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बड़े काम के हैं बच्चों को कुकिंग सिखाने के ये 5 फायदे

बदलते समय के चलते मल्टीटास्किंग खूबी नहीं, बल्कि आज की जरूरत बन गई है. पेरैंट्स को इस के लिए तभी से शुरुआत करनी चाहिए जब बच्चा स्कूल जाने लायक हो जाए. पढ़ाईलिखाई, स्पोर्ट्स, ब्रेन ऐक्टीविटी ट्रेनिंग के साथसाथ अब बच्चों को कुकिंग भी सिखानी चाहिए. ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि वे खाना बनाना सीख जाएं, बल्कि इस के और भी कई फायदे हैं. जैसेकि:

सिखाएं मदद करना: कुकिंग करते समय यदि बच्चा आसपास है तो उस से छोटीमोटी सहायता लेने से शुरुआत करें जैसे रैफ्रीजरेटर से सब्जी निकलवाना आदि. बच्चों में नईनई चीजों के बारे में जानने की जिज्ञासा होती है. जब वे कुकिंग की इन सब चीजों को करीब से देखेंगे तो इन की मदद से होने वाले काम के बारे में भी जानना चाहेंगे.

सिखाए सबकुछ खाना: ज्यादातर पेरैंट्स की परेशानी यह होती है कि उन का बच्चा सारी सब्जियां या फल नहीं खाता. ऐसा इसलिए होता है कि खानेपीने की ज्यादातर चीजों को या तो बच्चा कभीकभी देखता है या पहली बार ही देखता है. जब आप रोज कुकिंग के समय बच्चे से खानेपीने की चीजों के बारे में बात करेंगी तो वह उन चीजों को चखना भी चाहेगा.

सिखाए हैल्दी ईटिंग: कुकिंग करतेकरते बच्चे से डिश बनाने के लिए इस्तेमाल हो रही सामग्री के हैल्थ बैनिफिट्स के बारे में बात करें. धीरेधीरे वह खुद ही फ्रूट्स, वैजीटेबल्स और दूसरी खानेपीने की चीजों के बारे में आप से पूछना शुरू करेगा.

बनाए बौंडिंग: बच्चे से बौंडिंग बनाने और उस के शौक के बारे में जानने के लिए किचन से बेहतर जगह भला घर में और कौन सी होगी. बच्चे चंचल होते हैं और उन को सामने बिठा कर अपनी बात कहना और उन की सुनना थोड़ा मुश्किल होता है. ऐसे में किचन में होने वाली अलगअलग कुकिंग ऐक्टीविटीज उस को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं और वह कुछ समय वहां जरूर बिताना चाहता है. बस यही तो समय है काम करतेकरते उस के साथ बौंडिंग मजबूत बनाने का.

बनाए सैल्फ डिपैंड: कैरियर बनाने के लिए ज्यादातर बच्चों को टीनऐज में ही घर से बाहर पीजी या होस्टल इत्यादि में रह कर पढ़ाई करनी पड़ रही है. ऐसी स्थिति में आप के द्वारा दी गई कुकिंग ट्रेनिंग बच्चे के सब से ज्यादा काम आएगी. वह मनपसंद और सेहतमंद खाने के लिए किसी पर निर्भर न रह कर खुद कुकिंग करने के लिए तैयार होगा.

बच्चे की उम्र के अनुसार उसे आसान डिशेज बनाना भी सिखाएं ताकि वह भी ‘हैल्दी ईटिंग हैप्पी लिविंग’ का सही मतलब समझ सके.

हमदर्द (भाग-1) : पति की मौत के बाद टूट चुकी थी कावेरी

कावेरी सन्न रह गई. लगा, उस के पैरों की शक्ति समाप्त हो गई है. कहीं गिर न पड़े इस डर से सामने पड़ी कुरसी पर धम से बैठ गई. 27 साल के बेटे को जो बताना था वह बता चुका  था और अब मां की पेंपें सुनने के लिए खड़े रहना उस के लिए मूर्खता छोड़ और कुछ नहीं था. फिर मां के साथ इतना लगाव, जुड़ाव, अपनापन या प्यार उस के मन में था भी नहीं जो अपनी कही हुई भयानक बात की मां के ऊपर क्या प्रतिक्रिया है उस को देखने के लिए खड़ा हो कर अपना समय बरबाद करता.

कावेरी ने उस की गाड़ी के स्टार्ट होने की आवाज सुनी और कुरसी की पुश्त से टेक लगा कर निढाल सी फैल गई. जीतेजागते बेटे से यह बेजान लकड़ी की बनी कुरसी उस समय ज्यादा सहारा दे रही थी. काम वाली जशोदा आटा पिसवाने गई थी. अत: जब तक वह नहीं लौटती अकेले घर में इस कुरसी का ही सहारा है.

पति का जब इंतकाल हुआ तो बेटा 8वीं में था. कावेरी को भयानक झटका लगा पर उस में साहस था. सहारा किसी का नहीं मिला, मायके वालों में सामर्थ्य ही नहीं थी, ससुराल में संपन्नता थी पर किसी के लिए कुछ करने का मन ही नहीं था.

वह समझ गई थी कि अब अपनी नाव को आप ही खींच कर किनारे पर लाना है. पति के फंड का पैसा ले कर मासिक ब्याज खाते में जमा किया. बीमा का जो पैसा मिला उस से आवासविकास का यह घर खरीद लिया. ब्याज जितना आता खाना और बेटे की पढ़ाई हो जाती पर कपड़ा, सामाजिकता, बीमारी आदि सब कैसे हो? उस का उपाय भी मिल गया. पड़ोस में एक प्रकाशक थे, पाठ्यक्रम की किताबें छापते थे. उन से मिल कर कुछ अनुवाद का काम मांग कर लाई. उस से जो आय होती उस का काम ठीकठाक चल जाता. अब अभाव नहीं रहा.

जशोदा को पूरे समय के लिए रख लिया. गाड़ी पटरी पर आ कर ठीकठाक चलने लगी. उस ने सोचा जीवन ऐसे ही कट जाएगा पर इनसान जो सोचता है उस के विपरीत करना ही नियति का काम है तो कावेरी के सपने भला कैसे पूरे होते.

अपने सपने पूरे नहीं होंगे इस का आभास तो बेटे के थोड़ा बडे़ होते ही कावेरी को होने लगा था. बेटा वैसे तो लोगों की नजरों में सोने का टुकड़ा है. पढ़ने में सदा प्रथम, कोई बुरी लत नहीं, बुरी संगत नहीं, रात में कभी देर से नहीं लौटता, पैसा, फैशनेबुल कपड़े या मौजमस्ती के लिए कभी मां को तंग नहीं करता पर जैसेजैसे बड़ा होता जा रहा था कावेरी अनुभव करती जा रही थी कि बेटे का रूखापन उस के प्रति बढ़़ता जा रहा था.

कोई लगाव, प्यार तो मां के प्रति बचा ही नहीं था. तेज बुखार में भी उठ कर बेटे को खाना बनाती और बेटा चाव से खा कर घर से निकल जाता. भूल कर भी यह नहीं पूछता कि मां, कैसी तबीयत है.

कावेरी इन बातों को कहे भी तो कैसे? ऊपर को मुंह कर के थूको तो थूक अपने मुंह पर आ कर गिरता है. दुश्मन भी यह जान कर खुश होंगे कि बेटा उस के हाथ के बाहर है. दूसरी बात यह थी कि उस के मन में भय भी था कि पति का छोड़ा यह घर उन के पीछे बिना बिखरे टिका  हुआ है. लड़ाईझगड़ा करे और बेटा घर छोड़ कर चला जाए तो एक तो घर घर नहीं रहेगा, दूसरी और बड़ी बात होगी कम उम्र की कच्ची बुद्धि ले घर से निकल वह अपना ही सर्वनाश कर लेगा.

बेटा कैसा भी आचरण क्यों न करे वह तो मां है. बेटे को सर्वनाश के रास्ते में नहीं धकेल सकती, अवहेलना अनादर सह कर भी नहीं. इन सब परिस्थितियों के बीच भी एक आशा की किरण टिमटिमा रही थी कि बेटा बिल्लू एम.बी.ए. कर एक बहुत अच्छी कंपनी में उच्च पद पर लग गया है. सुना है ऊंचा वेतन है. हां, यह जरूर है कि वेतन का बेटे ने एक 10 का नोट भी उस के हाथ पर रख कर नहीं कहा, ‘मां, यह लो, अपने लिए कुछ ले लेना.’

घर जैसे पहले वह चलाती थी वैसे ही आज भी चला रही है. अब तो बड़ेबड़े घरों से अति सुंदर लड़कियों के रिश्ते भी आ रहे हैं. कावेरी खुशी और गर्व से फूली नहीं समा रही. इन में से छांट कर एक मनपसंद लड़की को बहू बना कर लाएगी तो घर का दरवाजा हंस उठेगा. बहू उस के साथसाथ लगी रहेगी. बेटे से नहीं पटी तो क्या? पराई बेटी अपनी बेटी बन जाएगी पर बेटे ने उस की उस आशा की किरण को बर्फ की सिल्ली के नीचे दफना दिया और वह खबर सुना कर चला गया था जिस से उस के शरीर में जितनी भी शक्ति थी समाप्त हो गई थी और बेजान कुरसी ने उसे सहारा दिया.

