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अकेलेपन के आईने में जब देखती हूं खुद को!

अकेलेपन के आईने में
जब देखती हूं खुद को!
मुझे नजर आती है वह लड़की
जो किसी को नजर नहीं आती.
सुनाई देने लगती है वह आवाजें
जिसे बाकी दुनिया सुन नहीं पाती.
अकेलेपन के आईने में
जब देखती हूं खुद को!

मुस्कान लिए चेहरे पर एक लड़की
आंखों से गम के गीत गुनगुनाती है.
अनकही और अनसुनी कहानियां
मौन की भाषा में मुझको सुनाती है.
अकेलेपन के आईने में
जब देखती हूं खुद को!

दर्द के दरवाजे बीना किसी
जोर जबरदस्ती के खुल जाते है.
भावनाओं के भंवर उमड़ते
कभी हंसाते तो कभी रुलाते हैं.
अकेलेपन के आईने में
जब देखती हूं खुद को!

कुछ ‘दबा हुआ सा’, जो है मेरे अंदर
वो जोर-जोर से चीखता-चिल्लाता है.
चुपचाप सहते रहने की समझदारी भरी
कैद से छूटने को लेकर छटपटाता है.
अकेलेपन के आईने में
जब देखती हूं खुद को!

चेहरे पर चढ़े नकाब का सच
एकदम से साफ़ नजर आता हैं.
आंखों पर पड़ा पर्दा भी पल भर में
देखते ही देखते ओझल हो जाता है.
अकेलेपन के आईने में
जब देखती हूं खुद को!

भीड़ में होकर भी भाड़ में होने का
अनचाहा अहसास आहत कर जाता है.
गलतफहमी की गलियों से बेदख़ल कर
अकेलापन असलियत के आंगन ले आता है.

– रोशन सास्तिक

दूसरे देशों का पता नहीं, पर हम अपने दोगलेपन में माहिर हैं

दूसरे देशों के नागरिक दोगले हैं या नहीं, पर हम अपने दोगलेपन में माहिर हैं. हमारे नेताओं से ले कर घर के सामने सफाई करने वाले तक कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं और उन की नैतिकता, व्यावहारिकता, रिश्तेदारी, राष्ट्रीयता, भक्ति के पैमाने हर मौके पर बदल जाते हैं. सुबह 4 घंटे पूजा करने वाले घर में मांबहन की गालियां दी जाती हैं और बाहर निकलते ही हम लूट में लग जाते हैं. मंच पर सदाचार का भाषण देने वाले मंत्री कमरे में लौट कर लाखों की रिश्वत लेते हैं.

सब से बड़े दोगले तो वे प्रवचनकर्ता हैं जो सोने के सिंहासन पर बैठ कमसिन लड़कियों से पैर दबवाते सेवा व त्याग का गुणगान करते हैं और धन को माटी समान कहते हैं.

इसी गिनती में विदेशों में बसे भारतीय हैं. वे दोगलेपन के स्पष्ट नमूने हैं. उन्हें अपने देश से हजार शिकायतें हैं, पर कोई उन के देश की जरा सी आलोचना कर दे तो सिर फोड़ने की बात करने लगते हैं (फोड़ते नहीं क्योंकि इतना दम नहीं). अमेरिका में हर 7 में से 1 शख्स अमेरिका से बाहर पैदा हुआ है पर उन में भारतीय ही खास हैं जिन का पाकिस्तानी मूल के उसी देश में रहने वाले उसी देश के नागरिक को देख कर खून खौलता है.

वे अपने देश की गंदगी की भरपूर आलोचना करते हैं पर अगर उन के देश के दौरे पर हों तो भारत के उन्हीं राजनीतिबाजों की जीहुजूरी करते हैं जो उन की निगाहों में निकम्मे और भ्रष्ट हैं. हिंदू धर्म के ये ही सब से बड़े धर्मरक्षक हैं जबकि जानते हैं कि धार्मिक रीतिरिवाजों के कारण ही भारत पिछड़ा हुआ है. वर्ष 2007 से 2017 तक लगभग 8 लाख देशभक्त अपना देश भारत छोड़ कर अमेरिका जा चुके हैं और भारत की गंदगी से मुक्ति पा कर अमेरिका में सैकंड रेट रैजीडैंट बन कर खुश हैं.

भारतीय मूल के लोग इस साल बड़ी संख्या में अमेरिकी चुनावों में भी लगे हैं. वे भारतीय चुनावों में भी दखल देते रहते हैं. दोगलेपन में माहिर ये 2 देशों के नागरिक बने रहते हैं, भारत पर पैदाइशी हक और अमेरिका पर कानूनी.

ये वे ही हैं जो भारत में बंगलादेश से आए लोगों को कोसते नहीं थकते. ये ही भारत के हर मुसलमान को विदेशी मानते हैं. अमेरिका में आधुनिक शिक्षा पाते हैं, तार्किक ज्ञान पाते हैं लेकिन भारत लौट कर पंचांग देख कर शुभ समय देख व पूजापाठ करते हैं.

कुछ समय पहले इन की इज्जत बढ़ी थी जब भारतीय कंपनियों ने सौफ्टवेयर व छोटी मशीनें सस्ते में तैयार करनी शुरू की थीं पर अब ये फिर से ग्रहण में आ गए हैं. ये समाजसेवा के नाम पर मंदिर बनवाते हैं और लगता है अब ये अमेरिकियों की आंखों में चुभने लगे हैं.

अगली पीढ़ी के लिए कमाने की चिंता घटी

समाज की सोच समय के हिसाब से बदलती है और बदलनी भी समय के हिसाब से जरूरी है. आप ने कहावत सुनी होगी कि इतना कमाओ कि सात पीढि़यां आराम से खा सकें. अब यह अंधसोच बन रही है और आज के युवा नई सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं. इसी तरह से कमर झुकने तक नौकरी करते रहने की प्रवृत्ति में भी बदलाव आ रहा है और लोग कम उम्र में ही सेवानिवृत्ति को प्राथमिकता दे रहे हैं. यह खुलासा हाल के एचएसबीसी की भारत, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, मलयेशिया, सिंगापुर, चीन, ब्रिटेन सहित 16 देशों में कराए गए सर्वेक्षण में हुआ है.

सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत में 22 प्रतिशत लोगों की राय है कि उन्हें खुद की सुविधा के लिए कमाना है और अगली पीढ़ी क्या करे और कैसा खाएगी, यह उसे ही तय करना है. नई पीढ़ी को आने वाली पीढ़ी के लिए संपत्ति संग्रहण पर भरोसा नहीं है.

वहीं भारत में 54 प्रतिशत लोग समय से पहले सेवानिवृत्ति चाहते हैं. सेवानिवृत्ति के बाद वे निठल्ले नहीं बैठना चाहते बल्कि अपने लिए नया काम शुरू करना चाहते हैं. नई पीढ़ी की सोच में यह क्रांतिकारी बदलाव है, लेकिन असलियत यह है कि यह बदलाव नई परिस्थितियों के कारण आया है.

पहले नौकरी करना आसान था. बाबू दिन में कभी फुरसत मिलने पर औफिस पहुंचता और हाजिरी रजिस्टर में हस्ताक्षर कर ड्यूटी पूरी कर लेता. सबकुछ हाजिरी रजिस्टर होता था. लेकिन अब हालात बदले हैं. निजी कंपनियों में भी पहले कर्मचारी यूनियन गलत लोगों को बचाने और अपना गुट मजबूत करने में लगी रहती थीं. इस से नियोक्ता के लिए काम कराना मुश्किल था और लोग उम्र के आखिरी पड़ाव में भी बेमन से सेवानिवृत्ति लेते थे. अब स्थितियां बदली हैं और सोच का बदलाव स्वाभाविक है.

‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन नहीं, हिंदू धर्म में कीजिए संशोधन

साल 2013 में कांग्रेसी राज में शुरू की गई अंतर्जातीय विवाह की स्कीम में दूल्हे या दुलहन में से अगर एक दलित है तो ढाई लाख रुपए मिल सकते हैं पर 2014-15 में सिर्फ 5 जोड़ों को यह रकम मिली थी. 2015-16 में 74 जोड़ों को मंजूर की गई थी. कितनों को मिली यह साफ नहीं है क्योंकि इस संस्था की भी लापरवाही वैसी ही है जैसी ‘दलित ऐक्ट’ के मामलों में सजा देने वाली अदालतों की.

दूसरी तरफ जस्टिस अरुण मिश्रा और एमएम शांतनागौदार ने 20 साल काम करने के बाद जाति को जन्म से तय हो जाने का फैसला दे कर तय कर दिया कि न देश से जाति बदली है न आम लोगों का रुख (देखें सरस सलिल जून (प्रथम) 2018 अंक की गहरी पैठ).

देश में कई सर्वों से यही पता चल रहा है कि 95 फीसदी लोग अपनी ही जाति में शादी कर रहे हैं. दलितों की सवर्णों में तो शादी न के बराबर है. इक्कादुक्का शादियां दलितों और पिछड़ों में हो रही हैं. पिछड़े सवर्ण समाज के लिए वे शूद्र ही हैं जो रामायण में केवट और शंबूक हैं और महाभारत में एकलव्य.

फैमिली शादी डौट कौम के पहले ही पेज पर जो फार्म है उस में आयु, भाषा के बाद जाति ही है. मुजफ्फरपुर पुलिस ने 2 लड़कों को एक दलित लड़के की पिटाई 2 साल तक करने पर गिरफ्तार किया. उस का वीडियो वायरल हो गया था. उस का दोष था कि उस के नंबर अच्छे आए थे. वेदों की रक्षा करने वाले ब्राह्मण को ईश्वर का मुख बताया गया है और शूद्र (जो दलित नहीं) ईश्वर की सेवा करने वाले पैर. दलित तो पांचवीं जाति हैं जो जाति बाहर हैं और हाल ही में उन्हें जबरन मन मार कर सहना पड़ रहा है. यह मानसिकता हर रोज फैलाई जा रही है. बारबार दोहराई जा रही है. हर पंडे की किताब में यही लिखा है.

हिंदू समाज की जिस सोच को निशाने पर ले कर ब्राह्मणों ने फूट डालो और राज करो नीति के सहारे देश पर 2000 साल राज किया, आजादी के बाद भी वह सोच नहीं बदली है.

साल 1955 में ‘प्रोटैक्शन औफ सिविल राइट्स’ कानून बना कर छुआछूत को गैरकानूनी बताया गया पर हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते गए. देश में छुआछूत और जातीय भेदभाव बढ़ता गया. ऐसे में 1989 में नया कानून बनाना पड़ा. इस का नाम ‘अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम’ रखा गया. इस कानून में खास बात यह थी कि मुकदमा कायम होने के साथ ही गिरफ्तारी का प्रावधान था. इस कानून को ही ‘दलित ऐक्ट’ के नाम से जाना जाता है.

‘दलित ऐक्ट’ लागू होने के 29 साल बाद भी इस कानून से दलितों को सताना रुक नहीं सका है. सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना है कि इस कानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है. अगर केंद्र सरकार दलित ऐक्ट में संशोधन करना चाहे तो कर सकती है जिस से मुकदमा कायम होते ही गिरफ्तारी का प्रावधान फिर से शुरू हो सके.

पर कड़े कानून किसी भी समस्या का हल नहीं होते हैं. इस से उन का गलत इस्तेमाल बढ़ता है. मुकदमेबाजी बढ़ती है. आपस में नफरत और दूरियां बढ़ती हैं. दहेज कानून, आतंकवाद कानून, महिला हिंसा कानून वगैरह इस के जीतेजागते उदाहरण हैं.

‘दलित ऐक्ट’ के बहाने

वोट बैंक की राजनीति के चलते हर मुद्दे का हल सख्त कानून बना कर किया जाता है. कानून बनाते समय इस के गलत इस्तेमाल पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है. ऐसे कानून को लचीला बना कर विरोधी दल वोट बैंक की रोटियां सेंकने लगते हैं.

‘दलित ऐक्ट’ में सब से बड़ा विरोध मुकदमा कायम होते ही गिरफ्तारी का है. साल 1998 में जब उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा की 6-6 महीने की सरकार बनी थी तब के मुख्यमंत्री काल में तमाम लोगों को मुकदमा कायम होते ही जेल भेज दिया गया था.

मायावती के सरकार से हटने के बाद जब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो इस को लचीला बनाया गया. 2007 में जब मायावती बहुमत की सरकार के साथ मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने कैबिनेट में प्रस्ताव ला कर मुकदमा कायम होने के बाद गिरफ्तारी के मसले को खत्म कर दिया.

2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को बड़ी तादाद में दलित वोट भी मिले. भाजपा ने दलितों की अगुआई करने वाले कई दलों को अपने साथ मिलाया. इन में अपना दल, लोक जनशक्ति पार्टी, आरपीआई खास थीं. इन तीनों के ही नेता अनुप्रिया पटेल, राम विलास पासवान और रामदास अठावले केंद्र सरकार में मंत्री हैं.

केंद्र सरकार में मंत्री रहने के बाद अब एक बार फिर इन को दलितों की याद आई है. इन के लिए एक बार फिर से ‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन का बहाना बन रहा है. अब केंद्र सरकार सहयोगी दलों के दबाव का बहाना बना कर ‘दलित ऐक्ट’ में संशोधन कर रही है.

भाजपा की परेशानी यह है कि अगर लोकसभा चुनाव में सपाबसपा का गठबंधन हो गया तो उस की करारी हार तय है. ऐसे में ‘दलित ऐक्ट’ के बहाने भाजपा दलितों को पार्टी के साथ जोड़ना चाहती है.

दरअसल, लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीटें एससी और 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. इन 131 सीटों के अलावा कई ऐसी सीटें हैं जहां दलित वोट जीत के लिए जरूरी हो जाते हैं.

लोकसभा के साथ ही साथ देशभर की विधानसभा सीटों में 607 सीटें एससी और 554 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. सभी दलों को यह लगता है कि ऐसे मुद्दों को उठा कर जीत हासिल की जा सकती है.

आबादी की बात की जाए तो देश में तकरीबन 25 करोड़ दलित हैं. ये कुल आबादी का तकरीबन 24 फीसदी हैं. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु में इन की आबादी ज्यादा है. लिहाजा, चुनावी गणित के हिसाब से दलितों का साथ जरूरी है.

इमेज सुधारने की कोशिश

भारतीय जनता पार्टी के राज में ‘दलित ऐक्ट’ से जुड़ी वारदातें पूरे देश में बढ़ीं. गुजरात में दलितों को सताने की घटनाएं पूरे देश में देखीसुनी गईं.

महाराष्ट्र का कोरेगांव भी दलितों को सताने का गवाह बना. उत्तर प्रदेश में हालात सब से खराब नजर आने लगे.

कासगंज के बसई गांव के रहने संजय जाटव की शादी निजामपुर गांव की शीतल के साथ तय हुई. संजय ने सोचा था कि वह अपनी शादी में घोड़ी पर चढ़ेगा. उस के गांव में अभी तक किसी दलित ने घोड़ी पर चढ़ कर शादी नहीं की थी. इस की वजह यह थी कि यहां के ठाकुर बिरादरी के लोग नहीं चाहते थे कि दलित घोड़ी पर चढ़ें.

इन लोगों के विरोध को देखते हुए संजय जाटव ने दिल्ली की अदालत में गुहार लगाई. अदालत ने प्रशासन को आदेश दिया कि वह सुरक्षा दे कर घोड़ी पर दलित संजय की बरात निकलवाए.

कासगंज जिला प्रशासन ने 37 लोगों से निजी मुचलका भरवाया. तकरीबन 300 सुरक्षाकर्मियों की देखरेख में दलित संजय की घोड़ी पर बरात निकल सकी.

