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अपनी सुरक्षा अपने स्मार्टफोन में लेकर चलें

जिंदगी की भागदौड़ और सुनसान सड़कों पर असुरक्षित माहौल के बीच हमारे साथ हमेशा एक अनहोनी का डर चलता है. लेकिन जमाना तकनीक का है, तो ऐसे में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई गैजेट्स और ऐप्स भी हैं. रोजमर्रा के काम से लेकर सुरक्षा तक, हर क्षेत्र में टेक्नोलौजी का भरपूर उपयोग किया जा रहा है. बाजार में ऐसे कई ऐप्स और गैजेट्स मौजूद हैं, जो महिलाओं की सुरक्षा को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं. पहनने वाले गैजेट विशेष रूप से उपयोगी साबित होते हैं, क्योंकि वे महिलाओं के कपड़ों में छुपाए जा सकते हैं. कुछ गैजेट्स तो महिलाओं के आभूषण से मिलते-जुलते हैं. जब दो नए तरीके एक साथ आते हैं, तो टेक्नोलौजी के जरिए निजी सुरक्षा का लाभ उठाया जा सकता है.

सेफलेट (safelet)

सुरक्षा पर ध्यान देने वाले कई पहनने योग्य उपकरणों की तरह ‘सेफलेट’ को गति और सुविधा को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है. इस ब्रेसलेट में दो बटन होते हैं, जिनका प्रयोग एक अभिभावकीय नेटवर्क से संपर्क करने के लिए होता है. खतरे की स्थिति में चेतावनी को देखने वाले दोस्त या परिवार के सदस्य इसके ऐप से आपातकालीन नंबर से संपर्क कर सकते हैं. इसमें होने वाली औडियो रिकौर्डिंग सीधे उपयोगकर्ता के मोबाइल फोन के साथ समन्वयित होती है.

सायरन (SIREN)

‘सायरन’ का इस्तेमाल एक छोटी सी अंगूठी में छुपाकर भी किया जा सकता है. इसकी आवाज 110 डेसीबल से भी अधिक होती है, जिसे 50 फीट की दूरी से सुना जा सकता है. इसके प्रयोग के लिए उपयोगकर्ता को केवल बाईं ओर, करीब 60 डिग्री अंगूठी का टॉप मोड़ना है और फिर एक सेकंड के भीतर वहां से एक जोर की आवाज आएगी. यह सायरन इतना तेज होता है कि हमलावर आसानी से भ्रमित हो सकता है. इसकी स्टाइलिश डिजाइन और आसान पहुंच कई स्थितियों में इसे इस्तेमाल करना और आसान बनाते हैं.

एथेना (Athena)

महिलाओं को आसानी से मदद पहुंचाने के लिए रोर ने अपना पहला उत्पाद ‘एथेना’ बनाया है. इसका आकार आधे सिक्के जितना है. उपोगकर्ता के बटन दबाने पर इसमें जोरदार अलार्म बजता है. इसके बाद उपयोगकर्ता के लोकेशन के साथ यह उपकरण उसके कौन्टैक्ट को एक चेतावनी भेजता है, जो उनकी मदद कर सकते हैं. इस उपकरण को पर्स के साथ जोड़ा जा सकता है या हार की तरह पहना जा सकता है. उपयोगकर्ता इस डिवाइस को साइलेंट मोड में भी सेट कर सकते हैं, ताकि एथेना बिना किसी आवाज के कौन्टैक्ट्स को जानकारी भेज सके.

स्टिलेटो चार्म्स (Stiletto Charms)

व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण को अधिक विचारशील बनाने के प्रयास में, ‘स्टिलेटो चार्म्स’ आधुनिक आभूषण की नकल करते हैं. दिखने में वे किसी भी पोशाक के पूरक लगते हैं, लेकिन गुप्त रूप से कई तरह के कार्यों को प्रबंधित करते हैं. स्टिलेटो मोबाइल ऐप का उपयोग करते हुए उपयोगकर्ता एक आपातकालीन प्रोफाइल बना सकते हैं. आपातकालीन संपर्क स्थापित कर सकते हैं. किसी मार्ग को चुनने की योजना बना सकते हैं और बैटरी का स्तर जांच सकते हैं.

रेवोलर (Revolar)

दूर से ‘रेवोलर’ एक छोटे गेराज क्लिकर की तरह दिखता है. ओवल आकार और दो इंच से कम लंबाई के इस उपकरण को जीन्स की पाकेट या अंदरूनी वस्त्र के साथ जोड़ा जा सकता है. या फिर इसे, चाबियों के गुच्छे में लगाया जा सकता है. दो बार दबाए जाने पर, रेवोलर नामित संपर्कों को ‘यलो अलर्ट’ भेजता है. उपयोगकर्ताओं के संपर्क को स्थान के साथ एक संदेश प्राप्त होता है, जिसमें बताया जाता है कि उन्हें खतरे का डर है. साथ ही तीन बार रेवोलर को दबाए जाने पर ‘रेड अलर्ट’ भेजा जाता है, जो इंगित करता है कि उपयोगकर्ता को गंभीर मदद की आवश्यकता है. रेवोलर के लिए किसी अन्य ऐप को डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं है.

महिला सुरक्षा ऐप्स

छेड़छाड़, एसिड अटैक और किडनैपिंग जैसी वारदातों के कारण आजकल खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षा का मुद्दा सबसे अहम हो गया है. इसे ध्यान में रखते हुए कई ऐप्स बनाए गए हैं, जो गूगल प्ले स्टोर पर मौजूद हैं. इन ऐप्स में जीपीएस ट्रैकिंग, इमर्जेंसी कौन्टैक्ट नंबर और सेफ लोकेशन जैसे फीचर्स हैं. इनमें सुरक्षित और असुरक्षित जगहें पिन यानी चिह्नित करने के भी विकल्प होते हैं. इनमें से कुछ ऐप्स सीधे पुलिस कंट्रोल रूम से जुड़े हुए हैं, जिनसे आप पुलिस से औडियो या वीडियो के जरिए संपर्क कर सकती हैं. इन ऐप्स में वुमन सेफ्टी (Women safety), स्मार्ट 24X27 (Smart 24X27), सेफ्टीपिन (Safetipin), रक्षा–वुमन सेफ्टी अलर्ट (Raksha Women Safety Alert), विदयूऐप (VithU App), निर्भया: बी फियरलेस ऐप (Nirbhaya: Be Fearless App), आई एम शक्ति ऐप (I’m shakti app) आदि हैं.

