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Family Story : अब आएगा मजा – रोज का क्या तमाशा बन गया था

Family Story : ‘‘अब आएगा मजा. पता चलेगा बच्चू को जब सारे नखरे ढीले हो जाएंगे. मां को नचाना आसान है न. मां हूं न. मैं ने तो ठेका लिया है सारे नखरे उठाने का,’’ सुनंदा अपने बेटे राहुल को सुनाती हुई किचन में काम कर रही थी. मां के सारे ताने सुनता राहुल मंदमंद मुसकराता हुआ फोन पर सिया से चैट करने में व्यस्त था.

कपिल ने मांबेटे की अकसर होने वाली तानेबाजी का आनंद उठाते हुए, धीरेधीरे हंसते हुए बेटे से कहा, ‘‘वैसे तुम परेशान तो बहुत करते हो अपनी मां को, चुपचाप नाश्ते में पोहा खा लेते तो इतने ताने क्यों सुनते. तन्वी को देखो, जो मां देती है, आराम से खा लेती है बिना कोई नखरा किए.’’

‘‘हां पापा, पर मैं क्या करूं. मुझे शौक है अच्छेअच्छे, नएनए खाना खाने का. मुझे नहीं खाना है संडे को सुबहसुबह पोहा. अरे संडे है, कुछ तो स्पैशल होना चाहिए न, पापा.’’

किचन से ही सुनंदा की आवाज आई, ‘‘हांहां, बना रही हूं, कितना स्पैशल खाओगे संडे को.’’

राहुल हंस दिया. यह रोज का तमाशा था, खानेपीने का शौकीन राहुल सुनंदा की नाक में दम कर के रखता था. घर का सादा खाना उस के गले से नहीं उतरता था. उसे रोज कोई न कोई स्पैशल आइटम चाहिए होता था. सुनंदा उस के नखरे पूरे करतेकरते थक जाती थी. पर अब उसे इंतजार था राहुल के विवाह का. एक महीने बाद ही राहुल का सिया से विवाह होने वाला था. राहुल और सिया की

3 साल की दोस्ती प्रेम में बदली तो दोनों ने विवाह का निर्णय ले लिया था. दोनों के परिवारों ने इस विवाह पर अपनी सहमति सहर्ष प्रकट की थी.

सुनंदा को इस बात की खुशी थी कि राहुल के नखरों से छुट्टी मिलेगी. राहुल स्वभाव से मृदुभाषी, सभ्य लड़का था पर खाने के मामले में वह कभी समझौता नहीं करता था. जो मन होता था, वही चाहिए होता था. आजकल सुनंदा का रातदिन यही कहना था, ‘‘कर लो थोड़े दिन और नखरे, बीवी आएगी न, तो सुधार देगी. अब आएगा मजा, पता चलेगा, ये सारे नखरे मां ही उठा सकती है.’’ सिया से जब सुनंदा मिली तो मधुर स्वभाव, शांत, हंसमुख, सुंदर, मौडर्न सिया उसे देखते ही पसंद आ गई. कपिल एक कंपनी में जनरल मैनेजर थे, तन्वी राहुल से 3 साल छोटी थी. वह अभी पढ़ रही थी. कपिल और तन्वी को भी सिया पसंद आई थी. सिया अच्छे पद पर कार्यरत थी. विवाह की तिथि नजदीक आती जा रही थी और सुनंदा का ‘अब आएगा मजा’ कहना बढ़ता ही जा रहा था. हंसीमजाक और उत्साह के साथ तैयारियां जोरों पर थीं.

राहुल ने एक दिन कहा, ‘‘मां, आजकल आप बहुत खुश दिखती हैं. अच्छा लग रहा है.’’ कपिल और तन्वी भी वहीं बैठे थे. कपिल ने कहा, ‘‘हां, सास जो बनने जा रही है.’’ सुनंदा ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे बस उस दिन का इंतजार है जब राहुल खाने के साथ समझौता करेगा, तो मैं कहूंगी, ‘बेटा, सुधर गए न’.’’

सब इस बात पर हंस पड़े. सुनंदा ने अत्यंत उत्साहपूर्वक कहा, ‘‘बस, अब आएगा मजा. सिया औफिस जाएगी या इस के नखरे उठाएगी. बस, अब मेरा काम खत्म. यह जाने या सिया जाने. मैं तो बहुत दिन नाच ली इस के इशारों पर.’’

तन्वी ने कहा, ‘‘मां, पर भाभी तो कुकिंग जानती हैं.’’

‘‘सब कहने की बात है, औफिस जाएगी या बैठ कर इस के लिए खाना बनाएगी. मैं तो बहुत उत्साहित हूं. बहुत मजा आएगा.’’ राहुल मंदमंद मुसकराता रहा, सुनंदा उसे जी भर कर छेड़ती रही.

विवाह खूब अच्छी तरह से संपन्न हुआ. सिया घर में बहू बन कर आ गई. दोनों ने 15 दिनों की छुट्टी ली थी. विवाह के बाद सब घर समेटने में व्यस्त थे. यह मुंबई शहर के मुलुंड की एक सोसायटी में थ्री बैडरूम फ्लैट था. सिया का मायका भी थोड़ा दूर ही था. औफिस जाने का भी समय आ गया. सिया का औफिस पवई में था. राहुल का अंधेरी में. औफिस जाने वाले दिन सिया भी जल्दी उठ गई. राहुल ने आदतन पूछा, ‘‘मां, नाश्ते में क्या है?’’

‘‘आलू के परांठे.’’

‘‘नहीं मां, इतना हैवी खाने का मन नहीं है.’’

सुनंदा ने राहुल को घूरा, फिर कहा, ‘‘सब का टिफिन तैयार कर दिया है. टिफिन में आलू की सब्जी बनाई थी, तो यही नाश्ता भी बना लिया.’’ सिया ने कहा, ‘‘अरे मां, आप ने क्यों सब बना लिया. मैं तैयार हो कर आ ही रही थी.’’

‘‘कोई बात नहीं सिया, आराम से हो जाता है सब. तुम्हें औफिस भी जाना है न.’’

राहुल ने कहा, ‘‘मां, मेरे लिए एक सैंडविच बना दो न.’’

सिया ने कहा, ‘‘हां, मैं बना देती हूं. आलू के परांठे तो हैं ही, कितना टाइम लगेगा, झट से बन जाएंगे.’’

अचानक एक ही पल में राहुल और सुनंदा ने एकदूसरे को देखा. आंखों में कई सवालजवाब हुए. तन्वी भी वहीं खड़ी थी. उस ने राहुल को देखा और फिर दोनों हंस दिए. ‘‘मैं 2 मिनट में बना कर लाई,’ कह कर सिया किचन में चली गई. मां की मुसकराहट झेंपभरी थी जबकि बेटी की मुसकराहट में शरारत थी. उम्मीद से जल्दी ही सिया सैंडविच बना लाई. सब नाश्ता कर के अपनेअपने काम पर चले गए. तन्वी अपने कालेज चली गई.

शाम को ही सब आगेपीछे लौटे. सुनंदा डिनर की काफी तैयारी कर के रखती थी. डिनर पूरी तरह से राहुल की पसंद का था तो सब ने खुशनुमा माहौल में खाना खाया. 3-4 दिन और बीते. सिया सुनंदा के काम में भरसक हाथ बंटाने लगी थी. एक दिन डिनर के समय राहुल ने कहा, ‘‘मैं नहीं खाऊंगा यह दालसब्जी.’’ सुनंदा ने राहुल को घूरा, ‘‘चुपचाप खा लो, साढ़े 8 बज रहे हैं. अब क्या कुछ और बनेगा.’’

‘‘नहीं मां, यह दालसब्जी मैं नहीं खाऊंगा.’’ खाना पूरी तरह से लग चुका था. सिया के सामने यह दूसरा ही मौका था. मांबेटे एकदूसरे को घूर रहे थे. कपिल और तन्वी मुसकराते हुए सब को देख रहे थे. सिया ने कहा, ‘‘अच्छा बताओ, राहुल, क्या खाना है?’’

‘‘कुछ भी चलेगा, पर यह नहीं.’’

‘‘औमलेट बना दूं?’’

