रुपए करने के प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया गया है. सरकार 15 हजार से कम वेतन पर 1.16 प्रतिशत राशि पैंशन में देती है जिस के कारण सरकारी खजाने पर हर साल 3 हजार करोड़ रुपए का बोझ पड़ता है और यदि नए प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है तो यह बोझ कई गुना बढ़ जाएगा. इसलिए सरकार फिलहाल न्यूनतम वेतन वृद्धि के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर रही है.

सरकार का यह तर्क बेतुका है. महंगाई आसमान छू रही है और इस से लोगों का जीवन दूभर हो रहा है. एक तरफ सरकारी कर्मचारियों का वेतन संगठित क्षेत्र के न्यूनतम वेतन से कई गुना ज्यादा है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र के लिए मामूली वेतनवृद्धि की मांग ठुकराई जा रही है. इस से समाज में असमानता की खाई और चौड़ी हो रही है.

देशभर में खत्म सा हो गया है कम्यूनिस्ट पार्टी का असर

कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी का असर अब देशभर में खत्म सा हो गया है. केरल में इस की सरकार है पर त्रिपुरा में हार के बाद लगता नहीं कि 20 साल पहले के दिन लौटेंगे. फिर भी कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी काफी समय तक गरीबों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों की मसीहा होने का दावा करती रही है. अब सीताराम येचुरी ने बड़ी मुश्किल से पार्टी को मनाया है कि उस कांग्रेस के साथ हाथ जोड़ा जाए जिस की वह बरसों खिलाफत करती रही है क्योंकि उस के बिना धर्म की बातें करने वाली भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला नहीं करा जा सकता.

कम्यूनिस्ट आंदोलन दुनियाभर में अब इतिहास की बात रह गया है. चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी का राज है पर उस पार्टी में कम्यूनिज्म नाम का सा है. चीन दुनिया का बड़ा कैपिटलिस्ट देश बनता जा रहा है और जिस तेजी से उस का विकास हो रहा है वह कल सेठ देशों को पीछे छोड़ देगा. चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी बहुत ही जमीनी है और उसे उत्पादन से मतलब है, कौनकैसे कर रहा है, से कम.

भारतीय कम्यूनिस्टों को भी यही सोचना होगा. देश के गरीबों, जिन में मजदूर, पिछड़े और दलित ही नहीं अच्छेखासे सवर्ण भी शामिल हैं, को असल में उत्पादन कर के ही गरीबी से निकाला जा सकता है. यह सोचना कि पैसे का बंटवारा सही है, सपनों की बात?है. बांटोगे तो तब जब होगा. कम्यूनिस्ट पार्टी ही इस में कुछ कर सकती है क्योंकि कांग्रेस पर तो अभी भी राज करने के पुश्तैनी हक का सुरूर छाया हुआ है और भारतीय जनता पार्टी सोचती है कि जब तक यज्ञ, हवन, पूजापाठ, मंदिर, आश्रम चल रहे हैं, सब ठीक है. आम गरीब की कहीं कोई सोच ही नहीं रहा.

कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी को चीनी रास्ते से सबक लेना चाहिए और गरीबों को मेहनत करना और अपनी मेहनत के पैसे का सही इस्तेमाल सीखना चाहिए. गरीबी तब दूर होगी जब लोग ज्यादा काम करेंगे, ज्यादा उगाएंगे, ज्यादा बनाएंगे.

भारत के गरीब नारों से नहीं कारखानों से खुशहाल होंगे. उन्हें पूजापाठ नहीं, नई तकनीक चाहिए. उन्हें सड़कों पर जुलूस नहीं, नए कारखाने चाहिए, नई खेती की मशीनें चाहिए. उन्हें कर्ज नहीं सही बाजार चाहिए.

कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी ही अकेली पार्टी है जो कहने के लिए ही सही, है तो गरीब कामगारों की पार्टी जिस में धर्म, जाति, भाषा, मूल क्षेत्र का कोई मतलब नहीं, वही कर्मठता का पाठ पढ़ा सकती है.

