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हरी सब्जियों के अनूठे जायके : शिमला मिर्च के सूखे कोफ्ते

शिमलामिर्च के सूखे कोफ्ते

सामग्री

– 3/4 कप लाल, हरी व पीली शिमलामिर्च मिक्स्ड कद्दूकस की

– 1/2 कप मोटा बेसन

– 50 ग्राम पनीर

– 2 छोटे चम्मच अदरक व हरीमिर्च बारीक कटी

– 1/2 छोटा चम्मच गरममसाला

– कोफ्ते तलने के लिए मस्टर्ड औयल

– नमक स्वादानुसार.

मसाले की सामग्री

– 1/2 कप प्याज का पेस्ट

– 1/4 कप लंबाई में कटी प्याज

– 1 छोटा चम्मच अदरक व लहसुन पेस्ट

– 1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

– 2 छोटे चम्मच धनिया पाउडर

– 1/2 छोटे चम्मच लालमिर्च पाउडर

– 1/4 छोटा चम्मच बड़ी इलायची के दाने पिसे

– 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती कटी

– 1 बड़ा चम्मच मस्टर्ड औयल

– नमक स्वादानुसार.

विधि

कोफ्ते बनाने की सारी सामग्री मिक्स कर लें. फिर छोटेछोटे गोले बना कर गरम तेल में डीप फ्राई कर लें. पुन: एक नौनस्टिक कड़ाही में 1 बड़ा चम्मच तेल गरम कर प्याज को पारदर्शी होने तक भूनें. फिर प्याज का पेस्ट, अदरकलहसुन पेस्ट डाल कर भूनें. इलायची पाउडर को छोड़ कर सारे सूखे मसाले डालें और तेल छूटने तक भूनें. अब कोफ्ते डालें. साथ ही 2 बड़े चम्मच पानी डाल दें. ढक कर धीमी आंच पर कोफ्तों के  गलने व पानी सूखने तक पकाएं. सर्विस प्लेट में निकाल कर धनियापत्ती व इलायची पाउडर बुरक कर सर्व करें.

हरी सब्जियों के अनूठे जायके : कद्दू के दही भल्ले

कद्दू के दहीभल्ले

सामग्री

– 1/3 कप उड़द छिलका दाल

– 1/4 कप छिलका मूंग दाल

– 1 कप पका कद्दू कद्दूकस किया

– 10-12 किशमिश

– 1 बड़ा चम्मच काजू, बादाम, चिरौंजी कुटे हुए

– 11/2 कप दही गाढ़ा

– भल्ले तलने के लिए रिफाइंड औयल

– 1/2 छोटा चम्मच हींग जीरा पाउडर

– 1/2 छोटा चम्मच काला नमक

– थोड़ी सी इमली की सोंठ और हरी चटनी

– लालमिर्च पाउडर और नमक स्वादानुसार.

विधि

दोनों दालों को धो कर 4 घंटों के लिए पानी में अलगअलग भिगो दें. फिर पानी निथार कर हाथ से मसल कर छिलका उतार लें. दालों को मिक्स कर के मिक्सी में बिना पानी डाले पीसें. इस में कद्दू, नमक व मेवा मिलाएं. गरम तेल में पकौड़े तल लें. पकौड़ों को गरम पानी में 1/2 घंटे के लिए भिगो दें. दही फेंटें, नमक, मिर्च व काला नमक मिलाएं. कद्दू वाले भल्लों का हलके हाथों से पानी निचोड़ें और उन्हें फिर दही में डाल दें. 1 घंटा फ्रिज में ठंडा करें. फिर मिर्च पाउडर, हींग, जीरा, सोंठ व चटनी डाल कर सर्व करें.

पौष्टिक भोजन संवारे जीवन

कुशल गृहिणी जानती है कि कैसे पौष्टिक भोजन खिला कर वह अपने परिवार की तंदुरुस्ती कायम रख सकती है. महिलाओं के इसी विश्वास को मजबूत बनाने की कोशिश में 15 जून, 2018 को दिल्ली के शालीमार बाग के मोहन लीला रौयल में दिल्ली प्रैस द्वारा आईटीसी आशीर्वाद सर्वगुण संपन्न कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

कार्यक्रम की शुरुआत रोटी मेकिंग ऐक्टिविटी से हुई. इस के लिए भीड़ में से 3 महिलाओं को बुलाया गया. इन्हें आशीर्वाद सलैक्ट आटे से एकएक रोटी बनानी थी. इन तीनों प्रतिभागियों को ऐसी रोटी बनानी थी जो दिखने में खूबसूरत, छूने में मुलायम और खाने में स्वादिष्ठ हो. तीनों प्रतिभागियों- नीलम, प्रवीण और वीणा गुप्ता ने पूरी तत्परता से इस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. रोटियां बनाने में तीनों निपुण थीं. मगर विजेता वही बनी जिस के हाथ में आशीर्वाद सलैक्ट आटा था क्योंकि, आशीर्वाद आटे से बनी रोटी ही सब से मुलायम और स्वादिष्ठ थी.

फिर मल्टीटास्किंग दीवा कंपीटिशन का आयोजन किया गया, जिस में सरोज विजेता बनीं और दूसरे स्थान पर निर्मल गुप्ता रहीं.

न्यूट्रिशनिस्ट सैशन: न्यूट्रिशनिस्ट नेहा सागर ने मल्टीग्रेन आटे के फायदे बताते हुए कहा कि इस में बहुत पोषक तत्त्व होते हैं, जो कई तरह से हमारी सेहत के लिए फायदेमंद हैं. इस में मौजूद हाई फाइबर कोलैस्ट्रोल घटाता है और कफ की दिक्कत भी कम करता है. पोटैशियम ब्लडप्रैशर कंट्रोल में रखता है तो आयरन खून की कमी दूर करता है. इस आटे में मौजूद सेलीनियम कैंसर से बचाने में फायदेमंद है और फास्फोरस हड्डी व दांतों के लिए अच्छा है.

शैफ सैशन: इस के बाद शैफ सैशन शुरू हुआ, जिस में शैफ सारिका मेहता ने आशीर्वाद शुगर रिलीज कंट्रोल आटे से लो शुगर लड्डू बनाए. उन्होंने आटा भून कर उस में फ्रैश फ्रूट (पाइनएप्पल) प्यूरी ऐंड किया. बच्चों के लिए उन्होंने इस में कोको पाउडर मिला दिया. थोड़ा पका कर ठंडा किया और उस में

2 चम्मच शहद मिलाया. फिर लड्डू का शेप दे कर इसे गार्निश किया. इस तरह बच्चों और बड़ों दोनों के लायक एक स्वादिष्ठ मगर पोषक डिश तैयार हो गई.

इस के बाद पौपुलर दीवा प्रतियोगिता का आयोजन किया गया. चुने गए 2 प्रतिभागियों को आशीर्वाद पौपुलर आटे के साथ कुछ इनग्रैडिऐंट्स दिए गए, जिस से 15 मिनट में उन्हें कोई डिश तैयार करनी थी. इस प्रतियोगिता में स्टफ पिज्जा बनाने वाली डिंपल गोयल को विजेता घोषित किया गया, क्योंकि पिज्जा काफी मुलायम था और प्रेजैंटेशन भी बेहतर था. दूसरी प्रतिभागी चंचल ने स्टफ परांठा बनाया था.

अंत में रैसिपी कौंटेस्ट के विजेताओं की घोषणा की गई, जिस में आटा कुकीज बना कर नीलम बाधवा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया. जूसी पुआ बनाने वाली मधु गुप्ता दूसरे स्थान पर रहीं. आटा रैविओली बनाने वाली संतोष गुप्ता को तीसरा स्थान मिला.

इवैंट के दौरान हो रही इन प्रतियोगिताओं ने जहां महिलाओं को अपना हुनर सामने लाने का मौका दिया, वहीं आशीर्वाद आटे के पौष्टिक गुणों और सेहत से जुड़े दूसरे राज जान कर उन्होंने अपना ज्ञान बढ़ाया. बीचबीच में पूछे जाने वाले छोटेछोटे सवाल और मिलने वाले गिफ्ट उन्हें लगातार उत्साहित करते रहे. जाते समय सबों को गुड्डी बैग्स दिए गए.

‘अपना घर’ से ‘बड़े घर’ तक : वेश्यालय बन गया नारी संरक्षण गृह

18 अप्रैल, 2018 को पंचकूला की सीबीआई अदालत के विशेष जज जगदीप सिंह की कोर्ट के भीतरबाहर लोगों की काफी भीड़ थी. उल्लेखनीय है कि इन्हीं विशेष न्यायाधीश ने 28 अगस्त, 2017 को साध्वी यौनशोषण मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख कथित संत गुरमीत राम रहीम सिंह को 20 साल कैद की सजा सुनाई थी.