जिस दिन गांव में बरात निकली, वहां के ठाकुर परिवार अपने घरों में ताला बंद कर गांव से बाहर चले गए थे.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 58 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के वारासगवर इलाके के सथनी गांव में 22 फरवरी को 19 साल की मोनी नामक लड़की को जिंदा जलाने की घटना घट गई.

एक दिन मोनी साइकिल से अपने गांव से बाजार की तरफ जा रही थी. इतने में कुछ लड़के आए और साइकिल से उसे गिरा कर खेतों में खींच लिया और इस के बाद पैट्रोल छिड़क कर आग लगा दी.

जान बचाने के लिए मोनी सड़क की ओर भागी पर उस की मदद करने वाला कोई नहीं था. बदमाश आग लगा कर भाग गए. मोनी जल कर मर गई.

पुलिस ने 2 दिन बाद विकास नामक एक लड़के को पकड़ कर जेल भेज दिया. विकास पर आरोप है कि उस की मोनी से दोस्ती थी. दोस्ती में दरार पड़ी तो उस ने यह कांड कर दिया.

उन्नाव की घटना से कुछ ही दिन पहले उत्तर प्रदेश की शिक्षा नगरी कहे जाने वाले इलाहाबाद शहर में एक दलित नौजवान को रैस्टोरैंट में पीटपीट कर मार डाला गया था. मारपीट की वजह छोटी सी थी. इन दोनों घटनाओं में लोगों ने सरेआम किसी अकेले को मारा था.

पूरे देश में दलितों को सताने की घटनाओं के विरोध में 2 अप्रैल, 2018 को दलित संगठनों ने भारत बंद कराया था. इस दौरान हिंसक झड़पों में 12  लोगों की मौत हो गई. इस से भाजपा पर दलित को सताने का आरोप लगा.

सुप्रीम कोर्ट की ‘दलित ऐक्ट’ में सुधार की बात के विरोध में इस बंद का आयोजन किया गया था. भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट में फैसला देने वाले जस्टिस एके गोयल को एनजीटी का अध्यक्ष बना दिया. इस बात को ले कर दलित समर्थक नाखुश थे. भाजपा को सहयोग देने वाले दल भी यह सोच रहे थे कि 2014 वाली कामयाबी 2019 के लोकसभा चुनावों में नहीं मिलेगी. ऐसे में चुनाव से पहले ‘दलित ऐक्ट’ को मुद्दा न बना दिया जाए. ‘दलित ऐक्ट’ में सुधार कर भाजपा दलितों की हमदर्द बनने का दिखावा कर रही है.

समाज में दबंगई करने वाले लोग सरकार बदलने के साथ खुद को सरकार के एजेंडे में फिट कर लेते हैं. बसपा के राज में वे दलितों के हमदर्द बन जाते हैं, तो अखिलेश राज में वे समाजवाद का चोला ओढ़ लेते हैं. योगी राज में हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर यह चोला बदल चुके हैं.

हिंदू रक्षा के नाम पर दबंग और गुंडे सक्रिय हो गए हैं. वे भगवा गमछाधारी बन गए हैं. अब इन को किसी पार्टी के झंडे की जरूरत नहीं रह गई है.

ऐसे दबंग भीड़ जुटाने में भी आगे हो जाते हैं. जहां अच्छे काम में 5 लोग एकसाथ नहीं खड़े होते, वहां ये लोग हत्या जैसे बड़े अपराध करने पर भी बहुत से लोगों को तैयार कर लेते हैं.

उन्नाव और इलाहाबाद की दोनों ही घटनाओं में दबंग का साथ देने वाले दूसरे लोग भी थे. कासगंज में हुए दंगे में भी ऐसे ही दबंग शामिल थे. इन को कानून की परवाह नहीं होती. कासगंज में धारा 144 लागू होने के बाद भी ‘तिरंगा यात्रा’ निकालने की इजाजत लेने की जरूरत नहीं समझी गई.

असल में कानून का उल्लघंन एक छूत की बीमारी की तरह है. एक को कानून तोड़ते देख दूसरा भी कानून तोड़ कर मजे लेना चाहता है. एक कानून को तोड़ कर बच जाता है तो दूसरे को भी लगता है कि कानून बेकार है. देश में अगर कानून का राज होता, तो लोगों में कानून का डर होता तो ऐसी घटनाएं नहीं होतीं.

गौरक्षा और धर्म के नाम पर कानून तोड़ने वाले जब बचने लगे तो दूसरे दबंगों का भी मनोबल बढ़ने लगा. जाति की खाई लगातार गहरी होती जा रही है. ऐसे में जब लोगों को यह लगता है कि सामने वाला उस से नीची जाति का है तो वह और भी ज्यादा हिंसक हो कर उस को पीटने लगता है.

धर्म की आड़ में प्रवचनों के द्वारा लोगों कोे यह लगातार बताया जा रहा है कि समाज में अलगअलग खेमे भगवान की देन हैं. पिछले जन्मों में किए गए पापों का फल हैं.

गुमराह न हों दलित

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने हिंदुत्व के नाम पर दलितों को अपने साथ मिला लिया था, जिस की वजह से आरक्षित सीटों में से तकरीबन

50 फीसदी सीटें भाजपा को मिल गई थीं. देश के तमाम बड़े दलित नेता भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और अब वे भाजपा के साथ हैं.

दलित तादाद में ज्यादा हैं. उन के पास वोट हैं. ऐसे में नेता उन को साथ रख कर वोट लेने तक उन के साथ रहते हैं. बाद में वे उन की मूल समस्याओं पर चुप हो जाते हैं. दलित अपने से ऊंची जातियों से मेलजोल नहीं रख पाते हैं.

दलित घटनाओं के पीछे की सामाजिक सोच बताती है कि देश और समाज कितना भी बदल जाए पर दलितों को वैसा ही रहना चाहिए जैसे वे सदियों से रहते आए हैं. आज भी भेदभाव बना हुआ है. ऐसे में यह स्वाभाविक बात है कि केवल कानून बना लेने से दलितों का भला नहीं होने वाला.

दलितों को इस बात से कोई सरोकार नहीं कि उन को मंदिर में पूजापाठ का हक मिल गया है. आरक्षण के नाम पर दलितों का सारा फायदा अगड़े दलित ले रहे हैं.

ऐसे में यह जरूरी है कि आरक्षण का सही फायदा दलितों तक पहुंचाने का इंतजाम हो. जब तक हर दलित माली तौर पर मजबूत नहीं होगा तब तक उस में बराबरी का भाव नहीं आएगा. कमजोर दलित पढ़ाईलिखाई के अलावा सेहत और रहनसहन से भी पिछड़ता रहेगा.

‘दलित ऐक्ट’ के नाम पर दलितों को बरगलाने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला. कानून बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि उस का गलत इस्तेमाल न किया जा सके. कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों को भी वही सजा मिले जो कानून तोड़ने वाले के लिए तय होती है.

लड़की फंसाने के चक्कर में खुद फंसे

भोपाल के बागसेवनिया इलाके के कान्हासैया बिलखिरिया इलाके के रहने वाले गुड्डू चौहान ने अब लड़कियों और उन की दोस्ती से तोबा कर ली है. दरअसल, गुड्डू चौहान के खिलाफ एक लड़की पुष्पा (बदला नाम) ने 24 मई, 2018 को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि गुड्डू ने शादी का झांसा देते हुए एक साल तक उस के साथ बलात्कार किया और फिर शादी के अपने वादे से मुकर गया. हुआ यों था कि 25 साला गुड्डू चौहान और 20 साला पुष्पा की दोस्ती कुछ ज्यादा ही गहरा गई थी. उन के बीच रजामंदी से जिस्मानी ताल्लुकात बने थे. भोपाल में तो इन दोनों के बीच संबंध बनते ही थे पर एक दफा गुड्डू पुष्पा को घुमाने अहमदाबाद भी ले गया था. वहां भी उन दोनों के बीच हमबिस्तरी हुई थी.

