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भारत ने हांगकांग को 26-0 से हरा 86 साल पुराना रिकार्ड तोड़ा

भारतीय पुरुष हाकी टीम ने एशियाई खेलों के पूल बी मैच में हांगकांग को 26-0 से रौंदकर 86 साल पुराना रिकार्ड तोड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय हाकी में अपनी सबसे बड़ी जीत दर्ज की. दोनों टीमों के बीच की गहरी खाई साफ नजर आ रही थी. गत चैंपियन भारत ने 1932 के अपने रिकार्ड में सुधार किया जब महान खिलाड़ी ध्यानचंद, रूपचंद और गुरमीत सिंह की मौजूदगी में राष्ट्रीय टीम ने लास एंजिलिस ओलंपिक में अमेरिका को 24-1 से हराया था.

अंतरराष्ट्रीय हाकी में सबसे बड़ी जीत का रिकार्ड न्यूजीलैंड के नाम दर्ज है जिसने 1994 में समोआ को 36-1 से हराया था. भारत के दबदबे का अंदाजा इस बाद से लगाया जा सकता है कि जब मैच खत्म होने के सात मिनट बचे थे तब टीम ने गोलकीपर को मैदान से हटा लिया.

मैच में भारत के 13 खिलाड़ियों ने गोल किए. भारत की ओर से रूपिंदरपाल सिंह (तीसरे, पांचवें, 30वें, 45वें और 59वें मिनट), हरमनप्रीत सिंह (29वें, 52वें, 53वें, 54वें मिनट) और आकाशदीप सिंह (दूसरे, 32वें, 35वें मिनट) ने हैट्रिक बनाई.

मनप्रीत सिंह (तीसरे, 17वें मिनट), ललित उपाध्याय (17वें, 19वें मिनट), वरूण कुमार (23वें और 30वें मिनट) ने दो-दो जबकि एसवी सुनील (सातवें मिनट), विवेक सागर प्रसाद (14वें मिनट), मनदीप सिंह (21वें मिनट), अमित रोहिदास (27वें मिनट), दिलप्रीत सिंह (48वें मिनट), चिंगलेनसाना सिंह (51वें मिनट), सिमरनजीत सिंह (53वें मिनट) और सुरेंदर कुमार (55वें मिनट) ने एक-एक गोल किए.

दुनिया की पांचवें नंबर की टीम भारत और 45वें नंबर की टीम हांगकांग के बीच इस मुकाबले के पहले से ही एकतरफा होने की उम्मीद की जा रही थी. भारत के मुख्य कोच हरेंद्र सिंह अपने खिलाड़ियों के लिए खुश हैं और कहा कि वे अब विरासत का हिस्सा हैं जिन्हें भारतीय हाकी के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा.

हरेंद्र ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘मेरे लिए यह मायने नहीं रखता लेकिन खिलाड़ियों के लिए यह गौरवपूर्ण लम्हा है. जब हतिहास पर चर्चा होगी तो इन 18 खिलाड़ियों का नाम वहां होगा. रिकार्ड हमेशा खिलाड़ियों के लिए होते हैं.’’

भारत ने तेज शुरुआत की और पहले पांच मिनट में ही चार गोल दाग दिए. पहले क्वार्टर के बाद भारतीय टीम 6-0 से आगे थी जब मध्यांतर तक उसकी बढ़त 14-0 हो गई. इससे पूर्व भारत ने अपने पहले पूल मैच में मेजबान इंडोनेशिया को भी 17-0 से हराया था.

लगभग पूरा खेल हांगकांग के हाफ में खेला गया और भारतीय कप्तान और गोलकीपर पीआर श्रीजेश को पूरे मैच के दौरान कोई चुनौती नहीं मिली. हांगकांग के गोलकीपर माइकल चुंग अगर तीसरे क्वार्टर में कुछ अच्छे बचाव नहीं करते तो भारत की जीत का अंतर और अधिक होता. श्रीजेश ने पहले हाफ जबकि कृष्ण बहादुर पाठक ने दूसरे हाफ में गोलकीपिंग की जिम्मेदारी संभाली.

भारत अगले मैच में शुक्रवार को जापान से भिड़ेगा.

लाई-फाई : अब एक सेकेंड में डाउनलोड होगी फिल्म

इंटरनेट से फिल्म डाउनलोड करने के शौकान लोगों के लिए एक बढ़िया खबर है. अब एक फिल्म डाउनलोड करने के लिए आपको मिनटों का नहीं बस सेकेंडों का इंतजार करना होगा. यह मजाक नहीं बल्कि सच बात है क्योंकि वाई-फाई से 100 गुना तेज इंटरनेट सेवा देने के लिए लाई-फाई तकनीक ने दस्तक दे दी है. इस सेवा की क्षमता इतनी है कि एक सेंकेंड में यह एक जीबी डेटा कम्प्यूटर और मोबाइल में ट्रांसफर कर सकता है. हाल ही में लाई-फाई को लेकर प्रयोगशाला में हुए एक सफल शोध के बाद यह दावा किया जा रहा है.

बदल जाएगी इंटरनेट की दुनिया
दरअसल लाई-फाई एक वायरलेस तकनीक है जो विजिबल लाइट कम्युनिकेशंस का उपयोग करती है और यह जल्द ही बाजार में दस्तक दे देगी. वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में लाईफाई के जरिए 224 गीगाबाइट प्रतिसेकेंड की रफ्तार हासिल करने का दावा किया है. इस तकनीक को बनाने वाली कंपनी वेल्मेनी के सीईओ दीपक सोलंकी ने बताया कि वो इस तकनीक पर आधारित परियोजनाएं इंडस्ट्री में लाने जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि यह न सिर्फ कम खर्चीला है बल्कि लाई-फाई का विकल्प खोजना भी भविष्य में आसान नहीं होगा.

कैसे काम करती है तकनीक
Li-Fi तकनीक में एलईडी बल्ब के जरिए इंटरनेट एक्सेस किया जाता है. एलईडी बल्ब में एक माइक्रोचिप लगाई जाती है. वैज्ञानिकों का दावा है कि यह तकनीक वाई-फाई के मुकाबले सुरक्षित है. इस एलईडी की रोशनी दीवार को पार नहीं कर पाती है. यह तकनीक बाइनरी कोड में ट्रांसमिट होती है. इस तकनीक में डेटा ट्रांसफर के लिए रेडियो फ्रिक्वेंसी तरंगों की जगह विजिबल लाइट कम्युनिकेशंस या इंफ्रारेड/अल्ट्रावॉयलेट तरंगों को इस्तेमाल में लेती है. यह नई तकनीक 400 और 800 THz के बीच के विजिबल लाइट का इस्तेमाल करती है. एलईडी बल्ब को स्विच ऑन या ऑफ करने से इसका उपयोग किया जाएगा. जैसा कि यह पूरी प्रक्रिया चंद सेकेंडों (नैनोसेकेंड) में होगी इसलिए इसे आंखों से नहीं देखा जा सकेगा. सुरक्षा के लिहाज से लाई जा रही इस तकनीक की सबसे अच्छी बात यह है कि हैकिंग जैसी समस्याओं को रोकने में कारगर होगी.

सड़क किनारे सब्जी बेचती दिखी ये ग्लैमरस अभिनेत्री

आपने कई सारी खबरें सुनी होगी, जिसमें आपको पता चला होगा कि कई बौलीवुड अभिनेता या अभिनेत्री अच्छा-खासा फिल्मी करियर छोड़ कर खेती-किसानी में लग गए. लेकिन हाल ही में एक ऐसा नजारा देखने को मिला है, जिसे देखकर हर कोई दंग रह जाएगा. बता दें कि हाल ही में बौलीवुड अभिनेत्री अदा शर्मा तो सड़क पर सब्जी बेचते हुए नजर आईं. ये फोटोज तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. अदा का ये हाल देखकर हर कोई हैरान हो गया है. क्योंकि, कुछ दिनों पहले ही वो अपने ग्लैमरस लुक में नजर आई थीं. फिर ऐसे अचानक उनका ये हाल कैसे हो गया. अगर आप भी यही सोचकर परेशान हो रहे हैं तो हम बता दें कि ये सब अदा ने जानबूझकर किया है वो भी एक फिल्म के लिए.

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खबरों की माने तो अदा का ये लुक एक हौलीवुड फिल्म के स्क्रीन टेस्ट के लिए था. बिखरे बाल, सूती मैली साड़ी और टैन स्किन में अदा को पहचानना बेहद मुश्किल है. लेकिन अदा ने ये साबित कर दिया है कि वो अपने काम को लेकर कितनी डेडीकेटेड हैं. तभी तो उन्होंने ये लुक बखूबी अपनाया है.

गौरतलब हा कि अदा शर्मा अपनी फिल्मों से ज्यादा अपने सोशल वीडियोज और फोटोज को लेकर सुर्खियों में रहती हैं. वो अपने स्वैग और स्टाइल के वजह से खूब चर्चाएं बटोरती हैं. बता दें कि अदा शर्मा ने अपना फिल्मी करियर साल 2008 में हौरर मूवी ‘1920’ से शुरू किया था. इसके अलावा वो ‘हम हैं राही कार के’ और ‘हंसी तो फंसी’ जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी हैं. कुछ दिनों पहले ही अदा विद्युत जमवाल के साथ ‘कमांडो 2’ में नजर आई थीं, और इस फिल्म में उनके रोल को काफी पसंद किया गया था.

छोटे निवेशकों की सुरक्षा के लिए विधेयक

संसद के मौनसून सत्र के पहले दिन मोदी सरकार ने छोटे निवेशकों के हितों को ध्यान में रखते हुए पोंजी योजनाओं को प्रतिबंधित करने वाला विधेयक लोकसभा में पेश किया. इस विधेयक का मकसद लोगों को लुभावने औफर दे कर अपने पसीने की कमाई पूंजी को जमा करने के लिए उकसाने और फिर उसे ले कर फरार होने वाले लोगों पर नकेल कसना है.

इस धंधे में लगे गिरोह अब तक हजारों लोगों की करोड़ों की कमाई डकार चुके हैं और सरकार उन्हें रोकने की कोशिश भी कर रही है, लेकिन वह इसे रोकने में असफल रही है. इस कानून में 10 साल की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के बजट में इस तरह का विधेयक लाने की बात कही थी, लेकिन विधेयक करीब डेढ़ साल बाद लाया गया है. इस विधेयक की अच्छी बात यह है कि किसी पोंजी कंपनी द्वारा घपला करने की बात सामने आने से पहले कंपनी के खिलाफ कार्यवाही कर लोगों का पैसा बचाया जा सकता है. विधेयक का मकसद अवैध कंपनियों को लोगों का पैसा जमा करने से रोकना है. इस के साथ ही, सरकार फर्जी कंपनियों पर भी लगाम लगा रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि ढाई लाख फर्जी कंपनियों पर ताला लगाया गया है और बड़ी संख्या में कंपनियां सरकार के रडार पर हैं.

इधर, जेल की सजा काट रहे आसाराम बापू की फर्जी कंपनियों पर छापे पड़ रहे हैं. इन सब का मकसद भोलीभाली जनता को लूटना है. इन चोरों के लिए 10 साल की सजा नहीं, बल्कि आजीवन कारावास होना चाहिए. शिकायत होते ही उन्हें जेल पहुंचाया जाना चाहिए.

हमारे समाज में पढ़ेलिखे लोगों की संख्या बढ़ रही है, इस के बावजूद लोग बेवकूफ बन रहे हैं और फर्जी कंपनियां में पैसा लुटा रहे हैं. हमें खुद सतर्क रहने की जरूरत है.

