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साइबर धोखाधड़ी पर अंकुश लगाने के उपाय

आप और आप के पारिवारिक सदस्य उन लोगों में शामिल हो सकते हैं जिन्हें साइबर लुटेरों से एटीएम का विवरण देने के लिए फोन कौल आया हो. हो सकता है आप या आप के परिचित इस के शिकार भी हुए होंगे. यह पूरे देश की समस्या है. लगभग हर फोन तक इन लुटेरों की पकड़ है और उन्हें जानकारी है कि आप का खाता किस बैंक में है.

पहले तो उन लुटेरों के चंगुल में काफी लोग फंस जाते थे, लेकिन अब इस बारे में काफी जागरूकता आ चुकी है और बैंकों ने भी खूब प्रचार कर दिया है कि उन की तरफ से कोई फोन कौल खाताधारक को नहीं की जाती है. इस के बावजूद देश में साइबर अपराधों की बाढ़ आई है और बड़े स्तर पर लोगों की गाढ़ी कमाई एक क्लिक में ही लुट रही है, सरकार ने संसद के शीतकालीन सत्र में लोकसभा में बताया कि पिछले वित्त वर्ष में साइबर धोखाधड़ी के कारण जनता के 16 हजार 789 करोड़ रुपए डूबे हैं.

रिजर्व बैंक की धोखाधड़ी रिपोर्ट में यह सूचना दी गई है. इस में वह राशि शामिल नहीं है जिस की रिपोर्ट नहीं लिखी जाती है. करोड़ों भोलेभाले लोगों के खातों से एक झटके में ये लुटेरे पैसे लूट रहे हैं. उस की रिपोर्ट पुलिस में होनी चाहिए लेकिन पुलिस रिपोर्ट नहीं लिखती. साइबर अपराध की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए साइबर सुरक्षा फौरेंसिक और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों की रिजर्व बैंक ने एक समिति बनाई है और इस समिति को साइबर अपराध रोकने के लिए उपाय सुझाने को कहा गया है. यह समिति जब तक रिपोर्ट देगी और तब तक कितने लोग लुट चुके होंगे इस बारे में अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है.

रिश्तों का रेतीला महल : भाग 3

तरुण ने खोला भेद

पूछताछ के दौरान तरुण ने बहुत चौंका देने वाला खुलासा कर के पुलिस को हैरत में डाल दिया. तरुण ने सब इंसपेक्टर परमदीप सिंह को बताया कि कुलदीप की हत्या खुद सुदीक्षा ने ढाई लाख रुपए दे कर करवाई थी.

पुलिस कमिश्नर लुधियाना व अन्य पुलिस उच्चाधिकारियों के समक्ष दिए गए तरुण के इस बयान के बाद कुलदीप की हत्या के अपराध में गीता और सुदीक्षा को गिरफ्तार कर लिया गया.

उसी दिन सुदीक्षा, उस के प्रेमी तरुण और मां गीता को कुलदीप की हत्या के इलजाम में अदालत में पेश कर के आगामी पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया.

तरुण और सुदीक्षा की निशानदेही पर पुलिस ने उस का मोबाइल फोन भी बरामद कर लिया, जो उस ने छत पर छिपा रखा था. साथ ही उस की वह चुन्नी और खून से सना तौलिया भी मिल गया, जो वारदात में इस्तेमाल हुआ था.

तरुण और सुदीक्षा ने इस हत्याकांड में लिप्त 4 और लोगों के नाम भी बताए. हैबोवाल थानाप्रभारी परमदीप सिंह ने इन आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए एक विशेष टीम बनाई. जिस में हंबड़ां चौकी प्रभारी एएसआई मनजीत सिंह सिंघम, कांस्टेबल प्रगट सिंह, जतिंदर सिंह व जीतू कुमार को शामिल किया गया.

इस टीम ने 25 जुलाई को बड़े नाटकीय ढंग से सागर गैंग के सरगना एवं कौंट्रैक्ट किलर सागर उर्फ न्यूट्रन को, उस के 3 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया, जबकि इस मामले का 8वां आरोपी जसकरन अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर था.

पकडे़ गए आरोपियों की पहचान फील्डगंज के प्रेमनगर निवासी सागर ब्राह्मणिया. खुडु मोहल्ले के दीपक धालीवाल उर्फ दीपा व सीएमसी के निकट रहने वाले विशाल जैकप के रूप में हुई. पकड़े गए आरोपी 18 से 21 साल के बीच के थे जो कि 10वीं तक ही पढ़े थे. ये सभी आपस में दोस्त थे, सागर, विशाल और दीपक को राजपुरा रोड से काबू किया गया, जबकि न्यूट्रन को ढोलेवाल चौक से पकड़ा गया. पूछताछ में इन सभी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

पिता नहीं प्रेमी चाहिए था

आरोपियों के कब्जे से वारदात में इस्तेमाल मोटरसाइकिल व लाल रंग की स्कूटी के अतिरिक्त मृतक की स्पलैंडर मोटरसाइकिल, उस का पर्स, परिचय कार्ड व अन्य सामान बरामद हुआ, जबकि वारदात में इस्तेमाल किया गया हथियार बरामद करने के लिए इन का पुलिस रिमांड लेना पड़ा.

रिमांड के दौरान की गई पूछताछ में कुलदीप की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह खून के रिश्तों को तारतार कर मर्यादाओं का गला घोंटने वाली एक ऐसी असभ्य और जिद्दी औरत की कहानी थी, जिस ने अपने प्रेमी से रिश्ता रखने के लिए अपने ही पिता का खून बहा दिया था.

कुलदीप अकसर शराब पी कर नशे में गीता व सुदीक्षा से मारपीट करता था. इस की वजह यह थी कि कुलदीप को बेटी और तरुण उर्फ तेजपाल के प्रेम संबंधों पर सख्त आपत्ति थी. वैसे तो उसे उन तमाम रिश्तों पर ऐतराज था, जो बेटी की पढ़ाई और उस के भविष्य के आडे़ आते थे.

वह नहीं चाहता था कि उस की बेटी तेजपाल से मेलमिलाप रखे. उस ने कई बार सुदीक्षा को मोबाइल पर बात करते हुए पकड़ लिया था और तैश में आ कर बेटी का मोबाइल भी तोड़ दिया था, जबकि गीता इस मामले में बेटी को ऊंचनीच समझाने की जगह उलटे उसी का साथ दिया करती थी.

इस का नतीजा यह निकला कि सुदीक्षा अपनी मां की शय पा कर दिनप्रतिदिन बिगड़ती चली गई और पिता पर हावी होने की कोशिश करने लगी, जो कुलदीप को कतई मंजूर नहीं था. इसलिए वह शराब पीने के बाद इस बात को ले कर पत्नी और बेटी से झगड़ा किया करता था.

उधर सुदीक्षा अपने प्रेमी तरुण को किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं थी. वह हर समय अपने पिता को नीचा दिखाने के लिए योजनाएं बनाती रहती थी. इस बीच सुदीक्षा ने अपने पिता के बारे में गीता से कहना शुरू कर दिया कि उस का शराबी पिता उस पर बुरी नजर रखता है. वह कभी भी उस की इज्जत की धज्जियां उड़ा सकता है. पति की यह बात गीता को नागवार गुजरी और उस ने बिना विवेक से काम लिए बेटी की बातों पर विश्वास कर लिया और पति के कत्ल की साजिश रच डाली.

अपने बयानों में सुदीक्षा ने बताया कि उस के तेजपाल के साथ पिछले 3 सालों से प्रेम संबंध थे. तरुण की तरह सुदीक्षा भी प्राइवेट तौर पर बीए कर रही थी. पिता को रास्ते से हटाने के लिए गीता ने तेजपाल से बात की. तीनों ने मिल कर 3 महीने पहले अप्रैलमई में योजना तैयार की.

हिस्ट्रीशीटर से हुआ हत्या का सौदा

कुलदीप की हत्या के लिए पहले तेजपाल ने बीड़ा उठाया था. बीते जून महीने की 18 तारीख को वह पूरी तैयारी के साथ कुलदीप की हत्या करने के लिए उस के घर आया था, लेकिन एन मौके पर उस की हिम्मत जवाब दे गई. फलस्वरूप योजना धरी की धरी रह गई.

एक बार योजना नाकाम रहने पर गीता व सुदीक्षा ने तेजपाल के माध्यम से उस के दोस्त कुख्यात हिस्ट्रीशीटर सागर सूद उर्फ न्यूट्रन से मिल कर कुलदीप को कत्ल करने की बात की. फलस्वरूप कुलदीप की हत्या का सौदा ढाई लाख रुपए में तय हो गया. सागर सूद एलआईजी फ्लैट फेज-3 का रहने वाला था. उस पर लुधियाना के सराभा नगर व थाना डिवीजन नंबर-6 में हत्या के प्रयास, मारपीट, चोरी और अन्य संगीन धाराओं में कई मामले दर्ज थे.

आखिरी बार उसे हत्या के प्रयास के मामले में थाना सलेम टाबरी पुलिस ने गिरफ्तार किया था. इस मामले में विशाल भी सह अभियुक्त था. सागर बीते मई महीने में जेल से बाहर आया था. जून में उस ने लुधियाना की एक युवती से प्रेम विवाह कर लिया था और उस के साथ चंडीगढ़ में रहने लगा था. तरुण से उस की पहले से ही दोस्ती थी.

नयानया विवाह हुआ था, न्यूट्रन को पैसों की सख्त जरूरत थी. यही सोच कर जब तरुण ने कुलदीप का कत्ल करने के लिए ढाई लाख रुपए देने की बात कही तो वह तुरंत तैयार हो गया. तरुण ने उसे 6 हजार रुपए एडवांस दे दिए. बाकी रकम काम करने के बाद देना तय हुआ. साथ ही यह भी तय हुआ कि कुलदीप को इस तरह मौत के घाट उतारा जाए ताकि उस की मौत प्राकृतिक लगे.

ऐसा इसलिए ताकि कुलदीप की मौत के बाद रेलवे की तरफ से मिलने वाला पैसा उस की पत्नी गीता को मिल जाए. उसी पैसे में से सुपारी के शेष पैसे देना तय हुआ. यह भी तय हुआ कि कत्ल के बाद घर में जो भी पैसा और कीमती सामान होगा, उसे कातिल अपने साथ ले जाएंगे.

