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6 साल के बच्चे ने वौलमार्ट से की डील, यूट्यूब से कमाए 70 करोड़

अब यूट्यूब चैनल का सबसे छोटा करोड़पति 6 साल का रेयान ने अमेरिकी ई-कौमर्स कंपनी वौलमार्ट के साथ एक डील की है. इस डील के तहत अब वौलमार्ट अमेरिका में अपने 2500 स्टोर्स पर बच्चे के खुद के ब्रांड के खिलौने बेचेगा. कंपनी ने ब्रांड का नाम भी ‘रेयान वर्ल्ड’ रखा है. इन खिलौनों की बिक्री सोमवार से शुरू हुई है. आपको बता  कि रेयान यूट्यूब पर खिलौनों का रिव्यू करता है. पिछले साल उसने यूट्यूब पर खिलौनों का रिव्यू करके 1.1 करोड़ डालर (करीब 70 करोड़) की कमाई की है.

गौरतलब है कि रेयान यूट्यूब पर काफी लोकप्रिय है. उसके चैनल ‘रेयान टौय रिव्यू’ के 1.5 करोड़ सब्सक्राइबर्स हैं. इसमें कई वीडियो को अरबों व्यूज मिल चुके हैं. पिछले साल बढ़ती लोकप्रियता की वजह से ही रेयान को 8वें सबसे ज्यादा कमाने वाले यूट्यूबर का तमगा दिया गया था. हालांकि, रेयान के माता पिता ने उसकी कम उम्र के चलते उसका आखिरी नाम (सरनेम) और राष्ट्रीयता छिपाकर रखी है. रेयान का पहला यूट्यूब वीडियो मार्च 2015 में आया था. तब 3 साल के रेयान को एक लेगो बॉक्स (मिट्टी के खिलौने) से खेलता दिखाया गया था.

बता दें कि पिछले महीने ही वीडियो के जरिए बच्चों के खिलौने बेचने वाली वेबसाइट ‘पाकेट वौच’ ने भी रेयान के साथ एक डील की. यह वेबसाइट रेयान के वीडियो का इस्तेमाल कर उसके खिलौने, कपड़े और घर के सामान से बच्चों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है. अमेरिका की सबसे बड़ी टौय रिटेलर कंपनी टौयज आर के दिवालिया होने के बाद अमेरिका में उसके करीब 885 स्टोर्स बंद हो चुके हैं. ऐसे में वॉलमार्ट और पाकेट वौच के बीच रेयान के जरिए एक बार फिर खिलौनों के मार्केट में कब्जा करने की होड़ है.

शादी के बाद एक्टिंग छोड़ देंगी आलिया? दिया ये चौंकाने वाला बयान

रणबीर भले ही सोशल मीडिया पर ज्यादा एक्टिव ना रहते हों पर उनकी दोस्त और अदाकारा आलिया भट्ट सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. आलिया ने पहली बार सोशल मीडिया पर अपने फैन्स के सवाल का जवाब दिया. इस दौरान उनसे एक फैन ने शादी के बाद उनके प्लान्स के बारे में पूछा. आलिया ने इसका मजेदार जवाब दिया. बता दें कि इंस्टाग्राम पर आलिया ने अपने फैन्स के साथ AskSomething सेशन किया था. इस दौरान उनसे एक फैन ने पूछा- क्या आप शादी के बाद एक्टिंग छोड़ देंगी? मुझे आशा है कि नहीं… इसके जवाब में आलिया भट्ट ने कहा- ”स्टेटस को छोड़ने के अलावा कुछ भी छोड़ने की जरूरत नहीं है. मैं एक्टिंग करूंगी और जितना लंबा हो सके करती रहूंगी.

आपको याद होगा कि इससे पहले भी आलिया ने एक समाचार पत्र से बातचीत के दौरान कहा था- लोग शायद उम्मीद कर रहे हैं कि मैं 30 के बाद शादी करूंगी लेकिन बहुत संभव है कि मैं इससे पहले ही शादी करके सबको चौंका दूं. हालांकि, आलिया ने यह भी कहा कि कोई भी बात पत्थर की लकीर नहीं है. आलिया कहती हैं- यदि मुझे लगेगा कि मैं अब उस स्थिति में हूं तो मैं ऐसा कोई कदम उठा लूंगी. मेरा हमेशा ऐसा मानना रहा है कि मैं बच्चों के लिए शादी करूंगी. तो जब मुझे लगेगा कि अब वह वक्त आ गया है कि जब मुझे बच्चे चाहिए और मैं उन्हें संभाल सकती हूं तो मैं शादी कर लूंगी.

इसके बाद रणबीर ने भी अपने एक इंटरव्यू में कहा था- आलिया की मेरी जिंदगी में आने से एक पौजिटिव अप्रोच आया हैं. वो मेरी दिंदगी में रंग जोड़ती हैं और सहज हैं. आलिया बहुत मेहनती हैं और अनुशासन में रहती हैं. बतौर एक्टर मैं उनकी तारीफ करता हूं. आखिर किसे पसंद नहीं कि कोई आपको प्यार करे.

गर्भवती होने के बाद भी केट का ग्लैमर बरकरार

अमेरिका की स्टार मौडल और अभिनेत्री केट अप्टन ने पिछले महीने यह घोषणा कर सभी को चौंका दिया था, कि वह गर्भवती हैं और जल्द मां बनने वाली हैं. इसके बाद लगा कि शायद वह कुछ दिनों के लिए अपने काम से छु्ट्टी लेकर घर पर आराम करेंगी. पर, अमेरिकी बेसबॉल खिलाड़ी जस्टिन वेरेंडर की इस खूबसूरत पत्नी ने बिकनी फोटोशूट कराकर अपने प्रशंसकों की नींद ही उड़ा दी.