यह बात दूसरी है कि पूरी कम्यूनिस्ट पार्टी ऊंची जातियों के लोगों के हाथों में है जो गरीबों की बात तो करते हैं पर उत्पादन बढ़ाने में अड़चनें लगाते हैं. वे हड़तालों पर भरोसा करते हैं, नई तकनीक पर नहीं. वे गरीबों को गरीब बने रहने देते हैं ताकि उन को लाल झंडे उठाने वाले मिलते रहें. आज बदलाव की जरूरत है.

सिल्वर जुबली गिफ्ट : भाग 2

सुगंधा की हालत उस पंछी की तरह थी जो चोट खा कर उड़ने को फड़फड़ा रहा हो. उड़ने का हर प्रयास विफल हो कर उस के दर्द में इजाफा कर रहा था, उस के आत्मविश्वास को ध्वस्त कर के उसे और कमजोर बना रहा था. शादी होते ही उस के कुंआरे सपनों की कलियां मुकम्मल फूल बनने के पहले ही मुरझा गई थीं.

सारे रिश्तेदार सिल्वर जुबली पार्टी के दूसरे ही दिन विदा हो चुके थे. आजकल किस को फुरसत होती है किसी के सुखदुख में लंबे समय तक शरीक होने की. जाते वक्त भी कइयों के चेहरे ईर्ष्या की स्याही से पुते हुए थे. रिश्तेदारी की विवाहयोग्य युवतियों के आंखों में सुगंधा जैसी शाही जिंदगी की तमन्ना का प्रतिबिंब झिलमिला रहा था.

कोई नहीं सोचना चाहता कि कभीकभी ऊपर से ठीक दिखने वाला व्यक्ति अंदर से घुटघुट कर मर रहा होता है. खुशियों का पैमाना कीमती कपड़े, महंगा पर्यटन, लक्जरी कार नहीं होती. खुशी होती है मन की शांति से, संतृप्त खुशहाल जिंदगी से, मन की सुखी, चटकती धरती पर किसी के प्यार की फुहार से मिली ठंडक से, घर में गूंजती किलकारियों से.

क्या पाया है उस ने इंद्र से? नहीं पूरा कर पाया वह उस के कुंआरे सपनों को, नहीं पूर्ण कर पाया वह उस के नारीत्व को, ऐसे नाम के पति के साथ एक बच्चे का सपना संजोना तो रेगिस्तान में दूब उगाने की सोचने जैसा था. अपनी खामी को ढांपने के लिए शादी के शुरुआती दिनों में ही उस ने रिश्तेदारों और दोस्तों में ऐलान कर दिया कि सुगंधा को हृदयरोग है और प्रैग्नैंसी उस के लिए घातक हो सकती है.

संबंधों का एकतरफा निर्वाह सुगंधा ने किया था और दुनिया में उस को हृदयरोगी बता कर त्याग की मूर्ति स्वयं इंद्र बन बैठा था. यह कैसी विडंबना थी, यह कैसा न्याय था समय का, जहां गुनाहगार किसी की जिंदगी तबाह कर के इज्जतदार बना हुआ था. इंद्र के गुनाह की शिकार सुगंधा विवाहित हो कर भी उम्रभर अतृप्ति के एहसास में गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही थी.

शादी की जाती है खुशियों के लिए, खुशियों की तिलांजलि देने के लिए नहीं. सुगंधा करवाचौथ का व्रत करती आई थी दुनियादारी की मजबूरी में बिना किसी भाव, बिना किसी श्रद्धा के. उम्र बीती थी ठंडी आहें भरने में. ऐसे संबंधों में सोच ही कुचली जाती है, समर्पण नहीं होता.

