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सोसाइटी के मकानों में दिलचस्पी ले रहे हैं लोग

4 दिन की मुंबई ट्रेनिंग का अपना और्डर देख कर नीतू परेशान हो उठी. उस का पति नमन पहले ही 6 माह के औफिशियल टूअर पर विदेश गया हुआ था. घर में वृद्ध सासससुर को छोड़ कर वह कैसे जा पाएगी, यह सोचसोच कर उस का सिर दर्द से फटने लगा. घर आ कर भी काम में मन नहीं लग रहा था, यद्यपि सासससुर उसे अकेले रह लेने का आश्वासन दे रहे थे. मगर वह स्वयं उन्हें 4 दिन अकेले छोड़ कर जाने के लिए स्वयं को तैयार नहीं कर पा रही थी.

शाम को सोसाइटी के पार्क में उस के सामने वाले फ्लैट में रहने वाली उस की दोस्त नीना उसे कुछ परेशान देख कर बोली, ‘‘क्या बात है आज चेहरे पर 12 क्यों बज रहे हैं?’’

पहले तो नीतू टाल गई पर उस के बारबार पूछने पर उस ने उसे अपनी मुंबई ट्रेनिंग की बात बताई. यह सुन कर नीना हंसते हुए बोली, ‘‘अरे इस में चिंता करने या परेशान होने की क्या बात है? मैं सामने ही रहती हूं. आंटीअंकल को कोई परेशानी नहीं होने दूंगी. वैसे तो मैं खुद ही उन का ध्यान रखूंगी पर फिर भी तुम उन्हें मेरा फोन नंबर दे देना ताकि कभी भी कोई जरूरत पड़े तो वे मुझे बुला सकें.’’

नीना की बातें सुन कर नीतू कुछ आश्वस्त हुई. फिर खुश होते हुए बोली, ‘‘वाह नीना तुम ने तो मेरी प्रौब्लम चुटकियों में सौल्व कर दी. मैं तो सुबह और्डर मिलते ही परेशान हो गई थी. पिछली ट्रैनिंग में बीमारी के कारण नहीं जा पाई थी. इसलिए अब टाल भी नहीं सकती थी.’’

अगले दिन नीना के भरोसे सासससुर को छोड़ कर नीतू मुंबई चली गई. जब वापस आई तो सासससुर पड़ोसिन नीना की तारीफें करते थक नहीं रहे थे. ये सब सुन कर नीतू को बहुत अच्छा लगा. तभी उसे 2 साल पहले का घटनाक्रम याद आया जब वह फ्लैट के स्थान पर अपना स्वतंत्र मकान लेने के पक्ष में थी जबकि नमन को फ्लैट इसीलिए पसंद था कि वहां जरूरत पड़ने पर आसपास कोई पड़ोस में होता है, जो काम आ जाता है, जबकि स्वतंत्र घरों में तो महीनों एक पड़ोसी को दूसरे पड़ोसी के दर्शन नहीं होते.

सभ्य पासपड़ोस

रानू के लिए तो उस का फ्लैट वरदान साबित हुआ था. उस ने और उस के पति अमन ने कुछ साल पहले अपनी थोड़ी सी जमापूंजी से एक सोसाइटी में फ्लैट लिया था. सास की मृत्यु के बाद उन के वृद्ध ससुर भी साथ रहते थे.

सुबह 10 बजे दोनों पतिपत्नी औफिस के लिए निकलते थे तो शाम तक ही आ पाते थे. दिन में उस के ससुर अपने रोज के कामों में व्यस्त रहते और शाम को सोसाइटी के पार्क में घूमते. अपने हमउम्र लोगों के साथ बतियाते कब वक्त बीत जाता उन्हें पता ही न चलता. परंतु 1 साल बाद ही रानू का कानपुर से इलाहाबाद तबादला हो गया.

अमन परेशान हो उठा कि कैसे अकेला वह घर और पापा को मैनेज करेगा. रानू की लगीलगाई इतनी अच्छी सरकारी नौकरी भी तो छोड़ी नहीं जा सकती थी. खैर, किसी तरह 1 सप्ताह के लिए घर को मैनेज कर के रानू ने इलाहाबाद अपनी नौकरी जौइन कर ली.

1 सप्ताह बाद जब रानू वीकैंड पर घर आई तो यह सुन कर हैरान रह गई कि ससुर की मित्रमंडली को जैसे ही रानू के बाहर जाने का पता चला सभी उन की मदद के लिए आगे आ गए. घर में खाना, नाश्ता नहीं बनाने दिया. बाद में रानू ने धीरेधीरे अपने कामवालों को ट्रेंड कर दिया और किसी तरह 1 साल काट कर वापस कानपुर तबादला करवा लिया.

रानू अपने पड़ोसियों की तारीफ करते नहीं थकती. वह कहती है, ‘‘मैं तो वीकैंड पर ही आ पाती थी, पर इस बीच मेरे सभी पड़ोसियों ने मुझे इतना संबल दिया कि मैं उन के कारण ही 1 साल इलाहाबाद में काट पाई. इस के अतिरिक्त सोसाइटी में ही हर प्रकार की सुविधाएं भी मौजूद थीं. मेरे पीछे ससुर और पति को मैनेज करने में कोई समस्या नहीं आई.’’

जरूरत पड़ने पर मदद

बैंककर्मी अनीता का तो सोसाइटी का अनुभव कुछ अलग ही है. वह बताती है कि उस के साथ उस की सास भी रहती है. पति का तबादला दूसरे शहर हो गया था. इकलौती बेटी भी दूसरे शहर में इंजीनियरिंग कर रही है.

एक दिन मेड से काम करवाते वक्त उस की सास का पैर फिसल गया और वे गिर कर बेहोश हो गईं. जैसे ही उस के सामने वाले फ्लैट में रहने वाली तनु को पता चला वह उन्हें अस्पताल ले गई. जब तक अनीता हौस्पिटल पहुंची उन का इलाज शुरू हो चुका था. इस घटना को घटे 2 साल हो गए हैं, पर अनीता आज भी अपनी सास के सहीसलामत होने के लिए अपनी सोसाइटी के निवासियों को धन्यवाद देती है.

अस्मिता के पति एक दिन सुबह जब सो कर उठे तो असहज महसूस कर रहे थे. कुछ ही देर में उन्हें चक्कर आने लगा. घबराई अस्मिता ने अपने पड़ोसी राजेंद्र्रजी को बताया तो आननफानन में वे उन्हें अस्पताल ले गए. तुरंत इलाज होने से उन की जान बच गई. अस्मिता कहती है, ‘‘मैं तो 7 दिन तक हौस्पिटल में थी, घर में मेरी वृद्ध सास और 12 वर्षीय बेटी को मेरे पड़ोसियों ने ही संभाला. मैं तो हरेक से कहूंगी कि फ्लैट में ही रहना सुरक्षित है. कम से कम आसपास कोई खोजखबर लेने वाला तो होता है.’’

शर्माजी ने बड़े मन से अपनी सारी जमापूंजी को जोड़ कर 8 कमरों का 2 मंजिल घर बनवाया. दोनों बच्चे जब तक थे तो उन की मौजमस्ती से घर आबाद रहता था. अब दोनों बच्चे महानगरों

में अपनीअपनी नौकरी में व्यस्त हैं. दोनों पतिपत्नी 1 ही कमरे का प्रयोग करते हैं. वे कहते हैं, ‘‘पूरे घर की तो रोज सफाई नहीं हो पाती. महीने में

1 बार कामवाली से पूरी सफाई करवाते हैं. अब लगता है इतने बड़े घर का क्या लाभ? कोई रहने वाला ही नहीं है.’’

तनूजा कहती है, ‘‘आज के समय में फ्लैट लेना ही सर्वोत्तम है, क्योंकि उम्र को तो दिनप्रतिदिन बढ़ना ही है. वृद्धावस्था में छत पर तो जाने से रहे. वृद्धावस्था में व्यक्ति अपने व्यक्तिगत कार्यों को ही सहजता से कर ले वही बहुत है. बड़े घर की देखभाल कैसे करेंगे. फ्लैट छोटा होता है. उस की साफसफाई आसानी से की जा सकती है.’’

सोसाइटी फ्लैट को प्राथमिकता

पहले लोग स्वतंत्र घर पसंद करते थे, क्योंकि उस में उन्हें जमीन और छत दोनों की सुविधाएं प्राप्त हो जाती थीं. मगर वहीं आज लोग सोसाइटियों के फ्लैटों में रहने को ही प्राथमिकता देने लगे हैं. इस के कारण निम्न हैं:

– आजकल पतिपत्नी दोनों नौकरीपेशा होते हैं. ऐसे में घर रह जाते हैं बड़ेबुजुर्ग या फिर बच्चे. अकसर पूरा दिन इन्हें अकेले रहना पड़ता है. बैंककर्मी रागिनी और उस के पति शाम को ही घर आ पाते हैं, परंतु उन के दोनों टीनेज बच्चे 4 बजे तक स्कूल से आ जाते हैं. उन के पड़ोस में आंटीअंकल रहते हैं, जिन के बच्चे विदेश में हैं. रागिनी और उस के पति के आने तक वे दोनों बच्चों की देखभाल करते रहते हैं. इस से उन दोनों का भी मन लगा रहता है और रागिनी की समस्या भी हल हो जाती है.

द्य यहां पर एक ही परिसर में कई घर होते हैं, इसलिए किसी न किसी पड़ोसी से तो आप के संबंध प्रगाढ़ हो ही जाते हैं, जो आफतमुसीबत में आप का संबल बनते हैं.

द्य आजकल सोसाइटियों का स्वरूप अत्याधुनिक हो गया है. उन में जिम, क्लब, पार्टी हौल, गार्डन, लाइब्रेरी, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र तक होते हैं.