‘‘हां, अच्छा रहेगा, साथ में एक कौफी भी मिलेगी?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, आप लोग बैठो, मैं अभी बना कर लाई.’’

राहुल सुनंदा को देख कर मुसकराने लगा तो वह भी हंस ही दी. सिया बहुत जल्दी सब बना लाई. बातोंबातों में सिया ने कहा, ‘‘मां, राहुल आप को बहुत परेशान करते हैं न, मैं ही इन की पसंद का कुछ न कुछ बनाती रहूंगी. आप का काम भी हलका रहेगा.’’ सुनंदा ने हां में गरदन हिला दी.एकांत में कपिल ने कहा, ‘‘सुनंदा, तुम्हें तो बहुत अच्छी बहू मिल गई है.’’

‘‘हां, पर यह थोड़े दिन के शौक हैं. उस के नखरे उठाना आसान बात नहीं है.’’ शनिवार, रविवार सब की छुट्टी ही रहती थी. दोनों दिन कुछ स्पैशल ही बनता था. सिया ने सुबह ही सुनंदा से कहा, ‘‘ये 2 दिन कुछ स्पैशल बनता है न, मां? आज और कल मैं ही बनाऊंगी. आप ये 2 दिन आराम करना.’’

‘‘नहीं, बेटा, मिल कर बना लेंगे, पूरा हफ्ता तुम्हारी भी तो भागदौड़ रहती है.’’

राहुल वहीं आ कर बैठता हुआ बोला, ‘‘हां मां, आप वीकैंड पर थोड़ा आराम कर लो, आप को भी तो आराम मिलना चाहिए.’’ सुनंदा को बेटेबहू की यह बात सुन कर अच्छा लगा. सिया ने पूछा, ‘‘मां, नाश्ते में क्या बनेगा?’’

राहुल ने फौरन कहा, ‘‘बढि़या सैंडविच.’’

‘‘और लंच में?’’

सुनंदा ने कहा, ‘‘मैं ने छोले भिगोए थे रात में.’’

‘‘नहीं मां, आज नहीं, पिछले संडे भी खाए थे, कुछ और खाऊंगा.’’

‘‘राहुल, क्यों हमेशा काम बढ़ा देते हो?’’

‘‘मां, कुछ चायनीज बनाओ न.’’

‘‘उस की तो कुछ भी तैयारी नहीं है.’’

सिया ने फौरन कहा, ‘‘मां, आप परेशान न हों. छोले भी बन जाएंगे. एक चायनीज आइटम भी.’’ सिया किचन में चली गई. सुनंदा हैरान सी थी, यह कैसी लड़की है, कुछ मना नहीं करती. राहुल की पसंद के हर खाने को बनाने के लिए हमेशा तैयार. छुट्टी के दोनों दिन सिया उत्साहपूर्वक राहुल और सब की पसंद का खाना बनाने में व्यस्त रही. सोमवार से फिर औफिस का रूटीन शुरू हो गया. जैसे ही सिया को अंदाजा होता कि नाश्ताखाना राहुल की पसंद का नहीं है, वह झट से किचन में जाती और कुछ बना लाती. सुनंदा हैरान सी सिया की एकएक बात नोट कर रही थी. 2 महीने बीत रहे थे, इतने कम समय में ही सिया घर में पूरी तरह हिलमिल गई थी. सुनंदा को उस का राहुल का इतना ध्यान रखना बहुत भाता था.

पिछले कुछ सालों से किसी न किसी शारीरिक अस्वस्थता के चलते सुनंदा खाना इस तरह से बना रही थी कि उसे किचन में ज्यादा न खड़ा होना पड़े, इसलिए कई चीजें तो घर में बननी लगभग छूट ही चुकी थीं. अब सिया घर में आई तो किचन की रूपरेखा ही बदल गई. उसे हर तरह का खाना बनाना आता था. वह कुकिंग में इतनी ऐक्सपर्ट थी कि सुनंदा ने भी जो चीजें कभी नहीं बनाई थीं, वह उत्साहपूर्वक सब को बना कर खिलाने लगी. सुनंदा तो सिया की लाइफस्टाइल पर हैरान थी. सुबह 6 बजे उठ कर सिया किचन के खूब काम निबटा देती. छुट्टी वाले दिन तो सब इंतजार करने लगे थे कि आज क्या बनेगा. सुनंदा ने तो कभी सोचा ही नहीं था कि इतनी मौडर्न लड़की किचन इस तरह संभाल लेगी.

एक संडे को सब लंच करने बैठे. सिया ने छोलेभठूरे बनाए थे. सब ने वाहवाह करते हुए खाना शुरू ही किया था कि राहुल ने कहा, ‘‘मार्केट में छोलों पर गोलगोल कटे हुए प्याज अच्छे लगते हैं न.’’ सुनंदा ने राहुल को घूरा. सिया ने कहा, ‘‘गोल काट कर लाऊं?’’

सुनंदा ने कहा, ‘‘रहने दो सिया, इस के नखरे उठाना बहुत मुश्किल है, थक जाओगी.’’

सिया उठ खड़ी हुई, ‘‘एक मिनट लगेगा, लाती हूं.’’

सुनंदा सोच रही थी कि राहुल के नखरे कम तो क्या हुए, बढ़ते ही जा रहे हैं. उसे सोचता देख कपिल ने पूछा, ‘‘अरे, तुम क्या सोचने लगी?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

राहुल ने शरारत से हंसते हुए कहा, ‘‘मुझे पता है, मां क्या सोच रही है.’’ सुनंदा ने घूरा, ‘‘अच्छा, बताना?’’

राहुल हंसा, ‘‘मां कहती थी न, विवाह होने दो, बच्चू को मजा आएगा, तो मां, मजा तो आ रहा है न?’’ सब हंस पड़े. सुनंदा झेंप गई. इतने में एक प्लेट में गोलगोल पतलेपतले प्याज सजा कर लाती हुई सिया ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, किसे मजा आ रहा है?’’ सब मुसकरा रहे थे. राहुल ने मां को छेड़ा, ‘‘इस समय तो सब को आ रहा है. जानती हो, सिया, मां को हमारे विवाह से पहले ही पता था कि बहुत मजा आएगा. है न मां?’’ सब  हंस रहे थे तो झेंपती हुई सुनंदा भी सब के साथ हंसी में शामिल हो गई. सिया को पूरी बात समझ तो नहीं आई थी पर वह मांबेटे की आंखों में चलती छेड़छाड़ को समझने की कोशिश कर रही थी.

Hindi Story : बरसी मन गई – शीला ने अपने ससुर की बरसी कैसे मनाई ?

Hindi Story : इधर कई दिनों से मैं बड़ी उलझन में थी. मेरे ससुर की बरसी आने वाली थी. मन में जब सोचती तो इसी नतीजे पर पहुंचती कि बरसी के नाम पर पंडितों को बुला कर ठूंसठूंस कर खिलाना, सैकड़ों रुपयों की वस्तुएं दान करना, उन का फिर से बाजार में बिकना, न केवल गलत बल्कि अनुचित कार्य है. इस से तो कहीं अच्छा यह है कि मृत व्यक्ति के नाम से किसी गरीब विद्यार्थी को छात्रवृत्ति दे दी जाए या किसी अस्पताल को दान दे दिया जाए.

यों तो बचपन से ही मैं अपने दादादादी का श्राद्ध करने का पाखंड देखती आई थी. मैं भी उस में मजबूरन भाग लेती थी. खाना भी बनाती थी. पिताजी तो श्राद्ध का तर्पण कर छुट्टी पा जाते थे. पर पंडित व पंडितानी को दौड़दौड़ कर मैं ही खाना खिलाती थी.

जब से थोड़ा सा होश संभाला था तब से तो श्राद्ध के दिन पंडितजी को खिलाए बिना मैं कुछ खाती तक नहीं थी. पर जब बड़ी हुई तो हर वस्तु को तर्क की कसौटी पर कसने की आदत सी पड़ गई. तब मन में कई बार यह प्रश्न उठ खड़ा होता, ‘क्या पंडितों को खिलाना, दानदक्षिणा देना ही पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है?’