सागर कुलदीप की हत्या की वारदात को अंजाम देने के लिए तैयार हो गया और उस ने हत्या करने के लिए फूलप्रूफ योजना तैयार कर ली. न्यूट्रन ने इस वारदात को अंजाम देने के लिए अपने दोस्तों सागर ब्राह्मणिया, दीपक धालीवाल उर्फ दीपा व विशाल जैकप को अपनी योजना में शामिल कर लिया.

एडवांस 6 हजार रुपए में से 8 सौ रुपए उस ने चंडीगढ़ से लुधियाना आने के लिए टैक्सी के किराए पर खर्च कर दिए, जबकि 12 सौ रुपए में लुधियाना बस अड्डे के पास अपनी नई पत्नी को होटल का कमरा किराए पर ले कर दिया था. इस के बाद एक वह और उस के दोस्त मोटरसाइकिल व स्कूटी पर सवार हो कर कुलदीप के घर पहुंचे.

कुलदीप की जिंदगी की आखिरी रात

आसपास घर होने के कारण न्यूट्रन पकडे़ जाने का रिस्क नहीं लेना चाहता था, क्योंकि उस की नईनई शादी हुई थी. इसीलिए उस ने अपने दोस्तों को साथ मिलाया था. कुलदीप के घर का मुख्यद्वार गीता और सुदीक्षा ने पहले से ही खोल कर रखा था. जब ये लोग घर में दाखिल हुए तो कुलदीप बैडरूम में गहरी नींद सो रहा था.

न्यूट्रन और उस के साथियों ने कुलदीप को सोते वक्त दबोच लिया और उस का मुंह तौलिए से दबा कर गले के चुन्नी से घोंट दिया, जबकि 2 लोगों ने उस की टांगें और बाजू पकड़ रखे थे. इस बीच जब कुलदीप बेसुध हो गया तो जसकरण ने उस के दिल की धड़कन चैक की, जो चल रही थी. इस पर न्यूट्रन और विशाल ने साथ लाए तेजधार हथियारों से वार कर के उस की गरदन काट कर उसे मौत के घाट उतार दिया.

इस के बाद ये लोग कुलदीप का पर्स, जिस में करीब 2000 रुपए थे, उस का पहचान पत्र, कमरे में रखे 2 मोबाइल फोन और मोटरसाइकिल ले कर भाग गए. कुलदीप का कत्ल करने के बाद सागर ने मोबाइल से इस की सूचना तरुण को दे दी.

तरुण ने मोबाइल पर यह बात सुदीक्षा को बता दी. योजना के अनुसार कुलदीप की हत्या होने की खबर मिलते ही दोनों मांबेटी ने सबूत मिटाने की कोशिश की. वे छत से नीचे आईं और खून से सने तौलिए व चुन्नी काले रंग की पोलीथिन में डाल कर पीछे के खाली प्लाट में फेंक दी, जिसे बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया था. कुलदीप की पत्नी गीता पुलिस को दिए अपने बयान में बुरी तरह फंस गई थी. उस ने पुलिस को बताया था कि जब वह सुबह उठी तो सीढि़यों पर लगे दरवाजे की कुंडी उस ने ही खोली थी. जब वह नीचे आई तो घर के मेनगेट के लौक में अंदर से चाबी लगी हुई थी और वह खुला हुआ था.

इसी पर पुलिस को संदेह हुआ कि जब ऊपर से कोई नहीं आया तो मेन गेट का लौक किस ने खोला, जबकि कुलदीप का रूटीन था कि वह सोने से पहले मेन गेट लौक कर के चाबी को कुंडी पर टांग देता था.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रिश्तों का रेतीला महल : भाग 2

अगली सुबह यानी 20 जुलाई, 2018 की सुबह साढ़े 5 बजे उठ कर गीता छत से नीचे आई. यह उस का रोज का नियम था. नित्यकर्म से फारिग हो कर जब वह पति कुलदीप को जगाने उस के कमरे में की ओर जा रही थी, तभी अचानक उस की नजर खुले हुए मुख्य दरवाजे पर पड़ी, मुख्यद्वार खुला हुआ था.
वह तेजी से कुलदीप के कमरे की ओर लपकी. कमरे के भीतर का दृश्य देख कर उस की आत्मा तक कांप उठी. सामने बेड पर खून से लथपथ कुलदीप की लाश पड़ी थी.

गीता ने डर कर जोरजोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उस के रोने चिल्लाने की आवाज सुन कर अड़ोसीपड़ोसी जमा हो गए. किसी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन पर सूचना दी कि अजीत नगर की गली नंबर-3 के मकान नंबर-1715/21 ए में एक आदमी की हत्या हो गई है, जल्दी पहुंचें.
पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना संबंधित थाने हैबोवाल को दे दी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी परमदीप सिंह अपने सहायक पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

सुबह का समय था, दिन अभी पूरी तरह से नहीं निकला था. इस के बावजूद वहां अपेक्षा से अधिक भीड़ जमा थी. जहां हत्या हुई थी, वह 40 वर्षीय कुलदीप सिंह संघड़ उर्फ मोनू का था. हत्या भी उसी की हुई थी. थानाप्रभारी परमदीप सिंह ने घटनास्थल का मुआयना किया. कुलदीप की लाश कमरे में बैड पर पड़ी थी. उस की हत्या किसी तेजधार हथियार से गला रेत कर की गई थी. कटने पर गले से बहा खून बैड पर फैला हुआ था.

खून देख कर ऐसा लगता था, जैसे कुलदीप की हत्या कुछ घंटे पहले ही की गई हो, क्योंकि खून का रंग अभी तक लाल था, काला नहीं हुआ था. घनी आबादी वाली उस मध्यमवर्गीय परिवारों की कालोनी के एक मकान में इस तरह हत्या हो जाना आश्चर्य वाली बात थी.

मामले की गंभीरता को देखते हुए परमदीप सिंह ने घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों और क्राइम टीम को दे दी थी. सूचना मिलते ही लुधियाना पुलिस कमिश्नर डा. सुखचैन सिंह गिल, एडीसीपी गुरप्रीत कौर पोरवाल, एसीपी (वेस्ट) गुरप्रीत सिंह, स्पैशल स्टाफ की टीम और क्राइम ब्रांच टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

डौग स्क्वायड भी मौके पर बुला लिया गया था. सब ने आते ही अपनाअपना काम शुरू कर दिया. घटनास्थल से कुछ फिंगरप्रिंट भी उठाए गए. खोजी कुत्ते ज्यादा मदद नहीं कर पाए. वह मृतक के कमरे से निकल कर आंगन में चक्कर लगाने के बाद बाहर सड़क पर आ कर रुक गए.

साथसाथ खाना खा कर  अलग सोए थे

थानाप्रभारी परमदीप सिंह को मृतक कुलदीप की 37 वर्षीय पत्नी गीता ने बताया कि कुलदीप ने रात को करीब साढे़ 9 बजे मेरे और 17 वर्षीय बेटी सुदीक्षा के साथ छत पर खाना खाया था. खाना खाने के बाद लगभग 10 बजे वह नीचे अपने कमरे में सोने चले गए थे. बाद में मैं ने नीचे आ कर घर का मुख्य द्वार बंद कर के ताला लगाया था, फिर मैं छत पर बेटी के साथ सोने चली गई थी.

रोज की तरह सुबह साढ़े 5 बजे जब मैं छत से उतर कर नीचे आई, तो मैं ने कुलदीप के कमरे में उन की लाश देखी. उस समय घर का मुख्य द्वार खुला हुआ था. यह देख मैं ने घबरा कर शोर मचा दिया. जिस से अड़ोसीपड़ोसी जमा हो गए. उन्हीं में से किसी ने पुलिस को फोन किया होगा.

मृतक कुलदीप के भाई हरदीप ने बताया कि वह रात के करीब साढे़ 9 बजे जब काम पर जा रहा था, तब भाईभाभी और सुदीक्षा छत पर बैठ कर खाना खा रहे थे. सुबह साढ़े 5 बजे मेरे दोस्त और पड़ोसी लाला ने फोन पर मुझे यह खबर दी. हरदीप ने यह भी बताया कि रात को रोजाना कुलदीप ही बाहर वाले मुख्य दरवाजे पर ताला लगाया करता था.

उस ने यह भी बताया कि कुलदीप को शराब पीने की आदत थी. अपनी ड्यूटी से आने के बाद वह सोने से पहले तक 1-2 घंटे घर पर ही बैठ कर शराब पीया करता था. हरदीप के अनुसार घर से उस के भाई की काले रंग की स्पलेंडर मोटर साइकिल और 2 फोन भी गायब थे, जिन में एक फोन ओप्पो कंपनी का था और दूसरा चाइनीज सेट था.

मृतक की बेटी सुदीक्षा ने अपने बयान में सिर्फ इतना ही बताया कि मां के रोने की आवाज सुन कर वह छत से नीचे आई थी.

बहरहाल सब थानाप्रभारी ने मृतक कुलदीप के भाई हरदीप के बयानों के आधार पर कुलदीप की हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 120 बी, 34 के अंतर्गत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ दर्ज कर लिया. प्राथमिक काररवाई कर के उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दी. इस हत्याकांड से पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया था.

पुलिस को नहीं मिला क्लू

खुद को हाईटेक सिस्टम से लैस बताने वाली लुधियाना पुलिस ने घटनास्थल की हाईटेक तरीके से ही जांच की थी. पुलिस की पूरी टीम ने डेढ़ से 2 घंटे में पूरे घटनास्थल की जांच की. अब तक की जांच पड़ताल में यह बात सामने आई कि कुलदीप के हत्यारे जो भी रहे हों, वह थे जानने वाले.
क्योंकि घटनास्थल से ऐसा कोई चिह्न नहीं मिला था, जिस से पता चलता कि हत्यारों ने घर में प्रवेश करने के लिए कोई जोर जबरदस्ती की हो. संभवत: कुलदीप की हत्या में किसी नजदीकी का हाथ था.

बहरहाल, परमजीत सिंह ने आगामी तफ्तीश शुरू करते हुए घटनास्थल के आसपास लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की. मृतक की पत्नी गीता, बेटी सुदीक्षा और नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा कुलदीप के दोस्तों और सहकर्मियों से भी पूछताछ की गई. लेकिन परमदीप सिंह के हाथ ऐसा कोई सूत्र नहीं लगा जिसे कुलदीप की हत्या से जोड़ कर देखा जा सके.