द्य ग्लोबलाइजेशन के इस युग में आज बच्चे न केवल देश, बल्कि विदेशों तक में नौकरी करने चले जाते हैं. ऐसे में अकसर मातापिता को उन के पास जाना ही पड़ता है. स्वतंत्र घरों में जहां चोरी का अंदेशा रहता है वहीं यहां पर चौकीदार और लोगों की आवाजाही होते रहने से इस प्रकार का कोई डर नहीं रहता.

द्य आजकल लोग स्वतंत्र घरों को इसलिए भी कम पसंद कर रहे हैं, क्योंकि बढ़ती उम्र में वे न तो छत पर जा पाते हैं और न ही बड़े घरों को मैंटेन कर पाते हैं. वे चाहते हैं एक ऐसा घर जिस के आसपास ही सारी सुविधाएं मौजूद हों और जिस की वे आराम से देखभाल कर सकें.

– सोसाइटी अपने परिसर में रहने वालों से प्रतिमाह साधारण शुल्क वसूलती है, जिससे वह समयसमय पर पूरी बिल्डिंग की मैंटेनैंस करवाती रहती है. निर्धारित शुल्क देने के बाद आप बेफिक्र हो जाते हैं, जबकि अपने स्वतंत्र मकान में कोई भी समस्या होने पर समाधान आप को स्वयं ही करना होता है और वृद्धावस्था में ये सब करवाना बहुत बड़ी मुसीबत होती है.

द्य यहां विभिन्न संस्कृतियों के लोग निवास करते हैं, जिस से देश की विभिन्न संस्कृतियों से भी आप का परिचय होता है. पूरी सोसाइटी के निवासी मिलजुल कर पर्व आदि भी मनाते हैं, जबकि कालोनियों में तो कब त्योहार निकल गया पता ही नहीं चलता.

लिव इन रिलेशन : क्या करें जब हो जाए ब्रेकअप

राखी कुछ दिनों से बेहद परेशान दिख रही थी. दफ्तर के काम में भी उस का मन नहीं लग रहा था. वह एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत थी. ऐसे में बौस का उस पर झल्लाना लाजिम था.

यह सब उस की सहकर्मी नीलिमा से न देखा गया और एक दिन लंच टाइम में उस ने राखी के मन को कुरेदा तो वह फफक उठी, ‘‘नीलिमा, मैं और मिहिर 1 साल से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे थे. मैं ने तो अपने मातापिता को भी मना लिया था शादी के लिए, लेकिन अब वह कह रहा है कि वह इस रिश्ते से ऊब चुका है. उसे स्पेस चाहिए. कुछ हफ्तों से हम एक छत के नीचे रह कर भी अजनबियों की तरह रह रहे हैं. 3 दिन से वह मुझे मिला भी नहीं है. न कौल, न मैसेज. कुछ भी रिप्लाई नहीं कर रहा,’’ और फिर वह फूटफूट कर रोने लगी.

नीलिमा ने राखी को जी भर कर रोने दिया. फिर दफ्तर के बाद उसे अपने घर ले गई. नीलिमा अपने मम्मीपापा और भैयाभाभी के साथ रहती थी. राखी को एक परिवार का भावनात्मक सहारा मिला और अपनी एक सहेली का हौसला, जिस से उस का मनोबल मजबूत हुआ और वह आगे की जिंदगी हंसतेहंसते बिता पाई.

राखी जैसी न जाने कितनी लड़कियों को सहजीवन या लिव इन रिलेशनशिप ने अपने मकड़जाल में फंसाया हुआ है, जिस से निकलतेनिकलते वे टूट कर पूरी तरह बिखर जाती हैं और हाथ लगती है सिर्फ हताशा और मानसिक अवसाद.

कुछ वर्षों पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दी थी तब युवावर्ग खुशी से झूम उठा था मानो खुले आसमान के साथसाथ अब उन्हें सुनहरे पंख भी मिल गए हों. मगर अब इस रिश्ते की स्वच्छंदता बहुतों को घायल कर रही है, जिन में महिलाएं, लड़कियां ज्यादा हैं.

नैंसी के साथ तो बहुत ही बुरा हुआ.

6 महीने तक प्रकाश के साथ सहजीवन में रहने के बाद अचानक एक हादसे में प्रकाश की मौत हो गई. किसी तरह वह इस सदमे से खुद को उबारती है तो पता चलता है कि वह मां बनने वाली है और अब गर्भपात की समयसीमा भी निकल चुकी है. ऐसे में वह जीवन से हताश हो कर आत्महत्या जैसा गलत कदम उठा लेती है और पीछे छोड़ जाती है अपना रोताबिलखता परिवार और उन के अनमोल सपने जो कभी उन्होंने नैंसी के लिए देखे थे.

महानगरों में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे. अब सवाल यह उठता है कि यदि विवाह संस्था बंधन और लिव इन आजादी है, तो फिर इस आजादी में इतनी तकलीफ क्यों सहन करनी पड़ रही है लड़कियों को? इस का जवाब है समाज की दोयमदर्जे की मानसिकता.

भारतीय महिलाओं के लिए संबंधों को तोड़ पाना अभी भी आसान नहीं है. सामाजिक ही नहीं भावनात्मक स्तर पर भी. पुरुष तो ऐसे रिश्तों से अलग हो कर शादी भी कर लेता है और समाज स्वीकार भी लेता है, परंतु वही समाज महिला के चरित्र पर उंगली उठाता है.

ऐसी स्थिति में क्यों न हम कुछ बातों का खयाल रखते हुए एक सुकून भरी जिंदगी जीएं. लिव इन रिश्ते के टूटने पर पलायनवादी होने से अच्छा है कि हम इसे अपना अनुभव समझते हुए सबक लें. यह सच है कि महिलाओं के लिए साथी के साथ को भूलना और जीवन के आगामी संघर्षों से मुकाबला करना आसान नहीं होता. लेकिन जिंदगी रुकने का नहीं, निरंतर चलने का नाम है. बस जरूरत है तो इस रिश्ते से जुड़े कुछ पहलुओं पर गौर करने की ताकि लिव इन रिलेशनशिप से टूट कर न बिखरें.

खुद को रखें व्यस्त: यदि आप नौकरी करती हैं, तो आप के लिए खुद को व्यस्त रखना थोड़ा आसान होगा. अपने औफिशियल टारगेट को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करें. हर वक्त यह न सोचती रहें कि अपने पार्टनर को कैसे मनाया जाए क्योंकि आप के पार्टनर ने मानसिक तैयारी के साथ ही आप को छोड़ा है, इसलिए वह तो आने से रहा.

नौकरी न करने वाली लड़कियों को भी चाहिए कि वे ज्यादा से ज्यादा समय परिवार के साथ बिताएं और साथ ही अपने अंदर के किसी हुनर को पहचानते हुए उसे निकालने का प्रयास करें. वे सारे कार्य करें जो कभी आप समय की कमी के कारण नहीं कर पाती थीं. कभीकभी अपनी भावनाओं को डायरी के पन्नों में भी ढालने का प्रयास करें. मन की तकलीफ कुछ कम हो जाएगी.

कुछ तो लोग कहेंगे: जब आप ने लिव इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया होगा तब अवश्य ही लोगों की बातों को नजरअंदाज किया होगा. लोग क्या कहेंगे, इस वाक्य को कई बार सिरे से खारिज किया होगा. तो बस अभी वही करते रहिए. शांति से उन की नकारात्मक बातों को अनसुना कीजिए. कभी भी अपनी तरफ से सफाई देने या अपना पक्ष रखने की कोशिश न कीजिए, क्योंकि आप ने कोई अपराध नहीं किया है.

हीनभावना न पनपने दें: आप केवल दोस्ती के एक रिश्ते से अलग हुए हैं. अत: स्वयं को तलाकशुदा न समझें. आप ने कोई अपराध नहीं किया है. यौन शुचिता के तराजू पर भी खुद को न तौलें. शारीरिक संबंध बनाना एक प्राकृतिक क्रिया है. इसे लेकर अपने मन में हीनभावना न पालें. साथी के साथ बिताए सुखद पलों को ही जीवन में स्थान दें. साथी के प्रति मन में नफरत का भाव न रखें. आमनेसामने होने पर भी दोस्ताना व्यवहार करें और किसी भी प्रकार का ताना या उलाहना न दें.

कानून है आप के साथ: यदि आप लंबे समय से लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं और आप का बच्चा भी है तो ऐसे में यदि आप का साथी आप को आप की मरजी के खिलाफ छोड़ना चाहता है तो आप कानून का सहारा ले सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में यह फैसला सुनाया है कि लिव इन के कारण पैदा हुए बच्चे नाजायज नहीं कहे जाएंगे. आप सीआरपीसी की धारा 125 के तहत बच्चे के गुजाराभत्ते के लिए अर्जी दाखिल कर सकती हैं, क्योंकि अधिक समय तक लिव इन रिश्ते में रहने के कारण आप को कानूनन पत्नी का दर्जा मिलता है.

साथी के द्वारा मारपीट या जबरदस्ती करने पर भी आप न्यायालय से घरेलू हिंसा कानून के तहत इंसाफ एवं गुजाराभत्ते की मांग कर सकती हैं या हिंदू अडौप्शन ऐंड मैंटनैंस एक्ट की धारा 18 के तहत भी अर्जी दाखिल कर सकती हैं.

न छिपाएं होने वाले जीवनसाथी से: टूटे रिश्ते के गम से बाहर निकलने के लिए शादी एक बेहतर विकल्प है, पर इतना याद रखें कि शादी

से पहले आप अपने भावी जीवनसाथी को अपने लिव इन रिलेशनशिप के बारे में अवश्य बताएं, साथ ही उन्हें यह आश्वस्त करें कि आप अपने पुराने रिश्ते को नए रिश्ते पर कभी हावी नहीं होने देंगी.