हमारे यहां दादाजी के श्राद्ध के दिन पंडितजी आया करते थे. दादीजी के श्राद्ध के दिन अपनी पंडितानी को भी साथ ले आते थे. देखने में दोनों की उम्र में काफी फर्क लगता था. एक  दिन महरी ने बताया कि  यह तो पंडितजी की बहू है. बड़ी पंडितानी मर चुकी है. कुछ समय बाद पंडितजी का लड़का भी चल बसा और पंडितजी ने बहू को ही पत्नी बना कर घर में रख लिया.

मन एक वितृष्णा से भर उठा था. तब लगा विधवा विवाह समाज की सचमुच एक बहुत बड़ी आवश्यकता है. पंडितजी को चाहिए था कि बहू के योग्य कोई व्यक्ति ढूंढ़ कर उस का विवाह कर देते और तब वे सचमुच एक आदर्श व्यक्ति माने जाते. पर उन्होंने जो कुछ किया, वह अनैतिक ही नहीं, अनुचित भी था. बाद में सुना, उन की बहू किसी और के साथ भाग गई.

मन में विचारों का एक अजीब सा बवंडर उठ खड़ा होता. जिस व्यक्ति के प्रति मन में मानसम्मान न हो, उसे अपने पूर्वज बना कर सम्मानित करना कहां की बुद्धिमानी है. वैसे बुढ़ापे में पंडितजी दया के पात्र तो थे. कमर भी झुक गई थी, देखभाल करने वाला कोई न था. कभीकभी चौराहे की पुलिया पर सिर झुकाए घंटों बैठे रहते थे. उन की इस हालत पर तरस खा कर उन की कुछ सहायता कर देना भिन्न बात थी, पर उन की पूजा करना किसी भी प्रकार मेरे गले न उतरता था.

अपने विद्यार्थी जीवन में तो इन बातों की बहुत परवा न थी, पर अब मेरा मन एक तीव्र संघर्ष में जकड़ा हुआ था. इधर जब से मैं ने एक महिला रिश्तेदार की बरसी पर दी गई वस्तुओं के लिए पंडितानियों को लड़तेझगड़ते देखा तो मेरा मन और भी खट्टा हो गया था. पर क्या करूं ससुरजी की मृत्यु के बाद से हर महीने उसी तिथि पर एक ब्राह्मण को तो खाना खिलाया ही जा रहा था.

मैं ने एक बार दबी जबान से इस का विरोध करते हुए अपनी सास से कहा कि बाबूजी के नाम पर कहीं और पैसा दिया जा सकता है पर उन्होंने यह कह कर मेरा मुंह बंद कर दिया कि सभी करते हैं. हम कैसे अपने रीतिरिवाज छोड़ दें.

मेरी सास वैसे ही बहुत दुखी थीं. जब से ससुरजी की मृत्यु हुई थी, वे बहुत उदास रहती थीं, अकसर रोने लगती थीं. कहीं आनाजाना भी उन्होंने छोड़ दिया था. सो, उन्हें अपनी बातों से और दुखी करने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी. पर दूसरी ओर मन अपनी इसी बात पर डटा हुआ था कि जब हम चली आ रही परंपराओं की निस्सारता समझते हैं और फिर भी आंखें मूंद कर उन का पालन किए जाते हैं तो हमारे यह कहने का अर्थ ही क्या रह जाता है कि हम जो कुछ भी करते हैं, सोचसमझ कर और गुणदोष पर विचार कर के करते हैं.

मैं ने अपने पति से कहा कि वे अम्माजी से बात करें और उन्हें समझाने का प्रयत्न करें. पर उन की तरफ से टका सा जवाब मिल गया, ‘‘भई, यह सब तुम्हारा काम है.’’

वास्तव में मेरे पति इस विषय में उदासीन थे. उन्हें बरसी मनाने या न मनाने में कोई एतराज न था. अब तो सबकुछ मुझे ही करना था. मेरे मन में संघर्ष होता रहा. अंत में मुझे लगा कि अपनी सास से इस विषय में और बात करना, उन से किसी प्रकार की जिद कर के उन के दुखी मन को और दुखी करना मेरे वश की बात नहीं. सो, मैं ने अपनेआप को जैसेतैसे बरसी मनाने के लिए तैयार कर लिया.

हम लोग आदर्शों की, सुधार की कितनी बड़ीबड़ी बातें करते हैं. दुनियाभर को भाषण देते फिरते हैं. लेकिन जब अपनी बारी आती है तो विवश हो वही करने लगते हैं जो दूसरे करते हैं और जिसे हम हृदय से गलत मानते हैं.

मेरे स्कूल में वादविवाद प्रतियोगिता हो रही थी. उस में 5वीं कक्षा से ले कर 10वीं कक्षा तक की छात्राएं भाग ले रही थीं. प्रश्न उठा कि मुख्य अतिथि के रूप में किसे आमंत्रित किया जाए. मैं ने प्रधानाध्यापिका के सामने अपनी सास को बुलाने का प्रस्ताव रखा, वे सहर्ष तैयार हो गईं.

पर मैं ने अम्माजी को नहीं बताया. ठीक कार्यक्रम से एक दिन पहले ही बताया. अगर पहले बताती तो वे चलने को बिलकुल राजी न होतीं. अब अंतिम दिन तो समय न रह जाने की बात कह कर मैं जोर भी डाल सकती थी.

अम्माजी रामचरितमानस पढ़ रही थीं. मैं ने उन के पास जा कर कहा, ‘‘अम्माजी, कल आप को मेरे स्कूल चलना है, मुख्य अतिथि बन कर.’’

‘‘मुझे?’’ अम्माजी बुरी तरह चौंक पड़ीं, ‘‘मैं कैसे जाऊंगी? मैं नहीं जा सकती.’’

‘‘क्यों नहीं जा सकतीं?’’

‘‘नहीं बहू, नहीं? अभी तुम्हारे बाबूजी की बरसी भी नहीं हुई है. उस के बाद ही मैं कहीं जाने की सोच सकती हूं. उस से पहले तो बिलकुल नहीं.’’

‘‘अम्माजी, मैं आप को कहीं विवाहमुंडन आदि में तो नहीं ले जा रही. छोटीछोटी बच्चियां मंच पर आ कर कुछ बोलेंगी. जब आप उन की मधुर आवाज सुनेंगी तो आप को अच्छा लगेगा.’’

‘‘यह तो ठीक है. पर मेरी हालत तो देख. कहीं अच्छी लगूंगी ऐसे जाती हुई?’’

‘‘हालत को क्या हुआ है आप की? बिलकुल ठीक है. बच्चों के कार्यक्रम में किसी बुजुर्ग के आ जाने से कार्यक्रम की रौनक और बढ़ जाती है.’’

‘‘मुझे तो तू रहने ही दे तो अच्छा है. किसी और को बुला ले.’’

‘‘नहीं, अम्माजी, नहीं. आप को चलना ही होगा,’’ मैं ने बच्चों की तरह मचलते हुए कहा, ‘‘अब तो मैं प्रधानाध्यापिका से भी कह चुकी हूं. वे क्या सोचेंगी मेरे बारे में?’’

‘‘तुझे पहले मुझ से पूछ तो लेना चाहिए था.’’

‘‘मुझे मालूम था. मेरी अच्छी अम्माजी मेरी बात को नहीं टालेंगी. बस, इसीलिए नहीं पूछा था.’’

‘‘अच्छा बाबा, तू मानने वाली थोड़े ही है. खैर, चली चलूंगी. अब तो खुश है न?’’

‘‘हां अम्माजी, बहुत खुश हूं,’’ और आवेश में आ कर अम्माजी से लिपट गई. दूसरे दिन मैं तो सुबह ही स्कूल आ गई थी. अम्माजी को बाद में ये नियत समय पर स्कूल छोड़ गए थे. एकदम श्वेत साड़ी से लिपटी अम्माजी बड़ी अच्छी लग रही थीं.

