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अटल की विरासत

लंबी बीमारी के बाद भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी का 93 वर्ष की आयु में निधन होने से देश ने एक लोकप्रिय नेता खो दिया. भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा को दूसरे दलों के लिए सहज बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी का बहुत बड़ा योगदान रहा. भारतीय जनसंघ का स्वरूप असल में कट्टरवादी हिंदू का था जिसे कम्युनिस्ट, समाजवादी तो छोडि़ए, स्वतंत्र पार्टी जैसी पार्टियां भी सहज न ले पाती थीं पर अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने सौम्य व मिलनसार व्यवहार से भारतीय जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी को सब के लिए सहयोग करने योग्य बना दिया.

1977 में अटल बिहारी वाजपेयी के कारण ही कांग्रेस का एक हिस्सा, कम्युनिस्ट, समाजवादी, लोकदल और दूसरे कई एक मंच पर आए और उन्होंने इंदिरा गांधी को हराया ही नहीं, बल्कि आपातस्थिति को इस्तेमाल करने के संवैधानिक हथियार को सदासदा के लिए दफना भी दिया.

1977 से 1981 के दौरान राज में भागीदार होने के बाद भाजपा को 18 वर्षों तक इंतजार तो करना पड़ा पर अगर वह इन 18 वर्षों तक विपक्षी धुरी बनी रही तो अकेले अटल बिहारी वाजपेयी के ही कारण. वाजपेयी कट्टरवादी हिंदू संघ के होने के बावजूद दूसरों को भी सहज लेने में विश्वास करते थे और उन का व्यवहार दोस्ताना था.

आज जो भारतीय जनता पार्टी अपनेआप में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को समेट पा रही है उस में बड़ी भूमिका अटल बिहारी वाजपेयी की डाली नींव की है. भाजपा नेता व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असल में इसी का लाभ उठा रहे हैं. नरेंद्र मोदी तो वास्तव में अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को नष्ट करने में लगे हैं. मौजूदा भाजपा व मोदी की नीतियों के चलते मुसलमान तो भयभीत हैं ही, दलित और पिछड़े भी रुष्ट हो चले हैं.

‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा’ के सिद्धांत को मानने वाले अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदूवादी पार्टी को बाधकों की पार्टियों के कट्टर चोले से निकाल कर उसे सब के लायक बनाया था और 1984 में केवल 2 सीटें लोकसभा में जीतने के बावजूद हार नहीं मानी और 1998 में फिर सत्ता पा ली, उस बार अपने दम पर.

2005 के बाद सक्रिय न रह कर अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय राजनीति को कट्टरवादियों के हाथों में फिसल जाने दिया. 2004 में पार्टी की हार का मुख्य कारण अटल बिहारी वाजपेयी नहीं, वे कट्टरवादी थे जो

‘जरूरी यह है कि ऊंचाई के साथ विस्तार भी हो, जिस से मनुष्य ठूंठ सा खड़ा न रहे, औरों से घुलेमिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले’ के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते. पार्टी के दूसरे नेताओं के अहं व अहंकार के कारण व रार पालने अर्थात बदले की भावना से काम करने की प्रवृत्ति ने पार्टी को 2004 व 2009 में पराजय दिलाई.

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के लिए विरासत में बहुत सारी सोच दे गए हैं पर उन्हें उन के पीछे पैदल चलने वाले बंद संदूक में रखेंगे, यह पक्का है.

दिल्ली पुलिस के इंसानी रोबोट हैं बलजीत राणा

अधिकांश वेतनभोगी कर्मचारी छुट्टियां पाने के लिए लालायित रहते हैं. वे विभाग से मिलने वाली हर तरह की छुट्टी का लाभ लेने की भी कोशिश करते हैं. यानी किसी भी छुट्टी को जाया नहीं करना चाहते.

इस के विपरीत दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ऐसे भी हैं जिन्होंने पिछले 20 सालों से कोई छुट्टी नहीं ली. अर्जित अवकाश, आकस्मिक अवकाश, चिकित्सा अवकाश आदि की बात तो छोडि़ए, उन्होंने शनिवार, रविवार के साप्ताहिक अवकाश भी नहीं लिए.

पिछले 20 सालों से वह सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक लगातार ड्यूटी करते आ रहे हैं. और तो और रिटायर होने के बाद भी वह पहले की तरह अपनी ड्यूटी को अंजाम दे रहे हैं. विभाग में इस अधिकारी को इंसानी रोबोट के नाम से जाना जाता है.

इस इंसानी रोबोट का नाम है बलजीत सिंह राणा. बलजीत सिंह राणा मूलरूप से हरियाणा के सोनीपत ्जिले के कुंडल गांव के रहने वाले श्रीराम राणा के बेटे हैं. उन का जन्म 14 अगस्त, 1952 को हुआ था. श्रीराम राणा आसपास के गांवों में नंबरदार के नाम से जाने जाते थे. उन के 3 बच्चे थे. बेटी शकुंतला, बलजीत सिंह और जगदीश सिंह. इन में बलजीत सिंह मंझले नंबर के थे.

बलजीत सिंह ने 1971 में गांव के ही सरकारी स्कूल से हाईस्कूल की परीक्षा पास की. बलजीत बताते हैं कि दिल्ली पुलिस में उन की भरती मौजमजे में ही हो गई थी. वह दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने आए थे. वहां आ कर पता चला कि किंग्सवे कैंप में दिल्ली पुलिस के लिए कांस्टेबल की भरती चल रही है.

बलजीत भी जा कर कतार में खड़े हो गए. शारीरिक रूप से वह हृष्टपुष्ट थे, इसलिए शारीरिक नापतौल में फिट पाए गए. बाद में उन्होंने दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती की सूचना अपने घर वालों को दे दी. यह बात पहली सितंबर, 1972 की है.

कांस्टेबल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 1973 में उन की पहली पोस्टिंग राष्ट्रपति भवन में हुई. वहां 4 साल नौकरी करने के बाद उन का ट्रांसफर नई दिल्ली के संसद मार्ग थाने में कर दिया गया. यहां पर इन की ड्यूटी डिप्लायमेंट सेल में लगा दी.

इस सेल में काम करने वालों के साथ चौबीसों घंटे सिरदर्दी बनी रहती है. वीआईपी, वीवीआईपी मूवमेंट, विदेशी मेहमानों की सुरक्षा, रूट निर्धारण, विभिन्न धरनाप्रदर्शनों को शांतिपूर्वक संपन्न कराना, फोर्स का इंतजाम करना आदि जिम्मेदारी इसी सेल की होती है. यहां काम करने वालों की ड्यूटी हर वक्त तलवार की धार पर टिकी रहती है.

बलजीत सिंह ने यहां मन लगा कर काम किया. तत्कालीन पुलिस उपायुक्त बी.के. गुप्ता ने सन 1982 में बलजीत सिंह का प्रमोशन कर हैडकांस्टेबल बना कर उन्हें डिप्लायमेंट सेल का इंचार्ज बना दिया. इंचार्ज बन जाने के बाद उन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं.

इस पद पर रहने से जरा सी गलती का होना दिल्ली और देश में बवाल मचाने वाली खबरों को जन्म देना था. डीसीपी बी.के. गुप्ता ने उन्हें इसी संवेदनशील पद की जिम्मेदारी दे दी. उन्होंने अपनी इस जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया.

सन 1992 में तत्कालीन डीसीपी कंवलजीत देओल ने बलजीत सिंह का प्रमोशन कर उन्हें एएसआई बना दिया. अपनी मेहनत के बलबूते वह प्रमोट हो कर सन 1998 में एएसआई से एसआई बन गए. उस समय नई दिल्ली जिले के डीसीपी टी.एन. मोहन और पुलिस कमिश्नर वी.एन. सिंह थे.

सबइंसपेक्टर बनने के बाद तो वह एक तरह से दिल्ली पुलिस के ही बन कर रह गए. उन की पोस्टिंग संसद मार्ग थाने में ही डिप्लायमेंट सेल के इंचार्ज के रूप में रही. वह सुबह 7 बजे अपनी ड्यूटी पर पहुंच जाते और रात 11 बजे तक ड्यूटी पर रहते. घर जाने से पहले वह स्टाफ का अरेंजमेंट कर के जाते थे.

इस के बाद उन का ड्यूटी का यही सिलसिला चलता रहा. उन्होंने किसी भी तरह की कोई छुट्टी नहीं ली. साप्ताहिक अवकाश हो या कोई त्यौहार, वह उस दिन भी अपनी ड्यूटी बखूबी पूरी करते. कहने का मतलब साल के 365 दिन बड़ी ही जिम्मेदारी से अपनी ड्यूटी करते रहे.

बारहों महीने लगातार रोजाना 16 घंटे तक ड्यूटी पूरी करने वाले इस पुलिस अफसर की विभाग में चर्चा होने लगी. अन्य पुलिस वाले इस बात पर आश्चर्यचकित होने लगे कि लगातार इतनी कठिन ड्यूटी करने के बाद वह कभी बीमार नहीं होते. वास्तव में बलजीत सिंह कभी बीमार नहीं हुए.

अपनी ड्यूटी पर पूरी तरह समर्पित रहने वाले बलजीत राणा के सामने कई समस्याएं भी आईं. वह अपने रिश्तेदार या परिचित के शादी समारोह या अन्य सामाजिक कार्यों में भाग नहीं ले पाते थे, अपने बच्चों तक को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे. ऐसे में उन की पत्नी सुशीला ने उन की यह जिम्मेदारी निभाई. वही घर और समाज की सभी जिम्मेदारियां पूरी करती थीं.

सरकारी विभागों में डिपार्टमेंटल सर्विस रिकौर्ड शीट में लिखी गई टिप्पणी बहुत कुछ कैरियर पर निर्भर करती है. बलजीत सिंह ने बताया कि नई दिल्ली जिले के तत्कालीन एडीशनल पुलिस कमिश्नर केशव द्विवेदी ने जैसी उन की एसीआर लिखी, वैसी कम ही मिलती है. उन्होंने लिखा था, ‘मैं ने अपनी सर्विस में ऐसा कोई कर्मचारी नहीं देखा, जिस ने छुट्टी न ली हो. मैं हैरान हूं. राणा ने 24 घंटे और 365 दिन नौकरी को दिए हैं.’

अपनी ड्यूटी के लिए समर्पित रहने वाले बलजीत सिंह राणा विभाग में एक चलतेफिरते बोलने वाले इंसानी रोबोट के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे. वह सन 2012 में सेवानिवृत्त हो गए.

यानी उन्होंने 7454 दिन बिना किसी छुट्टी के रोजाना सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक ड्यूटी की. इसे इत्तफाक ही कहा जाएगा कि जिन आईपीएस अधिकारी बी.के. गुप्ता ने उन्हें नई दिल्ली जिले के डिप्लायमेंट सेल का इंचार्ज बनाया था, उन्हीं बी.के. गुप्ता के पुलिस कमिश्नर के कार्यकाल में बलजीत राणा रिटायर हुए.

तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बी.के. गुप्ता बलजीत राणा के काम से बहुत खुश थे. उन के रिटायरमेंट के बाद भी वह उन्हें इसी पद पर बनाए रखना चाहते थे. इसलिए वह खुद बलजीत राणा को तत्कालीन उपराज्यपाल के पास ले गए.

कमिश्नर ने उपराज्यपाल से बलजीत राणा को कंसलटेंट पद पर बने रहने की अनुमति देने की सिफारिश की तो उपराज्यपाल ने पुलिस कमिश्नर की सिफारिश पर मोहर लगाते हुए बलजीत राणा को कंसलटेंट के पद पर अस्थाई रूप से बने रहने की अनुमति दे दी. साथ ही उन की 10,570 रुपए प्रतिमाह की सैलरी भी निर्धारित कर दी. लेकिन बलजीत ने बिना सैलरी लिए काम करने की इच्छा जाहिर की.