पूछताछ के दौरान पड़ोसियों ने बताया था कि कुलदीप और उस की पत्नी गीता के बीच अकसर झगड़ा होता था. इस बारे में जब गीता से पूछा गया तो उस ने बताया कि कुलदीप अनुशासनप्रिय था. लेकिन शाम को थोड़ी पीने के बाद वह और भी ज्यादा अनुशासित हो जाता था. वह जब तब सुदीक्षा को ठीक से पढ़ने और कोई अधिकारी बनने के बारे में कहा करता था, जिसे ले कर दोनों के बीच कहासुनी हो जाती थी.

बाहर से कौन और कैसे आया?

थानाप्रभारी परमदीप सिंह के लिए यह केस चुनौतीपूर्ण बन चुका था. उन्होंने एक बार फिर सारे घटनाक्रम का शुरू से अध्ययन किया. कत्ल के वक्त केवल मांबेटी ही घर पर थीं. पुलिस को यह बात खटक रही थी कि आखिर कातिल घर में दाखिल कैसे हुए. क्योंकि बिना फ्रैंडली एंट्री के घर में दाखिल होना संभव नहीं था.

वारदात के वक्त मृतक कुलदीप का छोटा भाई हरदीप भी अपनी ड्यूटी पर गया हुआ था. छानबीन में वह न केवल निर्दोष पाया गया, बल्कि उस के बयान ने पुलिस के शक की सुई मृतक की पत्नी गीता की ओर घुमा दी थी.

गीता ने बताया था कि खाना खाने के बाद उस ने खुद मुख्यद्वार बंद किया था. जबकि हरदीप का कहना था कि मुख्यद्वार उस का भाई कुलदीप ही बंद करता था. सोने से पहले कुलदीप को 5-7 मिनट टहलने की आदत थी. टहलने के बाद वह मुख्यद्वार बंद कर चाबी कमरे में खूंटी के पास लटका देता था ताकि सुबह गीता को चाबी ढूंढने में परेशानी न हो. सोचने वाली बात यह भी थी कि जब घर में 2 लोग मौजूद थे तो किसी तीसरे ने बाहर से आ कर कुलदीप की हत्या कैसे कर दी.

इस का मतलब घर का एक आदमी बाहर वाले से मिला हुआ था. या दोनों ही मिले हुए थे. अथवा दोनों ने ही मिल कर कुलदीप की हत्या की थी और मामले को लूटपाट का जामा पहना दिया गया था. जो भी खिचड़ी पकी थी, वह घर के अंदर ही पकी थी. यह बात जेहन में आते ही परमदीप सिह ने गीता और सुदीक्षा की पिछले एक हफ्ते की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर सामने आया जिस पर सुदीक्षा की बहुत बात होती थी. कई काल्स तो घंटे भर से भी ज्यादा की थीं और कई काल देर रात भी की गई थीं. यहां तक कि घटना वाली रात 19 जुलाई को थोड़ेथोड़े अंतराल से दोनों की उस समय तक बात होती रहती थी, जिस समय कुलदीप की हत्या की जा रही थी.

सोचने वाली बात यह थी कि क्या ऐसा संभव था कि नीचे वाले कमरे में लूटपाट के साथ किसी की हत्या की जा रही हो और ऊपर छत पर फोन पर बातें करने वाले को भनक तक ना लगे.
कोई खटका, कोई आहट सुनाई ना दे, ऐसा कैसे संभव था? यह बात परमदीप सिंह को हजम नहीं हो रही थी.

उन्होंने तत्काल उस नंबर के मोबाइल की काल डिटेल्स चैक कीं तो पुलिस के कान खड़े हो गए. थोड़ी सख्ती करने पर सारी सच्चाई सामने आ गई. पुलिस ने सुदीक्षा के 21 वर्षीय प्रेमी तरुण उर्फ तेजपाल सिंह भाटी को हिरासत में ले लिया, जो हंबड़ा स्थित पंजपीर रोड के मेहर सिंह नगर का रहने वाला था. उस की मैडिकल शौप थी. वह बीए सैकेंड ईयर में पढ़ रहा था.

क्रिकेट की यह जोड़ी है समलैंगिकता की सबसे बड़ी मिसाल

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है. सर्वोच्च अदालत का यह फैसला देश में समलैंगिक व ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए बड़ी जीत मानी जा रही है. यह फैसला समलैंगिक लोगों की बहुत बड़ी सफलता है. लेकिन कई देशों में समलैंगिक सम्बन्ध बनाने की पूर्ण आजादी मिली हुई है. इसी आजादी का जश्न मानते हुए दक्षिण अफ्रीका की दो महिला क्रिकेट खिलाड़ियों ने करीब दो महीने पहले आपस में शादी रचाई थी.

कप्तान ने टीम की तेज गेंदबाज से रचाई शादी

दक्षिण अफ्रीका महिला क्रिकेट टीम की कप्तान डेन वैन निकेर्क ने अपनी टीम की हरफनामौला खिलाड़ी मैरीजाने कैप से जुलाई 2018 में शादी रचाई थी. दोनों खिलाड़ियों ने शादी रचाने के बाद सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम) पर तस्वीर साझा करके अपने प्रशंसकों को यह जानकारी दी थी. दोनों खिलाड़ियों ने अपने करीबी दोस्तों, परिवार और अफ्रीकी टीम के साथी खिलाड़ियों की मौजूदगी में शादी रचाई थी. निकेर्क और कैप ने 2009 में हुए महिला क्रिकेट विश्व कप के दौरान अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पर्दापण किया था. निकेर्क ने 8 मार्च को वेस्ट इंडीज के खिलाफ जबकि कैप ने 10 मार्च को औस्ट्रेलिया के खिलाफ अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय मैच खेला था. यह दोनों खिलाड़ी महिला बिग बैश में सिडनी सिक्सर्स की टीम के लिए खेलती हैं.

कप्तान निकेर्क का क्रिकेट करियर

कप्तान निकेर्क दक्षिण अफ्रीका के लिए ODI क्रिकेट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाली गेंदबाज हैं. उन्होंने 95 मैचों में 125 विकेट लिए हैं. इसका लावा वो बहुत ही सफल बल्लेबाज भी हैं, उन्होंने ODI में 1,770 रन भी बनाए हैं. निकेर्क को 2017-18 सीजन के लिए दक्षिण अफ्रीका की शीर्ष महिला क्रिकेटर का पुरस्कार दिया गया था.

कैप का शानदार करियर

आपको बता दें कि हरफनमौला खिलाड़ी कैप ने 93 ODI मैचों में 99 विकेट और 62 T20 मैचों में 48 विकेट झटके हैं. इसके साथ ही उन्होंने बल्लेबाजी से भी कमाल दिखते हुए 93 ODI मैचों में 1618 रन बनाए हैं. 62 T20 मैचों में उनके नाम 600 रन हैं. उन्होंने ODI क्रिकेट में एक शतक भी लगाया है. उनके नाम महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप में किसी भी दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज द्वारा एक मैच में सबसे अधिक रन बनाने का रिकौर्ड है.

प्यार की हद

आंखों का मुसकराना
दिल के भीतर तक उतर जाना
होंठों को दबाना
यौवन का गजब का कहर ढाना.

फूलों में सौंदर्य के साथ
खुशबू होना भी जरूरी है
पलकों को उठाना और झुकाना
तितलियों का दामन बचा जाना.

बसंती धूप में आंचल सरकता
मदहोश होती दिशाएंरूप के सागर में उतर कर
आप कोई मोती ढूंढ़ लाना.

नजरों की इनायत होती उस पर
जो सही माने में हकदार है
फूलों की चाहत के लिए सचमुच
कांटों की दहलीज से गुजर जाना.

मुसकराहट है ऐसी आप की जिस में
तड़प हो तप्त यौवन की
अधर हैं सुर्ख गुलाब से
पंखडि़यों का आंचल में बिखर जाना.
कदम उठाओ बन जाए खूबसूरत
फिजाएं तो जाने कमल
अंजुरि में समेटो सौंदर्य प्यार की
जरा हद से गुजर जाना.

– कमलसिंह चौहान

यह कैसी स्वतंत्रता : धर्म की आलोचना करना क्यों है प्रतिबंधित

आज तक दुनिया में जितने भी आविष्कार हुए, नएनए तथ्य सामने आए, वे सब मानवीय तर्कशक्ति और चिंतन के बलबूते पर हुए हैं. लेकिन दुख की बात है कि धर्म तर्कवितर्क एवं चिंतन पर प्रतिबंध लगाता है. सोचिए, यदि आप बच्चों की क्यों और कैसे संबंधी जिज्ञासा की हत्या कर दें तो उन बच्चों का क्या होगा? क्या उन का बौद्धिक विकास हो सकेगा? यह कैसी स्वतंत्रता है कि हम तर्क ही न कर सकें? हम क्यों बिना सोचविचार के किसी चीज पर विश्वास करें. कोरा विश्वास बुद्धि को खा जाता है और वह पशु तुल्य हो जाता है.

स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘धर्म यह दावा क्यों करता है कि वह तर्क द्वारा परीक्षित होना नहीं चाहता. तर्क के बिना किसी भी प्रकार का यथार्थ निर्णय नहीं दिया जा सकता. प्रवचनों के आधार पर अंधों की तरह 20 लाख देवताओं में विश्वास करने की अपेक्षा बुद्धि का अनुसरण कर के नास्तिक होना अच्छा है. मनुष्य की गरिमा उस की विचारशीलता के कारण है, पशुओं से हम इसी बात में भिन्न हैं.’’

तर्क पर प्रतिबंध

रामचरित मानस में तुलसीदास लिखते हैं :

‘चरित राम के सगुण भवानी,

तर्कि न जाहिं बुद्धि बल वाणी.’

अर्थात राम के चरित्र के संबंध में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क नहीं किया जा सकता.

दूसरे शब्दों में कहें कि बुद्धि को ताक पर रख कर लिखे गए चरित्र को स्वीकार करें.

बात यहीं पर खत्म नहीं होती है. राम के चरित्र पर तर्कवितर्क करना ईश निंदा माना गया है.

‘हरिहर निंदा सुनई जो काना,

होइ  पाप  गोघात  समाना.’

अर्थात भगवान की निंदा जो कानों से सुनता है, उसे गोहत्या के समान पाप लगता है.

इस का मतलब कि कोई तर्क सुने ही नहीं.

तुलसीदास ने सोचा होगा कि यदि लोग इस भय से भी पार कर जाएं तो :

‘राम भगति जिन्ह के उर नाहीं,

कबहुं न तात कहिअ तिन्ह पाहीं.’