बढ़ते पेट्रोल के दाम और गिरते रुपये के बीच करें बचत, अपनाएं यह कारगर उपाय

बचत और निवेश के जरिये एक अच्छी जीवनशैली के लिए यह अति आवश्यक है कि अनुशासन पूर्ण तरीके से अपनी वित्तीय योजनाओं को क्रियान्यवन में लाया जाए. एक अच्छी जीवनशैली के लिए बचत और मुद्रास्फीति से अधिक रिटर्न वाली निवेशों के विकल्पों की जानकारी आवश्यक है. आपकी मासिक आय चाहे जो भी हो, एक फिक्स लक्ष्य और कम से कम 20 प्रतिशत बचत अपनी आमदनी में से जरुर करें और जितना अधिक आप बचा सकते हैं उतना ही बेहतर होगा.

फाइनेंशल प्लानिग के नियम जो धन संचय के लिए जरुरी हैः

  • किसी भी संकट की घड़ी के लिए आप अपनी कमाई के कम से कम छह महीने कि राशि को कैश यानि नकदी के रुप में रखें.
  • किसी भी संकट की स्थिति के खिलाफ सुरक्षा के रूप में एक उपयुक्त अवधि बीमा और स्वास्थ्य बीमा पालिसी खरीदें.
  • अपने दीर्घकालिक और अल्पकालिक वित्तीय लक्ष्यों की सूची बनाएं और उन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शुरुआती बचत शुरू करें.
  • जितनी जल्दी हो सके अपनी सेवानिवृत्ति की योजना बनाएं और सेवानिवृत्ति के लिए मासिक बचत को अलग करें.

लम्बी अवधि तक नियमित निवेश करने से व्यक्ति अपनी नेट वर्थ को बढ़ा सकता है. इसके दो फायदे होते है, सबसे बड़ा फायदा चक्रवृद्धि ब्याज की वजह से मिलता है. नियमित निवेश से आपकी निवेश राशि का एवरेज कास्ट भी कम होता है. निवेश के लिए एक विविध पोर्टफोलियो बनाना चाहिए जिसमें सभी प्रकार के निवेश के विकल्प जैसे-  इक्विटी, डैट, सोना और रियल एस्टेट जैसी सभी संपत्ति वर्ग पर्याप्त रूप से आवंटित किए जाने चाहिए.

बचत के कुछ हिस्से को टैक्स सेविंग विकल्प जैसे – पोस्ट औफिस डिपाजिट, पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) आदि में निवेश करना जरुरी है. निवेश पोर्टफोलियो का यह हिस्सा सुरक्षा उद्देश्यों के लिए है न कि अधिक रिटर्न के लिए. ऐतिहासिक रूप से, इक्विटी एकमात्र विकल्प जिसने मुद्रास्फीति से कही ज्यादा रिटर्न निवेशकों को प्रदान किये है. इसलिए इक्विटी एक्सपोजर जरूरी है, इस एक्सपोजर को शेयर बाजारों में प्रत्यक्ष भागीदारी या म्यूचुअल फंड के माध्यम से हासिल किया जा सकता है.

युवा अवस्था में इक्विटी निवेश का अनुपात पोर्टफोलियो में  अधिक होना चाहिए, क्योंकि उस उम्र में जोखिम सहनशीलता अधिक है. जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है ये अनुपात कम होता जाना चाहिए और पोर्टफोलियो को तब सुरक्षित निवेश विकल्पों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए.

अंततः बचत और नियमित निवेश ही धन संचय की कुंजी है. बचत करने की आदत और बचत को सही जगह निवेश करने से ही व्यक्ति अमीर बन सकता है. निवेश के विकल्पों के बारे में जानकारी और मुद्रास्फीति से अधिक रिटर्न प्रदान करने वाली स्कीमों का चयन अगर सही हो तो व्यक्ति रिटायरमेंट तक एक अच्छी रकम जोड़ सकता है.

वालमार्ट-फ्लिपकार्ट सौदे में सरकार को मिला 10,500 करोड़ रुपये टैक्स

फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी खरीदने के बाद वालमार्ट ने भारत सरकार के प्रति अपनी टैक्स देनदारियों का कर दिया है. आयकर विभाग के आकलन के मुताबिक सरकार को वालमार्ट ने टैक्स देनदारियों के तौर पर 10500 करोड़ रुपये की राशि अदा की है. कंपनी को टैक्स देनदारियों का शुक्रवार तक करना था.

इस साल मई में वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट में 77 फीसद हिस्सेदारी 16 अरब डॉलर (1.05 लाख करोड़ रुपये) में खरीदी थी. इसके बाद पिछले महीने कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (सीसीआइ) ने भी इस सौदे को मंजूरी प्रदान कर दी थी. कंपनी को शुक्रवार से पहले शेयरधारकों की हिस्सेदारी खरीदने के एवज में विदहोल्डिंग टैक्स की राशि सरकार को जमा करानी थी. कंपनी ने कहा है कि उसने यह काम टैक्स अधिकारियों के साथ मिल-बैठकर पूरा कर लिया है.

इसी साल जुलाई में वालमार्ट के एक्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट व ट्रेजरर पेड्रो फाराह और उनके सहयोगी जैफ एडम्स ने आयकर विभाग के एक शीर्ष अधिकारी अखिलेश रंजन से मुलाकात कर उन्हें इस मामले में सहयोग करने का भरोसा दिया था. उसके बाद से ही कंपनी आयकर विभाग के साथ मिलकर टैक्स की राशि का आकलन कर रही थी.

वालमार्ट के प्रवक्ता ने टैक्स अदायगी की पुष्टि करते हुए कहा, ‘हम अपनी कानूनी देयता को गंभीरता से लेते हैं. इसमें उस सरकार के प्रति टैक्स देनदारी भी शामिल है जहां हम कारोबार करते हैं. फ्लिपकार्ट में हमारे निवेश के बाद हमने अपनी टैक्स विदहोल्डिंग की देयता को भारतीय टैक्स अधिकारियों की सलाह के मुताबिक पूरा कर लिया है.’

विदहोल्डिंग टैक्स या रिटेंशन टैक्स का मतलब ऐसे कर से है जिसका किसी कंपनी के हिस्सेदारों से इक्विटी खरीदने वाला करता है, न कि हिस्सेदारी बेचने की एवज में धनराशि पाने वाला. वालमार्ट फ्लिपकार्ट सौदे में भी वालमार्ट ने फ्लिपकार्ट के विभिन्न शेयरधारकों से इक्विटी हिस्सेदारी खरीदी है. लिहाजा इस टैक्स की देनदारी भी वालमार्ट की ही थी.