पिछले 6 सालों से वह लगातार अपने पुराने रूटीन पर ही संसद मार्ग थाने में बिना कोई पैसे लिए ड्यूटी कर रहे हैं. 66 साल के बलजीत राणा का शरीर अभी भी बहुत फुरतीला है. अभी भी उन के अंदर पहले की तरह ऊर्जा है.

जब उन से उन के स्वस्थ रहने का राज पूछा तो उन्होंने बताया कि वह रोजाना 5-6 किलोमीटर की दौड़ पूरी कर के योगा करते हैं. इस के बाद हैवी नाश्ता करते हैं. नाश्ते में ड्राईफ्रूट्स के अलावा रोटी, दाल आदि शामिल रहती है. लंच में वह छाछ या एक किलोग्राम दही लेते हैं और शाम को केवल फ्रूट्स.

बलजीत सिंह राणा ने अपने 35-36 साल की नौकरी में दिल्ली के नौकरशाही सिस्टम को भी बदलते देखा. सन 1970 में जब वह भरती हुए तो उस समय दिल्ली में आईजी सिस्टम था. उस समय लीली सिंह बिष्ट दिल्ली के आईजी थे. कश्मीरी गेट के रिट्ज सिनेमा के पीछे पुलिस मुख्यालय था. जब कमिश्नर सिस्टम शुरू हुआ तो जे.एन. चतुर्वेदी दिल्ली के पहले पुलिस कमिश्नर बने. तब से अब तक 19 पुलिस कमिश्नरों को उन्होंने विदा होते देखा.

बलजीत भले ही अपने परिवार को समय नहीं दे पाए, लेकिन उन की पत्नी सुशीला ने अपने तीनों बच्चों की जिम्मेदारी पूरी करते हुए बच्चों को काबिल बना दिया. उन की बड़ी बेटी नीलम एक एयरलाइंस में है.

वह अपने परिवार के साथ नोएडा में रहती हैं तो वहीं छोटी बेटी आस्ट्रेलिया के मेलबोर्न में टीचर हैं. वह भी पति और बच्चों के साथ आस्ट्रेलिया में रह रही हैं. बेटा संजीव राणा चंडीगढ़ स्थित एबीएन एमरो बैंक में अधिकारी है.

अपने काम के प्रति निष्ठावान और समर्पित रहने वाले बलजीत राणा को इस उपलब्धि पर कई सम्मान भी मिल चुके हैं. सन 2001 और 2012 में उन्हें राष्ट्रपति मेडल, 2015 में दिल्ली पुलिस का एक्सीलेंस अवार्ड के अलावा कई विदेशी सम्मान भी मिल चुके हैं. रिटायर के बाद वह 2 हजार दिनों से ज्यादा काम कर चुके हैं. बलजीत राणा का कहना है कि वह अपने अंतिम समय तक दिल्ली पुलिस में फ्री में सेवा करते रहेंगे.

इज्जत की खातिर : भावनाओं में बह कर चुना गलत रास्ता

बस्ती-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित बस्ती जिले के थाना कोतवाली क्षेत्र के बड़ेवन फ्लाईओवर पर भारी वाहनों का आनाजाना जारी था. इसी फ्लाईओवर से पश्चिम में अमहट पुल के पास सैकड़ों तमाशबीन एकत्र थे. सड़क के दूसरी ओर एक 21-22 साल के युवक की लाश पड़ी हुई थी, जिसे देख कर लग रहा था कि शायद किसी वाहन से टकराने से दुर्घटना हुई है.

मौके पर जुटी भीड़ मृतक की शिनाख्त करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान पा रहा था. भीड़ में से किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी थी.

पुलिस कंट्रोलरूम से वायरलेस के जरिए घटना की सूचना प्रसारित कर दी गई. वह इलाका थाना कोतवाली में पड़ता था. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर जा पहुंचे थे.

पुलिस ने घटनास्थल पर जुटी भीड़ से शव की शिनाख्त कराई, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका. पुलिस ने लाश का गौर से मुआयना किया. लाश की दशा देख कर थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह को ऐसा नहीं लगा कि उस युवक की मौत मार्ग दुर्घटना में हुई है.

क्योंकि मृतक के शरीर पर कहीं भी खरोंच के निशान तक नहीं थे, जबकि दुर्घटना में लाश की स्थिति भयावह हो जाती है. यही बात संदेह पैदा कर रही थी. मृतक के सिर के पीछे चोट लगी थी, जिसे देख कर ऐसा लग रहा था कि मृतक की हत्या कहीं और कर के हत्यारों ने लाश यहां फेंकी हो.

लाश की जामातलाशी लेने पर उस की पैंट की जेब से आधार कार्ड बरामद हुआ. आधार कार्ड मृतक का ही था, उस पर उस का नाम विवेक चौहान पुत्र शिव गोविंद चौहान निवासी बरगदवां, चिल्लुपार, गोरखपुर लिखा था.

शव की शिनाख्त हो जाने से पुलिस ने थोड़ी राहत की सांस ली. लेकिन पुलिस ने यह बात पक्की कर ली थी कि युवक की हत्या कहीं और कर के हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए लाश यहां फेंक दी थी.

पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. उस के बाद थाना लौट कर विजयेंद्र सिंह ने कागजी काररवाई कराई. तब तक आधा दिन बीत गया था. यह घटना 10 मार्च, 2018 की सुबह की थी.

थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह को काम से जैसे ही थोड़ी फुरसत मिली, वैसे ही एक फरियादी आ गया. फरियादी का नाम विजयपाल चौहान था. विजयपाल के साथ 2 अन्य लोग भी आए थे. वे इसी थाने के मूड़ाघाट गांव के रहने वाले थे. बातचीत में पता चला कि विजयपाल की बेटी किरन, बीती रात से रहस्यमय तरीके से गायब थी.

10 मार्च की सुबह जब किरन घर में कहीं दिखाई नहीं दी तो सब परेशान हो गए. पूरा घर छान मारा गया. पड़ोसियों के घर जा कर पता लगाया गया, लेकिन किरन का कहीं पता नहीं चला.

जवान बेटी के इस तरह अचानक रहस्यमय ढंग से गायब हो जाने से पूरा परिवार परेशान था. विजयपाल चौहान बडे़ बेटे गोलू उर्फ शंभू और छोटे भाई जनार्दन के साथ बेटी की गुमशुदगी की फरियाद ले कर कोतवाली थाना पहुंचा.

विजयपाल चौहान की बात सुन कर थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह चौंके. उन्होंने विजयपाल चौहान से गुमशुदगी की तहरीर ले कर उसे घर भेज दिया. पुलिस ने किरन की गुमशुदगी दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी.

शाम को कोतवाली पुलिस को हाइवे से सटे पुराने आरटीओ कार्यालय के पास खेत में एक युवती की लाश पड़ी होने की सूचना मिली. उस की हत्या ईंट मारमार कर की गई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. 2-2 लाशें मिलने से शहर में सनसनीफैल गई थी.

युवती की लाश के पास काफी लोग एकत्र थे. देखने से युवती 19-20 साल की लग रही थी. लाश की स्थिति से ऐसा लगता था जैसे युवती की हत्या कहीं और कर के हत्यारों ने लाश ठिकाने लगाने के लिए यहां ला कर फेंकी हो. फ्लाईओवर के पास सुबह मिली लाश की दशा जैसी ही हालत इस लाश की भी थी.

पुलिस ने लाश का मुआयना किया. मृतका के दोनों पैरों की चप्पलें लाश से थोड़ी दूरी पर इधरउधर पड़ी थीं. हत्यारों ने सिर पर ईंट मारमार कर उसे मौत के घाट उतारा था. ऐसी ही चोट सुबह मिली युवक की लाश के सिर पर मौजूद थी. पुलिस सोच रही थी कि कहीं दोनों लाशों का आपस में कोई संबंध तो नहीं है.

चप्पलें मृतका की ही थीं. पुलिस ने बतौर साक्ष्य चप्पलों को कब्जे में ले लिया. इस के बाद पुलिस और सबूत ढूंढने में जुट गई. इसी बीच भीड़ में से एक युवक ने लाश को पहचान लिया. उस ने बताया कि लाश मूड़ाघाट के रहने वाले विजयपाल चौहान की बेटी किरन की है.

इतना ही नहीं उस युवक ने कोतवाल विजयेंद्र सिंह को एक ऐसी जानकारी दी, जिसे सुनते ही वे उछल पडे़. युवक ने बताया कि सुबह के समय फ्लाईओवर के पास जिस विवेक चौहान की लाश बरामद हुई थी, वह मृतका किरण का प्रेमी था.

यह सुन कर विजयेंद्र सिंह को समझते देर नहीं लगी कि दोनों हत्याओं के पीछे जरूर विजयपाल चौहान का ही हाथ रहा होगा. वह यह भी समझ गए कि यह मामला प्रेमप्रसंग से जुड़ा हुआ है और विजयपाल को पूरे मामले की जानकारी होगी.

विजयेंद्र सिंह ने 2 सिपाहियों को मूड़ाघाट भेज कर लाश की शिनाख्त कराने के लिए विजयपाल को मौके पर बुलवा लिया. विजयपाल के साथ उन का बेटा और छोटा भाई भी साथसाथ आए थे. विजयपाल युवती को देख कर पहचान गए, वह उन की बेटी किरन चौहान थी जो बीती रात रहस्यमय तरीके से गायब थी.

लाश देख कर विजयपाल चौहान, उन का बेटा और छोटा भाई दहाड़ मार कर रोने लगे. पुलिस ने उन्हें किसी तरह शांत कराया. लाश का पंचनामा भर कर पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. विजयेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ थाने लौट आए. पुलिस ने किरन की गुमशुदगी को हत्या की धारा (302) में तरमीम कर दिया, जिस में अज्ञात हत्यारों को आरोपी बनाया गया.

मौकाएवारदात पर पुलिस को जो सूचना मिली थी, वह उस ने गोपनीय रखी ताकि घटना के असल कारणों का पता लगा कर मुलजिमों को आसानी से सलाखों के पीछे पहुंचाया जा सके. थानाप्रभारी विजयेंद्र सिंह ने विजयपाल को कानोंकान भनक नहीं लगने दी कि वे घटना की तह तक पहुंच गए हैं.

अगले दिन पुलिस को विवेक चौहान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. रिपोर्ट में मौत की वजह हैड इंजरी बताया गया था. हत्यारों ने किसी नुकीली और वजनदार चीज से वार कर के उसे मौत के घाट उतारा था. यही नहीं हत्यारों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए विवेक की लाश को फ्लाईओवर के पास फेंक दिया था, ताकि पुलिस इसे दुर्घटना मान ले और हत्यारे साफ बच निकलें.

विवेक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट और किरन की हत्या को ले कर सीओ (सदर) पवन कुमार गौतम काफी सक्रिय थे. दोहरे हत्याकांड की निगरानी सीओ गौतम ही कर रहे थे. पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए किरन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि उस ने सब से ज्यादा फोन एक ही नंबर पर किए थे. उसी नंबर पर 9 मार्च, 2018 की रात 10 बजे के करीब भी किरन की बात हुई थी.

वह नंबर विवेक का निकला. जांच में यह भी पता चला कि विवेक विजयपाल के साढ़ू का बेटा था. विवेक और किरन मौसेरे भाईबहन थे. फिर भी उन के बीच सालों से प्रेमसंबंध था.

9 मार्च की रात विवेक चौहान को मूड़ाघाट गांव में देखा गया था. वह अपने मौसा के घर आया था. उस के बाद से वह गायब था. अगले दिन उस की लाश बरामद हुई थी. पुलिस के लिए यह सूचना पर्याप्त थी. इस से पुलिस का यह शक यकीन में तब्दील हो गया कि इस घटना में विजयपाल चौहान और उस के परिवार का ही हाथ है.

विजयेंद्र सिंह ने किरन की हत्या के संबंध में पूछताछ के लिए विजयपाल, उस के बेटे गोलू उर्फ शंभू और छोटे भाई जनार्दन को थाने बुलवा लिया.

