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‘जीनियस’ में गैंगस्टर का किरदार नहीं निभाया है : नवाजुद्दीन सिद्दिकी

इंसान की मेहनत और प्रतिभा को ज्यादा दिन तक नजरंदाज नहीं किया जा सकता. तभी तो लंबे संघर्ष के बाद अब नवाजुद्दीन सिद्दिकी बौलीवुड के उन चंद नामचीन कलाकारों में से एक हैं, जिनकी अभिनय प्रतिभा का मुकाबला करने की ताकत बहुत कम कलाकारों में है. वह नित नए चुनौतीपूर्ण किरदारों को निभाते हुए अपनी छाप छोड़ते जा रहे हैं. इन दिनों एक तरफ वह 24 अगस्त को प्रदर्शित होने वाली अनिल शर्मा की फिल्म ‘‘जीनियस’’ को लेकर चर्चा में हैं, तो दूसरी तरफ वह सआदत हसन मंटों की बायोपिक फिल्म ‘‘मंटो’’ के अलावा बाला साहेब ठाकरे की बायोपिक फिल्म ‘‘ठाकरे’’ को लेकर भी चर्चा में हैं. इतना ही नहीं इन दिनों वह एक दो नहीं बल्कि चार रोमांटिक फिल्में भी कर रहे हैं.

फिल्म ‘‘जीनियस’’ में क्या कर रहे हैं?

यह एक साइंस फिक्शन के साथ साथ जासूसी वाली फिल्म है. इसमें एक्शन के साथ साथ देशभक्ति का तड़का भी हैं. इस फिल्म में नई अति आधुनिक तकनीक व गैजेट को भी कहानी का हिस्सा बनाया गया है. फिल्म में मैं और उत्कर्ष शर्मा दोनों ही जीनियस हैं. मेरे किरदार का नाम शाह है. हम दोनों ही वैज्ञानिक विकास के साथ उपलब्ध गैजेट का उपयोग करते हैं. दोनों बुद्धिमान हैं. पर दोनों के बीच टकराव है.

फिल्म ‘‘जीनियस’’ से फिल्म के निर्माता, लेखक व निर्देशक अनिल शर्मा के अपने बेटे उत्कर्ष शर्मा भी अभिनय करियर की शुरुआत कर रहे हैं. ऐसे में बेटे के चक्कर में उन्होंने आपके किरदार को कम अहमियत दी हो?

देखिए, अनिल शर्मा एक अनुभवी निर्देशक हैं. वह अपने बेटे को इस फिल्म से लांच कर रहे हैं. उन्हें बेहतर ढंग से पता हैं कि फिल्म सिर्फ उनके बेटे पर केंद्रित रही और बाकी किरदार कमजोर हुए, तो फिल्म तहस नहस हो जाएगी. अनिल शर्मा के लिए फिल्म की कहानी बहुत मायने रखती है. उन्होंने कहानी के अनुसार ही सारे किरदार गढ़े हैं. कहानी से इतर किसी भी किरदार को अहमियत नहीं दी गयी है. देखिए, फिल्म टीम वर्क होता है. कला एक इंसान के कंधे पर आगे नहीं बढ़ सकती. अनिल शर्मा इस फिल्म के हीरो के पिता होने के साथ साथ लेखक व निर्देशक भी हैं. उन्हें पता है कि फिल्म के लिए कहानी कितनी अहम होती है. इसलिए मुझे इस फिल्म को करने में कोई हिचक नहीं थी.

ट्रेलर देखकर समझ में आया कि आपने इस फिल्म में गैंगस्टर का किरदार निभाया है. क्या इस किरदार के लिए आपने कोई शोध कार्य किया?

पहली बात तो स्पष्ट कर दूं कि मैंने फिल्म में गैंगस्टर का किरदार नहीं निभाया है. मेरा किरदार एक बहुत बड़े उद्योगपति शाह का है, जो कि बहुत बड़ा इंजीनियर है. उसका अपना एक ईगो है. जब इंसान पर उसका ईगो हावी हो और कोई उसकी जिंदगी या उसके व्यापार के साथ खिलवाड़ करे, तो वह चुप नहीं बैठेगा. यही टकराव की मूल वजह है.

फिल्म की टैग लाइन है-‘‘दिल की लड़ाई दिमाग से’’. तो इसमें किस दिल को लेकर लड़ाई हो रही है?

इंसान दिल से बहुत भावुक होता है. उसकी जिंदगी में सारे इमोशंस आते रहते हैं. पर जिंदगी में अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए उसको दिमाग का उपयोग तो करना पड़ता है. मेरे अनुसार इंसान अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दिल व दिमाग दोनों का उपयोग करता है. उस वक्त दिल और दिमाग के बीच जो अंतरद्वंद चलता है, वही इस फिल्म की कहानी है.

फिल्म ‘‘मंटो’’ को लेकर आप बहुत चर्चा में हैं?

जी हां!! यह फिल्म सआदत हसन मंटो की जीवनी है. इसे ढेर सारे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया जा चुका है. मैं तो इस फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हूं. आखिरकार यह एक ऐसे लेखक की जीवनी है, जो कि अपने समय में वक्त से कई गुना ज्यादा आगे था. उन्होंने उस वक्त सच लिखा, जब लोग सच कहने से डरते थे. उनके ऊपर कई मुकदमे हुए, पर वह डरे नहीं. उनका लेखन निर्बाध गति से चलता रहा. एक तरफ वह अदालती लड़ाई लड़ रहे थे, तो दूसरी तरफ वह लगातार लिख रहे थे. हालात ऐसे थे कि उनके वकील भी बीच में उनका केस लड़ना बंद कर देते थे. तो वह खुद ही अपने केस की पैरवी करते थे. यह एक आयकानिक किरदार है. मेरे ख्याल से पूरे विश्व का हर कलाकार इस किरदार को निभाना चाहेगा.

आपने सआदत हसन मंटो को कितना पढ़ा है?

पहले मैंने मंटो को बहुत ज्यादा नहीं पढ़ा था. 1988 में जब मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में था, तब मैंने उनकी कहानी ‘तोबा टेक’ पर एक नाटक किया था. उसके बाद नाट्य स्कूल में हमारे शिक्षक मंटो को लेकर बहुत चर्चाएं किया करते थे. उन चर्चाओं का सुनकर मेरे दिमाग में आया कि आखिर यह मंटो है कौन? जिसको लेकर हमारे शिक्षक इतनी बातें करते हैं. उसके बाद मैंने मंटो की लघु कहानियां पढ़ी और फिर उनके लेखन का मैं दीवाना हो गया. उनको पढ़ने का मेरा शौक बढ़ता चला गया. 2000 में तो मैंने उनकी तमाम किताबें पढ़ी.

जब आपको इस फिल्म का आफर मिला उस वक्त तक आप सआदत हसन मंटो से कितना वाकिफ हो चुके थे?

बहुत अच्छी तरह से वाकिफ था.

मंटो को पढ़ने के बाद उनको लेकर आपके दिमाग में जो इमेज बनी थी, उसमें और मंटो की पटकथा में कितना फर्क है?

नंदिता दास ने बहुत शोध करने के बाद यह पटकथा लिखी है. उन्होंने तो मुझसे भी कहीं ज्यादा मंटो को पढ़ा था.

मंटो के किरदार को निभाना आपके लिए कितना आसान रहा?

मंटो बहुत जटिल और कठिन किरदार है. पर मैंने पहले से ही उन्हें पढ़ रखा था और पटकथा काफी शोध के बाद लिखी गयी थी, इसलिए मुझे परदे पर उन्हें उतारने में ज्यादा तकलीफ नहीं हुई. मंटो ने कभी झूठ नहीं लिखा. आज 70 साल बाद भी लोग उन पर लिख रहे हैं. उनकी कहानियों पर नाटकों का मंचन हो रहा है. तो मंटों में कुछ तो बात होगी. दूसरी बात फिल्म की निर्देशक नंदिता दास की वजह से भी मेरे लिए इस किरदार को निभाना आसान रहा.

नेटफिल्क्स पर प्रसारित वेब सीरीज ‘‘सेक्रेड गेम्स’’ में आपने अभिनय किया है. जिसकी प्रशंसा व विरोध दोनों हुए. इसके खिलाफ कुछ लोगों ने अदालत के दरवाजे तक खटखटाए. आप क्या कहेंगें?

देखिए, ‘नेटफिलक्स’ पर ‘सेक्रेड गेम्स’ के पहले एपीसोड के प्रसारित होने के दूसरे दिन मैं भारत से बाहर रोम चला गया था. पूरे डेढ़ माह बाद आज ही वापस लौटा हूं. इस बीच यहां क्या हुआ, मुझे पता नहीं है. सच कहूं तो मैंने खुद अभी तक इस वेबसीरीज को देखा नहीं है.

रोम में फिल्म की शूटिंग कर रहे थे या घूमने गए थे?

मैं रोम में तनिष्ठा चटर्जी के निर्देशन में प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘रोम रोमिओ’’ की शूटिंग कर रहा था. मेरे अलावा सारे कलाकार वहां के थे. बतौर निर्देशक तनिष्ठा की यह पहली फिल्म है. तो उनके निर्देशन में मुझे पहली बार काम करने का मौका भी मिल गया. लेकिन बतौर अभिनेता हम दोनों ने एक साथ कई फिल्में की हैं.