ठीक समय पर हमारा कार्यक्रम शुरू हो गया. प्रधानाध्यापिका ने मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘आज मुझे श्रीमती कस्तूरी देवी का मुख्य अतिथि के रूप में स्वागत करते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है. उन्होंने अपने दिवंगत पति की स्मृति में स्कूल को 2 ट्रौफियां व 10 हजार रुपए प्रदान किए हैं. ट्रौफियां 15 वर्षों तक चलेंगी और वादविवाद व कविता प्रतियोगिता में सब से अधिक अंक प्राप्त करने वाली छात्राओं को दी भी जाएंगी. 10 हजार रुपयों से 25-25 सौ रुपए 4 वषों तक हिंदी में सब से अधिक अंक प्राप्त करने वाली छात्राओं को दिए जाएंगे. मैं अपनी व स्कूल की ओर से आग्रह करती हूं कि श्रीमती कस्तूरीजी अपना आसन ग्रहण करें.’’

तालियों की गड़गड़ाहट से हौल गूंज उठा. मैं कनखियों से देख रही थी कि सारी बातें सुन कर अम्माजी चौंक पड़ी थीं. उन्होंने मेरी ओर देखा और चुपचाप मुख्य अतिथि के आसन पर जा बैठी थीं. मैं ने देखा, उन की आंखें छलछला आई हैं, जिन्हें धीरे से उन्होंने पोंछ लिया.सारा कार्यक्रम बड़ा अच्छा रहा. छात्राओं ने बड़े उत्साह से भाग लिया. अंत में विजयी छात्राओं को अम्माजी के हाथों पुरस्कार बांटे गए. मैं ने देखा, पुरस्कार बांटते समय उन की आंखें फिर छलछला आई थीं. उन के चेहरे से एक अद्भुत सौम्यता टपक रही थी. मुझे उन के चेहरे से ही लग रहा था कि उन्हें यह कार्यक्रम अच्छा लगा.

अब तक तो मैं स्कूल में बहुत व्यस्त थी. लेकिन कार्यक्रम समाप्त हो जाने पर मुझे फिर से बरसी की याद आ गई.

दूसरे दिन मैं ने अम्माजी से कहा, ‘‘अम्माजी, बाबूजी की बरसी को 15 दिन रह गए हैं. मुझे बता दीजिए, क्याक्या सामान आएगा. जिस से मैं सब सामान समय रहते ही ले आऊं.’’

‘‘बहू, बरसी तो मना ली गई है.’’

‘‘बरसी मना ली गई है,’’ मैं एकदम चौंक पड़ी, ‘‘अम्माजी, आप यह क्या कह रही हैं?’’

‘‘हां, शीला, कल तुम्हारे स्कूल में ही तो मनाई गई थी. कल से मैं बराबर इस बारे में सोच रही हूं. मेरे मन में बहुत संघर्ष होता रहा है. मेरी आंखों के सामने रहरह कर 2 चित्र उभरे हैं. एक पंडितों को ठूंसठूंस कर खाते हुए, ढेर सारी चीजें ले जाते हुए. फिर भी बुराई देते हुए, झगड़ते हुए. मैं ने बहुत ढूंढ़ा पर उन में तुम्हारे बाबूजी कहीं भी न दिखे.’’

‘‘दूसरा चित्र है   उन नन्हींनन्हीं चहकती बच्चियों का, जिन के चेहरों से अमित संतोष, भोलापन टपक रहा है, जो तुम्हारे बाबूजी के नाम से दिए गए पुरस्कार पा कर और भी खिल उठी हैं, जिन के बीच जा कर तुम्हारे बाबूजी का नाम अमर हो गया है.’’

मैं ने देखा अम्माजी बहुत भावुक हो उठी हैं.

‘‘शीला, तू ने कितने रुपए खर्च किए?’’

‘‘अम्माजी, 11 हजार रुपए. 5-5 सौ रुपए की ट्रौफी और 10 हजार रुपए नकद.’’

‘‘तू ने ठीक समय पर इतने सुंदर व अर्थपूर्ण ढंग से उन की बरसी मना कर मेरी आंखें खोल दीं.’’

‘‘ओह, अम्माजी.’’ मैं हर्षातिरेक में उन से लिपट गई. तभी ये आ गए, बोले, ‘‘अच्छा, आज तो सासबहू में बड़ा प्रेमप्रदर्शन हो रहा है.’’

‘‘अच्छाजी, जैसे हम लड़ते ही रहते हैं,’’ मैं उठते हुए बनावटी नाराजगी दिखाते हुए बोली.

ये धीरे से मेरे कान में बोले, ‘‘लगता है तुम्हें अपने मन का करने में सफलता मिल गई है.’’

‘‘हां.’’

‘‘जिद्दी तो तुम हमेशा से हो,’’ ये मुसकरा पड़े, ‘‘ऐसे ही जिद कर के तुम ने मुझे भी फंसा लिया था.’’

‘‘धत्,’’ मैं ने कहा और मेरी आंखें एक बार फिर अम्माजी के चमकते चेहरे की ओर उठ गईं.

Trending Debate : सोफिया कुरैशी पर विजय शाह की आपत्तिजनक टिप्पणी – जानना जरुरी है कि कब कहां कितना बोलना चाहिए

Trending Debate : एक देहाती कहावत के मुताबिक जीभ बाबरी होती है वह तो कुछ भी कह कर दांतों के बीच जा कर सुरक्षित बैठ जाती है लेकिन उस के बोले का खामियाजा कपाल यानी माथे को भुगतना पड़ता है. इन दिनों बोलने के नाम पर कुछ भी बक देने का रिवाज शबाब पर है जिसे देख लगता है कि हमें आप को संभल कर बोलना जरुरी है.

महाभारत के युद्ध के आखिरी दिन हैं पितामह के खिताब से नवाज दिए गए भीष्म तीरों की शैय्या पर पड़े सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे हैं. वे बहुत तकलीफ में हैं शारीरिक भी और मानसिक भी. चारों तरफ हिंसा है, खूनखराबा है, सैनिकों के कटे सर और अंग कुरुक्षेत्र में कचरे की तरह बिखरे पड़े हैं. खुद भीष्म के शरीर से भी खून बह रहा है. पूरा शरीर तीरों से घायल है लेकिन हश्र जानते हुए भी इस भीषण युद्ध का अंत देखना चाहते हैं.

महाभारत के अनुशासन पर्व में उल्लेख है कि उन्होंने इस दौरान युधिष्ठिर को जो ज्ञान की बातें बताईं उन में से एक प्रमुख और प्रचिलित है –

अहिंसा परमो धर्म, धर्म हिंसा तथैव च.

अर्थात – अहिंसा सर्वोच्च धर्म है लेकिन धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी धर्म हो सकती है.

धर्म ग्रन्थों में वर्णित दूसरी हजारों लाखों बातों की तरह यह भी एक घुमावदार बात है जिस की टाइमिंग को ले कर कहा जा सकता है कि यह बात तो उन्हें तब कहनी चाहिए थी जब भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था. सभा में विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य सहित खुद भीष्म भी सारा तमाशा ख़ामोशी से देखते रहे थे. जाने क्यों तब उन्हें यह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था और हो गया था तो उन्होंने इस पर अमल करने की जरूरत महसूस नहीं की थी कि दुर्योधन के आदेश पर दुशासन जो कर रहा है वह अधर्म से भी बदतर चीज है. लिहाजा प्यार और शराफत से न मानने पर हिंसा किया जाना भी धर्म है क्योंकि आख़िरकार उस की ही तो रक्षा करनी है.

और इस के लिए उन्हें कोई तलवार वगैरह नहीं चलानी थी बल्कि पूरी शांति से अपने आसन से उठ कर दुशासन का टेंटुआ भर दबा देना था. भीष्म इतने बलशाली थे कि उन के सामने दुशासन की हैसियत वही थी जो शतरंज की बिसात पर वजीर के सामने एक प्यादे की होती है. लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया तो इस की दो प्रमुख वजहें ये हैं. पहली यह कि धर्म के ठेकेदारों को स्त्री को अपमानित होते देख एक विचित्र सा अवर्णीय सा सुख मिलता है फिर यहां तो भयंकर अपमान सार्वजनिक रूप से हो रहा था. इसलिए मुंह से धर्म अहिंसा और रक्षा टाइप का कोई उपदेश बाहर की तरफ नहीं फूटा.