आज कावेरी को पहली बार लगा कि जीवन उस के लिए बोझ बन गया है क्योंकि इनसान जीता है किसी उद्देश्य को ले कर, कोई लक्ष्य सामने रख कर. जिस समय पति की मृत्यु हुई थी तब भी उसे लगा था कि जीवन समाप्त हो गया पर उस को जीना पड़ेगा, सामने उद्देश्य था, लक्ष्य था, बेटा छोटा है, उस को बड़ा कर उस का जीवन प्रतिष्ठित करना है, उस का विवाह कर के घर बसाना है. मौत भी आ जाए तो उस से कुछ सालों की मोहलत मांग बेटे के जीवन को बचाना पड़ेगा पर आज तो सारे उद्देश्य की समाप्ति हो गई, जीवन का कोई लक्ष्य बचा ही नहीं पर बुलाने से ही मौत आ खड़ी हो इतनी परोपकारी भी नहीं.

जशोदा लौटी. आटे का कनस्तर स्टोर में रख कर साड़ी झाड़ती हुई आ कर बोली, ‘‘आंटी, नाश्ता बना लूं? भैया चला गया क्या? बाहर गाड़ी नहीं है.’’

‘‘रहने दे, मेरा मन नहीं है. तू कुछ खा ले फिर भैया का कमरा ठीक से साफ कर दे, आता ही होगा.’’

‘‘फिर कुछ हुआ? अरे, बिना खाए मर भी जाओ तो भी बेटा पलट कर नहीं देखने या पूछने वाला. तुम इतनी बीमार पड़ीं पर कभी बेटे ने पलट कर देखा या हाल पूछा?’’

‘‘बात न कर के कमरा साफ कर… आता ही होगा.’’

‘‘कहां गया है?’’

‘‘ब्याह करने.’’

इतना सुनते ही जशोदा धम से फर्श पर बैठ गई.

‘‘जल्दी कर, रजिस्ट्री में समय ही कितना लगता है…बहू ले कर आता होगा.’’

‘‘बेटा नहीं दुश्मन है तुम्हारा. कब से सपने देख रही हो उस के ब्याह के.’’

‘‘सारे सपने पूरे नहीं होते. उठ, जल्दी कर.’’

‘‘कौन है वह लड़की?’’

‘‘मैं नहीं जानती, नौकरी करती है कहीं.’’

‘‘तुम भी आंटी, जाने क्यों बेटे के इशारे पर नाचती हो? अपना खाती हो अपना पहनती हो…उलटे बेटे को खिलातीपहनाती हो. सुना है मोटी तनख्वाह पाता है पर कभी 10 रुपए तुम्हारे हाथ पर नहीं रखे और अब ब्याह भी अपनी मर्जी का कर रहा है. ऐसे बेटे के कमरे की सफाई के लिए तुम मरी जा रही हो.’’

गहरी सांस ली कावेरी ने और बोली, ‘‘क्या करूं, बता. पहले ही दिन, नई बहू सास को बेटे से गाली खाते देख कर क्या सोचेगी.’’

‘‘यह तो ठीक कह रही हो.’’

जब बड़ी सी पहिए लगी अटैची खींचते बिल्लू के साथ टाइट जींस और टीशर्ट पहने और सिर पर लड़कों जैसे छोटेछोेटे बाल, सांवली, दुबलीपतली लावण्यहीन युवती को ले कर आया तब घड़ी ठीक 12 बजा रही थी. एक झलक में ही लड़की का रूखा चेहरा, चालचलन की उद्दंडता देख कावेरी समझ गई कि उसे अब पुत्र मोह को एकदम ही त्याग देना चाहिए. यह लड़की चाहे जो भी हो उस की या किसी भी घर की बहू नहीं बन सकती. पता नहीं बिल्लू ने क्या सोचा? बोला, ‘‘रीटा, यह मेरी मां है और मां यह रीटा.’’

जरा सा सिर हिला या नहीं हिला पर वह आगे बढ़ गई. कमरे में जा कर बिल्लू ने दरवाजा बंद कर लिया. हो गया नई बहू का गृहप्रवेश. और नई चमचमाती जूती के नीचे रौंदती चली गई थी वह कावेरी के वे सारे सपने जो जीवन की सारी निराशाओं के बीच बैठ कर देखा करती थी. सुशील बहू, प्यारेप्यारे पोतेपोती के साथ सुखद बुढ़ापे का सपना.

जशोदा लौट कर रसोई की चौखट पर खड़ी हुई और बोली, ‘‘आंटी, यह औरत है या मर्द, समझ में नहीं आया.’’

जशोदा इतनी मुंहफट है कि उस की हरकतों से डरती है कावेरी. पता नहीं नई बहू के लिए और क्याक्या कह डाले. पहले दिन ही वह बहू के सामने बेटे से अपमानित नहीं होना चाहती. पर यह तो सच है कि अब उस को कुछ सोचना पड़ेगा. देखा जाए तो बेटे का जो बरताव उस के साथ रहा उस से बहुत पहले ही उस को अलग कर देना चाहिए था पर अनजान मोह से वह बंध कर रह गई.

‘‘अब तो मां के सहारे की उसे कोई जरूरत नहीं…अब क्यों साथ रहना.’’

जशोदा ने खाना बना कर मेज पर लगा दिया. न चाहते हुए भी कावेरी ने थोड़ी खीर बनाई. जशोदा फिर बौखलाई.

‘‘अब ज्यादा मत सिर पर चढ़ाओ.’’

‘‘नई बहू है, उसे तो पूरी खिलानी चाहिए. मीठा कुछ मंगाया नहीं, थोड़ी खीर ही सही.’’

‘‘अब तुम रहने दो. कहां की नई बहू? पैंट, जूता, बनियान में आई है, सास के पैर छूने तक का ढंग नहीं है. लगता है कि घाटघाट का पानी पी कर इस घाट आई है.’’

कंधे झटक जशोदा चली गई. थोड़ी देर में दोनों अपनेआप खाने की मेज पर आ बैठे. बेटा तो कुरतापजामा पहने था. बहू घुटनों से काफी ऊंचा एक फ्राक जैसा कुछ पहने थी और ऊपर का शरीर आधा नंगा था.

बेटे से एक शब्द भी बोले बिना कावेरी ने बहू को पारखी नजर से देखा. दोनों चुपचाप खाना खा रहे थे. उस के मुख पर भले घर की छाप एकदम नहीं थी और संस्कारों का तो जवाब नहीं. सास से एक बार भी नहीं कहा कि आप भी बैठिए. और तो और, खाने के बाद अपनी थाली तक नहीं उठाई और दरवाजा फिर से बंद हो गया.

घर का वातावरण एकदम बदल गया. यह स्वाभाविक ही था. घर में जब बहू आती है तो घर का वातावरण ही बदल जाता है. उसे भोर में उठने की आदत है. फ्रेश हो कर पहले चाय बनाती, आराम से बैठ कर चाय पीती, तब दिनचर्या शुरू होती. तब कभीकभी बेटा भी आ बैठता और चाय पीता, दोचार बातें न होती हों ऐसी बात नहीं, मामूली बातें भी होतीं पर अब तो साढ़े 8 बजे जशोदा चाय की टे्र ले कर दरवाजा पीटती तब दरवाजा खोल चाय ले कर फिर दरवाजा बंद हो जाता. खुलता 9 बजने के बाद फिर तैयार हो, नाश्ता करने बैठते दोनों और फौरन आफिस निकल जाते.

दोपहर का लंच आफिस में, शाम को लौटते, ड्रेस बदलते फिर निकल जाते तो आधी रात को ही लौटते. बाहर ही रात का खाना खाते तो नाश्ता छोड़ घर में खाने का और कोई झंझट ही नहीं रहता. छुट्टी के दिन भी कार्यक्रम नहीं बदलता. नाश्ता कर दोनों घूमने चले जाते…रात खापी कर लौटते.

बहू से परिचय ही नहीं हुआ. बस, घर में रहती है तो आंखों में परिचित है, संवाद एक भी नहीं. खाना खाने के बाद ऐसे उठ जाती जैसे होटल में खाया हो. न थाली उठाती न बचा सामान समेट फ्रिज में रखती. कावेरी हैरान होती कि कैसे परिवार में पली है यह लड़की? संस्कार दूर की बात साधारण सी तमीज भी नहीं सीखी है इस ने और यह सब छोटीमोटी बातें तो बिना सिखाए ही लड़कियां अपनी सहज प्रवृत्ति से सीख जाती हैं. इस में तो स्त्रीसुलभ कोई गुण ही नहीं है…पता नहीं इस के परिवार वाले कैसे हैं, कभी बेटी की खोजखबर लेने भी नहीं आते?