अब तक सिल्वर जुबली पार्टी को भी करीबकरीब 6 महीने पूरे हो चुके थे. सुगंधा के लिए खुद को संभालना मुश्किल होता जा रहा था. मन के साथ अब तन भी टूटने लगा था. चलने में कदम डगमगाने लगे थे, हाथों के कंपन से मन की कमजोरी छिपाए न छिपती थी. उस शानदार सिल्वर जुबली की शहर में चर्चा पर अब धूल जमने लगी थी. सब के लिए जिंदगी कमज्यादा बदल रही थी, मगर सुगंधा का जीवन उसी ढर्रे पर चल रहा था, सदा की तरह तनहा दिन, लंबीकाली उदास रातें.

इधर कुछ दिनों से सुगंधा को अपने दाएं स्तन में एक ठोस गांठ सी महसूस हो रही थी. जब उस ने इंद्र से स्थिति बयां की तो उस ने पूछा, ‘‘दर्द होता है क्या उस गांठ में?’’

‘‘नहीं, दर्द तो नहीं होता,’’ सुगंधा ने जवाब दिया.

‘‘तो शायद तुम्हें मेनोपौज होने वाला है. मैं ने पढ़ा था कि मेनोपौज के दौरान कभीकभी ऐसे लक्षण पाए जाते हैं. घबराने की कोई बात नहीं, जान. कुछ नहीं होगा तुम्हें.’’

इंसान की फितरत होती है कि वह अनिष्ट की तरफ से आंखें बंद कर के सुरक्षित होने की गलतफहमी में खुश रहने की कोशिश करता है. सुगंधा भी इस का अपवाद नहीं थी. मगर जब कुछ महीनों के बाद उस के निपल्स के आसपास की त्वचा में परतें सी निकलने लगीं और कुछ द्रव्य सा दिखने लगा तो वह घबराई. धीरेधीरे निपल्स कुछ अंदर की तरफ धंसने लगे और शुरुआत में जो एक गांठ दाएं स्तन में प्रकट हुई थी, वैसी ही गांठें अब दोनों बगलों में भी उभर आई थीं.

अब झटका लगने की बारी इंद्र की थी, वह अपने हाथ लगी ट्रौफी को किसी भी कीमत पर नहीं खोना चाहता था. जब वह सुगंधा को फैमिली डाक्टर के पास ले कर पहुंचा तो डाक्टर ने जनरल चैकअप करने के बाद तत्काल ही मैमोग्राम कराने की सलाह दी. मैमोग्राम रिपोर्ट में स्तन कैंसर के संकेत पाए जाने पर जरूरी ब्लडटैस्ट कराए गए. स्तन से टिश्यूज ले कर टैस्ट के लिए पैथोलौजी भेजे गए. सुगंधा की सभी रिपोर्ट्स के रिजल्ट को देखते हुए अब फैमिली डाक्टर ने उसे स्तन कैंसर विशेषज्ञ औंकोलौजिस्ट के पास जाने की सलाह दी.

‘‘आप ने इन्हें यहां लाने में काफी देर कर दी है. अब तक तो कैंसरस सैल ब्रैस्ट के बाहर भी बड़े क्षेत्र में फैल चुके हैं और अब इस बीमारी को किसी भी तकनीकी सर्जरी द्वारा कंट्रोल नहीं किया जा सकता. मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है, सर, इन का कैंसर अब उस स्टेज पर पहुंच चुका है जहां कोई भी इलाज असर नहीं करता,’’ औंकोलौजिस्ट ने सारी रिपोर्ट्स का सूक्ष्म निरीक्षण और सुगंधा का पूरी तरह से चैकअप करने के बाद इंद्र से कहा.

उस रात घर वापस आ कर इंद्र और सुगंधा दोनों ही न सो सके. इंद्र की नींद क्यों उड़ी हुई थी, यह तो अस्पष्ट था मगर सुगंधा एक अजब से सुकून में जागी हुई थी. उस के दिलोदिमाग में बारबार गुलजार की मशहूर गजल का शेर घूम रहा था, ‘‘दफन कर दो हमें कि सांस मिले, नब्ज कुछ देर से थमी सी है.’’ सुगंधा के लिए तो नब्ज पिछले 26 वर्षों से थमी सी थी.