26 वर्षीय केट ने अपने फोटोशूट की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की. इसके बाद तो इन तस्वीरों को लाइक्स करने वालों की बाढ़ आ गई. केट ने कई तरह की डिजाइनर बिकनी में पोज दिए हैं. उनकी काले रंग की बिकनी में पोस्ट की गई तस्वीरों को खासतौर पर काफी पसंद किया जा रहा है.

अलग-अलग अंदाज में इस फोटोशूट को कराकर केट ने दिखाया कि वह भले ही पहले बच्चे को जन्म देने वाली हैं, लेकिन उनकी खूबसूरती में कोई कमी नहीं आई है.

#KateUpton for Yamamay.

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केट के सोशल साइट पर लाखों फालोअर्स हैं. उनके लिए केट की यह तस्वीरें सरप्राइज पैकेज की तरह रही. इन तस्वीरों में केट का फिगर भी काफी स्लिम दिखाई दे रहा है. चूंकि अभी केट के मां बनने में काफी समय है इसलिए उनका बेबीबंप नहीं दिख रहा है.

केट ने 35 वर्षीय जस्टिन से पिछले साल ही शादी की थी. दोनों के बीच अफेयर की शुरुआत 2014 में हुई थी. हालांकि जस्टिन से पहले भी केट का कई लोगों के साथ अफेयर रहा लेकिन उनका कोई भी संबंध शादी तक परवान नहीं चढ़ सका.

आधुनिक युद्ध का शक्तिशाली हथियार ड्रोन विमान

इस समय दुनिया की हर उस सेना के पास ड्रोन मौजूद हैं जो आधुनिक है और खुद को सशक्त मानती है. वास्तव में यह ड्रोन युग है. बिना ड्रोन तमाम सेनाएं आज की तारीख में अपने को अधूरी पाती हैं क्योंकि चाहे दुश्मन से मोरचा लेने की बात हो या फिर आतंकवादियों से निबटना हो, ड्रोन का कोई जवाब नहीं है. सवाल उठता है ड्रोन है क्या?

सीधी सरल भाषा में कहें तो ड्रोन एक ऐसा वायुयान है जिस में पायलट नहीं होता. इसे यूएवी यानी अनमैंड एरियल व्हीकल भी कहते हैं. आप ने मौडल प्लेन सुने होंगे. ये हवाई जहाज के छोटे से प्रतिरूप होते हैं, जिन्हें कोई हाथ में रिमोट ले कर उड़ा सकता है. रिमोट के जरिए ही ये दाएं से बाएं, बाएं से दाएं, ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर भी हो जाते हैं. नए उन्नत ड्रोन कंप्यूटराइज्ड दिशानिर्देश से भी संचालित होते हैं. विदेशों में ये बच्चों के खिलौने हैं लेकिन ड्रोन इतना बचकाना नहीं है. हां, खिलौना लगने वाला यह बेहद जटिल और बेहद उन्नत प्लेन है.

मौडल प्लेन को उन्नत कर के ऐसे बना दिया जाता है कि 3 हजार फुट से ज्यादा की ऊंचाई तक उड़ सके. इसे ऐसा लचीला रूप दिया गया है कि समुद्री चक्रवात में भी यह उड़ता रह सकता है, सूचनाएं और चित्र भेजता रहता है और वह भी 1-2 घंटे नहीं, 80 से 90 घंटे लगातार. यह बिजली, ईंधन और सौर ऊर्जा से संचालित हो सकता है.  ड्रोन में कोई चालक नहीं होता. इसे दूर बैठा एक औपरेटर चलाता है. खुद ड्रोन के कंप्यूटर विभाग में स्थान का विशेष खाका होता है. इस के अगले सिरे में बेहद शक्तिशाली कैमरे फिट होते हैं जो काफी ऊंचाई से किसी भी स्थान या सामान की साफ तसवीर खींच सकते हैं. अगलबगल की खिड़की में कोई ऐंटीएअरक्राफ्ट गन ले कर बैठा हो तो इस के कैमरे इतने बड़े परिक्षेत्र को कवर करने वाले एवं संवेदनशील होते हैं कि वे उन का चित्र खींच लेंगे.

ड्रोन को औपरेट करने वाला कभीकभी 8 से 10 हजार मील दूर पर भी हो सकता है. वह आसमान में स्थित उपग्रह के जरिए रेडियो संकेतों से ड्रोन को नियंत्रित करता है और वहीं से अपने लक्ष्य के इच्छित व्यक्ति या स्थान को निशाना बनाता है या फिर ड्रोन खुद ही पहले से फिट चित्र या ग्राफिक का मिलान कर के निशाना साधता है. यह बहुत सटीक तौर पर मिसाइल दाग लेता है. ड्रोन की कैमरायुक्त आंखें रात हो या दिन, एक जैसी क्षमता से देख सकती हैं.