आज उन्हीं विद्वान एवं सक्षम न्यायाधीश द्वारा हरियाणा के एक अन्य बेहद चर्चित रहे केस का फैसला सुनाया जाना था.

वहां मौजूद लोगों को इसी केस का फैसला सुनने का बेसब्री से इंतजार था. दरअसल इन लोगों को पूरी उम्मीद थी कि जज महोदय इस केस का भी ऐतिहासिक फैसला ही सुनाएंगे.

मगर जज साहब ने उस रोज इस केस का फैसला तो नहीं सुनाया, अलबत्ता फिलहाल जसवंती देवी, जसवंत, शीला, वीना, सतीश, रामप्रकाश सैनी, जयभगवान, सिम्मी व रोशनी वगैरह अभियुक्तों को विभिन्न आरोपों में दोषी करार दे दिया. जबकि एक आरोपी अंगरेज कौर को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया.

दोषियों को सजा सुनाए जाने की तारीख 24 अप्रैल, 2018 निर्धारित की गई थी.

कहावत है कि मानव सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं. इसी के मद्देनजर समाज के ठुकराए लोगों पर मानवीय रहमोकरम दिखाने का आश्रयस्थल स्थापित करने का प्रावधान रखा गया था. खासकर उन बच्चों का भविष्य संवारने को ज्यादा तरजीह दी गई थी, जो किसी वजह से यतीम करार दे दिए गए थे या फिर वे मानसिक रूप से कमजोर थे.

सरकारी स्तर पर उन्हें संरक्षण देने के अलावा इस तरह की अनेक निजी संस्थाओं को भी प्रोत्साहित किया गया था. ऐसे कामों पर हर साल करोड़ों रुपया खर्च भी किया जाता रहा था.

मगर कुछ लोगों ने इस की आड़ में न केवल अनैतिक कार्य करने शुरू किए, बल्कि गलीज धंधे की तरह इस से पैसा भी खूब कमाया. लेकिन गलत काम की एक दिन पोल खुलती ही है.

मई, 2012 के प्रथम सप्ताह में दिल्ली पुलिस ने 3 लड़कियों को संदिग्ध हालत में पकड़ा था. इन से पूछताछ की गई तो इन की आपबीती सुन कर पुलिस वालों के जैसे होश उड़ गए. तत्काल मामला उच्चाधिकारियों के नोटिस में लाया गया.

‘अपना घर’ नाम से हरियाणा के शहर रोहतक की श्रीनगर कालोनी में एक ऐसा एनजीओ चलाया जा रहा था, जिस की प्रसिद्धि चंद सालों में कहीं से कहीं पहुंच गई थी. इस संस्था की संचालिका इस क्षेत्र की जानीमानी हस्ती बन चुकी थी.

समाजसेवा के कार्यों के लिए उसे कितनी ही बार सम्मानित किया गया था. इंदिरा गांधी नारी शक्ति पुरस्कार जिस में एक लाख रुपया नकद दिया जाता है, से भी उसे नवाजा गया था. जुवेनाइल कोर्ट की सदस्या के रूप में भी उसे मनोनीत किया हुआ था.

इस एनजीओ को सरकार की तरफ से मोटी आर्थिक मदद मिल रही थी. यहां सैकड़ों बच्चे थे, जिन की हर तरह की देखभाल के अलावा उन की पढ़ाईलिखाई का जिम्मा भी इस संस्था पर था. दिल्ली में संदिग्ध हालत में पकड़ी गई उक्त 3 लड़कियां भी सदस्याओं के रूप में अपनाघर में रह रही थीं.

कुछ दिन पहले ये भाग कर दिल्ली चली गई थीं, जहां संदेहास्पद स्थिति में पुलिस के हत्थे चढ़ गई थीं. पूछताछ में इन्होंने पुलिस को बताया था कि अपना घर की संचालिका जसवंती नरवाल, उस की छोटी बेटी सिम्मी और एक दामाद जयभगवान न केवल संस्था के लोगों से मारपीट करते थे, बल्कि वहां आश्रय ले रही लड़कियों का दुराचार के लिए भी इस्तेमाल करते थे.

मामला राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के नोटिस में लाया गया तो आयोग की 4 सदस्यीय टीम— डा. अजय कुमार, दिनेश लाहौरिया, विनोद टिक्कू व रामानाथ नैयर ने 9 मई, 2012 को अपना घर पर पुलिस की मदद से रेड कर दी. तदनंतर  120 लोगों, जिन में 94 अवयस्क व औरतों को इस प्रोटेक्शन होम से बचा कर 62 बच्चों व 32 महिलाओं के बयान दर्ज करने के बाद उन का मैडिकल करवाया गया.

इन के बयानों में यह बात उभर कर सामने आई कि केंद्र की संचालिका जसवंती नरवाल लड़कियों को दिल्ली भेज कर उन से देहव्यापार करवाती थी.

कोलकाता की रहने वाली 18 वर्षीय लड़की समीना (बदला हुआ नाम) ने अपने बयान में बताया था कि एक साल पहले पुलिस ने उसे आवारागर्दी के आरोप में स्थानीय रेलवे स्टेशन से पकड़ा था. चूंकि उस का इस दुनिया में कोई नहीं है, इसलिए उसे अपना घर के संरक्षण में भेज दिया गया था. यहां उस से गलत काम करवाया जाने लगा. इस गलत काम के बारे में उस ने पूरा विस्तार से बताया.

उस के बताए अनुसार, अन्य कई लड़कियों के साथ उसे भी अकसर दिल्ली के जी.बी. रोड पर ले जा कर वहां के वेश्यालयों में देहव्यापार करवाया जाता था.

समीना का आरोप था कि संचालिका कई लड़कियों को एक साथ ले जाया करती थी, जिस के लिए एक दिन पहले लड़कियों को समझाया बुझाया जाता था. जो लड़की इन के कहे अनुसार चलती थी, उसे खूब खिलायापिलाया जाता था. उस से अच्छे ढंग से बात की जाती थी, जो आनाकानी करती उस के साथ मारपीट की जाती. खाना भी न दे कर उसे रात भर नंगा रखा जाता था.

बयान के अनुसार, अपना घर की लड़कियों को कई बार आसपास के गांवों में भेज कर भी उन से देहधंधा करवाते हुए ग्राहकों से मोटी रकम वसूली जाती थी. जयभगवान पर आरोप था कि वह इन लड़कियों से मारपीट करने के अलावा इन से दुराचार भी किया करता था.

जसवंती यह देख कर भी आंखें फेर लिया करती थी. यदि कोई लड़की संचालिका से शिकायत करने जाती तो वह अपने औफिस के दरवाजे बंद करवा कर उस की जम कर पिटाई करवाती थी. सिम्मी तो ऐसी लड़कियों को कुछ ज्यादा ही पीटा करती थी.

दिल्ली में पकड़ी जाने वाली लड़कियां इसी सब से परेशान हो कर वहां से भागी थीं. अब उन्हीं के माध्यम से अपना घर का घिनौना सच बाहर आ गया था.

पुलिस ने इस संबंध में समीना की तहरीर के आधार पर भादंवि की धाराओं 294, 323, 342, 354, 376, 109 और 506 के अलावा इम्मोरल ट्रैफिकिंग एक्ट (प्रिवेंशन) की धारा 3, 4, 5 व बांडेड लेबर सिस्टम (एबोलिशन) एक्ट के सेक्शन-16 के तहत आपराधिक मामला दर्ज कर 10 मई, 2012 को जसवंती नरवाल, सिम्मी और जयभगवान को गिरफ्तार कर लिया.

इसी दिन इन तीनों आरोपियों को इलाका मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश कर के 3 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. इन से पूछताछ के अलावा अपना घर की तलाशी भी शुरू कर दी गई थी.

आयोग की टीम के अलावा रोहतक के तत्कालीन एसपी विवेक शर्मा, एसडीएम पंकज यादव, डीएसपी सुमित कुमार, लेडी डीएसपी धारणा यादव, समाज कल्याण अधिकारी एम.पी. गोदारा व रोहतक रेंज के आईजी आलोक मित्तल भी अपनी टीमों के साथ इस काम में आयोग को अपना सहयोग दे रहे थे.