कावेरी ने अब अपने को पूरी तरह समेट लिया है. जो मन में आए करो, मुझ से मतलब क्या? कुछ इस प्रकार के विचार बना लिए उस ने. सोचा था घर छोड़ ‘हरिद्वार’ जा कर रहेगी पर इस घर की एकएक चीज उस की जोड़ी हुई, सजाई हुई है. बड़ी ममता है इस सजीसजाई गृहस्थी के प्रति, फिर यह घर भी तो उस के नाम है…वह क्यों अपना घर छोड़ जाएगी…जाना है तो बहूबेटे जाएंगे.

जशोदा भी यही बात कहती है. इस समय उस का अपना कोई है तो बस, जशोदा है. महीने का वेतन और रोटीकपड़े पर रहने वाली जशोदा ही एकमात्र अपनी है…बहुत दिनों की सुखदुख की गवाह और साथी.

बेटे ने घर के लिए कभी पैसा नहीं दिया और आज भी नहीं देता है. कावेरी ने भी यह सोच कर कुछ नहीं कहा कि ये लोग घर पर केवल नाश्ता ही तो करते हैं. बहू तो कमरे से बाहर आती ही नहीं है. कभीकभी चाय पीनी हो तो बेटा रसोई में जा कर चाय बना लेता है. 2 कप कमरे में ले जाते हुए मां को भी 1 कप चाय पकड़ा जाता है. बस, यही सेवा है मां की.

  • – क्रमश:

भारतीय जनता पार्टी और उस के उग्र रक्षक

ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनावों और बाद में कई विधानसभाओं में मिली जीतों के इनाम में अपने वर्करों को हुड़दंग मचाने और पीटने का हक दे दिया है. हर उस राज्य में जहां भाजपा सरकार है, रक्षकों की एक फौज पैदा हो गई है जो कभी गाय, कभी लव जेहाद, कभी देशभक्ति, कभी भारत माता, कभी वैलेंटाइन डे के विरोध में तो कभी पूजा करने या न करने के हक को ले कर खुलेआम पीटपीट कर किसी को भी मार तक सकती है. कानून इस कदर अंधा हो गया है कि पीटने वालों को आमतौर पर पकड़ा नहीं जाता. जिन पर आरोप लगते भी हैं, उन का तो मंत्री तक हार पहना कर सम्मान करते हैं.

वर्करों को कुछ देना बहुत जरूरी होता है ताकि वे पार्टी के साथ बने रहें. कांग्रेस ने 1947 के बाद अपने वर्करों को स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर सुविधाएं, पैंशन, सम्मान दिए थे. कम्यूनिस्टों ने हड़ताल कराने के हक अपने वर्करों को दिए थे. कांग्रेस ने अपने वर्करों को सरकारी कंपनियों में नौकरियां भी दिलवाई थीं.

भाजपा के पास न नौकरियां हैं, न पीटने वालों को पैंशनें दी जा सकती हैं इसलिए उस ने शायद उन्हें पीटने का बिना कहे लाइसैंस दे दिया है. कुकुरमुत्तों की तरह देशभर में भगवा दुपट्टाधारी लिंचिंग करने लगे हैं और पुलिस इस लिंचिंग का मत लेती है. अलवर में एक मुसलिम गौ व्यापारी को पीटपीट कर मारने की ताजा घटना है. इसी के 2 दिन बाद गाजियाबाद में एक मुसलिम युवक को हिंदू लड़की से शादी करने की कोशिश में पीटा गया.

भाजपा सोच रही?है कि यह जोरजबरदस्ती विरोधियों का मुंह बंद रखेगी. पर यह छूट असल में खतरनाक होती है. अब गैंग बनने लगे हैं जो हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर हर तरह की दंगई करने को तैयार हैं पर पैसा ले कर हिफाजत भी देने लगे हैं. आखिर इन रक्षकों को मौजमस्ती के लिए पैसा चाहिए.

वैसे यह पुराने हिंदू राजाओं का टैक्स वसूलने और फौज बनाए रखने का पुराना तरीका रहा है. मुगल राजाओं ने तो हिसाबकिताब रखा था पर हिंदू राजा जो अनपढ़ होते थे, डाकुओं को इलाके ठेके पर दे देते थे. उन्हें लूटने पर राजा को हिस्सा देना होता था. अब भक्तों को गुंडई के ठेके दिए जाने लगे हैं और इस का खमियाजा और ज्यादा गरीबों, किसानों, मजदूरों को भुगतना पड़ रहा है. दलितों, मुसलमानों को कमजोर मान कर उन पर रोब जमा कर हर तरह का जुल्म करने का लाइसैंस दिया गया है और यह बीमारी सारे देश में फैल गई है.

प्रायश्चित्त (भाग-1) : क्या नलिनी को पति की बेरुखी स्वीकार हो सकी

‘‘दीदी, मेरा तलाक हो गया,’’ नलिनी के कहे शब्द बारबार मेरे कानों में जोरजोर से गूंजने लगे. मैं अपने दोनों बच्चों के साथ कोलकाता से अहमदाबाद जाने वाली ट्रेन में बैठी थी. नागपुर आया तो स्टेशन के प्लेटफार्म पर नलिनी को खड़ा देख कर मुझे बड़ी खुशी हुई. लेकिन न मांग में सिंदूर न गले में मंगलसूत्र. उस का पहनावा देख कर मैं असमंजस में पड़ गई.

मेरे मन के भावों को पढ़ कर नलिनी ने खुद ही अपनी बात कह दी थी.

‘‘यह क्या कह रही हो, नलिनी? इतना सब सहने का अंत इतना बुरा हुआ? क्या उस पत्थर दिल आदमी का दिल नहीं पसीजा तुम्हारी कठोर तपस्या से?’’

‘‘शायद मेरी जिंदगी में यही लिखाबदा था, दीदी, जिसे मैं 8 साल से टालती आई थी. मैं हालात से लड़ने के बदले पहले ही हार मान लेती तो शायद मुझे उतनी मानसिक यातना नहीं झेलनी पड़ती,’’ नलिनी भावुक हो कर कह उठी. उस के साथ उस की चचेरी बहन भी थी जो गौर से हमारी बातें सुन रही थी.

नलिनी के साथ मेरा परिचय लगभग 10 साल पुराना है. बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत मेरे पति आशुतोष का तबादला अचानक ही कोलकाता से अहमदाबाद हो गया था. अहमदाबाद से जब हम किराए के  फ्लैट में रहने गए तो सामने के बंगले में रहने वाले कपड़े के व्यापारी दिनकर भाई ठक्कर की तीसरी बहू थी नलिनी.

नई जगह, नया माहौल…किसी से जानपहचान न होने के कारण मैं अकसर बोर होती रहती थी. इसलिए शाम होते ही बच्चों को ले कर घर के सामने बने एक छोटे से उद्यान में चली जाती थी. दिनकर भाई की पत्नी भानुमति बेन भी अपने पोतेपोतियों को ले कर आती थीं.

पहले बच्चों की एकदूसरे से दोस्ती हुई, फिर धीरेधीरे मेरा परिचय उन के संयुक्त परिवार के सभी सदस्यों से हुआ. भानुमति बेन, उन की बड़ी बहू सरला, मझली दिशा और छोटी नलिनी. भानुमति बेन की 2 बेटियां भी थीं. छोटी सेजन 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी.

गुजरात में लोगों का स्वभाव इतना खुले दिल का और मिलनसार होता है कि कोई बाहरी व्यक्ति अपने को वहां के लोगों में अकेला नहीं महसूस करता. ठक्कर परिवार इस बात का अपवाद न था. मेरी भाषा बंगाली होने के कारण मुझे गुजराती तो दूर हिंदी भी टूटीफूटी ही आती थी. भानुमति बेन को गुजराती छोड़ कर कोई और भाषा नहीं आती थी. वह भी मुझ से टूटीफूटी हिंदी में बात करती थीं. धीरेधीरे हमारा एकदूसरे के घर आनाजाना शुरू हो गया था. घर में जब भी रसगुल्ले बनते तो सब से पहले ठक्कर परिवार में भेजे जाते और उन की तो बात ही क्या थी, आएदिन मेरे घर वे खमनढोकला और मालपुए ले कर आ जातीं.

ठक्कर परिवार में सब से ज्यादा नलिनी ही मिलनसार और हंसमुख स्वभाव की थी. गोरा रंग, बड़ीबड़ी आंखें, तीखे नाकनक्श, छरहरा बदन और कमर तक लटकती चोटी…कुल मिला कर नलिनी सुंदरता की परिभाषा थी. तभी तो उस का पति सुशांत उस का इतना दीवाना था. नलिनी घरेलू कामों में अपनी दोनों जेठानियों से ज्यादा दक्ष थी. सासससुर की चहेती बहू और दोनों ननदों की चहेती भाभी, किसी को भी पल भर में अपना बना लेने की अद्भुत क्षमता थी उस में.

