हर इंसान लोभी होता है. इंसान के इसी लोभ और प्राचीन मिथक का ऐतिहासिक पीरियड हौरर फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ में बहुत बेहतरीन चित्रण है. फिल्म में कल्पनाओं व लोककथा के मिश्रण के साथ बहुत सुंदर दृश्यों को पेश किया गया है.

मराठी भाषी उपन्यासकार श्रीपाद नारायण पेंडसे के उपन्यास ‘‘तुम्बाड़चे खोट’’ पर आधारित  फिल्म ‘‘तुम्बाड़’’ की कहानी तीन अलग काल में विभाजित है. जिसकी शुरुआत होती है 1918 से. जहां महाराष्ट्र के तुम्बाड़ नामक गांव में विनायक राव (सोहम शाह) अपनी मां और भाई के साथ रहते हैं. वहां के बाड़े में एक खजाने के छिपे होने की चर्चा होती है, जिसकी तलाश विनायक के साथ साथ उसकी मां को भी है.

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