आईजी आलोक मित्तल ने तो यह भी घोषणा कर दी कि रोहतक रेंज में आने वाली उन सभी एनजीओ की व्यापक जांच होगी, जहां बच्चों व युवतियों को संरक्षण दिया जाता है. इस संबंध में उन्होंने तत्काल रोहतक, झज्जर, पानीपत व सोनीपत के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिख कर जांच रिपोर्ट भिजवाने के आदेश भी कर दिए.

अपना घर की व्यापक तलाशी लिए जाने पर इस के कमरों से करीब 2 दरजन डंडे, लोहे की रौड, मोटे रस्से व दरांत वगैरह बरामद हुईं. यहां के बच्चों ने बताया था कि उन्हें इन्हीं डंडों व रौड्स से पीटा जाता था. अनेक बार रस्सों से बांध कर पंखे से भी लटका दिया जाता था. कई बार जसवंती इन्हें खेतों पर ले जा कर दरांत से फसल भी कटवाया करती थी.

यहां रहने वाली एक महिला ने आयोग की टीम व पुलिस के सामने केंद्र की संचालिका जसवंती नरवाल पर अपना बच्चा बेचने का आरोप भी लगाया. अपने आरोप में उस ने बताया कि करीब 3 महीने पहले जब उस ने अपना घर में रहते हुए एक बेटे को जन्म दिया था तो जसवंती ने उस का बेटा उठा कर किसी को बेच दिया था.

उस के शोर मचाने पर उसे 10 हजार रुपए देते हुए जसवंती ने कहा था, ‘तुम्हारी हालत पर तरस खा कर मैं यह तुम्हारे भले के लिए कर रही हूं. आगे ज्यादा शोर मचाया तो पैसे भी वापस छीन लूंगी और पंखे से उल्टा टंगवा के धुलाई भी ऐसी करवाऊंगी कि जिंदगी में दोबारा बच्चा जनने के काबिल नहीं रहेगी.’

इस धमकी से औरत अवसाद में तो चली ही गई, भयभीत भी इस कदर हुई कि 3 महीनों तक मुंह खोलने का साहस नहीं जुटा पाई. अब पुलिस के हाथों जसवंती को प्रताडि़त होते देख उस का भी साहस लौट आया था.

एसपी विवेक शर्मा ने इस औरत के बयान दर्ज करवा कर मामले की व्यापक छानबीन शुरू करवा दी. कुछ महिलाओं ने बताया कि यहां छापेमारी की सूचना जसवंती नरवाल को गई थी तो उस ने ऐसे करीब दरजन भर बच्चों को वहां से भगा दिया था, जिन की उस दिन बेतहाशा पिटाई हुई थी.

इस तरह के संगीन आरोप सामने आने पर आयोग की टीम सकते में आ गई थी. 9 मई को देर रात तक जांच करते रहने के बाद 10 मई की सुबह ही टीम के सदस्य फिर से अपना घर में आ पहुंचे थे और लगातार छानबीन करते रहे थे. संस्था से संबंधित पूरा रेकार्ड इन्होंने अपने कब्जे में ले लिया था. उपस्थिति रजिस्टर से ले कर हरबच्चे के बारे में उपलब्ध जानकारी रखने वाला रेकार्ड भी कब्जे में ले लिया गया था.

इस बीच 8 अन्य युवतियों ने आयोग की टीम के सामने पेश हो कर अपने बयान दर्ज करवाए थे कि अपना घर में उन के साथ दुराचार हुआ है. उन का मैडिकल करवा कर उन की शिकायतों से संबंधित छानबीन भी शुरू कर दी गई.

व्यापक छानबीन व पूछताछ में यह बात भी सामने आई कि जसवंती ने अपने ममेरे भाई सतीश के साथ मिल कर छापामारी से एक रोज पहले 6 लड़कियों को दिल्ली ले जा कर छोड़ दिया था.

इस पर जसवंती के ममेरे भाई सतीश को काबू कर के उस से गहन पूछताछ की गई. उस ने पुलिस को बताया कि 8 मई की रात में वह अपना घर की 6 युवतियों को स्कौर्पियो गाड़ी में ले जा कर दिल्ली के बवाना क्षेत्र में छोड़ आया था. सतीश के बताए अनुसार जसवंती भी उस के साथ गई थी.

इस तरह की जानकारी सामने आने पर सिविललाइंस थाने में अन्य केस दर्ज कर सतीश को विधिवत गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

उक्त लड़कियां कहां हैं, इस बाबत कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. मालूम पड़ा कि लड़कियां मानसिक रूप से परेशान थीं.

अपना घर की चल रही गहन छानबीन में पुलिस के सामने 17 ऐसे बच्चे भी आए, जिन का संस्था के रेकार्ड में कहीं कोई उल्लेख नहीं था. सूखी रोटी देने के नाम पर इन से मजदूरी करवाई जाती थी.

इस प्रकरण का काला सच उजागर होते ही इस विषय ने जैसे देश भर में बहस का रूप ले लिया. इस बात की भी जोरदार चर्चा होने लगी कि इस संस्था को जिला प्रशासन ने केंद्र व राज्य सरकार से मिलने वाली वित्तीय सहायता तो नियमित दी, लेकिन रेकार्ड को जांचने की जहमत कभी नहीं उठाई.

व्यापक छानबीन में यह बात भी सामने आई थी कि इस सिलसिले में औपचारिकता निभाने को अधिकारियों की टीम जब अपना घर में आती थी तो जसवंती अपने औफिस में बिठा कर ऐसी जोरदार खातिरदारी करती थी कि वे लोग उस के औफिस में बैठेबैठे ही अपनी रिपोर्ट तैयार कर वापस चले जाते थे.

खैर, अपना घर की युवतियों की जांच के लिए 12 मई, 2012 को मैडिकल बोर्ड गठित कर के जांच का कार्य आगे बढ़ा दिया गया था.

जसवंती की पूछताछ में यह बात भी सामने आ रही थी कि संस्था के सदस्यों का उत्पीड़न करने व महिलाओं का यौनशोषण करने के अलावा उस ने एक नहीं 2 नवजात शिशुओं को भी बेचा था.

इस संबंध में जसवंती का एक ही स्पष्टीकरण था कि इन बच्चों की अच्छी परवरिश और उन के उज्ज्वल भविष्य को देखते हुए उस ने उन्हें दिल्ली व अलीगढ़ के संपन्न दंपतियों को गोद दिया था. हालांकि इस सब का कोई रेकार्ड संस्था के पास उपलब्ध नहीं था.

पुलिस की 2 टीमों को इन दंपतियों की खोज के लिए अलीगढ़ व दिल्ली भी भेजा गया, मगर कोई सफलता नहीं मिल पाई.

पूछताछ में जसवंती ने यह बात कबूल की थी कि अलीगढ़ वाले लोग 31 हजार में व दिल्ली वाले 60 हजार में बच्चा ले कर गए थे. इस संबंध में संस्था के नाम पर डोनेशन की रसीदें कटवा ली गई थीं.

पुलिस की गहन पूछताछ में जसवंती ने यह भी स्वीकार किया कि वह केंद्र की लड़कियों को बार गर्ल्स की तरह शादी समारोहों में नाचगाने के लिए भी भेजा करती थी. तरीका सही हो या गलत, जसवंती का मकसद ज्यादा से ज्यादा पैसा इकट्ठा करना था.

1992-93 में जसवंती का अपने पति से तलाक हुआ था. तब ये लोग गाय के गोबर की खाद बेचने का धंधा करते थे. तलाक के बाद जसवंती अनाथ बच्चों के एक आश्रम की केयरटेकर बन गई. इस का फायदा उसे यह हुआ कि उस के संपर्क सूत्र बढ़ने लगे. नगर के प्रभावशाली लोगों से वह नित्यप्रति मिलने लगी. फिर वह दिन आते भी देर नहीं लगी, जब उक्त लोगों की सहायता से उस ने अपना खुद का एनजीओ भी स्थापित कर लिया.

देखतेदेखते अपनी संस्था की कमाई से वह इतनी अमीर हो गई कि धनदौलत अर्जित करने के अलावा उस ने अपनी अच्छीखासी प्रौपर्टी भी बना ली.

रोहतक की श्रीनगर कालोनी की तिमंजिला विशाल इमारत में अपना घर की स्थापना करने के बाद उस ने यहां के अबोध सदस्यों से अपने खेतों पर बेगार कराना भी शुरू कर दिया.

जसवंती नरवाल कुछ ही समय में इतनी मालामाल हो गई थी कि उस के परिचितों को यह सब सपने की तरह लगा करता था. दरअसल, जिले की अधिकतर योजनाओं का कार्य उसी को सौंपा गया था. इन में एक योजना थी ईंट भट्ठों पर चलने वाली बचपन पाठशाला, जिस के लिए इसे चलाने वाली गैरसरकारी संस्था को भारीभरकम राशि देने का प्रावधान था.