‘करीम मोहम्मद’ आतंकवाद पर तमाचा है : यशपाल शर्मा

‘हजार चौरासी की मां’’, ‘‘लगान’’, ‘‘अपहरण’’, ‘अब तक छप्पन’’, ‘गंगाजल’’, ‘धूप’, ‘ट्यूबलाइट’ सहित कई सफल फिल्मों के अलावा कलात्मक सिनेमा की फिल्मों में अभिनय करते हुए यशपाल शर्मा ने अपनी एक अलग पहचान बनायी है. इतना ही नहीं वह आसामी, हरियाणवी, गुजराती, तेलगू सहित अन्य क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों में भी धमाल मचा रहे हैं. उनकी हरियाणवी फिल्म ‘‘पगड़ी’’ को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. इस वक्त वह पवन कुमार शर्मा की कश्मीरी जाति बकरवाल पर बनी फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ को लेकर उत्साहित हैं. जिसमें वह मेन लीड में हैं.

आपके 18 साल के करियर में टर्निंग प्वाइंट क्या रहे?

18 साल के करियर मे मेरे लिए पहला टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘लगान’’ थी. फिर ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘अब तक 56’ रही. पिछले ढाई वर्ष से मैं हरियाणा पर ज्यादा ध्यान दे रहा हूं. हरियाणा में मैंने तीन फिल्म फेस्टिवल कराए हैं. देखिए, आमिर या सलमान या शाहरुख खान के साथ फिल्में करने की मेरी इच्छा खत्म हो चुकी है. मैं मन का काम यानी कि ऐसा काम, जिसे करने में मजा आए, करना चाहता हूं. ‘सिंह इज किंग’ या ‘राउडी राठौड़’ जैसी फिल्मों में कुछ भी नया करने के लिए नहीं होता. ऐसी फिल्में करने से कलाकार के मन को संतुष्टि नही मिलती. इसी वजह से मैं थिएटर भी करता रहा. 12 नाटक कर रहा था. अब कुछ कम किया है. इन दिनों मैं फिल्म ‘करीम मेाहम्मद’ को लेकर उत्साहित हूं.

ऐसी कोई फिल्म जिसे करने से आपको संतुष्टि मिली हो, पर वह फिल्म दर्शकों तक नहीं पहुंची?

ऐसी एक फिल्म है-राजन कोठारी की ‘डाक कैपिटल’. अब तो वह भी नहीं रहे. एक ‘त्रिशा’ थी. एक हास्य फिल्म है-‘‘सबको इंतजार है’’. वास्तव मे सबसे बड़ी समस्या यह है कि अच्छी व छोटे बजट की फिल्मों को थिएटर ही नहीं मिल पाते. यह सबसे बड़ी त्रासदी है. पर मेरा यह भी मानना है कि फिल्म अच्छी बने तो रिलीज हो जाती है, भले ही उसे ज्यादा थिएटर न मिले, जैसे कि मेरी फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ रिलीज हो रही है.

फिल्म ‘करीम मोहम्म्द’ से जुड़ने की वजह?

पवन कुमार शर्मा मेरे दोस्त हैं. वह अक्सर मुझसे अपनी फिल्म से जुड़ने के लिए कहते थे. उनकी पिछली फिल्म ‘ब्रीना’ के समय मेरे पास सिर्फ दो दिन का वक्त था, इसलिए एक छोटा सा किरदार निभाया था. फिर उसने मुझसे कहा कि उन्हे एक फिल्म के लिए 20 दिन चाहिए. मैंने कहा कि मैं व्यस्त हूं, इतने दिन नहीं दे पांउगा. उसने मुझे ‘करीम मोहम्मद’ की पटकथा पढ़ने के लिए देते हुए कहा कि इसे पढ़कर बताना कौन सा किरदार करना चाहोगे. मैंने घर पर जाकर पटकथा पढ़ी और दूसरे दिन मैं उनके पास पहुंचा और मैंने कहा कि मुझे यह फिल्म करनी है, बताओ कितने दिन चाहिए. हमने एक ही शैड्यूल में पैशन के साथ यह फिल्म पूरी की.

Yashpal sharma interview for Karim Mohammed

पटकथा पढ़कर ऐसा क्या हुआ कि आप इसे करने के लिए तैयार हुए?

पटकथा में मेरे लिए कश्मीरी बकरवाल जनजाति के इंसान का किरदार निभाना चुनौती थी. भेड़ बकरी चलाने वाला मुस्लिम किरदार है. भाषा का एसेंट अलग, पहनावा अलग. ठाकुर और इंस्पेक्टर किरदार निभाते हुए मैं तंग आ चुका हूं, मुझे लगा कि बकरवाल जाति के इंसान का किरदार निभाना चाहिए. अपनी इमेज को तोड़ने के लिए ही मैने सीरियल ‘नीली छतरी वाले’ किया था. ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ या ‘ट्यूब लाइट’ फिल्मों में भी कुछ अलग करने को मिला, तो मैंने यह फिल्में भी की. अब ठाकुर के किरदार वाली फिल्में मना कर रहा हूं.

फिल्म ‘‘करीम मोहम्मद’’ में काम करना मेरे लिए चुनौती थी. इसमें कलाकार भी कम थे. यह अपने परिवार के साथ पहाड़ों पर घूमता रहता है. उसके साथ रास्ते में क्या क्या होता है, वह सब इस फिल्म का हिस्सा है.

क्या आपने इस किरदार को निभाने के पहले कोई शोध किया?

जी हां!! मैंने बकरवाल पर अपनी तरफ से बहुत शोध किया. यूट्यूब पर मैंने उनका संगीत सुना. उनकी चाल ढाल, उनके कपडे़ देखे. उनकी शादी के वीडियो देखे. गूगल सर्च में जाकर उनके बारे में पढ़ा. फिर मैंने एक किरदार को छांट कर उसके जैसी ही अपनी दाढ़ी उगाई. उसी तरह की पगड़ी और कपड़े भी सिलवाए. शोध में मुझे पता चला कि पहाड़ों पर इतनी ठंड होती है कि यह लोग नहाते नहीं हैं. तो मैंने भी बीस दिन तक एक ही पोशाक पहनी. मैं तीन चार दिन में नहा जरूर लेता था. फिल्म में मेरी पत्नी का किरदार निभाने वाली लड़की जम्मू की है. इसने सुजीत सरकार की फिल्म ‘‘यहां’’ में मेरी छोटी बहन का किरदार निभाया था.

आपने एक बाल कलाकार हर्षित राजावत के साथ इस फिल्म में काम किया है. क्या अनुभव रहे?

जी हां! फिल्म में मेरे बेटे का किरदार फिल्म के निर्माता के बेटे हर्षित राजावत ने निभाया है. पहले तो मुझे लगा कि निर्माता का बेटा है, फिल्म को बर्बाद कर देगा. पर निर्देशक ने कहा कि सेट पर उसके साथ दो दिन काम करके देखो. हमने उस बच्चे से कहा कि वह अपनी मर्जी से काम करे और उसने जो काम किया है, वह काबिले तारीफ है. हमारी सोच से भी कहीं ज्यादा सशक्त कलाकार निकला. हर अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में उसे सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का पुरस्कार मिला. अब तक मुझे दो और उसे चार अवार्ड मिल गए.

तो क्या इसमें कश्मीरी भाषा है?

नहीं! देखिए, बकरवाल जनजाति मूलतः राजस्थान के मुस्लिम गुर्जर हैं, जो कि जो कि कश्मीर में जाकर बसे हैं. बकरवालों की भाषा डोगरी या कश्मीरी से थोड़ी सी अलग है. मैंने फिल्म में वही भाषा बोली है.

Yashpal sharma interview for Karim Mohammed

फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ में आपके किरदार की यात्रा के दौरान क्या क्या होता है?

यह एक ऐसा परिवार है, जिनका अपना कोई घर नहीं है. जिनके अपने दो घोड़े व कुछ भेड़ बकरी हैं. घोड़ों पर यह अपना तंबू वगैरह लाद कर चलते हैं. शाम होने पर कहीं भी डेरा डाल लेते हैं. रास्ते में पाकिस्तान का बार्डर आता है. बच्चा अपने पिता से कहता है कि उस पार चलें. पिता कहता है कि वह पड़ोसी मुल्क है. बेटा कहता है-‘हमारे यहां कोई पड़ोसी आता है, तो हम उसका स्वागत करते हैं.’ पिता कहता है कि, ‘बेटा तेरी समझ में नहीं आएगा. यह लकीरों का खेल है.’ इस तरह बच्चा सवाल पर सवाल करता रहता है. पूरी फिल्म बच्चे के सवालों पर है. वह जिज्ञासू है. यह बच्चों के लिए बहुत कमाल की फिल्म है. एक बच्चे के माध्यम से पूरी दुनिया की जो भी समस्याएं हैं, उनका फिल्म में चित्रण है.

आईएस आईएस, ईरान, इराक, सीरिया की समस्याओं से लेकर पाकिस्तान के आतंकवाद तक की बात की गई है. आतकंवाद हिंसात्मक हो या गैर हिंसात्मक हो, पर उस पर सवाल उठाए गए हैं. संसद में बैठे कोट पैंट वाले भी आतंकवाद फैला रहे हैं. इन सभी के ऊपर यह फिल्म तमाचा है. फिल्म में एक दृश्य में मेरी पत्नी सवाल करती है कि, ‘तुम इसकी मदद करने जा रहे हो, पर यदि यह आतंकवादी निकला, तो जान जोखिम में जाएगी.’ तब मैं कहता हूं कि, ‘यदि यह आतंकवादी ना हुआ तो. फेक इनकाउंटर भी होते हैं. जीजीबाई यह हराम के जने कभी हमारा खाना लूट लेते हैं, कभी भेड़ बकरियां छीन लेते हैं, हम कुछ नहीं कर पाते हैं. क्योंकि हमारे साथ पुलिस या आर्मी नहीं होती है. पर हम इधर इन्हें इन हराम के जनों को इनकी औकात बता सकते हैं.’ यह फिल्म जमीर और जिंदगी की लड़ाई है. खून की एक बूंद दिखाए गए बगैर आतंकवाद पर जोरदार तमाचा है. फिल्म में अंततः एक बच्चा अपने पिता की मौत के बाद जमीर और जिंदगी की लड़ाई में किस तरह से जमीर को चुनता है,वह हर इंसान को सोचने पर मजबूर कर देगा.

फिल्म में आतंकवाद के बाद शिक्षा का मुद्दा है. बकरवाल जनजाति के इस परिवार में कोई पढ़ा लिखा नहीं है, मगर यह परिवार उसूलों पर चलता है. यह परिवार पहाड़ों पर जंगल में रहता है, जिन्हे आप जंगली कह सकते हैं, पर यह सच्चाई के रास्ते पर चलते हैं. देशभक्त हैं. वर्तमान समय में उच्च वर्ग या अति अमीर ही नहीं मध्यमवर्गीय परिवार के लोग भी अपने बच्चे को यह सिखाते हैं कि 97 प्रतिशत नंबर कैसे आएं. पर उन्हें यह नहीं सिखा रहे कि सही मायनों में शिक्षा क्या है. शिक्षा का मतलब 97 प्रतिशत नंबर आना या आईएएस अफसर बन जाना या कमिश्नर बन जाना नहीं है. शिक्षा आपकी आदतों, संस्कृति, संस्कार, एटीट्यूड, भावनाओं, इंसानियत को लेकर होनी चाहिए, जो कि नहीं दी जाती. बच्चे को ऐेसे खेल नहीं खिलाए जाते जिससे बच्चे में टीम वर्क के रूप में काम करने या दूसरों की मदद करने की भावना पैदा हो. उनकी कल्पनाशक्ति को विकसित किया जाना चाहिए.