बतौर निर्देशक तनिष्ठा चटर्जी में क्या खूबी नजर आयी?

वह पहले से ही बहुत ही ज्यादा प्रतिभाशाली थी. हम लोग जब भी मिलते थे, तो अपने अपने विचारों का आदान प्रदान करते थे. मैं तनिष्ठा को थिएटर के दिनों से जानता हूं. हम दोनों ने एक साथ अभिनय के विद्यार्थी के तौर पर पढ़ाई भी की. एक दिन हम लोगों को अहसास हुआ कि हम लोग जिस तरह की फिल्म बनाना चाहते हैं, अब उसे बना लेना चाहिए. बस फिर तनिष्ठा ने काम शुरू किया. अब फिल्म बनकर तैयार है.

आपने तनिष्ठा को कितनी सलाह दी?

मैं तनिष्ठा को पिछले दस वर्षों से फिल्म निर्देशित करने के लिए उत्साहित करते आया हूं.

‘‘रोम रोमिओ’’ तो आपकी पहली प्रेम कहानी वाली फिल्म है?

ऐसा आप कह सकते हैं. पर इन दिनों मैं एक ही बल्कि चार प्रेम कहानी वाली फिल्में कर रहा हूं. ‘रोम रोमिओ’ के अलावा सुनील शेट्टी की बेटी आथिया शेट्टी के साथ प्रेम कहानी वाली फिल्म ही कर रहा हूं. रितेश बत्रा निर्देशित फिल्म भी प्रेम कहानी वाली फिल्म हैं. देखिए, मैंने बहुत संजीदा किरदार निभाए हैं. अब मैं हल्की फुल्की रोमांटिक फिल्म करते हुए इंज्वाय कर रहा हूं. मैं वह फिल्में कर रहा हूं, जिसमें हल्की फुल्की जिंदगी के साथ प्यार व रोमांस है. मैं भी अपने आपको थोड़ा हल्का महसूस करना चाहता हूं.

अब तक आपके द्वारा निभाए गए किरदारों में से किसी किरदार ने आपकी अपनी जिंदगी पर कोई असर डाला?

‘‘रमन राघव 2’’ में मैंने जो किरदार निभाया था, उसका मेरी जिंदगी पर बहुत प्रभाव रहा है.

इन दिनों और क्या कर रहे हैं?

एक फिल्म ‘ठाकरे’’ की है. जो कि बाला साहेब ठाकरे के जीवन पर है. इसकी शूटिंग पूरी हो चुकी है. एडीटिंग चल रही है. इस किरदार को निभाना मेरे लिए बहुत कठिन रहा. इसे हमने हिंदी व मराठी दो भाषाओं में बनाया है. मैं ठहरा गैर मराठी भाषी. इस फिल्म के लिए मुझे मराठी भाषा सीखनी पड़ी. बाला साहेब ठाकरे के बारे में फिल्म के निर्देशक संजय राउत ने काफी जानकारी दी.

कीबोर्ड के 10 शार्टकट्स, आसान करेंगे आपका काम

कम्प्यूटर पर काम करने वाले अधिकांश लोग माउस का इस्तेमाल करने के आदी होते हैं. कोई भी पुरानी फाइल ढूंढ़नी हो, कोई विंडो को छोटा करना हो, दो विंडो एक साथ ओपन करनी हों या फिर मॉनीटर पर चालू सभी प्रोग्राम को बंद करना हो इसके लिए अब आपको माउस छूने की जरूरत नहीं पड़ेगी. हम आपको कुछ ऐसे की-बोर्ड शार्टकट्स बताएंगे जो आपको लंबे प्रोसेस को शार्ट कर आपका काफी सारा वक्त बचाएंगे. जानिए कम्प्यूटर के ऐसे शार्टकट्स जिनका इस्तेमाल आप शायद अब तक नहीं करते थे.

1. Windows Key + Arrow: यह विंडो 7 का एक बहुत ही अच्छा फीचर है यह फीचर विंडो 8 में भी उपलब्ध है. इस कीवर्ड की सहायता से आपकी स्क्रीन दो हिस्सों में बंट जाती है जिससे की आपको काम करने में परेशानी नहीं होती और आप आसानी से काम कर सकते है.  Windows + Left Arrow को दबाने से  कम्प्यूटर के लेफ्ट जगह पर आपकी विंडो खुल जाएगी और Windows + Right Arrow को दबाने से कम्प्यूटर के राइट जगह पर विंडो खुल जाएगी. Windows + Up  Arrow से आप किसी भी विंडो को मेक्सिमाइज़ कर सकते हैं. तथा Window + Down Arrow ले आप किसी भी विंडो को मीनिमाइज़ कर सकते हैं.

2. Shift + Arrow: इसके इस्तेमाल से आप अपने लिखे गए किसी भी चीज को हाईलाइट कर सकते है. अगर आर cntrl का इस्तेमाल करते है तो एक वर्ड की बजाए आप पूरी लाइन को हाईलाइट कर सकते है. cntrl+b से आप वर्डस को बोल्ड भी कर सकते है.

3. Alt + F4: किसी विंडो को बिना माउस को छुए बंद करने के लिए आप इस कीवर्ड का इस्तेमाल कर सकते है ALT+F4 को दबाने से आपकी विंडो के सारे प्रोग्राम बंद हो जाएंगे.

4. Windows Key + L: अगर आपको काम करते करते अचानक से कुछ याद आता है और आप अपना कम्प्यूटर तो बंद नहीं करना चाहते तो आर उसे लॉक करके जा सकते हो. आपको अपने कीबोर्ड को छूने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी.

5. Windows Key + M:  जब आपके पास बहुत सारी विंडो खुली हुई होती हैं तो एक -एक कर सभी विंडो को बंद करने में बहुत समय लग जाता है. Windows Key + M को दबाने से आपकी सारी विंडो बंद हो जाती है.

6. Shift + Space: एक्सल पर काम करते समय बहुत बड़ी बड़ी फाइल्स होती है जिसपर चीजें ढूंढ़ना बहुत ही मुश्किल होता है लेकिन  Shift + Space दबाने से आप पूरी लाइन को सलेक्ट कर सकते है और अगर आप इस लाइन को डिलीट करना चाहते है तो आप CNTRL+DEL को दबा सकते हैं.

7. ALT + S / CTRL + Enter: अगर आप किसी को भी जल्दी से मेल करना चाहते है तो इसके लिए बहुत ही आसान कीवर्ड है मैसेज लिखने के बाद आप ALT + S / CTRL + Enter को दबाकर अपना मेल जल्दी से भेज सकते है.

8. R / CTRL + R: किसा को रिप्लाई करने के लिए जरूरी नहीं की आप रिपलाई का बटन दबाएं आप आसान तरीके से भी रिपलाई कर सकते है R / CTRL + R दबाने से आप झट से रिपलाई कर सकते है.

9. CTRL + D: अगर आप अपने द्वारा पढ़ें हुए किसी भी चीज़ को बुकमार्क करना चाहते है तो उसके लिए आपको इस पर बने स्टार के साइन को नहीं छूना पड़ेगा आप केवल CTRL + D जरिए अपने पेज को बुकमार्क कर सकते है.

10. CTRL + Shift + B / O: अपनी मनलपसंद साइट को क्रोम में बुकमार्क करने के बाद उन्हें ढूंढ़ना बहुत ही मुश्किल होता है लेकिन CTRL + Shift + B / O को दबाने से आप अपनी बुकमार्क की हुई चीज़ें आसानी से ढूंढ़ सकते है.

रंग लाई तपस्या की मेहनत : मेहनत कभी बेकार नहीं जाती

लड़की और लड़के के प्रति समाज की दोयम दरजे की सोच के चलते ग्रामीण इलाकों में रहने वाली लड़कियां उचित मार्गदर्शन और संसाधनों के अभाव में उच्चशिक्षा से वंचित रह जाती हैं. वहीं दूसरी ओर कुछ विलक्षण प्रतिभाएं ऐसी भी होती हैं, जो ऐसे माहौल में अपने लक्ष्य से नहीं डगमगातीं. वे अपनी मेहनत से सफलता का ऐसा परचम लहराती हैं कि सभी आश्चर्यचकित रह जाते हैं. ऐसी प्रतिभाएं दूसरों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनती हैं.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक छोटे से गांव जोबा की रहने वाली तपस्या परिहार ने अपनी लगन और मेहनत से सफलता का वो मुकाम हासिल किया कि गांव वालों ने ही नहीं, बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी उसे बधाई दी. तपस्या ने सिविल सर्विस परीक्षा में देश में 23वीं रैंक ला कर न सिर्फ अपने परिवार और गांव का नाम रोशन किया बल्कि नरसिंहपुर जिले की पहली महिला आईएएस बन कर प्रदेश का भी गौरव बढ़ाया है.