अर्थात राम की भक्ति जिन के हृदय में नहीं है उन के समक्ष राम की कथा नहीं कहनी चाहिए.

‘कथा’ और ‘चरित’ तो उसे कहा जाता है जो नास्तिक के दिल में भी भक्ति पैदा कर दे. प्रवचनकर्ता लोगों को समझाते फिरते हैं कि भक्ति का आधार है विश्वास. और विश्वास किस पर करना है, ईश्वर पर, ईश्वर के बनाए नियमों पर. मेरा मानना है, जो विश्वास बगैर तर्कवितर्क का, बिना परीक्षण का, बिना चिंतन का होगा वह विश्वास नहीं अंधविश्वास है और यह कभी स्थायी नहीं हो सकता. इसीलिए महात्मा बुद्ध ने कहा था :

‘‘कोई बात इसलिए मत मानो कि परंपरा से लोग ऐसा ही मानते रहे हैं. कोई बात इसलिए भी मत मानो कि आज सभी लोग ऐसा ही मानते हैं. किस शास्त्र में ऐसी बात लिखी हुई है कि हमारा गुरु यही बात कहता है. अमुक बेहद सुंदर व भव्य रूप वक्ता ने यही बात कही है आदि आधारों पर कोई बात न मानो. हां, जिस सत्य को तुम्हारी बुद्धि स्वीकार करे जो तुम्हें सर्वथा उचित जान पड़े, उसी पर विश्वास करो, उसी के अनुसार आचरण करो.’’

स्वतंत्र चिंतन और बुद्धि बल द्वारा सत्य के परीक्षण के बुद्ध कितने समर्थक थे.

अर्जुन का तर्क

गीता का जन्म अर्जुन के तर्क से शुरू होता है. तर्क यही है कि स्वजन को मार कर वह तीनों  लोकों का भी राज नहीं चाहता है और युद्ध क्षेत्र में अपना गांडीव रख देता है. एक विचारशील प्राणी के हृदय में यह विचार उठना स्वाभाविक है.

‘ईश्वर: सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति’

(18-61 गीता)

अर्थात ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में बैठा रहता है तो कौन किस को मारेगा?

‘भ्रामय्यन्सर्वभूतानि यंत्रारूढ़ानि मायया’                      (18-61 गीता)

अर्थात ईश्वर सभी भूतों को यंत्र की भांति घुमाते हैं. तो फिर कौरवों के हृदय में भी तो वही ईश्वर बैठे हैं. ऐसे में दोष किस का है?

असल में 2 पक्षों के बीच में लड़ाने वाला तीसरा पक्ष हो और लड़ाने वाला न लड़ने वाले का सखा हो और स्वयं तीसरे पक्ष का इस में स्वार्थ सिद्ध होता हो तो युद्ध अवश्यंभावी है.

अर्जुन के तर्क के प्रत्युत्तर में जो बात तीसरे पक्ष द्वारा कही गई है उस से तो

एक पंगु आदमी भी युद्ध के लिए उ-त हो जाए :

  1. हे अर्जुन, नपुंसकता को मत प्राप्त हो. (गीता 2-3)
  2. मैं युद्ध नहीं करूंगा, तेरा यह निश्चय अहंकार है. (गीता 18-59)
  3. युद्ध नहीं करोगे तो लोग तुम्हारी अपकीर्ति का कथन करेंगे. (गीता 2-34)
  4. महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे. (गीता 2-35)
  5. तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए न कहने योग्य वचन कहेंगे.

(गीता 2-36)

  1. लोग युद्ध में उद्धत होते हैं ललकार से न कि आत्मापरमात्मा के ज्ञान से. और तो और यदि लड़ाने वाला यह सुनिश्चित कर दे कि जीत तुम्हारी निश्चित है तो कहने ही क्या?

निचोड़ यह है कि एक विचारशील तर्क जो रक्तपात नहीं चाहता था, उसे मोड़ दिया गया युद्ध की तरफ. यदि कौरव पक्ष को अन्याय और अत्याचार का पक्ष मान लिया जाए तो इस अन्यायी पक्ष का संहार भी अन्याय से ही हुआ और इस की शुरुआत भी अन्याय से ही हुई.

उधर कौरव पक्ष के सेनापति भीष्म पितामह युद्ध का शंखनाद करते हैं और दूसरी तरफ पांडव पक्ष द्वारा इस शंखनाद का उत्तर तीसरा पक्ष जो लड़ाने वाला है, शंख बजा कर देता है. लड़ने वालों से लड़ाने वाला प्रबल है. यह भी एक अन्याय है कि युद्धघोष का प्रत्युत्तर सेनापति न दे कर सारथी दे.

यहां कृष्ण सारथी के साथ लड़ाने वाला सर्वशक्तिमान परमात्मा है. परमात्मा तो गलती करता ही नहीं. जो आमजन गलती समझते हैं वह परमात्मा की लीला है. यह लीला वह धर्मसंस्थापनार्थाय और विनाशाय च दुष्कृताम के लिए रचते हैं. जहां परमात्मा स्वयं नियम का उल्लंघन करे तो आम आदमी क्या खाक नियम का पालन करेगा.

धर्मयुक्त युद्ध का तर्क

श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अध्याय में धृतराष्ट्र कहते हैं :

‘धर्मक्षेत्रे  कुरुक्षेत्रे  समवेता  युयुत्सव,

मामका पांडवाश्चैव किमकुर्वत संजय.’

अर्थात धर्म के जिस कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए 2 भाई इकट्ठे हुए हैं और एक दूसरे के प्राण लेने को आतुर हैं वह धर्मक्षेत्र कैसे रह गया? हे संजय, जब धर्म के क्षेत्र में लड़ना पड़े तो वहां धर्म बचेगा? भीषण रक्तपात के बाद भी कुरुक्षेत्र धर्मक्षेत्र हो तो अधर्मक्षेत्र में क्या होगा? शोचनीय है.

‘धर्म्याद्धि युद्धाच्छे्रयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न वि-ते.’       (गीता 2-31)

अर्थात क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़ कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है.

‘अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि.

तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि.’         (गीता 2-33)

किंतु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खो कर पाप को प्राप्त होगा.

युद्ध से विमुख न होना क्षत्रिय का स्वाभाविक धर्म है.       (गीता 18-43)

गीता-तत्त्वविवेचनी टीका के अनुसार, ‘जिस युद्ध का आरंभ अनीति या लोभ के कारण नहीं किया गया हो एवं जिस में अन्यायाचरण नहीं किया जाता हो, किंतु जो धर्मसंगत हो, कर्तव्यरूप से प्राप्त हो और न्यायानुकूल किया जाता हो, ऐसा युद्ध ही क्षत्रिय के लिए अन्य समस्त धर्मों की अपेक्षा अधिक कल्याणकारक है.’

महाभारत में दोनों पक्षों द्वारा युद्ध के नियमों का जो उल्लंघन हुआ है, किसी से छिपा नहीं है. हार और जीत दोनों में किस प्रकार लोभ दिखाया गया है, उस की एक झलक देखें :

‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्.

तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय युद्धाय कृतनिश्चय:.’        (गीता 2-37)

अर्थात या तो तू युद्ध में मारा जाएगा तो स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीत कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा. इस कारण हे अर्जुन, तू युद्ध के लिए निश्चय कर के खड़ा हो जा. यानी गीता के अनुसार दोनों हाथों में लड्डू हैं. ऐसी स्थिति में जयपराजय, लाभहानि और सुखदुख क्यों न समान समझा जाए?

आज जो हिंसा और रक्तपात हो रहा है, क्या यह कह कर जायज ठहराया जाए कि आत्मा न मरती है न जन्म लेती है, हत्यारा कर्त्ता नहीं है, जिस की हत्या हुई, वह पहले से ही मरा हुआ है.

परमात्मा युद्ध मैदान में जिस के साथ हो, जिस युद्ध का प्रायोजक ही परमात्मा हो, उस पक्ष की जीत में संदेह क्या? जो अत्याचार है, वह भी आचार है, जो अधर्म है वह भी धर्म है. इसीलिए तो शस्त्र न उठाने का प्रण करने वाले परमात्मा रथ का पहिया ले कर मारने दौड़ते हैं.

‘यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्.’

(गीता 2-32)

गीता तत्त्वविवेचनी टीका के अनुसार, ‘तुम ने यह युद्ध जानबूझ कर खड़ा नहीं किया है. तुम लोगों ने तो संधि करने की बहुत कोशिश की. सवाल उठता है जहां सर्वशक्तिमान परमात्मा संधि प्रस्ताव ले कर जाए, संधि कराने की कोशिश करे और संधि नहीं हो तो विचारणीय है.’

मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे प्रणाम कर

व्यक्ति को इतनी भी आजादी नहीं है कि वह अपने विवेक द्वारा अपने आराध्य का चयन कर सके. गीता में मनुष्य को अविवेकी, पशु तुल्य समझा गया है, जो अपने अच्छेबुरे का स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकता. गीता में तथाकथित भगवान ने जो प्रचार किया है कि मैं ही परमात्मा हूं, मुझे भज, मेरे दल में आ जा, तेरे सभी पाप माफ कर दूंगा, ब्रह्मांड के हर तत्त्व का सार मैं हूं, ऐसा स्वप्रचार शायद दूसरे किसी धर्म में नहीं मिलता :

‘ये त्वेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्,

सर्वज्ञानविमूढ़ांस्तान्विद्धि नठटानचेतस:.’

(गीता 3-32)

अर्थात जो मनुष्य मुझ में दोषारोपण करते हुए मेरे मत के अनुसार नहीं चलते उन मूर्खों को नष्ट हुआ समझ.

‘मामेव ये प्रपद्यंते मायामेतां तरन्ति ते.’

(गीता 7-14)

जो पुरुष केवल मुझ को ही निरंतर भजते हैं वे माया का उल्लंघन कर संसार से तर जाते हैं.

‘न मां दुष्कृतिनो मूढ़ा: प्रपद्यंते नराधमा:

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:.’

अर्थात माया के द्वारा जिन का ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे असुर स्वभाव को धारण किए मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझ को नहीं भजते. (गीता 7-15)

गीतोपदेश पर तर्क का भय

‘इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन.

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां याभ्यसूयति..’

अर्थात तुझे यह गीतारूपी रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्तिरहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए. और जो मुझ में दोषदृष्टि रखता है उस से तो कभी नहीं कहना चाहिए.