सीओ (सदर) पवन कुमार गौतम थाने में पहले से मौजूद थे. थानाप्रभारी ने विजयपाल से सवाल किया, ‘‘क्या बता सकते हो कि कल फ्लाईओवर के पास जो लाश बरामद हुई थी, किस की थी?’’

‘‘साहब, मुझे क्या पता वो किस की लाश थी?’’ विजयपाल चौहान ने गंभीरता से जवाब दिया.

‘‘सच कहते हो तुम, भला तुम्हें कैसे पता होगा कि वह लाश किस की थी. तुम्हें तो उस के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है.’’

‘‘हां साहब, सचमुच मुझे उस लाश के बारे में कोई जानकारी नहीं है और न ही मैं उसे पहचानता हूं.’’ विजयपाल ने उत्तर दिया.

‘‘ठीक है, कोई बात नहीं चलो मैं ही तुम्हारी कुछ मदद कर देता हूं.’’ विजयेंद्र सिंह ने व्यंग्य कसते हुए कहा, ‘‘किसी विवेक चौहान उर्फ रामू को जानते हो?’’ विजयपाल से सवाल कर के उन्होंने उस के चेहरे पर अपनी तीखीं नजरें गड़ा दीं. उन की सवालिया नजरों को देख कर विजयपाल एकदम से सकपका गया.

‘‘साहब, आप तो मुझे ऐसे देख रहे हैं, जैसे मैं ने ही उस की हत्या की है.’’ विजयपाल बोला.

‘‘हम ने कब कहा कि तुम ने उस की हत्या नहीं की है.’’ इस बार सीओ गौतम बोले, ‘‘भलाई इसी में है कि तुम अपना जुर्म कबूल कर लो और सचसच बता दो कि तुम ने विवेक की हत्या क्यों की? वादा करता हूं, मैं सरकार से सिफारिश करूंगा कि तुम्हें कम से कम सजा हो.’’

‘‘हां, साहब. मैं ने ही रामू की हत्या की है.’’ विजयपाल सीओ (सदर) के पैरों को पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘साहब मुझे माफ कर दीजिए, मुझे बचा लीजिए, मैं ऐसा नहीं करना चाहता था, लेकिन हालात से मजबूर हो कर मुझे यह कदम उठाना पड़ा. रामू ने मेरी इज्जत की बखिया उधेड़ कर रख दी थी. लाख समझाने के बावजूद भी वह मेरी बेटी का पीछा नहीं छोड़ रहा था. उस दिन तो उस ने हद ही कर दी और…’’ भावावेश में आ कर विजयपाल चौहान पूरी कहानी सुनाता चला गया.

विजयपाल चौहान द्वारा अपना जुर्म कबूल कर लेने के बाद उस के बेटे गोलू उर्फ शंभू और भाई जनार्दन ने भी अपनाअपना गुनाह कबूल कर लिया. दोनों ने स्वीकार किया कि विवेक और किरन की हत्या में उन्होंने विजयपाल का साथ दिया था. 36 घंटे के भीतर जिले को दहला देने वाली 2-2 सनसनीखेज हत्याओं का पर्दाफाश हो चुका था.

विवेक किरन हत्याकांड के परदाफाश पर पुलिस कप्तान नरेंद्र कुमार सिंह ने पुलिस टीम को 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत के सामने पेश कर के उन्हें जेल भेज दिया. आरोपियों से की गई पूछताछ के आधार पर कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

विजयपाल के परिवार में कुल 5 सदस्य थे. पतिपत्नी और 3 बच्चे. 3 बच्चों में 2 बेटे थे गोलू उर्फ शंभू और गुलाब तथा एक बेटी थी किरन, जिस की उम्र 20 वर्ष थी. विजयपाल प्राइवेट नौकरी करता था. तीनों संतानों में किरन दूसरे नंबर की औलाद थी. किरन चंचल और हंसमुख स्वभाव की युवती थी. वह बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ रही थी. गांव से कालेज वह साइकिल से जाती थी.

किरन की मौसी परिवार सहित गोरखपुर के बड़हलगंज के चिल्लुपार विधानसभा के बरगदवा में रहती थी. उस का एक ही एकलौता बेटा रामू उर्फ विवेक था. विवेक 21-22 साल का गबरू जवान था. साढ़े 5 फीट लंबा और स्मार्ट.

विवेक की अपनी कोई बहन नहीं थी. रक्षाबंधन के अवसर पर उसे बहन की कमी काफी खलती थी. विवेक की मां से बेटे की मायूसी देखी नहीं जाती थी. इसलिए विवेक की मां सुमन अपनी बड़ी बहन की बेटी किरन को रक्षाबंधन पर अपने यहां बुला लेती थी. किरन विवेक की कलाई पर राखी बांध कर अपने घर लौट आती थी. ऐसा हर साल होता था.

किरन और विवेक करीबकरीब हमउम्र थे. भाईबहन के रिश्ते के नाते दोनों के बीच काफी नजदीकियां थीं, विवेक जब भी किरन को देखता था, ख्ुशी के मारे उस का दिल बागबाग हो उठता था. किरन भी विवेक को देख कर खुश हो जाती थी.

गतवर्ष रक्षाबंधन के मौके पर विवेक ने मौसेरी बहन किरन को तोहफे में एक मोबाइल फोन दिया था. जब भी विवेक का मन किरन से बात करने का होता था, वह फोन कर लेता था और जब देखने की इच्छा होती तो बस्ती जा कर किरन से मिल आता था.

आतेजाते, मिलतेजुलते और बात करतेकराते दोनों के बीच बहनभाई का रिश्ता कब प्यार में बदल गया, न किरन जान सकी और न विवेक. उन्हें तब होश आया जब दोनों एक दूसरे के बिना तड़पने लगे. बिना एकदूसरे को देखे, बिना बात किए दोनों को चैन नहीं मिलता था. जल्दी ही दोनों समझ गए कि उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया है.

विवेक का हाल भी कुछ ऐसा ही था. वह मोबाइल स्क्रीन पर किरन की तसवीर देखदेख कर जीता था. उस की तसवीरों से बात कर के अपना मन बहलाता था.

नजदीकियों के चलते जल्दी ही दोनों ने एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खा लीं और शादी करने के सपने भी बुनने लगे. दोनों यह भी भूल गए कि रिश्तों की वजह से उन के सपने कभी हकीकत का रूप नहीं ले सकते.

वे दोनों पारिवारिक रिश्तों की जिस डोर में बंधे थे, उस डोर को न तो परिवार टूटने दे सकता था और न समाज. विजयपाल तो वैसे ही मानसम्मान के मामले में और भी ज्यादा कट्टर था. वह इस रिश्ते को किसी भी हालत में कबूल नहीं कर सकता था. क्योंकि विवेक विजयपाल के लिए बेटे जैसा था.

दोनों तरफ मोहब्बत की आग बराबर लगी हुई थी. जब से विवेक को किरन से मोहब्बत हुई थी. उस का मूड़ाघाट जानाआना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. विजयपाल और उस के दोनों बेटों ने भी इस बात को महसूस किया था. ये बात उन की समझ से परे थी कि विवेक इतनी जल्दीजल्दी क्यों आता है. जब भी वह आता था किरन से चिपका रहता था. दोनों आपस में धीरेधीरे बातचीत करते रहते थे.

विजयपाल को अपनी बेटी किरन और साढ़ू के बेटे विवेक के रिश्तों को ले कर कुछ संदेह हो गया था. वह दोनों की बात छिपछिप कर सुनने लगा. जल्दी ही उस का संदेह यकीन में बदल गया. पता चला दोनों के बीच नाजायज संबंध बन गए हैं. हकीकत जान कर विजयपाल और उस के दोनों बेटों का खून खौल उठा.

विजयपाल ने पत्नी को अप्रत्यक्ष तरीके से समझाया कि विवेक से कह दे यहां न आया करे. उस की नीयत में खोट आ गया है. इसी के साथ उस ने ये भी कहा कि वह बेटी पर ध्यान दे. उस के पांव बहक रहे हैं. हाथ से निकल गई या कोई ऊंचनीच कर बैठी तो समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. इसलिए उसे विवेक के करीब जाने से मना कर दे.

किरन की मां शर्मिली ने समझदारी का परिचय देते हुए यह बात बेटी को सीधे तरीके से न कह कर अप्रत्यक्ष ढंग से समझाई. वह जानती थी कि बेटी सयानी हो चुकी है, सीधेसीधे बात करने से उसे बुरा लग सकता है. वैसे भी किरन जिद्दी किस्म की लड़की थी, जो ठान लेती थी वही करती थी.

किरन मां की बात समझ गई थी कि वह क्या कहना चाहती हैं. लेकिन उस के सिर पर तो विवेक के इश्क का भूत सवार था. उसे विवेक के अलावा किसी और की बात समझ में नहीं आती थी. उस के अलावा कुछ नहीं सूझता था. किरन ने मां से साफसाफ कह दिया कि वह विवेक से प्यार करती है और उसी से शादी भी करेगी. चाहे कुछ हो जाए, वह अपना कदम पीछे नहीं हटाएगी.

किरन किसी भी तरह अपने मांबाप की बात मानने को तैयार नहीं हुई. बात जब हद से आगे निकलने लगी तो शर्मिली ने अपनी बहन सुमन को फोन कर के पूरी बात बता दी. सुमन बेटे की करतूत सुन कर हैरान रह गई, लज्जित भी हुई. सुमन ने विवेक को समझाया कि ऐसा घिनौना काम कर के तो वह उन्हें जिंदा ही मार डालेगा. जो हुआ सो हुआ, अब आगे किरन से कोई बात नहीं होनी चाहिए.

विवेक और किरन जान चुके थे कि उन के प्यार के बारे में दोनों के घर वालों को पता लग चुका है. दोनों परिवार इस रिश्ते को किसी भी तरह स्वीकार नहीं करेंगे, इस बात को ले कर विवेक काफी परेशान रहने लगा था.

9 मार्च, 2018 की बात है. विवेक घर में बिना किसी को बताए किरन से मिलने बस्ती मूड़ाघाट पहुंच गया. विवेक को देख कर किरन की जान में जान आ गई. लेकिन उस के आने से न तो उस की मौसी शर्मिली खुश थी, न मौसा विजयपाल और न ही उन के दोनों बेटे. वे उसे दरवाजे से भगा भी नहीं सकते थे. लेकिन वे उसे ले कर सतर्क जरूर हो गए. उन की नजर किरन पर जमी थी. यह बात किरन और विवेक जान चुके थे, इसलिए वे खुद भी सतर्क हो गए  थे. दोनों किसी भी तरह की गलती नहीं करना चाहते थे.

बात 9 मार्च की रात 10 बजे की है. किरन को विवेक उर्फ रामू ने फोन कर के घर के पिछवाड़े खेत में बुलाया था. घर के सभी लोग खाना खा कर अपनेअपने कमरे में सोने चले गए थे. घर में चारों ओर सन्नाटा फैला था. बरामदे में कोई दिखाई नहीं दिया तो उसे विश्वास हो गया कि सब लोग सो गए है.

विवेक को घर से गए काफी समय हो गया था. वह किरन के आने का इंतजार कर रहा था. किरन भी विवेक के पास जाने के लिए व्याकुल थी. दबे पांव वह घर से खेत की ओर निकल गई. उस का छोटा भाई गुलाब अभी सोया नहीं  था. जैसे ही किरन घर से निकली, छोटे भाई गुलाब ने उसे बाहर जाते देख लिया और यह बात पिता विजयपाल को बता दी.

बेटे के मुंह से हकीकत सुन कर विजयपाल का खून खौल उठा. उस ने बड़े बेटे गोलू और छोटे भाई जनार्दन को उठाया. विजयपाल ने हाथ में टौर्च ले ली और तीनों किरन की तलाश में निकल पड़े. वे लोग यह देखना चाहते थे कि इतनी रात गए किरन अकेले कहां जा रही है.