वालमार्ट ने इस साल मई में फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण का एलान किया था और उसने सॉफ्टबैंक, नैस्पर, एस्सेल पार्टनर्स और ई-बे समेत 44 निवेशकों से फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की थी. इसके अतिरिक्त फ्लिपकार्ट के प्रमोटर सचिन बंसल ने भी अपनी हिस्सेदारी अमेरिकी कंपनी को बेच दी थी.

एनक्लैट ने वालमार्ट से पूछे सवाल

उधर, एनक्लैट ने खुदरा कारोबारियों के संगठन कैट की याचिका पर वालमार्ट और फ्लिपकार्ट दोनों से भारत में उनके कारोबार के तौर तरीकों की जानकारी मांगी है. वालमार्ट से इस मामले में 20 सितंबर 2018 तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा गया है. साथ ही एनक्लैट ने सौदे के खिलाफ याचिका दाखिल करने वाले संगठन कैट से भी कहा है कि वे भी बताएं कि वह वालमार्ट के बिजनेस मॉडल को किस रूप में देखता है. एनक्लैट के चेयरमैन जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय ने कहा है कि वह याचिका की मेरिट तय करने से पहले वालमार्ट और फ्लिपकार्ट के देश में बिजनेस करने के तौर तरीकों को समझना चाहते हैं. मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में ही एनक्लैट की बेंच मामले की सुनवाई कर रही है.

विश्व निशानेबाजी : 17 साल के हृदय ने सोने पर लगाया निशाना

भारतीय जूनियर निशानेबाजों का आइआइएसएफ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने का सिलसिला शुक्रवार को भी जारी रहा. 17 वर्ष के एक और उभरते हुए निशानेबाज हृदय हजारिका ने पुरुषों की 10 मीटर एयर राइफल जूनियर स्पर्धा में देश के लिए स्वर्ण पदक जीता.

इसके अलावा जूनियर भारतीय महिलाओं की टीम ने भी नए विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया, जबकि सीनियर महिला 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में भारत की इलावेनिल वालारिवन ने भी रजत पदक जीता. इलावेनिल ने 249.8 का स्कोर किया, जबकि स्वर्ण जीतने वाली चीन की शी मेनग्याओ ने 250.5 का स्कोर किया. भारत की एक अन्य निशानेबाज श्रेया अग्रवाल ने 228.4 के स्कोर के साथ कांस्य पदक हासिल किया. चार खिलाड़ियों के शुक्रवार को पोडियम तक पहुंचने से भारत के इस चैंपियनशिप में कुल 18 पदक हो गए हैं. यह इस चैंपियनशिप में भारत का सबसे बेहतर प्रदर्शन है. इससे पहले भारत का छह पदक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था, जो उन्होंने क्रोएशिया के जगरेब में आयोजित चैंपियनशिप में किया था.

हजारिका अपनी स्पर्धा में फाइनल में पहुंचने वाले अकेले भारतीय रहे. फाइनल में हजारिका और ईरान के मुहम्मद आमिर के बीच 250.1 के स्कोर पर टाई हो गया, जिसके बाद नतीजा शूट ऑफ से निकाला गया. यहां हजारिका ने बाजी मारते हुए स्वर्ण जीता. इस स्पर्धा का कांस्य पदक रूस के ग्रिगोरी शमाकोव ने जीता. हजारिका ने 22वें शॉट तक आमिर पर बढ़त बनाए रखी, लेकिन 23वां शॉट हजारिका 9.4 का लगा बैठे, जिसके बाद 24वें शॉट के खत्म होने तक दोनों का स्कोर 250.1 हो गया. शूटऑफ के आखिरी शॉट में हजारिका ने 10.3 का शॉट लगाया, जबकि ईरानी निशानेबाज 10.2 का शॉट रहा.

महिलाओं के 10 मीटर एयर राइफल जूनियर टीम स्पर्धा में इलावेनिल, श्रेया और मनिनी कौशिक ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 1880.7 के विश्व रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण जीता. इलावेनिल ने अकेले 631 का स्कोर किया, यह भी नया जूनियर विश्व रिकॉर्ड है. पुरुषों की 10मीटर एयर राइफल जूनियर टीम स्पर्धा में हजारिका, दिव्यांश पंवार और अजरुन बबुता 1872.3 का स्कोर करके चौथे स्थान पर रहे.

सीनियरों ने किया निराश

पुरुषों की 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन में भारतीय निशानेबाजों ने निराश किया, जहां कोई भी निशानेबाज फाइनल में जगह नहीं बना सका. एशियन गेम्स के रजत पदक विजेता संजीव राजपूत ने 1158 के स्कोर के साथ सबसे निचला 58वां स्थान प्राप्त किया.

ऐंकरिंग और ऐक्टिंग के बारे में बता रहे हैं जय भानुशाली

एक होस्ट के रूप में 9 सालों में जय में क्या बदलाव आए?

लुक वाइज, कौन्फिडैंस वाइज, ऐक्टिंग वाइज बहुत सारे चेंज हुए हैं. पहले डरतेडरते ऐंकरिंग करता था और दिमाग में यही रहता था कि जल्दी काम खत्म करो और निकलो, मगर अब ऐसा नहीं है. अब दिमाग में यह रहता है कि स्टेज पर लोगों को क्या बैस्ट दिखाऊं. पहले लर्निंग लाइसैंस वाला था, इसलिए डरते हुए गाड़ी चलाता था पर अब कौन्फिडैंस का लाइसैंस मिल गया है, इसलिए फर्राटे भरता हूं.

इंडस्ट्री में जो भी ऐक्टिंग से होस्टिंग में आया सिर्फ होस्ट बन कर रह गया. ऐसा क्यों?

मैं इस का कारण आलसीपन मानता हूं. रिऐलिटी शो हफ्ते में 2 दिन ही शूट होते हैं. बाकी दिन आराम करो. पैसा भी अच्छा मिलता है तो लगता है कि डेली सोप की टैंशन में कौन पड़े. जब पैसा भी भरपूर मिल रहा हो और काम भी 2 दिन का है, तो आलस आने लगता है और फिर टैंशन फिल्मों और डेली शोज में काम करने का. रुझान कम होता जाता है. जब आप कम इंट्रैस्ट लेते हैं तो एक दिन ऐसा आता है कि आप को फिल्मों में काम मिलना बंद हो जाता है.

आप ऐक्टिंग को कितना मिस करते हैं?