20 जनवरी, 2001 को मैं सपरिवार अपनी छोटी बहन के विवाह में शामिल होेने कोलकाता चली गई. 26 जनवरी को मेरी छोटी बहन की अभी डोली भी नहीं उठी थी कि किसी ने आ कर बताया कि अहमदाबाद में भयंकर भूकंप आया है. सुन कर दिल दहल गया. मेरे परिवार के चारों सदस्य तो विवाह में कोलकाता आ कर सुरक्षित थे, पर टेलीविजन पर देखा कि प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखा कर कहर बरपा दिया था और भीषण भूकंप के कारण पूरे गुजरात में त्राहित्राहि मची हुई थी.

अहमदाबाद में भूकंप आने के 10 दिन बाद हम वापस आ गए तो देखा हमारे अपार्टमेंट का एक छोटा हिस्सा ढह गया था, पर ज्यादातर फ्लैट थोड़ीबहुत मरम्मत से ठीक हो सकते थे.

अपने अपार्टमेंट का जायजा लेने के बाद ठक्कर निवास के सामने पहुंचते ही बंगले की दशा देख कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. पुराने समय में बना विशालकाय बंगला भूकंप के झटकों से धराशायी हो चुका था. ठक्कर परिवार ने महल्ले के दूसरे घरों में शरण ली थी.

मुझे देखते ही भानुमति बेन मेरे गले लग कर फूटफूट कर रो पड़ीं. घर के मुखिया दिनकर भाई का शव बंगले के एक भारी मलबे के नीचे से मिला था. बड़ा बेटा कारोबार के सिलसिले में दिल्ली गया हुआ था. भूकंप का समाचार पा कर वह भी भागाभागा आ गया था. नलिनी का पति सुशांत गंभीर रूप से घायल हो कर सरकारी अस्पताल में भरती था. घर के बाकी सदस्य ठीकठाक थे.

सुशांत को देखने जब हम सरकारी अस्पताल पहुंचे तो वहां गंभीर रूप से घायल लोगों को देख कर कलेजा मुंह को आ गया. सुशांत आईसीयू में भरती था. बाहर बैंच पर संज्ञाशून्य नलिनी अपनी छोटी ननद के साथ बैठी हुई थी. नलिनी मुझे देखते ही आपा खो कर रोने लगी.

‘दीदी, क्या मेरी मांग का सिंदूर सलामत रहेगा? सुशांत के बचने की कोई उम्मीद नजर नहीं आती. काश, जो कुछ इन के साथ घटा है वह मेरे साथ घटा होता.’ कहते हुए नलिनी सुबक उठी. नलिनी के मातापिता और उस का भाई मायके से आए थे. दिमाग पर गहरी चोट लगने के कारण सुशांत कोमा में चला गया था. उस के दोनों हाथपैरों पर प्लास्टर चढ़ा हुआ था.

देखतेदेखते 2 महीने बीत गए, पर सुशांत की हालत में कोई सुधार नहीं आया, अलबत्ता नलिनी की काया दिन पर दिन चिंता के मारे जरूर कमजोर होती जा रही थी. उस के मांबाप और भाई भी उसे दिलासा दे कर चले गए थे.

भानुमति बेन ने अपने वैधव्य को स्वीकार कर के हालात से समझौता कर लिया था. उन की पुरानी बड़ी हवेली की जगह अब एक साधारण सा मकान बनवाया जाने लगा. नीलिनी की दोनों जेठानियां अपनीअपनी गृहस्थी में मगन हो गईं.

एक दिन खबर मिली कि सुशांत का एक पैर घुटने से नीचे काट दिया गया, क्योंकि जख्मों का जहर पूरे शरीर में फैलने का खतरा था. मैं दौड़ीदौड़ी अस्पताल गई. आशा के विपरीत नलिनी का चेहरा शांत था. मुझे देखते ही वह बोली, ‘दीदी, पैर कट गया तो क्या हुआ, उन की जिंदगी तो बच गई न. अगर जहर पूरे शरीर में फैल जाता तो? मैं जीवन भर के लिए उन की बैसाखी बन जाऊंगी.’

मैं ने हामी भरते हुए उस के धैर्य की प्रशंसा की पर उस के ससुराल वालों को उस का धैर्य नागवार गुजरा.

उस की दोनों जेठानियां और ननदें आपस में एकदूसरे से बोल रही थीं, ‘देखो, पति का पैर कट गया तो भी कितनी सामान्य है, जैसे कुछ भी हुआ ही न हो. कितनी बेदर्द औरत है.’

उन के व्यंग्यबाण सुन कर हम आहत हो गए थे. नलिनी की आंखों में आंसू आ गए. वह बोली, ‘इन लोगों का व्यवहार तो मेरे प्रति उसी दिन से बदला है जब से सुशांत गंभीर रूप से घायल हुए हैं.’

जेठानियां तो पहले से ही नलिनी से मन ही मन जलती थीं, पर भानुमति बेन को भी जेठानियों के सुर में बोलते हुए देख कर मुझे बड़ी हैरत हुई. वह बोलीं, ‘सुशांत नलिनी को अपनी पसंद से ब्याह कर लाया था. शादी से पहले दोनों की कुंडलियां मिलाई गईं तो पाया गया कि नलिनी मांगलिक है. हम ने सुशांत को बहुत समझाया कि नलिनी से विवाह कर के उस का कोई हित न होगा. पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा कि अगर विवाह करेगा तो केवल नलिनी से वरना किसी से नहीं. अंत में हम ने बेटे की जिद के आगे हार मान ली. 2 साल तक नलिनी की गोद नहीं भरी. पर बाकी सब ठीक था. अब तो सुशांत शारीरिक रूप से अपंग हो गया है. वह कोमा से बाहर आएगा, इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है. यह तो पति के लिए अपने साथ दुर्भाग्य ले कर आई है. जोशी बाबा भी यही कह गए हैं.’

भानुमति बेन के घर में एक जोशी बाबा हर दूसरेतीसरे दिन चक्कर लगाते थे. उन के आते ही सारा घर उन के चारों ओर घूमने लगता. वह किसी की कुंडली देखते, किसी का हाथ. जोशी बाबा का कई परिवारों से संबंध था इसलिए उस के माध्यम से बहुत से सौदे हो जाते थे. जिसे जोशी बाबा ऊपर वाले की कृपा कहने पर अपनी दक्षिणा जरूर वसूलते थे.

नलिनी उन से सदा कतराती थी क्योंकि वह उसे सदा तीखी निगाहों से घूरते थे. दोनों जेठानियों को आशीर्वाद देते समय उन का हाथ कहीं भी फिसल जाए, वे उसे धन्यभाग समझती थीं पर नलिनी ने पहली ही बार में उन की नीयत भांप ली थी. वह हमेशा कटीकटी रहती थी. अब जोशी बाबा हर सुबह पंचामृत ले कर आते थे और डाक्टरों के विरोध के बावजूद एक बूंद सुशांत के मुंह में डाल ही जाते थे.

‘पर आंटीजी, भूकंप में तो जितने आदमियों की जानें गईं, क्या उन सब की बीवियां मांगलिक थीं? फिर अंकल भी तो नहीं रहे, क्या आप की कुंडली में कुछ दोष था? सुशांत फिर से पूर्ववत हो जाएगा, कम से कम मेरा दिल तो यही कहता है,’ मैं ने कहा.

‘बेटी, अंकल के साथ मेरे विवाह को 40 वर्ष से ऊपर हो चुके थे. मेरा और तुम्हारे अंकल का इतना लंबा साथ भी तो रहा है. औरोें के घरों का तो मैं नहीं जानती, पर नलिनी के ग्रह सुशांत पर जरूर भारी पड़े हैं.’

भानुमति बेन को अपनी बातों पर अड़ा जान कर मैं चुप हो गई.

भूकंप की तबाही को 8 महीने बीत चुके थे. एक दिन मेरा बेटा रिंकू बाहर से दौड़ते हुए घर में आया और कहने लगा, ‘मम्मी, सुशांत अंकल को होश आया है. उन के घर के सभी लोग अस्पताल गए हैं.’

रिंकू की बातें सुन कर मैं भी जाने के लिए निकली ही थी कि आशुतोष ने मुझे रोका, ‘पहले, उस के घर वालों को तो मिल लेने दो. कितने अरसे से तरस रहे थे कि सुशांत को होश आ जाए. जब सभी मिल लें, फिर कलपरसों जाना,’ मुझे आशुतोष की बात ठीक लगी.

2 दिन बाद जब मैं अस्पताल पहुंची तो माहौल खुशी का न था. बाकी सब पहले से ज्यादा गमगीन थे. सुशांत होश में तो आया था और घर के सभी लोगों को पहचान भी रहा था पर वह सामान्य रूप से बात करने में और हाथपैर हिलाने में असमर्थ था. उस की देखरेख गुजरात के जानेमाने न्यूरोलोजिस्ट डा. नवीन देसाई कर रहे थे. उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया था कि सिर पर लगी गंभीर चोट के कारण सुशांत धीरेधीरे ही सामान्य हो पाएगा.