किरन को ढूंढतेढूढंते वे मूड़ाघाट बाईपास स्थित पट्टीदार के खेत पर जा पहुंचे. उस समय रात के 12 बजे होंगे. किरन और विवेक दोनों आपत्तिजनक स्थिति में मिले. ये देखते ही तीनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

गुस्साए विजयपाल ने विवेक को पकड़ लिया और उन लोगों ने बगल में रखी ईंट से विवेक के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर के उसे मौत की नींद सुला दिया.

इसी दौरान किरन अपने प्रेमी विवेक की जान बचाने के लिए उन से उलझ गई. इस से उन का क्रोध और बढ़ गया. बाद में उन्होंने किरन के सिर पर ईंट से वार करकर के उसे भी मार डाला.

दोनों को मौत के घाट उतारने के बाद जब वे लोग होश में आए तो अंजाम से डर गए. सोचविचार कर तीनों ने मिल कर विवेक की हत्या को हादसा बनाने के लिए उसी रात फ्लाईओवर के पास उस की लाश खेत में फेंक कर लौट आए. उन्होंने किरन की लाश खींच कर सरसों के खेत में डाल दी थी.

इन लोगों ने कानून की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की, लेकिन उन की चालाकी धरी रह गई. आखिरकार पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का राजफाश कर ही दिया. कथा लिखे जाने तक तीनों आरोपी जेल में बंद थे. पुलिस ने तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

खतरों से भरी लिव इन की राह : ज्योति और शिवम की कहानी

नोएडा के खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव स्थित 4 मंजिला मकान में कुल 33 कमरे थे. सभी कमरों में नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली में काम करने वाले किराएदार रह रहे थे. इन में से कुछ लोग अपने परिवार के साथ रहते थे. लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे थे जो अकेले ही रहते थे. चूंकि सभी लोग नौकरीपेशा थे, इसलिए वे सुबह ही अपनी ड्यूटी पर चले जाते और देर शाम या रात को वापस अपने कमरों पर लौटते थे.

12 जून, 2018 की रात करीब 11 बजे की बात है. उस समय अधिकांश लोग अपने कमरों में सोने की तैयारी में थे. तभी कुछ लोगों को भयंकर बदबू आई. बदबू कहां से आ रही है, यह जानने के लिए कुछ किराएदार अपने कमरों से बाहर निकल आए. उसी समय एक युवक चौथी मंजिल से एक बड़े आकार का भूरे रंग का ट्रौली बैग अपने साथ ले कर सीढि़यों से उतरता दिखा.

वहां रहने वाले उस युवक के बारे में केवल इतना जानते थे कि वह ऊपर की मंजिल पर रहता है. उस का नाम किसी को मालूम नहीं था. ट्रौली बैग ले कर वह जिधर जा रहा था, उधर ही बदबू बढ़ती जा रही थी.

लोगों को शक हुआ कि उस के बैग में ऐसा क्या है जो इतनी बदबू आ रही है. एकदो लोगों ने उस से इस बारे में पूछा भी, लेकिन उस ने ठीक से कोई जवाब देने के बजाए उन्हें झिड़क दिया. इस के बाद उन लोगों को उस पर और भी ज्यादा शक बढ़ गया और वे उत्सुकतावश नीचे ग्राउंड फ्लोर पर आ गए.

दरअसल, पिछले 2 दिनों से उस मकान में एक अजीब तरह की सड़ांध आ रही थी. कई किराएदारों ने सड़ांध का पता लगाने की कोशिश की थी लेकिन कुछ भी पता नहीं चल पाया था. लेकिन ट्रौली बैग देख कर वे लोग समझ गए कि सड़ांध उसी बैग से आ रही है.

ग्राउंड फ्लोर पर उतरने के बाद वह युवक लाल रंग की कार की तरफ बढ़ रहा था, तभी लोगों ने इस की सूचना उस मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी को दे दी. राधेमोहन त्रिपाठी उस ट्रौली बैग वाले युवक के पास पहुंचे. वह उस युवक को पहचान गए. वह युवक चौथी मंजिल पर रहने वाला किराएदार शिवम विरदी था.

राधेमोहन ने शिवम से बैग के बारे में पूछा तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. इस पर राधेमोहन ने उसे कार में बैठने से रोक लिया और नोएडा पुलिस के कंट्रोलरूम को फोन कर दिया. जो किराएदार नीचे उतर आए थे, वे उस लाल रंग की कार के आगे खड़े हो गए ताकि वह कार ले कर वहां से न भाग सके. तब तक शिवम वह ट्रौली बैग ले कर कार में बैठ चुका था. उस ने कार का हौर्न बजा कर सामने खडे़ लोगों से हट जाने का संकेत किया. लेकिन वे नहीं हटे तो शिवम के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी.

शिवम ने जब देखा इतने सारे लोग उस के पीछे पड़ गए हैं तो वह कार से उतरा और उसे लौक कर के वहां से पैदल ही भाग खड़ा हुआ. लोग उस के पीछे भागे भी पर वह किसी की पकड़ में नहीं आया.

थोड़ी देर में खोड़ा थाने के थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार वहां आ गए. लोगों ने उन्हें पूरी बात बताई. कार के सामने पहुंच कर वह उस का मुआयना करने लगे. कार के दरवाजे लौक थे, इस के बावजूद कार से कुछ बदबू बाहर आ रही थी. उन्होंने साथ में आए स्टाफ से कार का शीशा तोड़ कर कार में रखा ट्रौली बैग बाहर निकालने को कहा.

पुलिसकर्मियों ने कार का शीशा तोड़ कर ट्रौली बैग बाहर निकाला तो उस में से बहुत तेज बदबू आ रही थी. इस से थानाप्रभारी ने बैग खुलवाया तो उन की शंका सच साबित हुई. उस में एक लड़की की लाश थी.

लाश काफी खराब अवस्था में थी. लाश देख कर लोगों ने बताया कि लाश शिवम की पत्नी ज्योति की है. ज्योति कई दिनों से दिखाई भी नहीं दे रही थी. लाश का मुआयना करने पर थानाप्रभारी ने देखा उस पर घाव के निशान थे. थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार ने वरिष्ठ अधिकारियों को फोन कर के मामले की सूचना दे दी और जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उन्होंने लाल रंग की स्विफ्ट कार अपने कब्जे में ले ली.

मकान के केयरटेकर राधेमोहन त्रिपाठी से पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि कार छोड़ कर फरार हुआ शिवम लुधियाना, पंजाब का रहने वाला है और पिछले 8 महीने से वह अपनी पत्नी ज्योति के साथ यहां रह रहा था. केयरटेकर को साथ ले कर थानाप्रभारी चौथी मंजिल स्थित शिवम के कमरे पर पहुंचे.

कमरे पर ताला लगा हुआ था. ताला तोड़ कर पुलिस टीम अंदर पहुंची तो देखा फर्श की अच्छी तरह सफाई कर दी गई थी. कमरे की तलाशी में पुलिस को कुछ कागजात मिले, उन में से एक में ज्योति के भाई का पता और फोन नंबर मिल गया.

थानाप्रभारी ने उस के भाई को फोन कर के बताया कि उस की बहन के साथ अनहोनी हो गई है, इसलिए वह जितनी जल्दी हो सके, नोएडा के खोड़ा थाने पहुंच जाए. उस कमरे को सील कर के पुलिस टीम थाने लौट गई.

अगले दिन सुबह फरार शिवम का हुलिया पता कर के नोएडा के बसस्टैंड तथा मैट्रो स्टेशन पर उस की तलाश की गई, मगर वह कहीं नहीं मिला. उधर थानाप्रभारी को बेसब्री से ज्योति के भाई के आने का इंतजार था. उस के आने के बाद ही आगे की काररवाई की जानी थी.

12 जून, 2018 की शाम को ज्योति का भाई लोधी सिंह वर्मा खोड़ा थाने पहुंच गया. थानाप्रभारी ने सब से पहले उसे अस्पताल में रखी लाश दिखाई. लाश देखते ही वह रोने लगा. उस ने उस की शिनाख्त अपनी छोटी बहन ज्योति के रूप में कर दी. लोधी सिंह की शिकायत पर पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

पुलिस ने लोधी सिंह से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस की बहन पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली के एक सैलून में जौब मिलने की बात बता कर लुधियाना से नोएडा चली आई थी.

चूंकि उस ने परिवार को अच्छी सैलरी मिलने की बात बताई थी, वैसे भी ज्योति तेजतर्रार थी, इसलिए उस के दिल्ली आने पर किसी ने ऐतराज नहीं किया था.

नौकरी लग जाने पर उस ने बताया था कि वह दिल्ली में अपनी एक सहेली के साथ किराए पर कमरा ले कर रहती है. यहां आने के बाद भी वह प्रतिदिन अपने घर फोन कर के अपने बारे में जानकारी देती रहती थी. जब तक वह यहां रही, परिवार का कोई सदस्य उसे देखने के लिए नहीं आया.

इस वारदात के बाद लोधी सिंह को पता लगा कि वह किसी सहेली के साथ नहीं बल्कि शिवम के साथ रह रही थी. लोधी सिंह से बात करने के बाद थानाप्रभारी ने फरार शिवम को तलाशने के लिए मुखबिर लगा दिए.

13 जून, 2018 की शाम को खोड़ा के कुछ लोगों ने नोएडा के लेबर चौक के पास शिवम को खड़े देखा. वह शायद किसी गाड़ी के इंतजार में वहां खड़ा था. पुलिस को सूचना देने से पहले ही लोगों ने उसे पकड़ लिया और इस की सूचना खोड़ा पुलिस को दे दी.

शिवम के पकड़े जाने की बात सुन कर थानाप्रभारी धर्मेंद्र कुमार फौरन पुलिस टीम के साथ लेबर चौक पहुंच गए. वहां कुछ लोग शिवम को दबोचे खड़े थे. पुलिस ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया. थाने ला कर जब उस से उस की पत्नी ज्योति की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि ज्योति की हत्या उस ने नहीं की है, बल्कि उस ने आत्महत्या की थी.

शिवम ने बताया कि 9 जून की रात को वह शराब पी कर घर लौटा तो ज्योति उस से नाराज हो गई. दोनों के बीच कहासुनी हुई तो ज्योति गुस्से में बाथरूम में गई और फंदा बना कर लटक गई.

आधी रात होने पर जब उस का नशा उतरा तो उस ने ज्योति को ढूंढना शुरू किया. वह उसे ढूंढते हुए बाथरूम में पहुंचा तो उस की लाश फंदे में झूल रही थी. यह देख कर वह घबरा गया और पुलिस से बचने के डर से उस ने 2 दिनों तक उस की लाश कमरे में ही छिपाए रखी. कल जब वह उसे ठिकाने लगाने के लिए जा रहा था, तभी लोगों ने उसे घेर लिया और लाश ठिकाने नहीं लगा सका.

यह सब बतातेबताते शिवम थानाप्रभारी से बारबार नजरें चुरा रहा था. यह देख कर थानाप्रभारी को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. इस के बाद उन्होंने शिवम से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि ज्योति की हत्या उस ने ही की थी. उस ने ज्योति की हत्या के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

26 वर्षीय शिवम लुधियाना के फतेहपुर अवाना राजगुरू नगर में अपने पिता जगदीश विरदी और मां के साथ रहता था. उस के पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे. 2 साल पहले वह लुधियाना के एक मौडर्न सैलून के सामने से गुजर रहा था, तो उस की मुलाकात ज्योति से हुई. ज्योति उसी सैलून में नौकरी करती थी.

पहली ही नजर में ज्योति की खूबसूरती उस के दिल को भा गई. उस ने उत्सुकतावश पूछ लिया कि इस सैलून में लेडीज और जेंट्स दोनों की हेयर सेटिंग होती है? इस पर ज्योति ने उसे बताया कि यहां दोनों के लिए अलगअलग सैलून हैं और वह भी इसी सैलून में काम करती है. अगर उसे कभी जरूरत हो तो उसे फोन कर के आ जाए.