भोपाल आ कर पुष्पा ने गुड्डू चौहान पर शादी के लिए दबाव डाला तो वह साफ मुकर गया. इस पर तिलमिलाई पुष्पा को अहसास हुआ कि अब तक जो हो रहा था वह रजामंदी नहीं बल्कि जबरदस्ती थी इसलिए उस ने पुलिस का सहारा लिया. बागसेवनिया थाने में रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस वाले गुड्डू चौहान को जबरदस्ती उठा लाए और उस पर मुकदमा दर्ज कर दिया.

फंसे या फंसाया

गुड्डू चौहान और पुष्पा जैसे मामले रोशनी में आना अब रोजमर्रा की बात हो चली है, जो पहले दोस्ती, फिर प्यार और फिर जिस्मानी ताल्लुकात में बदल जाते हैं. हालांकि इस में लड़का लड़की को बिस्तर तक जबरदस्ती नहीं ले जाता, बल्कि बाकायदा पटाता है.

जमाना जिस तेजी से बदल रहा है उस से ज्यादा तेजी से प्यारमुहब्बत के माने बदल रहे हैं. अब वह जमाना लदे ही एक जमाना गुजर गया जब लड़का सालों तक गली में लड़की की एक झलक पाने के लिए एक पैर पर खड़ा रहता था. लड़की प्यार की उस की पेशकश कबूल कर लेती थी तो वह तो दीवानों की तरह नाचने लगता था. प्यार और दोस्ती करने लायक लड़कियां अब राह चलते मिल जाती हैं.

अब प्यार के माने बेहद साफ हैं कि पहले दोस्ती और फिर सीधे हमबिस्तरी. इस दौरान अगर दोनों एकदूसरे को जम जाएं तो शादी भी हो जाती है, नहीं तो कुछ महीनों या सालों बाद दोनों एकदूसरे को बायबाय कर के नए पार्टनर की तलाश में निकल पड़ते हैं.

यह सौदा या चलन कतई हर्ज की बात नहीं पर मुसीबत उस वक्त खड़ी हो जाती है जब लड़की यह इलजाम लगाने लगती है कि वह तो भोलीभाली और दूध की धुली है जिसे उस के दोस्त या आशिक ने जबरदस्ती मैला कर दिया है, लिहाजा उसे सजा मिलनी चाहिए.

चूंकि जबरदस्ती की बात अकसर अदालत में साबित नहीं हो पाती है इसलिए आशिक रिहा तो हो जाता है लेकिन पुलिस और कोर्टकचहरी के दौरान जो परेशानियां वह झेलता है उन्हें जिंदगीभर नहीं भूलता.

इस बात पर कई दफा अदालतें भी हैरानी जता चुकी हैं कि कैसे कोई लड़का लंबे वक्त तक लड़की से जिस्मानी संबंध बनाता रहा, भले ही उस ने वादा शादी का किया हो या फिर दूसरा कोई लालच दिया हो? लड़की ने तब कोई एतराज क्यों नहीं जताया था? एतराज उसी वक्त क्यों जताया गया जब लड़का पल्ला झाड़ने लगा?

इस बात के कानूनी माने अलग हैं लेकिन ऐसे मामले गुड्डू चौहान जैसे लड़कों के लिए सबक हैं कि अकसर लड़की को फंसाना या पटाना बहुत महंगा पड़ जाता है जिस में पैसों की बरबादी के साथसाथ इज्जत की भी फजीहत होती है. इस बाबत लड़की को पुलिस थाने जा कर एक रिपोर्ट दर्ज करानी होती है.

लड़कियां जब फंस जाती हैं तो लड़कों का दिल बल्लियों उछलने लगता है. इस दौरान वे माशूका का दिल जीतने के लिए उन पर तबीयत से पैसा लुटाते हैं और कभीकभी शादी करने का झूठा वादा भी कर लेते हैं, जबकि वे बेहतर जानते हैं कि शादी करना उन का मकसद नहीं, बल्कि मंशा वक्त काटना और मौजमस्ती करना है, वह भी ऐसे कि मामला जोरजबरदस्ती का न लगे.

लड़की जब हायहाय करते हुए थाने जा पहुंचती है तो ऐसे मजनुओं को समझ आता है कि असल में उन्होंने लड़की को नहीं फंसाया था बल्कि लड़की उन्हें फंसा रही थी. इस बात का अहसास भी उन्हें हो जाता है कि एक ऐसा जुर्म उन के सिर मढ़ दिया गया है जो उन्होंने किया ही नहीं है.

क्या है दिक्कत

प्यार या हमबिस्तरी करना जुर्म नहीं है और इस बात को कानून भी मानता है कि अगर 2 बालिग अपनी मरजी से हमबिस्तरी करें तो वह कोई गुनाह नहीं होता. इस के बाद भी कानून अकसर लड़कियों के साथ है तो इस बात की भी अपनी अलग अहमियत है कि कहीं सचमुच लड़कियों को प्रेमजाल में फंसा कर उन्हें लड़के धोखा देते हुए उन की जिंदगी बरबाद न करें.

यह बात जाने क्यों कोई नहीं सोचता कि इज्जत लुटने, प्यार में बरबाद होने और धोखा खाने की फरियाद ले कर लड़कियां ही थाने और अदालत क्यों जाती हैं, लड़के क्यों नहीं जाते हैं?

इस बहस से परे अहम बात लड़कों की लड़की फंसाने की वह सोच है जिसे वे शान और मर्दानगी समझते हैं और यारदोस्तों के बीच इस के किस्से भी सुनाते हैं. प्यार हो या रजामंदी हो, जब जिस्मानी ताल्लुकात बनते हैं तो इस मर्दानगी में और चार चांद लग जाते हैं.

आफत कब और कैसे खड़ी होती है, यह लड़की की रिपोर्ट के बाद लड़कों को समझ आता है, जिस में कई दफा उन का कैरियर भी दांव पर लग जाता है.

एहतियात बरतें

लड़के अकसर जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के चक्कर में लड़कियों के हाथों नाचने लगते हैं और उन्हें पूरा हासिल करने के चक्कर में उन की शादी की जिद भी मान लेते है. कानून जिरह के दौरान यह तय करता है कि सुबूतों की बिना पर आरोप सही था या गलत था.

लिहाजा, कभी लड़की, चाहे वह दोस्त हो या माशूका, से भूल कर भी शादी का झूठा वादा नहीं करना चाहिए. उसे साफसाफ बता देना ही बेहतर होता है कि आप उस से संबंध तो बना सकते हैं पर शादी नहीं कर सकते. इस के बाद वह राजी हो तो कोई अड़ंगा पेश नहीं आता.

लड़की के दबाव में अकसर लड़के फेसबुक, ह्वाट्सऐप या लव लैटर्स में शादी का वादा कर लेते हैं जो बाद में उन्हें फंसा देते हैं और न केवल अदालत में बल्कि जाति, समाज और रिश्तेदारी में भी ऐसे अहम सुबूत लड़के के गले का फंदा बन जाते हैं, इसलिए इस तरह के वादे सोचसमझ कर करने चाहिए.

भोपाल के गुड्डू चौहान की तरह कई लड़के गर्लफ्रैंड या माशूका को मौजमस्ती की गरज से घुमानेफिराने शहर से बाहर ले जाते हैं और जहां भी होटल में ठहरते हैं वहां आईडी प्रूफ देते हैं. यह बात अकसर लड़की के हक में जाती है.

कोशिश यह होनी चाहिए कि लड़की अगर जिस्म सौंपने के एवज में शादी का वादा करे तो उस से बचना चाहिए, खासतौर से सोशल मीडिया और लव लैटर्स में झूठी हां नहीं करनी चाहिए.

यह ठीक है कि लड़की भी सबकुछ अपनी मरजी से कर रही होती है लेकिन पुष्पा की तरह वह कब पुलिस थाने जा पहुंचे इस की कोई गारंटी नहीं, इसलिए एहतियात बरतना जरूरी है.