गीता लिखने वाले को यह भय जरूर सता रहा होगा कि इतनी विरोधाभासी बातों को पढ़ कर लोग अवश्य दोष निकालेंगे. एक तरफ कृष्ण कहते हैं कि न मेरा कोई प्रिय है, न अप्रिय. दूसरी तरफ अर्जुन को अपना अतिशयप्रिय बता रहे हैं. एक तरफ कृष्ण कहते हैं कि तीनों वेद मैं हूं. दूसरी तरफ कहते हैं कि मैं वेदों में सामवेद हूं.

प्रचार करने वाला मेरा सर्वप्रिय

य इमं परमं गुह््यं मद्भक्तेएवभिधास्यति,

भक्तिं यचि परां कृत्वा मामेवैस्यत्यसंशय:. (गीता 18-69)

अर्थात जो पुरुष मुझ में परम प्रेम कर के इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा. वह मुझ को ही प्राप्त होगा, इस में कोई संदेह नहीं है.

न च तस्मान्मनुस्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तम:,

भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि.’ (गीता 18-69)

अर्थात उस से बढ़ कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है और धरती पर उस से बढ़ कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं.

क्या आप ने निम्नलिखित बिंदुओं पर स्वतंत्र चिंतन व तर्कवितर्क किया है :

–       धार्मिक स्वतंत्रता अधिकार के अंतर्गत क्या धर्म के संबंध में तर्कवितर्क करना नहीं आता? क्या बुद्धि को ताक पर रख कर किसी चीज को मानना ही धर्म और धार्मिक आस्था या ईश्वर भक्ति है?

–       यदि कोई व्यक्ति ईश्वर के प्रति गलत बोलता है या गलत चित्र बनाता है अथवा गलत व्यवहार करता है तो ईश्वर उसे दंडित करे. वह तो सर्वशक्तिमान है, वह तो कभी भी किसी को भी दंडित कर सकता है. तो फिर धार्मिक ठेकेदार क्यों बवंडर मचाते हैं? कोई भी धर्म या धार्मिक भावना इतनी कमजोर क्यों होती है, जो किसी की कलम से या कहने पर डगमगा जाती है?

–       क्या सर्वशक्तिमान परमेश्वर को यह अच्छा लगता है कि एक तरफ उन के बंदे अन्न के लिए तरस रहे हों, दूसरी तरफ अन्नघी मिला कर यज्ञ के नाम पर आग के हवाले कर दिया जाए?

–       यदि बाबू व अधिकारी घूस या चढ़ावा ले कर काम करें तो उसे भ्रष्टाचार या घूसखोरी कहा जाता है. यदि तथाकथित भगवान या देवता चढ़ावा से खुश हो कर आप के मनमाफिक काम करे तो उसे क्या कहा जाए? पवित्र गं्रथों में भगवान से वरदान प्राप्त करने वालों की सूची देखी जाए तो सभी को वरदान खुशामदगीरी से मिला है, चाहे वह तथाकथित राक्षस ही क्यों न हो.

–       जब सभी जीव ईश्वर की संतान हैं, इस सृष्टि की रचना ही भगवान ने की है तो भला ईश्वर बलि से कैसे खुश होते हैं?

–       क्या भगवान झोंपड़ी की कीमत पर करोड़ोंअरबों के मंदिर में रहना पसंद कर सकते हैं और भूखे मर रहे लोगों की कीमत पर स्वर्ण व रजत बेलपत्र व महामस्तकाभिषेक के नाम पर दूध, दही, घृत, मधु आदि की बरबादी सहन कर सकते हैं?

जब ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, सर्वव्यापक हैं, हर पल व क्षण के नियंता वही हैं तो धर्म की हानि होती कैसे है? वे धर्म की हानि क्यों होने देते हैं? क्या आग लगने के बाद उसे बुझाने के काम में उन्हें मजा आता है? आप का जवाब होगा-यह ईश्वर की लीला है.

–       प्राकृतिक आपदाओं में लाखों लोगों की जान जाती है, उस समय भक्तवत्सल, कृपासिंधु, करुणा के सागर, बिन हेतु स्नेही, सर्वशक्तिमान भगवान कहां रहते हैं?

–       क्या इन तथ्यों से पाप प्रवृत्ति को प्रोत्साहन नहीं मिलता है? यदि नहीं तो दुनिया में पापाचार बढ़ क्यों रहा है?

निम्नलिखित बिंदुओं पर भी विचार कर देखिए :

–       किसी पवित्र नदी के दर्शन या स्नान से पाप धुल जाते हैं.

–       अमुक तिथि या वार को पवित्र जल में स्नान करने से सौ जन्मों के पाप मिट जाते हैं.

–       पवित्र ग्रंथों में भगवान के मुख से पापियों को अभयदान :

कोटि  विप्र  बध  लागै  जाहू.    आए  सरन  तजौं  नहि  ताहू..

सन्मुख होई जीव मोहि जबहीं.  जन्म कोटि अध नासहिं तबहीं..

जो  नर  होइ  चराचर  द्रोही.    आबै सरन समय तकि मोही..

तजि मद मोह कपट छल नाना.  करौं स- तेहि आप समाना..

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि,

गए सरन प्रभु राखि हैं, सब अपराध विसारि.         (रामचरितमानस)

यदि इतनी आसानी से पाप को धोया जा सके तो पापियों को पाप करने में भय कैसा?

धर्म व धार्मिक चिंतन के लिए व्यक्ति को आजाद होना चाहिए. यदि कोई मत या संप्रदाय या धार्मिक ग्रंथ किसी पर अपना मत थोपता है तो वह स्वतंत्रता (धार्मिक स्वतंत्रता) का हनन है. मत थोपे जाने के चलते ही व्यक्ति कट्टर हो जाता है, क्योंकि उस ने व्यक्तिगत रूप से सत्य का परीक्षण नहीं किया है. कोरा विश्वास सत्य के लिए सब से खतरनाक होता है क्योंकि यह चिंतन का, तर्कवितर्क का, सत्य की तरफ स्वयं झांकने का अवसर नहीं देता है.

धर्मराज ने सावित्री को मना नहीं किया कि तुम तर्क मत करो. सावित्री जीत गई अपने तर्क से, मृत्यु पर उस ने विजय प्राप्त कर ली. हे धर्मराज, मुझे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे कर पति को साथ कैसे लिए जा रहे हैं? दुनिया में यही हो रहा है, मेरे दल पर विश्वास करो, भवसागर पार हो जाओगे. बगैर विश्वास के कोई किसी दल में शामिल ही नहीं होगा. विश्वास करने की भी आजादी होनी चाहिए. हम किस पर विश्वास करें. कम से कम सोचविचार का तो अवसर अवश्य मिलना चाहिए.

रिश्तों में खटास जो ले जाए हिंसा तक, आखिर क्या है वजह

‘कितने अजीब रिश्ते हैं यहां पर, एक पल मिलते हैं मिल कर बिछुड़ते हैं, जब मोड़ आए तो बच के निकलते हैं…’ ‘पेज 3’ फिल्म का यह गीत ही नहीं बल्कि पूरी फिल्म ही हमारे समाज के उस भयावह चेहरे को पेश करती है जिस में रिश्तों पर सपनों का जनून कुछ इस कदर हावी हो गया है कि व्यक्ति से ज्यादा ओहदा माने रखने लगा है.

कोई भी रिश्ता जब तक इनसान की खुशी और प्रतिष्ठा के आड़े नहीं आता तब तक तो ठीक चलता है, लेकिन जैसे ही व्यक्ति को इस पर कोई खतरा नजर आता है वह इस खतरे की जड़ को ही मिटा देता है. चाहे खतरे की जड़ मांबाप, भाईबहन, पतिपत्नी ही क्यों न हों. तभी तो सदियों से रिश्तों का खून होता रहा है और होता रहेगा.

आरुषि की हत्या का मामला इस का ताजा उदाहरण है. भाजपा नेता प्रमोद महाजन की उन के भाई द्वारा हत्या सुर्खियां बन चुकी हैं. उत्तर प्रदेश के पूर्व सांसद डीपी यादव की बेटी भारती यादव के प्रेमी नीतिश कटारा की हत्या हो या 2000 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की मुखिया बीबी जागीर कौर की बेटी हरप्रीत कौर की हत्या हो, इन सभी घटनाओं ने रिश्तों को ही तो शर्मसार किया है.

2007 की एक घटना ने तो भाईबहन के रिश्ते को ही कलंकित कर दिया. मुंबई में भाईबहन की बहस का खूनी अंत तब हुआ जब होटल व्यवसायी ललित डिसूजा ने पार्किंग पर हुए विवाद में अपनी बहन लोरना को गोली मार कर घायल कर दिया. इसी तरह सितंबर, 2007 में मुंबई में ही होटल के मालिक मोहन शेट्टी ने कथित रूप से अपने छोटे भाई मनोहर को उन के वकील के दफ्तर में गोली मार दी. इन दोनों भाइयों के बीच अरसे से संपत्ति का विवाद चल रहा था.

फरवरी, 2008 में दिल्ली के नंदनगरी इलाके में पत्नी की हत्या में उस का पति गिरफ्तार हुआ और मार्च, 2008 में उत्तम नगर में चाचा ने भतीजी से अवैध संबंध बनाए और फिर सुपारी दे कर उस की हत्या करा दी. अप्रैल, 2008 में विकासपुरी (दिल्ली) में भाई ने प्रेमिका के साथ मिल कर अपने ही छोटे भाई की हत्या कर शव को जला दिया.

इस तरह की घटनाएं समाज में क्यों बढ़ती जा रही हैं? यही जानने के लिए इस प्रतिनिधि ने समाज के कुछ खास वर्ग से जुड़े लोगों से बातचीत की.

प्रो. अंशुम गुप्ता दिल्ली विश्व- विद्यालय में मनोविज्ञान विभाग के प्रमुख हैं. वह बताते हैं कि नैतिक मूल्यों के बंधन टूट रहे हैं तो इस की वजह यही है कि इनसान के भीतर जानवरों की सहज प्रवृत्ति होती है और इस के प्रभावी होने पर इनसान भी जानवरों की तरह व्यवहार करने लगता है. नैतिक मूल्यों का ध्यान आते ही आमतौर पर लोग इसे नियंत्रित कर लेते हैं. पर जब बंधन टूट चुके हों तो फिर नियंत्रण की उम्मीद कहां से की जा सकती है.