उस रात सुगंधा ने निश्चय किया कि उस का तनमन उस का तनमन है, किसी नामर्द, फरेबी की मिल्कीयत नहीं. उसे खुद के सम्मान का पूरापूरा अधिकार है. जीतेजी तो वह अपना मान न रख पाई और इंद्र उस की भावनाओं से अधिकारपूर्व खेलता रहा. वह सोचता रहा उस के साथ सात फेरे ले कर सुगंधा उस की मिल्कीयत बन गई थी. मगर भूल गया था कि वह सात फेरे गृहस्थ जीवन की नींव होते हैं और वह नींव मजबूत होती है तनमन से एकदूसरे को पूर्ण समर्पित हो कर, एक दूजे का बन कर, खुशियों का आशियाना बनाने से. झूठ के जाल बिछा कर किसी के पंख काट पर उसे पिंजरे में रखने से नहीं.

सुगंधा उम्रभर चुप्पी साधे रही. जीतेजी वह इंद्र से बगावत करने का साहस नहीं कर पाई थी, मगर मौत में ही सही, वह अपना मान जरूर करेगी. वह बदला लेगी और इंद्र को दुनिया के सामने बेनकाब कर के ऐसी जिल्लत देगी जो हिंदुस्तान की किसी भी पत्नी ने अपने पति को न दी हो. ऐसी जिल्लत, जिस के बोझ से दब कर वह अपनी बाकी की जिंदगी कराहते हुए जीने को विवश हो जाएगा.

वह अपने एक वार से इंद्र के अनगिनत सितम का हिसाब बराबर करेगी. वह जानती थी कि अब उस के पास ज्यादा सांसें नहीं बची हैं, इसलिए दूसरे ही दिन उस ने शहर के जानेमाने वकील सुधांशु राय को फोन लगाया, मिलने का वक्त निश्चित करने के लिए ताकि वह अपना वसीयतनामा तैयार करवा सके. वैसे भी, अभी तो उस का इंद्र को सिल्वर जुबली गिफ्ट देना भी तो बाकी था.

यह वसीयतनामा जायदाद के लिए नहीं था, बल्कि उस के अंतिम संस्कार का था. दुनिया को बताने के लिए कि उस की शादी अमान्य थी, इंद्र तो शादी के योग्य ही नहीं था. उम्रभर वह नारीत्व के लिए तरसी थी. मातृत्व की हूक कलेजे में दबाती रही थी. वह कोई हृदयरोगी नहीं थी. एक बच्चे को जन्म देने के लिए वह पूरी तरह स्वस्थ थी. रोग तो इंद्र को था नपुंसकता का. ऐसा रोग जिस से वह विवाहपूर्व पूरी तरह परिचित था. फिर भी उसे एक पत्नी चाहिए थी, घर में ट्रौफी की तरह सजाने और दुनिया से अपनी नामर्दगी छिपाने के लिए.

वह अपनी वसीयत में इंद्र को अपने अंतिम संस्कार से बेदखल कर गई थी और खुद को एक विधवा की हैसियत से सुपुर्देखाक करने की जिम्मेदारी अपने बेटे समान इकलौते भतीजे को सौंप गई थी.

सुगंधा दुनिया से जा चुकी थी अतृप्त ख्वाहिशों के साथ. उस ने उम्रभर अपनी कामनाओं का गला घोंटा, अपनी इच्छाओं की जमीन को बंजर रख कर, इंद्र के कोरे अहं के पौधे को सींचा था. 26 वर्षों तक दुनियादारी के बोझ से दबी सुगंधा मौत में इंद्र को जबरदस्त तमाचा मार कर गई थी. झूठे बंधन से मुक्त हो कर वह शांति से चिरनिद्रा में सो गई थी और छोड़ गई थी इंद्र को बेनकाब कर के.