कई दफा कंडोम इस्तेमाल न करने से लड़कियां पेट से हो आती हैं. ऐसी हालत में वे पुलिस और अदालत में जाएं तो लड़कों का बचना मुश्किल हो जाता है. वजह, आजकल इस बाबत डीएनए टैस्ट होने लगा है और लड़के चाह कर भी झूठ बोल कर खुद को बचा नहीं सकते.

ऐसे भी फंसाती हैं

आजकल की लड़कियों की सोच काफी बोल्ड होती जा रही है जो रजामंदी को जबरदस्ती बता कर ब्लैकमेल करने से भी नहीं चूकतीं.

कई मामलों में तो लड़कियां जानबूझ कर अपना सबकुछ लड़कों को सौंप देती हैं और इस के सुबूत भी इकट्ठा करती रहती हैं जिस से उन्हें फंसाया जा सके.

ऐसा ही एक दिलचस्प और सबक सिखाने वाला मामला जून, 2018 के आखिरी हफ्ते में उजागर हुआ था. दिल्ली के एक कारोबारी पीएन विजय को पटना की एक लड़की प्रियंका ने फेसबुक पर अपने प्रेमजाल में फंसा कर 10 करोड़ रुपए ऐंठ लिए थे. प्रियंका पटना के साकेतपुरी इलाके के रघुवरी कौंप्लैक्स के फ्लैट नंबर 404 में रहती थी.

फेसबुकिया प्यार में ही इतनी भारीभरकम रकम लुटाने के बाद पीएन विजय को अपने ठगे जाने का अहसास हुआ तो उस ने दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच में इस की रिपोर्ट लिखाई. पुलिस प्रियंका को दिल्ली ले कर आई तो पता चला कि वह तो पहले से ही शादीशुदा है और प्यारमुहब्बत की जज्बाती बातें करते हुए पीएन विजय से पैसे ऐंठ रही थी. इस काम में उस का पति सुमन भी साथ दे रहा था.

यह रकम पीएन विजय ने प्रियंका द्वारा बताए गए दर्जनभर अलगअलग बैंक खातों में जमा की थी. जब पीएन विजय ने पैसे देने बंद कर दिए तो प्रियंका उसे सोशल मीडिया की बातचीत की बिना पर पुलिस में जाने की धमकी देने लगी थी.

अब इस मामले की जांच चल रही है लेकिन पीएन विजय मालीतौर पर अच्छाखासा लुटपिट चुका है. उसे भी यह अंदाजा नहीं था कि वह जिसे फंसाना समझ रहा है वह असल में खुद फंसना है.

बेहतरी तो इसी में है कि लड़की से दोस्ती या इश्क की राह में कदम फूंकफूंक कर रखे जाएं, नहीं तो लेने के देने पड़ जाते हैं.

लांबा की ढाणी : खुद लिखी तरक्की की इबारत

राजस्थान के चूरू जिले में एक अनूठा गांव है, जहां एक भी मंदिर नहीं है. इस गांव के लोग किसी धार्मिक कर्मकांड में विश्वास ही नहीं करते हैं. हैरत की बात तो यह है कि यहां मरने वालों की अस्थियों को बहते पानी में बहाया नहीं जाता है. यह है चूरू जिले की तारानगर तहसील का गांव ‘लांबा की ढाणी’. यहां के लोग सिर्फ काम करने में यकीन करते हैं. इसी के दम पर आज यहां के लोग पढ़ाईलिखाई, चिकित्सा व कारोबार के क्षेत्र में कामयाबी हासिल कर अपने गांव को देशभर में नई पहचान दे रहे हैं. सब से बड़ी बात तो यह है कि तकरीबन 105 घरों की आबादी वाले इस गांव में तकरीबन 100 घर जाटों के हैं, 5 घर नायकों के और तकरीबन 10 घर मेघवाल समाज के हैं.

यहां के लोगों ने नैशनल लैवल पर भी अपनी पहचान बनाई है. गांव लांबा की ढाणी से तकरीबन 25-30 नौजवान सेना में, इतने ही पुलिस में, 20 के आसपास रेलवे में और तकरीबन 25 से ज्यादा लोग चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर नाम कमा रहे हैं. इस ढाणी के 5 नौजवानों ने खेलों में नैशनल लैवल पर पदक हासिल किए हैं, वहीं 2 नौजवान खेल कोच भी हैं.

आप को जान कर सुखद हैरानी होगी कि गांव के 2 लोग इंटैलीजैंस ब्यूरो में अफसर हैं वहीं तकरीबन  2 प्रोफैसर, 7 वकील और 35 अध्यापक हैं.

गांव के रहने वाले 80 साल के वकील बीरबल सिंह लांबा ने बताया कि गांव में तकरीबन 65 साल पहले यहां के रहने वालों ने सामूहिक रूप से तय किया कि गांव में किसी की मौत पर उस का दाह संस्कार तो किया जाएगा, लेकिन अस्थियों को नदी में बहाया नहीं जाएगा. यहां दाह संस्कार के बाद बची हुई अस्थियों को गांव वाले फिर से जला कर राख में बदल देते हैं.

खेती प्रधान गांव

यह गांव पूरी तरह से खेती प्रधान है. यहां के गांव प्रधान ने बताया कि लोगों को मंदिर जैसी संस्था में शुरू से ही विश्वास नहीं था. दूसरी वजह थी, लोगों का सुबह से शाम तक मेहनत के कामों में ही लगे रहना. बहरहाल, यहां के लोग नास्तिक भी नहीं हैं, लेकिन धार्मिक अंधता जैसी चीज यहां दिखाई नहीं देती. मंदिर के नाम पर गांव के प्रधान कहते हैं कि ग्रामवासी कहा करते थे कि ‘मरण री फुरसत कोने, थे राम के नाम री बातां करो हो’ (यहां मरने की भी फुरसत नहीं है और आप राम नाम की बात कर रहे हो).

गांव के एक और बाशिंदे और जिला खेल अधिकारी ईश्वर सिंह लांबा का कहना है कि गांव के लोग अंधविश्वास से कोसों दूर हैं. इसी वजह से वे अपनी कोशिशों के बूते प्रशासनिक सेवा, वकालत, चिकित्सा, सेना और खेलों में गांव का नाम रोशन कर रहे हैं.

पैसा बचाना है और परफैक्ट लुक पाना है, तो आजमाएं ये टिप्स

सही मेकअप के लिए त्वचा की रंगत के हिसाब से सही रंग के कौस्मैटिक्स का चयन करें. इन्हें किस प्रकार लगाया जाए कि आप की सुंदरता निखर जाए, उस के लिए कुछ टिप्स पेश हैं:

मेकअप करने के स्टैप्स

प्राइमर, कंसीलर, फाउंडेशन, कंटूरिंग, हाइलाइटिंग, पलकों को कर्ल करना, आईशैडो, मसकारा, आईब्रोज, गाल, होंठ.

वाटरपू्रफ मेकअप

गरमी के मौसम में मेकअप इस प्रकार किया जाए कि पसीना और उमस उसे खराब न कर पाए. इस मौसम में वाटरप्रूफ मेकअप करना ही बेहतर रहता है. यह न केवल आप के चेहरे पर लंबे समय तक टिकेगा बल्कि इस से आप फ्रैश और प्रेजैंटेबल भी लगेंगी.

कैसे करें वाटरप्रूफ मेकअप

वाटरप्रूफ मेकअप रूखी त्वचा पर तो लंबे समय तक टिकता है क्योंकि यह औयल सोख लेती है, लेकिन तैलीय त्वचा पर आप जितना चाहे मेकअप कर लें वह 3-4 घंटे से अधिक नहीं टिकता. गरमी के मौसम में रूखी त्वचा पर वाटरप्रूफ मेकअप करने पर कोई परेशानी नहीं आएगी, लेकिन अगर त्वचा तैलीय है तो मेकअप करते समय इन बातों का खास खयाल रखें:

– अगर आप की त्वचा औयली है, तो मेकअप करने से पहले हीट और स्वैटिंग को कम करने के लिए त्वचा पर बर्फ लगाएं.

– फाउंडेशन का इस्तेमाल कम से कम करें. इस से स्वैटिंग कम होगी और मेकअप भी अधिक समय तक टिकेगा.