ड्रोन सिर्फ मिसाइल ले जाने और हमला करने के लिए ही काम नहीं आते, इस के अलावा भी इस के बेहद अहम कार्य हैं जिन के लिए भी ये जाने जाते हैं. अगर कोई घने जंगल या ऐसे दुर्गम स्थान में फंस गया हो जहां से उस का ढूंढ़ना मुश्किल हो तो उस की सहायता भी ड्रोन ही करता है. भयानक चक्रवात, भूकंप, हवाई सर्वेक्षण आदि में बचाव व राहत कार्य करने के लिए ड्रोन का कोई मुकाबला नहीं. ड्रोन को इस के द्वारा संपन्न किए जाने वाले कामों के आधार पर निम्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है :

  1. टारगेट या डिकाय श्रेणी के ये ड्रोन जमीन पर या हवा में मार करने वाले अपने साथियों को निशाना सुझाते हैं. यदि दुश्मन ने इन्हें निशाना बनाया तो उन की पोजीशन समझ में आ जाती है. यदि नहीं बनाया तो ड्रोन उन की खोजखबर अपने गोल अंदाजों को आ कर दे देता है.
  2. सूक्ष्म सर्वेक्षण के ड्रोन 37 मीटर ऊंचाई से दुश्मन के युद्धक क्षेत्र की तसवीरें भेज कर उन का विश्लेषण कर गहन सर्वेक्षण कर सकते हैं और हमले की तैयारी में सहायता करते हैं. ये सीमा और युद्ध क्षेत्र की पर्याप्त जासूसी कर लेते हैं. कुछ ड्रोन विशेषतौर पर इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे माल की ढुलाई भी करें. कई बार सेना अतिदुर्गम क्षेत्रों में फंस जाती है जहां पशु, मानव या हैलीकौप्टर या हवाई जहाज से सामान भेज पाना मुश्किल होता है तब ड्रोन काम आते हैं.
  3. ब्रिटेन ने अक्तूबर 2012 में दुनिया का सब से छोटा मानवरहित विमान यानी नैनो ड्रोन ‘एसक्यू-4’ का विकास किया है जिस का हाल में अमेरिका में परीक्षण किया गया है. हालांकि अभी तक परीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई पर माना जा रहा है कि यह परीक्षण सफल रहा है. इस से विशेषज्ञों की आशंका बढ़ गई है कि आने वाले समय में अमेरिका, तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में इस का इस्तेमाल कर सकता है.
  4. विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की जान बचाने में यह विमान काफी मददगार साबित होगा. महज 198 ग्राम भार वाला यह ड्रोन विमान मुट्ठी में समा सकता है. यह हवा में एक ही जगह 30 मिनट तक चक्कर काटने में सक्षम है. इस की कीमत भी अच्छीखासी है, तकरीबन 20 हजार पाउंड. पिछले दिनों अमेरिका ने इस लघु विमान का परीक्षण कार्डिफ स्थित बीसीबी इंटरनैशनल ऐंड मिडिलसैक्स विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में किया है.
  5. एसक्यू-4 रेकान नैनो ड्रोन 400 मीटर तक ऊंचा उड़ने में सक्षम है. इस की रफ्तार 6.5 मीटर प्रति सैकंड है. यह  1.5 मील इलाके पर आसानी से नजर रख सकता है. इस से अमेरिकी सैनिकों को सड़कों पर बिछी बारूदी सुरंगों से बचाया जा सकेगा व इस की मदद से आतंकियों की पहचान करना आसान होगा. इस से आतंकियों की स्थिति का पहले ही पता लग जाएगा जिस से उन का खात्मा करना आसान होगा.
  6. मौजूदा ड्रोन विमान एक तो आकार में बहुत बड़े हैं, दूसरे, ये तालिबान के रौकेटों का निशाना आसानी से बन जाते हैं, क्योंकि इन की रफ्तार कम है, जबकि ड्रोन एसक्यू-4 रेकान रफ्तार के मामले में छोटा होने के बावजूद तेज है.

दुनिया के इस सब से छोटे मानवरहित विमान में उच्च क्षमता के 2 कैमरे लगे हैं जो किसी भी जगह की साफ तसवीर खींच सकते हैं. यही नहीं, यह विमान अपने अतिसंवेदनशील माइक्रोफोन के जरिए दुश्मन के ठिकाने की धीमी से धीमी बातचीत भी सुना सकता है. बैटरी की क्षमता कम होने पर यह विमान  खुद-ब-खुद नियंत्रण केंद्र पर वापस आने में सक्षम है और इसे दुनिया के किसी भी कोने से रिमोट कंट्रोल  व टच स्क्रीन कंप्यूटर से नियंत्रित किया जा सकता है.

ऐसी जगह जहां वातावरण बेहद विषम हो, परिस्थितियां प्रतिकूल हों, थलसेना और वायुसेना का वहां पहुंचना आसानी से संभव न हो या पहुंचती न हों, वहां ये ड्रोन बहुत कारगर हैं. खर्चीले युद्ध क्षेत्र में भी ड्रोन के जरिए लड़ाई लड़ना आसान और आर्थिक दृष्टि से भी लाभदायक है. हां, जंग का मैदान लक्ष्य से बहुत दूर हो तो ऐसे लक्ष्य को भी इन्हीं के जरिए पाना आसान होता है.  मानव रहित हथियारबंद ड्रोन इस के लिए बेहद कारगर होता है. यही वजह है कि आज दुनिया की हर सेना इसे अपने जंगी बेड़े का हिस्सा बनाना चाहती है.