बहुत ज्यादा, लेकिन जब एक के बाद एक ऐंकरिंग के औफर मिलते चले गए और मैं करता चला गया तो लोगों को यही लगा कि मैं अब सिर्फ ऐंकरिंग करना चाहता हूं. लेकिन मैं सब से कहना चाहता हूं कि मैं अब ऐक्टिंग में लौटना चाहता हूं, रोमांटिक फिल्में करना चाहता हूं. सिर्फ ऐंकरिंग में बंध कर रहना मेरा उद्देश्य कभी नहीं रहा.

ऐंकरिंग के लिए मसाला कहां से लाते हैं?

इस में होमवर्क जैसा कुछ नहीं होता. सब स्टेज पर लाइव करना पड़ता है. तुरंत देखो और रिएक्शन दो. यही एक अच्छे ऐंकर की निशानी है. एक बात जरूर है मैं शूटिंग से 1 दिन पहले घर पर ही रहता हूं. कोई नाइट पार्टी नहीं करता हूं. भरपूर नींद लेता हूं ताकि सुबह फ्रैश हो कर शूटिंग कर सकूं.

एशियन गेम्स में मेडल जीतने वाला खिलाड़ी दिल्ली में बेच रहा है चाय

एशियन गेम्स में भारत ने अब तक का अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करते हुए 69 मेडल जीते हैं. इनमें से कुछ खिलाड़ियों को जहां इनाम के तौर पर करोड़ों की राशि देने का वादा किया गया तो वहीं कुछ को अपने पुराने काम पर लौटना पड़ा. ऐसी ही एक कहानी भारत को कांस्य पदक दिलाने वाले हरीश कुमार की है.

हरीश कुमार एशियन गेस्म में सेपक टकरा में कांस्य पदक जीतने वाली टीम के सदस्य थे. हरीश दिल्ली के मजनू का टीला में अपने पिता की दुकान पर चाय बेचते हैं. इंडोनेशिया से लौटने के बाद हरीश अपने काम में जुट गए हैं और अपने पिता का हाथ बंटा रहे हैं. उनके घर की आजीविका इस चाय की दुकान पर टिकी है.

हरीश कुमार के मुताबिक उनका परिवार बड़ा है और आय का स्रोत कम है. हरीश ने कहा कि मैं चाय की दुकान पर पिता की मदद करता हूं. इसके साथ ही 2 बजे से 6 बजे तक चार घंटे खेल का अभ्यास करता हूं. उन्होंने कहा कि परिवार के बेहतर भविष्य के लिए अच्छी नौकरी करना चाहता हूं.

हरीश की मां ने कहा कि हमने बड़े संघर्ष से अपने बच्चों को बड़ा किया है. हरीश के पिता औटो ड्राइवर हैं और साथ में हमारी एक चाय की दुकान है. जिसमें पति के साथ बेटा भी काम करता है. मैं अपने बेटे की सफलता में सहयोग के लिए सरकार और कोच हेमराज का धन्यवाद देती हूं.

यह बताते हुए कि वह इस खेल में कैसे पहुंचे, हरीश ने कहा कि 2011 की बात है जब उन्होंने अपने कोच के साथ पहली बार यह खेल खेला था. मैंने 2011 से इस खेल को खेलना शुरू कर दिया. मेरे कोच हेमराज ने मुझे इस खेल में लाया. हरीश ने कहा कि हम भी टायर के साथ खेला करते थे जब मेरे कोच हेमराज ने मुझे देखा और स्पोर्ट्स अथौरिटी औफ इंडिया (SAI) में ले गए. इसके बाद मुझे मासिक फंड और किट मिलना शुरू हुआ. मैं हर दिन अभ्यास करता हूं और अपने देश के लिए और अधिक पुरस्कार लाने के लिए इसे जारी रखूंगा.

उज्जैन में अमावस्या के नाम पर अंधविश्वास का मकड़जाल

उज्जैन में क्षिप्रा नदी के पास ही स्थित 52 कुंडों में वर्ष में 2 बार सोमवती अमावस्या और शनीचरी अमावस्या के दिन बहुत भीड़ होती है. ऐसा अंधविश्वास है कि यहां स्नान करने से भूतप्रेत, चुड़ैल और पिशाच की बाधा का नाश होता है.

17 मार्च, 2018 को शनीचरी अमावास्य के दिन मैं भी इस जगह की प्रत्यक्षदर्शी बनी. मैं ने यहां बड़ी विचित्र घटनाएं घटित होते देखीं. प्रस्तुत है एक रिपोर्ट: दृश्य-1

एक 25 वर्षीय नवयुवती को उस के परिवार वाले जबरदस्ती कुंड में डुबकी लगवा रहे हैं. उन के साथ आया तांत्रिक दिशानिर्देश दे रहा है पर वह युवती जोरजोर से चिल्ला रही है, ‘‘मुझे छोड़ दो. मैं इस पानी में नहीं नहाऊंगी. देखो कितनी बदबू आ रही है, कितना गंदा है यह पानी. मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैं बीमार हूं…कोई भूतप्रेत नहीं लगा है… प्लीज मुझे छोड़ दो.’’ नवयुवती की ये बातें सुन कर उन के साथ आया पंडित बोला, ‘‘बहुत जबरदस्त और उम्रदराज चुड़ैल का प्रभाव है, बिलकुल ढीले मत पड़ना. स्नान कराओ. उस के बाद मैं सब ठीक कर दूंगा.’’

पंडित की बात सुन कर परिवार वाले अपनी लड़की की बातों को उपेक्षित कर के उसे डुबकी लगवाने में व्यस्त हो जाते हैं और तांत्रिक अपने तंत्रमंत्र की पूजा की तैयारी में व्यस्त हो जाता है. घर वाले दानदक्षिणा तैयार कर रहे थे. दृश्य-2

एक 30 वर्षीय महिला को उस के परिवार वाले महंगी गाड़ी में ले कर आते हैं. हंसतीबोलती सामान्य सी दिखने वाली उस महिला को देख कर कोई नहीं कह सकता कि उसे कोई परेशानी है, परंतु जैसे ही उस ने कुंड में डुबकी लगाई और जब पानी से बाहर आई तो उस के पूरे बाल खुले हुए थे और फिर वह जोरजोर से चिल्लाना शुरू कर देती है. उस के साथ आया तांत्रिक कई बड़ेबड़े मोतियों की मालाएं पहने महिला के मुंह पर काला कपड़ा डाल कर कई मंत्र पढ़ते हुए उस महिला के बाल पकड़ कर तेज आवाज में पूछता है, ‘‘बोल कौन है तू? क्यों परेशान कर रहा है?’’