पुरुष भी दें ध्यान: यह सही है कि सहजीवन से अलग होने का परिणाम सब से ज्यादा लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है, परंतु कुछ समय संवेदनशील पुरुष भी प्रभावित होते हैं, इस बात को नकारा नहीं जा सकता.

जयंत की पार्टनर ने उसे छोड़ने के बाद उस के खिलाफ शादी का झांसा दे कर बलात्कार करने का इलजाम लगा दिया था. काफी मुश्किलें झेलने के बाद वह इस से छुटकारा पा सका.

ऐसे पुरुषों के लिए ही दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे मामलों में पुलिस को बलात्कार के बजाय विश्वास भंग (क्रिमिनल ब्रीच औफ ट्रस्ट)का मुकदमा दर्ज कर जांच करने का आदेश दिया है, ताकि पुरुषों को भी न्याय मिल सके.

वक्त बदल रहा है (अंतिम भाग) : क्यों बेबस हो गई थी लीना

पूर्व कथा

सुबह अखबार पढ़ कर लीना चौंक जाती है कि हरिनाक्षी ने जिला कलक्टर का पद ग्रहण कर लिया है. यह खबर पढ़ते हुए वह अतीत में खोने लगती है. दलित परिवार की हरिनाक्षी और उस के बीच कभी गहरी दोस्ती नहीं रही.

एक दिन हरिनाक्षी की सहेली अनुष्का का बलात्कार हो जाता है. प्रतिष्ठित व्यापारी का बिगड़ैल बेटा होने के कारण बलात्कारी सुबूतों के अभाव में जमानत पर छूट जाता  है. कालिज की राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ी होने के कारण अनुष्का लीना के पास मदद के लिए जाती है, लेकिन वह मना कर देती है. उधर, अनुष्का आत्महत्या कर लेती है.

अपने उत्तराधिकारी के रूप में लीना के पिता उसे राजनीति में उतारते हैं और उस की शादी ऊंचे व्यापारिक घराने में कर देते हैं. उस का देवर ही अनुष्का का बलात्कारी था इसी वजह से लीना इस रिश्ते को स्वीकार करने में हिचकिचाती है. अंतत: शादी कर लेती है.

आज लीना एक लोकप्रिय राजनीतिक पार्टी की सचिव है. वह अपने राजनीतिक रुतबे का इस्तेमाल पति कमलनाथ के एक बहुत बड़े प्रोजेक्ट के लिए करती है. इस प्रोजेक्ट के लिए उसे हरिनाक्षी की मदद की जरूरत पड़ती है.

शहर के व्यस्ततम इलाके के एक पुराने मकान को कमलनाथ खाली करवाना चाहते हैं लेकिन मकान मालिक शिवचरण खाली नहीं करता क्योंकि इस मकान से उस की बेटी अनुष्का की यादें जुड़ी हैं. कमलनाथ पुलिस विभाग में अपने रौबदाब की वजह से मकान खाली करवाना चाहते हैं लेकिन शिवचरण अपनी फरियाद ले कर जिला कलक्टर हरिनाक्षी के पास जाते हैं तो वह शिवचरण को पहचान लेती है. अनुष्का के पिता होने के नाते वह उन की मदद करने का आश्वासन देती है. वह एस.पी. को बुला कर पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाती है और बैठक को संबोधित करने लगती है.

अब आगे…

हरिनाक्षी मीटिंग पूरी कर के चली गई. वह जानती थी कि उस की बात अब लीना, कमलनाथ और निर्मलनाथ के कानों तक जरूर पहुंचेगी और वे लोग भागेभागे उस के पास आएंगे और ऐसा हुआ भी.

शिवचरण के इलाके का थानेदार लीना के घर हाजिरी लगाने पहुंच गया.

‘‘क्या उस बुड्ढे का मकान खाली हो गया?’’ लीना ने पूछा.

‘‘मैडम, मकान खाली कराना तो दूर की बात है अब तो आप पर मुकदमा दर्ज करना होगा,’’ थानेदार ने घिघियाते हुए कहा.

‘‘क्या बकते हो?’’ लीना बुरी तरह भड़क गई.

‘‘हां, मैडम. मैं मजबूर हूं. आज कलक्टर साहिबा ने सारे पुलिस वालों की मीटिंग बुलाई और साफ शब्दों में आदेश दिया कि किसी भी फरियादी को थाने से खाली हाथ लौटने न दिया जाए. लिहाजा, हमें भी शिवचरण की शिकायत पर काररवाई करनी होगी,’’ थानेदार की आवाज थोड़ी डरी हुई थी.

कमलनाथ का चेहरा उतर गया.

लीना भी परेशान हो गई.

‘‘डी.एस.पी. साहब ने कुछ नहीं कहा,’’ कमलनाथ की आवाज में बेचैनी झलक रही थी.

‘‘कहां साहब, मैडम के सामने सब की बोलती बंद थी,’’ थानेदार ने कहा.

‘‘अब क्या होगा?’’ कमलनाथ ने लीना की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘होगा क्या. चलो, मिलने चलते हैं. अपनी सहेली से और आप की साली साहिबा से,’’ लीना ने माहौल को हलका करने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘भाभी, मैं भी चलूंगा,’’ निर्मलनाथ ने कहा.

‘‘हां, हां, क्यों नहीं,’’ लीना बोली.

दूसरे ही दिन लीना, कमलनाथ और निर्मलनाथ कलक्टर साहिबा के बंगले पर पहुंच गए. मुलाकाती कक्ष में कई महिलापुरुष बैठे हुए थे. कई लोग लीना को पहचानते भी थे और सब की आंखों में एक सवाल भी था कि लीना जैसी हस्ती भी मिलने के लिए मुलाकाती कक्ष में बैठने पर मजबूर है.

लीना ने अपना कार्ड चपरासी को देते हुए कहा, ‘‘मैडम को दे दो.’’

चपरासी कार्ड ले कर अंदर चला गया और फिर तुरंत बाहर आ कर अपनी जगह खड़ा हो गया.

‘‘मैडम ने क्या कहा?’’ वह पूछे बगैर न रह सकी.

‘‘कुछ नहीं,’’ चपरासी ने टका सा जवाब दिया.

लीना ठंडी पड़ गई. लीना के साथसाथ कमलनाथ और निर्मलनाथ भी परेशान दिखाई दे रहे थे. उन्हें अपनी बारी का इंतजार करते हुए 2 घंटे हो गए.

‘‘चलिए, मैडम ने आप लोगों को अंदर बुलाया है,’’ चपरासी ने कहा तो तीनों के चेहरे पर थोड़ी राहत नजर आने लगी.

तीनों ने अंदर कमरे में प्रवेश किया.

लीना देख रही थी कि हरिनाक्षी आज भी सुंदर दिखाई दे रही है जैसा कालिज के जमाने में दिखाई देती थी. ऊंचे पद की गरिमा ने उस की आंखों की चमक और बढ़ा दी है.

‘‘आइए, बैठिए,’’ कुरसियों की तरफ इशारा करते हुए हरिनाक्षी ने कहा.

‘‘हरिनाक्षीजी, पहचाना आप ने? मैं लीना सिंह. हम सब सेंट जेवियर्स कालिज में साथ पढ़ते थे,’’ लीना ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अरे, आप को कैसे नहीं पहचान सकती…आप मुझ से सीनियर थीं और मुझ जैसी नई छात्राओं की बहुत मदद करती थीं,’’ हरिनाक्षी ने हंसते हुए उत्तर दिया.

लीना समेत सब की जान में जान आई.

‘‘आप के ही सहयोग के चलते मैं आज यहां पर बैठी हूं. खैर, बताइए क्या काम है?’’ हरिनाक्षी ने चुभते हुए स्वर में कहा.

‘‘यह मेरे पति हैं, कमलनाथ और साथ में इन के छोटे भाई निर्मलनाथ हैं.’’

‘‘मैं इन्हें खूब पहचानती हूं. मेरी स्मरण शक्ति इतनी खराब नहीं है. बात क्या है? इस गरीब को कैसे याद किया?’’ हरिनाक्षी मुसकराई.

‘‘कुछ दिन हुए, एक मकान का सौदा किया था और मकान मालिक को इन्होंने मकान की आधी कीमत चुकाई थी. मगर आज इस बात को मकान मालिक मानने को तैयार ही नहीं हो रहा है. उलटे इन्हें गुंडों से धमकी दिलवा रहा है,’’ लीना और भी कुछ कहने जा रही थी मगर हरिनाक्षी ने बीच में ही कहना शुरू किया, ‘‘वह आदमी आप लोगों से कहीं ज्यादा पहुंच और पैसे वाला होगा. है न? गुंडे भी वरदी वाले होंगे. खादी हो या खाकी वरदी, क्या फर्क पड़ता है,’’ हरिनाक्षी ने कटाक्ष करते हुए कहा.

तीनों के चहेरों का रंग उड़ गया. उन्हें धरती घूमती नजर आने लगी.

‘‘बात यह है कि …’’ कमलनाथ ने कुछ कहने की कोशिश की.

‘‘सारे शहर को मालूम है कि शिवचरण की हैसियत में और आप लोगों की औकात में जमीनआसमान का अंतर है. फिर भी अगर आप को शिकायत दर्ज करानी है तो अपने निकट के थाने में उस के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज करवाइए. प्रशासन से मदद चाहिए तो एक आवेदन- पत्र दीजिए. ध्यान रहे कि दस्तावेज पूरे होने चाहिए,’’ हरिनाक्षी ने ठंडे स्वर में कहा.

‘‘मैं तो यह सोच कर आई थी कि हमारी पुरानी दोस्ती का लिहाज करते हुए तुम हमारी मदद करोगी,’’ लीना ने अपने नेतागीरी वाले अंदाज में कहा.