पाकिस्तानी ड्रोन

करांची के बाहरी इलाके में स्थित शांत सा पड़ा एक परिसर कुछ खास बड़ा नहीं है, 90 हजार वर्ग फुट की जगह पर मुख्य भवन बना है साधारण सा. एक साइन बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है, ‘इंटीग्रेटेड डायनामिक्स’ और नीचे करांची के उस इलाके का पता. हां, बोर्ड से यह भी पता चलता है कि यह ड्रोन पर शोध करने  वाला केंद्र है. आईडी यानी इंटीग्रेटेड डायनामिक्स के सीईओ व शोध केंद्र के अगुआ डा. आर एस खान सहजता से बताते हैं, ‘‘हां, हम यहां ड्रोन बनाते हैं, सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं, हमारे खरीदारों में अमेरिका, इटली, आस्ट्रेलिया, फ्रांस और स्पेन भी हैं.’’

आज पाकिस्तान में इंटीग्रेटेड डायनामिक्स समेत तकरीबन आधा दर्जन सरकारी, गैर सरकारी कंपनियां ड्रोन विकसित करने में लगी हैं. पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कामरा स्थित पाकिस्तान एअरोनौटिकल कौंप्लैक्स ने इटली के सेलेक्स गैलीलियो के सहयोग से फाल्को नामक ड्रोन बनाया है. फाल्को गैलीलियो ने ही डिजाइन किया है. फाल्को का ही पाकिस्तानी नाम उकाब है. इटली वाली डिजाइन में मिसाइल फिट नहीं है. यह जासूसी के काम आने वाला ड्रोन है. लेकिन चीन ने सहयोग किया और अब उकाब नामक ड्रोन इसी डिजाइन में हमलावर क्षमता से लैस है.

सेना के उपयोग के लिए पाकिस्तान इसी की 2 दूसरी श्रेणियां विकसित कर रहा है जिन्हें बाज और अबाबील नाम दिया गया है. पाकिस्तान की एअरवेपन कौंप्लैक्स एक दूसरी कंपनी है जो ड्रोन तैयार कर रही है. नैशनल डैवलपमैंट कौंप्लैक्स, ईस्टवैस्ट इन्फिनिटी, सतुमा ग्लोबल इंडस्ट्रियल डिफैंस सौल्यूशन भी ड्रोन बनाने के व्यवसाय में कूद पडे़ हैं.  इंटीग्रेटेड डायनामिक्स इसे निशान के नाम से तो ईस्टवैस्ट इन्फिनिटी इसे हैलीकवाद के नाम से तैयार कर रहा है. रासाडो, बौर्डर ईगल, हार्नेट, वैक्टर कुछ दूसरे मौडल हैं जो यहां तैयार हो रहे हैं. सतुमा, जो इस्लामाबाद के बाहर मात्र  500 वर्गमीटर का एक कौंप्लैक्स है और सोआन नदी के किनारे स्थित है, फ्लेमिंगो, जासूस और मुखबिर नामक ड्रोन तैयार कर रहा है जबकि ग्लोबल इंडस्ट्रियल डिफैंस सौल्यूशन हुमा-1 और उकाब का नया वर्जन बना रहा है.

सारांश यह है कि आसमान के जरिए आफत बरपा करने वाली वर्तमान की सब से सटीक और कारगर ताकत पाकिस्तान के हाथ आ गई है. पाकिस्तान का दावा है कि उस ने ड्रोन का निर्माण अपने बलबूते कर लिया है.  पाकिस्तान का दावा है कि उस के पास 20 वर्षों से ड्रोन तकनीक मौजूद है. जब भी जरूरत होती, हम 1 साल के भीतर जरूरत के मुताबिक अपने ड्रोन तैयार कर लेते हैं. मगर सवाल है कि पाकिस्तान इतने प्रकार के, इतनी भारी मात्रा में ड्रोन का उत्पादन कर के क्या करेगा? पाकिस्तानी जवाब तो यह है कि वह इस के जरिए आतंकियों से निबटेगा, वह इस का इस्तेमाल अलकायदा, तालिबान जैसी चुनौतियों के खिलाफ करेगा. पर उन के लिए तो अमेरिकी प्रीडेटर ड्रोन  ही काफी थे. एक सामान्य ड्रोन तकरीबन 350 करोड़ पाकिस्तानी रुपए का और मिसाइल युक्त युद्धक ड्रोन तकरीबन 700 से 800 करोड़ रुपए का खर्च आता है. भूखे, अविकसित देश में दाने के बजाय ड्रोन पर इस तरह बेतहाशा खर्च क्यों?

खैर, यह बात शीशे की तरह साफ है कि इटली और दीगर देशों से शांति, विकास और शोध के नाम पर गैर युद्धक ड्रोन बनाने की तकनीक खरीद कर पाकिस्तान चीन के सहयोग से उस में मिसाइलें फिट कर उसे युद्धक हथियार की शक्ल दे रहा है, निशाना है भारत. जब भी कभी ऐसी परिस्थिति आए तो वह हर हाल में भारत से आगे रहे, ऐसी उस की मंशा है.

हम भी पीछे नहीं

तकनीकी रूप से देखें तो भारत के पास प्रीडेटर जैसी क्षमता वाला युद्धक ड्रोन नहीं है लेकिन इस मामले में पाकिस्तान से हम बहुत पीछे हों, ऐसा भी नहीं है. हम ने भी ऐसी क्षमता हासिल कर ली है कि जब चाहें तब स्वनिर्मित और इसराईली ड्रोन को हथियारों से लैस कर सकते हैं. भारत दुनिया की अलगअलग कंपनियों से 500 ड्रोन खरीदने तो जा ही रहा है पर इस से पहले भी हम ने इसराईल से हेरोन नामक 50 गैर युद्धक ड्रोन खरीदे हैं जिन्हें बहुत कम समय में फिट फौर फाइट किया जा सकता है.