दूसरी वजह भी बोलने से ही ताल्लुक रखती है कि द्रोपदी अपने जुआरी पतियों की लत की नहीं बल्कि अपने बड़बोलेपन की सजा भुगत रही थी. एक प्रचिलित प्रसंग के मुताबिक जब इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की तैयारियां हो रहीं थीं तब राजमहल में बने एक मायावी कुंड में दुर्योधन गिर गया था. इस पर हंसते हुए द्रोपदी ने दुर्योधन को अंधे पिता का अंधा पुत्र कह कर बेइज्जत किया था. दुर्योधन ने तभी द्रोपदी से बदला लेने की कसम खा ली थी.

द्रोपदी ऐसा न बोलती तो शायद महाभारत की लड़ाई न होती जिस का रक्तपात देख भीष्म भी घबरा उठे थे और उन्हें सामने तय हार देख अहिंसा नजर आने लगी थी. यानी बोलना अहम है. आम जिन्दगी में अकसर लोग तय नहीं कर पाते कि उन्हें कब कहां कितना बोलना है.

ऐसा ही कुछ भारत पाकिस्तान युद्ध के सीजफायर के बाद मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ मंत्री विजय शाह के साथ हुआ जिन्होंने इन्दोर के नजदीक महू के रायकुंडा की एक सभा में बोलने की मर्यादाएं (बशर्ते अगर कहीं होती हों तो ) पार कर दीं. उन्होंने कहा, “जिन लोगों ने हमारी बेटियों का सिंदूर उजाड़ा था मोदीजी ने उन्हीं की बहन भेज कर उन की ऐसीतैसी कर दी. उन्होंने कपड़े उतारउतार कर हमारे हिंदुओं को मारा और मोदीजी ने उन की बहन को उन की ऐसीतैसी करने उन के घर भेजा. अब मोदीजी तो कपड़े उतार नहीं सकते इसलिए उन की समाज की बहन को भेजा कि तुम ने हमारी बहनों को विधवा किया है तो तुम्हारे समाज की बहन आ कर तुम्हें नंगा कर छोड़ेगी. देश का सम्मान और मानसम्मान और हमारी बहनों के सुहाग का बदला तुम्हारी जाति समाज की बहनों को पाकिस्तान भेज कर बदला ले सकते हैं.”

इस घोर आपत्तिजनक भाषण पर जो बबंडर मचा वह किसी सबूत का मोहताज नहीं. खुद जबलपुर हाईकोर्ट ने संज्ञान ले कर पुलिस से एफआईआर दर्ज करने का हुक्म दिया. मामला अभी कोर्ट में चल रहा है लेकिन धर्मरक्षक पार्टी भाजपा ने अपने बड़बोले मंत्री को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं हटाया था और न ही मंत्री ने इस्तीफा देने की जरूरत समझी थी. यानी अपनी नजर में उन्होंने जो बोला था वह ठीक था. अब उन का अंजाम जो भी हो लेकिन गलत नहीं कहा जाता कि धनुष से निकला तीर और मुंह से निकले शब्द वापस नहीं आते.

बात इन्हीं मंत्रीजी की नहीं है बल्कि मध्य प्रदेश के उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने भी बड़बोलेपन की बहती गंगा में हाथ धोते औपरेशन सिंदूर की सफलता पर जबलपुर में सिविल डिफैन्स वालिन्टियर्स के ट्रेनिंग प्रोग्राम में यह कह डाला कि पूरा देश देश की सेना और सैनिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चरणों में नतमस्तक हैं.

इन्होने भी जो जी में आया या ऊपर से प्राप्त निर्देशों के मुताबिक बोल दिया. लेकिन सुनने वालों के मुंह खुले के खुले रह गए कि आखिर यह हो क्या रहा है क्यों भाजपाई खामोख्वाह नरेंद्र मोदी को हीरो साबित करने तुले हुए हैं. दरअसल में यह उन्माद एक किस्म की खीझ और खिसियाहट है क्योंकि युद्ध में भारत जीता नहीं है जिसे ले कर सरकार की छीछलेदार हो रही है. क्रिकेट के भाषा में कहें तो मेच ड्रा रहा और इस की एम्पायरिंग बिलाशक इन से भी बड़बोले कलयुग के नए पितामह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने की, इस पर भी खूब सवाल जवाब होते रहे और कटघरे में मोदी और उन की सरकार रही.

नेताओं का बड़बोलापन अब बेहद आम है जो अकसर अपने एजेंडे के तहत बोलते हैं. एक तिहाई देशों में दक्षिणपंथियों का राज है और वे सिर्फ बोल रहे हैं करने के नाम पर कुछ खास नहीं कर रहे.

मुट्ठी भर लोगों के आदर्श बन गए इन नेताओं में सीखने लायक कुछ नहीं है सिवाय इस के कि हम अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में संभल कर बोलें क्योंकि बोलना एक कला है जिस में बहुत कम लोग पारंगत हैं. डोनाल्ड ट्रम्प और नरेंद्र मोदी से ले कर विजय शाह और जगदीश देवड़ा जैसे नेताओं का कुछ नहीं बिगड़ना है लेकिन हमारा आप का काफी कुछ बड़बोलेपन से बिगड़ सकता है. घर हो दफ्तर हो रिश्तेदारी हो या फिर महफिल हो हमारा बोलना काफी कुछ बना और बिगाड़ सकता है.

ज्यादा बोलने के फायदे तो कुछ खास नहीं लेकिन नुकसान बेहिसाब हैं. बातूनी, वाचाल या बड़बोला होना अकसर बहुत महंगा साबित होता है क्योंकि ज्यादा बोलने वालों के पास तथ्य और तर्क कम होते हैं बकवास ज्यादा होती है. भोपाल के एक प्रोफैसर की मानें तो इन दिनों पारिवारिक समारोहों तक में उपयोगी बातें न के बराबर होती हैं बेवजह की बहस ज्यादा होती है. कहने को ही यह वैचारिक होती है नहीं तो लोग एकदूसरे के प्रति अपनी भड़ास और घृणा ज्यादा निकालते हैं.

अपना ही उदाहरण देते वह बताते हैं कि एक बार ऐसी ही यार दोस्तों की छोटी सी महफिल में सीजफायर को ले कर बहस छिड़ गई. एक मित्र मोदी सरकार को ले कर हमलावर थे तो दूसरे उस के बचाव में सोशल मीडिया से हासिल किया हुआ ज्ञान बघार रहे थे. बहस होतेहोते व्यक्तिगत जिन्दगी पर आ गई. मैं जानता हूं तुम्हारी औकात क्या थी तुम्हारे पिताजी मामूली मुनीम थे,……. तो क्या तुम्हारे पिताजी कहां के अफसर थे जैसी बातें होने लगीं तो यूएन छाप दोस्तों ने मध्यस्ता कर जैसेतैसे माहौल संभाला लेकिन तब तक दोनों के 25 साल पुराने संबंध स्थाई रूप से बिगड़ चुके थे.

इस और ऐसी बातों और बहसों से किसी को कुछ हासिल नहीं होता यह हर कोई जानता है लेकिन अपने बोलने पर काबू कोई नहीं रख पाता. बात तब और बिगड़ती है जब जाती जिंदगी में भी ऐसा होता है. पतिपत्नी का रिश्ता बहुत अंतरंग होता है पर इस में बड़बोलापन आ जाए तो नौबत अलगाव और तलाक तक भी पहुंच जाती है. एक गारमेंट व्यापारी और उन की पत्नी अब एक ही घर में अजनबियों की तरह रहते हैं.

दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ तो वे एकदूसरे के खानदान की बघिया उधेड़ने लगे. इसी तूतू मैंमैं में पत्नी ने कह दिया कि मैं जानती हूं तुम्हारे घर की हालत क्या थी जब मैं शादी हो कर आई थी तो तुम भी लट्ठे के कपड़े की चड्डी पहनते थे. इस बात पर पति बिगड़ा तो पूरे घर का सुख चैन छिन गया. ये गैरजरुरी बातें संबंध बहुत तेजी से बिगाड़ रही हैं.