अब बाकी बची उम्र सिसकियों में काटने की बारी इंद्र की थी. वह जब भी दीवार पर लटकी सुगंधा की तसवीर को देखता तो सिहर उठता. तसवीर में उस की आंखों को देख कर उसे ऐसा प्रतीत होता मानों वे आंखें उस से पूछ रही हों, ‘एक बार मुझे मेरा दोष तो बताओ, क्या किया था मैं ने ऐसा, जिस की सजा तुम मुझे जिंदगीभर देते रहे. पूरी हो कर भी मैं ने मातृत्व का सुख न जाना. तुम अपना अधूरापन जानते थे, फिर भी तुम ने मेरी जैसी स्त्री से विवाह किया. अपराध तुम्हारा था, तुम से विवाह कर के आहें मैं भरती रही. दिल मेरा जलता रहा.’

इंद्र की रातें अब बिस्तर में करवटें बदलते हुए कटती थीं. उसे याद आतीं हर सुबह सुगंधा की रोई हुई उनींदी आंखें. काश, उस ने वक्त रहते सुगंधा का दर्द, उस की तड़प महसूस की होती तो उस की बेचैनी का आज यह आलम न होता और सुगंधा उसे ऐसा सिल्वर जुबली गिफ्ट दे कर दुनिया से अलविदा न होती.

बिना ईमान की औरत : भाग 2

मनोज ने घर वालों की बातों को दरकिनार करते हुए खुद मुसलिम धर्म अपना कर गुलशबा से निकाह कर लिया. उस ने अपना नाम बदल कर कैफ रख लिया था.

गुलशबा से शादी कर के मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ खुश था. गुलशबा को भी अचानक में ही सही, पर एक ऐसा पति मिल गया था जो उस का हर तरह से पूरा ध्यान रख रहा था. मनोज रातदिन मेहनत कर के पत्नी को अपनी क्षमता के अनुसार सुखसुविधाएं दे रहा था.

पति के प्यार में गुलशबा भी अपनी बीती जिंदगी के पलों को भुला कर अपनी गृहस्थी में रम गई थी. दोनों के जीवन के 8 साल कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. इस बीच गुलशबा 2 बच्चों की मां बन गई. कुल मिला कर उस की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी.

समय अपनी गति से चल रहा था. मनोज के कहने पर गुलशबा ने अपने मायके वालों से भी बातचीत करनी शुरू कर दी थी, जिस से उस के उन से भी संबंध सामान्य हो गए थे. बेटी खुश थी, उस का जीवन सुखी था, इस से ज्यादा एक मातापिता को और क्या चाहिए. मायके वालों का उस के पास आनाजाना शुरू हो गया.

8 सालों तक एक ही जगह पर रह कर जब गुलशबा का मन भर गया तो वह कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई. गुलशबा चाहती थी कि उस का पति मुंबई में ही अपना धंधा शुरू कर के वहीं रहे तो वह मायके वालों के करीब आ जाएगी.

यही सोच कर उस ने एक दिन कैफ को समझाते हुए कहा, ‘‘जो काम तुम आगरा में करते हो, वही काम मुंबई में भी कर सकते हो. और फिर तुम सामान तो मुंबई से ही लाते हो. सामान लाने में खर्च भी होता है. मुंबई में काम करने से यह खर्चा भी बचेगा.’’

मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को पत्नी का सुझाव अच्छा लगा. फिर वह सन 2016 में आगरा वाली दुकान किराए पर दे कर अपने परिवार के साथ मुंबई चला गया और अपनी ससुराल के नजदीक नायगांव में किराए का घर ले कर रहने लगा.

बेटी के नजदीक आने पर मायके वाले भी खुश हुए क्योंकि उन का जब भी मन होता गुलशबा से मिलने के लिए आते रहते थे. मुंबई में गुलशबा ने एक बच्ची को जन्म दिया, जिस का नामकरण काफी धूमधाम से हुआ. जहां गुलशबा अपने मायके वालों के करीब रह कर खुश थी, वहीं मनोज उर्फ कैफ थोड़ा चिंतित और परेशान था. इस की वजह यह थी कि मुंबई में उस का कारोबार ठीक नहीं चल पा रहा था. आगरा की दुकान भी बंद हो चुकी थी.