शायद भारत की इस क्षमता को पाकिस्तान जानता है इसीलिए हम ने जब इसराईल से 50 गैर युद्धक ड्रोन खरीदने का समझौता 220 मिलियन डौलर में किया था तो पाकिस्तान ने खूब भौंहें चढ़ाई थीं. भारत ने स्पष्ट कर दिया था कि वह ये ड्रोन कश्मीर और चीन से लगे अपने सीमा क्षेत्र की निगरानी के लिए खरीद रहा था. पर पाकिस्तानी घुसपैठियों को इस से दिक्कत हो सकती थी इसलिए उस ने खूब विरोध किया. जबकि भारत ने सिर्फ तब अपनी आवाज उठाई जब पाकिस्तान बारबार अमेरिका से युद्धक ड्रोन की मांग कर रहा था, तत्कालीन विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने तब इतना ही कहा था कि इस से हमारे क्षेत्र में हथियारों की होड़ बढ़ेगी.

फिलहाल हेरोन 3 हजार फुट की ऊंचाई पर लगातार 40 घंटे उड़ कर सर्वेक्षण कर सकने वाला ऐसा ड्रोन है जो औपरेटर से संपर्क टूट जाने के बावजूद खुद ही सुरक्षित अपने आधार कैंप में वापस आ जाता है. इसराईली सहायता से भारत में रुस्तम नामक ड्रोन भी विकसित हो रहा है, जिसे डीआरडीओ विकसित कर रहा है. यह 300 किलोमीटर परिक्षेत्र में 1 हजार मीटर की ऊंचाई पर 24 घंटे उड़ान  भर सकता है. इस के अलावा हमारे  पास निशांत और लक्ष्य नामक ड्रोन भी मौजूद हैं.

साथ ही नौसेना के पास अपने सर्चरो और हेरोन नामक ड्रोन हैं. इस के अलावा भारत प्रीडेटर सरीखा ड्रोन तैयार करने की प्रक्रिया में लगने वाला है, पर इस के लिए और समय लगेगा, पहले वह कू्रज मिसाइलों की तर्ज वाले ड्रोन बनाने की तैयारी में है. इस के अलावा भारत के पास स्वयं विकसित करने व यूरोपीय समुदाय के देशों से ड्रोन खरीदने के विकल्प खुले हुए हैं. इसलिए पाकिस्तान अपनी ड्रोन क्षमता पर बहुत नहीं इतरा सकता, यह तय है.

भारत ने युद्धक स्तर के ड्रोन को कम ही तरजीह दी है. पर जिस तरह कारगिल के दौरान तोजोलिंग और दूसरी कई चोटियों पर उसे संघर्ष करना पड़ा व अपेक्षाकृत ज्यादा जानें गंवानी पड़ीं, उसे देखते हुए देश को अमेरिकी प्रीडेटर सरीखे ड्रोन की सख्त जरूरत है. और तब जब पड़ोसी पाकिस्तान हो, जो इस तरह के चौंकाने वाले साजिशी हमले करने का आदी हो, घुसपैठ और  कश्मीर के दुर्गम इलाकों में आतंकी गतिविधियों का संचालक हो तब इस की जरूरत हर हाल में बढ़ जाती है. वैसे अपनी सुरक्षा और खतरों का सामना करने के लिए भी इस तरह के उन्नत हथियार आवश्यक हैं.

छोटी विरासत, बड़ा विवाद

उसूल बेच कर पैसा कमाना कभी घाटे का सौदा साबित नहीं होता. यह अगर केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल कर रही हैं तो यह सिर्फ उन की मां कृष्णा और बहन पल्लवी पटेल की निगाह में ही गुनाह है वरना अब लोग भूल चले हैं कि अपने दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की सियासी और सामाजिक हैसियत किसी और से उन्नीस नहीं हुआ करती थी. बसपा संस्थापक कांशीराम के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू करने वाले सोनेलाल की एक आवाज पर पूरा कुर्मी समुदाय इकट्ठा हो जाता था. सोनेलाल जातिगत भेदभाव और कट्टरपंथियों से इस हद तक नफरत करते थे कि उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था.

बीती 2 जुलाई को उन की पुण्यतिथि अनुप्रिया ने अपने पति आशीष पटेल के साथ समारोहपूर्वक मनाई तो पल्लवी और कृष्णा ने भी अपने आयोजन का आकार बड़ा ही रखा.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शायद कभी बेटी को याद आए कि 1999 में तत्कालीन भाजपाई दिग्गज सांसद मुरली मनोहर जोशी के इशारे पर उन के पिता की ऐसी सरकारी पिटाई हुई थी कि उन के शरीर पर आए फ्रैक्चरों की संख्या आज तक कोई नहीं बता पाया.

खाद्य पदार्थों में मिलावट पर उम्रकैद

खाद्य पदार्थों में मिलावट करना कारोबारियों के लिए आज सामान्य बात हो चुकी है. यदि वे मिलावट नहीं करते हैं तो उन्हें लगता है कि जैसे कोई अनैतिक काम कर रहे हैं. शुद्धता का दावा करने वाली बड़ीबड़ी कंपनियों के खाद्य पदार्थों में भी मिलावट की शिकायतें आती रहती हैं.