बच्चे को पहली कक्षा से ही थिएटर विषय होना चाहिए, पर हमारे स्कूली पाठ्यक्रम में थिएटर विषय है ही नहीं. मैंने अपने बच्चे से कह रखा है कि फेल मत होना. पर मेरा बेटा फुटबाल खेलता है. मिट्टी के बर्तन बनाता है. स्कैचिंग करता है. बहुत कुछ करता है. मैंने उस पर कोई दबाव नहीं बनाया है. कुल मिलाकर फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ में शिक्षा का मुद्दा भी बहुत बडे़ स्तर उठाया गया है.

यह फिल्म औरतों को लेकर कोई बात नहीं करती?

करती है. हमारी फिल्म औरतों की स्थिति पर भी बात करती है. मंच पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का भाषण देने वाले लोग अपने घर में बेटी को दबा कर रखते हैं. जो लोग कहते हैं कि यदि लड़की ने छोटे कपड़े पहने तो क्या हो गया? वह खुद अपने घर की लड़की को इस तरह के कपडे़ पहनने नहीं देते. मेरा मानना है कि कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए. कश्मीर में भी औरतों कि स्थिति भोग्या से अधिक नही है.

आप वेब सीरीज वगैरह कर रहे हैं?

मैंने एक वेबसीरीज ‘चाइनीज भसड़’ की है.उ सके बाद कोई मनपसंद वेबसीरीज आयी ही नही. हां! लघु फिल्में मैंने बहुत की हैं. लघु फिल्म ‘मुक्ति’ को कई अवार्ड भी मिले. नवाजुद्दीन सिद्दकी के साथ ‘कार्बन’ की है. यह काफी लोकप्रिय है. ‘मोक्ष’ भी पसंद की गयी.

सिनेमा बदल रहा है. पर अच्छी फिल्में को थिएटर मिलना आज भी मुश्किल है?

गुणवत्ता वाली फिल्मों को थिएटर मिल जाते हैं. पर हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम अच्छे दर्शक तैयार करें. मैं तो खुले आम लोगों से कहता हूं कि आप एकता कपूर की फिल्में ‘क्या कूल हैं हम’ तथा ‘द ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ देखने ना जाएं. इस तरह की घटिया फिल्मों को सफल ना बनाएं. अच्छा सिनेमा देखें. ‘मुल्क’ देखकर मैंने सोशल मीडिया पर लिखा कि इसे जरूर देखें.

थिएटर में कुछ नया हो रहा है?

12 नाटक चल रहे हैं. पुराने नाटकों के शो करने में ही परेशान हो जाता हूं. तो नए नाटक कहां से लूं.

इसके अलावा कोई नई फिल्म कर रहे हैं?

इसके अलावा मनोज झा निर्देशित  फिल्म ‘‘चौहान : द कामन मैन’’ भी की है. यह फिल्म सितंबर माह में आएगी. करनाल के उद्योगपति और मशहूर शख्सियत एस पी चौहान की बायोपिक फिल्म है. इसमें मेरे अलावा जिम्मी शेरगिल ने भी अभिनय किया है. युविका चौधरी भी हैं.

एक फिल्म ‘‘मिस्टर पानवाला’’ है, जिसमें मैंने शीर्ष भूमिका निभायी है. इसे लंदन के निर्माता ने बनाया है. इसकी पांच प्रतिशत शूटिंग लंदन में और 95 प्रतिषत शूटिंग लखनऊ में हुई है. एक फिल्म ‘‘फागुन हवाएं’’ हैं. इसमें मेरा मेन लीड है. इसका निर्माण व निर्देशन बांगलादेश के मशहूर निर्देशक तौकीर अहमद ने किया है. तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘‘मिलन टाकीज’’ की है.

सरकार का कैदियों को छोड़ देने का फैसला

सरकार को उन कैदियों को छोड़ देने का फैसला जिन की उम्र ज्यादा हो, जिन्होंने सजा के आधे दिन गुजार दिए हों और जो बीमार हों, अच्छा है. कैद समाज को ज्यादा साफसुथरा रखती है, यह गलतफहमी है. पकड़े जाने पर और जेल में कैद काटने से कोई सुधरता है या नहीं, समाज में अपराध तो कम बिलकुल नहीं होते.

अमेरिका आजकल बदनाम हो गया है कि उस ने बहुत ज्यादा लोगों को जेलों में भर रखा है. वहां जेलों का निजीकरण हो गया है और प्राइवेट ठेकेदार हल्ला मचवाते रहते हैं कि यदि अपराधी जल्दी छोड़ दिए गए तो वे समाज को तहसनहस कर देंगे. फिर भी वहां समाज में अपराध कम नहीं हो रहे.

हमारे देश में जेलों में आमतौर पर वही बंद हैं जो अदालतों में महंगे वकील नहीं कर पाए. कुछ मोटे मामलों को छोड़ कर महंगे वकीलों के सहारे आरोपी आमतौर पर बच ही निकलते हैं. यदि वे लोग जो अपराध के शिकार हुए हों चुप बैठ जाएं तो हमारे यहां सजा मिलना कम ही होता है इसलिए जेलें या तो ऐसे लोगों से भरी हैं जो पुलिस से भिड़ गए होते हैं या जो गरीब होते हैं पर कोई जुर्म कर बैठे हों. उन्हें छोड़ने का फैसला ठीक है क्योंकि अब उन्हें पता चलेगा कि जेल से बाहर की जिंदगी भी आसान नहीं.

जेल काट कर आए लोगों को न घर वालों का प्यार मिलेगा, न दोस्तों का. आजकल जिस तरह की बेरोजगारी है, उन्हें रोजगार मिलेगा इस के भी मौके कम हैं. उन्हें हकीकत का पता अब चलेगा. जेल से बाहर रह कर भी वे अपनी खुद की बनाई कैद में रहेंगे.

सदियों से कानून को समझने वाले बहस करते रहे हैं कि सजा क्या किसी को सुधारती है. कई बार तो कैद से सजा पूरी कर के आए और ज्यादा खूंख्वार हो जाते हैं क्योंकि जेलों की दुनिया में अपराध ज्यादा होते हैं क्योंकि वहां तो सभी बेईमान, हत्यारे होते हैं. विदेशों में जहां जेलों में सुविधाएं मिलनी शुरू हो गई हैं वहां भी जेल से बाहर आने तक लोग और ज्यादा अपराध करने के गुर सीख जाते हैं.

जेलों में न रख कर आजकल पैर में खास बिजली की चेन पहना कर घर तक रहने की सजा दी जा रही है. कैदी केवल अपने घर में रह सकता है, बाहर जाते ही सायरन बज जाता है. सरकार को इस तरह के कैदी पर खर्च नहीं करना पड़ता.

समाज गुनाहगारों को सजा देने के लिए रोजदररोज खर्च करे यह भी कोई अच्छा नहीं. उन्हें छोड़ना गलत न होगा. अगर कुछ शिकायती काम करेंगे तो फिर पकड़े जा ही सकते हैं.

आशिक की अधूरी मौत : प्यार में उठाया खतरनाक कदम

मोहम्मद आसिफ ने सामने बैठी शबनम की पूरी बात सुनने के बाद एक गहरी सांस ले कर बुझे
मन से कहा, ‘‘आखिर वही हुआ जिस का मुझे डर था, आज सारी दुनिया हमारे प्यार की दुश्मन बन बैठी है. जब अपनों ने ही साथ देने से साफ इंकार कर दिया तो किसी दूसरे को क्या दोष दें.’’
‘‘आसिफ मैं अम्मीअब्बू तो क्या, अपनी खाला से भी बात कर चुकी हूं. मुझे भी वही सब जवाब मिले थे, जो तुम्हें अपने परिवार से मिले हैं.’’

फिर कुछ सोचते हुए आसिफ ने कहा, ‘‘शबनम, हमें घर से भाग कर अपनी एक नई दुनिया बनानी होगी.’’
आसिफ की बात बीच में ही काटते हुए शबनम ने कहा, ‘‘यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, क्या घर से भागना इतना आसान है? आसिफ मुझे तो ऐसा लग रहा है कि आज यह हमारी आखिरी मुलाकात है. आज के बाद हम कभी नहीं मिल सकेंगे. क्योंकि अगले हफ्ते मेरा निकाह है. इस बीच अगर तुम अपने घर वालों को मना सको तो ठीक है, नहीं तो मुझे भूल जाना और बेवफा कह कर दोषी मत ठहराना. खुदा हाफिज.’’ कह कर शबनम वहां से उठ कर अपने घर की तरफ चली गई. आसिफ काफी देर तक वहीं बैठा सोचता रहा.

मोहम्मद आसिफ पाकिस्तान के जिला कसूर के अंतर्गत आने वाले गांव जल्लोके का रहने वाला था. उस के पिता का नाम था खलील मोहम्मद. खलील मोहम्मद की 4 संतानों में आसिफ सब से छोटा था. उसे छोड़ कर सभी बहनभाइयों की शादी हो चुकी थी.

खलील मोहम्मद के पास अपने गुजारे लायक जमीन थी, जिस में घर खर्च बड़े मजे से चलता था. सब कुछ ठीक चल रहा था कि आसिफ की जिंदगी में उस दिन से हलचल शुरू हुई, जिस रोज उस ने पहली बार शबनम को देखा था.

मन ही मन आसिफ ने उस की तारीफ की थी. उन की यह मुलाकात एक शादी समारोह में हुई थी. शबनम की एक झलक देखते ही आसिफ अपना दिल हार बैठा था. वह सोचने लगा कि अगर यह खूबसूरत लड़की उस की जिंदगी में आ जाए तो जिंदगी बन जाएगी.

जब मन में उसे पाने की चाहत ने जन्म लिया तो उस ने अपनी हमउम्र मामू, खाला आदि की लड़कियों के माध्यम से शबनम के पास पैगाम भिजवाने शुरू कर दिए. वह जल्द से उस के नजदीक पहुंचने की कोशिश करने लगा.

चूंकि वह उस के बड़े भाई हमीद की साली थी और आसिफ शबनम को पाने के लिए बेताब हो उठा. उस की चाहत को देखते हुए शबनम भी उस की ओर आकर्षित हो चुकी थी. यानी आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई थी.

जल्द ही आसिफ को शबनम के निकट रहने का मौका मिल गया. शादी समारोह के बाद सभी रिश्तेदार विदा हो कर अपनेअपने घरों को लौटने लगे, पर आसिफ के बड़े भाई हमीद को उस के ससुर ने कुछ दिनों के लिए अपने यहां रोक लिया. अपनी भाभी से जिद कर के आसिफ भी उन के साथ भाई की ससुराल में रुक गया.

एक तरह से वह शबनम के बिलकुल करीब पहुंच गया था. घर में गहमागहमी का माहौल था. घर के बडे़ अपनी बातों में मशगूल रहते थे तो बच्चे और किशोर अपनी अलग मंडली जमाए बैठे थे. ऐसे में आसिफ और शबनम को अपनेअपने दिल की बात कहने का अवसर मिल गया.

दोनों ने एकदूसरे के सामने प्यार का इजहार किया, साथ जीनेमरने की कसमें खाईं. दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था. शादी का फैसला करते वक्त दोनों ने यह बात सपने में भी नहीं सोची थी कि परिवार वालों को उन का फैसला मंजूर होगा भी या नहीं. दोनों अभी अपने प्यार की पींगे पूरी तरह बढ़ा भी नहीं पाए थे कि शबनम के अब्बू को उन की प्रेम कहानी का पता चल गया.