इस के बाद उस ने अपना फोन नंबर बताया तो शिवम ने जल्दी से उस का नाम पूछ कर उस का नंबर अपने मोबाइल में सेव कर लिया. इस के बाद उस ने अपना नाम और नंबर भी ज्योति को बता दिया. यह उन दोनों की पहली मुलाकात थी. इस के बाद तो आए दिन किसी न किसी बहाने से दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया जो जल्दी ही प्यार में बदल गया.

दोनों का जब भी दिल करता, आपस में प्यार की मीठीमीठी बातें कर अपनी चाहतों का इजहार करने से नहीं चूकते थे. धीरेधीरे 2 साल गुजर गए. इस बीच शिवम ने लुधियाना के नामी इंस्टीट्यूट से बीसीए का कोर्स भी पूरा कर लिया. अब उसे भी नौकरी की तलाश थी. वह जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो कर ज्योति को अपनी दुलहन बनाना चाहता था.

ज्योति के परिवार में उस के पिता की कुछ साल पहले ही मौत हो चुकी थी. इस समय घर में 2 बडे़ भाई धर्मेंद्र सिंह वर्मा और लोधी सिंह वर्मा तथा 5 बहनें थीं. बहनों में वह सब से छोटी थी.

दोनों को ऐसा लगता था कि उन की शादी में परिवार वाले बाधक नहीं बनेंगे. फिर भी दोनों फूंकफूंक कर कदम रख रहे थे. मजे की बात यह थी कि काफी समय गुजर जाने के बाद भी उन के परिवार वालों को उन के अफेयर की जानकारी नहीं थी.

इस बीच एक दिन जब दोनों मिले तो शिवम ने उसे बताया कि वह नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा है और नौकरी मिलते ही उसे भी वहां बुला लेगा. ज्योति इस के लिए पहले से ही राजी थी, इसलिए उस ने शिवम के प्रस्ताव पर फौरन हामी भर दी.

ज्योति के साथ नया जीवन गुजारने की उमंग में वह मन में नएनए सपने बुनता हुआ नोएडा आ गया. यहां उसे वीवो कंपनी में नौकरी मिल गई. वह कंपनी के कस्टमर केयर डिपार्टमेंट में काम करने लगा.

6 महीने बाद उस ने ज्योति को भी फोन कर के अपने पास बुला लिया. अक्तूबर में ज्योति नोएडा आ गई. साथ रहने के लिए दोनों ने खोड़ा कालोनी के वंदना एनक्लेव में वन रूम सेट किराए पर ले लिया और लिवइन में रहने लगे. वहां शिवम ने ज्योति को अपनी पत्नी बताया था. कुछ दिन बाद ज्योति वर्मा को भी गाजियाबाद के वसुंधरा एनक्लेव के एक ब्यूटीपार्लर में ब्यूटीशियन की नौकरी मिल गई. चूंकि दोनों ही नौकरी कर रहे थे, इसलिए उन्हें अब किसी तरह की टेंशन नहीं थी. दोनों खुश थे.

ज्योति और शिवम के शुरुआत के 3-4 महीने बेहद खुशनुमा थे, लेकिन परेशानी तब शुरू हुई, जब ज्योति शिवम के जल्दी शादी करने के प्रस्ताव को किसी न किसी बहाने टालने लगी. यह देख कर शिवम मन ही मन बहुत परेशान रहने लगा. इस के अलावा उन दोनों की सैलरी में भी भारी अंतर था. शिवम को जहां 14 हजार रुपए मिलते थे, वहीं ज्योति की सैलरी 22 हजार रुपए महीने थी.

इस के अलावा ज्योति ने अप्रैल महीने से घर लेट पहुंचना शुरू कर दिया था. इस से शिवम ने मन में सोचा कि ज्योति को कोई अमीर आशिक मिल गया है, इसलिए वह उस से किनारा करना चाह रही है. अपना शक दूर करने के लिए वह रोज ज्योति के घर लौटने पर उस का मोबाइल चैक करने लगा.

शिवम को अपना मोबाइल चैक करते देख कर ज्योति लपक कर उस से मोबाइल छीन लेती थी, साथ ही ऐसा करने से मना भी करती थी. इस के बाद शिवम का शक और बढ़ गया. नतीजतन आए दिन दोनों के बीच रोज लड़ाई होने लगी. शिवम को अब पक्का यकीन हो गया कि ज्योति जरूर किसी के साथ डेट पर जाने लगी है.

9 जून, 2018 की शाम शिवम विरदी ने शराब पी. उस ने सोचा कि आज वह ज्योति का मोबाइल छीन कर उस के वाट्सऐप और फेसबुक की फ्रैंडलिस्ट चैक करेगा. देर शाम जब ज्योति घर लौटी तो पहले से गुस्से में भरे बैठे शिवम ने उस से मोबाइल छीन लिया. जब ज्योति ने इस का पुरजोर विरोध किया तो दोनों के बीच जम कर लड़ाई हो गई.

गुस्से में शिवम रसोई से चाकू उठा लाया और उस के पेट पर कई वार कर दिए. थोड़ी देर तड़प कर ज्योति ने दम तोड़ दिया. ज्योति के मरने के बाद शिवम को लगा, उस से बहुत बड़ी गलती हो गई. लेकिन अब क्या हो सकता था. वह 72 घंटों तक लाश को एक ट्रौली बैग में बंद कर के रखे रहा और उसे ठिकाने लगाने के बारे में सोचता रहा.

12 जून को उस ने दिल्ली के लक्ष्मीनगर से एक सेल्फ ड्राइव स्विफ्ट कार किराए पर ली और उसे वंदना एनक्लेव स्थित मकान के सामने ले आया. जब वह ट्रौली बैग को उस में रखने जा रहा था, उसी समय ज्योति की लाश से निकलने वाली बदबू के कारण उस का भांडा फूट गया और वह खोड़ा के थानाप्रभारी के हत्थे चढ़ गया.

14 जून, 2018 को नोएडा के एसएसपी वैभव कृष्ण, एसपी आकाश तोमर ने नोएडा स्थित अपने औफिस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर मीडिया को ज्योति वर्मा मर्डर केस का खुलासा होने की जानकारी दी.

उसी दिन आरोपी शिवम विरदी को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

तमाम युवक और युवतियां लिवइन में रहते हैं और अपनीअपनी नौकरी करते हैं, लेकिन सभी के अनुभव अच्छे नहीं होते. इस की वजह होती है दोनों की अंडरस्टैंडिंग ठीक न बन पाना. ज्योति और शिवम के मामले में भी यही हुआ.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

फुहारों के मौसम में बरकरार रखें त्वचा की सुंदरता

बारिश के मौसम में त्वचा को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. इस मौसम में त्वचा को गीलेपन या नमी से बचाएं. ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि गीली त्वचा कीटाणुओं को ज्यादा आकर्षित करती है. परिणामस्वरूप जलन और चकत्तों से ले कर रिंगवर्म तक त्वचा संबंधी तमाम तरह की समस्याएं हो सकती हैं.

पेश हैं, मौनसून में त्वचा से जुड़ी समस्याओं से निबटने के टिप्स:

– अतिरिक्त मैल और तेल को हटाने के लिए दिन में कम से कम 3 बार त्वचा को अच्छी तरह साफ करें, क्योंकि ये दोनों रोमछिद्रों को अवरुद्ध कर सकते हैं.

– अपनी त्वचा को टोन करें. इस के लिए नौनअलकोहलिक वैराइटीज का इस्तेमाल करें, जो आप की त्वचा के पीएच बैलेंस ठीक रखने में भी मदद करती हैं और आप की त्वचा पर चमक भी लाती हैं.

– बारिश के कारण त्वचा में जो नमी आती है वह उस के लिए काफी नुकसानदायक होती है. अपनी त्वचा को नम, कोमल और स्वस्थ बनाए रखने के लिए इफैक्टिव डे क्रीम का प्रयोग करें.

– अगर आप की त्वचा तैलीय हो तो वाटर बेस्ड मौइश्चराइजर अच्छा विकल्प हो सकता है, जो तेल के स्राव को नियंत्रित रखने में मदद करेगा.

– अच्छे एसपीएफ जैसे 30 या 40 वाले विश्वसनीय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें. मौसम भले ही क्लाउडी हो, लेकिन वह सूर्य की यूवी किरणों के हानिकारक प्रभाव को नहीं रोक पाता है.

– यह आवश्यक है कि आप प्रतिदिन अपनी त्वचा की पपड़ी हटाने के लिए उसे मलें ताकि मृत कोशिकाएं हट जाएं, लेकिन ऐसा बड़ी कोमलता के साथ करें.

– शरीर में पानी की मात्रा बनाए रखने के लिए दिन भर में कम से कम 8 गिलास पानी जरूर पीएं क्योंकि उमस के दौरान काफी ज्यादा पसीना निकल जाता है, जिस से त्वचा में पर्याप्त नमी नहीं रहती है और वह मलिन और सुस्त दिखने लगती है.

– अन्य मौसमों में सप्ताह में 2 बार बालों को शैंपू और कंडीशनिंग करना पर्याप्त हो सकता है, लेकिन मौनसून के मौसम में 3-4 बार ऐसा करना चाहिए, क्योंकि बारिश के मौसम में ज्यादा पसीना आना आप की स्कैल्प पर गंदगी और कीटाणुओं का पनपना आसान बनाता है.

– मौनसून आर्टिफिशियल ज्वैलरी पहनने का समय नहीं होता है, खासतौर पर जब तब आप की त्वचा ज्यादा संवेदनशील भी हो. हवा में नमी ब्रेकआउट के जोखिम को बढ़ाएगी.

– घर में फेस पील्स और पैक्स बनाएं. ये प्राकृतिक होते हैं और त्वचा में निखार लाते हैं.

– पौष्टिक खाना खाएं, जिस में पर्याप्त वसा हो, क्योंकि वह क्षतिग्रस्त त्वचा की मरम्मत करने और नमी बनाए रखने के लिए जरूरी है.

– अपने पैरों को सांस लेने दें. बंद फुटवियर जैसे जूते आदि पहनने से आप के पैरों में पसीना आएगा, जो फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण का कारण बन सकता है. इस के बजाय सैंडल या फ्लोटर्स जैसे वाटरपू्रफ फुटवियर पहनें.

– जब पैडीक्योर के लिए जांए, तो यह तय करें कि टूल्स स्टरलाइज्ड हों. वैसे तो अधिकांश सैलून साफसफाई का खास ध्यान रखते हैं, लेकिन बारिश के मौसम में ऐसा करना थोड़ा कठिन हो जाता है. अत: जांचें कि सभी टूल्स संक्रमण रहित हों. अगर जरूरत हो तो उन्हें अपने सामने ऐसा करने को कहे.

– डा. अनूप धीर, अपोलो हौस्पिटल, नई दिल्ली

बीमारियों का शिकार बना सकती है थोड़ी सी लापरवाही

मौनसून यानी चिलचिलाती गरमी और पसीने से राहत दिलाने वाला खूबसूरत मौसम, जिस में हमें खाने और घूमने में खूब मजा आता है. लेकिन यह मौसम अपने साथ कई तरह की बीमारियां भी लाता है, जिस से सारा मजा किरकिरा हो जाता है. मौनसून के दौरान ज्यादातर बीमारियां दूषित पानी पीने या उस के संपर्क में आने और मच्छरों के काटने से होती हैं.

मुंबई के जनरल फिजिशियन डा. गोपाल नेने कहते हैं कि ऐसी कई बीमारियां हैं, जो मुख्य रूप से मौनसून में लापरवाही बरतने से होती हैं और शुरुआती लक्षणों के पहचान में न आने से गंभीर रूप ले लेती हैं. ये निम्नलिखित हैं:

इन्फ्लुएंजा: मौनसून के दौरान इन्फ्लुएंजा यानी सर्दीजुकाम होना आम बात है. यह एक संक्रामक बीमारी है जो हवा में फैले वायरस के सांसों के जरीए अंदर जाने से तेजी से फैलती है. ये वायरस हमारे श्वसनतंत्र को संक्रमित करते हैं, जिस से विशेष रूप से नाक और गला प्रभावित होता है. नाक बहना, गले में जलन, शरीर में दर्द, बुखार इत्यादि इस के लक्षण होते हैं. इस के होने पर जल्द से जल्द डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए.