जोबा गांव के एक किसान परिवार में जन्म लेने वाली तपस्या की प्राथमिक शिक्षा करेली तहसील के सरस्वती शिशु मंदिर में हुई थी. केंद्रीय विद्यालय नरसिंहपुर से हायर सेकैंडरी परीक्षा मेरिट में पास करने के बाद वह कानून की पढ़ाई करने के लिए पुणे चली गई. घर वालों से कोसों दूर अकेले रह कर उस ने पुणे के आईएलएस कालेज से 5 साल तक कानून की पढ़ाई की.

वकालत करने के बाद तपस्या का रुझान सिविल सर्विस परीक्षा की ओर हो गया. वह आईएएस बनना चाहती थी. इस के बाद उस ने 2 साल तक आईएएस की कोचिंग की. दूसरे प्रयास में उस ने यह मुकाम हासिल कर लिया.

27 अप्रैल, 2018 को संघ लोक सेवा आयोग ने वर्ष 2017 की सिविल सर्विस परीक्षा का फाइनल परिणाम घोषित किया. तपस्या ने अपने मोबाइल स्क्रीन पर जैसे ही चयनित सूची देखी तो अपने आप को 23वें स्थान पर पा कर खुशी से झूम उठी.

इस के बाद तो पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. देखते ही देखते यह खबर टेलीविजन चैनलों की हैडलाइन बन गई और पूरे परिवार को बधाइयां मिलने का दौर शुरू हो गया. 25 वर्षीय तपस्या के आईएएस में सेलेक्ट होने पर जोबा गांव में आतिशबाजी कर जश्न मनाया जाने लगा.

करेली तहसील के गांव जोबा के प्रगतिशील किसान विश्वास परिहार का पूरा परिवार शिक्षा, राजनीति, समाजसेवा और उन्नत कृषि के क्षेत्र में अपना अहम स्थान रखता है. अपने आदर्श और मानवीय मूल्यों के प्रति गहरी आस्था रखने वाले विश्वास परिहार ने बेटी को पारिवारिक संस्कारों के साथ कुछ खास कर दिखाने की सीख दी थी.

तपस्या की दादी देवकुंवर परिहार सन 2010 से 2015 तक नरसिंहपुर की जिला पंचायत की अध्यक्षा रह चुकी हैं. तपस्या के चाचा विनायक परिहार सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो वर्तमान में नर्मदा नदी के संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं. तपस्या की मां ज्योति परिहार वर्तमान में गांव की सरपंच हैं. तपस्या अपनी सफलता का श्रेय भी अपने संयुक्त परिवार को देती हैं. उस का कहना है कि सब से अधिक प्रोत्साहन दादी और चाचा विनायक परिहार से मिला.

तपस्या की दादी देवकुंवर परिहार ने अपने विद्यार्थी जीवन में कलेक्टर बनने का सपना देखा था, लेकिन उन का यह सपना अधूरा रह गया था. यही कारण था कि अपने बच्चों और पोतापोती की पढ़ाई के प्रति वह शुरू से ही गंभीर रहीं.

देवकुंवर परिहार के दोनों बेटे विश्वास और विनायक परिहार आज जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं.

विश्वास परिहार का नाम उन्नत खेती करने वाले किसान के रूप में है तो विनायक परिहार का नाम एक सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता है.

तपस्या ने दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान से आईएएस की कोचिंग की और जब पहली बार आईएएस की परीक्षा दी तो वह प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर सकी. लेकिन तपस्या ने हार नहीं मानी और दूसरे प्रयास में न केवल सफल हुईं बल्कि पूरे देश में 23वां रैंक और मध्य प्रदेश में प्रथम स्थान भी पाया.

दादी देवकुंवर परिहार उस की इस सफलता पर गर्वित हो कर कहती हैं कि तपस्या ने देश की सब से बड़ी परीक्षा पास कर के उन के सपने को साकार कर दिया है. मां ज्योति परिहार भी अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर भावुक हो कर कहती हैं कि तपस्या घरपरिवार से दूर रह कर केवल पढ़ाई के लिए समर्पित रही. यहां तक कि उस ने पढ़ाई के दौरान घरपरिवार से फोन पर भी बात नहीं की और वाट्सऐप और फेसबुक से तो दूरी बनाए रखी.

एक भाई और 2 बहनों में तपस्या सब से बड़ी है. अपनी पारिवारिक एवं ग्रामीण पृष्ठभूमि पर तपस्या कहती है कि जहां मेरे गांव में मेरे साथ पढ़ने वाली लड़कियों की शादी 12वीं पास करते ही हो जाती है, ऐसे में मेरे परिवार ने मुझे एलएलबी की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया. मेरे परिवार का यही प्रोत्साहन मेरी सफलता की कहानी बन गया.

तपस्या के परिवार में एक घोड़ा था, जिस से तपस्या को बचपन से ही घुड़सवारी का शौक लग गया था. आज भी वह खाली समय में घुड़सवारी करती है. घुड़सवारी के अलावा तपस्या को पेंसिल स्क्रैचिंग, वेस्ट मैटीरियल से कलाकृति बनाने के साथ एक्टिंग और खाना बनाने का भी शौक है.

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के दौरान रोज 8 से 10 घंटे तक पढ़ाई करने वाली तपस्या बताती है कि उस ने कई प्रकार की पुस्तकों का अध्ययन किया और स्वामी विवेकानंद, एपीजे अब्दुल कलाम और लालबहादुर शास्त्री के विचारों व उन के व्यक्तित्व से वह काफी प्रभावित हुई.

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान को मूर्तरूप देने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी प्रदेश की बेटी तपस्या के संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में चयनित होने पर तपस्या को बधाई दी.

देश की भावी कलेक्टर तपस्या परिहार का कहना है कि वह कलेक्टर बन कर देश के विकास के लिए पूरी लगन से अपने दायित्वों का निर्वहन करेगी. अपने कार्य के दौरान राजनीतिक दबाव के प्रश्न पर वह बोली कि कार्य के दौरान ही देखा जाएगा कि किस प्रकार का पौलिटिकल प्रैशर है.

तपस्या अपने इंटरव्यू के परफार्मेंस से ज्यादा खुश नहीं थी, बावजूद इस के 990 अभ्यर्थियों में से 23वीं रैंक मिलने पर आश्चर्यचकित है. इस सफलता का श्रेय वह अपनी 8 से 10 घंटे की पढ़ाई और संयुक्त परिवार से मिलने वाली प्रेरणा को देती है.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं को तपस्या यह संदेश देती है कि युवा पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करें और पूरी निष्ठा के साथ कड़ी मेहनत करें तो सफलता उन के कदमों में होगी.

कर्ज चुकाने के लिए जुर्म : बैंक लूटने की योजना

गरमी का मौसम होने की वजह से पथरीला शहर कोटा जैसे तंदूर की तरह तप रहा था. मंगलवार 19 जून, 2018 का दिन भी कमोबेश ऐसा ही था. दोपहर ढल चुकी थी. इस के बावजूद कोटा के तापमान में कमी नहीं आई थी. अपराह्न के लगभग 4 बज चुके थे, सीओ नरसीलाल मीणा अपने चैंबर में बैठे बड़े गौर से ग्यारसीराम शृंगी नाम के शख्स की बातें सुन रहे थे.

लगभग 50 साल की उम्र पार कर चुका ग्यारसीराम बड़ौदा-राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की गुमानपुरा शाखा में कैशियर के पद पर कार्यरत था. लेकिन वक्ती तौर पर वह इसी बैंक की कंसुआ शाखा में कैशियर का काम संभाल रहा था. कंसुआ अनंतपुरा थाना क्षेत्र में आता है.

अनंतपुरा पुलिस स्टेशन पर सीओ अमर सिंह राठौड़ थानाप्रभारी के पद पर तैनात थे. संयोग से उस वक्त राठौड़ भी मीणा साहब के चैंबर में बैठे थे. ग्यारसीराम जो समस्या ले कर उन के पास आया था, वह काफी गंभीर थी. इतनी गंभीर कि ग्यारसीराम की नौकरी और इज्जत दोनों ही दांव पर लग गई थीं.

ग्यारसीराम ने नरसीलाल मीणा को बताया कि 3 बजे वह बैंक का अस्थाई कर्मचारी देवप्रकाश के साथ बैंक से 8 लाख रुपए ले कर रवाना हुआ था. मोटरसाइकिल वह खुद चला रहे थे जबकि पीछे बैठे देवप्रकाश ने रुपयों से भरा बैग थाम रखा था.

यह रकम भामाशाह मंडी स्थित बैंक की दूसरी शाखा में जमा करनी थी. जैसे ही वे भामाशाह मंडी की पुलिया तक पहुंचे, अचानक एक स्कूटी पर सवार 2 लोग आए और बड़ी फुरती से देवप्रकाश के हाथों से नोटों का बैग छीन कर भाग गए.

दोनों ने शोर मचाते हुए काफी दूर तक उन का पीछा भी किया, लेकिन बदमाश तेज रफ्तार के साथ भाग निकले. ग्यारसीराम ने बताया कि यह सब इतने अचानक हुआ कि वह ठीक से स्कूटी का नंबर और बदमाशों का हुलिया तक नहीं देख पाए. दोनों बदमाश 24-25 साल के आसपास के थे और स्कूटी काले रंग की थी.