एनजीओ का अपना धंधा शुरू करने के 4 साल के भीतर ही जसवंती ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि उस का नाम प्रतिष्ठित के साथसाथ अमीर लोगों की सूची में भी आ गया. अमीर बनने के पीछे की उस की घिनौनी सच्चाई जब सामने आई तो सब आश्चर्यचकित हो उठे थे.

आगे की काररवाई करते हुए जसवंती के बयानों पर 15 मई को पुलिस ने अपना घर की काउंसलर वीना व जसवंती के कजिन सतीश को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद प्रशासन ने यह काम किया कि जसवंती को दिए सभी सम्मान उस से वापस ले लिए. फिर अपना घर के तमाम शरणदाताओं को अलगअलग शहरों के आश्रय केंद्रों में भेज दिया.

अन्य कई बच्चों के साथ एक गूंगीबहरी लड़की भी थी, जिसे रोहतक के अपना घर से भिवानी के सवधार केंद्र में शिफ्ट किया गया था. यहां उस का मैडिकल होने पर वह गर्भवती पाई गई. फिर तो हड़कंप मच गया. तुरंत एक पुलिस टीम और गूंगेबहरों के विशेषज्ञ को भिवानी भेजा गया.

युवती से इशारों में यह बात तो समझ ली गई कि वह पिछले 2 सालों से अपना घर में थी, जहां उस से अकसर दुराचार होता था. मगर इन दुराचारियों के बारे में वह ज्यादा नहीं समझा पाई. बाद में सामने लाए जाने पर उस ने जयभगवान की पहचान अपने साथ दुराचार करने वाले के रूप में की थी.

पहली जून को डीजीपी की ओर से अपना घर सिलसिले की स्टेटस रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रेषित की गई. हरियाणा सरकार की तरफ से अपना घर में रहते रहे सभी लोगों की सीलबंद मैडिकल रिपोर्ट भी हाईकोर्ट में दाखिल करवाई गई.

लेकिन इन क्रियाओं से संतुष्ट न हो कर कार्यवाहक चीफ जस्टिस एम.एम. कुमार व जस्टिस आलोक सिंह की खंडपीठ ने मामले की गहराई में जाने के लिए हरियाणा के स्टैंडिंग काउंसिल अनिल मल्होत्रा के नेतृत्व में एक विशेष कमेटी गठित कर दी, जिस ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस प्रशासन की भूमिका को संदिग्ध आंकते हुए मामले की तफ्तीश सीबीआई को सौंपे जाने की सिफारिश कर दी.

13 जुलाई, 2012 को सीबीआई की टीम ने रोहतक पहुंच कर इस केस का जांच कार्य एकदम नए सिरे से शुरू किया. सीबीआई अधिकारियों द्वारा अपनी जांच पूरी कर 7 अगस्त, 2012 को 10 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र सीबीआई की विशेष अदालत में दाखिल कर दिए गए.

23 सितंबर, 2014 से इस केस के आरोपियों का विधिवत ट्रायल शुरू हो गया. 14 फरवरी, 2018 को गवाहियां पूरी हो चुकने के बाद मामले में अंतिम बहस शुरू हुई जो 10 अप्रैल, 2018 को पूरी हुई.

18 अप्रैल को सीबीआई अदालत की ओर से एक आरोपी को बरी करते हुए अन्य 9 को दोषी करार दे कर इन्हें सजा सुनाए जाने की तारीख 24 अप्रैल, 2018 निर्धारित कर दी.

इस रोज खचाखच भरी अदालत में सीबीआई के माननीय विशेष जज जगदीप सिंह ने उक्त दोषियों को जो सजा सुनाई, वह इस प्रकार रही—

मुख्य आरोपी व अपना घर की संचालिका जसवंती नरवाल के अलावा उस के दामाद जयभगवान व कजिन कम ड्राइवर सतीश को उम्रकैद की सजा. जसवंती के बेटे जसवंत सिंह को 7 साल कैद की सजा.

जसवंती पर 52 हजार, जयभगवान व सतीश पर 50-50 हजार व जसवंत पर 20 हजार रुपयों का जुरमाना भी लगाया गया, जिस के अदा न करने पर इन्हें अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी.

माननीय अदालत की इस सजा में जसवंती की बेटी सुषमा उर्फ सिम्मी, चचेरी बहन शीला व अपना घर की काउंसलर वीना को अंडरगोन किया गया है यानी जितना अरसा वे अंडरट्रायल के रूप में जेल में बिता चुकी हैं, वही उन की सजा रहेगी.

जसवंती की सहेली रोशनी व अपना घर के कर्मचारी रामप्रकाश सैनी को फिलहाल प्रोबेशन पर छोड़ा गया है यानी कुछ समय के लिए उन का आचरण देखा जाएगा. शिकायत मिलने की सूरत में इन पर दोबारा काररवाई की जा सकती है.

सजा सुनाए जाने के दौरान जसवंती फूटफूट कर रोते हुए अदालत से सजा कम किए जाने की गुहार लगाती रही. मगर अब उस की चीखोपुकार का किसी पर कोई असर होने वाला नहीं था.

अदालत के उठते ही अन्य सजायाफ्ता आरोपियों के साथ जसवंती को भी अंबाला की सेंट्रल जेल में भेज दिया गया. अपना घर की शाही जिंदगी के बाद तमाम कड़ाई वाला यह बड़ा घर (जेल) ही अब उस का व उस के साथियों का नया ठिकाना होगा.

नौजवान दलितों पर जोरजुल्म क्यों?

आजकल देशभर में दलितों पर हिंसा की खबरें सुर्खियों में हैं. आएदिन कहीं न कहीं दलित तबके के लोगों के साथ मारपीट, भेदभाव और हिंसा की वारदातें हो रही हैं.

हाल ही में गुजरात के राजकोट में कचरा बीन रहे एक नौजवान मुकेश सावजी वनिया को पीटपीट कर मार डाला गया. वह रादडिया इंडस्ट्री के पास अपनी पत्नी जया के साथ कचरा इकट्ठा कर रहा था. फैक्टरी के मुलाजिमोें ने चोरी के शक में उसे बांध कर बुरी तरह से पीटा था.

घायल मुकेश को अस्पताल ले जाया गया जहां उस की मौत हो गई. मुकेश की पत्नी का आरोप है कि पिटाईर् करने वालों ने पहले उस की जाति पूछी और फिर मारने लगे थे.

इस से पहले गुजरात के ही गांधीनगर के लिंबोदरा गांव में मूंछ रखने के मामले में एक दलित नौजवान की पिटाई कर दी गई थी. कहा गया था कि उसे मूंछ रखने का हक नहीं है.

आणंद जिले के भादरणीया गांव में, जो गुजरात में ही है, गरबा देखने गए प्रकाश सोलंकी नाम के एक दलित नौजवान पर हमला कर दिया गया. उसे धमकाया गया कि हमारी बहनबेटियां यहां गरबा खेलती हैं, नीची जाति के लड़के यहां न आया करें.

पिटाई से प्रकाश की मौत हो गई. उस का भाईर् जयेश सोलंकी उसे बचाने आया तो उसे भी मारापीटा गया.

गुजरात के बनासकांठा जिले के अमीरगढ़ के कर्जा गांव में एक दलित नौजवान और उस के परिवार पर इसलिए हमला बोल दिया गया क्योंकि गांव के एक परिवार ने उस दलित नौजवान को मरा हुआ पशु उठाने को कहा था. नौजवान ने मना कर दिया तो कुछ लोगों ने मिल कर उन लोगों को पीटपीट कर जख्मी कर दिया.

भावनगर, गुजरात में एक नौजवान की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वह घोड़ा रखता था. उस से कहा गया कि घोड़ा रखने का हक दलित जाति के लोगों को नहीं है.

उत्तर प्रदेश में हाथरस में संजय कुमार नामक एक नौजवान ने हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा कि वह गांव निजामाबाद में बरात ले कर अपनी दुलहन को लाना चाहता था, पर ठाकुर बहुल गांव के लोगों का कहना था कि उन के इलाके से कभी दलितों की बरात आई ही नहीं है. दलितों की बरात दूसरे रास्तों से आती है इसलिए दलित संजय कुमार द्वारा यह मांग क्यों रखी गई?