‘‘हम कितने गहरे दोस्त थे यह बताने की शायद मुझे जरूरत नहीं. और मैं यह बता देना जरूरी समझती हूं कि मैं इस शहर में दोस्ती निभाने नहीं आई हूं. मेरा फर्ज यहां के आम नागरिकों के जानमाल की रक्षा करना है,’’ हरिनाक्षी ने बिना किसी लागलपेट के कहा.

लीना के अंदर छिपा हुआ राजनीतिज्ञ जोर मारने लगा. हरिनाक्षी से पहले आए जिला अधिकारियों की नाक में दम कर देने वाली लीना अपनी खादी वरदी का असर देख चुकी थी.

‘यह हरिनाक्षी की बच्ची किस खेत की मूली है?’ लीना ने सोचा.

‘‘देखिए, हरिनाक्षीजी, अब तक हम सिर्फ एक आम नागरिक की तरह आप से प्रार्थना कर रहे थे, लेकिन ऐसा लगता है कि अफसरी की वरदी ने आप के खून में कुछ ज्यादा ही उबाल ला दिया है,’’ लीना के तेवर अचानक ही बदल गए

हरिनाक्षी उत्तर देने को तत्पर हुई कि इस बीच कमलनाथ बोल पड़ा, ‘‘आप को शायद दौलत और ‘पहुंच’ की ताकत का अंदाज लगाने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ है,’’ कमलनाथ के बोलने का अंदाज शतप्रतिशत धमकी भरा था.

‘‘अब मालूम हुआ कि आप सब यहां केवल धमकी देने और अपनी ताकत का बखान करने आए हैं. खैर, मैं ने सुन लिया. अब मेरी भी एक बात ध्यान से सुन लीजिए कि राजनेता और पूंजीपति कभी मेरे प्रिय पात्रों में से नहीं रहे. इसलिए मुझे उन से न तो कभी दोस्ती निभाने की जरूरत पड़ी और न कभी डरने की जरूरत समझी. आप लोग जो भी कदम उठाना चाहें बडे़ शौक से उठा सकते हैं. अब आप लोग जा सकते हैं,’’ हरिनाक्षी ने गंभीरतापूर्वक कहा.

लीना के चेहरे का रंग उड़ गया. उसे अंदाजा नहीं था कि हरिनाक्षी उस के राजनीतिक रसूख की धज्जियां उड़ा कर रख देगी. वह पिटी हुई सूरत ले कर बाहर निकली. उधर कमलनाथ का चेहरा भी उतर गया था. बाहर निकलते ही लीना  पति व देवर को दिलासा देते हुए बोली, ‘‘तुम घबराओ मत. मैं इसे जब तक अपनी हैसियत और इस की औकात न बता दूंगी तब तक चैन से नहीं बैठूंगी.’’

इस के बाद लीना अपनी पार्टी के कई आला नेताओं से ले कर गृहमंत्री तक से मिली. आश्चर्यजनक था कि हर जगह उसे निराशा ही मिली.

चुनाव सामने आ रहे थे और कोई भी नेता इस समय किसी दलित अधिकारी को केवल किसी के कहने पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं था. सब को अपने दलित वोट बैंक का खाता खाली होने का डर सता रहा था.

लीना बुरी तरह निराश हो उठी. उसे अपने बुरे दिन नजदीक दिखाई देने लगे थे. वह अपने बंगले में बैठी आने वाले दिनों के बारे में सोच रही थी.

इधर हरिनाक्षी एक पत्रकार सम्मेलन को संबोधित कर रही थी.

‘‘मैडम, पुलिस और प्रशासन पर से जनता का विश्वास क्यों उठता जा रहा है?’’ एक बुजुर्ग पत्रकार ने पहला सवाल दागा.

‘‘दरअसल, लोगों को केवल अपनी पहुंच और पैसे पर भरोसा रह गया है और भरोसे का यह माध्यम हर वर्ग के लोगों पर अपनी पैठ कायम कर चुका है. कई बार यह महसूस कर काफी दुख होता है कि लोग पुलिस और कानून से बचना चाहते हैं. लोग सामने नहीं आते. इस में कोई दोराय नहीं कि ऐसी स्थिति के लिए हम भी कहीं न कहीं दोषी हैं. मैं पूरी कोशिश करूंगी कि लोगों का पुलिस और प्रशासन पर फिर से भरोसा कायम हो जाए,’’ हरिनाक्षी के स्वर में दृढ़ता थी.

‘‘इस शहर में महिलाएं भी खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं. छेड़खानी, बलात्कार जैसी घटनाएं आएदिन होती ही रहती हैं. अभी भी कई सारे अपराधी आरोपी होने के बावजूद खुलेआम घूम रहे हैं क्योंकि उन के पास खादी और खाकी दोनों की ताकत है. ऐसे अपराधियों के लिए प्रशासन क्या कदम उठाने जा रहा है?’’ यह एक महिला पत्रकार का सवाल था.

‘‘ऐसे सारे मामलों की फाइल दोबारा खोली जाएगी. मैं मीडिया को विश्वास दिलाती हूं कि अपराधी चाहे कितना भी रसूख वाला हो. उसे बख्शा नहीं जाएगा,’’ हरिनाक्षी ने जवाब दिया.

‘‘क्या आप खादी की ताकत से नहीं घबरातीं?’’ एक पत्रकार ने व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा.

‘‘बिलकुल नहीं,’’ हरिनाक्षी ने दो शब्दों में जवाब दिया.

‘‘क्या अनुष्का को न्याय मिलेगा, हरिनाक्षीजी?’’ एक गंभीर और उदास आवाज गूंजी. अपना नाम लिए जाने पर हरिनाक्षी चौंक उठी और उस पत्रकार की तरफ देखा. वह रवि था, जो अनुष्का से प्यार करता था.

अनुष्का ने रवि से उसे एकदो बार मिलाया था. रवि उन दिनों दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था जब अनुष्का के साथ वह दर्दनाक हादसा हुआ था.

‘‘रविजी, आप प्रशासन पर भरोसा रखें. आप के इस सवाल का जवाब बहुत जल्दी मिलेगा,’’ हरिनाक्षी ने गंभीरता से जवाब दिया.

‘‘मैं तो आप को देखते ही पहचान गया था. अब आप से उम्मीद लगा रहा हूं तो कुछ गलत तो नहीं कर रहा?’’ रवि ने पूछा.

‘‘नहीं. कतई नहीं,’’ हरिनाक्षी ने उत्तर दिया और पूछा, ‘‘अभी आप किस अखबार से जुडे़ हैं?’’

‘‘एक राष्ट्रीय अखबार ‘दैनिक प्रभात समाचार’ से जुड़ा हूं.’’

‘‘अनुष्का को आप अभी तक नहीं भूल पाए,’’ हरिनाक्षी ने जैसे रवि की दुखती रग पर हाथ रख दिया.

‘‘अनुष्का को मैं अपने मरने के बाद ही भूल पाऊंगा,’’ रवि का स्वर भीगा हुआ था.

‘‘क्षमा करें, मैं आप से व्यक्तिगत सवाल पूछ बैठी,’’ हरिनाक्षी अब धीरेधीरे औपचारिकता छोड़ रही थी.

‘‘आज आप को इस ओहदे पर देख कर मुझे कितनी खुशी हो रही है, आप अंदाजा नहीं लगा सकतीं,’’ रवि के स्वर में खुशी झलक रही थी. वह उठते हुए बोला, ‘‘आशा है, आप अनुष्का को इंसाफ जरूर दिलाएंगी.’’

‘‘हां, अनुष्का को भी और उस के पिता को भी. साथ ही शहर के उन सभी नागरिकों को जो चुप रहते हैं और शैतानों के डर से सामने नहीं आते.’’

उस के बाद हरिनाक्षी ने नंबर डायल करने शुरू किए.

दोचार दिनों के बाद शहर में जैसे एक हंगामा हुआ. नई जिलाधिकारी की चर्चा हर गलीचौराहों पर आम हो गई. स्थानीय अखबारों के साथसाथ राष्ट्रीय अखबारों में भी हरिनाक्षी सुर्खियों में छाने लगी. शहर के तमाम सफेदपोश परेशान हो उठे थे. उन के खाकी और खादी वरदी वाले दोस्त उन से दूरदूर रहने लगे थे.

पुरानी फाइलें खुल रही थीं. दोषियों को फौरन पकड़ा जा रहा था.

लीना भी बेहद परेशान थी. उसे ऐसा लग रहा था कि बस, पुलिस आज या कल उस के घर पर धावा बोलने ही वाली है. कमलनाथ और उन का बिगड़ा हुआ छोटा भाई निर्मलनाथ भी डरेडरे से रहते थे.

आज भी लीना अपने बंगले के लान में बैठी अखबार पलट रही थी. लगभग हर पन्ने में हरिनाक्षी का नाम पढ़ कर बुरी तरह चिढ़ रही थी.

उस ने सामने देखा तो घर का नौकर शंकर घबराया हुआ उन की तरफ दौड़ता आ रहा था.

‘‘मालकिन, पुलिस आई है. तिवारीजी आए हुए हैं,’’ शंकर की आवाज में अभी भी घबराहट थी.

इंस्पेक्टर तिवारी का नाम सुन कर लीना ने इत्मिनान की सांस ली, क्योंकि तिवारी तो उन का अपना आदमी था.

वह बरामदे में बैठे तिवारी के सामने पहुंची. उस के साथ 2-3 सिपाही भी बैठे थे.

‘‘क्या बात है, तिवारी?’’ लीला ने डरते हुए पूछा.

‘‘कमलबाबू और निर्मलबाबू के नाम से गिरफ्तारी वारंट है. शिवचरण ने इन दोनों के खिलाफ एफ.आई.आर. दर्ज कराई है. कलक्टर साहिबा ने फौरन काररवाई करने का आदेश दिया है,’’ इंस्पेक्टर तिवारी ने भरे हुए स्वर में कहा.

‘‘तो फिर?’’ लीना के माथे पर बल पड़ गए.