‘‘जब रकम आप के बैंक में सुरक्षित थी तो उसे दूसरी शाखा में जमा कराने का क्या मतलब?’’ सीओ मीणा ने सवाल किया.

कैशियर ग्यारसीराम ने उन्हें बैंकिंग प्रक्रिया समझाते हुए कहा, ‘‘सर, बैंक की कंसुआ शाखा में 5 लाख से ज्यादा रकम रखने का प्रावधान नहीं है. जब बैंक में 8 लाख की रकम जमा हो गई तो बैंक की मुख्य ब्रांच भामाशाह मंडी शाखा में जमा कराना जरूरी हो गया था.’’

सीओ नरसीलाल मीणा ने ग्यारसीराम के चेहरे पर नजर गड़ाते हुए पूछा, ‘‘आप बैंक से कितने बजे रवाना हुए थे और वारदात कितने बजे हुई?’’

‘‘जी, यही कोई पौने 3 बजे…’’ हड़बड़ाते हुए ग्यारसीराम ने कहा.

‘‘मतलब वारदात 15 मिनट बाद ही हो गई, क्यों?’’ सीओ ने सवाल किया.

‘‘जी.’’ ग्यारसीराम के मुंह से निकला.

सीओ मीणा की आंखों में जैसे गहरी चमक कौंध गई. उन्होंने टेबल पर रखे पेपरवेट को घुमाते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब किसी को आप के पूरे रूटीन की जानकारी थी.’’

ग्यारसीराम हक्काबक्का हो कर सीओ नरसीलाल मीणा की तरफ देखता रह गया.

वारदात जिस ढंग से हुई थी, उस का केंद्र भामाशाह मंडी की पुलिया थी और यह जगह वीरान नहीं बल्कि आमदरफ्त वाला चहलपहल भरा इलाका था.

मीणा ने तत्काल एसपी अंशुमान भोमिया को घटना का ब्यौरा दिया तो वह भी चौंके. उन के मुंह से बरबस निकला पड़ा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’

इस मामले का खुलासा करने के लिए भोमिया साहब ने एडीशनल एसपी समीर कुमार दुबे की अगुवाई में स्पैशल टीम का गठन किया. इस टीम में सीओ नरसीलाल मीणा के अलावा अनंतपुरा थानाप्रभारी अमर सिंह राठौड़, एएसआई आनंद यादव, दिनेश त्यागी, हैडकांस्टेबल कमल सिंह, कांस्टेबल रामकरण आदि को शामिल किया गया.

भामाशाह मंडी के पास जहां वारदात हुई थी, उधर जाने वाला रास्ता एकदम सुनसान नहीं था. वहां आसपास दुकानें और छोटेबडे़ कई मकान भी थे. दुकानें भी छोटेमोटे बाजारनुमा थीं.

पुलिस की शुरुआती तहकीकात का नतीजा ही चौंकाने वाला निकला. दुकानदारों से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने यहां ऐसी कोई वारदात होती नहीं देखी.

घटनास्थल के पास स्थित स्टाल पर चाय बेचने वाले ने बताया कि यहां लूट की कोई वारदात हुई ही नहीं है और न ही उस ने यहां लूट को ले कर किसी का शोर सुना. जबकि ग्यारसीराम ने शोर मचाने की बात पुलिस को बताई थी.

पुलिस ने सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. एएसपी दुबे के मन में शक तब हुआ, जब ग्यारसीराम ने उन्हें बताया कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए देवप्रकाश उस के साथ नहीं आया, जबकि वारदात के दौरान रकम का बैग उसी के पास था.

घटना को ले कर संदेहास्पद स्थितियों ने कई सवाल खड़े कर दिए थे. जैसे लूट की वारदात अचानक हुई थी, ऐसी स्थिति में बाइक का गिरना तो दूर की बात, उस का संतुलन तक नहीं बिगड़ा था. चौंकाने वाला सवाल यह भी था कि लूट दोपहर 3 बजे हुई लेकिन उन्होंने तत्काल पुलिस को सूचित करने के बजाए एक घंटे बाद यानी 4 बजे खबर की.

पुलिस ने अब यह पता लगाने की कोशिश की कि इस पूरे मामले में कैशियर ग्यारसीराम की क्या भूमिका थी. एएसपी समीर कुमार दुबे ने एक बार फिर ग्यारसीराम से बात की.

इस बार उस ने जो बताया, उस ने तहकीकात का नया खाका खींच दिया. उस ने कहा, ‘‘वारदात के दिन कंसुआ बैंक शाखा के मैनेजर और नियमित कैशियर दोनों छुट्टी पर थे. मेरी तैनाती तो बैंक की गुमानपुरा शाखा में है. मुझे वक्ती तौर पर एवजी कैशियर के रूप में बैंक में रकम जमा करवाने के लिए बुलवाया गया था.’’

‘‘लेकिन पुलिस को इत्तला करने में एक घंटा क्यों जाया किया गया? क्या वारदात की जानकारी पुलिस को तुरंत नहीं दी जानी चाहिए थी?’’ एएसपी दुबे ने सवाल किया.

‘‘सर, हम ने पहले अपने स्तर पर कोशिश की. गोबरिया बावड़ी तक हम ने दौड़ भी लगाई. फिर वापस बैंक आए. लेकिन जब कोई नतीजा नहीं निकला तो पुलिस के पास तो आना ही था.’’ उस ने बताया.

एएसपी दुबे को लगा कि ग्यारसीराम जो कह रहा है, शायद सच हो. इसलिए उस से कहा, ‘‘ठीक है, आप अभी घर चले जाइए लेकिन कहीं बाहर मत जाना. पूछताछ के लिए जरूरत पड़ सकती है.’’

एएसपी दुबे का संदेह अब पूरी तरह देवप्रकाश पर टिक गया. इस की वजह भी साफ थी कि वारदात के दौरान वह बाइक के पीछे बैठा था और लुटेरों ने रकम से भरा बैग उसी से छीना था. ऐसे में उसे भी ग्यारसीराम के साथ थाने आना चाहिए था, लेकिन नहीं आया.

एएसपी दुबे अभी इस बारे में सोच ही रहे थे कि उसी समय सीओ नरसीलाल मीणा और इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ ने उन के चैंबर में प्रवेश किया. सीओ मीणा ने आते ही कहा, ‘‘सर, बैंक की गतिविधियों से पूरी तरह वाकिफ अंदर का आदमी तो देवप्रकाश ही है, क्या आप इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे?’’

‘‘नहीं, मुझे पूरा यकीन है लेकिन ऐसे मामलों में जल्दबाजी ठीक नहीं होती.’’ एएसपी दुबे ने बात का खुलासा करते हुए कहा, ‘‘मुझे शक ही नहीं, पूरा विश्वास है कि इस वारदात का मास्टरमाइंड देवप्रकाश के अलावा और कोई नहीं हो सकता. लेकिन वारदात को तो उस के 2 साथियों ने अंजाम दिया था न?

‘‘अब अगर सीधे देवप्रकाश को गिरफ्तार किया जाता है तो उस के दोनों साथी भाग जाएंगे और हमें ऐसा नहीं होने देना है. हमें उसे अंधेरे में रखना है कि पुलिस को उस पर शक नहीं है. इस का नतीजा यह होगा कि वह बेफिक्र हो कर रकम के बंटवारे के लिए अपने साथियों से मिलने की कोशिश करेगा. तभी हम आसानी से उसे और उस के साथियों को दबोच लेंगे.’’

‘‘और हां, आप ने देवप्रकाश की जन्मकुंडली तो खंगाल ली होगी?’’ एएसपी दुबे ने पूछा.

‘‘यस सर,’’ सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ ने बताया, ‘‘देवप्रकाश पिछले 4 सालों से बतौर अस्थाई कर्मचारी बैंक में चपरासी तैनात है, इसलिए बैंक की तमाम गतिविधियों से वह पूरी तरह वाकिफ है. आदमी खुराफाती किस्म का है. उस की संगत भी कुछ गड़बड़ नजर आती है. बैंक के सामने ही एक मोबाइल की दुकान है. दुकान अरुण कुमार बुलीवाल की है. देवप्रकाश और अरुण में अच्छी दोस्ती है.’’

‘‘हां, अब बात का सिरा नजर आ गया है.’’ एएसपी ने अमर सिंह राठौड़ की बात बीच में ही काट कर सीओ मीणा की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘फौरन इस अरुण कुमार को थामो. बिल्ली की पूंछ पर पैर पड़ेगा तो उस के गले में घंटी बांधने में देर नहीं लगेगी.’’

योजना के मुताबिक, सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ अगले दिन सादे कपड़ों में बैंक के सामने स्थित अरुण की मोबाइल की दुकान पर पहुंच गए. ग्राहक के रूप में मोबाइल खरीदारी की बात कर के उन्होंने तसल्ली कर ली कि जिस से वह रूबरू हुए हैं, वह अरुण बुलीवाल ही है. दुकान पर राठौड़ कुछ इस तरह खड़े थे कि बैंक में लोगों की आवाजाही साफ दिखाई दे.