‘‘मैं इस की पड़ोसिन हूं जिस की 2 साल पहले मृत्यु हो गई थी,’’ महिला के अंदर का भूत उत्तर देता है. ‘‘बोल क्यों इसे परेशान कर रही है?’’

‘‘अब नहीं करूंगी पर मुझे वचन चाहिए.’’ ‘‘बोल क्या?’’

‘‘ससुराल वाले मुझ से चक्की नहीं चलवाएंगे. मुझे खेत पर फसल काटने नहीं भेजेंगे, आदमी मुझ पर हाथ नहीं उठाएगा.’’ ‘‘हांहां, हमें सब बातें मंजूर हैं. तू बस इस का पीछा छोड़ दे,’’ ससुराल वाले हाथ जोड़ कर घबराए स्वर में उत्तर देते हैं.

‘‘बस आज के बाद परेशान नहीं करूंगी.’’ इस के कुछ देर बाद ही महिला एकदम सामान्य महिला की तरह व्यवहार करने लगती है. तांत्रिक अपनी मोटी फीस ले कर वहां से चला जाता है.

दृश्य-3 एक 35 वर्षीय युवक को ले कर कुछ पुरुष आते हैं. उसे पकड़ कर जबरदस्ती कुंड में डुबकी लगवाते हैं. युवक जैसे ही कुंड से बाहर आता है जोरजोर से चीखनाचिल्लाना और विचित्र आवाजें निकालना शुरू कर देता है. तांत्रिक पास ही कंडे जला कर मंत्रोचार करते हुए कुछ चीजों को अग्नि में डाल रहा है. युवक तांत्रिक पर ही हमला बोलने को तैयार हो जाता है. तभी तांत्रिक युवक की पीठ पर 3-4 डंडे मारता है और जोर से उस की गरदन पकड़ कर चीखता है, ‘‘बोल अब इसे परेशान करेगा?’’

‘‘मुझे छोड़ दो. मैं अब कुछ नहीं करूंगा.’’ तांत्रिक उसे छोड़ देता है और वह युवक एकदम पस्त हो कर बेहोशी की अवस्था में जमीन पर गिर जाता है.

तांत्रिक युवक के परिवार वालों से कहता है, ‘‘आप लोग बेफिक्र हो कर घर जाएं. आज के बाद वह इसे परेशान नहीं करेगा.’’ हिंदू पाखंड का खुला खेल

ये तीनों दृश्य आम जनमानस में फैले अंधविश्वास का साक्षात प्रमाण हैं. किस प्रकार शिक्षा और जागरूकता के अभाव में हम भारतीय काल्पनिक, अविश्वसनीय धारणाओं और मान्यताओं पर विश्वास कर लेते हैं. तांत्रिकों और बाबाओं के द्वारा किस प्रकार भोलेभाले जनमानस को अपने चंगुल में फंसाया जाता है इस का भी साक्षात प्रमाण हैं ये उदाहरण. यह पिछले 4-5 दशकों के जबरदस्त हिंदू पाखंडों के प्रचार का परिणाम है. इस प्रकार के तांत्रिकों का शिकार हो चुके मेरे एक परिचित अपने साथ घटी एक घटना कुछ इस प्रकार सुनाते हैं:

‘‘मेरी 14 वर्षीय छोटी बहन एक दिन अचानक बेहोश हो गई. उस के हाथपैरों में कंपन और मुंह से झाग निकल रहा था. मुंह से आवाजें भी आ रही थीं. कुछ देर बाद पानी के छींटे मुंह पर मारने के बाद वह ठीक हो गई. फिर यह बारबार होने लगा. एक बार मेरी गांव में रहने वाली मौसी के साथ भी यही हुआ. मौसी ने इसे प्रेतात्मा का प्रभाव बताया और कितने ही चक्कर मेरे मातापिता के साथ तांत्रिक के यहां लगाए. ‘‘तांत्रिक हर बार अपनी मोटी दक्षिणा लेता और अगली बार पूरी तरह ठीक हो जाने की बात कहता. मगर पूरे 2 वर्ष तक लगातार जाने के बाद भी नतीजा सिफर रहा. इधर बहन की हालत लगातार बिगड़ रही थी. एक दिन मेरी एक दूर की रिश्तेदार डाक्टर हमारे घर आईं तो वे बहन को मानसिक चिकित्सक के पास ले गईं.

‘‘डाक्टर ने मिरगी की बीमारी बताई और फिर लंबे चले इलाज के बाद मेरी बहन पूरी तरह ठीक हो गई.’’ ऊपर बताए गए दृश्य-2 की तरह ग्रामीण महिलाओं का जहां अत्यधिक शोषण किया जाता है, वे भूतप्रेत को अपने काम न करने के हथियार के रूप में भी प्रयोग करती हैं, क्योंकि सामान्य स्थिति में तो ससुराल वालों पर उन का कोई जोर नहीं चलता, परंतु भूतपे्रत के कारण वे उन की हर बात को सहजता से स्वीकार लेते हैं.

तांत्रिक की नहीं डाक्टर की जरूरत मनोवैज्ञानिक और वरिष्ठ काउंसलर राकेश डांगी के अनुसार, ‘‘वास्तव में ये भूतप्रेत नहीं, बल्कि व्यक्ति के मनमस्तिष्क में गहरे तक पैठ बना चुका एक वहम मात्र है. इस वहम को जब बारबार परिवार के सदस्यों के द्वारा भूतप्रेत और पिशाच के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो प्रभावित व्यक्ति के मन में यही धारणा अवचेतन में समाहित हो जाती है.

‘‘जब इस से मुक्ति के लिए अज्ञानतावश तांत्रिकों और पंडेपुजारियों के पास वे जाते हैं तो वे अपनी कमाई के लिए भूतप्रेत बाधा की पुष्टि कर देते हैं, जिस से यह अवधारणा और अधिक मजबूत हो जाती है, जबकि वास्तव में इस प्रकार के सभी व्यक्ति किसी न किसी मानसिक रोग के शिकार होते हैं और उन्हें किसी तांत्रिक की नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक चिकित्सक की जरूरत होती है.’’