मनोज चाहता था लौटना पर गुलशबा नहीं मानी

यह सब सोच कर मनोज ने आगरा वापस लौटने का फैसला कर लिया पर गुलशबा मुंबई छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. उस ने पति को कह दिया कि वह अपने तीनों बच्चों के साथ अकेली ही मुंबई में रह लेगी, क्योंकि उस के मायके वाले पास में हैं. मनोज ने भी उस की बात मान ली. पत्नी और बच्चों की तरफ से चिंतामुक्त हो कर मनोज आगरा लौट आया. वापस लौट कर उस ने अपना व्यवसाय फिर से जमा लिया.

कुछ दिनों बाद उस का धंधा पहले की तरह चलने लगा. वह अपने धंधे में व्यस्त हो गया तो गुलशबा अपनी गृहस्थी में. लेकिन वक्त का पहिया कुछ इस प्रकार से घूमा कि उन का सुखमय परिवार तिनके की तरह बिखर गया. अपने कारोबार में मनोज कुमार उर्फ कैफ कुछ इस तरह उलझा कि अपनी पत्नी गुलशबा के लिए वक्त ही नहीं निकाल पाता था. वह साल में 2-4 बार ही गुलशबा को वक्त दे पाता था, जिस के कारण उस के और पत्नी के बीच की दूरियां बढ़ गई थीं.

मनोज कुमार का समय तो उस के कामों में निकल जाता था, लेकिन गुलशबा को उस की याद आती थी. वह अधिक दिनों तक पति की इन दूरियों को बरदाश्त नहीं कर पाई, लिहाजा 27 वर्षीय रिजवान कुरैशी से उस के नाजायज संबंध बन गए. रिजवान गुलशबा के भाई शादाब कुरैशी का साला था, जिस का गुलशबा के यहां आनाजाना लगा रहता था.

रिजवान से अवैध संबंध बन जाने के बाद गुलशबा ने पति की चिंता करनी बंद कर दी. बल्कि जब कभी पति से फोन पर बात होती तो वह उस से कह देती कि यहां की कोई चिंता मत करो और अपने काम पर ध्यान दो. पत्नी की चहकती बातों से मनोज को लगता कि गुलशबा खुश है. इस तरह गुलशबा पति के भरोसे का खून करती रही.

पत्नी के अवैध संबंधों की खबर किसी तरह मनोज के पास पहुंची तो उस के होश उड़ गए. उस ने सोचा भी न था कि जिस गुलशबा को वह रोड से उठा कर अपने घर लाया, जिस की खातिर उस ने अपना धर्म बदला, अपने घर वालों तक से बगावत की, जिसे उस ने जीने का सहारा दिया, उसे सारे ऐशोआराम दिए, वह उस के एहसानों का बदला इस प्रकार से चुकाएगी.

इस बात की सच्चाई की तह में जाने के लिए मनोज कुमार जब मुंबई गया तो उसे पत्नी का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा. उस के पहुंचने पर पत्नी जिस तरह खुश हो जाती थी, उसे उस के चेहरे पर वह खुशी देखने को नहीं मिली. पत्नी के हावभाव से वह इतना तो समझ ही गया था कि उस के पास पत्नी और रिजवान कुरैशी के बारे में जो खबर पहुंची थी, वह कोई कोरी अफवाह नहीं थी.

इस के बाद वह खबर की पुष्टि में लग गया. इस के लिए वह सूत्र तलाशने लगा. उस ने पड़ोसियों और अपने बच्चों से बात की तो इस बात की पुष्टि हो गई कि रिजवान गुलशबा से मिलने अकसर आता रहता है. कभीकभी तो वह उस के फ्लैट पर भी रुक जाता था.

इस बारे में उस ने गुलशबा से बात की तो वह सरासर झूठ बोल गई. उस ने कहा कि उस की पड़ोसियों से बनती नहीं है, इसलिए वे सब उसे बदनाम कर रहे हैं. रिजवान तो उस का भाई जैसा है.