‘‘इन्हें गिरफ्तार करना ही होगा,’’ इंस्पेक्टर तिवारी का स्वर थोड़ा बदला.

‘‘ठीक है,’’ लीना ठंडी पड़ गई.

फरार होने के बजाय दोनों भाई कमलनाथ व निर्मलनाथ नीचे आ गए तो इंस्पेक्टर तिवारी ने उन्हें हथकडि़यां पहना दीं.

कुछ ही पलों के बाद दोनों भाइयों को पुलिस जीप में बैठा कर थाने ले जाया गया. लीना यह सब बेबसी से देखती रही.

अब तो अदालत के चक्कर काटने होंगे. गवाह भी खुल कर सामने आएंगे. दोनों भाइयों को सजा होनी  निश्चित थी.

लीना को कालिज का वह जमाना याद आ रहा था जब वह हरिनाक्षी जैसी लड़कियों का खुल कर मजाक उड़ाया करती थी. हरिनाक्षी पर तो फुर्सत निकाल कर फिकरे कसने का दौर वह शुरू करती थी.

दलितों को कमजोर समझना एक भयंकर भूल होगी. देश भर के दलित अगर ऊंचे पदों पर बैठ गए तो ऊंची जाति वालों का क्या होगा?

उधर हरिनाक्षी को भी कमलनाथ और निर्मलनाथ की गिरफ्तारी की खबर मिली. उस ने संतोष की सांस ली. अब जब तक वह शहर में है. ऐसे लोगों को उन की औकात याद दिलाती रहेगी जो कानून और पुलिस को अपनी जेब में ले कर चलने का दावा करते हैं. चाहे वह किसी भी समुदाय से संबंध रखते हों. ऐसे सफेदपोशों को वह उन की सही जगह पहुंचाती रहेगी.

लीना अगर समझती है कि उस ने प्रतिशोध लिया है तो वह गलत समझती है. हां, उसे यह एहसास जरूर होना चाहिए कि वक्त बदल रहा है. अनुष्का जैसी मासूम लड़कियों को इनसाफ मिलना ही चाहिए.

शिवचरण जैसे असहाय बुजुर्गों या किसी भी नागरिक को उस के घर से बेदखल करने का किसी भूमाफिया को अधिकार नहीं है.

कमलनाथ और निर्मलनाथ की गिरफ्तारी की खबर से रवि की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा.

उस ने तुरंत अपने मोबाइल पर संदेश लिखना शुरू किया.

‘‘इस शहर का चेहरा बदल रहा है और वक्त भी. अनुष्का और शिवचरण जैसे लोग सारे देश में फैले हुए हैं और इंसाफ की तलाश में भटक रहे हैं. उन्हें आप जैसे रहनुमा की खोज है.’’

हरिनाक्षी को यह संदेश मिला. वह सोच रही थी, ‘ऐसे लोग सामने आ रहे हैं. हमें आशावान होना चाहिए क्योंकि वक्त बदल रहा है.’ और यही संदेश उस ने अपने मोबाइल पर लिखना शुरू किया.

मैं 53 वर्षीय विवाहित व्यक्ति हूं. मुझे पोर्न देखने व हस्तमैथुन की लत लग गई है. क्या करूं.

सवाल
मैं 53 वर्षीय विवाहित व्यक्ति हूं. सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत हूं. मेरा स्थानांतरण ऐसे शहर में हुआ जहां कोई परिचित न होने के कारण मैं खुद को अकेला फील करता हूं. खाली समय में मोबाइल, इंटरनैट व टीवी पर बिताता हूं. मुझे पोर्न देखने व हस्तमैथुन की लत लग गई है. क्या करूं?

जवाब
पोर्न को बेवजह का हौआ न बनाएं क्योंकि जब इंसान अकेला होता है तो खुद की इच्छाओं को पूरा करने के लिए वह इन माध्यमों का सहारा लेता है और एक सीमा तक इन का प्रयोग बुराई भी नहीं है. जहां तक हस्तमैथुन का सवाल है, आप परेशान न हों क्योंकि यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि आप पार्टनर की कमी को पूरा करने के लिए ऐसा कर रहे हैं. संभव हो तो परिवार को अपने साथ ले आएं या फिर पत्नी से जल्दीजल्दी मिलते रहिए ताकि आप को पार्टनर की कमी महसूस न हो.

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अगर आप भी सबसे छिपकर देखते हैं पोर्न, तो ये खबर आपके लिए है

पोर्न फिल्म का जिक्र आते ही युवाओं का दिल मचलने लगता है और उन के चेहरे पर एक खुशी की लहर दौड़ जाती है. कुछ लोगों का मानना है कि पोर्न फिल्में देखने में कोई हर्ज नहीं है. यही वजह है कि युवाओं में पोर्न फिल्में देखने का चलन बहुत बढ़ गया है. उन्हें सैक्स के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती और जब वे इस तरह की मूवी देखते हैं तो उन्हें लगता है कि यही सैक्स है. लेकिन सच तो यह है कि पोर्न असली जिंदगी के सैक्स की तरह नहीं है और न ही यह सैक्स और अंतरंगता के बारे में जानने का सर्वोत्तम तरीका है बल्कि यह तो पैसा कमाने का एक जरिया है.

एक सीमा तक तो ठीक है, लेकिन जब पोर्न देखना आदत में शुमार हो जाता है तो इस से परेशानियां पैदा होने लगती हैं. इसलिए पोर्न देखना अच्छी बात नहीं है और अगर देखना भी है तो इस की एक लिमिट आप को खुद ही तय करनी होगी ताकि यह आप की पर्सनल लाइफ को प्रभावित न करने लगे. आइए, पोर्न के बारे में जानें कुछ जरूरी बातें :

पोर्न नशा कैसे है

पोर्न देखने की आदत जब इस हद तक बढ़ जाए कि उस से हमारी पर्सनल और प्रोफैशनल लाइफ प्रभावित होने लगे तो वह पोर्न का नशा बन जाता है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि पोर्न देखने वाला शौकीन व्यक्ति हर वक्त पोर्न देखने की फिराक में रहता है, उसे अकेलापन अच्छा लगने लगता है, वह कभी भी कहीं भी पोर्न देखने के मौके को छोड़ना नहीं चाहता और इसलिए धीरेधीरे दोस्तों से भी दूरी बना लेता है, क्योंकि ज्यादा टाइम उसे पोर्न देखने में बिताना होता है. पोर्न देखने के लिए वह बहाने बनाना भी शुरू कर देता है. इस तरह पोर्न एक ऐसा नशा है जो लत बन जाता है.

इस बारे में मनोचिकित्सक स्मिता देशपांडे का कहना है कि हमारे शरीर में डोपामाइन व सेरोटोनिन नामक हारमोंस होते हैं, जिन्हें ‘हैप्पीनैस हारमोंस’ भी कहा जाता है. इन्हीं हारमोंस की वजह से हमें कुछ भी करने में खुशी मिलती है. अमूमन जब हमें कुछ अच्छा लगता है या खुशी देता है तब 5-10 यूनिट हारमोंस रिलीज होते हैं. पोर्न के केस में यह रिऐक्शन अलग तरह से होता है. पोर्न देखते ही दिमाग को कुछ ऐसा मिलता है जो उस ने पहले अनुभव नहीं किया होता. ऐसा होने पर कई बार 1 हजार यूनिट तक डोपामाइन रिलीज होते हैं. डोपामाइन की यह तगड़ी लहर फीलगुड तो ले कर आती ही है साथ ही ऐसी प्यास भी जगा देती है जिस का कोई अंत नहीं. यही पोर्न के नशे का कारण बनता है.

पोर्न के पीछे इंसान ऐसे चल पड़ता है जैसे सूखे रेगिस्तान में पानी मिलने की आस में प्यासा व्यक्ति कोसों चलता है. लेकिन हर पोर्न देखने वाले का नजरिया अलग होता है जैसे कि कुछ को शराब से ही नशा हो जाता है तो कुछ को उस के साथ ड्रग्स ले कर. इसी तरह कुछ को पोर्न तसवीरें देखने में मजा आता है तो कुछ को पोर्न फिल्में और कुछ को वाइल्ड सैक्स देखने में. इस तरह यह नशा एक तरफ तो फीलगुड का ऊंचा लैवल सैट कर देता है और दूसरी तरफ उस हिस्से को भी ऐक्टिव कर देता है जिस में कुछ और नया देखने और ज्यादा आनंद लेने की इच्छा जाग्रत होती है. इस तरह पोर्न देखने का शौकीन न तो इस के बिना रह पाता है और न ही जल्दी से इस से संतुष्ट हो पाता है. इस का नतीजा होता है कि इस से व्यक्ति मानसिक रूप से पंगु हो जाता है और उस की सोचने की शक्ति भी कम हो जाती है. वहीं उस के दिमाग में बस, पोर्न ही घूमता रहता है. इस से उस का स्वास्थ्य भी खराब होता है.

पोर्न के शौकीन हैं तो इन बातों का रखें खयाल :

पोर्न का शौक इंसान के मन में कामुक विचार पैदा करता है. सैक्स के विचार युवाओं से ले कर हर वर्ग के व्यक्ति को गंदी फिल्में, गंदी कहानियां पढ़ने को मजबूर करते हैं. वैसे भी युवावस्था ऐसी उम्र है जिस में युवा सैक्स के बारे में सोचे बिना रह नहीं सकते. अब बात करें व्यक्ति के टेस्ट की तो हर व्यक्ति का टेस्ट सैक्स के बारे में अलगअलग होता है. इस टेस्ट को और भी मजेदार बनाते हैं पोर्न स्टार्स.