सावधानियां: सर्दीजुकाम से बचने के लिए सब से अच्छा तरीका है नियमित रूप से स्वच्छ, संतुलित और पौष्टिक आहार लें, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को विकसित कर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाए.

वायरल फीवर: अचानक मौसम परिवर्तन के कारण थकान, ठंड, शरीर में दर्द और बुखार को वायरल बुखार कहते हैं. यह बुखार एक संक्रामक बीमारी है, जो संक्रमित हवा या संक्रमित शारीरिक स्राव के संपर्क में आने से फैलती है. वायरल बुखार सामान्यतया 3 से 7 दिनों तक रहता है. यह आमतौर पर अपनेआप भी ठीक हो जाता है, लेकिन दोबारा संक्रमण में ऐंटीबायोटिक लेने की आवश्यकता होती है.

सावधानियां: वायरल फीवर से बचने के लिए बारिश में भीगने से बचें और लंबे समय तक गीले कपड़ों में न रहें. हाथों की साफसफाई पर विशेष ध्यान दें. इस के अलावा विटामिन सी युक्त खाना, हरी सब्जियां व फल खाएं ताकि इम्यून सिस्टम मजबूत बना रहे. संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाए रखें.

मच्छरों से होने वाली बीमारियां

मलेरिया: डा. नेने के अनुसार मौनसून में होने वाली बीमारियों में से एक मलेरिया गंदे पानी में पैदा होने वाले मादा मच्छर अनाफिलिज के काटने से होता है, क्योंकि बारिश के मौसम में पानी जमा होना एक गंभीर समस्या है, जिस से मच्छरों के पैदा होने की संभावनाएं अधिक रहती हैं. इस के लक्षण बुखार, शरीर में दर्द, ठंड, उलटी, पसीना आना आदि हैं. यदि इस का समय से इलाज न कराया जाए तो जौंडिस, ऐनीमिया, लिवर और किडनी की विफलता जैसी जटिलताएं बढ़ने की आशंका रहती है.

मलेरिया की जांच आमतौर पर रक्त फिल्म का उपयोग कर रक्त की माइक्रोस्कोपिक जांच या ऐंटीजन आधारित रैपिड डायग्नोस्टिक टैस्ट के जरीए की जाती है. मलेरिया का ऐंटीमलेरियल दवाओं के साथ सफलतापूर्वक इलाज किया जाता है. अपनी मरजी से भूल कर भी कोई दवा न लें.

सावधानियां: मच्छरजनित क्षेत्रों में रहने वालों को पहले ही डाक्टर की सलाह पर ऐंटीमलेरियल दवाएं लेनी चाहिए. मच्छरों से बचने के लिए प्रतिरोधक क्रीम और इलैक्ट्रौनिक उपकरणों का उपयोग करें, साथ ही मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिए घर के आसपास गंदा पानी इकट्ठा न होने दें. इस के अलावा ऐसे कपड़े पहनें, जिन में पूरा शरीर ढका रहे.

डेंगू: डेंगू बुखार मच्छरों से होने वाला एक वायरल संक्रमण है. यह बीमारी मुख्यतया काले और सफेद धारीदार मच्छरों के काटने से होती है, जो आमतौर पर सुबह काटते हैं. डेंगू को ‘ब्रेक बोन फीवर’ भी कहते हैं.

मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, सूजन, सिरदर्द, बुखार, थकावट इत्यादि डेंगू के लक्षण हैं. यदि डेंगू बुखार गंभीर हो जाए तो पेट दर्द, रक्तस्राव होने के साथसाथ सर्कुलेटरी सिस्टम भी खराब हो सकता है.

गौरतलब है कि डेंगू के इलाज के लिए कोई विशेष ऐंटीबायोटिक या ऐंटीवायरल दवा नहीं है. ऐसे में इस के शुरुआती लक्षणों की पहचान कर उपचार कराना बेहतर रहता है. इस में ज्यादा से ज्यादा आराम और तरलपदार्थों का सेवन महत्त्वपूर्ण है. इस दौरान सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द से बचने के लिए डाक्टर की सलाह से ही दवा लें.

सावधानियां: डेंगू मच्छर संक्रमित बीमारी है. ऐसे में मच्छरों के काटने से बचने के लिए प्रतिरोधक क्रीम का इस्तेमाल करें. बाहर निकलते समय कपड़ों से शरीर को ढकें. डेंगू का मच्छर आमतौर पर दिन में काटता है.

दूषित पानी से होने वाली बीमारियां

टाइफाइड: डा. नेने के अनुसार, टाइफाइड साल्मोनेला नामक बैक्टीरिया के कारण होता है. यह बीमारी संक्रमित व्यक्ति के मल के साथ दूषित पानी या दूषित भोजन और पीने के पानी के कारण होती है. इस का इलाज रक्त और हड्डियों के व्यापक परीक्षण के साथ किया जाता है. लंबे समय तक तेज बुखार, सिरदर्द, उलटी, पेट दर्द आदि टाइफाइड के सामान्य लक्षण हैं. इस बीमारी की सब से बुरी बात यह है कि मरीज के ठीक होने के बाद भी इस के संक्रमण मूत्राशय में रह जाते हैं.

सावधानियां: स्वच्छ खाना, पानी, घर की साफसफाई के साथसाथ हाथपैरों को स्वच्छ रख कर आप इसी बीमारी से बच सकते हैं. टाइफाइड के उपचार के लिए डाक्टर की सलाह लेनी बहुत आवश्यक है.

हैपेटाइटिस ए: यह मौनसून में होने वाली एक गंभीर लिवर की बीमारी है. हैपेटाइटिस ए आमतौर पर वायरल संक्रमण है, जो दूषित पानी और मनुष्य के संक्रमित स्राव के संपर्क में आने से होता है. यह ज्यादातर मक्खियों के माध्यम से फैलता है. इस के अलावा रखरखाव के दौरान संक्रमित फल, सब्जियों या अन्य खा-पदार्थों के खाने से भी होता है. इस का सीधा प्रभाव किडनी पर होता है, जिस से वहां सूजन हो जाती है. इस के अनेक लक्षण हैं जैसे जौंडिस, पेट दर्द, भूख की कमी, मितली, बुखार, दस्त, थकान इत्यादि. इस की जांच के लिए ब्लड टैस्ट किया जाता है.

सावधानियां: इस बीमारी से बचने के लिए मितली का उपचार और लिवर को आराम देना आवश्यक होता है. इस के अलावा साफसफाई पर खास ध्यान देना सब से बढि़या तरीका है. अधिक जोखिम वाले लोगों के लिए वैक्सीन उपलब्ध है.

एक्यूट गैस्ट्रोएंटेराइटिस: बरसात के मौसम में गैस्ट्रोटरोराइटिस या फूड पौइजनिंग एक आम बीमारी है. वातावरण में नमी के कारण इस बीमारी के जिम्मेदार बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं. गैस्ट्रोटरोराइटिस के लक्षण हैं पेट में ऐंठन, मितली, उलटी और दस्त आदि. लगातार बुखार और दस्त होने से बेचैनी व कमजोरी महसूस होती है. इस से बचने के लिए ज्यादा से ज्यादा खुद को हाइड्रेट करें.

चावल, दही, फल जैसे केला, सेब और ब्लैंड आहार खाएं. चावल और नारियल का पानी भी हाइड्रेशन के लिए सही उपचार है. बुखार और डिहाइड्रेशन के इलाज के लिए ओआरएस पानी अनिवार्य होता है. स्थिति को देखते हुए डाक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

सावधानियां: मौनसून में कच्चा या अधपका खाना जैसे सलाद खाने से बचें. मौनसून में बाहर का कुछ भी खाने से बचें.

कुछ खास टिप्स

– टाइफाइड, जौंडिस और डायरिया जैसी पानी से उत्पन्न बीमारियों से बचने के लिए पानी उबाल कर या शुद्ध ही पीएं.

– बैक्टीरिया के कारण होने वाली बीमारियों से बचने के लिए अलग तौलिए का प्रयोग करें.

– खांसी या छींकते समय मुंह और नाक को रूमाल से ढकें.

– डेंगू और मलेरिया से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें.

– फंगल इन्फैक्शन से बचने के लिए हमेशा कपड़ों को अच्छी तरह सुखा कर ही पहनें.

– घर का बना ताजा खाना ही खाएं.

– हाथों को स्वच्छ रखने के लिए हैंड सैनिटाइजर का प्रयोग करें.

मेरी सैक्स में रुचि काफी कम हो गई है. जब भी मेरी पत्नी मेरे पास आती है तो मैं उसे दूर भगा देता हूं. मैं उसे अपने मन का हाल कैसे बताऊं.

सवाल
मेरी उम्र 45 वर्ष है, मेरा एक 12 वर्षीय बेटा है. जिम्मेदारियों के बोझ से मेरी सैक्स में रुचि काफी कम हो गई है. जब भी मेरी पत्नी मेरे पास आती है तो मैं उसे दूर भगा देता हूं जिस से अब वह उदासउदास रहने लगी है. कैसे मैं उसे अपने मन का हाल बताऊं?

जवाब
यह सच है कि जैसेजैसे जिम्मेदारियां व उम्र बढ़ती है, सैक्स के प्रति रुचि घटती जाती है, लेकिन जरूरत है हर उम्र में खुद को ऊर्जावान बनाए रखने की वरना जीवन में नीरसता आ जाएगी. इसलिए, जरूरी है कि सैक्स से खुद को खुश रखें. अनेक सर्वे में साबित हुआ है कि सैक्स करने से इंसान को अच्छा फील होता है.

सोचिए, जैसे आप अपनी पत्नी को इग्नोर करते हैं यदि आप की पत्नी आप को इग्नोर करती तब आप को कैसा लगता. आप की ऐसी हरकत उन्हें यह भी सोचने पर मजबूर कर सकती है कि कहीं आप किसी और को तो पसंद नहीं करने लगे हैं. इसलिए समय रहते उन्हें अपनी स्थिति से वाकिफ कराते हुए स्थिति को बिगड़ने से बचाएं.

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सैक्स को गंभीरता से लेना है बेहद जरूरी

कालेज में पढ़ने वाले युवाओं को सैक्स संबंध बनाना हो या फिर लिव इन रिलेशनशिप में रहना हो, उन्हें इस बारे में अधिक सोचविचार की आवश्यकता नहीं होती. एक समय था जब विवाहपूर्व सैक्स के बारे में सोचना गलत माना जाता था, लेकिन आज तमाम सर्वे पर नजर डालें तो न सिर्फ युवा बल्कि किशोरकिशोरियों को भी सैक्स से कोई परहेज नहीं है. यह बात सही हो सकती है, लेकिन बिना सोचेसमझे सैक्स और इसे गंभीरता से लिए बिना कोई कदम उठाना सही नहीं है. इस से खुद को ही नुकसान हो सकता है. इसलिए सैक्स को मजाक न समझें, बल्कि गंभीरता से लें.

यह मजाक नहीं है

कई बार युवा अपने दोस्तों की देखादेखी या फिर दोस्तों में लगी शर्त को पूरा करने के चक्कर में सैक्स संबंध स्थापित करते हैं, ताकि वे अपने दोस्तों के बीच दबदबा बना सकें. लेकिन उन्हें इस बात का पता ही नहीं रहता कि कुछ पलों के हंसीमजाक के चलते उन्होंने अपनी जिंदगी का कितना अहम कदम बिना सोचेसमझे उठा लिया है. इसलिए सैक्स को गंभीरता से लें.