राममनोहर लोहिया अस्पताल के साइकेट्री डिपार्टमेंट की प्रमुख डा. स्मिता देशपांडे का कहना है, ‘‘भारतीय समाज में मारकाट की घटनाएं आम हो गई हैं. लोगों के अंदर संवेदनशीलता ही नहीं बची है, इसलिए उन की नजर में आदमी की वकत खत्म हो गई है. दरअसल, हर इनसान के अंदर कंस्ट्रक्टिव और डिस्ट्रक्टिव, 2 तरह की प्रवृत्ति होती हैं. इन दोनों तरह की प्रवृत्ति का प्रभाव दिमाग पर घटने या बढ़ने से इनसान की सोच और उस का व्यवहार निर्धारित होता है. पागलपन प्रवृत्ति को नियंत्रित न रख पाने की हालत में व्यक्ति विनाश का काम करता है.’’

समाज अब दिखावे में ज्यादा जी रहा है और हर किसी के दिमाग पर यही सोच हावी है कि ऐसा हो गया तो लोग उस के बारे में क्या सोचेंगे?

विवाह और रिश्तों के विशेषज्ञ  डा. खुराना का कहना है, ‘‘हमारे यहां लोग आदर्शों और सिद्धांतों की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन फिर भी पारिवारिक शिक्षा न के बराबर है. परिवार में कोई मुसीबत आ जाए तो उस का सामना कैसे किया जाए? या परिवार के लोग आपस में मेलजोल बिठा कर कैसे रहें? ये बातें परिवार में बुजुर्गों के साथ बैठ कर बातचीत के जरिए या फिर काउंसलिंग के द्वारा की जा सकती हैं लेकिन नादान लोग काउंसलिंग का रास्ता छोड़ कर तंत्रमंत्र का रास्ता अपनाते हैं. इस से पीडि़त का मसला तो नहीं सुलझता लेकिन इन पंडेपुजारियों को खूब फायदा होता है.

‘‘सुखी दांपत्य जीवन के सपने दिखा कर धर्म के बिचौलिए दंपती को गृहस्थ जीवन में प्रवेश के साथ ही धर्म की डगर दिखा देते हैं. आम लोगों में यह धारणा घर कर जाती है कि पंडे- पुजारियों, मुल्लाओं द्वारा सुझाए मंत्र और उन की बातें दांपत्य जीवन को सुखी बना देती हैं. लिहाजा, वे उन के यहां दिनरात चक्कर लगाने शुरू कर देते हैं, जबकि उन्हें जरूरत काउंसलिंग की होती है पर वे काउंसलिंग के लिए मनोचिकित्सक के पास जाने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वे मनोरोगी नहीं हैं. दूसरे कुछ लोग इस डर से नहीं जाते कि कहीं लोगों को इस बात का पता न चल जाए कि उन के परिवार के बीच आपस में विवाद है.’’

इस बारे में शिवानी का कहना है, ‘‘मेरे ही पड़ोस में रहने वाली शोभा को  पंडों पर बहुत विश्वास है. पिछले दिनों शोभा के पति घर कुछ देरी से आते थे. आफिस में काम की वजह से वह कुछ तनाव में भी रहते थे. वह तनाव के चलते ही पत्नी को कभीकभी झिड़क भी देते थे.

पति का बदला व्यवहार देख कर शोभा एक दिन पुजारी के पास पहुंच गई. पुजारी ने पंचांग देख कर बताया कि कुछ ग्रहों की टेढ़ी नजर उस के वैवाहिक जीवन पर पड़ गई है नतीजतन, उस के पति का चक्कर किसी दूसरी औरत से चल रहा है. पुजारी ने उपाय के तौर पर कुछ पूजा बता दी. इस के बाद तो शोभा अपने पति की हर बात को शक की निगाह से देखती, उस की हर गतिविधि पर नकारात्मक सोच रखती.

धीरेधीरे पतिपत्नी के बीच का तनाव बढ़ता गया. छोटीछोटी बातों पर दोनों के बीच कहासुनी होने लगी. इस तरह रिश्ते में आई कटुता फिर कभी सही नहीं हो पाई. इस मामले में होना यह चाहिए था कि  शोभा पति से बात करती और स्वयं ही समस्या का हल ढूंढ़ती.

धर्मभीरु शोभा जैसे लोगों को समझना होगा कि जीवन में सुख किसी चमत्कार, आशीर्वाद, कृपा या तंत्रमंत्र से नहीं मिलता बल्कि इस के लिए जीवन की व्यावहारिकता जरूरी है.

सामाजिक कार्यकर्ता शोभा विजेंद्र का कहना है, ‘‘अंधविश्वास व रूढि़यों को बढ़ावा देने में बहुत हद तक मीडिया भी जिम्मेदार है. ऐसे तथाकथित ज्योतिषी, पंडेपुजारियों, तकदीर बांचने वाले ढोंगी लोगों के विज्ञापन आएदिन अखबारों, पत्रपत्रिकाओं व टीवी चैनल पर दिखाई देते रहते हैं जिस में ये लोग नौकरी व्यवसाय में मुनाफा दिलवाने, प्रेमी को पाने व संपत्ति विवाद को हल करने जैसी समस्याओं का हल निकालने का दावा करते हैं.’’

इस तरह के समाचारनुमा विज्ञापन में इन के पूरे पते और फोन नंबर भी लिखे होते हैं.

अपनी समस्याओं से परेशान व्यक्ति जैसे ही इन की तरफ रुख करता है, इन ढोंगी लोगों के वारेन्यारे हो जाते हैं और लोगों का हाल कुछ शोभा की तरह हो जाता है. यह उन के रिश्तों को सही करने के बजाय उस में जहर घोलने का काम करते हैं. अगर मीडिया इन का प्रचार करना बंद कर दे, तो काफी हद तक इस धंधे को फलनेफूलने से रोका जा सकता है.

सिर्फ यही नहीं, टूटते परिवार, अवैध संबंधों कोे बढ़ावा देने में भी मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका है. जिस तरह से टेलीविजन पर सीरियल परोसे जा रहे हैं और फिल्में आ रही हैं उस का प्रभाव आम जनता पर पड़ता है.

एक ही पुरुष के कई औरतों के साथ संबंध और उन्हें बड़ी ही आसानी से छिपा लेने के तरीके जब आम लोग धारावाहिकों में देखते हैं, तो उस का अनुकरण करने लगते हैं पर ऐसा करते हुए वे यह भूल जाते हैं कि धारावाहिक मात्र एक कल्पना पर आधारित होते हैं और असली जिंदगी की सचाई कुछ और ही है. मीडिया समाज में घटी किसी भी घटना को बहुत बढ़ाचढ़ा कर पेश करता है जिस का नकारात्मक प्रभाव समाज के लोगों पर पड़ता है.

इन लोगों से की गई बातचीत के आधार पर जो निष्कर्ष निकला वह यह है कि इस तरह की घटनाएं अपने पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ देती हैं कि हत्या करने के बाद हत्यारे को आखिर क्या हासिल होता है?

समाज में होने वाली इन सभी घटनाओें को अंजाम देने के बाद आरोपी का अंजाम प्रमोद महाजन की हत्या करने वाले उन्हीं के भाई प्रवीण महाजन जैसा ही होता. वह आज तक जेल में है.

अगर किसी वजह से हत्या का आरोपी पुलिस से बच भी जाए तो भी उस की इतनी बेइज्जती हो चुकी होती है कि कोई ऐसे को अपने यहां नौकरी तक नहीं देता. उस का सुखचैन तो जाता ही है, पैसे की तंगी झेलता है सो अलग.

इन सब के बावजूद एक हत्यारा पुलिस और कानून से बच सकता है लेकिन क्या वह खुद से बच सकता है?

व्यक्तित्व को चमकाने में लगे हैं नई संस्कृति के माडर्न भगवान

ढलती जवानी में लाखों रुपए खर्च कर के अपना मेकओवर करवाने वाली महिलाओं की तरह ही मंदिरों का मेकओवर करवाने का चलन आजकल जोरों पर है. मुंबई शहर के  सब से पुराने मंदिरों में एक ढाकलेश्वर मंदिर के निवासी महादेव भी मेकओवर करवा कर माडर्न भगवानों की जमात में शामिल हो चुके हैं. हम किसी से कम नहीं की तर्ज पर यह मेकओवर 10-20 लाख रुपए का नहीं पूरे 2 करोड़ रुपए का करवाया गया है.

ध्यान रहे 174 साल पुराने ढाकलेश्वर महादेव का और उन के निवास स्थान का मेकओवर आईएसओ 9001-2000 की गाइडलाइंस के तहत किया गया है ताकि मंदिर में हाई प्रोफेशनल स्टैंडर्ड अपनाए जा सकें. भगवान का स्टैंडर्ड मेंटेन करने में कमर कस चुके मंदिर ट्रस्ट के जनरल मैनेजर चंचल चौधरी ने बताया कि मंदिर के मेकओवर में करीब 2 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं.

सबकुछ भगवान की मर्जी

आखिर सर्व शक्तिमान भगवान को भी माडर्न जमाने के चलन के हिसाब से अपने निवासस्थान के लिए आईएसओ सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ ही गई. इसलिए शायद सब बातों में भगवान की मर्जी को मानने वाले भक्तों को इस बार भी भगवान ने अपनी मर्जी बता दी होगी. हर साल अपने आलीशान भवनों में कुछ नया करवाने वाले भक्तों के सामने भगवान महादेव को 174 साल पुराना मंदिर बेकार लगने लगा होगा और भगवान भी अपने 174 साल पुराने निवास में रहतेरहते ऊब गए होंगे सो मंदिर में स्टैंडर्ड का बदलाव चाहते होंगे.

नए पैटर्न और डिजाइन की चाहत रखने वाले भक्तों की बातें सुनसुन कर भगवान का मन भी नए डिजाइन और सुंदर साजसज्जा वाले मंदिर में रहने का हो आया हो इसलिए उन्होंने डिजाइनर पैटर्न से सुसज्जित मंदिर बनवाने की अपनी इच्छा अपने भक्तगणों को बता दी होगी.

अपने नादान भक्तों द्वारा फैलाई गंदगी भगवान को पहले रास आती होगी, अब माडर्न जमाने में मौल कल्चर देख चुके साफसुथरे माहौल में रहने वाले भक्तों की तर्ज पर उन्हें वह गंदगी रास नहीं आ रही हो, इसलिए उन्होंने भक्तों से इंटरनेशनल मापदंडों पर खरे उतरने वाली साफसफाई की डिमांड कर दी या फिर उन्हें चढ़ावे में मिलने वाले जेवरातों और मोटी रकम पर किसी अंडर वर्ल्ड डौन की नजर पड़ चुकी हो जिस के चलते उन्हें सिक्योरिटी की जरूरत पड़ गई और उन्होंने भक्तों से इंटरनेशनल तौरतरीकों वाली सिक्योरिटी की मांग रख दी हो.

