सरकार और उच्चतम न्यायालय के बीच खाई बढ़ती जा रही है. हालांकि कई न्यायाधीशों को सरकारी इशारे पर चलने के खुले संकेत दिए जा रहे हैं, सभी न्यायाधीशों की सामूहिक आवाज के कारण सरकारपसंद न्यायाधीश भी चुपचुप हैं और न्यायाधीशों के मामले में बहुमत का आदर करने को विवश हैं. भारतीय जनता पार्टी जानबूझ कर ऐसे न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय में भेजना चाहती है जो उस की नीतियों का समर्थन करते हैं. अमेरिका में यह खुल्लमखुल्ला चर्चा होती है कि कौन सा न्यायाधीश किस राष्ट्रपति ने नियुक्त किया था और वह किस मसले पर कैसा निर्णय देगा. हमारे न्यायाधीश पिछले 3-4 दशकों से खासे स्वतंत्र रहे हैं और वे खुद ही नए न्यायाधीश नियुक्त करते रहे हैं और इस प्रक्रिया को सरकार भी मानती रही.

न्यायाधीशों की नियुक्ति यदि न्यायाधीश खुद करें तो अच्छा है, क्योंकि वे फिर किसी तरह से भी मनमानी नहीं कर सकते. न्यायाधीश दक्षिणपंथी हों या वामपंथी, उन के पास चूंकि सरकार की शक्तियां नहीं होतीं, वे गलत फैसले नहीं ले सकते. वे डाक्टरों की तरह हैं जो फैसले मरीज को देख कर करते हैं और डाक्टरों की नियुक्ति चाहे वरिष्ठ डाक्टर करें या सरकार. सरकारी नीतियों को तो इलाज में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसी तरह न्याय सामाजिक, पारिवारिक, व्यावसायिक, सरकारी बीमारियों का इलाज है और सरकार या लिटिगैंट खुद न्यायाधीश नियुक्त करेंगे तो गलत निर्णय होंगे ही. न्याय नहीं चाहता कि मरीज बेमौत मारा जाए.

उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ से केंद्र की भाजपा सरकार चिढ़ी हुई है, क्योंकि उन्होंने कुछ वर्षों पहले भारतीय जनता पार्टी को विधायकों की खरीदफरोख्त के बल पर सत्ता में आने से रोक दिया था. सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने पर सहमत नहीं हो रही है और न्यायाधीश उन्हें नियुक्त करने की सिफारिश भेज चुके हैं. न्यायपालिका और कार्यपालिका का यह द्वंद्व पुराना है पर अब तक काम चल रहा था. अब डर लग रहा है कि चुनाव आयोग की तरह यह संस्था भी सरकारी नकाब न पहन ले और इंदिरा गांधी का युग वापस न आ जाए जब न्यायाधीश बनते ही प्रधानमंत्री की सिफारिश पर थे.

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