शादी के बाद होगी मुश्किल

शादी के बाद पति को भी इस का पता चल सकता है. यदि अपनी किशोरावस्था में आप ने सैक्स को गंभीरता से नहीं लिया और अपने फ्रैंड से कई बार सैक्स संबंध बनाए तो हो सकता है शादी के बाद पति को इस बात की किसी तरह भनक लग जाए और अगर ऐसा हुआ तो आप की खुशहाल जिंदगी क्या करवट लेगी, कुछ कहा नहीं जा सकता.

यौन संबंधी बीमारियों का डर

आमतौर पर विवाहपूर्व सैक्स संबंध शारीरिक और भावनात्मक स्तर पर सुरक्षित नहीं माने जाते. असुरक्षित सैक्स से कई यौन रोग भी गले पड़ सकते हैं, जो जानलेवा होते हैं. यदि कम उम्र में ऐसे संबंध स्थापित किए जाते हैं तो इस का असर शारीरिक विकास पर पड़ता है. इस के साथ ही सामाजिक संबंधों पर भी इस का गहरा असर पड़ता है.

साथी के साथ ही करें सैक्स

सैक्स हमेशा उसी के साथ करें जिसे आप ने जीवनसाथी बनाना है. कोशिश करें कि शादी से पहले अपने बौयफ्रैंड से सैक्स संबंध न बनाएं, क्योंकि उस के मन में यह विचार आ सकता है कि जो लड़की मेरे साथ सैक्स कर सकती है उस ने औरों के साथ भी संबंध बनाए होंगे. किसी अजनबी के साथ सैक्स संबंध बनाना न तो ठीक है और न ही सुरक्षित. सैक्स संबंधों में जल्दबाजी न करें बल्कि जिस के साथ सैक्स करना है उस के बारे में अच्छी तरह जान कर व सोचसमझ कर ही आगे बढ़ें. यह भी ध्यान रहे कि वह संबंध बनाने की बात दूसरों को न बता दे.

जगह का चुनाव करें

सैक्स कहां कर रहे हैं, यह भी काफी माने रखता है. वह जगह सेफ न हुई या किसी ने होटल के कमरे में वीडियो क्लिपिंग बना ली तो क्या होगा, इसलिए जहां मन हुआ सैक्स कर लिया ऐसा नहीं होना चाहिए. सैक्स करने से पहले गंभीरता से सोचें कि इसे कहां किया जाए.

ब्लैकमेलिंग से बचें

बौयफ्रैंड के पास आप के कुछ पर्सनल फोटो हो सकते हैं, जिन से आगे चल कर वह आप को ब्लैकमेल भी कर सकता है, इस बात का भी ध्यान रखें, फिर चाहे वह बौयफ्रैंड हो या कोई और. सैक्स  से पहले यह बात जरूर सोच लें कि इस वजह से कहीं आप ब्लैकमेलिंग का शिकार न हो जाएं, इसलिए इन बातों का विशेष खयाल रखें.

प्रैग्नैंसी का खतरा

इस बात पर भी विचार करना जरूरी है कि अगर आप ने बिना सोचेविचारे जल्दबाजी में सैक्स संबंध बनाने का फैसला किया और उस दौरान कोई सावधानी नहीं बरती तो गर्भ ठहरने का खतरा भी बना रहता है. यदि ऐसा होता है तो आप मानसिक तनाव से घिर जाएंगी, क्योंकि इस का दुष्प्रभाव आप की पूरी जिंदगी पर पड़ेगा.

डिप्रैशन न हो जाए

जब कई बार इन संबंधों में दरार पड़ती है तो दोनों पक्षों को ही गहरा मानसिक आघात पहुंचता है. ऐसे में सामाजिक और नैतिक बंधनों के चलते विवाहपूर्व सैक्स संबंध बनाने की शर्म, ग्लानि, अविश्वास, तनाव तथा एकदूसरे के प्रति सम्मान की कमी जैसे कारक मुख्य भूमिका निभाते हैं.

डेटिंग को डेटिंग ही रहने दें

कई बार डेटिंग के दौरान भी सैक्स संबंध बन जाते हैं. जहां डेटिंग का मकसद एकदूसरे को भलीभांति जानना होता है वहीं वे उस मकसद को भूल सैक्स संबंध स्थापित कर लेते हैं. सैक्स के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है, लेकिन अभी समय एकदूसरे को जाननेसमझने का है. यह वक्त दोबारा नहीं आएगा, इसलिए पहले दोनों एकदूसरे को भलीभांति समझ लें और अपने रिश्ते को कुछ समय दें. उस के बाद इस पायदान पर आएं.

अच्छा नहीं उतावलापन

सैक्स के लिए उतावलापन अच्छा नहीं है इसलिए आप को प्रोफैशनल या बाजारू महिला या पुरुष के साथ सैक्स संबंध बनाने से बचना चाहिए. यह पूरी तरह गलत है. इस से आप गलत लोगों के चंगुल में भी फंस सकते हैं.

जबरदस्ती सैक्स न करें

सैक्स जबरन नहीं करना चाहिए. आप को किसी के दबाव या किसी अन्य कारण से सैक्स करने से बचना चाहिए. साथ ही किसी डर की वजह से भी सैक्स नहीं करना चाहिए. मन के सारे भ्रम और आशंकाएं निकालने के बाद ही सैक्स संबंध बनाएं.

सही कदम

–       हर चीज समय पर ही अच्छी लगती है और सही भी रहती है. माना कि दिल किशोरावस्था में प्रेम की पींगें बढ़ाने को बेताब रहता है. प्रेम करना गलत नहीं है अवश्य करें, लेकिन सैक्स के लिए सही वक्त का इंतजार भी जरूरी है. तभी उस का असली मजा और आनंद ले पाएंगे वरना वह कुछ पलों का आनंद तो देगा लेकिन बाद में मन का सुकून भी छीन लेगा.

–       अगर फिर भी आप ने सैक्स का मन बना ही लिया है तो समय और स्थान का ऐसा चुनाव करें जो आप के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो और बाद में किसी मुसीबत में फंसाने वाला न हो, इसलिए किसी भी कमजोर पल में सैक्स करने का फैसला न लें बल्कि यदि सैक्स करना भी है तो सोचीसमझी योजना के तहत करें.

–       सैक्स के बाद यदि प्रैग्नैंसी आदि का वहम हो रहा है तो बिना डाक्टर को दिखाए खुद ही किसी नतीजे पर न पहुंचें, बल्कि सब से पहले इस बारे में अपने घर पर बड़ी बहन, मां आदि को बताएं. यह सच है कि आप को बताने में हिचकिचाहट होगी, डर भी लगेगा और शायद शर्मिंदगी भी होगी, लेकिन यह शर्मिंदगी उस मुसीबत से कम होगी जो न बताने पर आप को झेलनी पड़ सकती है. वह आप के घर वाले हैं, इस बात को सुन कर चाहे लाख नाराज हों, आप को डांटें, लेकिन इस मुसीबत से निकालने की जिम्मेदारी लेने में उन्हें देर नहीं लगेगी. उस समय वह वही करेंगे जो आप के लिए उचित होगा. इसलिए उन पर विश्वास कर हिम्मत कर के एक बार उन से सच कह डालिए, फिर देखिए कैसे आप की परेशानी हल होती है.

–       अगर आप का कोई बौयफ्रैंड है जिस पर आप बहुत विश्वास करती हैं तो भी उसे अपना कोई वीडियो आदि न बनाने दें चाहे कुछ भी हो जाए. वह रिश्ता तोड़ने की धमकी देता है तो न डरें, क्योंकि जो युवक आप से ऐसी बात कह रहा है वह किसी भी तरह का रिश्ता रखने के लायक नहीं है.

–       अगर सैक्स करना भी है तो इस बात का खयाल रखें कि उस की वजह से आप की पढ़ाई में कोई बाधा न आए. यह समय आप के भविष्य बनाने का है. इस में किसी भी तरह का कोई व्यवधान नहीं आना चाहिए. सैक्स कर के कहीं हर वक्त उसी में खोए रह कर पढ़ाई करना न भूलें.

जीनियस : पुत्र मोह में फिल्म का कबाड़ा

‘श्रद्धांजली’, ‘गदरःएक प्रेम कथा’ सहित कई सफल फिल्मों के सर्जक अनिल शर्मा की नई फिल्म ‘‘जीनियस’’ अति निराश करने वाली फिल्म है. ‘जीनियस’ देखकर अहसास होता है कि अनिल शर्मा बतौर लेखक व निर्देशक अब चुक गए हैं. फिल्म की टैग लाइन है-दिल की लड़ाई दिमाग से..मगर फिल्म में न दिल है और न दिमाग.

फिल्म की कहानी मथुरा में पले बढ़े अनाथ वासुदेव शास्त्री की है. जिसे हिंदी, संस्कृत व अंग्रेजी भाषा में महारत हासिल है. पढ़ाई में जीनियस है. वह आई आई टी का विद्यार्थी है. वह जीनियस है. कौलेज में उसे एक बुद्धिमान लड़की नंदिनी (इशिता चौहान) से प्यार हो जाता है. वासुदेव शास्त्री को कम्प्यूटर हैकिंग में महारत हासिल है. इसी के चलते उसे रॉ के चीफ जयशंकर प्रसाद अपनी संस्था के साथ जुड़ने के लिए कहते हैं. कई बार मना करने के बाद महज आईएसआई के सफाए के लिए वह रॉ से जुड़ता है और उसे एक नई टीम दी जाती है.

मगर हथियारों की चोरी की जांच करते हुए जब वह पोरबंदर पहुंचता है, तो वहां उसकी मुठभेड़ एमआरएस (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) से होती है. जो कि एक डिजिटल कंपनी का मालिक है. जयशंकर प्रसाद से उसकी निजी दुश्मनी है, इसलिए वह आईएसआई के साथ भी हाथ मिला लेता है. इस बीच कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. पता चलता है कि एमआरएस से व आईएसआई के साथ रॉ के कुछ अफसर व देश के एक मंत्री भी जुड़े हुए हैं. अंततः वासुदेव शास्त्री के हाथों  मंत्री, रॉ के गद्दार अफसर व एमआरएस मारे जाते हैं. और वासुदेव शास्त्री को उसका प्यार मिल जाता है.

फिल्म ‘‘जीनियस’’ देखकर इस बात का अहसास नहीं होता कि इस फिल्म के लेखक व निर्देशक ‘गद रः एक प्रेम कथा’, ‘वीर’, ‘श्रद्धांजली’ फेम निर्देशक अनिल शर्मा ही हैं. बतौर लेखक व निर्देशक अनिल शर्मा इस फिल्म में बुरी तरफ से असफल हुए हैं. फिल्म के संवाद भी प्रभावहीन हैं और उनका यह दावा खोखला साबित होता है कि उन्होंने चार वर्ष अमेरिका जाकर पढ़ाई करते हुए अपने आपको नए सिरे से खोजने के बाद फिल्म ‘जीनियस’ की पटकथा लिखी है. मगर अफसोस की बात है कि कम्प्यूटर हैंकिंग को छोड़ दें, तो फिल्म में कुछ भी नयापन नहीं है. पूरी फिल्म की कहानी अनिल शर्मा की ही कई पिछली व अन्य फिल्मों का मिश्रण ही है.