दूध, घी, दाल, आटा, चावल आदि में मिलावट स्थानीय स्तर पर होती रहती है. प्रसिद्ध कंपनियों के उत्पाद के नाम में एक अक्षर बदल कर नकली सामान बाजार में बेधड़क बिक रहा है. सरकारी स्तर पर इसे रोकने की व्यवस्था है लेकिन जिन अधिकारियों को यह काम सौंपा गया है वे रिश्वत ले कर मामले को रफादफा कर देते हैं. जांच के लिए आए अधिकारियों का मिलावटखोर उन के पहुंचते ही स्वागतसत्कार शुरू कर देते हैं, उन्हें घूस दे कर अपना धंधा जारी रखते हैं. सरकारी मशीनरी इस मामले में कितनी सुस्त है, इस के असंख्य उदाहरण देखने को मिलते हैं. हाल ही में खाद्य उत्पाद विनियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों को उम्रकैद तथा 10 लाख रुपए के जुर्माने की सजा के प्रावधान की सिफारिश की है.

प्राधिकरण मानक कानून में संशोधन का प्रस्ताव 12 साल पहले 2006 में कर चुका था और तब उस के लिए कानून भी बनाया गया था, लेकिन मामला लटका रहा और 2011 में इस के नियमों को अधिसूचित किया गया. अब इस में कुछ और धाराएं जोड़ी गई हैं जिस के तहत घातक पदार्थ मिलने पर उम्रकैद की सजा या 10 लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान है. सिफारिश अच्छी है लेकिन इस का क्रियान्वयन कैसे होता है, यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. अब त्योहारी सीजन आने वाला है, मावा आदि में घातक पदार्थों की मिलावट की खबरें आएंगी. प्रशासन मिलावट कैसे रोकता है, यह समय बताएगा.

सियासत धर्म की

जब देश का पूरा समय और ताकत गरीबी, भुखमरी, बीमारी, पढ़ाईलिखाई पर लगना चाहिए, देश के नेता या तो हिंदूमुसलिम दंगे करा रहे हैं या तीर्थयात्राएं करा कर लोगों को धर्म की अफीम पिला कर सुला रहे हैं. देशभर की आंखें एक तरह से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे बाबरी मसजिद मामले की सुनवाई पर लगी हैं. हिंदू गुट उसे ही रामजन्म भूमि मानते हैं और मुसलिम एक पुरानी मसजिद.

सुप्रीम कोर्ट ने अभी जिरह के दौरान कहा है कि वह इस मामले को सिर्फ जमीन की मिलकीयत का मामला मान रही है और रामजन्म से उस का कोई लेनादेना नहीं है. पर बहस के दौरान हिंदू पक्ष बारबार किसी हिंदू मंदिर की बात ही कर रहे हैं. और उन्हें तथ्यों से नहीं भाजपा से मतलब है. 1526 से, जब से कुछ फैक्ट मालूम हैं, यहां मसजिद ही है पर भगवा जमात इसे मंदिर साबित करने में लगी है.

सच यह है कि इस जगह अगर मसजिद दोबारा बने तो मुसलमानों की हालत चमक नहीं जाएगी और अगर राममंदिर बन गया तो हिंदू सुधर नहीं जाएंगे. यह मामला कोरा बहकाने का है. हिंदुओं का एक कट्टर हिस्सा किसी तरह साबित करने में लगा है कि 1947 के विभाजन के बाद भारत केवल हिंदुओं का है, संविधान चाहे जो भी कहता रहे.

हिंदू हों या मुसलमान मंदिरों और मसजिदों से किसी की कभी हालत नहीं सुधरी है. धर्म तो केवल दान की शक्ल में टैक्स वसूलता है और आम भक्त को गुलाम बना कर उसे वह करने को मजबूर करता है जो वह नहीं करना चाहता. तिलक, तीर्थ, नमाज, टोपी, क्रौस, कड़ा यह सब धर्मों की साजिश है कि किसी तरह अपने भक्तों को बेवकूफ बनाए रखो. उन्हें एकदूसरे से लड़वाते रहो और धर्म के नाम पर कुरबानी के लिए उकसाते रहो.

राममंदिर के साथसाथ कभी ताजमहल को तेजोमहालय कहना और कुतुबमीनार को विष्णु स्तंभ कहना बेबात में आम आदमी को उलझाना है. हिंदू धर्म के दुकानदार तो मक्का तक को शिवमंदिर साबित करने में लगे रहते हैं ताकि हर समय साबित करा जा सके कि उन का धर्म है तो सबकुछ है, वरना कुछ नहीं. धर्म का मतलब अगर गरीबी, बीमारी, फूहड़ता और गंदगी है तो बात दूसरी पर असल में कोई बेवकूफ ही होगा जो इसे मानेगा. भक्तों को धर्म का हुक्म मानना पड़ता है इसलिए कि धर्म के पास जाति से बाहर करने का हक होता है. धर्म ने अरबों लोगों की शादी और मौत तक पर कब्जा कर रखा है. अयोध्या का यह महज 2.77 एकड़ का प्लाट तो क्या चीज है?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो भी हो, हिंदू और मुसलिम धर्मों के ठेकेदारों की बन जाएगी. जीतने वाला खुशियों के लिए दान वसूलेगा और हारने वाला लड़ने के लिए. लोग तो अपनेआप पिसेंगे.