नलिनी मुझे देखते ही मेरी ओर लपकी और बोली, ‘दीदी, आप ने जो कहा था अब सच हो गया है. सुशांत ठीक हो रहे हैं.’

‘देखना, सुशांत धीरेधीरे पूरी तरह ठीक हो जाएगा,’ मैं ने उत्तर दिया.

सुशांत के होश में आने से नलिनी का हौसला बुलंद हो गया था. अस्पताल में नर्सों के होते हुए भी उस ने अपनी खुशी से पति की देखरेख का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया. वह हर रोज उस की दाढ़ी बनाती, कपड़े बदलती. घर के बाकी सदस्य हर दूसरेतीसरे दिन अस्पताल आते और 5-10 मिनट सुशांत का हालचाल पूछने की खानापूर्ति कर के चले जाते.

करीब 2 महीने बाद सुशांत स्पष्ट रूप से बात करने लगा. हिलनेडुलने की आत्मनिर्भरता अब तक उस में नहीं आई थी, लेकिन उसे कुदरती तौर पर ही पता चल गया था कि उस की दाईं टांग घुटने तक आधी काट दी गई थी.

हुआ यों कि एक दिन वह कहने लगा, ‘नलिनी, मुझे ऐसा क्यों लग रहा है, कि मैं दाएं पैर की उंगलियों को हिला नहीं पा रहा हूं, जरा चादर तो उठाओ, मैं अपना पैर देखना चाहता हूं,’ बेचारी नलिनी क्या जवाब देती, वह सुशांत के आग्रह को टाल गई, तो सुशांत ने पास से गुजरती एक नर्स से अनुरोध कर के चादर हटाई तो अपने कटे हुए पैर को देख कर हतप्रभ रह गया.

उस की आंखों से बहते आंसुओं को पोंछ कर नलिनी ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया. डा. देसाई ने सुशांत को समझाया कि किन हालात में उन्हें उस का पैर काटने का निर्णय लेना पड़ा. सुशांत ने ऐसी चुप्पी साध ली कि किसी से बात न करता. मैं ने नलिनी को समझाया, ‘तुम्हीं को धैर्य से काम लेना होगा. वह बच गया. 8 महीने कोमा में रहने के बाद होश में आया है…क्या इतना कम है. अभी तो उसे अपने पिता की मौत का सदमा भी बरदाश्त करना है. तुम्हें हर हाल में उस का साथ निभाना है.’

कुछ संभलने के बाद वह बारबार पिता के बारे में पूछता था तो उसे हर बार इधरउधर की कहानी बता कर बात टाल दी जाती, लेकिन जब झूठ बोल कर उसे टालना नामुमकिन हो गया तो एक दिन बड़े भैया ने उसे हकीकत से अवगत करा दिया.

अब सुशांत बारबार घर जाने की जिद करने लगा. हालांकि उस जैसे मरीज की अस्पताल में ही अच्छी देखभाल हो सकती थी पर पति की इच्छा को देखते हुए नलिनी ने सब को आश्वासन दिया कि वह घर में सुशांत की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ेगी बल्कि घर के माहौल में सुशांत जल्दी ठीक हो जाएगा. अंत में डाक्टरों ने उसे घर ले जाने की इजाजत दे दी.

घर पर सुशांत की देखरेख का सारा जिम्मा नलिनी के सिर पर डाल कर भानुमति बेन तो मुक्त हो गईं. घर पर ही फिजियोेथेरैपी चिकित्सा देने के लिए एक डाक्टर आते.

सुशांत की नौकरी तो छूट गई थी. दोनों भाइयों का कारोबार अच्छा चल रहा था. सुशांत और नलिनी का खर्च भी उन्हें ही वहन करना पड़ रहा था. प्रत्यक्षत: तो कोई कुछ न कहता, पर घर के ऊपरी काम करने के लिए जो महरी आती थी, उसे निकाल दिया गया था. सुशांत को नहलानेधुलाने, खिलानेपिलाने के बाद जो वक्त बचता था, वह नलिनी कपड़े धोने, बर्तन साफ करने, झाडूपोंछा करने और रसोई का काम करने में बिता देती. वह बेचारी दिन भर घर के कामों में लगी रहती.

मैं कभी उन के घर बैठने जाती तो मुझे नलिनी को देख कर तरस आता कि किस तरह यह समय की मार झेल रही है. दिनभर घर के कामों के साथ अपाहिज पति की देखभाल करती है पर चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आती. मैं कभी आंटीजी से कहती तो वह खीज उठतीं, ‘इस के कर्मों का फल तो सुशांत भुगत रहा है. उस की सेवा कर के यह अपने पूर्व जन्म के पापों का प्रायश्चित्त ही कर रही है,’ मुझे उन की बातों का बुरा जरूर लगता पर मैं सोचती कि सुशांत वक्त के साथ ठीक होगा तो सब के मुंह अपनेआप बंद हो जाएंगे.

फिजियोथेरैपिस्ट और नलिनी की अथक मेहनत से सुशांत अब उठताबैठता, बैसाखी की मदद से चलता. अपने तमाम छोटेमोटे काम वह खुद ही करता. अब नलिनी उसे जयपुर फुट लगवाने की सलाह देने लगी. जब जयपुर फुट की मदद से सुशांत चलने का प्रयास करने लगा तो नलिनी को तो मानो सारे जहान की खुशियां  मिल गईं.

एक दिन मैं दोपहर के खाली समय में बैठी कोई पत्रिका पढ़ रही थी कि किसी ने दरवाजा खट- खटाया. दरवाजा खोलने पर सामने नलिनी को देख कर मैं खुश हो गई और बोली, ‘आओ, नलिनी, कितने दिनों बाद तुम घर से बाहर निकली हो. मैं कल आशुतोष से तुम्हारी ही बात कर रही थी. किस तरह तुम ने विपरीत परिस्थितियों में हार न मानी. मौत के मुंह से अपने पति को बाहर ले आईं. सच, सारे विश्व में एक हिंदुस्तानी नारी इसलिए ही पतिव्रता मानी जाती होगी.’

‘बस, दीदी, अब मेरी तारीफ करना छोडि़ए, मैं आप को यह बताने आई थी कि सुशांत ने फिर से नौकरी कर ली है. भूकंप में दुर्घटनाग्रस्त होने के पहले सुशांत जिस प्रेस में काम करते थे, उस के मालिक ने उन को फिर से काम पर बुलाया है. सुशांत को पहले भी घर के व्यापार में दिलचस्पी नहीं थी. प्रेस का प्रिय काम पा कर वह खुश हैं.’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है, नलिनी…2-3 साल बहुत कष्ट सह लिए तुम ने, अब जल्दी से सुशांत को वह प्यारा तोहफा देने की तैयारी करो जिस के आने से जीवन में बहार आ जाती है. वैसे भी सुशांत को बच्चे बहुत पसंद हैं.’

मेरे यह कहते ही नलिनी की आंखों में आंसू भर आए, ‘दीदी, पति के जिस प्यार को पाने के लिए मैं ने इतने कष्ट सहे, वह तो आज तक मेरे हिस्से में नहीं आया. सुशांत काफी समय से मुझ से कटेकटे रहते थे. पहले तो मैं समझती थी कि दुर्घटना के कारण उन में बदलाव आया होगा. पर आजकल मुझ से बात करना तो दूर वह मेरी तरफ देखते तक नहीं हैं.

‘कल रात को मैं ने जब उन से इस बेरुखी की वजह पूछी तो वह मुझ पर बिफर उठे कि क्या बात करूं, मैं तुम से? अरे, तुम से शादी कर के तो अब मैं पछता रहा हूं. कैसी मनहूस पत्नी हो तुम? तुम्हारे मांगलिक होने के कारण मेरी तो जान ही जाने वाली थी. वह तो जोशी बाबा की पूजा, अम्मां की मन्नतें, घर वालों का प्यार ही था, जो मैं बच गया.

‘मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ. पहली बार पता चला कि सुशांत के दिल में मेरे लिए इतना जहर भरा है. मैं ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की. मैं ने यह भी कहा कि आप तो जन्मकुंडली मांगलिक अमांगलिक यह सब नहीं मानते थे.

‘मेरी बात सुनते ही सुशांत गुस्से में भड़क गए थे कि उसी का तो अंजाम भुगत रहा हूं. अम्मां और पिताजी तो तुम से शादी करने के पक्ष में ही नहीं थे. काश, उस वक्त मैं ने उन का और जोशी बाबा का कहा माना होता तो कम से कम मेरी जान पर तो न बन आती.