इतना ही नही अनिल शर्मा का दावा है कि वह और उनका बेटा उत्कर्ष शर्मा, जो फिल्म का हीरो है, दोनों विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, पर उन्हे यह भी नहीं पता कि आईआईटी की प्रयोगशाला में रसायन शास्त्र की तरह केमिकल वाली प्रयोग शाला नहीं होती है. पूरे पौने तीन घंटे की फिल्म में कहानी शून्य है. इसे इतना लंबा बनाने की जरुरत भी नहीं थी. मगर पुत्र मोह में अनिल शर्मा फिल्म का जितना कबाड़ा कर सकते थे, उसे करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. फिल्म में बेवजह कहीं भी गाने ठूंसे गए हैं. मिथुन चक्रवर्ती व नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों के किरदारों को ठीक से नहीं गढ़ा गया. पटकथा के स्तर पर फिल्म में कमियां ही कमियां हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो वासुदेव शास्त्री के किरदार में उत्कर्ष शर्मा काफी कमजोर साबित हुए हैं. उन्हे अभी बहुत मेहनत करने की जरुरत है. उनके चेहरे पर ठीक से भाव ही नहीं आते. हीरोईन यानी कि नंदिनी के किरदार में इशिता चौहान का चयन भी गलत ही रहा. उन्हे अभिनय आता ही नहीं है. अकेले नवाजुद्दीन सिद्दिकी इस फिल्म को कितना आगे ले जाएंगे? अफसोस यह है कि फिल्मकार व लेखक ने तो नवाजुद्दीन के किरदार को कई जगह कैरीकेचर व मिमिक्री वाला बना दिया है.

दो घंटे  44 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘जीनियस’’ का निर्माण अनिल शर्मा ने दीपक मुकुट व कमल मुकुट के साथ मिलकर किया है. फिल्म के निर्देशक अनिल शर्मा, पटकथा लेखक अनिल शर्मा, सुनिल सिरवैया व अमजद अली, संगीतकार हिमेश रेशमिया और कलाकार हैं – उत्कर्ष शर्मा, इशिता चौहान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, आयशा जुल्का, मिथुन चक्रवर्ती, मालती चहर, देव गिल, जाकिर हुसेन, के के रैना, अभिमन्यु सिंह व अन्य.

हैप्पी फिर भाग जाएगी : पहली फिल्म का दोहराव

2016 की मुदस्सर अजीज की सफल फिल्म ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ पहली फिल्म का दोहराव ही है. सोनाक्षी सिन्हा के रूप में एक और हैप्पी और कहानी को पाकिस्तान की बजाय चीन ले जाना ही नयापन है. अन्यथा पहली फिल्म के मुकाबले यह फिल्म निराश करती है.

2016 की सफल फिल्म ‘‘हैप्पी भाग जाएगी’’ की सिक्वअल फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ की कहानी शुरू होती है अमृतसर की ही दो हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी का चीन के शंघाई शहर जाने से. गुड्डू को एक साजिश के तहत चीन के शंघाई शहर के चाउ की तरफ से एक संगीत कार्यक्रम में गाने के लिए बुलाया जाता है. गुड्डू (अली फजल) अपने साथ अपनी प्रेमिका हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी (डायना पेंटी) को भी लेकर जाता है.

उधर दूसरी हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) अपने पिता की खुशी के लिए चीन में अपने मंगेतर अमन वाधवा (अपराशक्ति खुराना) को ढूढ़ने निकली है, इसके लिए उसने शंघाई शहर के विश्वविद्यालय में नौकरी के लिए आवेदन दिया है और उसे वहां पर बुलाया गया है. दोनों एक ही हवाई जहाज से शंई पहुंचते हैं. एअरपोर्ट से बाहर निकलते ही नाम की समानता के चलते चाउ के गुर्गे हरप्रीत कौर उर्फ हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) को किडनैप कर लेते हैं. जबकि गुड्डू अपनी हैप्पी के साथ विश्वविद्यालय पहुंच जाता है. जब चाउ को पता चलता है कि यह वह हैप्पी नहीं है, जिसकी उन्हे तलाश थी, तो वह अपने गुर्गे से कहकर अमृतसर में डोली चढ़े बग्गा (जिम्मी शेरगिल) और पाकिस्तान से उस्मान अफरीदी (पीयूष मिश्रा) को किडनैप करा लेते हैं.

वास्तव में चाउ (बिजौय थांगजम) एक चीनी एजेंट है, जिसने पाकिस्तान के साथ चीन  सरकार के लिए एक व्यापारिक अनुबंध किया था. मगर अब वह अधर में लटक गया है. उसे पता है कि यह काम लाहौर में रह रहे राजनेता जावेद अहमद ही कर सकते हैं. जावेद अहमद पर हैप्पी व उस्मान अफरीदी दबाव डाल सकते हैं. उस्मान अफरीदी जावेद अहमद के करीब हैं और हैप्पी, जावेद अहमद के बेटे के करीब है.

चाउ के गुर्गों के चंगुल मे फंसी हैप्पी भाग निकलती है और उसकी मुलाकात भारतीय दूतावास में काम कर रहे खुशवंत गिल उर्फ खुशी (जस्सी गिल) से होती है. खुशवंत हैप्पी की मदद के लिए चाउ के पास जाता है. उसकी नजर में चाउ एक अच्छे व रुतबे वाले इंसान हैं. चाउ उन्हे मदद का भरोसा दिलाते हैं, मगर उसी वक्त अपने गुर्गों को हैप्पी को पकड़ने के लिए खुशवंत गिल के घर भेज देता है. पर हैप्पी उन्हे मारकर भगा देती है.

इस बीच हैप्पी व खुशी को बग्गा और उस्मान अफरीदी का भी साथ मिल जाता है. एक तरफ हैप्पी को अमन वाधवा की तलाश है, तो दूसरी तरफ उसे उस हैप्पी की भी तलाश है, जिसके कारण वह फंसी हुई है. इधर चाउ, खुशी को गुमराह करता रहता है और उनकी मुसीबतें बढ़ाता रहता है. पर एक दिन हैप्पी को अमन वाधवा जेल में मिलता है. पता चलता है कि वह ‘गे’ है और अपने साथी के जेल में होने की वजह से वह भी जेल में है. उधर खुशी को चाउ की असलियत पता चल जाती है. काफी भागमभाग के बाद दोनों हैप्पी, गुड्डू, बग्गा आदि चीने से भारत के लिए रवाना होते हैं.

जहां तक पटकथा व संवाद लेखन का सवाल है, तो पिछली फिल्म में मुदस्सर अजीज ने लेखन के लिए काफी तारीफ बटोरी थी, पर इस बार वह असफल रहे हैं. इस बार उनकी पटकथा व संवादों में परिपक्व लेखक की छाप नजर नहीं आती. मुदस्सर ने इस फिल्म में भी जिम्मी शेरगिल व पीयूष के बीच भारत व पाकिस्तान को लेकर ही हास्यव्यंग के संवाद रचे हैं. जो कि काफी हतोत्साहित करते हैं.

कुछ व्यंगात्मक हास्य व्यंग वाले संवाद अच्छे बन पड़े हैं. इंटरवल से पहले फिल्म दर्शकों को हंसाती रहती है, मगर इंटरवल के बाद निर्देशक फिल्म पर से अपनी पकड़ खो देते हैं. इतना ही नहीं तमाम दृश्यों को देखते हुए लगता है कि हैप्पी जबरन व बेवजह भाग रही है. एडीटिंग टेबल पर कसकर इसकी लंबाई कम करने की जरुरत थी.

इस बार फिल्म की कहानी के केंद्र में है वह हैप्पी है, जिसे सोनाक्षी सिन्हा ने बेहतर तरीके से निभाया है. डायना पेंटी और अली फजल के हिस्से ज्यादा कुछ करने को रहा नहीं. मगर एक बार फिर जिम्मी शेरगिल ने साबित कर दिखाया कि उनके अंदर अभिनय के कई रंग समाए हुए हैं. जिम्मी के तकिया कलाम वाले संवाद दर्शकों को काफी राहत देते हैं. मसलन-‘तू गिल है, तो मैं शेरगिल हूं.’ सोनाक्षी सिनहा के अभिनय से ज्यादा प्रभावशाली तो जिम्मी शेरगिल व पीयूष मिश्रा की जुगलबंदी है. पीयूष मिश्रा के अभिनय में काफी दोहराव नजर आता है. जस्सी गिल उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते हैं.

फिल्म का गीत संगीत ठीक ठाक है. अब तक एक भी गाना लोकप्रिय नहीं हुआ है.

दो घंटे 17 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ का निर्माण आनंद एल राय ने ‘इरोज इंटरनेशनल’ के साथ मिलकर किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक मुदस्सर अजीज, कैमरामैन सुनील पटेल, संगीतकार सोहेल सेन  तथा फिल्म के कलाकार हैं – अली फजल, डायना पेंटी, सोनाक्षी सिन्हा, जिम्मी शेरगिल, पीयूष मिश्रा, जस्सी गिल, अपराशक्ति खुराना, जासन थाम, बिजौय थांगजम व अन्य.

यहां जानिए गूगल क्रोम के इन छिपे फीचर्स के बारे में

इंटरनेट पर कुछ भी सर्च करने के लिए अगर आप गूगल क्रोम (Google Chrome) का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको बता दें कि इस पर कुछ ऐसे बढ़िया फीचर्स हैं जो आपको शायद पता भी नहीं होंगे. देखें कुछ ऐसे ही ट्रिक्स जो आपका काफी समय बचाएंगे और काम आसान कर देंगे.

फटाफट सर्च हो जाएंगे शब्द

कई बार कोई टेक्स्ट पढ़ते वक्त उसमें ऐसा शब्द आ जाता है जिसका मतलब हमें पता नहीं होता. या किसी शब्द के बारे में हमें ढूंढ़ना होता है तो हम उसे कौपी करके वेब सर्च के लिए डालते हैं. ऐसा न करना चाहें तो आप बस उस शब्द को सिलेक्ट करके राइट क्लिक कर दीजिए, इसमें गूगल सर्च का विकल्प अपने आप ही आ जाएगा.

अगर कोई टैब गलती से बंद हो जाए तो…

काम करते वक्त हम लोग अक्सर कई सारे टैब्स एक साथ खोल लेते हैं. क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि कोई जरूरी टैब आप गलती से बंद कर गए हों? इसके लिए आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है. आपको बस नया टैब खोलकर Ctrl+Shift के साथ T क्लिक करना है.

झट से करें टैब चेंज

अगर आपने एक से ज्यादा टैब खोल रखे हैं और आप जिस टैब पर काम कर रहे हैं उसे छोड़कर दूसरे टैब को जल्दी से देखना है तो Ctrl Key के साथ 1 से लेकर 9 तक अलग-अलग नंबर के टैब पर जल्दी से पहुंच सकते हैं. जैसे 1 नंबर पर पहला टैब, 2 नंबर पर दूसरा इसी क्रम में टैब बदलते चले जाएंगे. Ctrl 9 से आप आखिरी टैब पर पहुंच जाएंगे.

ऐंड्रायड फोन में सर्च करना और भी आसान

अगर आप ऐंड्रायड मोबाइल में क्रोम में किसी शब्द को सर्च करना चाहते हैं तो यह और भी आसान है. जो शब्द आपको सर्च करना है उसे बस उसे थोड़ी देर तक प्रेस करके रखें इसके बाद उसमें सिलेक्ट, कौपी जैसे विकल्प के साथ सर्च का विकल्प भी आ जाएगा.

सिस्टम खोलते ही आएंगी आपकी पसंदीदा साइट्स

अगर आप अपना सिस्टम औन करते ही रोज कुछ खास साइट्स खोलते हैं तो क्रोम की सेटिंग्स में जाकर on startup पर क्लिक करें फिर इसमें औप्शंस दिखेंगे जिसमें Open a specific page or set of pages पर टिक कर दें. इसके नीचे दिए गए बॉक्स में आपको नया पेज ऐड करने का विकल्प दिखेगा या आप जिन टैब्स पर काम कर रहे हैं वे भी विकल्प के तौर पर आ जाएंगे जिन्हें आप ऐड कर सकते हैं. क्रोम खोलने पर ये पेजेस अपने आप खुल जाएंगे.

Omnibox का इस्तेमाल

Chrome का Omnibox (नया टैब खोलने पर जो address bar की तरह दिखाई देता है), सिर्फ कुछ सर्च करने के लिए ही नहीं बल्कि आप इससे मैथ्स इक्वेशन भी साल्व कर सकते हैं. नया टैब खोलकर omnibox पर कोई इक्वेशन लिखें जैसे 1049*1.5 तो आपको नीचे ही इसका जवाब मिल जाएगा.

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