हिस्ट्री करें डिलीट

इंटरनैट से उस साइट की हिस्ट्री क्लीन कर दीजिए जहां पर आप ने पोर्न देखा है ताकि अगर कोई आप के कंप्यूटर का इस्तेमाल करे तो वह यह न देख पाए कि आप ने कौन सी साइट देखी है. आप ऐसा ‘इन प्राइवेट ब्राउजिंग’ पर जा कर कर सकते हैं, जोकि इंटरनैट ऐक्सप्लोरर और फायरफौक्स दोनों पर आप को मिलेगी. लेकिन अगर कोई फाइल आप ने डाउनलोड की है तो वह कंप्यूटर पर रहेगी. इसलिए जो फाइल आप ने डाउनलोड की है उसे खोलने के लिए पासवर्ड का इस्तेमाल करें, ताकि कोई और यह फाइल न खोल पाए और आप को किसी के सामने शर्मिंदा भी न होना पड़े.

प्रतिबंधित साइट्स न देखें

भारत सरकार और टैलीकौम डिपार्टमैंट ने कुछ पोर्नोग्राफी साइट्स पर प्रतिबंध लगाने की काफी कोशिश की है, क्योंकि पोर्न फिल्में बनाना गैरकानूनी है. इसलिए ध्यान रखें कि प्रतिबंधित साइट्स न देखें. साथ ही बच्चों के साथ जिन साइट्स पर शारीरिक शोषण होते हुए दिखाया जाता है उन्हें भी देखने की कोशिश न करें.

पोर्न रियल लाइफ नहीं है

अधिकतर पोर्न फिल्में काल्पनिक दुनिया को दर्शाती हैं, जोकि असल जिंदगी में नहीं होती. असल जिंदगी में लोग वैसे नहीं दिखते जैसे पोर्न फिल्मों में दिखाया जाता है और न ही वैसी हरकतें करते हैं जैसी उन में दिखाई जाती हैं. इसलिए पोर्न देख कर अपनी रियल लाइफ में अपने साथी से या अपने सैक्स अनुभवों से पोर्न फिल्मों जैसी अपेक्षा रखना सही नहीं है. इसलिए रियल लाइफ में पोर्न स्टार बनने की कोशिश मत कीजिए.

पोर्न देखने से पहले फेसबुक लौगआउट कर दें

अगर आप फेसबुक पर लौगइन करते हुए किसी एडल्ट साइट पर जाते हैं तो संभव है कि आप को टै्रक किया जा रहा हो. यह आशंका तब ज्यादा होती है जब उस पोर्न साइट पर फेसबुक का प्लगइन हो. ऐसा इसलिए कि फेसबुक यह ट्रैक करता है कि आप कौन सी वैबसाइट सर्फ कर रहे हैं. इस तरह से जुटाई गई जानकारी की मदद से बाद में ट्रैक करने वाला आप की पसंद के हिसाब से विज्ञापन दिखाना शुरू कर देता है और आप परेशान होते रहते हैं कि इस तरह की पोस्ट या विज्ञापन आप के फेसबुक पर अचानक कैसे आने लगे.

स्मार्टफोन पर पोर्न देखने पर है खतरा

आजकल इंटरनैट पर काफी सारे ऐसे फ्री ऐप्स मिलते हैं जो फ्री पोर्न वीडियोज देखने की सुविधा प्रदान करते हैं. ये ऐप्स एंड्रौएड फोन में बड़ी आसानी से इंस्टौल हो जाते हैं. इन ऐप्स के जरिए लोग अपने मनपसंद पोर्न वीडियोज सर्च करते हैं. आप के स्मार्टफोन के लिए सब से बड़ा खतरा यही पोर्न ऐप्स हैं. जब आप इन ऐप्स के जरिए फ्री पोर्न देख रहे होते हैं तो उसी वक्त ये ऐप्स आप के स्मार्टफोन में स्टोर किए गए आप के ईमेल, बैंक अकाउंट डिटेल्स, जरूरी पासवर्ड और दूसरी जानकारी को हैकर्स के पास भेज रहे होते हैं. ये सारा डाटा चोरीछिपे ट्रांसफर भी हो जाता है और आप को पता भी नहीं चलता. इस से आप को बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है इसलिए ऐसे फ्री ऐप्स के लालच में न आएं.

पोर्न में मिथ ज्यादा वास्तविकता कम

पोर्न द्वारा यह भ्रम पैदा किया जाता है कि प्रेम, सैक्स और आत्मीयता सब एक ही चीज हैं. पोर्न यह भी सिखाता है कि किसी अनजान व्यक्ति से सैक्स किया जा सकता है, क्योंकि पोर्न में जिस से कामुक संबंध बनते हैं वह अकसर अपरिचित ही होता है. पोर्न यह भी संदेश देता है कि सैक्स में संतुष्टि मिलना ही महत्त्वपूर्ण है चाहे वह किसी के भी शरीर से मिले. पोर्न यह भी मिथ बनाता है कि सैक्स किसी से भी और कहीं भी किया जा सकता है, लेकिन सचाई का इस से कोई लेनादेना नहीं है. कम उम्र के युवा सैक्स के अधकचरे ज्ञान के कारण इसे ही सही मान लेते हैं और गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं जिस कारण उन्हें बाद में पछताना पड़ता है.

–       पोर्न साइट्स पर युवतियों की बहुत खराब छवि को प्रस्तुत किया जाता है. वहां युवतियां सैक्स करने के एक खिलौने की तरह होती हैं जिसे पैसे खर्च कर कोई भी खरीद सकता है और खरीदने के बाद सैक्स करना अपना अधिकार मानता है. इस में दिल और भावनाओं को पूरी तरह नकारा जाता है जबकि यह गलत है.

–       पोर्न में आमतौर पर युवतियों के बारे में गंदी और घटिया भाषा का प्रयोग किया जाता है. पोर्न के जरिए यह भी बताया जाता है कि छोटे बच्चों के साथ भी सैक्स किया जा सकता है. पिता को बेटी के साथ, मां को बेटे के साथ, भाई को बहन के साथ और इंसान को पशु के साथ सैक्स करते हुए दिखाया जाता है, जोकि पूरी तरह अमानवीय है.

बुरा है पोर्नोग्राफी वैबसाइट्स का चसका

इंटरनैशनल सिक्योरिटी सिस्टम लैब के कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ डा. गिलबर्ट वोंडरेसेक ने अपनी टीम के साथ किए एक परीक्षण में पाया कि ज्यादातर लोग पोर्न साइट्स के चक्कर में फंस जाते हैं. इस नए अध्ययन से पता चला है कि पोर्न साइट्स की सैर करने वाले लोग साइबर अपराधियों के जाल में फंस रहे हैं. डा. वोंडरेसेक के अध्ययन के तहत 2,69,000 वैबसाइट्स का विश्लेषण किया गया. इस से पता चला है कि करीब 3.23त्न साइट्स पर प्रयोक्ताओं की गोपनीय जानकारी इकट्ठा करने वाली स्क्रिप्ट रखी हुई थी.

सेहत पर भी बुरा असर

जब युवा एक बार पोर्न देखना शुरू करते हैं तो उन्हें इस के लिए एकांत की तलाश होती है और इस के लिए रात का समय सब से अच्छा रहता है इसलिए रात भर जाग कर पोर्न फिल्में देखते हैं और सुबह फिर डेली रूटीन के काम में लग जाते हैं. इस कारण नींद पूरी नहीं होती और सेहत बिगड़ने लगती है.

–       पोर्न देखने के बाद लोग कुछ ऐसा करना चाहते हैं जो उन के स्वभाव और प्राकृतिक तौर पर उन के दिमाग का हिस्सा नहीं है. चाहे वह जानवरों के साथ, कई लोगों के साथ हो या फिर कष्टकारी सैक्स ही क्यों न हो, वे सब ट्राई करना चाहते हैं.

–       युवा अपना काफी पैसा पोर्न फिल्में देखने में बरबाद करते हैं जिस से उन्हें आर्थिक रूप से परेशानी होती है.

–       कई बार वर्तमान पार्टनर विजुअल इमेज वाली तसवीर से मेल नहीं खाता, जिस से सैक्स इच्छा घटने लगती है क्योंकि वह साथी से कुछ ऐक्स्ट्रा की उम्मीद करने लगता है.

बनाएं अपने ट्विटर अकाउंट को सुरक्षित

ट्विटर सोशल नेटवर्किंग के मामले में काफी लोकप्रिय है. यह आपको 280 शब्दों की सीमा में अपने विचार रखने की आजादी देता है. बता दें कि 2017 से पहले ट्विटर पर केवल 140 शब्दों की सीमा थी लेकिन 2017 के बाद कोरियाई, चीनी और जापानी भाषा को छोड़कर ट्विटर ने सभी भाषाओं के लिए शब्दों की सीमा को दोगुना कर दिया.

कुछ समय पहले ट्विटर के करोड़ों यूजर्स के पासवर्ड लीक होने की खबरें आई थी लेकिन ट्विटर ने कहा था कि इस डेटा का अभी तक कोई गलत इस्तेमाल नहीं हुआ है. लेकिन भविष्य में अगर ऐसा हुआ और इसका गलत इस्तेमाल हुआ तो आप भी मुश्किल में पड़ सकते हैं इसलिए अगर आप ट्विटर पर अपनी निजी जानकारी को गोपनीय रखना चाहते हैं तो आपको अपने अकाउंट को जितनी जल्दी हो सके ज्यादा सुरक्षित करना होगा. यहां हम आपको अपने ट्विटर अकाउंट को सुरक्षित करने के तरीकों के बारे में बता रहे हैं.

अपने पासवर्ड को नियमित अंतराल पर बदलें

अपने पासवर्ड को नियमित अंतराल पर बदलना आपके अकाउंट को हैकर्स के लिए हैक करना और मुश्किल कर देगा. ऐसे बदले अपना ट्विटर पासवर्ड-

अगर आप ट्विटर वेब पर इस्तेमाल कर रहे हैं तो पहले ट्विटर डौट कौम पर जाएं

– अपनी प्रोफाइल इमेज पर क्लिक करें

– सैटिंग और प्राइवेसी के विकल्प को चुनें जब वेबपेज लोड हो रहा हो तो नीचे बाईं ओर दिए गए पासवर्ड विकल्पों में से अपना पासवर्ड चुनें.