संभव यह भी है कि भगवान खुद के व्यक्तित्व में बदलाव चाहते हैं? जाहिर है, माडर्न जमाने में कुछ अलग, कुछ नया और कुछ हट कर न किया जाए तो बेकार है. उस की कमीज मेरी कमीज से उजली क्यों? यही सोच रखते हुए भगवान ने अनुभव किया होगा कि स्टाइल अपनाने में भक्तगण पीछे नहीं तो भक्तों की रचना करने वाले भगवान भी पीछे क्यों रहें भला?

आज के जमाने में स्टाइल और अंदाज ही तो है, जो एक भगवान को अन्य भगवानों से अलग पहचान, प्रतिष्ठा देता है. भगवान के लिए यह जरूरी भी है कि उन की प्रतिष्ठा भक्तों के मन में बनी रहे, लिहाजा, उन्होंने अपने अमीर भक्तों से डिमांड रख दी होगी कि अब से मेरे मंदिर में भी सबकुछ इंटरनेशनल नियमकायदे से होना चाहिए. आखिर मेरी इज्जत तुम्हारी इज्जत है. लिहाजा, भक्तगण भी भगवान की शानोशौकत में कोई कमी नहीं रखना चाहते. भगवान की डिमांड से भौचक्के बेचारे भक्त इस डर से कि कहीं भगवान नाराज न हो जाएं आननफानन में शानशौकत केनए पैमाने बनाने में जुट गए और उन की नजर में आईएसओ सर्टिफिकेट लेना भी उसी शानशौकत का एक नया स्टाइल है.

अमीरों के भगवान

दरअसल, शानोशौकत स्टाइल का ही हिस्सा तो है और स्टाइल दिखाने का जिम्मा अमीरों के वश में ही है. यह स्टाइल उन के कपड़ों, खानपान, रहनसहन से प्रदर्शित होता है तो ऐसे प्रदर्शन में अमीरों के भगवान क्यों पीछे रहें? इसलिए शौकीन भक्तों के भगवान को भी उन के महंगे शौक लगते देर नहीं लगती.

जब भगवान के भक्त उन्हें भोग लगाते हैं तो देशी घी, काजू, मेवा, बादाम और पांचों मगज तो उस में होते ही हैं साथ ही भोग बनाने वाली और लगाने वाली कमसिन हो इस का भी ध्यान रखा जाता है. आखिर वे अमीरों के भगवान हैं कोई राह चलते भिखारी या दासीपुत्र के नहीं कि जो दे दिया, जब दे दिया वे खा लेंगे.

फिर अमीरों के भगवान कोई छोटेमोटे मंदिर में तो बसते नहीं, जहां कपड़ों की भी जरूरत नहीं होती. जहां नारियल के भाव दोगुने होने पर नारियल के बदले माथा झुका कर भक्त भगवान से यह कह कर माफी मांग लेता है कि क्या करूं भगवान, गरीब हूं, नारियल महंगा हो गया है इसलिए आज केवल सिर झुका रहा हूं.

यह तो हाई प्रोफाइल भक्तों के भगवान हैं जिन के स्टैंडर्ड के भक्त स्टैंडर्ड का चढ़ावा चढ़ाते हैं. लिहाजा, स्टैंडर्ड के भक्तों के समान स्टैंडर्ड के भगवान को भी तरहतरह के चेंज चाहिए होते हैं. स्टैंडर्ड के भगवान भी अपने भक्तों की देखादेखी शानशौकत से सजनेसंवरने की फिराक में रहते हैं. तरहतरह की ज्वैलरी का शौक भी भगवान को तभी चढ़ता है, जब उन के हाईफाई अमीर भक्त उन्हें चढ़ाते हैं.

अब महंगी ज्वैलरी है, कपड़े हैं, शानशौकत है और मंदिर वही पुराना बदरंग. बात कुछ जमती नहीं, इसलिए मंदिर का कायाकल्प करना तो जरूरी ही था. सबकुछ स्टैंडर्ड का हो तो कायाकल्प भी तो स्टैंडर्ड का होना चाहिए. लिहाजा, खुले दिल से रुपए खर्च किए गए. भगवान भी यह बात जानते ही होंगे कि इस देश में बुनियादी जरूरतों के लिए किसी के पास पैसे नहीं हैं, लेकिन करोड़ों रुपए मंदिरों की साजसज्जा में तो खर्च किए जा सकते हैं इसलिए उन के भक्त जहां से जैसे भी पैसों का इंतजाम करें उन्हें इस से क्या लेनादेना. भक्तों ने चढ़ाया गया पैसा पसीना बहा कर कमाया हो, किसी की जेब काट कर या गला दबा कर, भगवान को इस से क्या सरोकार. उन्हें भी तो स्टाइल और स्टैंडर्ड का खयाल रखना है, ताकि कोई और भगवान उन से आगे न हो जाए. इस देश की बिगड़ी हुई जवान पीढ़ी की तरह ही हमारे भोलेभाले भगवान को स्टाइल और चमकदमक का चस्का लग चुका है.

हैरानी की बात तो यही है कि सर्व मर्मज्ञ भगवान को यह बात न भी समझ में आए पर मुझ जैसी मूढ़मति खूब समझ सकती है कि क्यों पंडेपुजारी भगवान को ऐसा चस्का लगाते हैं? धर्म के धंधे को चमकाने के लिए पुजारी भगवान का जितना स्टैंडर्ड का लोकलुभावन और प्रभावशाली रूप जनता के सामने पेश करेंगे, मंदिर में आने वाली जनता भी भगवान को उतना ही सराहेगी, उतना ही चढ़ावा पुजारियों के हिस्से में आएगा. इसलिए ही भक्तों की मौडर्न मंशा और चढ़ावे की खातिर इस पुराने मंदिर का कायाकल्प कर इसे मौडर्न मंदिर का नया रूप दिया गया है. इतना ही नहीं इसे आईएसओ 2001 का सर्टिफिकेट भी दिया गया.

वाह रे, स्टैंडर्ड के भक्तगणों, अब तुम्हारे स्वार्थ के कारण भगवान को यह दिन भी देखने थे. ऐसे हाईफाई भक्तों के लिए अपने भगवान को सच्चा, प्रभावशाली और स्टैंडर्ड का भगवान दिखाने के लिए लोगों द्वारा प्रमाणित करवाना आवश्यक है क्योंकि ऐसी प्रमाणिकता मिलने पर ही उन के भगवान दूसरे भगवानों की तुलना में विश्वसनीय और खरे उतरेंगे, उन का स्टैंडर्ड भी बढ़ेगा. जितने स्टैंडर्ड के भगवान उतनी ही ज्यादा उन के दरबार में अर्जी लगाने वालों की भीड़ होगी.

सब से बड़ी बात यह है कि अपने इस स्टैंडर्ड को मेंटेन करने के चलते सर्वशक्तिमान भगवान पंडेपुजारियों के बंधक बन जाते हैं. उन्हें बंधक बनाने के लिए, अपने इशारों पर नचाने के लिए ऐसा शौक उन्हें पुजारी  लगाते हैं? यह बात भगवान को समझ में आए या न आए लेकिन जिस के मन में ईश्वर के प्रति थोड़ी सी भी आस्था है, उसे समझ आते देर नहीं लगती कि मंदिरों की सारी व्यवस्था पैसे के इर्दगिर्द ही है. जिस के पास पैसा है भगवान भी उसी का है .

इसलिए लगता तो ऐसा ही है कि अपने गरीब भक्तों की दुविधा की ओर से आंखें मूंदें और अमीरों की गिरफ्त में आए अपने व्यक्तित्व को चमकाने में लगे आज के आधुनिक भगवान की इच्छा भी इसी में है. उन की मर्जी और भी साफतौर पर इसलिए दिखाई देती है क्योंकि वे अपना नाम ले कर मजे करने वालों को लूटपाट करने का अवसर देते रहे हैं और आगे भी देते रहेंगे. भले ही इस से मंदिर के चढ़ावे पर निर्भर रहने वाले निखट्टुओं की संख्या बढ़ जाए और देश में  मेहनतकश लोगों का अकाल पड़े, भगवान को क्या फर्क पड़ेगा? उन्हें तो इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि स्वार्थी, निकम्मे उन्हें प्रसन्न कर के अपनी तिजोरियां भरते रहें.

भगवान के स्टैंडर्ड अमीर भक्तों के पास उन को खुश करने के एक से एक बेहतरीन उपाय हैं. इसलिए नई संस्कृति के माडर्न और स्टैंडर्ड के भगवान ने भी मौका भांपते हुए अपना फायदा पहले देखना सीख लिया है कि जो उन्हें सब से बढि़या बेहतरीन सेवा प्रोवाइड करवाएगा वे भी अपने आशीर्वादस्वरूप उस की तिजोरियां भरवाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे.

धरना देने का हक और सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक नए फैसले में दिल्ली के जंतरमंतर के पास और राजपथ पर वोट क्लब पर जलसे करने और सरकार का ध्यान खींचने के लिए प्रदर्शन करने के हक को बहाल किया है. कांग्रेस और भाजपा सरकारों ने इन प्रदर्शनों और धरनों को कानून व व्यवस्था के नाम पर बंद करा दिया था.

सरकार व शासन ही नहीं, कंपनियों, मंदिरमठों, मसजिदों, स्कूलों, कालेजों, व्यापारियों के खिलाफ भी बोलने की न सिर्फ आजादी चाहिए, वह सुविधा भी होनी चाहिए जिस से आजादी का इस्तेमाल किया जा सके. आप को बोलने की आजादी हो पर लाउडस्पीकर लगाने की इजाजत न हो तो यह बोलने की आजादी बेकार है. आप अपनी बात लोगों को कहना चाहते हैं पर जगह ही नहीं हो जहां लोगों को जमा करा जा सके तो क्या फायदा होगा. यह तो बंद कमरे में भड़ास निकालना होगा.

भाजपा सरकार ने तो बोलने की आजादी पर बहुत सी रोकें लगा दी हैं. टीवी लाइसैंसों पर चलते हैं और उन के कान मरोड़ना बहुत आसान हो गया है. समाचारपत्रों को सरकारी विज्ञापन दे कर अपने खिलाफ बोलने से रोका जा सकता है. खरीखरी कहने वाले के खिलाफ देशभर में जगहजगह मुकदमे कर के मुंह बंद करा जा सकता है. आजकल तो सरेआम पिटाई भी हथियार बन गया है जैसा स्वामी अग्निवेश के साथ किया गया.