– गरमियों में फाउंडेशन के बजाय पैन केक लगाएं.

– लिपस्टिक और आईशैडो के लिए न्यूड शेड्स का इस्तेमाल करें. इस से मेकअप अच्छा दिखेगा और देर तक भी टिकेगा.

पार्टी के लिए मेकअप टिप्स

पार्टी के लिए ड्रैस ही नहीं मेकअप का भी खास ध्यान रखना पड़ता है. पार्टी में जाने के लिए जल्दबाजी में मेकअप न करें. एक मेकअप प्रोडक्ट के सूखने के बाद ही दूसरा लगाएं. मेकअप करते समय सब से पहले प्राइमर लगाएं. इस से चेहरे के दाग छिप जाते हैं, छेद भर जाते हैं, मेकअप में शाइन और त्वचा पर ग्लो आ जाता है.

प्राइमर के बाद कंसीलर लगाएं. इस से चेहरे की सभी कमियां छिप जाती हैं. मेकअप को एक अलग निखार देने के लिए चेहरे पर प्रिक्सी डस्ट को स्प्रिंकल करें. भौंहों और गालों पर स्प्रिंंकल अधिक करें. मेकअप पूरा होने के बाद भी समयसमय पर उस का टचअप करती रहें.

औफिस के लिए मेकअप टिप्स

कुछ महिलाएं औफिस में मेकअप कर के जाना पसंद नहीं करती हैं, तो कुछ ज्यादा मेकअप कर लेती हैं. अत: औफिस जाते समय हलका मेकअप करने से न केवल आकर्षक लगेंगी बल्कि ट्रैंडी भी नजर आएंगी. पेश हैं, कुछ टिप्स:

– औपचारिक वातावरण में हमेशा लाइट मेकअप करें.

– ज्यादा भड़कीली लिपस्टिक न लगाएं.

– आईशैडो न लगाएं, काजल या आईलाइनर लगाएं.

– ग्लिटर्स या स्पार्कल्स का प्रयोग न करें.

– चेहरे के दागधब्बों को छिपाने के लिए कंसीलर का प्रयोग करें.

लेटैस्ट ट्रैंड है हाई डैफिनेशन मेकअप

आजकल हाई डैफिनेशन कैमरों का चलन है, जिन की नजरों से चेहरे की छोटीछोटी डिटेल्स जैसे महीन रेखाओं, झुर्रियों, दागधब्बों को छिपाना मुमकिन नहीं है, इसलिए हाई डैफिनेशन मेकअप यानी एचडी मेकअप का चलन तेजी से बढ़ रहा है.

सैलिब्रिटीज ही नहीं, आम महिलाएं भी यह मेकअप कराना पसंद कर रही हैं. बाजार में सभी नामी ब्रैंड्स के एचडी मेकअप उपलब्ध हैं, जिन में माइका, सिलिकौन, क्रिस्टल्स या क्वार्ट्ज में से कोई एक जरूर होता है. ये कण त्वचा की सब से ऊपरी परत पर जम जाते हैं और लाइट को बिलकुल महीन किरणों के रूप में फैलाते हैं. कुछ एचडी मेकअप्स में मैटीफाइंग एजेंट्स होते हैं, जो तैलीय त्वचा में चमक को रोकते हैं और ग्लेयर से बचाते हैं. अगर आप की त्वचा साफ है तो लिक्विड फाउंडेशन का इस्तेमाल करें और अगर स्किन खराब है तो मैट का इस्तेमाल करें, क्योंकि ये थोड़ी मोटी परत बनाते हैं.

– सौरव कश्यप, मेकअप आर्टिस्ट, नई दिल्ली

इस तरह पहले से ज्यादा हसीन बन जाएगा एक दूजे का साथ

हालफिलहाल दिल्ली और उस के आसपास घटी कुछ घटनाओं पर गौर करें-

24 अप्रैल, 2018 को दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में विनोद नाम के एक शख्स ने अपने बेटे के सामने अपनी 38 वर्षीय पत्नी सविता को हथौड़े से पीटपीट कर मार डाला.

सविता और विनोद की शादी 18 साल पहले हुई थी. दोनों के बीच अकसर झगड़ा होता था. इस वजह से दोनों अलगअलग फ्लोर पर रहने लगे थे. उन की 2 बेटियां और 1 बेटा था.

22 अप्रैल को दिल्ली के ही रंजीत नगर में क्व50 हजार न देने पर पत्नी ने व्यवसायी पति की पिटाई कर दी. इन दोनों की शादी को 27 साल हो चुके हैं.

पिछले साल पत्नी की कुछ सीक्रेट बातें पता लगने के बाद दोनों के संबंधों में खटास आ गई थी. इस वजह से पतिपत्नी अलगअलग कमरे में रहते थे.

6 अप्रैल को दिल्ली में रहने वाले एक दंपती के बीच हुई तकरार मारपीट तक पहुंच गई.

पति ने पत्नी को कमरे में बंद कर लातघूसों से इतना पीटा कि उस के पेट का औपरेशन करना पड़ा.

16 अप्रैल को गुरुग्राम में अपनी 32 वर्षीय पत्नी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार शख्स से जब पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया.

गुरुग्राम के सैक्टर 92 में रहने वाले हरिओम ने बताया कि उस की पत्नी फेसबुक और व्हाट्सऐप पर इतनी व्यस्त रहती थी कि घर का कोई काम नहीं करती थी. समय पर खाना न देना, पति का खयाल न रखना उस की आदत बन गई थी. इन सब बातों से आजिज आ कर उस ने पत्नी की हत्या कर दी.

कहते हैं न ‘शादी का लड्डू जो खाए वह भी पछताए और जो न खाए वह भी पछताए’. हालांकि हम इस कहावत को मजाक में लेते हैं, मगर हकीकत में जिस ने भी यह कहावत बनाई है उस ने जरूर शादी के पहले व बाद के पहलुओं को संजीदगी से समझा होगा.

मैक्स अस्पताल की डा. दीपाली बत्रा (साइकोलौजिस्ट) कहती हैं कि शादी के समय प्यार व खुशियों से भरी जिंदगी की कल्पना उस समय धरातल पर आ जाती है जब रोजमर्रा की जिंदगी में दोनों को एकदूसरे के प्रति शिकायतें होने लगती हैं. आपस में विचार न मिलना, एकदूसरे को समय न देना, एकदूसरे की इच्छाओं का खयाल न रखना जैसी समस्याओं के कारण वे खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं.

शोधों के अनुसार करीब 10 में 6 विवाहित जोड़े रिश्ते को बचाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह लेते हैं.

हाल ही में एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में हर साल करीब 1.3 लाख शादियां रजिस्टर होती हैं. इन में से करीब 10 हजार जोड़े शादी से खुश नहीं रहते.

तनाव के कारण एकदूसरे से अलग होने के लिए तलाक के मामलों में भी लगातार वृद्धि हो रही है. पतिपत्नी एकदूसरे से इतने आजिज आ जाते हैं कि हत्या करने से भी नहीं हिचकते.

रिश्तों में कड़वाहट के कारण मैरिटल डिसप्यूट रिसौल्विंग एजेंसी ने शादी में आए तनावों के कारणों को जानने के लिए सर्वे में 243 प्रतिभागियों को शामिल किया.

इस सर्वे में कई कारण सामने आए जिन में 24% व्यक्तिगत समस्याएं या बीमारी, 23% शादी के दौरान मिलने वाला पैसा, सामान और 21% मामले आपसी तालमेल न होने के भी पाए गए.

इन के अलावा क्रूरता, फ्रौड, उम्मीदों पर खरा न उतरना, संसाधनों में कमी जैसे कारण भी सामने आए.

बदलती अपेक्षाएं

एक युवती के उद्गार, ‘‘शादी से पहले मेरा बौयफ्रैंड एकदम अलग था. हम दोनों के बीच बहुत अंडरस्टैंडिंग थी. लेकिन शादी के बाद वह बिलकुल बदल गया है. मुझ से कहता है कि अब मुझे बदलना होगा और उस के मातापिता के हिसाब से चलना होगा. मेरी भी कोई इन्डिविजुएलिटी है.’’