घरों और रिश्तेदारी में भी दो गुट हो गए हैं पहला दो टूक कहें तो भाजपाई है और दूसरा एक हद तक कांग्रेसी कहा जा सकता है. पहला भक्ति आस्था और पूजापाठ को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है तो दूसरा तर्क करतेकरते लड़खड़ा जाता है क्योंकि आस्था के आगे तर्क कम ही टिकते हैं. दोस्ती यारी भी इसी रोग की गिरफ्त में है युवाओं में अव वैश्विक सामयिक समस्याओं पर बहस या चर्चा नहीं होती क्योंकि वे कुछ पढ़लिख ही नहीं रहे. उन की जिंदगी और दुनिया धर्म कर्म तक सीमित हो कर रह गई है. नतीजतन अपनी बात मनवाने या थोपने वे कुछ भी अनर्गल बोल जाते हैं.

आजकल तो नई मुसीबत स्मार्ट फोन है जिस पर ज्यादा बातें होती हैं. सोशल मीडिया पर कुछ बोलने यानी लिखे को मिटाने का तो एक मौका उसे हटा लेने का होता है लेकिन बातचीत अगर रिकौर्ड हो रही हो तो अपने कहे से मुकरना मुमकिन नहीं रह जाता. विजय शाह जैसे नेता इसी रिकौर्डिंग के चलते दिक्कत में हैं वर्ना तो वे कह देते कि मैं ने ऐसा कहा ही नहीं था.

बातचीत में रिकौर्डिंग संबंधों को बहुत औपचारिक बनाए दे रही है इसलिए मोबाइल फोन पर भी संभल कर बोलने की जरूरत है. कब कौन क्या रिकार्ड कर ले और जरूरत पड़ने पर या यूं ही पोल खोल दे या पब्लिक कर दे कहा नहीं जा सकता. हालत तो यह है कि पतिपत्नी तक एकदूसरे की बातें रिकौर्ड कर रख लेते हैं जाहिर है इस का एक खास मकसद होता है जो यह बताता है कि रिलेशन अकसर ढहने के मुकाम पर रहते हैं.

यह अविश्वास दरअसल में धर्म की ही देन है जिस ने जोजो बोलना सिखाया है वह सारा का सारा महाभारत में वर्णित है. दुर्योधन को अंधे का बेटा कह कर द्रोपदी ने उस का मजाक उड़ाया तो कितना खून खराबा हुआ था यह हर कोई जानता है. बचना इस बात से चाहिए कि बोलने के चलते घर कुरुक्षेत्र न बन जाए और इस के लिए जरुरी है बोलने पर नियंत्रण रखना. कम बोलना कभी नुकसानदेह साबित नहीं होता इसलिए एक चुप सौ सुख वाली कहावत को हमेशा ध्यान रखना चाहिए.

Social Media : मोबाइल ऐप्स के नुकसान

Social Media : मोबाइल ऐप्स जहां आप को ढेर सारे औफर्स का प्रलोभन देते हैं वहीं ये आप की प्राइवेसी के लिए खतरा भी पैदा करते हैं. ये सिक्योरिटी औप्शंस को भी धता बता रहे हैं.

आज हर काम के लिए अलगअलग तरह के मोबाइल ऐप्स आ गए हैं. ऐप्स को इंस्टौल करने के लिए कई लुभावने औफर्स भी दिए जा रहे हैं, जैसे पहले रिचार्ज पर 100 एमबी 3जी डाटा फ्री. कैशबैक औफर्स के चलते हम बिना सोचेसमझे इन्हें इंस्टौल कर लेते हैं पर क्या आप जानते हैं कि इन ऐप्स के नुकसान भी हैं?

जी हां, मोबाइल ऐप्स के कई नुकसान हैं, जिन्हें हम अपने फोन में इंस्टौल करते समय ध्यान नहीं देते. जानिए, क्या नुकसान हैं मोबाइल ऐप्स के:

प्राइवेसी का खतरा

जब आप कोई ऐप इंस्टौल करते हैं तो आप का पर्सनल डाटा पब्लिशर के पास स्टोर हो जाता है. इस में आप का नाम, फोन नंबर, यहां तक कि कई ऐप्स में आप की बैंक डिटेल्स भी सेव हो जाती हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि इस से क्या होगा, आप तो वैरिफाइड पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं. आप को बता दें कि अमेरिकी इंजीनियरों के एक दल ने जीमेल सहित कई ऐप्स को सफलतापूर्वक हैक कर लिया है. इन में कितने भी सिक्योरिटी औप्शंस क्यों न हों, लेकिन फिर भी प्राइवेसी का खतरा बना रहता है. सो, इन्हें जरा संभल कर इस्तेमाल करें.

ज्यादा डाटा खर्च

ऐप को तभी डाउनलोड किया जा सकता है जब आप के फोन में इंटरनैट कनैक्शन हो या आप का फोन वाईफाई से जुड़ा हो. ऐप को डाउनलोड करने में काफी इंटरनैट डाटा खर्च होता है और जब भी आप इन का इस्तेमाल करते हैं आप को इंटरनैट की जरूरत पड़ती है. इतना ही नहीं, ऐप बैकग्राउंड में रन करते हैं जिस की वजह से डाटा खर्च होता है. साथ ही, कुछ समय के बाद इन ऐप्स को अपडेट करने के लिए भी इंटरनैट डाटा की जरूरत पड़ती है.

फोन की स्पीड होती है धीमी

आप के फोन में जितने ज्यादा ऐप्स होते हैं फोन की स्पीड उतनी ही धीमी हो जाती है. ऐसे में जब आप फोन का इस्तेमाल करते हैं तब खुलने में काफी समय लगता है.

बैटरी पर पड़ता है इफैक्ट

ऐप्स का फोन की बैटरी पर भी असर पड़ता है. आप जब ऐप्स का इस्तेमाल करते हैं तब बैटरी खर्च होती है. इस वजह से फोन को चार्ज करने की जरूरत पड़ती है और फोन को बारबार चार्ज करने से बैटरी की लाइफ कम होती है.

आगे का अंश बौक्स के बाद 

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ऐप इंस्टौल करने से पहले इन बातों का ध्यान रखें :

किसी भी ऐप को इंस्टौल करने से पहले उस का रिव्यू जरूर पढ़ लें. कमैंट के नीचे लोग ऐप को रेटिंग भी देते हैं, आप इस रेटिंग की मदद भी ले सकते हैं, क्योंकि कुछ ऐप्स जब आप इंस्टौल करते हैं तो उन की वजह से फोन हैंग होने लगता है और आप को प्रौब्लम होती है. कई बार तो फोन को फौरमैट करना पड़ता है. सिर्फ रखने के लिए ऐप को इंस्टौल न करें बल्कि यह जरूर देखें कि आप के लिए कितना उपयोगी है और आप ऐप का कितना इस्तेमाल करते हैं. एक ही तरह के 2 ऐप फोन में न रखें बल्कि दोनों ऐप की तुलना करें कि कौन सा ऐप आप की जरूरतों को पूरा कर रहा है.

इंस्टौल करने से पहले जरूर देख लें कि ऐप आप के फोन को सपोर्ट करता है या नहीं. यह दिक्कत सभी फोन में नहीं आती, केवल विंडोज फोन के साथ आती है. कई ऐप्स इस फोन में सपोर्ट नहीं करते, इसलिए ऐप को डाउनलोड करने से पहले इस बात का ध्यान रखें.

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वायरस डाउनलोड का खतरा

ऐप डाउनलोड करते समय कभीकभी कुछ ऐसे वायरस भी डाउनलोड हो जाते हैं जो हमारे फोन को नुकसान पहुंचाते हैं.

ऐप से अनकंट्रोल बजट

ऐप से जहां एक मिनट में हर काम हो जाता है वहीं दूसरी तरफ इस से बजट अनकंट्रोल भी होता है. अगर कभी हमारे फोन का नैट पैक या बैलेंस खत्म हो जाता है तो हम इंतजार करते हैं रिचार्ज करवाने का. लेकिन रिचार्ज ऐप की वजह से फटाक से रिचार्ज कर लेते हैं और बिजी हो जाते हैं अपने स्मार्टफोन में. कई बार अट्रैक्टिव औफर्स देख कर शौपिंग भी कर लेते हैं, जिस से हमारा बजट बिगड़ता है.

Hindi Kahani : चाल – फहीम के चेहरे का रंग क्यों उड़ गया था ?

Hindi Kahani : कौफी हाउस के बाहर हैदर को देख कर फहीम के चेहरे की रंगत उड़ गई थी. हैदर ने भी उसे देख लिया था. इसलिए उस के पास जा कर बोला, ‘‘हैलो फहीम, बहुत दिनों बाद दिखाई दिए.’’