अपनी नौटंकी से कुछ समय के लिए तो गुलशबा ने पति को अपने झांसे में ले लिया. लेकिन 2-4 दिन में ही उस की हकीकत मनोज के सामने आ गई. मनोज ने पत्नी को रिजवान के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया. तब मनोज ने गुलशबा की जम कर पिटाई की.

पोल खुल जाने के बाद गुलशबा को बेइज्जती महसूस हुई. यह बात उस के मायके वालों को भी पता लग गई. इस सच्चाई का पता लग जाने के बाद मनोज पत्नी को मुंबई में अकेले नहीं छोड़ना चाहता था. उस ने गुलशबा और बच्चों को आगरा ले जाने का फैसला कर लिया.

उस ने पत्नी से कहा कि अब हम आगरा में रहेंगे. पर गुलशबा ने मुंबई छोड़ कर जाने से मना कर दिया. इस बात पर दोनों में झगड़ा भी हुआ. मनोज उसे ले जाने की जिद पर अड़ा था.

गुलशबा ने रिजवान को फोन कर बता दिया कि मनोज उसे आगरा ले जाने की जिद कर रहा है और वह यहां से जाना नहीं चाहती. इस बारे में वह कुछ करे. रिजवान भी नहीं चाहता था कि गुलशबा वहां से जाए, इसलिए गुलशबा को ले कर वह परेशान हो उठा.

लिखी गई हत्या की पटकथा

किसी तरह से उस ने गुलशबा से मुलाकात की और मनोज कुमार सोनी उर्फ कैफ को अपने बीच से हटाने की योजना तैयार कर ली. फिर अपनी योजना के अनुसार 2 जनवरी, 2018 की दोपहर में वह मनोज कुमार सोनी के फ्लैट पर पहुंच गया. जिस समय वह फ्लैट में आया, उस समय मनोज खाना खा कर सो रहा था. बच्चे घर के बाहर खेलने के लिए गए हुए थे.

मौका अच्छा था. वह गुलशबा के साथ उस के कमरे में गया और उस पर हमला कर दिया. लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका. अपनी जान बचाने के लिए मनोज रिजवान से भिड़ गया, जिस में रिजवान कुरैशी जख्मी हो गया.

अपने पति को रिजवान कुरैशी पर भारी होते देख गुलशबा ने रिजवान कुरैशी की मदद की. उस ने पति के दोनों हाथ पकड़ लिए, तभी झट से रिजवान ने मनोज का गला रेत दिया. मनोज नीचे गिर गया तो रिजवान ने उस का सिर काट कर धड़ से अलग कर दिया. इस के बाद दोनों ने उस के धड़ और सिर को कपड़ों के पुलिंदे में बांध कर दरवाजे के पीछे छिपा दिया. फिर उन्होंने कमरे की सफाई की.

शाम होतेहोते गुलशबा अपने तीनों बच्चों को अपने मायके में छोड़ कर फ्लैट पर आ गई. फिर घर के दरवाजे पर ताला लगा कर वह रिजवान कुरैशी के साथ उत्तर प्रदेश निकल गई, जहां पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस के पहले रिजवान कुरैशी ने पुलिस और घर वालों का ध्यान भटकाने के लिए शादाब कुरैशी और अपने सारे रिश्तेदारों को एक मनगढ़ंत कहानी सुना दी थी.

थानाप्रभारी किशोर जाधव और एपीआई मंजीत सिंह बग्गा ने गिरफ्तार रिजवान कुरैशी और गुलशबा से विस्तृत पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें तलोजा जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्त न्यायिक हिरासतऌ में थे. आगे की जांच एपीआई मंजीत सिंह बग्गा कर रहे थे. – कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अब फोन पास ना होने पर भी करें पेटीएम का इस्तेमाल, ये है ट्रिक

आजकल हममें से ज्यादातर लोग पेमेंट करने के लिए पेटीएम का इस्तेमाल करते हैं. कई बार आपके साथ ऐसा हुआा होगा कि आपको पेटीएम से पेमेंट करना है पर फोन में इंटरनेट नहीं है या फिर नेटवर्क नहीं है. या फिर फोन कहीं भूल गए हो तो भी पेमेंट नहीं हो पाता. ऐसे में पेटीएम से पेमेंट करना मुश्किल हो जाता है और आपको कैश के लिए भाग दौड़ करनी पड़ जाती है. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.