शबनम पर तो जैसे आफत का पहाड़ ही टूट पड़ा. इसी बात को ले कर ससुर और दामाद में भी कहासुनी हो गई. हामिद अपनी ससुराल से नाराज हो कर अपने गांव लौट आया. उस ने अपनी बीवी को भी सख्त ताकीद कर दी थी कि अब वह अपने अम्मीअब्बू को भूल जाए. आसिफ और शबनम के प्यार का घरौंदा बसने से पहले ही उजड़ गया.

आसिफ और शबनम ने अपनेअपने तरीकों से इस रिश्ते को कायम रखने के लिए बहुत कोशिश की. पर दोनों परिवारों की जिद के आगे उन की एक नहीं चली. शबनम के अब्बू ने शबनम का रिश्ता कहीं दूसरी जगह तय कर दिया था. जल्दी ही शादी का दिन भी आ गया. इस शादी में उस ने अपनी बेटी और दामाद को भी नहीं बुलाया था.

मोहम्मद आसिफ ने बड़ी बेबसी के साथ शबनम के घर की तरफ देखा. चारों तरफ जगमगाती लाइटें जल रही थीं, चहलपहल दिखाई दे रही थी. घर और आसपास के पेड़ों में लगे लाउडस्पीकर पर पंजाबी गाने बज रहे थे. वहां से 100 मीटर दूरी पर आसिफ एक जगह अंधेरे में बैठा था. वह नहीं चाहता था कि कोई उसे और उस के दर्द को देखे. जिसे देखना था वह अपनी खुशियों में व्यस्त थी.

लाउडस्पीकर पर बजते गाने आसिफ के दिल में तीर की तरह चुभ रहे थे. अंदर ही अंदर बेचैनी खाए जा रही थी.

बारात धीरेधीरे शबनम के घर की तरफ बढ़ रही थी. आवाज की तेजी बढ़ती जा रही थी. जैसे वे सारी आवाजें उस की तरफ आ रही हों. ढोल वाले के हर डंके की चोट में जैसे शबनम चीखचीख कर कह रही हो, ‘मैं जा रही हूं आसिफ. तुम को छोड़ कर. मेरी शादी किसी और के साथ हो रही है. अब मैं तुम्हारी नहीं रही.’

आसिफ धीरेधीरे वहां से उठा और खेतों की तरफ जाने लगा. वह इन आवाजों से दूर जाना चाहता था, बहुत दूर. काली अंधेरी रात में वह कहां जा रहा था, उसे पता नहीं चल रहा था. वह तो बस चले जा रहा था.
उस के मन में उस समय एक ही धुन सवार थी कि जितनी जल्दी हो सके, बोझ बनी इस जिंदगी से छुटकारा पा कर सुकून हासिल कर ले. वह चले जा रहा था, पर शहनाई की आवाज उस का पीछा नहीं छोड़ रही थी. उस ने अपने कदमों की रफ्तार और तेज कर दी थी.

वह शबनम के गांव से दूर आ चुका था. आवाजें उस का पीछा कर रही थीं. उस ने अपने दोनों कान बंद किए और वहीं बैठ गया. अचानक उस ने अपना मुंह आसमान की तरफ उठाया और चीखचीख कर रोने लगा. जैसे खुदा से शिकायत कर रहा हो.

अपने भीतर कितने दिनों से दबा कर रखे आंसुओं के भंडार को वह आज जी भर के निकालना चाहता था. वहां न कोई सुनने वाला था, और न कोई कुछ कहने वाला. वह रोता रहा, रोता रहा. तब तक जब तक जहर भरे सारे आंसू बाहर नहीं निकल गए.

मन हलका हो गया तो फिर से शबनम की यादों को समेटने लगा था. इस के पहले कि शबनम की यादों में पड़ कर कमजोर हो जाए, वह अपनी जगह से उठा और तेजी से एक ओर बढ़ता गया. आसिफ रात भर चलता रहा, उस के पैरों में बिजली सी तेजी थी, मानो वह जल्द से जल्द अपनी मंजिल पर पहुंचना चाहता हो.

सुबह के करीब 5 बजे वह भारतपाक सीमा के हुसैनीवाला क्षेत्र फिरोजपुर बौर्डर के पास पहुंच गया. वह एक पल के लिए वहां रुका और आसपास देख कर वहां का जायजा लेने लगा. जब दूर से उस ने 2 देशों की सीमा को विभाजन करने वाली तारों की बाड़ को देखा तो उस की आंखें चमक उठीं.

किसी सम्मोहनवश वह लगभग दौड़ता हुआ सीमा पर लगी बाड़ की ओर लपका. सीमा के दोनों ओर दोनों देशों के सुरक्षाकर्मी हाथों में आधुनिक हथियार लिए बड़ी मुस्तैदी से खडे़ थे, पर आसिफ सुरक्षाकर्मियों की नजरों के सामने से बिना भयभीत हुए ‘अल्लाह हू अकबर’ कहता हुआ सुरक्षा तारों को पार करने लगा.
सीमा के दोनों ओर के जवान इस अजूबे को हैरत की नजरों से देख रहे थे और सोच रहे थे कि वह कौन है और क्या करना चाहता है. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. क्योंकि आसिफ पाकिस्तान की ओर से सीमा पार कर के भारत की सीमा में प्रवेश कर चुका था.

अब भारतीय फौजियों को ही उसे रोकना था सीमा पर उस समय सीमा सुरक्षाबल की 118वीं बटालियन के जवान तैनात थे. उन्होंने आसिफ को चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘जहां हो वहीं रुक जाओ और वापस अपने सीमा क्षेत्र में लौट जाओ वरना गोली मार दी जाएगी.’’

सीमा सुरक्षाबल के जवानों की चेतावनी का आसिफ पर कोई असर नहीं हुआ. वह अपनी धुन में तारों को पार करने की कोशिश करता रहा. थोडे़ से प्रयास के बाद वह अपने इरादों में सफल हो कर भारतीय सीमा में प्रवेश कर गया.

भारतीय सीमा में प्रवेश करते ही सुरक्षाबलों ने उसे घेर लिया. एसआई राजवीर सिंह, हवलदार अरविंद कुमार, अशोक कुमार, सिपाही जुगल किशोर और पी.एच. डेविड ने आसिफ को गिरफ्तार कर अपनी हिरासत में ले लिया और यह सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

सीमा सुरक्षा बल के आला अधिकारियों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने आसिफ से जम कर पूछताछ की. किसी हारे हुए जुआरी की तरह आसिफ ने अपना दिल खोल कर जब अपने नाकाम प्यार की दास्तां सुनाई तो सभी दंग रह गए.

आसिफ ने अपने बयान में बताया कि उसे विश्वास था कि सीमा पर उस के द्वारा की गई इस हरकत के बदले जवान उसे गोली से उड़ा देंगे और वह दुनिया से मुक्त हो जाएगा. क्योंकि रमजान के पाक महीने में वह आत्महत्या जैसा गुनाह नहीं कर सकता था, इसलिए उस ने सोचसमझ कर जवानों की गोली से अपने प्यार के लिए शहीद होने की सोची थी. अपनी नाकाम मोहब्बत के सदमे की वजह से उस की जीने की इच्छा खत्म हो गई है.

सुरक्षा एजेंसियों की पूछताछ के बाद अपने अधिकारियों के आदेश पर एसआई राजबीर सिंह ने आसिफ को जिला फिरोजपुर के थाना ममदोह की पुलिस के हवाले कर दिया.

थानाप्रभारी रछपाल सिंह ने आसिफ से पूछताछ करने के बाद बताया कि नौजवान मानसिक तौर पर परेशान है. उस से सभी पहलुओं से पूछताछ की गई है. युवक की तलाशी लेने पर उस की जेब से 1200 रुपए की पाकिस्तानी करेंसी और 2 नींद की गोलियां बरामद हुई थीं.

पूछताछ के बाद थानाप्रभारी रछपाल सिंह ने आसिफ के खिलाफ 28 मई, 2018 को इंडियन पासपोर्ट एक्ट 1920 की धारा-3 और फारेनर एक्ट-1946 की धारा-14 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया गया जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

– पुलिस सूत्रों पर आधारित

ले डूबी अय्याशी : क्या निकला दीपा की अय्याशी का नतीजा

घटना 18 मई, 2018 की है. माधव नगर थाने के थानाप्रभारी गगन बादल अपने औफिस में बैठे
विभागीय कार्य निपटा रहे थे तभी उन्हें सूचना मिली कि थाना क्षेत्र के वल्लभ नगर में मां बादेश्वरी मंदिर के सामने रहने वाली दीपा वर्मा के घर से बड़ी मात्रा में धुआं निकल रहा है. शायद वहां आग लग गई है. यह थाना मध्य प्रदेश के जिला उज्जैन के अंतर्गत आता है.

थानाप्रभारी ने यह जानकारी दमकल विभाग के अलावा एसपी सचिन अतुलकर को भी दे दी. इस के बाद वह खुद सूचना में बताए गए पते की तरफ रवाना हो गए.

जब तक वह मौके पर पहुंचे, तब तक दमकल विभाग की गाड़ी भी वहां पहुंच चुकी थी. पता चला कि दीपा वर्मा के घर में आग लगी थी. इस से पहले कि आग भयावक रूप लेती, दमकलकर्मी वहां पहुंच गए थे. उन्होंने कुछ देर में आग बुझा दी. आग बुझने के बाद दमकल कर्मियों के साथ थानाप्रभारी जब उस मकान के अंदर पहुंचे तो किचिन में लिहाफ गद्दे वगैरह पड़े मिले. वह अधजले थे. उन कपड़ों से धुआं उठ रहा था.
दमकलकर्मियों ने उन अधजले लिहाफगद्दों को हटाया तो वहां का नजारा देख कर पुलिस चौंक गई. क्योंकि उन लिहाफगद्दों के नीचे एक महिला का शव औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उस की दोनों कलाइयों की नशें भी कटी हुई थीं. साथ ही उस की गरदन पर धारदार हथियार का घाव था.

मकान मालिक ने मृतका की पहचान 35 वर्षीय दीपा वर्मा के रूप में की. उस ने बताया कि यह 5 महीने से अशोक वर्मा के साथ इस मकान में रह रही थी. अशोक के अलावा इस के पास और भी कई युवक आते थे. कुछ ही देर में एसपी सचिन अतुलकर और एफएसल अधिकारी डा. प्रीति भी टीम के साथ मौके पर पहुंच गईं.

पुलिस ने जब जांच की तो बेडरूम में खून के धब्बों के अलावा सामान भी अस्तव्यस्त मिला. बेडरूम का दरवाजा भी टूटा हुआ था. इस से यह अनुमान लगाया कि घटना से पहले दीपा और हमलावर के बीच संघर्ष हुआ होगा. इस के बाद उस की हत्या कर लाश किचिन में ले जा कर जलाने की कोशिश की.

लाश को जलाने का तरीका भी अनोखा था. हत्यारे ने दीपा वर्मा की हत्या के बाद एलपीजी गैस सिलेंडर की नली चूल्हे से निकालने के बाद उसे दीपा वर्मा की जांघों के बीच डाल कर ऊपर से लिहाफगद्दे डाल दिए. फिर रैग्युलेटर से गैस औन कर के आग लगाई थी.

इस से इस बात की आशंका को बल मिला कि हत्या का मामला अवैध संबंधों से जुड़ा हो सकता है. दीपा वर्मा की हत्या की सूचना पा कर भैरवगढ़ में जेल रोड की ज्ञान टेकरी पर रहने वाला दीपा का भाई भी मौके पर पहुंच गया. उस ने दीपा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने वाले अशोक शर्मा पर उस की हत्या का आरोप लगाया.