ऊना, गुजरात में मरी हुई गाय की खाल उतार रहे 4 दलित नौजवानों को तथाकथित गौरक्षक गुंडों ने कार से बांधा और कपड़े उतार कर उन की पीठ की चमड़ी उधेड़ दी थी.

मध्य प्रदेश में शाजापुर के काजा गांव में एक दलित नौजवान के अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने से नाराज गांव के कुछ लोगों ने उस पर लाठीडंडों से हमला कर दिया था.

हाल ही मध्य प्रदेश के धार में सिपाही भरती में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के नौजवानों के सीने पर एससीएसटी लिख दिया था.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक दलित नौजवान सचिन वालिया की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी. इस से पहले पिछले साल दलितों के घर तोड़ दिए गए थे और भीम आर्मी के चंद्रशेखर को जेल में बंद कर दिया गया था.

इसी साल महाराष्ट्र के कोरेगांव भीमा में दलितों के साथ ऊंची जातियों की भीड़ ने मारपिटाई की थी.

मार्च में सुप्रीम कोर्ट के आए एक फैसले के बाद देशभर में दलित संगठनों ने भारत बंद का ऐलान किया था. इस दौरान एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौतें हो गई थीं.

सुप्रीम कोर्ट ने एससीएसटी अत्याचार निवारण ऐक्ट के तहत फैसला देते हुए कहा था कि दलितों पर अत्याचार की शिकायत की जांच एसपी लैवल का अफसर करेगा और निचली अदालतें आरोपी को जमानत दे सकेंगी. अब तक शिकायत के बाद सीधे आरोपी की गिरफ्तारी की जाती थी और जमानत नहीं होती थी.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से दलितों को इस कानून का डर कम होने और दलितों के प्रति भेदभाव व जोरजुल्म के मामले बढ़ने का डर सताने लगा था.

मई, 2014 के बाद से दलितों पर हिंसा की वारदातों में बढ़ोतरी हुई है. भेदभाव और हिंसा की बीमारी हद पर पहुंच गई है. इन बढ़ती हुई घटनाओं को ले कर दलित नौजवान आंदोलित हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में ऐसे कुल 40,801 मामले दर्र्ज हुए. साल 2015 में 38,370, मामले दर्ज हुए थे. अकेले उत्तर प्रदेश में 10,420 मामले दर्ज किए गए थे.

आंकड़े बयान कर रहे हैं कि दलित जातियों के खिलाफ जिन प्रदेशों में सब से ज्यादा अपराध दर्ज हुए हैं उन में भाजपा और उस के सहयोगी दलों के शासन वाली सरकारें हैं. इस मामले में उत्तर प्रदेश एक नंबर पर है, फिर गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तराखंड, गोवा आते हैं.

आंकड़े बताते हैं कि दलितों को सताने के मामले में गुजरात देश में दूसरे नंबर पर है. नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि साल 2008 से साल 2016 के बीच दलितों पर जुल्म की रफ्तार 23.6 फीसदी बढ़ी है.

एक सामाजिक स्टडी के मुताबिक, दलितों को सताने के रोजाना 125 मामले दर्र्ज होते हैं. गुजरात में 100 में से 95 मामलों में आरोपी छूट जाते हैं. कमोबेश यही हालात दूसरे प्रदेशों में भी हैं.

एक सामाजिक स्टडी में कहा गया है कि गांवों में दलितों को 48 तरह के बहिष्कारों का सामना करना पड़ता है. इन में सार्वजनिक जगह से पानी न भरने से ले कर मंदिरों में न जाने तक शामिल है.

आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला को भेदभाव की वजह से खुदकुशी करने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उस की स्कौलरशिप बंद करा दी गई थी और होस्टल खाली करने का हुक्म दे दिया गया था.

दिल्ली के जेएनयू में कन्हैया कुमार, गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और उत्तर प्रदेश में भीम सेना के दलित नेता चंद्रशेखर आजाद के साथ जैसा बरताव किया गया वह वर्णभेदी सोच को उजागर करता है.

दरअसल, हमारे समाज का तानाबाना वर्ण व्यवस्था पर चला आ रहा है. जाति को देख कर यहां इज्जतआदर का बरताव किया जाता है. दलितों को सब से नीचा समझा जाता है और ऊपरी जातियों द्वारा यह तबका सदियों से दुत्कारा जाता रहा है.

आजादी के बाद दलित तबके को संविधान में बराबरी का हक मिला तो धीरेधीरे वह पढ़नेलिखने लगा, सरकारी नौकरियों में जाने लगा. उस के पास थोड़ाबहुत पैसा भी आने लगा.

पिछले कुछ समय से दलितों की पढ़ाईलिखाईर् और माली हालत में काफी हद तक सुधार आया है. उन में लगातार जागरूकता आ रही है.

हर राजनीतिक दल दलित तबके को अपने साथ मिलाने की जुगत में दिखाईर् देता है. भाजपा की वर्णवादी सोच की वजह से यह तबका खुद को उस से दूर रखना चाहता है, इसी वजह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा को दलित समुदाय के बीच अपना राजनीतिक दबदबा बनाने और बढ़ाने में मदद नहीं मिल पा रही है.

संघ की ब्राह्मणवादी सोच दलितों को अब भी दोयम दर्जे का ही मान रही है, इसलिए पढ़लिख गए दलित नौजवानों ने अब ऊंची जाति वालों को अपना माईबाप मानने से इनकार कर दिया है. अब वे अपनी दशा के लिए नियति, पापपुण्य या पिछले कर्मों को नहीं, लालची लोगों की चालाकियों को मानने लगे हैं और अपने साथ होने वाली ज्यादतियों की खिलाफत करने लगे हैं. यह अच्छा संकेत है.

हाय मैं पेट से तो नहीं हो गई ?

44 साला उषा अपनी जवान होती बेटी निशा को देख कर सिहर उठती हैं कि कहीं उसे भी उन की तरह शादी के पहले इश्क के चक्कर में पड़ कर पेट से हो कर उन हालात से न गुजरना पडे़ जिन से वे कई साल पहले हो कर गुजरी थीं. हुआ यों था कि 20 साल पहले बीए करने के बाद उषा को अपने आशिक राकेश से बच्चा ठहर गया था. खुद के पेट से होने का पता उन्हें 4 महीने बाद चला था. वह भी एक सहेली के टोकने पर जिस से उन्होंने कहा था कि 4 महीने से पीरियड नहीं आ रहे हैं और शरीर में थकान व सुस्ती भी रहती है.

सहेली तुरंत भांप गई और राकेश से उन की हमबिस्तरी के बारे में पूछा तो उन्होंने सचसच बता दिया कि हां, कई बार बगैर कंडोम के भी संबंध बने थे. सहेली ने एक नर्सिंगहोम जा कर उषा के पेशाब की जांच कराई तो रिजल्ट पौजिटिव आया. इस पर उषा के पैरों तले जमीन खिसकने लगी. शुक्र इस बात का था कि घर में किसी को इस बात का अंदाजा नहीं हुआ था.

राकेश को जब उन्होंने यह बात बताई तो उस की भी हालत खस्ता हो गई. वह उषा से सच्चा प्यार तो करता था पर 2 बड़ी बहनों की शादी हो जाने तक भाग कर शादी कर लेने का जोखिम नहीं उठा सकता था. इस पर उन दोनों ने तय किया कि सभी झंझटों से बचने के लिए बेहतर है कि बच्चा गिरा दिया जाए. पर यह कोई हंसीखेल वाली बात नहीं थी. अपने छोटे से शहर में तो जानपहचान के चलते वे बच्चा गिराने की बात सोच ही नहीं सकते थे, इसलिए राकेश नजदीक के बड़े शहर में गया और कई नर्सिंगहोम में बच्चा गिराने की बात कही लेकिन इस में दिक्कत यह थी कि बगैर लड़की की जांच किए कोई इस के लिए तैयार नहीं था.

उषा की दिक्कत यह थी कि उन्हें किसी बड़ी वजह के बिना शहर से बाहर जाने की इजाजत घर वालों से नहीं मिलने वाली थी. इस दफा भी सहेली ही काम आई जो उषा के घर बहाना बना कर उन्हें इंदौर ले गई और जैसेतैसे एक नर्सिंगहोम वाले को तैयार किया. 3 दिन अस्पताल में रह कर उन्हें इस मुसीबत से छुटकारा मिला मगर इस दौरान जो तकलीफें उन्होंने उठाईं, वे आज तक जेहन में जिंदा हैं.