असल जिंदगी में भी उतनी ही बोल्ड हूं : राधिका आप्टे

हिंदी के अलावा मराठी, बंगला, तेलुगू व मलयालम भाषा की फिल्मों में विविधतापूर्ण किरदार निभाने वाली अदाकारा राधिका आप्टे अब वैब सीरीज करने के अलावा अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा का भी रुख कर रही हैं. बहुत जल्द ही वे मिशेल विंटरबौटम की फिल्म ‘वेडिंग गेस्ट’ में देव पटेल के साथ नजर आएंगी. इस के अलावा वे निर्माता से निर्देशक बनी लायडिया डीन की अनाम फिल्म में सारा मैगन थौमस के साथ नजर आएंगी. यह फिल्म दूसरे विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी एक जासूसी फिल्म है. पेश हैं एक मुलाकात के दौरान उन से हुई बातचीत के मुख्य अंश :

अपने कैरियर को ले कर आप कितनी खुश हैं?

मेरे कैरियर का स्वर्णिम व रोचक दौर चल रहा है. फिल्म ‘पैडमैन’ में मेरे अभिनय की काफी तारीफ हुई. इन दिनों मेरे पास कई बड़ी व महत्त्वपूर्ण फिल्में हैं जिन में 2 अंगरेजी फिल्में हैं. वहीं मैं नैटफ्लिक्स के लिए विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर आधारित एक वैब सीरीज ‘सैक्रेड गेम्स’ कर रही हूं, जिस में मेरे साथ सैफ अली खान व नवाजुद्दीन सिद्दीकी हैं. मैं श्रीराम राघवन की फिल्म ‘शूट द पियानो प्लेअर’ में आयुष्मान खुराना के साथ काम कर रही हूं. गौरव चावला की फिल्म ‘बाजार’ भी कर रही हूं. मैं ने इंटरनैशनल फिल्म ‘बौमबेरिया’ के अलावा हौलीवुड निर्देशक कल पेन की फिल्म ‘आश्रम’ की है, तो कुछ दूसरी फिल्में भी कर रही हूं.

फिल्म ‘आश्रम’ में मेरे सिवा सभी अमेरिकन कलाकार हैं. फिल्म को भारत में मनाली में फिल्माया गया है. मैं बहुत खुश हूं कि मेरे पास न सिर्फ बड़ी बल्कि बहुत ही अलग तरह की फिल्मों व वैब सीरीज के औफर आ रहे हैं. फिलहाल मैं काम करते हुए एंजौय कर रही हूं.

अब आप भी बौलीवुड की दूसरी अभिनेत्रियों के नकशेकदम पर चलते हुए हौलीवुड की फिल्में कर रही हैं?

हौलीवुड फिल्मों से जुड़ने की मेरी कभी कोई महत्त्वाकांक्षा नहीं रही, पर अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा व विश्व सिनेमा करने की इच्छा रही है. मैं हर भाषा का सिनेमा व उन किरदारों को निभाना चाहती हूं, जिन्हें करना मेरे लिए सहज हो. मैं खुद को एक खास तरह के सिनेमा तक ही सीमित नहीं रखना चाहती. विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर बन रही फिल्म में मैं नूर इनायत खान नामक जासूस का किरदार निभा रही हूं. यह फिल्म ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की ‘खुफिया सेना’ की इंटैलीजैंस औफिसर वेरा अटकिंस और नूर सहित उन 2 महिला जासूसों की कहानी है, जिन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक मिशन पर फ्रांस भेजा गया था. हम इस फिल्म की कुछ शूटिंग कर चुके हैं.

आप को नूर के किरदार में क्या पसंद आया?

नूर एक अंतर्राष्ट्रीय पात्र है. नूर इनायत खान का जन्म रूस में हुआ था. उस की मां अमेरिकन और पिता भारतीय मुसलिम थे. उस की परवरिश फ्रांस में हुई जबकि उसे ब्रिटिश नागरिकता हासिल थी. वह अपने समय से काफी आगे थी. वह राइटर थी, संगीतकार थी, बहादुर थी. उसे जरमन केंद्रित कैंप में ड्यूटी करते हुए मारा गया था. नूर का किरदार काफी प्रेरणादायक है, तो मैं ऐसे अद्भुत किरदार को निभाने से मना कैसे कर देती.

आप ने ‘हंटर’, ‘पार्च्ड’ सहित कई फिल्मों में काफी बोल्ड सीन दिए हैं?

मैं जिस माहौल से आई हूं, वहां कोई भी किरदार बोल्ड नहीं होता. मैं इस तरह के लोगों से अकसर मिलती रही हूं. बोल्ड किरदार का मतलब ‘सैक्सुअली बोल्ड’ नहीं होता, बल्कि एक स्वतंत्र जिंदगी जीना होता है. बोल्ड तो साहस का परिचायक है. हमारे देश में ही सैक्स को हौआ बना दिया गया है, जबकि मेरी राय में हर स्वस्थ इंसान को सैक्स और भोजन की चाह होनी स्वाभाविक है. सैक्स की ज्यादा भूख गलत नहीं है. सैक्स की कम या ज्यादा भूख तो इंसान की अपनी सोच है. हमारे देश में सैक्स को ले कर खुलेआम चर्चा नहीं होती, इसलिए यह हौआ बना हुआ है.

फिल्म ‘बाजार’ में तो आप का ग्लैमरस किरदार है?