‘आप यह क्या कह रहे हैं? 2 साल मैं ने कितने जी जान से आप की सेवा की, इस उम्मीद में कि हम आप के ठीक होने के बाद, अपने प्यार की दुनिया बसाएंगे. अब आप ठीक हो गए तो अंधविश्वास को आधार बना कर मुझ से इतनी नफरत कर रहे हैं? मैं सबकुछ सह सकती हूं, पर आप की नफरत नहीं सह सकती.

‘वह बोले कि नहीं सह सकतीं तो चली जाओ अपने बाप के घर, रोका किस ने है? तुम से जितनी जल्दी पीछा छूटे, उसी में मेरी बेहतरी है और ऐसी क्या सेवा की है तुम ने? जो तुम ने किया है वह तो चंद पैसों के बदले कोई नर्स भी तुम से बेहतर कर सकती थी. यह कह सुशांत बिना कुछ खाए ही काम पर चले गए.’

इतना बता कर नलिनी फूटफूट कर रो पड़ी.

– क्रमश:

नारी स्वतंत्रता के नाम पर पुरुषों के खिलाफ गालियां बकने के खिलाफ हूं : सोनाक्षी सिन्हा

लगातार कई फिल्मों की असफलता के बाद बौक्स आफिस पर फिल्म ‘‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’’ ने सोनाक्षी सिन्हा के चेहरे पर मुस्कान ला दी है. वैसे सोनाक्षी सिन्हा का दावा है कि उन्हें फिल्म की सफलता असफलता से कोई फर्क नहीं पड़ता. वह तो ईमानदारी के साथ अपने बेहतरीन काम करती रहती हैं. इन दिनों बौलीवुड में महिला सशक्तिकरण की ही बातें ज्यादा की जा रही हैं. लोग उसी के इर्द गिर्द अपनी फिल्म की कहानियां भी गढ़ने लगे हैं. हाल ही में उनसे महिला सशक्तिकरण को लेकर हुई बातचीत इस प्रकार रही..

बौलीवुड में ‘महिला सशक्तिकरण को लेकर कुछ हो रहा है?

हो रहा है, पर गति बहुत धीमी है. कई फिल्में बन रही हैं, जहां नारी केंद्रीय पात्र होती है. यह एक छोटा सा कदम है. पर कुछ तो कदम बढ़ाया गया है. पिछले दो तीन वर्षो में कई नारी प्रधान फिल्में बनी हैं और दर्शकों ने इन फिल्मों को स्वीकारा भी है. मेरा मानना है कि जब तक आप दर्शकों को विविधतापूर्ण सिनेमा नहीं देंगे, तब तक उनकी रूचि कैसे पता चलेगी? यदि आप बच्चे को लौलीपौप और केक दें, तो उसे समझ में आएगा कि उसे क्या अच्छा लगा. जब तक आप उसे लौलीपौप नहीं देंगें, तब तक वह केक ही खाता रहेगा. जब आप उसे केक के अलावा लौलीपौप भी देंगे, तब उसे पता चलेगा कि उसे लौलीपौप भी पसंद है.

आपके अनुसार महिला सशक्तिकरण के लिए क्या होना चाहिए?

समानता बहुत जरूरी है. जब ईश्वर ने पुरुष और औरत को समान रूप से इस संसार में भेजा है, तो हम क्यों भेदभाव करें.

पर बौलीवुड में तो भेदभाव बहुत होता है. हीरो के मुकाबले हीरोइन को बहुत कम पारिश्रमिक राशि मिलती है?

आपने एकदम सही कहा. पर इस दिशा में भी कुछ कदम आगे बढ़े हैं. अब हमारी पारिश्रमिक राशि बढ़ी है. लेकिन हीरोइन को अच्छे पैसे तभी मिलेंगें, जब दर्शक हीरोईन की फिल्मों को ज्यादा पसंद करेंगे. जिस तरह से हीरो की फिल्मों को दर्शक स्वीकार करते हैं, उस तरह से जब तक वह हीरोइन की फिल्मों को स्वीकार नही करेंगे, तब तक हीरोइन के पैसे नहीं बढ़ेंगे.

राजी जैसी महिला प्रधान फिल्म को स्वीकार किया गया?

जी हां! दर्शक धीरे धीरे बदल रहे हैं. पर इसकी गति बहुत धीमी है. मैं उम्मीद करती हूं कि वह दिन बहुत जल्द आएगा, जब हीरो व हीरोइन दोनों को समान रूप से पारिश्रमिक राशि मिलेगी. वैसे यदि आप देखेंगे तो यह भेदभाव हर जगह है. फिर चाहे वह स्पोर्ट्स हो या कोई दूसरा क्षेत्र हो.

फेमीनिज्म को लेकर आपकी क्या सोच है?

मेरे लिए फेमीनिज्म काम तलब समान अधिकार है. मेरे लिए फेमीनिज्म का मतलब पुरुषों के खिलाफ बकबक करना, उनके खिलाफ आंदोलन करना नही है. पुरुषों की बुरायी करना या नीचा दिखाना मेरे लिए फेमीनिज्म नहीं है. जब तक आप समानता की लड़ाई सभ्य तरीके से लड़ रहे हैं, तब तक हम आपके साथ हैं. फेमीनिज्म या नारी स्वतंत्रता के नाम पर आंदोलन चलाते हुए पुरुषों के खिलाफ गालियां बकने के मैं खिलाफ हूं. मेरी राय में गाली गलौज करने से कोई बदलाव नहीं आएगा. बदलाव तभी आएगा, जब आप अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकें.

आप बायोपिक फिल्मों से दूरी बनाए हुए हैं?

आपने एकदम सही कहा. इन दिनों बायोपिक फिल्में काफी बन रही हैं. मगर मुझे अभी तक किसी बेहतरीन बायोपिक फिल्म का हिस्सा बनने का मौका नहीं मिला. मगर मैं करना चाहती हूं. बशर्ते बहुत अच्छी कहानी हो, जो कि पूरे विश्व तक पहुंचे.

आपके दिमाग में ऐसी कोई कहानी है?

मैं एक स्पोर्टस बायोपिक करना चाहती हूं. मैं तो खेल के मैदान पर कई खेल खेलते हुए बड़ी हुई हूं. मैं खुद स्पोर्ट्स वुमन रह चुकी हूं. मैं बौलीबाल खेलती थी. फुटबाल, बास्केटबाल, टेनिस, स्वीमिंग सब कुछ खेल चुकी हूं. इसके अलावा ऐसी कहानियों का हिस्सा बनना चाहती हूं, जो कि बहुत कम लोगों तक पहुंच पाती हैं. पर काफी प्रेरणा दायक होती हैं. मसलन- दशरथ मांझी की कहानी को लीजिए. उन्होंने अपनी मेहनत से एक पहाड़ को तोड़कर गांव वालों के लिए रास्ता बनाया था.

इसके अलावा कौन सी फिल्में कर रही हैं?

करण जोहर की फिल्म ‘कलंक’ की शूटिंग चल रही है. इसके बाद सलमान खान के साथ ‘दबंग 3’ की शूटिंग शुरू होगी. शायद मुदस्सर अजीज की अगली फिल्म भी करुं.

सेक्सबौट्स से रुकेगा सेक्स क्राइम..!

एक रोबॉट के साथ सेक्स करने का आइडिया सुनने में साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है, लेकिन हर 5 में से 1 व्यक्ति इस आइडिया के बारे में सोचता है. एक ताजा सर्वे में यह बात सामने आई है. सर्वे के अनुसार, 21% ब्रिटिश लोग रोबॉट से सेक्स करेंगे और हर 3 में से 1 व्यक्ति रोबॉट के साथ डेट पर जाएगा. फ्यूचर टेक्नॉलजी पर एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2050 तक इंसान का रोबॉट के साथ सेक्स करना एक आम बात हो जाएगी.

सर्वे में 18 साल के 2816 सेक्शुअली ऐक्टिव ब्रिटिश युवाओं पर सर्वे किया था. सर्वे में सवाल किया गया था कि वे साइबॉर्ग के साथ कौन-सी एक्टिविटी करना चाहेंगे. गौरतलब है कि साइबॉर्ग उस वस्तु को कहा जाता है जिनमें ऑर्गैनिक और बायोमकैट्रॉनिक बॉडी पार्ट्स होते हैं. तो इसके जवाब में रिसर्चर को अलग अलग जबाव मिला.

कुछ लोगों ने जवाब में साइबॉर्ग से सेक्स करने के लिए कहा था, रिसर्चर ने उनसे ऐसा करने का कारण पूछा. उनमें से भी 72% लोगों ने कहा कि रोबॉट इस काम के लिए अच्छे रहेंगे, वहीं 28% ने कहा कि यह उनके लिए नया अनुभव होगा.

यह तकनीक डॉ. इयन पियर्सन की एक रिपोर्ट को फॉलो करता है, जिसमें डॉ. पियर्सन ने कहा था कि 2050 तक लोगों की नजर में रोबॉट्स से सेक्स करना इंसान की तुलना में ज्यादा आम बात हो जाएगी.