उस का कहना था कि दीपा पिछले 8 सालों से अशोक के साथ रह रही थी. पुलिस ने दीपा के भाई की तहरीर पर हत्या का मामला दर्ज कर लिया. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के दीपा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

पुलिस ने दीपा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने वाले अशोक के बारे में जानकारी हासिल की. पता चला कि अशोक पहले से शादीशुदा है. उस की ब्याहता गांव में रहती है. वह दीपा के पास 1-2 दिन में चक्कर लगाता था.

उधर 3 डाक्टरों के पैनल ने दीपा का पोस्टमार्टम किया जिस में चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि दीपा को जिंदा ही जलाया गया था. मरने से पहले दीपा के साथ बलात्कार किया गया था या नहीं इस की जांच के लिए उस की स्लाइड बना कर सागर जिले की लैबोरेटरी भेज दी. मामला गंभीर था इसलिए एसपी सचिन अतुलकर ने थाना माधव नगर के थानाप्रभारी गगन बादल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. एसआई बी.एस. मंडलोई, संजय राजपूत आदि के साथ साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे और संतोष राव को उन की टीम में शामिल किया गया.

इंसपेक्टर शिंदे ने सब से पहले अशोक को पूछताछ के लिए बुलाया. अशोक ने बताया कि वह पिछले 8 सालों से दीपा के संपर्क में था. इसलिए वह अब उसे क्यों मारेगा. साथ ही उस ने बताया कि मेरी गैरमौजूदगी में दीपा दूसरे कई युवकों को अपने पास बुलाती और उन के साथ मौजमस्ती करती थी. उस ने उसे कई बार समझाया लेकिन दीपा ने अपनी आदत नहीं बदली थी. अशोक ने दीपा के प्रेमियों के नाम भी पुलिस को बता दिए.

उन में 2 को पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. उन दोनों से पूछताछ में दीपा के एक और प्रेमी धर्मेंद्र गहलोत का नाम सामने आया. धर्मेंद्र देवास रोड पर रहता था. इंसपेक्टर दीपिका शिंदे और थानाप्रभारी गगन बादल दोनों टीम के साथ धर्मेंद्र के घर जा धमके.

संयोग से धर्मेंद्र घर पर ही मौजूद था. उस के दोनों हाथ की अंगुलियों में ताजे घाव थे. इंसपेक्टर शिंदे उस की चोट देखते ही समझ गईं कि दीपा वर्मा का कातिल उन के हाथ लग चुका है. इसलिए उन्होंने उस से सीधे सवाल किया, ‘‘दीपा को तूने क्यों मारा.’’

धर्मेंद्र को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि पुलिस इतनी जल्दी उस तक पहुंच जाएगी. इंसपेक्टर शिंदे का सवाल सुन कर वह हतप्रभ सा रह गया. वह इधरउधर की बातें करने लगा.

तभी पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली तो घर में छिपा कर रखे खून सने कपड़े और दीपा के दोनों मोबाइल फोन मिल गए. इस के बाद धर्मेंद्र के पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. सो उस ने चुपचाप अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस से पूछताछ के बाद दीपा वर्मा की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

दीपा वर्मा का परिवार उज्जैन का रहने वाला था. भैरवगढ़ इलाके में जेल रोड की ज्ञान टेकरी पर दीपा की मां अपने 2 बेटों के साथ रहती थी. दीपा बेहद खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी. उस के इस स्वभाव को निमंत्रण समझ कर मोहल्ले के युवक उस की गली के चक्कर लगाने लगे थे.

बेटी के पैर बहक न जाएं, इसलिए महज 14 साल की उम्र में उस के पिता ने दीपा की शादी देवास के जलाल खेड़ी में रहने वाले राकेश वर्मा के साथ कर दी थी. इस तरह खेलनेकूदने की उम्र में ही दीपा पति के साथ वयस्कों की दुनिया देख चुकी थी.

पति राकेश उस की सुंदरता का कायल था. उम्र बढ़ने के साथ दीपा ने जब जवानी में कदम रखा तो उस की शारीरिक जरूरतें पहले से ज्यादा बढ़ गईं. लेकिन अब तक राकेश वर्मा को घरपरिवार की चिंता सताने लगी थी. इसलिए राकेश रोजीरोटी के चक्कर में यहांवहां भटकने लगा था, इस से परेशान हो कर दीपा ने इधरउधर ताकाझांकी शुरू कर दी.

राकेश को जब पता चला तो वह शराब पी कर उस के साथ मारपीट करने लगा. पति की ज्यादती से दीपा बहुत परेशान हो गई थी. शादी के 10 साल बाद 24 साल की दीपा गुस्से में पति को छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी.

अपना गुजारा करने के लिए उस ने फ्रीगंज इलाके में फाल, पीको की दुकान कर ली. मायके में आ कर कुछ समय तक तो दीपा की जिंदगी आराम से कटी लेकिन फिर उसे अपनी शारीरिक जरूरतें महसूस होने लगीं.

यूं तो दीपा चाहती तो उस के बचपन के दीवाने अब भी मोहल्ले में मौजूद थे, जो उसे अभी भी ललचाई नजरों से घूरते रहते थे. लेकिन दीपा अब बच्ची नहीं थी. उस की आंखों को अब ऐसे मर्द की तलाश थी, जो उस की दैहिक के अलावा दूसरी तमाम जरूरतें भी पूरी कर सके.

एक दिन उस की मुलाकात अशोक से हुई तो दीपा ने अशोक के लिए अपने दिल की लगाम ढीली छोड़ दी. राजनीति में दखल रखने वाला अशोक वर्मा शादीशुदा और एक बच्चे का पिता था. लेकिन उस के पास इतना पैसा था कि वह दीपा की जिंदगी भर तमाम जरूरतें पूरी कर सकता था.

दीपा का रूप उस के दिल को भा चुका था. इसलिए दीपा को राजी देख उस ने उस के सामने साथ रहने का प्रस्ताव रखा, जिसे दीपा ने तुरंत स्वीकार कर लिया.

तब अशोक ने दीपा को किराए का मकान दिला कर घर की तमाम जरूरतें भी पूरी कर दीं. जिस के बाद दीपा अशोक के साथ बिना शादी किए ही पत्नी की तरह रहने लगी. यह करीब 8 साल पहले की बात है.
अशोक राजनीति में भी दखल रखता था. उस के पास पैसा भी खूब था, इसलिए दीपा को काम करने की जरूरत नहीं रह गई थी. फिर भी समय काटने के लिए उस ने फाल लगाने और पीको करने का काम बंद नहीं किया था. लेकिन ऐसे मामले में वही हुआ जो होता है.

दीपा के साथ 4-5 साल गुजारने के बाद अशोक का मन उस से भर गया. हालांकि वह अपने वादे से तो नहीं मुकरा, वह दीपा की हर आर्थिक जरूरत पूरी करता रहा. पर दीपा के पास उस का आनाजाना जरूर कम हो गया. अब वह 1-2 दिन बाद दीपा के पास आता.

लेकिन दीपा जिस मिट्टी से बनी थी उस के चलते उसे रोजाना पुरुष संग की जरूरत थी. इसलिए अशोक की गैरमौजूदगी का फायदा उठा कर उस ने कई दूसरे युवकों से दोस्ती कर ली. वह उन्हें रात के अंधेरे में अपने घर बुलाने लगी. लेकिन ऐसी बातें छिपती कहां हैं.

यानी अशोक को यह बात पता चल गई. अशोक ने उसे बहुत समझाया, पर उस ने अपनी आदत नहीं बदली. अशोक की गैरमौजूदगी में दूसरे युवक दीपा के घर में आ कर रात गुजारने लगे. अशोक तो दीपा का दीवाना था इसलिए उस के बदचलन होने के बावजूद भी उस ने दीपा का साथ नहीं छोड़ा.

जिस मकान में दीपा की हत्या हुई वह मकान इसी साल जनवरी के महीने में अशोक ने ही किराए पर ले कर उसे रहने के लिए दिया था. कोई 3 साल पहले धर्मेंद्र की पत्नी दीपा की दुकान पर अपनी साड़ी पर फाल लगवाने के लिए साड़ी दे कर चली गई थी. बाद में धर्मेंद्र दीपा की दुकान पर वह साड़ी लेने गया था. तभी दीपा से उस की पहली मुलाकात हुई थी.

वैसे दीपा धर्मेंद्र से उम्र में काफी बड़ी थी. लेकिन उस की खूबसूरती देख कर धर्मेंद्र का मन पागल हो गया. इसलिए उस के हाथ से साड़ी लेते समय उस ने जानबूझ कर उस की अंगुलियों को छू दिया.

ऐसा कर के धर्मेंद्र को इस बात का डर था कि कहीं वह बुरा न मान जाए. लेकिन दीपा काफी बोल्ड थी. उस ने सीधे कहा, ‘‘बड़े हिम्मत वाले हो जो पहली ही मुलाकात में अंगुली पकड़ रहे हो. इस बार अंगुली पकड़ी है तो लगता है अगली बार सीधे पहुंचा पकड़ोगे.’’

यह सुन कर धर्मेंद्र झेंप गया तो वह जोर से हंस दी. जिस के बाद दोनों की दोस्ती हो गई और फोन पर बातें होने लगीं. धर्मेंद्र दीपा से मिलना चाहता था. लेकिन उस से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. 10-15 दिन बाद एक रोज खुद दीपा ने ही कहा कि कब तक फोन पर बातें कर के आग भड़काते रहोगे, मिलोगे नहीं क्या?

‘‘मिलना तो चाहता हूं पर कहां मिलूं. यह बात समझ में नहीं आ रही है. अच्छा तुम एक काम करो, कल महाकाल मंदिर आ जाओ, वहीं मिलते हैं.’’ धर्मेंद्र बोला.

‘‘क्यों, मेरे साथ वहां क्या भजन करना है, जो मंदिर में बुला रहे हो. तुम सीधे मेरे घर आ जाओ, वहीं घंटा बजाएंगे.’’ कहते हुए दीपा ने अपने घर का पता बता दिया.

उसी दिन शाम को धर्मेंद्र दीपा के किराए वाले मकान में पहुंच गया. दोनों ने एकांत का लाभ उठाते हुए अपनी हसरतें पूरी कीं. जल्द ही दीपा ने धर्मेंद्र को अपनी अदाओं से वश में कर लिया.

इस के बाद धर्मेंद्र उस पर काफी पैसे भी लुटाने लगा था. दीपा से मिलनेजुलने में दिक्कत न हो इसलिए धर्मेंद्र ने उस के पति अशोक से भी दोस्ती बना ली थी. जब मन होता दोनों शराब और चिकन की पार्टी भी करते.

लेकिन कुछ समय बाद ही धर्मेंद्र को पता चल गया कि अशोक दीपा का पति नहीं है, बल्कि वह उस के साथ रखैल बन कर रह रही है. इतना ही नहीं दूसरे और युवकों के साथ भी दीपा के संबंध होने की जानकारी धर्मेंद्र को लग गई. यहां तक कि धर्मेंद्र जिन दोस्तों को दीपा के यहां ले गया था, उन के साथ भी दीपा ने अवैध संबंध बना लिए थे.

धर्मेंद्र ने दीपा को समझाया कि वह ऐसा न करे लेकिन उस ने उलटे धर्मेंद्र से ही मिलना बंद कर दिया. धर्मेंद्र उस से मिलने की चाहत व्यक्त करता तो वह किसी न किसी बहाने से उसे टाल देती थी.
धर्मेंद्र की पत्नी को भी यह जानकारी मिल गई कि उस का पति दीपा नाम की किसी महिला के पास जाता है. धर्मेंद्र पत्नी से लगातार झूठ बोलता रहा. जब उस ने दीपा से मिलना नहीं छोड़ा तो वह उस से झगड़ने लगी.