अमावस्या के दिन ऐसा भयावह दृश्य देख कर मेरे तो रोंगटे ही खड़े हो गए. आम जनता की अज्ञानता और अंधविश्वास का लाभ उठाने वाले तांत्रिकों के द्वारा रचा गया यह एक ऐसा जाल है, जिस से निकलने के लिए इंसान को वहम जैसी किसी भी भावना को अपने मनमस्तिष्क से निकाल फेंकना होगा. अपनी तर्कशक्ति का विकास कर के स्वस्थ मानसिकता विकसित करनी होगी वरना इस प्रकार की अमावस्याएं सदियों तक अपना प्रभाव दिखाती रहेंगी. जब तक हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर उस की सारी गलत धारणाओं की विज्ञान सम्मत कोशिश करी जाती रहेगी, इन से छुटकारा पाना असंभव है. अब तो जनता का घर में जमा पैसा जबरन और जोर से इन अंधविश्वासों के प्रचार पर लगाया जा रहा है और देश की तार्किक सोच को कुचला जा रहा है.

अंधविश्वास : बच्चों को लील रहे पोंगापंथ के सिक्के

चंद सिक्कों के लालच में ही सही, गरीबों के बच्चे जान जोखिम में डाल कर नदियों में छलांग लगा रहे हैं. नदियों की तली में जा कर सिक्कों को बटोरने के चक्कर में पिछले कुछ महीनों में 3 बच्चों की जानें जा चुकी हैं. पटना में गंगा नदी के किनारे बने गायघाट के पास 3 बच्चे सिक्कों के लालच में गंगा में कूदे, पर बाहर नहीं आ सके. छोटी पहाड़ी इलाके का रहने वाला 14 साल का पुन्नू राम और गायघाट के पास की एक झोंपड़पट्टी का रहने वाला 7 साल का साहिल सिक्कों को बटोरने के लिए गंगा में कूदे और डूब गए. तीसरे बच्चे की पहचान नहीं हो सकी.

गंगा के घाटों पर अकसर देखा जाता है कि बच्चे गंगा के गहरे और उफनते पानी में छलांग लगाते रहते हैं. उन बच्चों की उम्र अमूमन 8 से 12 साल के बीच होती है. उन्हें गंगा की तेज धारा में डूबने का जरा भी खौफ नहीं होता है. 10 साल का जुम्मन यह कह कर अच्छेअच्छों की बोलती बंद कर देता है, ‘‘जीने के लिए तो रोज मौत से खेलना ही पड़ता है साहब. गंगा के पेट से सिक्के निकालना ही हम सब का धंधा है. इसी से मेरी मां और बहन का गुजारा चलता है.’’

सिक्कों के लिए गंगा में छलांग लगाने के बाद कुछ पल के लिए वे पानी के भीतर गुम हो जाते हैं. इस से किनारे पर खड़े लोगों की सांसें अटक जाती हैं. थोड़ी ही देर के बाद बच्चे एकएक कर पानी की सतह पर आते हैं. वे जल्दीजल्दी तैर कर किनारे आते हैं और अपना मुंह खोलते हैं. उस में से भरभरा कर कई सिक्के जमीन पर आ गिरते हैं. उस के बाद अपनी हथेलियों को खोल कर दिखाते हैं. उन में भी

1, 2, 5 और 10 के कई सिक्के होते हैं. पटना में गंगा नदी के किनारे राजाघाट, गायघाट, गोसाईंघाट, कंगली गली, कालीघाट, अगमकुआं जैसी जगहों पर दर्जनों झोंपड़पट्टियां हैं. उन्हीं झोंपड़पट्टियों के बच्चे गंगा से सिक्कों को बटोरने में लगे रहते हैं. प्रशासन और पुलिस ने अपनी फाइलों में उन्हें ‘कौइन पिकर’ का नाम दे रखा है.

रेलगाडि़यों, बसों, कारों वगैरह से पुल पार करते समय लोग नदियों में अंधाधुंध सिक्के फेंकने लगते हैं. वे गंगा नदी समेत कई दूसरी नदियों में सिक्के फेंक कर यह समझते हैं कि उन्होंने एक झटके और सस्ते में काफी पुण्य कमा लिया है या ऊपर वाले को खुश कर दिया है. सिक्कों को नदी में फेंकने के बाद उन की सारी बाधाएं दूर हो जाएंगी, मन की हर मुराद पूरी हो जाएगी. पोंगापंथियों की इस अंधी सोच की वजह से जहां एक ओर हजारोंलाखों सिक्के बरबाद हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नदियों से सिक्के बटोरने के चक्कर में कई बच्चे नदी की गहराइयों में समा कर अपनी जान गंवा रहे हैं.

पटना के पुराने इलाके पटना सिटी के गायघाट समेत कई घाटों पर सुबह से ले कर शाम तक नंगधड़ंग बच्चों का हुजूम गंगा नदी में छलांग लगाता दिख जाता है. हर बच्चे के हाथ में एक चुंबक होती है.

नदी में कूदने के बाद वे उस की तली तक पहुंच जाते हैं और चुंबक को इधरउधर घुमाते हैं. इस से कई सिक्के चुंबक से चिपक जाते हैं. चुंबक से सिक्कों को छुड़ा कर बच्चे अपने मुंह में डाल लेते हैं और फिर से चुंबक को नदी की तली में इधरउधर घुमाने लगते हैं. इस बीच कुछ और सिक्के उस से चिपक गए तो ठीक वरना सांस लेने के लिए वे पानी की सतह पर आ जाते हैं.

सभी बच्चे अपनेअपने मुंह से सिक्के उगल कर उन्हें जमीन पर गिरा कर गिनते हैं. बाद में नदी किनारे खड़े अपने साथी को थमाते हैं. उस के बाद 5-7 मिनट तक लंबी सांसें ले कर फेफड़ों में ताजा हवा भरते हैं और सिक्कों की तलाश में दोबारा नदी की गहराइयों में डुबकी लगा देते हैं. 11 साल का मनोज बताता है कि वह स्कूल जाने के लिए घर से निकला है. स्कूल जाने के पहले कुछ देर तक वह गंगा में डुबकी लगा कर कुछ सिक्के निकाल लेता है और उस से चाट, गोलगप्पे, पकौड़े वगैरह खाता है. जिस दिन ज्यादा सिक्के हाथ लग जाते हैं तो वह घर के लिए चावल, आटा, दाल, चीनी वगैरह खरीद लेता है.