डॉ. पियर्सन ने कहा कि रोबॉट्स बिल्कुल इंसानों की तरह ही दिखेंगे. आने वाले समय में लोग अपने सेक्स बॉट्स को अपनी कार की तरह देखेंगे और उनपर हजारों रूपये खर्च कर देंगे. कुछ लोग रोबॉट्स को सिर्फ सेक्स के लिए ही खरीदेंगे. कुछ उनसे बाद में आकर्षित हो सकते हैं लेकिन सेक्शुअली अट्रैक्टिव रोबॉट्स ही ज्यादा प्रचलित हो पाएंगे.

ऑनलाइन सेक्स टॉय रिटेलर लवहनी के कॉ-ओनर नील स्लेटफॉर्ड ने कहा, ‘यह तकनीक हमेशा ही विकसित होती रहती है, जिसके कारण इसमें कीमतें आमतौर पर सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर होती हैं. हम तीन साल से इस तरह के प्रॉडक्ट्स बेच रहे हैं और इनकी कीमतें निस्संदेह रूप से कम होंगी. यह बहुत अच्छे प्रॉडक्ट्स हो सकते हैं. अपने निजी जिंदगी में लाइफ पार्टनर के साथ एक तीसरे शख्स को रखने का यह एक सबसे अच्छा तरीका हो सकेगा, जिसमें तलाक का डर भी नहीं रहेगा.

सर्वे में क्या पाया गया?

सर्वे में पूछा गया था कि आप रोबॉट के साथ क्या करना चाहेंगे?

कुक/सफाई कर्मी बनाएंगें: 45%

उनसे बातचीत करेंगे: 41%

उनसे खुद के सारे काम कराएंगें: 38%

उनके साथ सेक्स करेंगे: 21%

उनके साथ गेम खेलेंगे: 12%

क्या सेक्सबॉट्स से सेक्स क्राइम रुकेगा?

कई लोग सेक्सबॉट्स के तरह तरह के फायदे देख रहे हैं. बिहेवियर थेरेपिस्ट निकोलस ऑजुला इन्हें सेक्स के तरफ बेहद आकर्षित लोगों के लिए काम का माना. उनका मानना है कि यह सेक्स क्राइम में कमी लाने में कारगर साबित होंगे. ऑजुला ने कहा, ‘मेरा मानना है कि आने वाले कुछ सालों में सेक्स टॉयज सेक्स करने के लिए एक सुरक्षित और सबसे अच्छा साधन हो सकते हैं क्योंकि इनमें ज्यादा क्रिएटिव सेक्स की गुंजाइश होती है.’

सरित प्रवाह : भारत में समलैंगिक संबंध अब अपराध नहीं

समलैंगिक संबंधों को सुप्रीम कोर्ट ने अब जुर्मों के बाहर कर दिया है. ताजीराते हिंद यानि इंडियन पीनल कोर्ड की धारा 377 की मरम्मत करते हुए उन्होंने साफ कह दिया है कि दो जनानों का किसी भी तरह का प्रेम कानूनी दायरे में नहीं आएगा. यह कानून अंग्रेजों ने बनाया था पर उस से पहले किस बात को समाज गलत मानता था और किस को नहीं आज कहना मुश्किल है. समाज का कानून तो पति के मर जाने पर भी बेवा पत्नी को सजाए मौत की सजा देता रहा है. दया आई तो उस का सिर मुंडवा कर कभी वृंदावन भेज दिया था तो कभी घर के कोने में धकेल दिया.

लेकिन 2 आदमियों के बीच सैक्स कोई नई बात नहीं है. और न ही अजीबोगरीब. बोलचाल की  गालियों में इस का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है मानो हर जना ही समलैंगिक हो. समाज इन गालियों को सिरमाथे पर रखता है, वर्ना तो कब का इन पर रोकटोक लग सकती थी. कभी रामायण महाभारत को पढ़ कर देवताओं के कारनामों के बारे में कुछ कह कर देखें, समाज के ठेकेदार बिलबिला कर पीछे पड़ जाएंगे. जाहिर है समाज को आदमियों के बीच सैक्स उसी तरह मंजूर है जैसे वेश्याओं से. चूंचूं कर ली पर होने दिए.

सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानूनी दायरे के बाहर कर के अब 2 औरतों और 2 आदमियों को मर्जी से एकदूसरे के साथ रहने की इजाजत दे दी है. कम से कम खाकी वर्दी वाला डंडा घुमाता तो नहीं आएगा. वैसे एक आदमी औरत के बीच पैसे देले कर भी सैक्स कानून में जुर्म नहीं है पर पुलिस और कुछ कानूनों का सहारा ले कर पकड़ ही लेती थी. 2 आदमियों और 2 औरतों के बीच शादी अब कानून नहीं हो सकती. शादी होने के बाद विरासत का फायदा हो जाता है और गोद लेने में आसानी रहती है. शायद यह अगला कदम होगा.

इस मामले में भगवा सरकार का रुख बड़ा मजेदार रहा है. पहले ये लोग इसे अनैतिक मानते रहे थे पर समलैंगिकों ने इस तरह जम कर हल्ला मचाया और लगातार मचाया कि सरकार के हौंसले पस्त हो गए. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी झुकना पड़ा जो वर्ग शादी को संस्कार मान कर सैक्स सिर्फ शादी के बाद की इजाजत देना चाहता था. जो कट्टरपंथी पैंतरें पहले भगवाधारी अपनाने थे वे जनता के दबाव में बह गए.

इस मामले में तैयार किए गए जनमत ने धर्म की चूलें हिला दी हैं. किसी भी धर्म में 2 आदमियों या 2 औरतों की शादियों के नियम नहीं हैं. कहीं भी पंडों, पादरियों, मुल्लाओं, ग्रंथियों, भिक्शुओं को दान दक्षिणा नहीं मिलती. इसीलिए सभी धर्म 2 आदमियों 2 औरतों के सैक्स और शादी के खिलाफ हैं. जब बच्चे नहीं होंगे तो दान मिलने के मौके और कम जाएंगे इसलिए भक्तों  को उस रास्ते पर जाने ही न दो. यह बात दूसरी कि जो पंडेपादरी शादी के बिना रहने को मजबूर हैं वे इस में गले तक डूबे रहे हैं.

2 आदमियों और 2 औरतों का सैक्स आज के युग में शादी से ज्यादा सहूलियत वाला है. इस में बच्चों का डर नहीं. जब चाहा जब ब्रेकअप कर लो. जितने दिन बात बनी ठीक है. दोनों कमाऊं. दोनों बराबरी की हैसियत वाले. घरेलू पार्टनरशिप इस से अच्छी भला कैसी हो सकती है.

नोटबंदी की तरह नासमझी भरा फैसला है SC/ST एक्ट : मायावती

दलित एक्ट को लेकर देश भर की राजनीति गरम हो गई है. दलित एक्ट के विरोध में देश भर में सवर्ण समाज द्वारा आयोजित बंद में का मिलाजुला असर रहा. इसको देखते हुये राजनीतिक दलों में बेचैनी बढ़ गई है. एक्ट के विरोध में बंद का सबसे अधिक प्रभाव मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार में पडा. दलित एक्ट के विरोध में उत्तर प्रदेश में मायावती ने भाजपा ने जमकर हमला बोला.

बहुजन समाज पार्टी नेता और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने केन्द्र सरकार के दलित एक्ट को नासमझी भरा फैसला बताया. केन्द्र सरकार पर हमलावर होते हुए मायावती ने कहा कि चुनाव के समय भाजपा जातिवादी तनाव फैलाना चाहती है. यही वजह है कि दलित एक्ट के विरोध का असर भाजपा शासित वाले राज्यों में ज्यादा पड़ा. भाजपा सरकार की नीतियों ने जनता को परेशान कर दिया है. एससीएसटी एक्ट के साथ भाजपा ने खिलवाड़ किया. इसी तरह नोटबंदी और जीएसटी जैसी आर्थिक नीतियों से देश परेशान हुआ. यह काम आम जनता के हित में नहीं रहा. मायावती ने आरोप लगाया कि केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियां पूंजीपतियों के हित में है. दलित एक्ट का दुरूपयोग रोकने के लिये हमारी सरकार ने सही कदम उठाया था.

मायावती ने सर्वसमाज को भाजपा से सचेत रहने के लिये कहा. मायावती ने कहा कि भाजपा का जनाधार खिसक रहा है. जिसकी वजह से वह नये नये हथकंडे भाजपा प्रयोग कर रही है. इससे सभी को सावधान रहने की जरूरत है. भाजपा का जो दोगला चरित्र है वह सबके सामने उजागर हो गया है. मायावती ने कहा कि बसपा अकेली ऐसी पार्टी है जो सर्वसमाज का ध्यान रखती है. सर्व समाज के हित के लिये आर्थिक आधार पर आरक्षण दिये जाने की जरूरत है.