– ट्विटर पहले आपका पुराना पासवर्ड मांगेगा इसके बाद आपसे नया पासवर्ड डालने के लिए कहेगा.

– पासवर्ड कठिन और अलग तरह का डालें.

अगर आप ट्विटर ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इन चरणों का पालन करें.

– ऐप को खोलें और ऊपर दाईं ओर अपनी प्रोफाइल फोटो पर क्लिक करें.

– सैटिंग और प्राइवेसी के विकल्प को चुनें.

  1. इसके बाद अकाउंट को चुनें और चेंज पासवर्ड के विकल्प को चुनें.

– यह सुनिश्चित करें कि आपका पासवर्ड एकदम यूनिक हो और किसी के लिए भी इसे जानना आसान न हो

टू स्टेप औथेंटिकेशन

अगर आप अपनी प्रोफाइन को ज्यादा सुरक्षित बनाना चाहते हैं तो टू स्टेप औथेंटिकेशन का विकल्प आजमाएं. इसमें पासवर्ड डालने के बाद आपके रजिस्टर्ड मोबाइल पर 6 अंकों का औथेंटिकेशन कोड आएगा जिसे डालने के बाद ही अकाउंट खुलेगा.

– अपने प्रोफाइल आइकौन पर क्लिक करें और सैटिंग और प्राइवेसी के विकल्प को चुनें.

– अकाउंट चुनने के बाद लॉगिन वेरीफिकेशन सेट करें. अगर मोबाइल पर औथेंटिकेशन कोड सैट कर रहे हैं तो

– आपको यहां एक और चरण को पूरा करना होगा. इसमें आपको सैटिंग के अंदर सिक्योरिटी के विकल्प पर जाना होगा.

– ओवरव्यू इंस्ट्रक्शंस को पढ़ें और स्टार्ट पर क्लिक करें.

– पासवर्ड डालें और वेरीफाई पर क्लिक करें.

– अपने मोबाइल नंबर को डालने के लिए सेंड कोड पर क्लिक करें.

– आपके मोबाइल पर भेजे वेरीफीकेशन कोड को डालें और सबमिट बटन पर क्लिक करें. इसके बाद आपका लॉगिन वेरीफिकेशन शुरू हो जाएगा.

चोटिल होने के बावजूद दिव्या काकरान ने एशियन गेम्स में जीता ब्रौन्ज

अपने पहले ही एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली भारत की महिला पहलवान दिव्या काकरान के पिता अपनी बेटी की सफलता से बेहद खुश हैं. उन्होंने बेटी के पदक जीतने के बाद कहा है कि उनकी बेटी ने चोटिल होने के बावजूद पदक जीता है. दिव्या ने कांस्य पदक के मैच में चीनी ताइपे की चेन वेनलिंग को 10-0 से तकनीकी दक्षता के आधार पर मुकाबला जीत अपने पहले ही एशियाई खेलों में पदक जीता. दिव्या को मंगोलिया की पहलवान तुमेनटसेटसेग शारखु ने क्वार्टर फाइनल में 11-1 से मात दी थी.

क्वार्टर फाइनल में हार के बाद दिव्या का स्वर्ण जीतने का सपना टूट गया था, लेकिन उन्हें कांस्य पदक का मैच खेलने का मौका मिला जहां उन्होंने बाजी मारी. दिव्या ने इस मौके को पूरी तरह से भुनाया और भारत की झोली में पदक डाला. दिव्या के पदक जीतने के कुछ देर बाद उनके पिता सूरज पहलवान ने आईएएनएस से फोन पर कहा, “बहुत खुश हैं. जूनियर एशियन चैम्पियनशिप में भी दिव्या ने पदक जीता था. उससे पहले राष्ट्रमंडल खेलों में भी दिव्या पदक जीत कर आई थी और अब एशियाई खेलों में भी उसने पदक जीत लिया. हमें तो खुशी ही खुशी दे रहा है भगवान.”

सूरज ने कहा कि दिव्या से एक दिन पहले बात हुई थी उसने कहा था कि उसे चोट की परवाह नहीं है. उसके दिमाग में था कि यह खेल चार साल में एक बार आते हैं इसलिए वह इसका पूरा फायदा उठाना चाहती थी. सूरज ने कहा, “असल में उसे चोट भी लगी थी इसलिए हमें चिंता भी हो रही थी कि पता नहीं क्या होगा. उसके बाद सुशील कुमार और साक्षी मलिक जैसे खिलाड़ी हार गए थे तो हमें लगा पता नहीं क्या होगा. दिव्या बचपन में लड़कों के साथ दंगल किया करती थी. लड़की होने की वजह से जीतने पर दिव्या को ज्यादा पैसे मिला करते थे, जिससे उनका परिवार का गुजारा भी हो जाता.

हालांकि, दिव्या ने कहा था कि पापा मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगी. उसे चोट भी लगी थी, लेकिन फिर भी मैच खेला कह रही थी कि चार साल में एक बार मौका मिलता है जैसा भी होगा खेलूंगी. इलाज तो मैं कराती रहूंगी.”

बता दें कि दिव्या ने इसी साल औस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में आयोजित किए गए राष्ट्रमंडल खेलों में भी कांस्य पदक पर कब्जा जमाया था. दिव्या ने इसी साल भारत केसरी दंगल में दिग्गज पहलवान गीता फोगाट को मात दी थी.

कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट में निवेश करने से पहले जान लें ये बातें

निवेशकों के पैसे को सुरक्षित रखने के साथ-साथ पहले से तय किए गए दर पर रिटर्न देने के कारण बैंक एफडी एक पौप्युलर इन्वेस्टमेंट च्वाइस बन गया है. कई निवेशक अपने इन्वेस्टमेंट प्लान के एक हिस्से के रूप में बैंक एफडी (फिक्स्ड डिपौजिट) में निवेश करते हैं. कंपनी फिक्स्ड डिपौजिट या कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट भी उसी निवेश सिद्धांत पर काम करते हैं जिस सिद्धांत पर बैंक एफडी में अपनाए जाते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आपके पैसे को एक बैंक के बजाय एक कंपनी को उधार में दिया जाता है और इस पर आपको बैंक से थोड़ा ज्यादा इंट्रेस्ट भी मिल सकता है.

क्या है कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट?

कंपनियों को बिजनस से जुड़े अलग-अलग जरूरतों के लिए पैसों की जरूरत पड़ती है. वे बैंकों, इक्विटी इन्वेस्टरों या फिक्स्ड डिपौजिट के रूप में पब्लिक से पैसे मांग सकती हैं. भारतीय रिजर्व बैंक इन कंपनियों को कौर्पोरेट एफडी के माध्यम से पैसे जुटाने की अनुमति देता है. अलग-अलग कंपनियों और अलग-अलग इन्वेस्टमेंट पीरियड के आधार पर इंट्रेस्ट रेट भी अलग-अलग होता है. आम तौर पर लंबे समय के लिए ज्यादा ब्याज दर होता है.

कितना सुरक्षित है कौर्पोरेट एफडी?

डिपौजिट इंश्योरेंस और क्रेडिट गारंटी को-औपरेशन हर बैंक में 1 लाख रुपये तक आपके बैंक डिपौजिट को सुरक्षित करता है. लेकिन कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट पर इस तरह का कोई प्रोटेक्शन नहीं रहता है. इसका मतलब यह नहीं है कि आपका इन्वेस्टमेंट जोखिम भरा है. फिर भी आपको किसी कंपनी के कौर्पोरेट एफडी में पैसे इन्वेस्ट करने से पहले उस कंपनी की क्रेडिट रेटिंग जरूर देख लेनी चाहिए. अच्छी क्रेडिट रेटिंग वाली कंपनी पर आप सबसे ज्यादा यकीन कर सकते हैं कि वह आपका पैसा और उसका इंट्रेस्ट आपको समय पर लौटा देगी.

ब्याज दर

एक असुरक्षित लोन होने के कारण जहां कौर्पोरेट या कंपनियां आपके निवेश के बदले में कोई ऐसेट या सिक्यौरिटी नहीं देती हैं, इसलिए वे आपको ज्यादा इंट्रेस्ट रेट देती हैं. कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट के इंट्रेस्ट रेट बैंक फिक्स्ड डिपौजिट से थोड़े ज्यादा होते हैं. कौर्पोरेट एफडी में इन्वेस्ट करने पर सीनियर सिटीजंस को अपने इन्वेस्टमेंट पर 0.50% एक्स्ट्रा इंट्रेस्ट मिल सकता है.

किसी कंपनी में निवेश करना चाहिए?

आईसीआरए (ICRA), केयर (CARE), क्रिसिल (CRISIL) इत्यादि सहित कई रेटिंग एजेंसियां तरह-तरह के रिस्क पैरामीटरों के आधार पर कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट को रेटिंग प्रदान करती हैं. इन क्रेडिट रेटिंग को AAA, AA, AA+, B, C इत्यादि जैसे अक्षरों के माध्यम से दिखाया जाता है. AAA सबसे अच्छी सेफ्टी रेटिंग है जिसके बाद AA, A और क्रिसिल बीबीबी (CRISIL BBB) का नंबर आता है. सबसे खराब रेटिंग है- क्रिसिलएल डी (CRISISL D) जो डिफॉल्ट या चूक की अधिक संभावना का संकेत देती है. यह रेटिंग जितनी ज्यादा या अच्छी होती है आपका पैसा उतना ज्यादा सुरक्षित रहता है. रेटिंग जितनी खराब या कम होती है, आपका इन्वेस्टमेंट उतना ज्यादा रिस्की होता है.