मनोज कहता है कि 6 साल पहले उस के पिता की मौत हो गई थी. अम्मां दाई का काम कर परिवार का पेट पालती हैं. वे अकसर बीमार रहती हैं जिस से रोज काम पर नहीं जा पाती हैं. इस से मालिक लोग उन के पैसे काट लेते हैं. कम पैसों में 6 लोगों के परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल होता है, इसलिए नदी में गोता लगा कर सिक्के निकाल कर वह परिवार के लिए खाने का सामान खरीद लेता है. वह रोज 8 से 10 बार नदी में गोता लगाता है और तकरीबन

30 से 50 रुपए निकाल लेता है. कुछ सिक्कों के लिए स्कूल से भाग कर नदी में बच्चों की छलांग सरकारी योजनाओं को मुंह चिढ़ा रही हैं. सरकार इस खुशफहमी में आंकड़े तैयार करती रहती है कि मिड डे मील के लालच में लाखों बच्चे स्कूल आ रहे हैं, साइकिल योजना की वजह से लड़कियां काफी दूरदूर से पढ़ने के लिए स्कूल आ रही हैं, नए कपड़ों को लेने के बहाने हजारों गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल आने लगे हैं, पर चंद सिक्कों के लालच में जान जोखिम में डाल कर गंगा नदी में छलांग लगाते बच्चे तमाम सरकारी योजनाओं का सच बयान कर देते हैं.

10 साल का दिलीप राम बताता है, ‘‘स्कूल में तो हमें भरपेट खाना मिल जाता है पर लाचार मांबाप क्या खाएंगे? मेरे कुछ दोस्त गंगा में डुबकी लगा कर सिक्के जमा करने का काम करते हैं, इसलिए हम भी इसी काम में लग गए. रोजाना तकरीबन 60 से 100 रुपए तक जमा हो जाते हैं. पुल को पार करते समय हर बस, ट्रक, कार और रेलगाड़ी से कई सिक्के नदी में लोग फेंकते हैं.’’ नदी में सिक्के फेंकने वालों को पुण्य मिले या न मिले, पर उन सिक्कों से कई गरीब बच्चों का पेट तो भर रहा है. लेकिन इस के लिए उन्हें अपनी नन्ही जान को खतरे में डालना पड़ रहा है.

इस मसले पर समाजसेवी आलोक कुमार कहते हैं कि अंधविश्वास की वजह से हजारोंलाखों सिक्के रोज ही नदियों में फेंके जाते हैं. किसी भी पुल से गुजरते हर छोटीबड़ी गाड़ी से दनादन सिक्के नदियों में फेंके जाते हैं. पोंगापंथ के जाल में फंसे लोग समझते हैं कि नदियों में सिक्के डालने से उन्हें पुण्य मिलेगा या उन का सफर महफूज होगा, जबकि वे यह नहीं समझते हैं कि इस तरह से पुण्य कमाने के चक्कर में रोजाना हजारों सिक्के नदियों में फेंक दिए जाते हैं.

पढ़ाने से परहेज करते ज्यादातर टीचर

गुरु की महिमा का बखान करने का रिवाज हमारे समाज में बहुत पुराना है. लेकिन यह कड़वा सच है कि आजकल सीधेसच्चे गुरु कम व गुरुघंटाल ज्यादा दिखते हैं. स्कूलकालेजों में पढ़ाने वाले बहुत से गुरुओं या टीचरों का बुरा हाल है. वे भी खुद को ऐसे गुरु मानते हैं, जिन्हें पूजा जाए, पर काम करने को न कहा जाए. टीचर मोटी तनख्वाह व भरपूर छुट्टियां जैसी सहूलियतें लेते हैं, लेकिन इस के बावजूद ज्यादातर टीचर अपने काम को सही ढंग से अंजाम नहीं देते हैं.

ज्यादातर टीचर अपने घर के आसपास तैनाती को तरजीह देते हैं, ताकि वे दूसरे कामधंधे कर सकें. वे खासतौर पर दूरदराज के इलाकों में जाना ही नहीं चाहते. जहां रहते हैं, वहां पढ़ाते नहीं, इसलिए पढ़ाईलिखाई की बुनियाद लगातार कमजोर हो रही है. टीचरों द्वारा मन लगा कर न पढ़ाने के चलते बहुत से बच्चे पढ़ेलिखे हो कर भी नाकाबिल रह जाते हैं. इस से बेरोजगारों की भीड़ बढ़ रही है.

बहुत से टीचर मौका मिलते ही पढ़ाना छोड़ कर क्लासों में सो जाते हैं. बीड़ी, सिगरेट, पानतंबाकू, गुटका व शराब जैसी नशीली चीजों का सेवन करते हैं. पैसे के लालच में पेपर आउट व नकल कराते हैं. वजीफे बांटने में हेराफेरी व गड़बड़ी करते हैं. कई टीचर सारी हदें पार कर छात्रछात्राओं से जोरजबरदस्ती करने तक से भी बाज नहीं आते हैं.

बेशक सारे टीचर ऐसे नहीं हैं, पर बहुत से हैं जो सारे टीचर समाज को बदनाम करते हैं. हैरत की बात है कि अच्छे माने जाने वाले व हड़ताल के लिए हमेशा तैयार रहने वाले टीचर व उन के संगठन कुसूरवार टीचरों को सुधारने या सबक सिखाने की दिशा में कभी कोई कारगर कदम नहीं उठाते हैं. क्या है वजह

टीचरों द्वारा पढ़ाने में दिलचस्पी न लेने की एक बड़ी वजह उन का निकम्मापन व ट्यूशन का बढ़ता कारोबार है. इस के अलावा भाईभतीजावाद, सिफारिश व घूस के बल पर बहुत से ऐसे नाकाबिल लोग भी टीचरों की जमात में शामिल हो गए हैं, जो खुद किसी लायक नहीं हैं. पिछले दिनों टीचरों के ऊपर सोशल मीडिया में वायरल हुआ एक वीडियो खूब सुर्खियों में रहा था. उस में एक पत्रकार ने गांवदेहात के इलाकों में चल रहे स्कूलों में पढ़ाने वालों की पोल खोली थी.

उस वीडियो में केवल टीचर ही नहीं, बल्कि कई प्रिंसिपल भी देश के प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री व देश की राजधानी तक का नाम भी नहीं बता सके थे.

चंद नामी, बेहद महंगे प्राइवेट स्कूलों को छोड़ कर ज्यादातर सरकारी व निजी स्कूलों की हालत अच्छी नहीं है. इन में पढ़ाने वालों की हालत तो और भी ज्यादा खराब है. दरअसल, एक बार नौकरी मिल जाने के बाद ज्यादातर टीचरों पर कोई देखरेख या निगरानी नहीं होती है. शिक्षा अधिकारी भी सिर्फ खानापूरी के लिए कागजों में ही चेकिंग करते हैं.