‘‘अरे हैदर तुम..?’’ फहीम ने हैरानी जताते हुए कहा, ‘‘अगर और ज्यादा दिनों बाद मिलते तो ज्यादा अच्छा होता.’’

‘‘दोस्त से इस तरह नहीं कहा जाता भाई फहीम.’’ हैदर ने कहा तो जवाब में फहीम बोला, ‘‘तुम कभी मेरे दोस्त नहीं रहे हैदर. तुम यह बात जानते भी हो.’’

‘‘अब मिल गए हो तो चलो एकएक कौफी पी लेते हैं.’’ हैदर ने कहा.

‘‘नहीं,’’ फहीम ने कहा, ‘‘मैं कौफी पी चुका हूं. अब घर जा रहा हूं.’’

कह कर फहीम ने आगे बढ़ना चाहा तो हैदर ने उस का रास्ता रोकते हुए कहा, ‘‘मैं ने कहा न कि अंदर चल कर मेरे साथ भी एक कप कौफी पी लो. अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो बाद में तुम्हें बहुत अफसोस होगा.’’

फहीम अपने होंठ काटने लगा. उसे मालूम था कि हैदर की इस धमकी का क्या मतलब है. फहीम हैदर को देख कर ही समझ गया था कि अब यह गड़े मुर्दे उखाड़ने बैठ जाएगा. हैदर हमेशा उस के लिए बुरी खबर ही लाता था. इसीलिए उस ने उकताए स्वर में कहा, ‘‘ठीक है, चलो अंदर.’’

दोनों अंदर जा कर कोने की मेज पर आमने-सामने बैठ कर कौफी पी रहे थे. फहीम ने उकताते हुए कहा, ‘‘अब बोलो, क्या कहना चाहते हो?’’

हैदर ने कौफी पीते हुए कहा, ‘‘अब मैं ने सुलतान ज्वैलर के यहां की नौकरी छोड़ दी है.’’

‘‘सुलतान आखिर असलियत जान ही गया.’’ फहीम ने इधरउधर देखते हुए कहा.

हैदर का चेहरा लाल हो गया, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मेरी उस के साथ निभी नहीं.’’

फहीम को हैदर की इस बात पर किसी तरह का कोई शक नहीं हुआ. ज्वैलरी स्टोर के मालिक सुलतान अहमद अपने नौकरों के चालचलन के बारे में बहुत सख्त मिजाज था. ज्वैलरी स्टोर में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी के बारे में शक होता नहीं था कि वह उस कर्मचारी को तुरंत हटा देता था.

फहीम ने सुलतान ज्वैलरी स्टोर में 5 सालों तक नौकरी की थी. सुलतान अहमद को जब पता चला था कि फहीम कभीकभी रेस के घोड़ों पर दांव लगाता है और जुआ खेलता है तो उस ने उसे तुरंत नौकरी से निकाल दिया था.

‘‘तुम्हारे नौकरी से निकाले जाने का मुझ से क्या संबंध है?’’ फहीम ने पूछा.

हैदर ने उस की इस बात का कोई जवाब न देते हुए बात को दूसरी तरफ मोड़ दिया, ‘‘आज मैं अपनी कुछ पुरानी चीजों को देख रहा था तो जानते हो अचानक उस में मेरे हाथ एक चीज लग गई. तुम्हारी वह पुरानी तसवीर, जिसे ‘इवनिंग टाइम्स’ अखबार के एक रिपोर्टर ने उस समय खींची थी, जब पुलिस ने ‘पैराडाइज’ में छापा मारा था. उस तस्वीर में तुम्हें पुलिस की गाड़ी में बैठते हुए दिखाया गया था.’’

फहीम के चेहरे का रंग लाल पड़ गया. उस ने रुखाई से कहा, ‘‘मुझे वह तस्वीर याद है. तुम ने वह तस्वीर अपने शराबी रिपोर्टर दोस्त से प्राप्त की थी और उस के बदले मुझ से 2 लाख रुपए वसूलने की कोशिश की थी. लेकिन जब मैं ने तुम्हें रुपए नहीं दिए तो तुम ने सुलतान अहमद से मेरी चुगली कर दी थी. तब मुझे नौकरी से निकाल दिया गया था. मैं ने पिछले 4 सालों से घोड़ों पर कोई रकम भी नहीं लगाई है. अब मेरी शादी भी हो चुकी है और मेरे पास अपनी रकम को खर्च करने के कई दूसरे तरीके भी हैं.’’

‘‘बिलकुल… बिलकुल,’’ हैदर ने हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘और अब तुम्हारी नौकरी भी बहुत बढि़या है बैंक में.’’

यह सुन कर फहीम के चेहरे का रंग उड़ गया, ‘‘तुम्हें कैसे पता?’’

‘‘तुम क्या समझ रहे हो कि मेरी तुम से यहां हुई मुलाकात इत्तफाक है?’’ हैदर ने भेडि़ए की तरह दांत निकालते हुए कहा.

फहीम ने तीखी नजरों से हैदर की ओर देखते हुए कहा, ‘‘ये चूहेबिल्ली का खेल खत्म करो. यह बताओ कि तुम चाहते क्या हो?’’

हैदर ने बेयरे की ओर देखते हुए धीमे स्वर में कहा, ‘‘बात यह है फहीम कि सुलतान अहमद के पास बिना तराशे हीरों की लाट आने वाली है. उन की शिनाख्त नहीं हो सकती और उन की कीमत करोड़ों रुपए में है.’’

यह सुन कर फहीम के जबड़े कस गए. उस ने गुर्राते हुए कहा, ‘‘तो तुम उन्हें चोरी करना चाहते हो और चाहते हो कि मैं तुम्हारी इस काम में मदद करूं?’’

‘‘तुम बहुत समझदार हो फहीम,’’ हैदर ने चेहरे पर कुटिलता ला कर कहा, ‘‘लेकिन यह काम केवल तुम करोगे.’’

फहीम उस का चेहरा देखता रह गया.

‘‘तुम्हें याद होगा कि सुलतान अहमद अपनी तिजोरी के ताले का कंबीनेशन नंबर हर महीने बदल देता है और हमेशा उस नंबर को भूल जाता है. जब तुम जहां रहे तुम उस के उस ताले को खोल देते थे. तुम्हें उस तिजोरी को खोलने में महारत हासिल है, इसलिए…’’

‘‘इसलिए तुम चाहते हो कि मैं सुलतान ज्वैलरी स्टोर में घुस कर उस की तिजोरी खोलूं और उन बिना तराशे हीरों को निकाल कर तुम्हें दे दूं?’’ फहीम ने चिढ़ कर कहा.

‘‘इतनी ऊंची आवाज में बात मत करो,’’ हैदर ने आंख निकाल कर कहा, ‘‘यही तो असल हकीकत है. तुम वे हीरे ला कर मुझे सौंप दो और वह तस्वीर, निगेटिव सहित मुझ से ले लो. अगर तुम इस काम के लिए इनकार करोगे तो मैं वह तस्वीर तुम्हारे बौस को डाक से भेज दूंगा.’’

पलभर के लिए फहीम की आंखों में खून उतर आया. वह भी हैदर से कम नहीं था. उस ने दोनों हाथों की मुटिठयां भींच लीं. उस का मन हुआ कि वह घूंसों से हैदर के चेहरे को लहूलुहान कर दे, लेकिन इस समय जज्बाती होना ठीक नहीं था. उस ने खुद पर काबू पाया. क्योंकि अगर हैदर ने वह तसवीर बैंक में भेज दी तो उस की नौकरी तुरंत चली जाएगी.

फहीम को उस कर्ज के बारे में याद आया, जो उस ने मकान के लिए लिया था. उसे अपनी बीवी की याद आई, जो अगले महीने उस के बच्चे की मां बनने वाली थी. अगर उस की बैंक की नौकरी छूट गई तो सब बरबाद हो जाएगा. हैदर बहुत कमीना आदमी था. उस ने फहीम को अब भी ढूंढ़ निकाला था. अगर उस ने किसी दूसरी जगह नौकरी कर ली तो यह वहां भी पहुंच जाएगा. ऐसी स्थिति में हैदर को हमेशा के लिए खत्म करना ही ठीक रहेगा.