लगभग आधे घंटे बाद देवप्रकाश अरुण की दुकान पर आया. उस की दुकान में दाखिल होते ही अरुण अमर सिंह राठौड़ को छोड़ कर देवप्रकाश को गली के दूसरे मुहाने पर ले जाने लगा. जाते समय वह सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ से बोला, ‘‘मैं अपने दोस्त से कोई जरूरी बात कर लूं, तब तक आप मोबाइल सैट पसंद कर लीजिए.’’

‘‘ठीक है, तुम बात कर लो. मुझे कोई जल्दी नहीं है. लेकिन तुम इस तरह हड़बड़ाए हुए क्यों हो?’’ राठौड़ ने बड़े सहज भाव से अरुण की कलाई थामते हुए कहा.

‘‘कहां साब, आप अपना मोबाइल खरीदो और चलते बनो.’’ अनजान शख्स की मौजूदगी से अरुण हड़बड़ा गया था. फिर भी उस ने साहस बटोरते हुए कहा, ‘‘अब तुम फूटो यहां से, मुझे तुम्हें कोई मोबाइल नहीं देना है. पता नहीं कैसेकैसे लोग चले आते हैं.’’

‘‘तो चलो एक बात बताओ, जिस के साथ तुम जा रहे हो वह बैंक में काम करने वाला देवप्रकाश ही है न, तुम्हारा जिगरी दोस्त.’’

शेर बनने की कोशिश करने वाला अरुण अब सकपकाते हुए बोला, ‘‘भाई, तुम क्यों पंगा कर रहे हो? जरूर तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है.’’

‘‘कोई बात नहीं, गलतफहमी हो गई है तो अभी दूर कर देते हैं.’’ राठौड़ ने अरुण के गले में बांह डालते हुए गली के मुहाने की तरफ घसीटते हुए कहा, ‘‘चलो, तुम्हें कुछ दिखाते हैं.’’

यह सुन कर अरुण के होश फाख्ता हो गए. उस ने सामने जो नजारा देखा उसे देख वह बुरी तरह थरथराने लगा. देवप्रकाश को 2 सिपाही पकड़े हुए खड़े थे. सीआई राठौर ने उसे घुड़कते हुए कहा, ‘‘अरुण, तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम सब सचसच बता दो. तुम ने देवप्रकाश के साथ मिल कर कैसे बैंक की रकम लूटने की योजना बनाई और  तुम्हारे इस खेल में कौनकौन शामिल था?’’

तब तक दोनों सिपाही देवप्रकाश को राठौड़ के पास ले आए. देवप्रकाश का खेल खत्म हो चुका था. सीआई राठौड़ ने वहीं पर देवप्रकाश के 2-3 थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘2 तो तुम हो गए, अब और साथियों के नाम बता दो.’’

थप्पड़ और राठौड़ के पुलिसिया खौफ से थर्राए देवप्रकाश ने राहुल राठौड़ का नाम बताया. पुलिस ने तत्काल राहुल राठौड़ के घर छापा मारा. पुलिस को देखते ही राहुल के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पुलिस पूछताछ में देवप्रकाश ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया, ‘‘सर, बैंक से रकम लूटने की योजना मैं ने ही बनाई थी.’’ इस के साथ ही अरुण की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘इस पर अमल करने का तरीका अरुण ने बताया था. बैग छीनने के लिए स्कूटी अरुण ने ही ड्राइव की थी.’’

‘‘…और तीसरा कौन था, जिस ने देवप्रकाश से बैग छीनैती को अंजाम दिया?’’ एसपी भोमिया साहब ने घुड़कते हुए पूछा.

‘‘साहब, यह काम राहुल ने किया था.’’ उस ने राहुल की तरफ इशारा किया.

पुलिस को देवप्रकाश ने जो कुछ बताया, उस के मुताबिक मौजमजे में उस ने काफी लोगों से कर्ज ले लिया था और अब वह उन के तकाजों से परेशान था. बैंक के सामने स्थित मोबाइल की दुकान के मालिक अरुण बुलीवाल से उस की गहरी दोस्ती थी. आर्थिक दृष्टि से अरुण भी तंगहाली में था.

बैंक से रकम निकालने जमा कराने के काम में कैशियर के साथ उसी को आनाजाना होता था. देवप्रकाश को अपनी तंगहाली से उबरने का एक ही उपाय सूझा कि लूट का ऐसा नाटक रचा जाए ताकि किसी को शक भी न हो और अच्छीखासी रकम भी हाथ लग जाए. लेकिन कोई मुनासिब मौका हाथ नहीं आ रहा था.

वारदात के लिए मंगलवार 19 जून, 2018 का दिन उस ने इसलिए चुना क्योंकि बैंक का नियमित कैशियर तो छुट्टी पर था ही, बैंक मैनेजर के परिवार में किसी की मौत की वजह से वह भी छुट्टी पर थे. कैश जमा करवाने के लिए बैंक की गुमानपुरा शाखा के कैशियर ग्यारसीराम को बुलवाया गया था.

वारदात के मास्टरमाइंड देवप्रकाश ने सारी प्लानिंग कर रखी थी. मौका मिला तो वारदात को अंजाम भी दे दिया. योजना बनाते समय देवप्रकाश ने तीनों का हिस्सा तय कर रखा था. पुलिस ने तीनों से 8 लाख रुपए बरामद कर लिए. देवप्रकाश की गरदन शर्म से झुक गई. कथा लिखने तक देवप्रकाश, राहुल और अरुण तीनों न्यायिक अभिरक्षा में थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जाने किधर गए

उपहास वक्त ने किया यों जिंदगी के साथ

जो थे हमारे खो गए जो हैं बिखर गए.

आए अनेक बार झंझावात जीवन में

फलफूल पल्लव डार से हर बार झर गए.

आई किसी की याद तो बहने लगे झरने

हो रूबरू गुजरे जमाने से सिहर गए.

आई जुदाई की घड़ी मन डूबने लगा

सैलाब जैसे आ गया हो नैन भर गए.

समझाबुझा बहला लिया था बावरे मन को

डोली उठी पर जब उमड़ आंसू बिखर गए.

खोजें कहां उन को गगन में या सितारों में

दो सीपिओं में जो उफनता ज्वार भर गए.

जो हैं हमारे दूर तक छितरे बिखर गए

जो थे हमारे खो गए जाने किधर गए?

  • डा. गिरीश सक्सेना

बड़बोला (भाग-1) : विपुल से आखिर क्यों परेशान थे लोग

‘‘गुडमार्निंग सर,’’ केबिन में  प्रवेश करते हुए विपुल ने कहा और मुझे अपना नियुक्तिपत्र दिया. अकाउंट विभाग का हैड होने के नाते मैं ने उसे कुरसी पर बैठने का संकेत किया और इंटरकौम पर अपने सहायक महेश को केबिन में आने को कहा.

महेश ने केबिन में आते ही नमस्ते की और कुरसी पर बैठते हुए बोला, ‘‘सर, आज 2 घंटे पहले मुझे जाना है. श्रीमतीजी शाम की टे्रन से मायके से वापस आ रही हैं.’’

‘‘चले जाना पर पहले इन से मिलो,’’ मैं ने महेश को इशारा करते हुए कहा, ‘‘विपुल, तुम्हारे सहायक रहेंगे. काफी दिनों से तुम शिकायत कर रहे थे कि काम अधिक है, एक आदमी की जरूरत है. विपुल अब तुम्हारे अधीन काम करेंगे. विपुल के अलावा सुरेश को भी अगले सप्ताह ज्वाइन करना है. आफिस में स्टाफ पूरा हो जाएगा, जिस के बाद पेंडिंग काम पूरा हो जाएगा. अच्छा विपुल, तुम अब से महेश के साथ काम करोगे. अब तुम अपनी सीट पर जा कर काम शुरू कर दो.’’

20 साल का विपुल बी.काम. करने के बाद पिछले सप्ताह जब इंटरव्यू देने आया था तो उस को काम का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन एक गजब का आत्मविश्वास उस में जरूर था, जिस को देख कर मैं ने उसे नौकरी पर रखा था. मझले कद का गोराचिट्टा, हंसमुख नौजवान विपुल नवगांव में रहता था.

नवगांव नवयुग सिटी से लगभग 80 किलोमीटर दूर एक छोटा सा कसबा है. बस से एक तरफ का सफर लगभग ढाई घंटे में पूरा होता है. आफिस का समय सुबह 10 से शाम 6 बजे है. 8 घंटे की ड्यूटी के बाद बस पकड़ने के लिए आधा घंटा और फिर लगभग 5 घंटे बस में, यानी लगभग 14 घंटे की ड्यूटी देने की बात जब इंटरव्यू में विपुल को मैं ने बताई और पूछा कि किस तरह वह समय को मैनेज कर पाएगा. कहीं कुछ दिन काम करने के बाद नौकरी तो नहीं छोड़ देगा तो उस के आत्मविश्वास और जवाब देने के ढंग ने मुझे निरुत्तर कर दिया. उस ने कहा कि हर हालत और मौसम में सुबह 10 बजने से 10 मिनट पहले ही आफिस पहुंच जाएगा. और यही हुआ, बिना नागा आफिस खुलने से पहले विपुल पहुंच जाता और 2 महीने के छोटे से समय के अंदर सभी कार्यों में निपुण हो गया. आफिस का पेंडिंग काम समाप्त हो गया और काम रुटीन पर आ गया.