जी हां, ये सच है. ऐसा इसलिए क्योंकि पेटीएम ने इस समस्या को दूर करने के लिए ‘पेटीएम टैप कार्ड’ की शुरुआत की है जिसकी मदद से आप बिना इंटरनेट भी पेमेंट कर सकेंगे. यह कार्ड एक सेकंड में पेटीएम द्वारा जारी एनएफसी पीओएस टर्मिनल्स में पूरी तरह औफलाइन, सुरक्षित और सहज डिजिटल भुगतानों को सक्षम करने के लिए नियर फील्ड कम्यूनिकेशन (एनएफसी) तकनीक का इस्तेमाल करता है.

औफलाइन पेमेंट करने के लिए यूजर्स टैप कार्ड पर क्यूआर कोड स्कैन करके और किसी भी ऐड वैल्यू मशीन (एवीएम) में इसे सत्यापित करके अपने पेटीएम खाते से भुगतान कर सकेंगे. इतना ही नहीं अगर आपके पास आपका फोन नहीं है तो भी आप इस कार्ड केरिए भुगतान कर सकेंगे वो भी बिना किसी शुल्क के. इसे विस्तार रूप देने के लिए पेटीएम पहले चरण में कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और कार्पोरेट के साथ साझेदारी कर रहा है.

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Redmi Note 5 Pro को टक्कर देने के लिए लौंच हुआ Nokia X6

Redmi Note 5 Pro को टक्कर देने के लिए Nokia ने अपना नया स्मार्टफोन NOKIA X6 लौंच किया है. इस स्मार्टफोन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें iPhone X की तरह ही डिस्प्ले दिया गया है. इसकी डिस्प्ले का आस्पेक्ट रेश्यो 19:9 है.

NOKIA X6 फोन के फीचर्स

इस फोन में Redmi Note 5 Pro की तरह ही आक्टाकोर स्नैपड्रेगन 636 प्रोसेसर दिया गया है. NOKIA X6 में 4GB और 6GB रैम का विकल्प है. कंपनी ने इसके 3 वेरिएंट लौंच किए हैं. इसके 4GB रैम के साथ 32GB और 64GB की इंटरनल मैमोरी का विकल्प दिया गया है. इसकी इंटरनल मैमोरी को माइक्रोएसडी कार्ड से 128GB तक बढ़ाया जा सकता है.

वहीं इसके अन्य फीचर्स की बात करें तो इसमें 5.8 इंच की डिस्प्ले और 2.5D गोरिल्ला ग्लास प्रोटेक्शन दी गई है. यह फोन गूगल के एंड्रायड आपरेटिंग सिस्टम ओरिओ 8 पर काम करेगा. कैमरे की बात करें तो Nokia X6 में डुअल रियर कैमरा सेटअप दिया गया है. प्राइमरी कैमरा 16 मेगापिक्सल का है और दूसरा कैमरा 5 मेगापिक्सल का है. वहीं सेल्फी और वीडियो कौलिंग के लिए फ्रंट पैनल पर 16 मेगापिक्सल का कैमरा दिया गया है. बेहतर फोटोग्राफी के लिए इसमें एआई फीचर दिए गए हैं.

हालांकि इस स्मार्टफोन को अभी केवल चीन में लौंच किया है. चीनी मार्केट में Nokia X6 की कीमत 1,299 युआन (करीब 13,800 रुपए) से शुरू होती है. यह कीमत इसके 4GB रैम और 32GB इंटरनल मैमोरी वाले वेरिएंट की है. वहीं, 6GB रैम और 64GB इंटरनल मैमोरी वाले वेरिएंट की कीमत 1,699 युआन (करीब 18,100 रुपए) है. फिलहाल, इस हैंडसेट को भारत में लौंच किए जाने के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

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