कौर्पोरेट एफडी को RBI रेग्युलेट करता है?

बैंकिंग रेग्युलेशन ऐक्ट, 1949 में कवर होनेवाला बैंक फिक्स्ड डिपौजिट आरबीआई के रेग्युलेशन के तहत आता है जबकि कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट को सिर्फ कंपनीज ऐक्ट 1956 के सेक्शन 58-A के अनुसार कंट्रोल किया जाता है.

कौर्पोरेट एफडी पर टैक्स बेनिफिट भी मिलता है?

कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट में इन्वेस्ट करने पर कोई टैक्स बेनिफिट नहीं मिलता है. इस पर मिलने वाले इंट्रेस्ट को आपके टोटल टैक्सेबल इनकम में जोड़ दिया जाता है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार उस पर टैक्स लिया जाता है. इस तरह आप देख सकते हैं कि सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले 30% के सबसे ऊंचे टैक्स ब्रैकिट में आने वाले इन्वेस्टरों के लिए कौर्पोरेट फिक्स्ड डिपौजिट में इन्वेस्ट करना फायदेमंद नहीं भी हो सकता है.

ध्यान देने लायक बातें

रिस्क या खतरा जितना ज्यादा होता है, रिवार्ड या लाभ भी उतना ज्यादा मिलता है. इसलिए यदि आप अपनी फाइनैंशल प्लानिंग के अनुसार एक कौर्पोरेट एफडी में इन्वेस्ट करने का एक्स्ट्रा रिस्क ले सकते हैं तो आपको अपने इन्वेस्टमेंट को सुरक्षित बनाने के लिए निम्नलिखित काम करने चाहिए:

  • ज्यादा क्रेडिट रेटिंग वाली कंपनियों के कौर्पोरेट एफडी में इन्वेस्ट करें.
  • सार्वजनिक रूप से ट्रेड करने वाली कंपनियों में इन्वेस्ट करने से आपको उनके फाइनैंशल हेल्थ का पता लगाने में मदद मिलती है.
  • बहुत ज्यादा या हैरान कर देने वाले इंट्रेस्ट रेट औफर के जाल में न फंसें और सही या सच्चे इंट्रेस्ट रेट औफर करने वाली कंपनियों के कौर्पोरेट एफडी में इन्वेस्ट करें.
  • अच्छी तरह देख लें कि कंपनी की बैलेंस शीट में पिछले 2-3 साल का मुनाफा दिखाई दे रहा हो.

सलमान ने 5 दिन बाद जताया अटल के निधन पर शोक, हुए ट्रोल

बौलीवुड के दबंग खान यानी सलमान खान इन दिनों अपनी बहुचर्चित फिल्म ‘भारत’ की शूटिंग में काफी व्यस्त हैं. इस फिल्म की शूटिंग माल्टा में चल रही है. इस बीच सलमान ने सोशल मीडिया में कुछ ऐसा कर दिया है जिसकी वजह से उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाने लगा.

गौरतलब है कि दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी का 16 अगस्त, 2018 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था. उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई थी. क्या नेता और क्या अभिनेता, वाजपेयी के निधन से हर कोई गमजदा था. बौलीवुड के कई सितारों ने भी सोशल मीडिया पर अपना दुख जताया था. वाजपेयी के निधन का शोक सुपरस्टार सलमान खान ने भी सोशल मीडिया पर जताया लेकिन उन्होंने जरा देर कर दी. फिर क्या, सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें इस बात के लिए ट्रोल कर दिया.

सलमान खान ने मंगलवार को एक ट्वीट किया और लिखा, ‘बहुत दुख की बात है कि हमने अटल जी जैसा महान नेता, वक्ता, और असाधारण व्यक्ति खो दिया है.’

इतना ही नहीं, एक यूजर ने तो सलमान के इस ट्वीट में उनके देर होने के अलावा भी एक गलती पकड़ी और उसे सुधारा. क्या आपने नोटिस की सलमान की यह गलती?

किसान के बेटे ने अपने पहले एशियाई खेल में जीता स्वर्ण

सोलह बरस के सौरभ चौधरी 10 मीटर एयर पिस्टल में विश्व और ओलंपिक चैम्पियनों को पछाड़ते हुए पीला तमगा जीतने के साथ ही एशियाई खेलों के इतिहास में स्वर्ण जीतने वाले भारत के पांचवें निशानेबाज बन गए.

पहली बार सीनियर स्तर पर खेल रहे चौधरी ने बेहद परिपक्वता और संयम का परिचय देते हुए 2010 के विश्व चैम्पियन तोमोयुकी मत्सुदा को 24 शाट के फाइनल में हराया.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदार्पण कर रहे भारत के अभिषेक वर्मा ने 219.3 के स्कोर के साथ कांस्य पदक जीता.

मेरठ के कलिना गांव में एक किसान के बेटे चौधरी ने 240.7 का स्कोर किया. वहीं जापान के 42 बरस के मत्सुदा ने 239.7 का स्कोर करके रजत पदक जीता. उन्होंने 23वें शाट पर 8.9 स्कोर किया जबकि चौधरी ने खेलों का रिकार्ड बनाते हुए आखिरी दो शाट में 10.2 और 10.4 स्कोर किया.

चौधरी ने कुछ महीने पहले जर्मनी में जूनियर विश्व कप में रिकार्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता था. एशियाई खेलों में उनसे पहले जसपाल राणा, रणधीर सिंह, जीतू राय और रंजन सोढी स्वर्ण जीत चुके हैं.

तीन साल पहले निशानेबाजी में उतरे चौधरी ने कहा,‘‘ मुझे कोई दबाव महसूस नहीं हुआ.’’

क्वालीफिकेशन में भी उन्हें दबाव महसूस नहीं हुआ था और उन्होंने 586 स्कोर किया था. ओलंपिक और विश्व चैम्पियन कोरिया के जिन जिंगोह दूसरे और वर्मा छठे स्थान पर रहे थे.

11वीं के छात्र चौधरी ने बागपत के पास बेनोली में अमित शेरोन अकादमी में निशानेबाजी के गुर सीखे.घर पर वह अपने पिता की खेती बाड़ी में मदद करते हैं. उन्होंने कहा,‘‘ मुझे खेती पसंद है. हमें अभ्यास से ज्यादा छुट्टी नहीं मिलती लेकिन जब भी मैं गांव जाता हूं तो अपने पिता की मदद करता हूं.’’

रोहतक के वर्मा ने भी तीन साल पहले ही निशानेबाजी शुरू की. उन्होंने कहा,‘‘ शुरुआत में मैं नर्वस था लेकिन फिर संयम रखकर खेला. यह मेरा पहला अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट है और पदक जीतकर अच्छा लग रहा है.’’

पांचवीं सीरिज में उन्होंने 10.7 का स्कोर करके खुद को पदक की दौड़ में बनाये रखा. इससे पहले वह मनु भाकर के साथ मिश्रित टीम स्पर्धा में फाइनल के लिये क्वालीफाई नहीं कर सके थे.

उन्होंने कहा,‘‘मनु और मैं मिश्रित टीम फाइनल के लिये क्वालीफाई नहीं कर सके थे लेकिन हम निराश नहीं थे. हमने उससे काफी कुछ सीखा.’’

खाद्य पदार्थों में फैट, नमक, चीनी की मात्रा कम करेंगी 15 कंपनियां

मिलावट हमारे बाजारतंत्र का अभिन्न हिस्सा बन गई है. खाद्य पदार्थों में खतरनाक रसायनों की मिलावट की जा रही है. घूस और रिश्वत के सामने ईमानदारी और लोगों के स्वास्थ्य की चिंता घुटने टेक रही है. सब्जियों और फलों को खतरनाक कैमिकलों से धो कर उन को पकाया व चमकाया जा रहा है.

दालों, तेल आदि में मिलावट की खबरें आम हो चुकी हैं. त्योहारी सीजन पर मिलावटी मावा बरामद किए जाने की खबरें आती हैं. देशी घी में मिलावट की खबरें पुरानी पड़ चुकी हैं. जब मिलावट होती है, खबरें आती हैं तो सामान्य सी खबर सोच कर उस पर कोई खास ध्यान नहीं देता है. दूध रोज के इस्तेमाल की वस्तु है, लेकिन उस में तरहतरह की मिलावट की जाती है.

ऐसा नहीं है कि इन सब पर नियंत्रण की हमारे यहां व्यवस्था नहीं है. कागजी कार्यवाही को दुरुस्त रखने की कला हमारे बाबुओं से ज्यादा किसी को नहीं आती. नियामक प्राधिकरण भी हैं, लेकिन वहां भी कागज एकदम दुरुस्त मिलते हैं.

खाद्य वस्तुओं पर सुरक्षा नियामक है जो नियम बनाता है और उसे लागू करता है. उस के लिए खाद्य सुरक्षा एवं स्टैंडर्ड अथौरिटी औफ इंडिया (एफएसएसएआई) है. हाल ही में इस संगठन ने हिंदुस्तान यूनिलीवर, नेस्ले, एमटीआर, ब्रिटानिया, पतंजलि, आईटीसी सहित 15 कंपनियों से अपने खाद्य उत्पाद में चीनी, नमक तथा फैट की मात्रा घटाने को कहा है. सभी संस्थान नियामक की सलाह से सहमत हैं और आने वाले वक्त में इसे पैकेट के बाहर लिख भी देंगे, क्योंकि खाद्य पदार्थ के पैकेट पर मिश्रण की मात्रा लिखना अनिवार्य है.

यह कदम अच्छा है, साथ ही, मिलावट की जांच या शिकायत के लिए उपभोक्ता कहां जाएं, इस की जानकारी भी पैकेट पर होनी चाहिए. पैकेट पर शिकायत करने के लिए नंबर होना चाहिए जहां आसानी से उपभोक्ता शिकायत दर्ज करा सके.

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