विपुल काम में तेज, स्वभाव में विनम्र लेकिन उस की एक बात मुझे पसंद नहीं थी. वह बात उस के अधिक बोलने की थी. वह चुप नहीं रह सकता था. कई बार मुझे लगता था कि वह बात को बढ़ाचढ़ा कर करता था. विपुल ने अपनी बातों से धीरेधीरे पूरे आफिस को यकीन दिला दिया कि वह एक अमीर घर से ताल्लुक रखता है. अच्छे और महंगे कपड़े, जूते अपनेआप में उस के अमीर होने का एहसास कराते थे. आफिस में अपने सहयोगियोेंको अकसर दावत देना उस का नियम बन गया था.

आफिस में कंप्यूटर आपरेटर श्वेता और टेलीफोन आपरेटर सुषमा के आसपास उसे मंडराते देख कर मुझे ऐसा लगा था कि आफिस की लड़कियों में विपुल की कुछ खास रुचि थी. लंच वह सुषमा और श्वेता के साथ ही करता था. उन दोनों को प्रभावित करने में उस का खाली समय व्यतीत होता था. इन सब बातों को देख कर मैं ने विपुल को कभी टोका नहीं, क्योंकि आफिस का काम उस ने कभी पेंडिंग नहीं किया. इसलिए बाकी सब हरकतों को उस का निजी मामला समझ कर नजरअंदाज करता रहा क्योंकि वह कंपनी के काम में सदा आगे रहता था.

एक दिन मैं आफिस में रिपोर्ट देख रहा था. शाम के 4 बजे चाय के साथ चपरासी समोसा, गुलाबजामुन और पनीर पकौड़ा मेज पर रखता हुआ बोला, ‘‘सर, समोसा पार्टी विपुल की तरफ से है.’’

‘‘किस खुशी में दावत हो रही है?’’ मैं चपरासी से पूछ रहा था, तभी महेश केबिन में आता हुआ बोला, ‘‘सर, विपुल तो छिपा रुस्तम निकला. मोटा असामी है. यह दावत तो कुछ नहीं, बड़ी पार्टी लेनी पड़ेगी विपुल से. ऐसे नहीं छूट सकता. आज उस ने 2 ट्रक खरीदे हैं, 16 ट्रक पहले से ही नवगांव की दाल मिल में चल रहे हैं. टोटल 18 ट्रकों का मालिक है. समोसा पार्टी तो शुरुआत है, फाइव स्टार दावत पेंडिंग है, सर.’’

‘‘महेश, एक बात समझ में नहीं आती कि 18 ट्रकों के मालिक को एक क्लर्क की नौकरी करने की क्या जरूरत है?’’

‘‘सर, मुझे लगता है कि अनुभव लेने के लिए विपुल नौकरी कर रहा है. साल दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर वह अपने व्यापार में पिता का हाथ बटाएगा.’’

‘‘मेरा अनुभव यह कहता है कि अमीर घराने के बच्चे कभी नौकरी नहीं करते हैं, पढ़ाई के बाद अपने घर के व्यापार में जुट जाते हैं. आई.ए.एस. की नौकरी या मैनेजमेंट डिगरी के बाद किसी मैनेजर के पद पर नौकरी तो समझ में आती है, लेकिन एक क्लर्क की नौकरी कोई बड़ा व्यापारी अपने बच्चों से नहीं करवाता है.’’

‘‘आप के कहने में वजन है, सर,’’ महेश बोला, ‘‘लेकिन हमें इस से क्या मतलब, अपन तो दावत का मजा लेते हैं.’’

महेश के जाने के बाद मेरी नजर रिसेप्शन पर गई तो देखा, विपुल श्वेता और सुषमा के साथ हंसहंस कर अपनी दी हुई पार्टी के मजे ले रहा था. मैं सोचने लगा कि कहीं यह दावत लड़कियों को प्रभावित करने के लिए तो नहीं कर रहा.

एक दिन आफिस से घर जाते हुए सामान खरीदने के लिए बाजार गया. शाम के समय बाजार में बहुत भीड़ रहती है, बाजार में सामान खरीदते समय मुझे एहसास हुआ कि विपुल श्वेता के साथ हंसता हुआ हाथ में हाथ डाले टहल रहा था. दोनों एकदूसरे से चिपके हुए अपने में मस्त दुनिया से बेखबर मुझे भी नहीं देख सके. 2 हंसों का जोड़ा पे्र्रम की गहराई में उतर चुका था. युवा प्रेमी को डिस्टर्ब करना मैं ने उचित नहीं समझा. मैं सामान खरीद कर घर आ गया.

घर आ कर मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि विपुल कब नवगांव जाता होगा और कैसे टाइम मैनेज करता होगा. आफिस में विपुल और श्वेता की नजदीकियां अधिक बढ़ने लगीं. चाय ब्रेक में दोनों एकसाथ चाय पीते नजर आते और लंच टाइम में एकसाथ खाना खाते. काम के बीच में विपुल झट से किसी न किसी बहाने श्वेता से चंद बातें कर आता. धीरेधीरे विपुल और श्वेता का प्रेम परवान चढ़ गया. आफिस में सब की जबान पर सिर्फ विपुल और श्वेता के प्रेम प्रसंग के चर्चे थे.

एक दिन लंच में मैं आराम कर रहा था. महेश केबिन में आ कर सामने कुरसी खींच कर बैठ गया.

‘‘सर, आप ने नई खबर सुनी?’’

‘‘मुझे पुरानी की खबर नहीं, तुम नई की बात कर रहे हो. तुम्हारी शक्ल से लगता है कि कोई सनसनीखेज खबर है.’’

‘‘सर, आप के लिए सनसनी होगी. आप आफिस आते हैं, काम कर के चले जाते हैं. आप को दीनदुनिया की कोई खबर नहीं होती है. हम तो परदा उठने की फिराक में कब से टकटकी लगाए बैठे हैं.’’

‘‘लेखकों की तरह भूमिका मत बांधो, महेश, सीधे बात पर आओ.’’

‘‘सीधी बात यह है सर कि विपुल और श्वेता का प्रेम एकदम परवान चढ़ चुका है. बस, अब तो शहनाई बजने की देरी है. सर, आप को मालूम नहीं, विपुल आजकल नवगांव न जा कर श्वेता के घर पर ही रह रहा है. हफ्ते में 1 या 2 दिन ही नवगांव जाता है. अंदर की खबर बताता हूं कि शादी की घोषणा होते ही श्वेता नौकरी छोड़ देगी. इतने अमीर घर जा रही है. नौकरी की क्या जरूरत है, सर.’’

‘‘क्या श्वेता के घर वाले एतराज नहीं करते? शादी से पहले घर आनाजाना तो आजकल आम बात है, लेकिन रात को सोना क्या वाकई हो सकता है? कहीं तुम लंबी तो नहीं छोड़ रहे हो?’’

‘‘कसम लंगोट वाले की, एकदम सच बोल रहा हूं.’’

‘कसम लंगोट वाले की,’ यह महेश का तकिया कलाम था. मैं समझ गया कि बात में कुछ सचाई तो है, ‘‘महेश, लगता है आजकल हम लोग आफिस में काम कम और इधरउधर की बातों में अधिक ध्यान दे रहे हैं,’’ मैं ने बात पलटते हुए कहा.

‘‘सर, आप ऐसी बातें मुझ से नहीं कर सकते हैं. आप को मालूम है कि सारा काम समाप्त करने के बाद ही मैं आप से गपशप करता हूं,’’ महेश मेरी बात का बुरा मान गया.

‘‘महेश, मैं तुम्हारी बात नहीं कर रहा हूं. मैं विपुल की सोच रहा हूं कि आजकल जब देखो, वह श्वेता के इर्दगिर्द ही मंडराता नजर आता है. अपना काम कब करता है?’’ मैं ने कुछ हैरान हो कर पूछा.

महेश हंसते हुए बोला, ‘‘सर, आप इस बात की फिक्र मत कीजिए. उस का काम जब तक समाप्त नहीं हो जाता, उसे शाम को घर जाने नहीं देता हूं, श्वेता के प्यार से उस के काम की रफ्तार गोली की तरह हो गई है. शाम तक सारा काम निबटा देता है.’’

चूंकि आफिस के काम में मुझे कोई शिकायत नहीं मिली, इसलिए विपुल और श्वेता के आपसी रिश्तों में मैं ने विशेष महत्त्व देना छोड़ दिया. दिन बीतते गए और विपुल और श्वेता के प्रेमप्रसंग के किस्से कुछ और अधिक सुनाई देने लगे. एक दिन लंच टाइम में मैं कौफी पी रहा था. तभी विपुल और महेश ने केबिन में प्रवेश किया.

‘‘सर, बधाई हो, विपुल की बहन की शादी है. आप का निमंत्रणपत्र,’’ महेश ने शादी का कार्ड मुझे दिया.

‘‘विपुल, बहुतबहुत बधाई हो,’’ मैं ने विपुल से हाथ मिलाते हुए कहा.