अकसर शादी के बाद लड़की से उम्मीद की जाती है कि वह आधुनिक लड़की से पारंपरिक तौरतरीकों वाली महिला बन जाए. उसे इस दोहरी जिंदगी के लिए मजबूर किया जाता है.

बढ़ती जिम्मेदारियां सीमित अधिकार

कई महिलाएं शादी के बाद काम करना चाहती हैं, लेकिन उन से ऐसा न करने की उम्मीद की जाती है. कई दफा काम करने वाली महिलाओं से घर भी संभालने और कमाई भी घर में देने की उम्मीद की जाती है. परिवारों में घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करना भी विवाद का विषय बनता है. यही नहीं वित्तीय फैसले, यहां तक कि सामान्य फैसले लेना भी अभी तक पुरुषों का एकाधिकार माना जाता है.

शीरोज से जुड़ी मनोवैज्ञानिक और लाइफ कोच मोनिका मजीठिया कहती हैं, ‘‘परिवार शुरू करने के लिए अकसर महिलाओं को अपना कैरियर छोड़ना पड़ता है. आज के समय में महिला सिर्फ वित्तीय कारणों के लिए काम नहीं करती, बल्कि वह इस माध्यम से खुद को व्यक्त करना चाहती है. वैवाहिक संघर्ष की सब से बड़ी वजह यह है कि महिलाएं अपनी राय व्यक्त करने और निर्णय लेने की आजादी चाहती हैं, लेकिन विवाह के बाद यही बात झगड़ों की खास वजह बन जाती है.’’

जब हमें यह लगने लगता है कि तमाम कोशिशों के बावजूद कोई फायदा नहीं हो रहा है और स्थिति खराब होती जा रही है, तो भी हताश होने की जरूरत नहीं.

नयामत बावा कुछ उपाय बता रही हैं, जिन्हें अपना कर अपने संबंधों में पहले जैसी गरमाहट ला सकते हैं:

बात करें: बातचीत का रास्ता सदैव खुला रखें. आप के मन में जो है पार्टनर को जरूर बताएं. यही नहीं उस की सुनें भी. हम जैसा महसूस करते हैं वैसे ही कदम भी उठाते हैं. हम में से ज्यादातर लोगों को बस इस बात की परवाह रहती है कि मेरी बात को कितना सुना या समझा गया. इस बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं कि सामने वाले की बात सुनना और समझना भी जरूरी होता है.

एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं:  इस में कोई हैरानी वाली बात नहीं है कि हमारा पार्टनर हमारे साथ भरपूर क्वालिटी टाइम नहीं बिताता. ऐसा शायद इसलिए भी महसूस हो सकता है क्योंकि आप ने जो भी समय साथ बिताया हो वह एकदूसरे से झगड़ते हुए अथवा यह सोच कर कि फिर से झगड़ा न हो जाए, आप ने ठीक से बातचीत ही न की हो. साथ में कोई काम करते हुए वक्त बिताने से पार्टनर के साथ संबंध गहरे होते हैं.

संबंधों में सकारात्मकता ढूंढ़ना: अकसर हमारे दिमाग में सिर्फ यही खयाल हावी होने लगता है कि हमारे संबंधों में क्या गलत चल रहा है. ऐसे में आप उन सकारात्मक चीजों को भी नजरअंदाज कर देते हैं, जो आप दोनों के बीच चल रही होती हैं. अपने पार्टनर के साथ सकारात्मक अनुभवों के बारे में सोचें.

गलतियां पकड़नी बंद कर दें: जब हर समय आप की आलोचना हो रही हो, ऐसे में सामने वाले की आलोचना से बच पाना कठिन होता है. आलोचना करने से बचें. कई बार आप को ऐसा लग सकता है कि आप के पार्टनर ने आलोचना करना बंद नहीं किया है. इस के लिए आप को धैर्य रखना होगा.

शारीरिक प्रेम और अंतरंगता: एक स्वस्थ संबंध के लिए यह बेहद जरूरी हिस्सा होता है. अकसर हमारा ईगो हमारे संबंधों के बीच आ जाता है. हम अकसर ऐसा महसूस करते हैं कि अगर हम शारीरिक संबंध नहीं रखेंगे तब हमारे पार्टनर को अपनी गलती का एहसास होगा और फिर वह उसे सुधारने का प्रयास करेगा. लेकिन सच यह है कि ऐसा करने से दोनों के बीच की दूरियां और बढ़ती हैं.

अपनी भावनाएं व्यक्त करें: अपने पार्टनर को बताएं कि आप कैसा महसूस करते हैं, क्या करना चाहते हैं और एकदूसरे के बीच कैसे संबंध की कामना करते हैं. अच्छे दिनों को याद करें. अच्छी यादें ताजा करें. पुरानी तसवीरें देखें और एकदूसरे को बताएं कि उस समय आप ने क्या सब से अधिक ऐंजौय किया.

रिलेशनशिप काउंसलिंग: कई बार एक बाहरी नौनजजमैंटल विचार हमें यह समझने में मदद करते हैं कि हम कहां गलत हैं और हमें अपने संबंध सुधारने के लिए क्या करने की जरूरत है ताकि हमारा पार्टनर उपेक्षित महसूस न करे. काउंसलिंग से संबंधों में समझ व एकदूसरे के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने में मदद मिलती है. इस से कपल्स के बीच समस्या कम होने लगती है.

मिलबांट कर निभाएं जिम्मेदारी, घरेलू काम साझा करें कुछ इस तरह

अकसर पत्नियों को शिकायत रहती है कि पति घरेलू कामों में उन की मदद नहीं करते. किसी हद तक उन की यह शिकायत सही भी है, क्योंकि शादी के बाद ज्यादातर पति घर के बाहर की जिम्मेदारी तो बखूबी निभाते हैं, मगर बात अगर रसोई में पत्नी की मदद करने की हो या घर की साफसफाई की तो अमूमन सभी पति कोई न कोई बहाना बना कर इन कामों से बचने की कोशिश करते नजर आते हैं. कहने को तो पतिपत्नी गाड़ी के 2 पहियों की तरह होते हैं, मगर जब आप एक ही पहिए पर घरगृहस्थी का सारा बोझ डाल दोगे तो फिर गाड़ी का लड़खड़ाना तो लाजिम है.

अकसर पत्नियां घर के कामों में इतनी उलझ जाती हैं कि उन के पास खुद के लिए भी समय नहीं होता. ऐसे में यदि उन्हें घर के कामों में पति का सहयोग मिल जाए तो उन का न सिर्फ बोझ कम हो जाता है, बल्कि पतिपत्नी के रिश्ते में मिठास और बढ़ जाती है.

यों बांटें काम

घर के काम को हेय समझना छोड़ कर पति कुछ कामों की जिम्मेदारी ले कर अननी गृहस्थी की बगिया को महका सकते हैं. ऐसे कई काम हैं, जिन्हें पतिपत्नी दोनों आपस में बांट कर कर सकते हैं:

– किचन को लव स्पौट बनाएं, अकसर पति किचन में जाने के नाम से ही कतराते हैं, मगर यहां आप पत्नी के साथ खाना पकाने के साथसाथ प्यार के एक नए स्वाद का भी आनंद ले सकते हैं. सब्जी काटना, खाना टेबल पर लगाना, पानी की बोतलें फ्रिज में भर कर रखना, सलाद तैयार करना आदि काम कर आप पत्नी की मदद कर सकते हैं. यकीन मानिए आप के इन छोटेछोटे कामों को आप की पत्नी दिल से सराहेगी.

– कभी पत्नी के उठने से पहले उसे सुबह की चाय पेश कर के देखिए, आप के इस छोटे से प्रयास को वह दिन भर नहीं भूलेगी. अगर पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है तो ऐसे में हलकाफुलका नाश्ता बना कर उसे थोड़ा आराम दे सकते हैं.