बाद में उन्होंने घर वालों के कहने पर चुपचाप सुरेंद्र से शादी कर ली और राकेश को हमेशा के लिए भूल गईं. और जो नहीं भूल पाईं वह सब उषा अपनी बेटी निशा को बता देना चाहती हैं कि अगर प्यार वगैरह के चक्कर में पड़ जाओ तो पेट से होने से कैसे बचना है, जिस से कोई उंगली न उठे.

इस तरह जानें उषा का जमाना कुछ और था. तब आज जितनी सहूलियतें और साधन नहीं थे जिन से पेट से हो जाने का पता आसानी से चल सके और पता चल जाने पर बच्चा भी आसानी से गिरवाया जा सके. आमतौर पर कम उम्र की लड़कियां नहीं जानती हैं कि पेट से हो जाने के लक्षण क्या होते हैं और इस से शरीर में क्याक्या बदलाव आते हैं.

पेट से हो जाने का सब से अहम लक्षण है पीरियड का न आना. अगर आशिक से हमबिस्तरी की है और पीरियड आना बंद हो गया है तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती कि नतीजा आ गया है. इस नतीजे की तसल्ली के लिए आजकल तरहतरह की प्रैग्नैंसी टैस्ट किट मैडिकल स्टोर पर मिल जाती हैं जिन से मिनटों में हकीकत का पता चल जाता है. इस किट को खरीदने के लिए किसी डाक्टर के परचे की जरूरत नहीं पड़ती है.

किट पर दी गई हिदायतों के मुताबिक जांच करने पर अगर रिजल्ट पौजिटिव आता है तो बगैर देर किए किसी नर्सिंगहोम का रुख करना चाहिए. आजकल नर्सिंगहोम वाले फोटो, आईडी और उम्र साबित करने वाला सुबूत मांगते हैं जिन्हें साथ ले जाना चाहिए. इस में किसी का डर या झिझक की बात नहीं है क्योंकि बच्चा गिराने की बात प्राइवेट रखी जाती है.

इस के अलावा कुछ और लक्षण भी दिखते हैं, जैसे निप्पल सख्त हो जाना, बारबार पेशाब लगना, शरीर में सुस्ती और थकान के अलावा लगातार सिरदर्द और सुबह उठने पर थकान महसूस होना. सुबह उठने के बाद जी मिचलाना और उबकाई आना भी खास लक्षण हैं. पर ऐसा सभी लड़कियों के साथ हो, यह जरूरी नहीं. हमारे समाज में कुंआरी मां बनना आज भी अच्छा नहीं माना जाता है और कई वजहों के चलते यह ठीक भी नहीं है इसलिए संबंध बनाते वक्त एहतियात बरतना चाहिए. पार्टनर को कंडोम पहनने के लिए मजबूर करना चाहिए या खुद किसी लेडी डाक्टर से मिल कर औरल पिल्स ले लेनी चाहिए. इन्हें खरीदने में शर्म या देर नहीं करनी चाहिए. वजह, पेट से हो जाने पर मुसीबतें कई गुना बढ़ जाती हैं.

छोटे होटलों पर गाज

लखनऊ में 6 जुलाई को जिलाधिकारी के निर्देश पर सिटी मजिस्ट्रेट ने चारबाग इलाके में कई ऐसे होटलों को बंद कर दिया जिन्हें सरकारी भाषा में अवैध कहा जाता है. लोगों का व्यापार तो ठप हुआ ही बीसियों लोग जिन का सामान कमरों में था रह गया और बाकी को अपना सामान उठा कर दूसरे होटल ढूंढ़ने पड़े.

इन होटलों से किसी को शिकायत न थी. यहां कोई ऐसा काम नहीं हो रहा था जिस से किसी को परेशानी हो रही हो. सरकारी बहाने थे कि फायर नो ओब्जैक्शन सर्टिफिकेट नहीं लिया गया, जीने संकरे थे, गलियां तंग थीं, ग्राहकों की ऐंट्री अच्छी नहीं थी.

इस तरह के छापे देशभर में पड़ते रहते हैं और सरकार अपनी पीठ थपथपाती रहती है कि उस ने महान काम किया. असल में यह कोरा जनविरोधी काम है और इस के पीछे रिश्वतखोरी को बढ़ावा देने की नीयत है. सरकार ने हर तरह के काम पर बीसियों कानून बना रखे हैं, तरहतरह की इजाजतें लेनी होती हैं. सरकारी दफ्तरों में बैठे बाबू इंजीनियर भी बन जाते हैं, इकोनौमिस्ट भी, फायर फाइटर भी और समाज के ठेकेदार भी. कानून ने प्रमाणपत्र देने के नाम पर अंधेरगर्दी मचा रखी है.

छोटे होटलों की जरूरत बहुत सख्त है. जो लोग खुद 3000 रुपए महीने के कमरे में रहते हैं, वे दूसरे शहर में जाने पर क्या सारी अनुमतियों वाले होटल में जाने लायक पैसे दे सकते हैं? वे घर जैसा वातावरण पा कर खुश हैं. वे 200 रुपए रोज का खर्च दे कर भी कसमसाते हैं. रही बात आग से बचाव की तो किस घर के पास फायर नो ओब्जैक्शन सर्टिफिकेट है? आग तो कहीं भी लग सकती?है, फिर होटलों पर ही क्यों गाज गिरे? इसलिए कि होटल को बंद करने की, सील करने की धमकी दे कर पैसे वसूले जा सकते हैं.

जिस देश में 10 फुट×10 फुट के कमरे में 6 लोग रहते हैं, वहां होटलों को महंगा करना बेवकूफी है पर जब कानून बनता है, लागू होता है तो सरकारी नेताओं, अफसरों और बाबुओं की समाज की ठेकेदारी करने की चौगुनी नाक पैदा हो जाती है. वे समाज के हितों के ठेकेदार बन जाते हैं. वे होटल के कमरे का किराया 100 रुपए से बढ़वा कर 500 रुपए से 1000 रुपए करवा कर ही चैन से बैठते हैं क्योंकि तभी उन्हें लाख 2 लाख हर साल रिश्वत में मिलेंगे.

अफसोस यह है कि आमतौर पर जनता ही सस्तों को नंबर 2 का यानी कालाबाजारी करने वाले कहने लगती है जबकि एक तरह से वे नए शहर में आए गरीब या साधारण को कम सुविधा वाली छत देते हैं. ऐसे होटल जरूरी हैं और इन्हें अवैध कहना गलत है.

डीएनए जांच : जब न हो सुबूत

डीएनए के जरिए वल्दियत का सहीसही पता लगाया जा सकता है. यानी वल्दियत जांचने के लिए डीएनए जांच एक सटीक जरिया है. जहां पारंपरिक सुबूत नहीं होते या कोई झूठ बोलने पर उतारू हो तो वहां एकमात्र डीएनए जांच ही सहारा होती है, जिस से दूध का दूध और पानी का पानी साफ हो जाता है.

गौरतलब है कि 1995 में दिल्ली की नैना साहनी को उस के पति ने हत्या कर के तंदूर में झोंक दिया. हालांकि लाश पूरी तरह से खाक नहीं हो पाई, उस के पहले ही एक पुलिसवाले द्वारा सतर्कता के चलते लाश को तंदूर से निकाल लिया गया. लेकिन लाश में कोई भी अंग न तो साबुत था और न ही उसे पारंपरिक तरीके से पहचाना जा सकता था.

समस्या यह थी कि उस लाश को नैना साहनी की लाश कैसे माना जाए? इस जटिल मामले को कोई मंझा हुआ जासूस भी नहीं सुलझा सकता था क्योंकि नैना साहनी की तंदूर में जलने से बची जो लाश हासिल हुई थी, वह महज जलाभुना हड्डियों का एक कंकाल भर था.

ऐसे में यह जिम्मेदारी हैदराबाद स्थित सैंटर फौर मौलिक्यूलर बायोलौजिकल स्टडीज के डीएनए प्रिंट विभाग के तत्कालीन निदेशक लालजी सिंह को सौंपी गई. लालजी सिंह के नेतृत्व में फोरैंसिक वैज्ञानिकों के एक दल ने नैना साहनी की जलीभुनी हड्डियों से कुछ ऊतकों को इकट्ठा किया. इस के बाद शुरू हुई डीएनए फिंगरप्रिंटिंग जांच. लगभग 1 महीने बाद ही लालजी सिंह ने यह सिद्ध कर दिया कि वास्तव में जला हुआ शरीर नैना साहनी का ही था.