‘‘सर, सूखी बधाई से काम नहीं चलेगा. शादी में आप को अवश्य आ कर रौनक करनी है,’’ विपुल ने आग्रह किया.

‘‘जरूर शादी में रौनक करेंगे,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

शादी से 1 दिन पहले महेश ने लंच समय में कहा, ‘‘सर, कल विपुल की बहन की शादी है, पूरा स्टाफ शादी में जाएगा, कल लंच के बाद आफिस की छुट्टी. आप ने भी चलना है, कोई बहाना नहीं चलेगा.’’

‘‘देखो, महेश, शादी नवगांव में है, रात को वापस आने में देर हो सकती है, वहां से आने के लिए कोई सवारी भी नहीं मिलेगी,’’ मैं ने आशंका जताई.

‘‘सर, इस की चिंता आप मत कीजिए, वापसी का सारा प्रबंध विपुल ने कर दिया है. नवगांव के सब से अमीर परिवार में विवाह बहुत ही भव्य तरीके से हो रहा है, इसीलिए तो सारा स्टाफ जा रहा है. वहां पहुंचते ही एक चमचमाती कार हमारे और सिर्फ हमारे लिए होगी. हम उसी कार से वापस आएंगे. इसलिए आप बिलकुल चिंता न कीजिए,’’ महेश ने बहुत आराम से कहा, ‘‘ऐसी शादी देखने का मौका जीवन में केवल एक बार मिलता है, पूरे नवगांव में कारपेट बिछे होंगे, एक पुरानी हवेली में शादी का भव्य समारोह होगा.’’

विवरण सुन कर मैं ने हामी भर दी. मना किस तरह करता, आखिर इतनी भव्य शादी हम जैसे मध्यम वर्ग के लोगों को नसीब से ही देखने का मौका मिलेगा.

– क्रमश :

चिराग हुए पासवान

जब किसी दिमागचट या उधारी वाले को टरकाना होता है तब पिता अपने पुत्र को समझा देता है कि फलां अंकल आएं तो बोल देना कि पापा घर पर नहीं हैं. दुनियादारी का यह पहला पाठ स्मार्ट और खूबसूरत युवा सांसदों में शुमार चिराग पासवान खूब सीख गए हैं जो अमिताभ बच्चन की स्टाइल में कहते नजर आए कि जाओ पहले उस जज को एनजीटी के अध्यक्ष पद से हटाओ जिस ने एससीएसटी एक्ट से यह हटा दिया था कि …

गरमाती दलित राजनीति में ऐसे मुद्दों की भरमार है जिन्हें ले कर लोजपा मुखिया रामविलास पासवान छटपटा रहे हैं कि चेहरा चमकाने का यह सुनहरा मौका वे एनडीए का हिस्सा होने के चलते नहीं भुना पा रहे.  लिहाजा, उन्होंने अपने होनहार पूर्व अभिनेता बेटे को सियासी बिसात पर सामने ला खड़ा कर दिया है. वहीं चिराग भी अपनी भूमिका समझते न शह लगने दे रहे हैं, न पिताश्री को मात खाने दे रहे हैं.

4 वर्षों में बिहार की राजनीति का नक्शा उलट गया है और पासवान परिवार कशमकश में है कि कैसे दलित राजनीति व एनडीए दोनों को एकसाथ साधा जाए कि बात हल्दी लगे न फिटकरी और रंग भी आए चोखा जैसी लगे. इसलिए चिराग ने एससीएसटी एक्ट पर फैसला देने वाले जस्टिस ए के गोयल को निशाने पर ले कर खेल में बने रहने की कोशिश की है जिस में कांग्रेस भी उन के साथ खड़ी है.

दलित अत्याचार कानून और भारतीय जनता पार्टी

भारतीय जनता पार्टी सरकार को हार कर दलित अत्याचार कानून को फिर से ठीक करने पर मजबूर होना पड़ा है. इस कानून के अनुसार दलितों को गालियां देने या उन को सताने पर पुलिस को शिकायत मिलने पर तुरंत जेल भेज कर मुकदमा चलाने का हक था. सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में फैसला दिया था कि यह कानून गलत है और जब तक पुलिस अधीक्षक इजाजत न दें गिरफ्तारी नहीं हो सकती. अगर जिस के खिलाफ शिकायत है वह सरकारी कर्मचारी है तो उस के डिपार्टमैंट के हैड की इजाजत भी होनी चाहिए थी.

इन इजाजतों को लेने में महीनों लग जाने लाजिमी होने हैं और अगर इजाजत देनी भी हो तो अदालत जैसी सुनवाई पुलिस अधीक्षक या डिपार्टमैंट हैड को भी करनी होगी. एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को खटाई में डाल दिया था. दलितों को इस पर गुस्सा आया हुआ है.

इसे असल में ऊंची जातियों की पार्टी भारतीय जनता पार्टी का एजेंडा समझा जाता है जो दलितों को अछूत बने रहना देना चाहती है और पिछड़ों को शूद्र. जो पार्टी हर 4 वाक्यों में

2 वाक्य पुराने कल की महिमा के गाए उस से उम्मीद भी क्या की जा सकती है? 2014 में दलितों और पिछड़ों ने अपने वोट बंटने दिए थे और काफी वोट भाजपा को भी दे दिए थे.

भाजपा के आका संघ के लोग बरसों से इन लोगों को मंदिरों की सेवाओं में आने का मौका तो दे रहे थे और अपने देवताओं के दासों या गंवई देवीदेवताओं को पूजने के लिए उकसा भी रहे थे. उन्होंने भगवा दलितों और पिछड़ों की कई फौजें बना रखी हैं. इन के बल पर 2014 और बाद के चुनाव जीते गए थे.

अब दलितों को ही नहीं पिछड़ों को भी अहसास होने लगा है कि उन्हें इस्तेमाल करा जा रहा है. इसलिए मराठे, जाट, राजपूत, पाटीदार एक तरफ उठ खड़े हुए हैं तो दूसरी तरफ दलित. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछड़ी जातियों के वोट तो ले पाया पर अंबेडकर के नाम पर एक हो चुकी दलित जातियों में खाइयां नहीं खोद सका. दोनों को अब लगा है कि भाजपाई तो असल में आरक्षण को हटाना चाहते हैं और दलित ऐक्ट में अदालती फैसला तो बस एक नमूना है.

इस कदम पर भाजपा के साथ पुछल्ले बने दलित व पिछड़े दल भी बिदकने लगे. भाजपा की शैड्यूल कास्ट व शैड्यूल ट्राइब सीटों पर जीते सांसद भी खुलेआम तैश में आ गए. हार कर भाजपा को दलित ऐक्ट फिर से बहाल करना पड़ रहा है और पिछड़ा आयोग को भी साथ ही संवैधानिक दर्जा देना पड़ा है.

अब भारत की जनता के 80-85 फीसदी को साफ दिख रहा है कि भाजपा चाहे चुनावों में डर कर समझौते के मूड में है उस का मन क्या है. दूसरी तरफ भजनपूजन के ठेकेदारों को लग रहा है कि जब भाजपा इस सवर्ण एजेंडे को लागू ही नहीं कर सकती तो इसे पालने का क्या लाभ? वह गाय जो दूध न दे उसे तो कभी कोई हिंदू सदियों से नहीं पाल रहा. गौदान में मिली सारी गाएं सूखने के बाद कटती ही रही हैं. इस तरह की गाय का फायदा क्या है?

अपना आई मेकअप खुद कर बन सकती हैं पार्टी की शान

जब भी महिलाएं खुद आई मेकअप करती हैं, तो कोई न कोई कमी रह जाती है और फिर वे परेशान हो उठती हैं. मगर अब वे परेशान नहीं होंगी, क्योंकि इन कुछ खास बातों को ध्यान में रख कर वे खुद ही मेकअप आर्टिस्ट जैसा मेकअप कर किसी भी पार्टी की शान बन सकती हैं:

आई प्राइमर से टिकेगा मेकअप: यदि आई मेकअप करने के बाद वह कुछ ही घंटों में फैलने लगे तो पूरा लुक खराब हो जाता है. ऐसे में आई प्राइमर का रोल अहम हो जाता है. चेहरे पर सब से पहले आई मेकअप करें. आई मेकअप का बेस भी चुन कर लगाएं ताकि आप की आईशैडोज का लुक निखर आए. सब से अधिक परेशानी तैलीय पलकों वाली महिलाओं को होती है. आप बीबी व सीसी क्रीम और अपनी पसंद के कंसीलर को मिला कर आईबेस क्रीम तैयार कर सकती हैं, इस के बाद लूज पाउडर से इसे सैट करें ताकि पलकें तैलीय न रह जाएं.

कंसीलर: एक गलत धारणा है कि अगर आंखों के नीचे काले घेरे या दागधब्बे न हों तो कंसीलर की जरूरत ही न पड़े, लेकिन ऐसा नहीं है. हलके मेकअप में लाइट कवरेज कंसीलर का प्रयोग करें.