एक दिन धर्मेंद्र दीपा के पास गया तो वहां पर उस के 2 दोस्त कुक्कू और रवि मिले. दीपा ने उस दिन धर्मेंद्र को घर से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया था.

धर्मेंद्र अपने घर वापस आ गया लेकिन उस की नजरों के सामने दीपा की कुक्कू और रवि के साथ अय्याशी की तसवीरें किसी फिल्म की तरह चलती रहीं. इसलिए सुबह होते ही वह फिर से दीपा के घर पहुंचा. उस समय दीपा अकेली थी.

कुक्कू और रवि के साथ मस्ती करने के फेर में रात भर शायद वह सोई नहीं थी. इसलिए अपनी नींद में खलल पड़ने से वह धर्मेंद्र पर नाराज होते हुए को उलटासीधा बोलने लगी. यह देख कर धर्र्मेंद्र का खून खौल उठा और उस ने दीपा की पिटाई की. गुस्से में उस ने उस की दोनों कलाइयों की नसें भी काट दीं, जिस से कमरे में खून फैल गया और वह बेहोश हो गई. अब वह उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहता था.

हाजा वह उसे खींच कर रसोई में ले गया और उस की सलवार निकाल कर उस ने एलपीजी सिलेंडर का पाइप गैस चूल्हे से निकाल कर उस की दोनों जांघों के बीच फंसा कर ऊपर से लिहाफ, दरी, गद््दा डाल कर रैग्युलेटर से गैस चालू कर दी, फिर आग लगा कर वह वहां से चला गया. उस ने सोचा कि सिलेंडर फटने के बाद लोग इसे दुर्घटना समझेंगे और वह बच जाएगा.

लेकिन जब मकान में धुआं निकलना शुरू ही हुआ था, तभी पड़ोसी राकेश वर्मा ने इस की सूचना पुलिस को दे दी. धर्मेंद्र से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. बैडरूम का दरवाजा कैसे टूटा, यह बात पुलिस पता नहीं लगा सकी.

उज्जैन के आईजी राकेश गुप्ता ने केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम के कार्य की सराहना करते हुए पुरस्कृत करने की घोषणा की.

(कथा में कुछ नाम परिवर्तित हैं)

बड़बोला (अंतिम भाग) : कैसे हुई विपुल की बहन की शादी

पूर्व कथा

विपुल में गजब का आत्मविश्वास था, जिसे देख कर बी.काम के पश्चात बिना अनुभव के अकाउंट विभाग में महेशजी का सहायक नियुक्त कर दिया गया. वह 80 किलोमीटर दूर नवगांव से आफिस समय से पहले पहुंच जाता.

काम में वह तेज था और स्वभाव में विनम्र. बस बुराई थी तो एक, उस का बढ़चढ़ कर बोलना.
विपुल ने अपनी बातों, कपड़ों, रहनसहन से आफिस वालों को अपने अमीर होने का एहसास दिला दिया. आएदिन आफिस वालों को दावत देता रहता. अपनी बातों से सब को खुश रखता था इसलिए सभी उस से प्रभावित भी थे.

आफिस की कंप्यूटर आपरेटर श्वेता के साथ उस के अफेयर की खबर गरम थी. लेकिन उस की काम के प्रति ईमानदारी और व्यवहारकुशलता के कारण किसी को उस से कोई शिकायत न थी.
वह अपनी बहन की शादी का न्योता आफिस वालों को देता है. विवाह भव्य तरीके से हो रहा है और विवाह के बाद रात को नवगांव से वापसी का सारा प्रबंध विपुल ने कर रखा है, यह जान कर सभी आफिस वाले विवाह में जाने के लिए तैयार हो जाते हैं.

अब आगे…

विपुल की बहन की शादी के दिन पूरे आफिस का स्टाफ नए शानदार चमकते कपड़े पहन कर आफिस आया. ऐसा लगा मानो आफिस बरातघर बन गया हो. महेश को संबोधित करते हुए मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है, श्वेता नजर नहीं आ रही?’’

‘‘सर, आप भी क्या मजाक करते हैं, शादी से पहले अपनी ससुराल कैसे जा सकती है. बस, आज बहन की शादी हो जाए, अगले महीने विपुल का भी बैंड बजा समझें.’’ लंच के बाद सभी बस अड्डे पहुंच गए. थोड़ी देर इंतजार करने के बाद नवगांव की बस मिली. लगभग 4 बजे बस चली. बस चलते ही महेश और सुषमा शादी की बातें करने लगे, खासतौर से शादी के इंतजाम के बारे में और मैं उन की पिछली सीट पर बैठा मंदमंद मुसकराने लगा. तभी मेरे साथ सीट पर बैठे सज्जन ने बीड़ी सुलगाई और मेरे से पूछा, ‘‘भाई साब, क्या आप भी इन लोगों के साथ नवगांव जा रहे हैं बिहारी की छोरी की शादी में?’’

‘‘आप की बात मैं समझा नहीं,’’ मैं ने बीड़ी वाले सज्जन से पूछा. बीड़ी का कश लगाते हुए उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम बांके है. मैं और बिहारी अनाज मंडी में दलाली करते हैं. बिहारी का छोरा नवयुग सिटी में किसी बड़े दफ्तर में काम करता है. ऐसा लगता है कि आप लोग उसी दफ्तर में काम करते हैं और उस की बहन की शादी में जा रहे हैं. मैं आप लोगों की बातों से समझ गया कि आप वहीं जा रहे हो, क्योंकि इतनी लंबी बातें पूरे नवगांव में बिहारी का खानदान ही कर सकता है. अगर इतना ही अमीर होता तो उस का लड़का 3 हजार की नौकरी करता, ठाट से 18 ट्रक चलाता.

‘‘बिहारी के महल्ले में रहता हूं, आप सब जिस दाल मिल की बात कर रहे हैं उसे बंद हुए 10 साल हो गए हैं. मैं और बिहारी उस दाल मिल में नौकरी करते थे. जब मिल बंद हुई तब से अनाज मंडी में दलाली कर रहे हैं,’’ बीड़ी का कश लगाते हुए बांके की आवाज में व्यंग्य था. बांके की बातें सुन कर हम सब सकते में आ गए. सब की बोलती बंद हो गई और भौचक से एकदूसरे की शक्ल देखने लगे. साहस जुटा कर बड़ी मुश्किल से आवाज निकाल कर सुषमा बोली, ‘‘अंकल, आप सच कह रहे हो, कहीं मजाक तो नहीं कर रहे हो.’’

बांके ने एक और बीड़ी सुलगाई, फिर कश लगाते हुए बोला, ‘‘नवगांव पहुंच कर देख लेना. मेरी कोई दुश्मनी थोड़े है. इतना गपोड़ी निकलेगा, पता नहीं था. पूरा नवगांव बिहारी को एक नंबर का गपोड़ी मानता है पर बेटा तो बाप से भी दस कदम आगे निकला.’’

अब बाकी का रास्ता काटना दूभर हो गया. सभी इस सोच में थे कि जल्दी से नवगांव आ जाए और हकीकत से सामना करें. तभी बस एक पुरानी बिल्ंिडग के सामने रुकी. तब बांके ने कहा, ‘‘नवगांव आ गया, यह खंडहर ही दाल मिल है, जहां बिहारी क ा छोरा 18 ट्रक चला रहा है.’’ हम सब टूटे मन से बस से उतरे. अब करते भी क्या, कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. जो दाल मिल 10 साल से बंद है उस की हालत खंडहर से कम क्या और ज्यादा क्या. कच्ची टूटी सड़क पर हम कारपेट ढूंढ़ते रह गए. अब स्टाफ का सब्र टूट गया, सब विपुल को गालियां निकालने लगे, अपनी झूठी शान के लिए विपुल इतना बड़ा झूठ बोलेगा, इस की उम्मीद किसी को नहीं थी.

तभी सामने से एक तांगे में कुछ कारपेट और कुरसियों के साथ विपुल आता दिखाई दिया. उसे देख कर सुषमा जोर से चिल्लाई, ‘‘विपुल के बच्चे, नीचे उतर. हमें बेवकूफ बना कर कहां जा रहा है. इन टूटी गड्ढे वाली सड़कों पर चल कर हमारी टांगें टूट गई हैं और तू मजे में तांगे की सवारी कर रहा है.’’ हमें देख कर विपुल तांगे से नीचे आ कर बोला, ‘‘आइए सर, कारपेट बिछने के लिए गली में जा रहे हैं. बांके अंकल, तांगे का सामान घर पहुंचवा दो, मैं सर के साथ हवेली जाता हूं.’’

महेश ने विपुल का कालर पकड़ कर पूछा, ‘‘बेटे, इतना झूठ बोलने की क्या जरूरत थी. इतने महंगे कपड़े पहन कर आए, सब खराब करवा दिए, अगर सच बता देता तब भी शादी में आते, तब और ज्यादा खुशी होती. पागल बना कर रख दिया, अब राष्ट्रपति भवननुमा हवेली के दर्शन भी करवा दे, उस को भी देख कर तृप्त हो जाएं.’’ शायद विपुल को हमारे आने की उम्मीद नहीं थी. एक पल के लिए वह हमें देख कर सन्न रह गया, लेकिन हर बड़बोले की तरह चतुराई से बातें बनाने लगा. ऐसे व्यक्ति आदत से मजबूर…हार नहीं मानते. बात को पलटते हुए बोला, ‘‘आइए सर, हवेली चलते हैं. आप सफर में थक गए होंगे, कुछ जलपान कर लेते हैं.’’

थोड़ी देर पैदल चलने के बाद हम सब हवेली में पहुंच गए. हवेली एक पुरानी इमारत निकली. हवेली को देख कर लगता था कि किसी समय जमींदार की रिहाइश रही होगी, जो अब एक धर्मशाला बन कर रह गई है, जिस के 2 तरफ कमरे बने हुए थे और बाकी 2 तरफ खाली मैदान. रोशनी के नाम पर 3-4 खंभों पर बल्ब लटक रहे थे. 2-3 कमरों में कुछ हलचल हो रही थी, जहां वरपक्ष के पुरुष तैयार हो रहे थे, कुछ महिलाएं तैयार हो कर तांगे पर बैठ कर जा रही थीं. तभी विपुल ने सफाई देते हुए कहा, ‘‘हमारे यहां औरतें बरात के साथ नहीं जातीं, इसीलिए पहले हमारे घर जा रही हैं.’’

हलवाई ने विपुल के आग्रह पर कुछ पकौड़े तल दिए और चाय बना दी. जलीभुनी बैठी सुषमा जलीकटी सुनाने लगी, ‘‘विपुल, तू ने यह अच्छा काम नहीं किया, इतना झूठ तो कोई अपने दुश्मन से भी नहीं बोलता. सारा मेकअप खराब हो गया, इतनी महंगी साड़ी धूल से सन गई, ड्राईक्लीनिंग के पैसे तेरे से लूंगी.’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं,’’ झेंपती हंसी के साथ विपुल बोला.

‘‘इतनी भूख लग रही है और खिलाने को तुझे ये सड़े हुए बैगन और सीताफल के पकौड़े ही मिले थे. नहीं चाहिए तेरी दावत. इस से तो उपवास अच्छा,’’ कहते हुए सुषमा ने पकौड़े की प्लेट विपुल को ही पकड़ा दी. विपुल ने एक पकौड़ा मुंह में डालते हुए कहा, ‘‘सुषमा, नाराज नहीं होते, फाइव स्टार होटल से अच्छे पकौड़े हैं.’’ ‘‘तेरे घर का एक बूंद पानी भी नहीं पीना,’’ सुषमा तमतमाती हुई बोली.