प्रामाणिकता

एकदो नहीं, बल्कि अब तक देशभर में सैकड़ों ऐसे मामलों में जहां या तो स्पष्ट सुबूत नहीं थे या दूसरे पेच थे, उन्हें डीएनए जांच के जरिए ही सुलझाया जा सकता है. हर व्यक्ति के डीएनए की बनावट, उंगलियों की बनावट की ही तरह एकदूसरे से बिलकुल भिन्न होती है. 2 अलगअलग व्यक्तियों के डीएनए का एक जैसा होना

10 अरब मामलों में से कोई 1 मामला हो सकता है. यही नहीं, पूरी दुनिया के डीएनए वैज्ञानिक दावा करते हैं कि डीएनए जांच में गलती के लिए अवसर 300 अरब मामलों में से किसी 1 मामले में ही हो सकता है. आज की तारीख में सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि लगभग एक दर्जन देशों में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग जांच की बदौलत जटिल से जटिल आपराधिक मामलों का निबटान हो रहा है.

कब, कहां और कैसे

डीएनए जांच की विधि वास्तव में अमेरिका में खोजी गई थी और अमेरिका तथा ब्रिटेन में यह जांच विधि 1980 के दशक में ही अस्तित्व में आ गई थी. अमेरिका की खुफिया एजेंसी एफबीआई ने 80 के दशक में तमाम ऐसे मामलों का निबटारा डीएनए परीक्षण विधि से किया और अपराधियों की दुनिया में भूकंप आ गया क्योंकि उन का बचना बहुत मुश्किल हो गया था. ब्रिटेन में भी इस विधि से सैकड़ों आपराधिक वारदातों का निबटान हुआ. अमेरिका और ब्रिटेन के अलावा इस तकनीक में महारत हासिल करने वाला तीसरा देश भारत है.

भारत में डीएनए परीक्षणों की शुरुआत एक रोमांचक वारदात से हुई. दरअसल, 1989 में स्कूल में पढ़ने वाला एक लड़का हैदराबाद के निकट से कहीं लापता हो गया. कई दिनों तक घर वाले और पुलिस भी उस लड़के की खोजबीन करती रही मगर उस का कहीं पता नहीं चला. लगभग एक हफ्ते बाद स्कूल से थोड़ी दूर मौजूद कूड़े के ढेर से हड्डियों का एक कंकाल बरामद हुआ.  पुलिस को शक हुआ कि यह कंकाल खोए हुए छात्र का ही है. मगर यह बात आखिर किसी के गले कैसे उतरे? मांबाप भी इस बात को मानने को राजी नहीं थे. उन्हीं दिनों हैदराबाद में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग प्रयोगशाला में काम करना शुरू किया गया था इसलिए हैदराबाद की केंद्रीय फोरैंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में वह कंकाल लाया गया.

प्रयोगशाला को उस कंकाल के खोए हुए छात्र के शव के होने या न होने की पुष्टि का कार्य सौंपा गया. यहां के प्रमुख डीएनए वैज्ञानिक लालजी सिंह ने उस कंकाल की हड्डियों से कुछ टिश्यू को इकट्ठा किया और खोए हुए छात्र के मांबाप के रक्त के नमूने लिए. इस के बाद उन्होंने अपनी डीएनए परीक्षण जांच शुरू कर दी. लगभग एक हफ्ते बाद लालजी सिंह ने सिद्ध कर दिया कि वह कंकाल खोए हुए छात्र का ही था.

भारत में डीएनए परीक्षण का यह पहला मामला था. इस परीक्षण के साथ ही भारत अमेरिका और ब्रिटेन के बाद दुनिया में तीसरा ऐसा देश बन गया था जहां अपराधों की खोजबीन में डीएनए परीक्षणों की मदद लेने का चलन शुरू हुआ. तब से आज तक 22 साल गुजर चुके हैं. लालजी सिंह अब सीसीएमबी से रिटायर हो चुके हैं लेकिन देश में डीएनए परीक्षण विधि का प्रयोग लगातार जारी है.

पितृत्व की पहचान

पितृत्व के मामले में भी डीएनए जांच की शुरुआत लगभग 20 साल पहले तब हुई जब डीएनए जांच विधि के शुरू होने के कुछ दिनों के भीतर ही केरल की एक अदालत में अपने ढंग का एक अनूठा मामला आया. 28 साल की अविवाहित युवती विलासिनी ने अपने 4 साल के बेटे मनोज को न्यायालय में पेश किया. उस ने दावा किया कि उस के बेटे का बाप कुम्हिरामन नामक व्यक्ति है जो एक प्रसिद्ध ट्रांसपोर्टर है. कुम्हिरामन अपने क्षेत्र का एक दबंग व्यक्ति था. उस के उच्च राजनीतिक और सामाजिक रिश्ते थे. वह पैसे वाला भी था और पुलिस तथा प्रशासन के लोग आसानी से उस के साथ हो सकते थे.

चूंकि हिंदुस्तान की किसी अदालत में इस तरह का कोई मामला सामने नहीं आया था, इस वजह से यह न केवल चौंकाने वाला मामला था बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच के लिए भी एक चुनौती था. कुम्हिरामन बारबार और जोरदार ढंग से इस बात का खंडन कर रहा था कि विलासिनी का बेटा उस का नहीं है और उस ने विलासिनी पर उलटे ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया.

कुम्हिरामन के वकील के तेजर्रार तर्कों के बावजूद जज के गले यह बात नहीं उतर रही थी कि कोई हिंदुस्तानी महिला भरी अदालत में यह कह सकती है कि उस का बेटा एक नाजायज औलाद है और उस का बाप उस का पति नहीं, बल्कि कोई दूसरा व्यक्ति है.

विलासिनी एक सामान्य परिवार की लड़की थी. वह तेल्लीचेरी की रहने वाली थी, जहां का कुम्हिरामन निवासी था. विलासिनी के अनुसार, 55 साल के कुम्हिरामन ने उसे शादी का लालच दे कर अपने विश्वास में ले लिया था और उसी का परिणाम 4 वर्षीय मनोज था. विलासिनी की इस सीधीसादी कहानी ने जज को अंदर तक झकझोरा और जज ने फैसला किया कि वह उस महिला को न्याय दिला कर ही रहेगा.

आखिरकार तेल्लीचेरी के चीफ जुडीशियल मजिस्ट्रेट ज्ञान सुदर्शनन ने आदेश दिया कि विलासिनी, कुम्हिरामन व मनोज का डीएनए प्रिंट परीक्षण कराया जाए. अदालत के आदेश पर तीनों के रक्त के नमूने ले कर सीसीएमबी, हैदराबाद भेज दिए गए. एक बार फिर डा. लालजी सिंह के सामने दूध का दूध और पानी का पानी करने की चुनौती थी. डा. सिंह ने परीक्षण के बाद पाया कि कुम्हिरामन ही मनोज का जैविक पिता है. तत्पश्चात उन्होंने अपनी रिपोर्ट अदालत को भेज दी. लेकिन कुम्हिरामन के वकील ने अपने मुवक्किल के बचाव के लिए इस रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं लिया. उस ने अदालत में जोरदार तर्कों के साथ प्रतिवाद किया कि उस का मुवक्किल इलाके का प्रतिष्ठित सामाजिक व्यक्ति है और महज एक जांच रिपोर्ट के आधार पर उस की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने की किसी तरह की कोशिश न की जाए.

चूंकि इस के पहले पितृत्व के जांच के लिए कभी डीएनए परीक्षण विधि का इस्तेमाल नहीं हुआ था इसलिए अदालत के पास भी इस तरह का कोई तर्क नहीं था जिस के आधार पर वह अपने फैसले को अकाट्यता का लबादा पहना सके.

लेकिन जज ज्ञान सुदर्शनन कुम्हिरामन के वकील के तर्कों से सहमत नहीं थे. जज ज्ञान सुदर्शनन विज्ञान के छात्र रह चुके थे. विज्ञान से संबंधित आधुनिक शोधों में भी उन की रुचि थी. वे डीएनए प्रिंट परीक्षण पर भी यकीन रखते थे. बावजूद इस के उन्होंने कोई एकतरफा फैसला सुनाने के बजाय डीएनए परीक्षण करने वाले वैज्ञानिक डा. लालजी सिंह को अदालत में बुलाने का फैसला किया. इस के पीछे उन की सोच यह थी कि सभी पक्ष इस से रिपोर्ट के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकें. लिहाजा, उन के फैसले पर भी उंगलियां नहीं उठ सकेंगी.