पलटन : सिर्फ बेहतरीन एक्शन दृश्य अन्यथा फिल्म से दूरी ही भली

युद्ध पर केंद्रित फिल्में बनाने में महारत रखने वाले फिल्मकार जे पी दत्ता इस बार पाकिस्तान की बजाय भारत व चीन सीमा पर हुए 1965 के युद्ध पर फिल्म ‘‘पलटन’’ लेकर आए हैं. जे पी दत्ता का दावा है कि उन्होंने यह फिल्म सिक्किम सीमा पर स्थित नाथू ला दर्रे के उस घटनाक्रम पर बनायी है, जो कि इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं है. इस तरह वह अपनी फिल्म के माध्यम से इतिहास में नया अध्याय जोड़ने का काम कर रहे हैं.

फिल्म की कहानी 1965 के नाथू ला पास दर्रे की है. जब चीनी सेना की भारतीय सेना के साथ छोटी सी झड़प हुई थी, पर भारतीय सेना के जवानों ने चीनी सेना के छक्के छुड़ा दिए थे.

जे पी दत्ता ने फिल्म को वास्तविक लोकेशन पर जाकर फिल्माया है. कास्ट्यूम आदि पर काफी मेहनत की है. मगर पटकथा के स्तर पर इस बार वह काफी चूके हैं, जबरन ठूंसी गयी आधी अधूरी अतीत की  कहानियों के चलते फिल्म बोझिल होने के साथ साथ काफी लंबी खिंच गयी है. फिल्म में इमोशन की कमी है. जिन लोगों को युद्ध के दृश्य व एक्शन देखने का शौक है या जिन्हे तकरार देखना पसंद है, उन्हे यह फिल्म ठीक लग सकती है. सिद्धांत कपूर के पास करने को कुछ था ही नहीं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सोनाक्षी सिन्हा के भाई  लव सिन्हा सर्वाधिक निराश करते हैं. जैकी श्राफ, अर्जुन रामपाल व सोनू सूद ने ठीक ठाक अभिनय किया है.

दो घंटे 34 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘पलटन’’ के निर्माता, लेखक व निर्देशक जे पी दत्ता हैं. संगीतकार अनु मलिक, कैमरामैन शैलेष ए बी अवस्थी और निगम बोमजान तथा कलाकार हैं-जैकी श्राफ, अर्जुन रामपाल, सोनू सूद, गुरमीत चौधरी, लव सिन्हा, अभिलाष चौधरी, नागेंद्र चौधरी, ईशा गुप्ता, सोनल चौहान, दीपिका कर व अन्य.

लैला मजनूं : सदियों पुरानी क्लासिक प्रेम कहानी का बंटाधार

‘‘लैला मजनूं’’ की प्रेम कहानी सदियों पुरानी है, मगर फिल्मकार इम्तियाज अली और साजिद अली ने उसे आधुनिक जामा पहनाते हुए बंटाधार करके रख दिया है.

फिल्म की कहानी कश्मीर में रह रहे मसूद की लड़की लैला (तृप्ति डिमरी) से शुरू होती है, जो कि कौलेज में पढ़ती है. वह कौलेज पढ़ने नहीं बल्कि लड़कों के साथ फ्लर्ट करने, उन्हे अपने पीछे दीवाना बनाने के लिए जाती है. उसे इसी में आनंद की अनुभूति होती है. इसी दौरान लैला की मुलाकात कैस बट (अविनाश तिवारी) से होती है. दोनों के पिता शहर के अति अमीर व्यक्ति हैं. मसूद का आरोप है कि कैस बट के पिता ने वर्तमान सरकार की मदद से उनकी जमीन पर कब्जा कर शालीमार नामक बड़ा होटल बना लिया है.

जबकि बट का कहना है कि वह व्यापारी हैं और उन्होने सरकार से जमीन खरीदी है. मसूद का झगड़ा सरकार से है, उनसे नहीं. पर एक नेता के बहकावे में आकर मसूद ने कैस के परिवार को अपना दुश्मन मान लिया है. अब लैला व कैस का प्यार परवान चढ़ता है. कैस, लैला को खुश करने के लिए पूरे कश्मीर में लैला के जन्मदिन के नाम पर उपहार बांटता है. पूरे कश्मीर में इसकी चर्चा शुरू हो जाती है. उधर इस आग में घी डालने का काम लैला का फुफेरा भाई इबान (सुमित कौल) करता रहता है. इबान को नेता ने आश्वासन दिया है कि वह लैला के पति को एमएलए बनवा देगा.

बहरहाल, इबान व लैला की शादी हो जाती है. लैला, इबान व दूसरों की बातों में आकर कैस बट को घर से बेइज्जत कर भगा देती है. फिर कहानी चार वर्ष बाद शुरू होती है, जब कैस के पिता की मौत हो जाती है. पता चलता है कि इबान एमएलए बन गया है. वह शराब में डूबा रहता है. अपनी सरकार के चलते इबान ने ही कैस के परिवार पर जुल्म ढाते हुए कैस के पिता की संपत्ति छीनकर उन पर कई मुकदमे चलवा रखे हैं. इसी वजह से चार साल से शालीमार होटल भी बंद पड़ा है.

पिता के जनाजे को कंधा देने कैस लंदन से वापस आता है. यह खबर पाते ही लैला को नई शक्ति मिल जाती है. पति के विरोध के बावजूद वह कैस से मिलती है और अपने प्यार का पुनः इजहार करती है. अब लैला अपने शराबी पति की चार वर्ष से सहन कर रही प्रताड़ना के खिलाफ विद्रोह कर देती है. उसे अदालत में जाने की धमकी के साथ जनता के सामने इबान को बेनकाब करने की बात करती है. इसी गम में ज्यादा शराब पीकर इबान मर जाता है. लैला के पिता को अपनी गलती का अहसास होता है. वह लैला से कहते हैं कि पति की मौत के बाद की रस्म पूरी होने के बाद कैस से धूमधाम के साथ शादी कर सकती है. लैला, कैस से तब तक इंतजार करने के लिए कहती है. पर इस इंतजार के ही दौरान मजनूं बने कैस पागल हो जाते हैं.

कैस की हालत जानकर लैला को सदमा लगता है और उसकी मौत हो जाती है. कैस कब्रिस्तान जाता है और लैला की कब्र पर लगे पत्थर से चोटिल होकर वहीं मौत के मुंह में समा जाता है.

कथानक व पटकथा के स्तर काफी कमियां है. यह न पूरी तरह से बौलीवुड फिल्म बन पायी और न ही क्लासिक प्रेम कहानी वाली फिल्म ही बन पायी. लैला व कैस के बीच जुनूनी प्यार की बजाय एकतरफा प्यार ही नजर आता है और यह एकतरफा प्यार भी महज उसी वक्त परदे पर उभरता है, जब लैला व कैस आमने सामने होते हैं. यह फिल्म की बजाय किसी सीरियल के कुछ एपीसोड नजर आते हैं. फिल्म कश्मीर में है, तो वहां पर बहुत कुछ कहानी का केंद्र बन सकता था. मगर फिल्मकार ने राजनीतिक दुश्मनी को ही चुना और उसे भी ठीक से पेश नहीं कर पाए.

फिल्म में उबाउपना ज्यादा है. फिल्म में जिस तरह से कैस व उनके पिता के बीच के रिश्ते दिखाए गए हैं और जिस तरह से कैस अपने पिता को मूर्ख बनाकर उन्हे लैला के पिता के पास गिड़गिड़ाने के लिए राजी करता है, वह सब अस्वाभाविक व अति नकली नजर आता है. इस सीन को देखकर लेखक की दिमागी सोच पर हंसी आती है. इतना ही नहीं कई जगह इसे एडीटिंग टेबल पर ठीक किया जा सकता था, पर वह भी नहीं हुआ. फिल्म का गीत संगीत भी आकर्षित नहीं करता.

कश्मीर की खूबसूरत वादियों का नयनसुख लेने के लिए भले ही इस फिल्म को देखा जा सकता है. पूरी फिल्म में लैला भारी भरकम या यूं कहें कि अर्ध दुल्हन के मेकअप में ही नजर आती है. पर  कैस उर्फ मजनूं शानदार जैकेट पहने हुए नजर आते हैं. पर जहां तक अभिनय का सवाल है तो लैला के किरदार में तृप्ति डिमरी को अभी मेहनत करने की जरुरत है. कैस उर्फ मजनूं के किरदार में अविनाश तिवारी ने सहज अभिनय किया है. इस फिल्म से अविनाश तिवारी को अवश्य फायदा मिलेगा.

दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘लैला मजनूं’’ का निर्माण इम्तियाज अली व एकता कपूर ने किया है. फिल्म के लेखक इम्तियाज अली, गीतकार इरशाद कामिल, निर्देशक साजिद अली, कैमरामैन सयक भट्टाचार्य, संगीतकार  निलाद्री कुमार, जोई बरूआ व अलिफ तथा कलाकार हैं-अविनाश तिवारी, तृप्ति डिमरी, सुमित कौल, मीर सरवर, रूचिका कूपर , साहिबा बाली व अन्य.

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