‘‘सर, इस में नाराजगी की क्या बात है. आप इतनी दूर से आए हैं, कुछ तो लीजिए,’’ पकौड़ों की प्लेट मेरे आगे करते हुए विपुल ने कहा. एक पकौड़ा खाते हुए मैं सुषमा से बोला, ‘‘छोड़ो नाराजगी, भूखे पेट रहना ठीक नहीं, कुछ खा लो,’’ लेकिन सुषमा टस से मस नहीं हुई. उस ने कुछ नहीं खाया.

सुषमा और महेश ने अपनी नाराजगी विपुल को जाहिर कर दी. बाकी स्टाफ चुप रहा, लेकिन मेरे समेत सभी दुखी थे. हम विपुल के घर गए तो वहां घर के साथ वाला प्लाट खाली था, जहां खाने का प्रबंध था. शहरी वातावरण से बिलकुल उलट दरियों पर बैठ कर खाने का प्रबंध था. शादी का माहौल देख कर पूरा स्टाफ दंग रह गया. तभी बरात आ गई. आतिशबाजी के नाम पर बंदूक के दोचार फायर देखने को मिले.

भूख से बुरा हाल हुआ जा रहा था, इसलिए चुपचाप दरियोें पर बैठ गए, लेकिन सुषमा ने तो जैसे प्रण कर लिया था. वह अपने इरादे से नहीं पलटी. उस ने खाना तो दूर, पानी की एक बूंद भी नहीं ली. विपुल ने काफी आग्रह किया, लेकिन सब बेकार. महेश का मन खाने से अधिक वापस जाने की जुगाड़ में लगा था. अत: गुस्से में भुनभुनाता बोला, ‘‘कसम लंगोट वाले की, ऐसी बेइज्जती कभी नहीं हुई. विपुल से ऐसी उम्मीद नहीं थी. सर, मुझे चिंता वापस जाने की है. यहां रहने का कोई इंतजाम नहीं है, रात को कोई बस भी नहीं जाती है. सुबह आफिस कैसे पहुंचेंगे. स्टाफ की लड़कियां परेशान हैं, उन के घर कैसे सूचना दें कि हम यहां फंस गए हैं.’’

हमारी बातें सुन कर साथ में बैठे वरपक्ष के एक सज्जन बोेले, ‘‘आप कितने व्यक्ति हैं, हमारी एक बस खाना खत्म होने के बाद वापस मेरठ जाएगी. हम आप को नवयुग सिटी के बाईपास पर छोड़ देंगे. शहर के अंदर बस नहीं जाएगी, क्योंकि वहां जाने से हमें देर हो जाएगी.’’

यह बात सुन कर पूरा स्टाफ खुशी से झूम उठा. जहां दो पल पहले खाने का एक निवाला गले के नीचे जाने में अटक रहा था, अब भूख से ज्यादा खाने लगे. ऐसा केवल खुशी में ही हो सकता है. वरपक्ष के उस सज्जन को धन्यवाद देते हुए हम सब बस में जा बैठे. यह उन का बड़प्पन ही था कि बस में जगह न होते हुए भी हम 8 लोगों को बस में जगह दी, स्टाफ की लड़कियों को सीट दी और खुद ड्राइवर के केबिन में बोनट पर बैठ गए. रात के 1 बजे नवयुग सिटी के बाईपास पर बस ने हमें उतारा. चारों तरफ सन्नाटा, सब से बड़ी समस्या बस अड्डे जाने की थी, जहां हमारे स्कूटर खड़े थे. मन ही मन सब विपुल को कोस रहे थे कि कहां फंसा दिया, कोई आटो- रिकशा भी नहीं मिला. आधे घंटे इंतजार के बाद एक रोडवेज की बस रुकी, तब जान में जान आई. हालांकि बस ने पीछे से किराया वसूल किया. उस समय हम कोई भी किराया देने को तैयार थे, हमारा लक्ष्य केवल अपने घरों को पहुंचने का था.

अगले दिन गिरतापड़ता आफिस पहुंचा. पूरे आफिस में सन्नाटा. सिर्फ कंप्यूटर आपरेटर श्वेता ही आफिस में थी. मैं कुरसी पर बैठेबैठे कब सो गया, पता ही नहीं चला. दोपहर के 2 बजे महेश ने आ कर मुझे जगाया. बाकी समय हम दोनों सिर्फ शादी की बातें करते रहे. श्वेता के कान हमारी तरफ थे. हम ने तो अपनी भड़ास कह कर निकाल दी, लेकिन वज्रपात श्वेता पर हुआ, बेचारी के सारे सपने टूट गए. कहां तो उस ने एक राजकुमार से शादी का सपना संजोया था और वह राजकुमार फक्कड़ निकला. बात को बढ़ाचढ़ा कर कहने की आदत तो बहुतों की होती है, लेकिन 1 का 500 विपुल बना गया. श्वेता इस आडंबरपूर्ण झूठ को सह नहीं सकी और उस ने 3-4 दिन बाद त्यागपत्र दे दिया. आफिस में सब विपुल के व्यवहार

से नाराज थे, लेकिन हम कर भी कुछ नहीं सकते थे. जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा वाली कहावत आखिर चरितार्थ हो गई. एक दिन शाम को जब विपुल आफिस से निकला तो श्वेता के भाई ने अपने 3 दोस्तों के साथ उसे घेर लिया और हाकी से उस की जम कर पिटाई करने लगे. विपुल अपने बचाव में जोरजोर से चिल्लाने लगा, लेकिन ऐसे मौके पर लोग केवल तमाशबीन बन कर रह जाते हैं, कोई बचाने नहीं आता. तभी हम और महेश वहां से गुजरे तो भीड़ देख कर महेश रुक गया. विपुल की आवाज सुन कर महेश मुझ से बोला, ‘‘सर, यह तो अपना विपुल है.’’

विपुल को पिटता देख कर हम दोनों उसे बचाने की कोशिश करने लगे. उस के बचाव के चक्कर में हम भी पिट गए. हमारे कपड़े भी फट गए. हमें देख कर भीड़ में से कुछ लोग बचाव को आगे बढ़े तो हमलावर भाग गए. विपुल की बहुत पिटाई हुई थी. आंखें सूज गईं, शरीर पर जगहजगह नीले निशान पड़ गए थे. उसे पास के नर्सिंगहोम में इलाज के लिए ले गए, जहां उसे 2 दिन रहना पड़ा. ‘‘देख लिया अपने बड़बोलेपन का नतीजा, इतनी सुंदर सुशील कन्या का दिल तोड़ दिया. क्याक्या सपने संजो कर रखे थे उस ने, सब बरबाद कर दिया. शुक्र कर हम वहां पहुंच गए वरना तेरा तो क्रियाकर्म आज हो जाता. मैं तो कहता हूं कि अब भी समय है, संभल जा और आज की पिटाई से सबक ले.’’

विपुल चुपचाप सुनता रहा. महेश का भाषण जले पर नमक का काम कर रहा था, लेकिन कड़वी दवा तो पीनी ही पड़ती है. ऐसा आदमी अपनी आदत से मजबूर होता है, फिर उसी रास्ते पर चल पड़ता है. कुछ दिन खामोश रहने के बाद विपुल की बोलने की आदत फिर शुरू हो गई, लेकिन अब स्टाफ के लोग उस की बातों को गंभीरता से नहीं लेते थे. एक दिन विपुल मेरे केबिन में आया और बोला, ‘‘सर, आप की हेल्प की जरूरत है.’’

‘‘बोलो, विपुल, अगर मेरे बस में होगा तो जरूर करूंगा.’’ यहां नवयुग सिटी में सरकार ने प्लाट काटे हैं. डैडी ने नवगांव का मकान बेच कर यहां एक प्लाट खरीदा है और कोठी बनवानी है. आप को मालूम है कि ठेकेदार, मजदूरों के सिर पर बैठना पड़ता है, नहीं तो वे काम नहीं करते. सुबह कुछ देर से आने की इजाजत मांगनी है, शाम को देर तक बैठ कर आफिस का काम पूरा कर लूंगा, कोई काम पेंडिंग नहीं होगा. हम ने यहां किराए पर मकान ले लिया है, शाम को डैडी कोठी के कंस्ट्रेक्शन का काम देख लेंगे. बस, 1 महीने की बात है, सर.’’

मैं ने उस को इजाजत दे दी और सोचने लगा कि 1 महीने में कौन सी कोठी बन कर तैयार होती है, तभी महेश केबिन में आया. ‘‘विपुल अंगरेजों के जमाने का बड़बोला है, जिंदगी में कभी नहीं सुधरेगा.’’

‘‘अब क्या हो गया?’’ ‘‘सर, सेक्टर 20 में तो 25 और 50 गज के प्लाट प्राधिकरण काट रहा है, वहां कौन सी कोठी बनवाएगा. मकान कहते शर्म आती है, इसलिए कोठी कह रहा है. यदि उस की 50 गज में कोठी है, तो सर, मेरा 100 गज का मकान तो महल की श्रेणी में आएगा.’’

मैं महेश की बातें सुन कर हंस दिया और जलभुन कर महेश विपुल को जलीकटी सुनाने लगा. खैर, विपुल ने 1 महीना कहा था, लेकिन लगभग 4 महीने बाद मकान बन कर तैयार हो गया. मकान के गृहप्रवेश पर विपुल ने पूरे स्टाफ को आमंत्रित किया, लेकिन स्टाफ ने कोई रुचि नहीं दिखाई. सब बड़े आराम से आफिस के काम में जुट गए. मेरे कहने पर सब ने एकजुट हो कर विपुल के यहां जाने से मना कर दिया.

‘‘महेश, बड़े प्रेम से विपुल ने गृहप्रवेश पर बुलाया है, हमें वहां जाना चाहिए.’’ ‘‘सर, मुझे चलने को मत कहिए, उस की कोठी मैं बरदाश्त नहीं कर सकूंगा. मैं अपने झोंपड़े में खुश हूं.’’

‘‘महेश, आफिस से 2 घंटे जल्दी चल कर बधाई दे देंगे, उस की कोठी हो या झोंपड़ा, हमें इस से कुछ मतलब नहीं. वह अपनी कोठी में खुश और हम अपने झोंपड़े में खुश.’’

यह बात सुन कर महेश खुशी से उछल पड़ा और बोला, ‘‘कसम लंगोट वाले की, आप की इस बात ने दिल बागबाग कर दिया. अब आप का साथ खुशीखुशी.’’ शाम को 4 बजे हम आफिस से चल कर विपुल की कोठी पहुंचे. 50 गज के प्लाट पर दोमंजिला मकान था विपुल का. महेश ने चुटकी ली, ‘‘यार, कोठी के दर्शन करवा, बड़ी तमन्ना है, दीदार क रने की.’’

‘‘हांहां, देखो, यह ड्राइंगरूम, रसोई, बैडरूम…’’ अपनी आदत से मजबूर साधारण काम को भी बढ़ाचढ़ा कर बताने लगा कि कोठी के निर्माण में 50 लाख रुपए लग गए. ‘‘सुधर जा, विपुल, 5 के 50 मत कर.’’