15 सितंबर, 1989 को केरल की तेल्लीचेरी की अदालत में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डा. लालजी सिंह हाजिर हुए. उन्होंने अदालत कक्ष में ही एक प्रोजैक्टर व स्लाइड के सहारे वहां मौजूद लोगों को समझाया कि डीएनए फिंगर प्रिंट क्या है और क्यों इस रिपोर्ट के आधार पर दावे से कहा जा सकता है कि कुम्हिरामन ही 4 वर्षीय मनोज का पिता है.अदालत ने डा. लालजी सिंह के तर्कों को आसानी से नहीं पचाया. खासकर कुम्हिरामन के वकील तो उन्हें एक भी वाक्य बोलने देने के पक्ष में नहीं थे.

डा. लालजी सिंह जब भी अपनी बात कहना शुरू करते वे बीच में ही कोई न कोई सवाल पूछ कर व्यवधान पैदा कर देते. इस से एकदो बार तो डा. सिंह ने बीच में रुक कर वकील के सवाल का जवाब दिया लेकिन जब कुम्हिरामन के वकील बारबार उन्हें ध्यान बंटाने के लिए सवाल दर सवाल छेड़ने लगे तो लालजी सिंह ने जज से अनुरोध किया कि एक बार पहले उन्हें अपनी बात पूरी कहने दी जाए. इस के बाद ही किसी वकील को उन की बात पर सवाल करने दिया जाए. जज ने उन के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और उन्होंने कुम्हिरामन के वकील को सख्त निर्देश दिया कि जब तक डा. सिंह अपनी बात कह रहे हैं तब तक वे बीच में न बोलें.

डा. लालजी सिंह ने जब अपनी बात समाप्त की तो वकीलों ने कई घंटों तक उन से लंबी जिरह की. उन्होंने प्रत्येक प्रश्न का तर्कसम्मत उत्तर दिया, जिस से न सिर्फ जज, बल्कि अदालत में मौजूद सभी लोग संतुष्ट हुए और 24 अप्रैल, 1990 को अदालत ने डा. लालजी सिंह की रिपोर्ट को आधार मानते हुए विलासिनी के पक्ष में फैसला सुनाया. बाद में उच्च न्यायालय ने भी उस फैसले का अनुमोदन कर दिया. इस तरह पितृत्व के किसी मामले में पहली बार भारतीय न्यायिक व्यवस्था ने डीएनए रक्त परीक्षण को मान्यता दी.

अकाट्य परीक्षण विधि

वास्तव में आज डीएनए रक्त परीक्षण एक ऐसा वाक्य है जो हर पढ़ेलिखे आदमी की जबान पर है. डीएनए परीक्षण विधि अब अदालत और वैज्ञानिकों के लिए ही नहीं, हमारे देश के आम पढ़ेलिखे लोगों के लिए भी अनजानी चीज नहीं रह गई है. ‘मानव बम’ के रूप में राजीव गांधी की हत्या करने वाली महिला धनु के शव की पहचान इसी परीक्षण के सहारे हुई. बहुचर्चित तंदूर कांड के बारे में ऊपर जिक्र किया जा चुका है कि किस तरह नैना साहनी का शव इसी तकनीक से पहचाना गया, प्रियदर्शिनी मट्टू कांड, बेअंत सिंह की मानव बम द्वारा, हत्या और नारायण दत्त तिवारी के शेखर के पिता होने सहित 500 से ज्यादा मामले आज तक डीएनए परीक्षण विधि के जरिए सुलझाए जा चुके हैं. इन में से कई मामले तो इतने पेचीदा थे कि अगर डीएनए परीक्षण विधि मौजूद न होती तो शायद ही उन्हें सुलझाया जा सकता.

ऐसे में कहा जा सकता है कि डीएनए जांच परीक्षण वास्तव में वह परीक्षण विधि है जो तब अकाट्य सुबूत ढूंढ़ लेती है जब पारंपरिक तरीके से सुबूत हासिल करना असंभव होता है.

ई-मेल पर आए इस लिंक पर ना करें क्लिक, लग सकता है लाखों का चूना

हैकर्स आए दिन ई-मेल पर लिंक भेजकर लोगों को लाखों का चूना लगाते हैं. अभी हाल ही में सिक्योरिटी रिसर्च फर्म की एक रिपोर्ट सामने आई है जिसमें उसने कुछ ई-मेल के बारे में बताया और कहा है कि ई-मेल के साथ आए इन लिंक्स पर क्लिक करना खतरे से खाली नहीं है. आइए जानते हैं ऐसे ई-मेल के बारे में.

पासवर्ड बदलें

कई बार एक लिंक के साथ ई-मेल आता है कि आपका जीमेल अकाउंट खतरे में है. इस लिंक पर क्लिक करके पासवर्ड बदलें. लेकिन आपको ऐसे लिंक्स से सावधान रहना है.

पासवर्ड

कई बार ई-मेल आता है कि लिंक पर क्लिक करके फटाफट पासवर्ड चेक करें, नहीं तो बड़ा नुकसान होगा, जबकि गूगल ऐसा कोई मेल नहीं करता है. ऐसे लिंक पर क्लिक करने से बचें

सभी कर्मचारियों के लिए जरूरी प्रेस रिलीज

कई बार हैकर्स एक ई-मेल करते हैं जो कि आपके ऑफिस के नाम से होता है. इसमें कुछ निर्देश और लिंक भी दिए जाते हैं, लेकिन आपको ऐसे ई-मेल से बचना है. दिक्कत है तो ऑफिस में फोन करके पुष्टि कर सकते हैं.

आपका ई-मेल डिएक्टिवेट हो रहा है

कई बार ई-मेल अकाउंट को बंद करने का ई-मेल आता है और कहा जाता है कि लिंक पर क्लिक करके पासवर्ड रिसेट करें लेकिन आपको ऐसे मेल के बहकावे में नहीं आना है.

मेडिकल पौलिसी

ई-मेल में आपके ऑफिस के नाम से एक मेल आता है जिसमें नई मेडिकल पौलिसी के बारे में बताया जाता है और आपसे लिंक पर क्लिक करने को कहा जाता है. वैसे आपक ऐसे ई-मेल से सावधान रहने की दरकार है.

कंपनी की पौलिसी

कई बार आपकी कंपनी की नई पौलिसी को लेकर भी हैकर्स ई-मेल करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि लोग आफिस के नाम पर ज्यादा संख्या में शिकार हो सकते हैं.

भारतीय टेबल टेनिस खिलाड़ी ने की शादी, लड़की ने लगाया था रेप का आरोप

आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में इस साल आयोजित 21वें राष्ट्रमंडल खेलों से पहले लगे दुष्कर्म के आरोपों के बाद टीम से बाहर होने वाले भारत के टेबल टेनिस खिलाड़ी सौम्यजीत घोष ने कहा कि वह जल्द से जल्द वापसी की कोशिशों में हैं. उन्होंने साथ ही माना कि उनके लिए वापसी की राह आसान नहीं होगी. अब कबर आई है कि सौम्यजीत ने आरोप लगाने वाली उसी लड़की से शादी कर ली है.

गौरतलब है कि इस साल मार्च में घोष पर 18 साल की इस लड़की ने आरोप लगाए थे कि भारतीय खिलाड़ी ने उससे शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन बाद में वह अपने वादे से मुकर गए. कोर्ट से बाहर का विवाद तब सामने आया था जब वह अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 58 पर थे. टेबल टेनिस महासंघ (टीटीएफ) ने उन्हें पुलिस जांच से लंबित होने के कारण प्रतिबंध कर दिया था. इसी कारण वह अल्टीमेट टेबल टेनिस लीग में भी हिस्सा नहीं ले सके थे.

अपने रिसेप्शन से इतर मीडिया से बात करते हुए घोष ने कहा, ‘मैं खुश हूं कि हमारी शादी हो गई और सब कुछ अच्छा रहा. अब मैं अपना ध्यान खेल और फिटनेस पर लगा सकता हूं. मैं चार महीनों से काफी परेशान था. मेरा वजन भी बढ़ गया था. मेरे लिए यह किसी भी तरह से आसान नहीं होगा, मेरा लक्ष्य टोक्यो ओलम्पिक-2020 हैं लेकिन इससे पहले मुझे उस फौर्म में वापस आना होगा जिस फौर्म में मैं था.’

घोष की पत्नी ने कहा कि वह उनके लिए जो अच्छा होगा करेंगी. उन्होंने कहा, ‘मैं चाहती हूं कि वह जहां थे वहां दोबारा पहुंचें. हमारे बीच में जो भी मुद्दे हैं हम उन्हें सुलझा लेंगे. हमें अब वकीलों के साथ बैठकर बात करने की जरूरत है.’ घोष इस विवाद के कारण एशियाई खेलों में हिस्सा नहीं ले पाएंगे.

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