मेरे लिए ‘बाजार’ अलग तरह की फिल्म है. इस तरह की फिल्म या किरदार इस से पहले मैं ने नहीं किया है. यह सच है कि मैं ने इस फिल्म में पहली बार अति ग्लैमरस किरदार निभाया है. फिल्म की कहानी शेयर बाजार में आने वाले उतारचढ़ाव को ले कर है. इस फिल्म में मेरे किरदार में कई शेड्स हैं. फिल्म में मेरे ज्यादातर सीन चित्रांगदा सिंह के बजाय सैफ अली खान के साथ हैं. सैफ अली के साथ काम करने के मेरे अनुभव काफी अच्छे रहे. वे बेहतरीन सहकलाकार हैं.

वूमन इंपावरमैंट को ले कर आप की क्या सोच है?

मेरा मानना है कि वूमन इंपावरमैंट तब तक सही अर्थों में नहीं हो सकता जब तक लिंगभेद कायम रहेगा. आज की तारीख में पुरुष व नारी में समानता होनी चाहिए.

बौलीवुड में ‘मी टू मोमैंट की क्या स्थिति है?

बौलीवुड एकदम अलग तरह की फिल्म इंडस्ट्री है. यहां फिल्मों में काम पाने का तरीका भी अलग है. मसलन, विदेशों में कलाकार अभिनय स्कूल से प्रशिक्षण ले कर ही फिल्मों में आते हैं, फिर वहां एजेंट होते हैं. एजेंट प्रतिभाशाली कलाकारों को स्कूल या थिएटर से ले जाते हैं, जबकि भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है. हौलीवुड में जिस तरह से पुरुष और औरत एकसाथ आ कर टीम बना कर कहते हैं कि हम यहां ऐसा नहीं होने देंगे, वैसा ही बौलीवुड में भी होना चाहिए.

बौलीवुड में महिलाओं के शोषण की काफी बातें होती हैं?

देखिए, लोग बौलीवुड को जादुई नगरी समझते हैं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है. यह एक फिल्म इंडस्ट्री है. लोग अपने सपनों को पूरा करने की सोच के साथ बौलीवुड में आते हैं. वे इतने महत्त्वाकांक्षी होते हैं कि कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. जिस तरह विश्व में हर जगह बिना लिंग भेद के ताकतवर शोषण करता है, वैसा ही यहां भी है. मेरी राय में पुरुष या नारी के बजाय उम्र का शोषण होता है. लोग शोषित होते रहते हैं, पर आवाज नहीं उठाते.

अभिनय के अलावा क्या करना चाहती हैं?

लिखना चाहती हूं. गीत गाना चाहती हूं, पर फिल्मों में गाने का मौका मिलेगा, ऐसा मुझे लगता नहीं है.

हरी सब्जियों के अनूठे जायके : फ्रैंचबींस विद मूंग दाल

फ्रैंचबींस विद मूंग दाल

सामग्री

– 150 ग्राम फ्रैंचबींस

– 1 गाजर

– 1/4 कप धुली मूंग दाल

– 2 छोटे चम्मच अदरक व हरीमिर्च बारीक कटी

– 1 छोटा चम्मच राई

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– 1 छोटा चम्मच लहसुन बारीक कटा

– 1 साबूत लालमिर्च

– 1 बड़ा चम्मच नारियल कद्दूकस किया

– 1 बड़ा चम्मच रिफाइंड औयल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

दाल को 1/2 घंटा पानी में भिगो दें. फ्रैंचबींस को धो कर छोटाछोटा काट लें. गाजर को भी छोटे क्यूब्स में काटें. एक कड़ाही में तेल गरम कर के राई, जीरा व लहसुन का तड़का लगाएं. फिर हलदी पाउडर व कटी सब्जियां और दाल को पानी से निथार कर छौंक दें. अदरक हरीमिर्च, नमक भी डालें. 1 बड़ा चम्मच पानी डालें और सब्जी को ढक दें. दाल, फ्रैंचबींस व गाजर के गलने व पानी के सूखने तक पकाएं. ऊपर से नारियल बुरक कर सर्व करें.

हरी सब्जियों के अनूठे जायके : लौकी के क्यूब्स

सामग्री

– 3/4 कप बेसन

– 1/4 कप मूंग दाल आटा

– 1 कप लौकी कद्दूकस की

– 1 छोटा चम्मच अदरक व हरीमिर्च बारीक कटी

– 1 छोटा चम्मच लहसुन का पेस्ट

– 1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

– 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी

– 1 छोटा चम्मच जीरा

– चुटकी भर हींग पाउडर

– 2 बड़े चम्मच रिफाइंड औयल

– नमक व मिर्च स्वादानुसार.

विधि

बेसन और मूंगदाल आटे को मिला कर जीरा, हींग व तेल को छोड़ कर बाकी सारी सामग्री आटे में मिलाएं. 2 कप पानी डाल पतला घोल बना लें. 10 मिनट ढक कर रखें. एक नौनस्टिक कड़ाही में 1 चम्मच तेल गरम कर हींग व जीरा डालें. फिर लौकी व बेसन वाला घोल डाल दें. धीमी आंच पर बराबर चलाती रहें. जब मिश्रण गोले की तरह हो जाए व जमने लगे तो एक प्लेट को चिकना कर मिश्रण उस में पलटें. 1/2 इंच मोटाई में फैलाएं. ठंडा होने पर मनचाहे क्यूब्स काट लें. एक नौनस्टिक तवे को तेल से चिकना करें और लौकी के क्यूब्स को दोनों तरफ से सेंक लें.

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