– यदि पति किचन में कुछ पकाना चाहे तो उन्हें टोकिए मत. रसोईघर को व्यवस्थित रखें. सभी डब्बों में लेबल लगा कर रखने से पति हर चीज के लिए आप से बारबार नहीं पूछेंगे.

– अगर आप को शिकायत है कि आप की पत्नी सारा वक्त बाथरूम में कपड़ों की सफाई में गुजार देती है और आप के लिए उन से पास जरा भी फुरसत नहीं है तो इस का सारा दोष पत्नी को मत दीजिए. छुट्टी वाले दिन आप इस काम में उस का हाथ बंटा सकते हैं. कपड़ों को ड्रायर कर के उन्हें सुखाने डालते जाएं. इस तरह एकसाथ काम करते हुए आप दोनों को बतियाने का मौका भी मिल जाएगा.

– अकसर सभी घरों में हफ्ते भर की सब्जियां ला कर फ्रिज में स्टोर कर दी जाती हैं. टीवी पर अपना पसंदीदा शो या क्रिकेट मैच देखने में मशगूल पति को आप मटर छीलने के लिए बोल सकती हैं या फिर सब्जियां साफ करने के लिए दे सकती हैं.

– गार्डन में लगे पौधों को पानी देने का काम पति से बोल कर करवा सकती हैं.

– घर में कोई पालतू जानवर है तो उसे टहलाने की जिम्मेदारी दोनों मिल कर उठाएं.

– बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ विषय आप चुन लें. कुछ पति को दें.

– पति व घर के अन्य सदस्यों में अपने छोटेमोटे काम स्वयं करने की आदत डलवाएं. नहाने के बाद गीला तौलिया सूखने डालना, अपने कपड़े, मोजे आदि अलमारी में सलीके से रखने जैसे कई ऐसे काम हैं, जिन्हें घर का हर सदस्य खुद कर सकता है.

– यदि आप चाहती हैं कि पति घरेलू कामों में आप की दिल से मदद करें तो प्यार व मनुहार से कहें. यदि आप जबरदस्ती कोई काम उन पर थोपेंगी तो जाहिर है मिनटों का काम करने में उन्हें घंटों लग जाएं और कार्य भी ढंग से पूरा न हो. शुरू में उन के साथ मिल कर काम करें.

थोड़ा धैर्य बनाए रखें. धीरेधीरे ही सही, मगर एक बार पति आप के कामों में सहयोग देने लगेंगे तो उन्हें भी इस बात का एहसास होगा कि आप दिन भर में कितना खटती हैं.

पति हो या पत्नी जब घर दोनों का है तो घर के कामों का जिम्मा भी दोनों मिल कर उठाएं. तभी तो वैवाहिक जीवन की गाड़ी सुचारु रूप से चलेगी.

शराब और मतदान का सनातनी संबंध

पिछले कुछ सालों से जाने क्यों चुनाव आयोग के सर यह भूत सवार हो गया है कि निष्पक्ष चुनाव के साथ साथ उसकी एक महती ज़िम्मेदारी मतदान प्रतिशत बढ़ाने की भी है जिसको निभाने की वह तरह तरह से मतदाताओं से अपील कर रहा है कि कुछ भी हो वोट जरूर डालो. यह जिम्मेदारी अब जुनून में चिंताजनक तरीके से तब्दील हो रही है. तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने चुनाव आयोग रंगोली और मेहंदी प्रतियोगिताएं तक आयोजित कर रहा है और तो और हर सरकारी आयोजन में वोट जरूर डालें वाले होर्डिंग और फ़्लेक्स अनिवार्य से हो गए हैं. माहौल शादी वाले घर सरीखा हो गया है जहां सभी एक दूसरे से यह जरूर पूछते हैं कि खाना खाया या नहीं इसमें भी दिलचस्प बात यह कि पूछने वाला जवाब का इंतजार नहीं करता उसका मकसद भी चुनाव आयोग की मुहिम जैसा औपचारिक होता है जिससे शादी में खाने की महत्ता चुनाव में वोट जैसी दिखती रहे.

इसे दिखने दिखाने की मानसिकता ही कहा जाएगा कि मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य  जिले झाबुआ में जिला निर्वाचन अधिकारी आशीष सक्सेना ने शराब की बोतलों तक पर मतदान को प्रोत्साहित करते लेबल लगवा दिये. इन लेबलों पर निमाड़ी गुजराती मिश्रित भाषा में वोट डालने की अपील की गई है. यानि ये बोतलें ब्रांड एम्बेस्डर हो गईं हैं जो धड़ल्ले से लायसेन्सी दुकानों से बिक रही हैं और चर्चा में हैं.

शराब चीज ही ऐसी है

इसे इन निर्वाचन अधिकारी की दूरदर्शिता ही कहा जाएगा कि प्रोत्साहन के लिए इन्होने सटीक प्रोडक्ट चुना है और बारीकी से चुनाव और मदिरा के अंतरंग सम्वन्ध को समझा है. इन दिनों सोशल मीडिया पर एक लतीफा बहुत वायरल हो रहा है जिसमें वोटर वोटिंग मशीन के सामने खड़ा कुछ सोचते सर खुजला रहा है मतदान अधिकारी के पूछने पर वह बताता है कि याद नहीं आ रहा है कि कल रात किसने दारू पिलाई थी तो किसे वोट दूं.

जैसे हल्दी अक्षत के बिना पूजा नहीं हो सकती वैसे ही बिना शराब के चुनाव नहीं हो सकते तो इस सच को सहज रूप से स्वीकार कर लेने में हिचक नहीं होनी चाहिए. पहले चुनावों में वोटिंग की रात छक कर शराब वितरित होती थी अब काफी पहले से होने लगी है और अब  मेल कराती मधुशाला की तर्ज पर सभी दल और उम्मीदवार शराब बंटवाते हैं जिससे वोटर ठंडे दिमाग और इत्मीनान से तय कर सके कि असल में सबसे काबिल उम्मीदवार कौन है जो उसके क्षेत्र के विकास के लिए मुफ्त शराब बंटवाने की हद तक प्रतिबद्ध है. और सभी बंटवा रहे हैं तो ज्यादा और अंग्रेजी कौन छकवा रहा है.

एक चौथाई तादाद गले के नीचे उतरते ही वोटर को ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि काबिल उम्मीदवार वो है जो शराब के साथ चखना, बीड़ी, सिगरेट, पान और तंबाकू जैसे सहायक उत्प्रेरक भी वितरित करवाता है. लिहाजा इस दफा उसको ही वोट देना चाहिए. जब आधी बोतल पेट में जाकर खलबली मचाने लगती है तो मस्तिष्क भी ध्यान की अवस्था में पहुंचने लगता है कि एक वोट से होता क्या है, कौन सी क्रांति हमारे ही वोट से आनी थी इसलिए बेवजह की ग्लानि मन में न पनपने दी जाये कि जरा सी दारू के एवज में वोट जैसी कीमती चीज का सौदा कर डाला.

जैसे आयुर्वेदचार्यों की नजर में दुनिया में वीर्य से ज्यादा बहुमूल्य् कोई और पदार्थ या तत्व नहीं है ठीक वैसे ही चुनाव आयोग की नजर में वोट से ज्यादा कीमती कोई चीज नहीं जिसे जाया करना बहुत बड़ी क्षति है. जिससे बचने की सलाह अगर शराब की बोतलों पर लेबल चस्पा कर दी जा रही है तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ रहा. ये होनहार अधिकारी ही भारतीय मनोविज्ञान के फ्रायड हैं जो जानते समझते हैं कि अक्सर लोग वहीं पेशाब करते नजर आते हैं जहां यह लिखा होता है कि यहां पेशाब करना मना है.

अच्छा तो यह होगा कि राजनैतिक दल भी इसी तर्ज पर प्रचार करें. यह बड़ा असरकारी साबित होगा बशर्ते खुद ऐसा करने वाला चुनाव आयोग उन्हें भी ऐसा करने की इजाजत दे तो.

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