मेकअप आर्टिस्ट भव्या कहती हैं, ‘‘कलर करैक्टर का अहम रोल है. जब भी खुद मेकअप करने की बात आती है, तो अपनी अंडर टोन स्किन की पहचान करें, जिस में 3 विकल्प हैं- यलो अंडरटोन, औरेंज अंडरटोन व ब्लू अंडरटोन. स्किन अंडरटोन की पहचान के बाद अच्छा करैक्टर खरीदें. इस के बाद कंसीलर लगाएं और लूज पाउडर सैट करें.’’

आईशैडो: आईशैडो का लुक तभी निखर कर आता है जब इसे अच्छी तरह ब्लैंड किया जाए. मेकअप आर्टिस्ट बेहद खूबसूरती से आईशैडो को ब्लैंड करती है. अगर आप खुद मेकअप करने जा रही हैं, तो ब्लैंडिंग पर खास ध्यान दें. आईशैडो में एक रंग का चुनाव या

2 रंगों का चुनाव कर रही हैं यह अहम नहीं है. ब्लैंड के दौरान इस बात का ध्यान रखें कि यह अच्छी तरह मिक्स हो जाए. आईशैडो भी कई विकल्पों में मौजूद हैं- जैसेकि पाउडर बेस आईशैडो, क्रीम बेस आईशैडो.

लेकिन सब से ज्यादा चलन में पाउडर आईशैडो है. यह लगाने में आसान होता है और इसे लगाने में रंग भी खूब निखर कर आता है. मैट, साटन, शिमर, पर्ली, ग्लिटरी ये सभी आईशैडो अपने लुक व ड्रैस के अनुसार लगा सकती हैं. स्मोकी आई के लिए डार्क आईशैडो चुन सकती हैं. आईब्रोज हाईलाइट करने के लिए शिमर आईशैडो का प्रयोग करें. साटन व मैट आईशैडो अधिकतम क्रीज पर प्रयोग किया जाता है. नैचुरल लुक के लिए हलके ब्राउन शेड का प्रयोग करें.

आई मेकअप ब्रश की सही जानकारी: मेकअप मार्केट में कई तरह के मेकअप ब्रश मौजूद हैं. फ्लैट ऐप्लिकेटर ब्रश का प्रयोग आईशैडो को पलकों पर लगाने के लिए किया जाता है. इस की जगह आप फिंगर टिप का भी प्रयोग कर सकती हैं. भव्या कहती हैं, ‘‘पैंसिल ब्रश का प्रयोग ऊपरी व निचली लैशलाइन पर आईशैडो लगाने के लिए और आंखों के किनारों को हाईलाइट करने के लिए किया जाता है. ब्लैंडिंग ब्रश से आप क्रीज पर आईशैडो को मिक्स करती हैं. यह ब्रश सभी के लिए काफी कारगर रहता है. फ्लैट ऐंगल ब्रश भी एक खास तरह का ब्लैंडिंग ब्रश है जो किनारों व ब्रो बोन को उभारने में प्रयोग में लाया जाता है.

आईलाइनर: आजकल बाजार में कई तरह के आईलाइनर उपलब्ध हैं. इन में सब से ज्यादा चलन में लिक्विड ब्लैक आईलाइनर है. लेकिन वाटरप्रूफ आईलाइनर को अपने मेकअप बौक्स में शामिल करें. पैंसिल आईलाइनर लगाने में काफी आसान है.

आप इसे आईशैडो की तरह भी इस्तेमाल कर सकती हैं. लेकिन शार्प लुक के लिए पैंसिल को शार्प रखें. कैटआईज के लिए पैन आईलाइनर का प्रयोग करें. अगर जल्दी में हैं तो पैन आईलाइनर आप के लिए सब से अच्छा विकल्प है.

काजल: काजल के बिना मेकअप पूरा नहीं होगा. आई मेकअप में काजल की अहम जगह है. अगर आंखें थकी व हैवी हैं, तो काजल लगाते ही यह कमी भी छिप जाती है.

इस बारे में मेकअप ऐक्सपर्ट सौम्या चतुर्वेदी बताती हैं, ‘‘ब्लू, ग्रे, ग्रीन, ब्लैक जैसे कई रंगों

में काजल बाजार में मौजूद है. काली व भूरी आंखों पर हरे रंग का काजल लगाया जा सकता है. ग्रीन रंग की आंखों पर बैंगनी, हलका भूरा, नीला, ग्रीन आदि रंग फबते हैं. नीली आंखों पर नीले रंग का काजल लगाने से बचें. काला, ग्रे, वायलेट आदि रंगों से नीली आंखों की सुंदरता और निखर कर आएगी.’’

आईब्रोज: चेहरे की सुंदरता बढ़ाने के लिए आईब्रो कलर पर खास ध्यान दें. आईब्रो कलर से आप चेहरे को आकर्षक बना सकती हैं. शेप देने के लिए ब्राउन पैंसिल का इस्तेमाल करें. आईब्रो कलर चुनने से पहले अपने बालों व स्किन टोन का ध्यान रखें. ये नैचुरल दिखने चाहिए.

पलकें: जब भी मसकारा लगाएं अपनी पलकों को कर्ल करना न भूलें. यह आप की पलकों को आकर्षक अंदाज देगा.

भव्या कहती हैं, ‘‘अकसर मसकारा लगाते समय फैलने का डर रहता है. ऐसे में इस ट्रिक का प्रयोग करें- ऊपरी पलकों पर लगाते समय चेहरे को ऊपर उठा लें व नीचे की पलकों पर नीचे देखते हुए लगाएं.’’ आपस में चिपकी पलकें मसकारे के लुक को बिगाड़ देती हैं. ऐसे में मसकारा नीचे से ऊपर तक जिगजैग अंदाज में लगाएं, साथ ही पहला कोट सूखने के बाद ही दूसरा कोट लगाएं. मसकारा सूखने के बाद आईलैश कौंब का प्रयोग कर के इन्हें क्लीन लुक दें.

नकली पलकों पर मसकारे का एक ही कोट काफी है. नकली पलकें लेते समय इस बात का ध्यान रखें कि वे आप की लैशलाइन के काफी करीब हों.

किचन की साइज के अनुसार सही रहेगा ऐसा सिंक

महिलाएं किचन में कैबिनेट और काउंटर टौप के चुनाव पर तो खास ध्यान देती हैं पर किचन सिंक पर उतना नहीं जबकि यह भी किचन का एक अहम हिस्सा है. अत: सिंक लगाते समय इन बातों का ध्यान रखा जाए तो यह सुविधाजनक होने के साथसाथ अच्छा लुक भी देगा:

किस चीज का हो किचन सिंक: किचन में सब से ज्यादा स्टेनलैस स्टील के सिंक का प्रयोग होता है. सौंदर्य और सफाई के नजरिए से यह उत्तम है. कम गेज की चादर का भारी व मजबूत होता है तो ज्यादा गेज का हलका व कमजोर. अपनी जरूरत के अनुसार उचित गेज का स्टील का सिंक लगवाएं.

पहले सिंक ढलवा लोहे के होते थे, पर उन की साफसफाई कठिन होती थी. इस के लिए उन के ऊपर चीनीमिट्टी का कवर देते थे. आजकल ग्रेनाइट या क्वार्ज के सिंक भी मिलते हैं. सुंदरता के लिहाज से ये काफी अच्छे होते हैं. सिरैमिक के सिंक भी आते हैं, पर इन के टूटने का खतरा रहता है.

सिंक का डिजाइन: सिंक की धातु के चुनाव के बाद सिंक का डिजाइन कैसा हो, यह आप की जरूरत और किचन के साइज पर भी निर्भर करता है. आप किचन में सिंगल बेसिन सिंक या डबल बेसिन सिंक अपनी सुविधा से लगवा सकती हैं.

सिंगल बेसिन सिंक: इस में सिर्फ एक सिंक होता है, पर इस में बड़े बरतन रखने के लिए पर्याप्त जगह होगी. यह ड्रेन बोर्ड के साथ भी मिल सकता है

डबल बेसिन सिंक: इस में 2 बेसिन होंगे. इसे लगाने के लिए ज्यादा जगह चाहिए और खर्च भी थोड़ा ज्यादा होगा. दोनों बेसिन सिंगल की तुलना में कुछ छोटे होंगे. पर इस के फायदे भी हैं. एक सिंक में आप के गंदे बरतन हो सकते हैं, तो दूसरे सिंक में आप दूसरा काम कर सकती हैं. जैसे सब्जी, चावल, दाल आदि की धुलाई.

ट्रिपल बेसिन सिंक: 3 बेसिन वाले सिंक भी मिलते हैं. पर आमतौर पर ये घर में व्यवहार में नहीं आते हैं.

फार्महाउस या ऐप्रन फ्रंट सिंक: इस में सिंक का सामने का भाग ऐक्सपोज्ड होता है. आप को ज्यादा गहराई या धुलाई के लिए कुछ अधिक जगह मिल सकती है.

टौप माउंट सिंक: यह आप के काउंटर के ऊपर ही होता है और इसे लगाना भी आसान होता है, पर सुंदरता के लिहाज से देखने में उतना अच्छा नहीं लगता है.

अंडर माउंट सिंक: यह आप के काउंटर के लैवल से नीचे होगा, पर देखने में काफी अच्छा लगता है. ज्यादातर फ्लैट्स या अपार्टमैंट्स में आजकल यही देखने को मिलते हैं.

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