पहले सभी टीचर रोज अपनी डायरी लिखते थे कि किस क्लास में कबक्या पढ़ाया था. प्रिंसिपल उसे चैक करते थे, लेकिन अब यह चलन ही नहीं रहा. ऐसे टीचरों की गिनती कम नहीं है जो पैसे कमाने के लिए अपनी सारी इज्जत को ताक पर रख कर नाजायज काम करने से भी नहीं चूकते हैं.

पिछले दिनों जब आधारकार्ड के जरीए जांचपरख हुई तो 80,000 से भी ज्यादा टीचर 2-2 जगह से तनख्वाह लेते पकड़े गए. इस के अलावा कई टीचरों के नाम पेपरलीक कांड व नकल कराने के ठेके लेने में आए थे. करते दूसरे कामधंधे

दरअसल, बहुत से टीचर ट्यूशन व कोचिंग समेत और भी बहुत से दूसरी तरह के कामधंधों में लग जाते हैं. ऐसे बहुत से टीचर देखे जा सकते हैं जो तनख्वाह को बोनस या पैंशन मानते हैं. वे पढ़ाना छोड़ कर धड़ल्ले से खेतीबारी, कारोबार या नेतागीरी करते रहते हैं. दूरदराज के गंवई इलाकों में चल रहे बहुत से स्कूलों में तो ज्यादातर टीचर रोज पढ़ाने के लिए जाते ही नहीं हैं. ऐसे भी बहुत से टीचर हैं जो सिर्फ हाजिरी लगाने के लिए स्कूल जाते हैं, इस के बाद वे वहां से लापता हो जाते हैं.

खराब हैं हालात टीचरों की कामचोरी का सीधा नुकसान बच्चों को उठाना पड़ता है. वे पढ़ाई में कमजोर रह कर फेल हो जाते हैं. इस के अलावा उन के मांबाप को भी माली नुकसान भुगतना पड़ता है.

सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत देख कर ज्यादातर मांबाप अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला कराते हैं. वहां पढ़ाना अब हर आम इनसान के बस की बात नहीं रह गई है, क्योंकि निजी स्कूलों में मांबाप को फीस वगैरह के नाम पर तरहतरह से लूटा जाता है. पढ़ाईलिखाई को बढ़ावा देने के नाम पर सरकारें पानी की तरह पैसा बहा रही हैं. दोपहर को भोजन भी खिला रही हैं, लेकिन क्या इस से अनपढ़ों व कमपढ़ों की गिनती कम हुई?

टीचरों की शिकायत है कि सरकारें अकसर उन्हें चुनाव, जनगणना व वोट बनाने जैसे दूसरे कामों में लगा देती हैं इसलिए वे अपना काम ठीक से नहीं कर पाते हैं. आमतौर पर टीचर कम होने व क्लासों में ज्यादा बच्चे होने से भी वे पूरा ध्यान नहीं दे पाते हैं. उपाय भी हैं

राजकाज चलाने वाले ओहदेदारों के बच्चे खूब महंगे व बढि़या स्कूलों में पढ़ते हैं इसलिए वे मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के हालात व उस का लैवल देखने की जरूरत ही

नहीं समझते. सरकारी स्कूलों के हालात काफी बदतर हैं. गंवई इलाकों में हालात और भी ज्यादा खराब हैं. देश की तकरीबन 80 फीसदी आबादी कम आमदनी होने के चलते अपने बच्चों को महंगी तालीम नहीं दिला पाती है, इसलिए उन्हें सरकारी स्कूलों का मुंह ताकना पड़ता है.

नेता, अफसर व धर्मगुरु सब यही चाहते हैं कि ज्यादातर लोग अनपढ़ रहें ताकि वे उन का मुकाबला न करें व उन्हें आसानी से उल्लू बनाया जा सके, इसलिए सरकार के भरोसे रहने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है. अब तो हर बस्ती के बाशिंदों का जागरूक होना जरूरी है. वे एकजुट हों और खुद जा कर देखें कि कहां, कौन व कितने टीचर तैनात हैं? इस के अलावा बच्चों से भी टीचरों के बारे में फीडबैक लेना चाहिए.

तालीम के नाम पर खर्च हो रहा पैसा करदाताओं की मेहनत का है, इसलिए हर जिम्मेदार नागरिक को आगे आना चाहिए. थोड़ा वक्त निकाल कर अपने गलीमहल्ले में पास के सरकारी स्कूल में जाना चाहिए. वहां यह देखना जरूरी है कि कितने टीचर रोज वक्त से आतेजाते हैं? वे क्या और कैसा पढ़ाते हैं? अगर पढ़ाने वालों पर निगाह, निगरानी, शिक्षा विभाग का सोशल आडिट व सूचना के अधिकार की नकेल हो तो सुधार जरूर होगा.

धर्मग्रंथ क्षमा करें

नास्तिक तो नास्तिक ही सही
मैं जपतप प्रार्थना मंत्र
के नाम पर दूसरों
के शब्द नहीं दुहरा सकता
धर्म के लिए निरीह
प्राणियों को नहीं

काट सकता
मैं निगुरा ही भला
तथाकथित गुरुओं के कहने पर
जाति विशेष पर प्रहार
नहीं कर सकता
भले ही मुझे सौ नरकों
की यातना सहनी पड़े
पर नहीं जा सकता
मैं ईश्वर की चमचागीरी
करने मांग पत्र ले कर

मैं नहीं जा सकता
मंदिरोंमसजिदों में
जहां चढ़ावादक्षिणा
की कीमत होती हो
ओ ईश्वर
चाहे मुझे जो सजा दे
मुझ से नहीं होगा
तेरा घर बनाने के लिए

दूसरों के घर को मिटाना
मैं नहीं खींच सकता
धर्म की रक्षा के लिए कटार
ईश्वर आप हैं मैं नहीं
आप मुझे भले
ही कायर कह दें.
मुझ से नहीं पढ़े जाएंगे

पोथीपुराण में
नाम पर भ्रमित करते
शब्दों के जाल.
धर्मग्रंथों को पढ़ कर
मैं नहीं बनना चाहता
चालाक और निर्दयी
मैं भूखा ही सही
मैं नास्तिक ही भला
नहीं हो सकता मैं
शामिल पंथ महंत
के खेमों में

नहीं कर सकता
भेद मानवमानव में.
मैं ईसा की भांति
सूली पर चढ़ कर
विरोधियों को क्षमा
करना चाहता हूं
मैं गांधी की तरह
गोली खा कर क्षमा सिखाना चाहता हूं
मैं प्राणी मात्र में ईश्वर देखना चाहता हूं
सारे अधर्मी धर्मग्रंथ मुझे क्षमा करें.

– देवेंद्र कुमार मिश्रा

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