‘‘नहींनहीं, आप को पता नहीं है कि हर चीज बहुत महंगी है. जिस चीज को हाथ लगाओ, लाखों से कम आती नहीं है,’’ विपुल आदत से मजबूर सफाई देने लगा. ‘‘विपुल, समय बड़ा बलवान है, इतना झूठ बोलना छोड़ दे, एक

दिन तेरा सच भी हम झूठ मानेंगे. सुधर जा.’’ ‘‘बाई गौड, झूठ की बात नहीं है, बिलकुल सच है,’’ विपुल सफाई पर सफाई दे रहा था.

हम ने वहां से खिसकने में ही अपनी बेहतरी समझी. विपुल से बहस करना बेकार था. हम ने उसे शगुन का लिफाफा पकड़ाया और विदा ली. मकान से बाहर आ कर हम दोनों के मुख से एकसाथ बात निकली :

‘‘विपुल कभी नहीं सुधरेगा. बड़बोला था, बड़बोला है और बड़बोला रहेगा.’

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के साइड इफैक्ट्स

शादी के बाद पतिपत्नियों को यह जानने में जरा भी देर नहीं लगती कि उन का साथी पहले जैसा नहीं रहा. आखिर इस मनमुटाव का क्या कारण है? दरअसल, अधिकांश केसों में पतिपत्नी के बीच झगड़े का मुख्य कारण अतृप्त सैक्स संबंध हैं. सैक्स संबंधों की वैवाहिक जीवन में पतिपत्नी दोनों को आवश्यकता होती है.

महिलाओं में शुरू से ही लज्जा, शर्म और संकोच होता है. वैवाहिक जीवन के बाद भी वे सैक्स संबंधों के बारे में खुल कर बात नहीं कर पातीं. यही कारण है कि स्त्री सैक्स का चरमसुख प्राप्त करने के बारे में स्वयं कुछ नहीं कहती. लेकिन सैक्स एक ऐसी आग है, जो भड़कने के बाद आसानी से शांत नहीं होती.

स्त्रियों की परपुरुष के प्रति आसक्ति

‘‘जब मैं ने पहली बार परपुरुष से संबंध बनाया तब मुझे पता चला कि शारीरिक सुख का असल मजा क्या है वरना पति के साथ तो बस खानापूर्ति ही थी. वे तो अपना काम कर के सो जाते थे. एक बार भी पूछने की जरूरत नहीं  समझते थे कि मुझे संतुष्टि हुई या नहीं. जैसे मैं एक खिलौना हूं. जब तक मन हुआ खेला, फिर सो गए. अब तो मुझे परपुरुष से ही मजा आता है. वैसे भी इस में हरज ही क्या है,’’ यह कहना है मेरी एक फ्रैंड का.

जब मैं ने पूछा कि डर नहीं लगता तो वह बोली, ‘‘इस में डर कैसा?’’

कभीकभी कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं जो अपनी सैक्स की भूख को शांत करने के लिए सुखसुविधा भरे जीवन को ठोकर मार ऐसे पुरुष के पास चली जाती हैं, जो उन की सैक्स इच्छा को पूरी कर सके.

सपना ने भी तो यही किया था. उस की शादी दानिश से हुई थी. दानिश के पास काफी पैसा था. जब दोनों की शादी हुई थी तब पहली रात को ही सैक्स संबंध के दौरान सपना को पता चल गया था कि दानिश शीघ्रपतन का रोगी है. लेकिन दानिश अपनी पत्नी की अतृप्त इच्छा से बेखबर सिर्फ अपने काम में उलझा रहता. इस के बारे में सोचने का समय ही नहीं था.

अपने पति से सैक्स संबंधों में संतुष्टि न मिलने से वह मानसिक रूप से परेशान रहने लगी. एक तो सपना घर में अकेली थी फिर घर में करने के लिए कोई काम भी नहीं था. ऐसे में वह अपने पड़ोस में रहने वाले एक कालेज के विद्यार्थी के प्रति आकर्षित हो गई. धीरेधीरे आकर्षण बढ़ने लगा. सपना जब भी उस के साथ होती उस के मन में दबी सैक्स की इच्छा बढ़ने लग जाती.

एक दिन सपना अपनेआप पर काबू नहीं रख पाई. उस से लिपट उसे बेतहाशा चूमने लगी. इस तरह सपना के लिपटने और चुंबन करने से वह लड़का भी अपनेआप को रोक नहीं पाया और दोनों में सैक्स संबंध बन गया. दोनों ने उस दिन सैक्स का भरपूर आनंद उठाया. सपना को उस दिन सैक्स से जो शारीरिक व मानसिक सुख मिला वह पहले कभी नहीं मिला था.

धीरेधीरे दोनों के बीच सैक्स इच्छा बढ़ने लगी. एक दिन सपना ने घर छोड़ कर जाने का फैसला किया और मौका पा कर अपने घर से जितना हो सका उतने पैसेजेवर ले कर उस के साथ भाग गई. उस लड़के के दिखाए सपने में शायद उसे अच्छेबुरे का ध्यान ही नहीं रहा.

एक दिन वह लड़का सारे जेवर ले कर भाग गया. अब सिवा पछतावे के उस के पास कुछ नहीं था. घर लौटना चाहा पर सपना को उस के पति ने अस्वीकार कर दिया.

इस तरह सैक्स का अधूरापन स्त्री को दूसरे पुरुष के पास जाने पर मजबूर कर सकता है.

सैक्स का ज्ञान

सैक्स के मामले में पुरुष की मानसिकता अजीब होती है. वह सैक्स करते समय स्वयं तो सैक्स का पूरा आनंद लेना चाहता है, जबकि वह कभी यह जानने की कोशिश नहीं करता कि क्या इस सैक्स संबंध से स्त्री को आनंद मिला? वह संतुष्ट हो पाई?

पुरुषों में सैक्सक्षमता प्रभावित होने के भी बहुत से कारण हैं जैसे लिंग में तनाव न आना या लिंग का जल्दी ढीला पड़ जाना अथवा शीघ्र स्खलन आदि. इन सभी सैक्स संबंधी समस्याओं से पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां बहुत अधिक प्रभावित होती हैं. जब इस प्रकार की समस्याएं हर सैक्स संबंध के दौरान आती हैं, तब वे अपनेआप को बहकने से नहीं रोक पातीं. वे ऐसे पुरुष की ओर आकर्षित होने लगती हैं जो उन की सैक्स इच्छा को पूरी कर सके.

लेकिन जब पत्नी के इन अनैतिक संबंधों का पता उस के पति को चलता है तो उन का वैवाहिक जीवन तो नष्ट होता ही है, साथ ही परिवार में झगड़ा, विघटन व अन्य सामाजिक परेशानियां भी उत्पन्न हो जाती हैं.

पतिपत्नी के बीच झगड़ा

ऊंची महत्त्वाकांक्षा: अपने पति को छोड़ कर किसी दूसरे पुरुष से विवाह कर लेने या उस के साथ भाग जाने का कारण केवल सामाजिक रीतिरिवाज, पारिवारिक समस्या और यौन संबंधों में कमी ही नहीं है, बल्कि स्त्री के मन में उत्पन्न इच्छाएं और आकांक्षाएं भी हैं. अच्छी सुखसुविधा की इच्छा करना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन उस इच्छा और कल्पना में अपनी वास्तविकता को भूल जाना मूर्खता है.

आजकल अधिकांश लड़कियां अपनी इन्हीं इच्छाओं के कारण अनेक प्रकार की समस्याओं में फंस जाती हैं और गलत रास्ते पर चल पड़ती हैं.

रीता ग्रैजुऐशन करतेकरते ऐसे पति की कल्पना करने लगी जो उसे शारीरिक संतुष्टि के साथसाथ उस की सभी इच्छाओं को भी पूरी कर सके. कुछ समय बाद रीता की शादी जिस लड़के से हुई वह एक कंपनी में अकाउंटैंट था. इस काम में उसे जितना पैसा मिलता था वह घर चलाने के लिए काफी होता था. लेकिन यह पैसा रीता की इच्छाओं को पूरी करने के लिए काफी नहीं था. इसलिए वह नौकरी की तलाश करने लगी. एक औफिस में उसे पर्सनल सैक्रेटरी की नौकरी मिल गई. उस की सुंदरता पर उस का बौस लट्टू हो गया. वह रीता को समयसमय पर पैसे देने लगा. इस के बाद वह उसे महंगे उपहार देने लगा. कभीकभी दोनों होटल में खाना खाने भी जाने लगे. ये नजदीकियां जल्द ही शारीरिक संबंधों में तबदील हो गईं.

अब रीता का मन अपने पति के लिए बदलने लगा. काम के बहाने 2-4 दिनों के लिए घर से बाहर चली जाती और जगत के साथ खूब ऐश करती.

कुछ समय तक दोनों इसी तरह मौज करते रहे. इस के बाद धीरेधीरे रीता ने उस से शादी की बात करनी शुरू कर दी. वह अकसर सैक्स संबंध के दौरान बौस से शादी के लिए कहती. वह अकसर टाल देता कि पहले अपने पति से तलाक ले ले. रीता तलाक लेने के लिए तैयार हो गई और उस ने तलाक ले लिया. फिर दोनों एकसाथ एक ही घर में रहने लगे.

एक सुबह जब रीता उठी तो घर में वर्तमान पति को कहीं न पा कर परेशान हो गई. वह औफिस में गई तो पता चला कि वह लंदन चला गया है और उस के नाम का एक लैटर छोड़ गया है.

लैटर में लिखा था, ‘‘प्यारी रीता, मैं आज सुबह की फ्लाइट से लंदन जा रहा हूं. मैं ने जितना समय तुम्हारे साथ बिताया है वह मुझे हमेशा याद रहेगा. मैं कंपनी के काम से यहां आया था और यहां मेरा काम खत्म हो जाने के बाद मैं वापस जा रहा हूं. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता था, क्योंकि जो स्त्री अपने पति की न हो सकी वह मेरी क्या होगी? जो मेरे पैसे को देख कर अपने पति का घर छोड़ सकती है, वह कल मुझ से अधिक पैसे वाले के लिए मुझे भी छोड़ सकती है.’’

अब रीता के पास खुद को कोसने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था.

पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव: हमारे देश की संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों से आज भी जहां पूरी दुनिया प्रभावित होती है, वहीं हम अपने संस्कारों और संस्कृति को छोड़ कर पश्चिमी देशों की संस्कृति को अपना रहे हैं. हाई सोसाइटी में इस तरह का व्यवहार आम होता जा रहा है.

कुछ साल पहले की बात है. मुरादाबाद से 3 नवविवाहित जोड़े हनीमून पर नैनीताल गए. तीनों ने दूसरी रात पत्नियों की अदलाबदली की. पर उन में से एक की पत्नी ऐसे संबंधों को तैयार नहीं हुई और उस ने शोर मचाने की धमकी दे डाली. कहने का अर्थ है कि दूसरे देशों के प्रभाव में आ कर हमें अपने देश की संस्कृति, सभ्यता और संस्कार को नहीं भूलना चाहिए वरन इन्हें बचाने के लिए पश्चिमी देशों के प्रभावों से बचना चाहिए.

निराशा, तालमेल की कमी, खटपट और बेरुखी तो सिर्फ चंद वजहें हैं, जिन की वजह से शादीशुदा जिंदगी में प्यार की कमी हो सकती है. बेशक इस की कई और भी वजहें हैं, मगर वजह चाहे जो भी हो, क्या उन पतिपत्नियों के लिए कोई आशा है जो शादी के ऐसे बंधन में बंधे हैं?

एकदूसरे को एक मौका जरूर दें. साथ बिताए पलों को साथ बैठ याद करें. कोई भी गलत कदम उठाने से पहले उस के साइड इफैक्ट्स के बारे में जरूर सोचें.

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