जंतरमंतर और वोट क्लब पर धरनों और प्रदर्शनों की इजाजत दे कर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि लोकतंत्र सिर्फ वोटतंत्र नहीं कि वोट दिए और मामला खत्म. यह आजादी तो हमारे जीवन के तारतार में होनी चाहिए.

हमारे देश में गरीबों पर जुल्म होते हैं इसीलिए होते हैं कि वे अपना दुख जता नहीं सकते. वे हरदम डरे रहते हैं और इसीलिए जुल्म को सहते हैं. इसी वजह से वे पूरा काम नहीं कर पाते. वे पढ़ नहीं पाते. वे पैसा जमा नहीं कर पाते और गरीब के गरीब बने रहते हैं. गरीबी और लोकतंत्र में सीधा संबंध है. जो देश जितना तानाशाह है उतना गरीब है. अफ्रीका के कई देश तानाशाही झेल रहे हैं और इसीलिए गरीब हैं.

बोलने और दुख दिखाने की आजादी ही सब से बड़ा हथियार है गरीबी से लड़ाई का. आज दलितों और मुसलमानों को खासतौर पर डरा कर चुप इसीलिए कराया जा रहा है ताकि वे गरीब बने रहें और सस्ते में काम करते रहें. अगर उन्हें बोलने का मौका मिलता, जगह मिलती, तरीका मिलता तो वे कब के गरीबी के जंजाल से निकल चुके होते.

हां, जंतरमंतर कोई ऐसी जगह नहीं कि जहां के दर्शन किए और मुसीबतें छूमंतर हो गईं. वहां से तो मौका मिलता है. यह लोगों पर है कि वे गरीबी के चक्कर में फंसे रहना चाहते हैं या मंत्रोंहवनों में.

मैटरनिटी बैनिफिट्स बिल बन रहा है महिलाओं के लिए बाधा

पिछले साल मार्च में जब मैटरनिटी बैनिफिट्स बिल पास हुआ तो औरतों ने इस फैसले का स्वागत किया. मगर हाल ही में इंप्लौयमैंट सर्विसेज कंपनी टीमलीज द्वारा किए गए एक ताजा सर्वे की मानें तो बहुत संभव है कि सरकार का यह कदम महिलाओं की परेशानी खत्म करने के बजाय उसे बढ़ा भी सकता है.

दरअसल, इस कानून के बनने के बाद छोटी और मध्यम आकार की कंपनियां लड़कियों और महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचाने लगी हैं. 6 माह तक एक कर्मचारी को बिना काम के वेतन देना एक बड़ी चुनौती है और फिर इतने लंबे समय तक काम भी प्रभावित होगा. हो सकता है कि कंपनी को उस कर्मचारी का विकल्प ढूंढ़ना पड़े. ऐसे में एक काम के लिए कंपनी को डबल सैलरी का बोझ उठाना पड़ेगा. 6 माह लंबा समय होता है. यदि कंपनी नया कर्मचारी नहीं रखती तो भी वह महिला के महत्त्वपूर्ण काम किसी दूसरे कर्मचारी को सौंप सकती हैं.

टीमलीज द्वारा 350 स्टार्टअप्स और उद्योगों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि 26% कंपनियां 6 माह की मैटरनिटी लीव की लागत को देखते हुए पुरुष कर्मचारी रखने के फैसले को प्राथमिकता देंगी. सर्वे में शामिल 40% कंपनियों ने स्वीकार किया कि वे महिलाओं को हायर तो करेंगी पर इस बात पर ध्यान देंगी कि क्या कैंडीडेट इतना लायक है कि इस लागत को वहन किया जाए. हालांकि 22% के मुताबिक मैटरनिटी लीव का समय बढ़ने के फैसले का उन के हायरिंग डिसीजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

सर्वे में शामिल कंपनियों/संगठनों में से 39% ने कहा कि इस कदम का सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. वर्कप्लेस का माहौल बेहतर होगा, जबकि 35% कंपनियों के मुताबिक 6 माह की मैटरनिटी लीव से लागत और मुनाफा दोनों पर असर पड़ेगा. 10% के मुताबिक इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.

मैटरनिटी लीव 6 माह होने से उन महिलाओं को तो फायदा है जो पहले से जौब कर रही हैं पर नई लड़कियां जो जौब जौइन करना चाहती हैं उन्हें ले कर संशय के भाव पैदा होने लगे हैं. हर साल की तरह इस साल भी लड़कियों ने हर परीक्षा में अपना रुतबा दिखाया. सीबीएसई की 12वीं कक्षा की परीक्षा में जहां मेघा श्रीवास्तव ने पूरे देश में टौप किया वहीं 7 और लड़कियां टौप 3 पोजीशन में रही.

सवाल उठता है कि आज अपनी काबिलीयत दिखा रही इन लड़कियों को क्या कल आसानी से जौब मिल सकेगी? क्या उन के सपने अपने पंख फैला सकेंगे?

वैसे भी शादीशुदा महिलाओं को ले कर यह हिचकिचाहट हमेशा देखी जाती रही है कि इन का क्या भरोसा? कब प्रैगनैंट हो जाएं और छुट्टी पर चली जाएं. भले ही विश्वभर की महिलाएं बराबर के अधिकारों के लिए लड़ रही हों, मगर अब मैटरनिटी लीव का 6 माह होना उन की आर्थिक असुरक्षा और बेरोजगारी का सबब भी बन सकता है. कई विश्वविद्यालयों में तो 2 साल तक की चाडल्ड केयर लीव है.

क्यों जरूरी है मैटरनिटी लीव

इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिक और समाज सुधारिता अनुजा कपूर कहती हैं, ‘‘एक महिला के लिए डिलिवरी के बाद शुरुआत के 6 माह का समय बहुत महत्त्वपूर्ण और कठिन होता है. बच्चा पूरी तरह मां पर निर्भर होता है. उधर महिला स्वयं अपने शरीर से भी काफी कमजोर हो जाती है. उसे कई तरह की तकलीफें रह सकती हैं. खास कर बच्चा सीजेरियन हुआ हो तो खास सावधानियां बरतनी पड़ती हैं.

‘‘वर्किंग वूमन को बहुत कम समय में खुद को जौब पर जाने के लिए तैयार करना पड़ता है. अपनी सेहत का ध्यान रखने के साथसाथ उसे यह भी मैनेज करना पड़ता है कि वह औफिस में रहेगी तो पीछे बच्चे का खयाल कौन रखेगा. 3 के बजाय 6 माह की मैटरनिटी लीव से महिलाओं को खुद को व्यवस्थित करने और बच्चे के साथ बिताने के लिए थोड़ा और समय मिल जाएगा.’’

क्रक्स पब्लिक रिलेशंस कंपनी की फाउंडर विनी अग्रवाल कहती हैं, ‘‘जरूरी है कि हर कंपनी अपने कर्मचारियों को सपोर्ट दे. जब कोई महिला लंबे समय से कंपनी में काम कर रही है तो उसे हक है कि वह अपने जीवन के सब से खूबसूरत फेज यानी मातृत्व का ऐंजौय करे. सिर्फ काम की वजह से वह इस से वंचित क्यों रहे?’’

औफिसों में महिलाओं की मौजूदगी

किसी भी कंपनी में लड़कियों/महिलाओं की मौजूदगी सिर्फ जैंडर इक्वैलिटी के लिहाज से ही जरूरी नहीं वरन और भी कई बातें हैं जो इन के महत्त्व को दर्शाती हैं:

– महिलाओं/लड़कियों की मौजूदगी से औफिस का माहौल स्वस्थ और सुखद बना रहता है. महिलाएं ज्यादा बातूनी और सामाजिक होती हैं. वे न हों तो औफिस का माहौल उदासीन हो जाता है. उन की मौजूदगी से औफिस में हैल्दी कंपीटिशन बना रहता है.

– कंपनी की उन्नति के लिए भी महिलाएं जरूरी हैं. कुछ काम ऐसे होते हैं जिन्हें महिलाएं ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकती हैं. मसलन, किसी क्लाइंट को कौल कर किसी बात के लिए समझाना और राजी करना. महिला की आवाज और लहजा दोनों क्लाइंट पर अच्छा प्रभाव डालते हैं.

– महिलाओं की वजह से प्रोडक्शन बेहतर होता है. अनुजा कपूर कहती हैं कि महिलाएं स्वभाव से ही ज्यादा व्यवस्थित होती हैं. वे अपने काम के प्रति काफी गंभीर होती हैं और सुपरविजन का काम भी ज्यादा बेहतर ढंग से संभाल सकती है.

क्या है उपाय

पेड लीव को बोझ समझने के बजाय कंपनियों को दूसरे विकल्पों पर विचार करना चाहिए:

घर से काम: इंप्लौयर को काम से मतलब है. यदि महिला 2-3 माह बाद घर से काम करना शुरू कर दे तो यह महिला और कंपनी दोनों के लिए फायदेमंद होगा. इंप्लौयर को अपने पैसों की कीमत मिलती रहेगी और महिला को काम छूट जाने या प्रतियोगिता में पीछे रह जाने का खौफ भी नहीं रहेगा. यदि महिला का काम ऐसा है जिसे वह घर से नहीं कर सकती तो कुछ समय के लिए उसे ऐसा काम दे दिया जाए जिसे वह सहजता से घर से कर सके. पेड लीव पर गई महिला उदार हो कर ऐसा करेगी इस में शक है.

क्रेच खोलना: दूसरा विकल्प है क्रेच खोलना. औफिस बिल्डिंग या आसपास के्रच की सुविधा हो तो महिलाओं की समस्या हल हो सकती है. कंपनी की सभी महिला कर्मचारी अपने छोटे बच्चों को क्रेच में छोड़ सकती हैं. इस से वे जब चाहें बच्चों को देख सकती हैं और फिर शांत मन से औफिस के काम कर सकती हैं.

एक विकल्प यह भी है कि सरकार इस मामले में निजी कंपनियों को सपोर्ट करे, महिलाओं को 3 माह मिलने वाली ऐक्स्ट्रा पेड मैटरनिटी लीव का खर्च स्वयं वहन करे. इस से वास्तविक रूप में महिलाओं को इस कानून का फायदा मिल सकेगा.

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