‘‘तुम सचमुच मुझे वह तसवीर और उस की निगेटिव दे दोगे?’’ फहीम ने पूछा.

हैदर की आंखें चमक उठीं. उस ने कहा, ‘‘जिस समय तुम मुझे वे हीरे दोगे, उसी समय मैं दोनों चीजें तुम्हारे हवाले कर दूंगा. यह मेरा वादा है.’’

फहीम ने विवश हो कर हैदर की बात मान ली. हैदर अपने घर में बैठा फहीम का इंतजार कर रहा था. उस के यहां फहीम पहुंचा तो रात के 3 बज रहे थे. उस के आते ही उस ने पूछा ‘‘तुम हीरे ले आए?’’

फहीम ने अपने ओवरकोट की जेब से मखमली चमड़े की एक थैली निकाल कर मेज पर रखते हुए कहा, ‘‘वह तसवीर और उस की निगेटिव?’’

हैदर ने अपने कोट की जेब से एक लिफाफा निकाल कर फहीम के हवाले करते हुए हीरे की थैली उठाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया.

‘‘एक मिनट…’’ फहीम ने कहा. इस के बाद लिफाफे में मौजूद तसवीर और निगेटिव निकाल कर बारीकी से निरीक्षण करने लगा. संतुष्ट हो कर सिर हिलाते हुए बोला, ‘‘ठीक है, ये रहे तुम्हारे हीरे.’’

हैदर ने हीरों की थैली मेज से उठा ली. फहीम ने जेब से सिगरेट लाइटर निकाला और खटके से उस का शोला औन कर के तसवीर और निगेटिव में आग लगा दी. उन्हें फर्श पर गिरा कर जलते हुए देखता रहा.

अचानक उस के कानों में हैदर की हैरानी भरी आवाज पड़ी, ‘‘अरे, ये तो साधारण हीरे हैं.’’

फहीम ने तसवीर और निगेटिव की राख को जूतों से रगड़ते हुए कहा, ‘‘हां, मैं ने इन्हें एक साधारण सी दुकान से खरीदे हैं.’’

यह सुन कर हैदर फहीम की ओर बढ़ा और क्रोध से बोला, ‘‘यू डबल क्रौसर! तुम समझते हो कि इस तरह तुम बच निकलोगे. कल सुबह मैं तुम्हारे बौस के पास बैंक जाऊंगा और उसे सब कुछ बता दूंगा.’’

हैदर की इस धमकी से साफ हो गया था कि उस के पास तसवीर की अन्य कापियां नहीं थीं. फहीम दिल ही दिल में खुश हो कर बोला, ‘‘हैदर, कल सुबह तुम इस शहर से मीलों दूर होगे या फिर जेल की सलाखों के पीछे पाए जाओगे.’’

‘‘क्या मतलब?’’ हैदर सिटपिटा गया.

‘‘मेरा मतलब यह है कि मैं ने सुलतान ज्वैलरी स्टोर के चौकीदार को रस्सी से बांध दिया है. छेनी की मदद से तिजोरी पर इस तरह के निशान लगा दिए हैं, जैसे किसी ने उसे खोलने की कोशिश की हो. लेकिन खोलने में सफल न हुआ हो. ऐसे में सुलतान अहमद की समझ में आ जाएगा कि यह हरकत तुम्हारी है.

‘‘इस के लिए मैं ने तिजोरी के पास एक विजीटिंग कार्ड गिरा दिया है, जिस पर तुम्हारा नाम और पता छपा है. वह कार्ड कल रात ही मैं ने छपवाया था. अगर तुम्हारा ख्याल है कि तुम सुलतान अहमद को इस बात से कायल कर सकते हो कि तिजोरी को तोड़ने की कोशिश के दौरान वह कार्ड तुम्हारे पास से वहां नहीं गिरा तो फिर तुम इस शहर रहने की हिम्मत कर सकते हो.

‘‘लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो बेहतर यही होगा कि तुम अभी इस शहर से भाग जाने की तैयारी कर लो. मैं ने सुलतान ज्वैलरी स्टोर के चौकीदार को ज्यादा मजबूती से नहीं बांधा था. वह अब तक स्वयं को रस्सी से खोलने में कामयाब हो गया होगा.’’

हैदर कुछ क्षणों तक फहीम को पागलों की तरह घूरता रहा. इस के बाद वह अलमारी की तरफ लपका और अपने कपड़े तथा अन्य जरूरी सामान ब्रीफकेस में रख कर तेजी से सीढि़यों की ओर बढ़ गया.

फहीम इत्मीनान से टहलता हुआ हैदर के घर से बाहर निकला. बाहर आ कर बड़बड़ाया, ‘मेरा ख्याल है कि अब हैदर कभी इस शहर में लौट कर नहीं आएगा. हां, कुछ समय बाद वह यह जरूर सोच सकता है कि मैं वास्तव में सुलतान ज्वैलरी स्टोर में गया भी था या नहीं? लेकिन अब उस में इतनी हिम्मत नहीं रही कि वह वापस आ कर हकीकत का पता करे. फिलहाल मेरी यह चाल कामयाब रही. मैं ने उसे जो बता दिया, उस ने उसे सच मान लिया.’

Hindi Story : गोबिंदा – दीपा की सास लड़की की पहचान क्यों छुपा रही थी ?

Hindi Story : सांवली, सौम्य सूरत, छोटी कदकाठी, दुबली काया, काला सलवारसूट पहने, माथे पर कानों के ऊपर से घुमाती हुई चुन्नी बांधे इस पतली, सूखी सी डाल को दीपा ने जैसे ही अपने घर की ड्योढ़ी पर देखा तो वह किसी अनजाने आने वाले खतरे से जैसे सहम सी गई. घबरा कर बोली, ‘‘यह तो खुद ही बच्ची है, मेरी बच्ची को क्या संभालेगी?’’

यह सुनते ही उस की सास ने तने हुए स्वर में जवाब दिया, ‘‘सब तुम्हारी तरह कामचोर थोड़े ही जने हुए हैं. यह 9 साल की है, अकेले ही अपनी 3 छोटी बहनों को पाल रही है. खिलानापिलाना, नहलानाधोना सब करती है यह और यहां भी करेगी.’’

दीपा अभी कुछ कहने को ही थी, तभी पति की गरजती आवाज सुन कर चुप हो गई. वे कह रहे थे, ‘‘मेरी मां एक तो इतनी दूर से तुम्हारी सुविधा के लिए समझाबुझा कर इसे यहां ले कर आई हैं, ऊपर से तुम्हारे नखरे. अरे, इतने ही बड़े घर की बेटी हो तो जा कर अपने मांबाप से बोलो, एक नौकर भेज दें यहां. चुपचाप नौकरी करो, बेटी को यह संभाल लेगी.’’

दीपा मन मसोस कर बैठ गई. यह सोच कर ही उस का कलेजा मुंह को आ रहा था कि उस की डेढ़ साल की बेटी को इस बच्ची ने गिरा दिया या चोट लगा दी तो? पर वह इन मांबेटे के सामने कभी जबान खोल ही नहीं पाई थी. दीपा ने उस बच्ची से नाम पूछा तो उस की सास ने जवाब दिया, ‘‘इस का बाप इस को गोबिंदा बुलाता था, सो आज भी वही नाम है इस का.’’

दीपा ने उस गोबिंदा के मुंह से कुछ जैबुन्निसा सा शब्द निकलते सुना. समझ गई, सास उस का मुसलिम होना छिपा रही हैं. बड़ी अजीब दुविधा में थी दीपा. कोई उस की सुनने को तैयार ही नहीं था.

उस की सास बोले जा रही थी, ‘‘हजार रुपए कम नहीं होते, खूब काम कराओ इस से, खाएगीपिएगी, कपड़ेलत्ते खरीद देना. जो घर से लाई है 2 सलवारकमीज, उन्हें फेंक देना. एक पुराना बैग दे दो, उस में इस का ब्रुश, पेस्ट, साबुन, तेलकंघी, शीशा सब दे कर अलग कर दो. हां, एक थाली, कटोरी और गिलास भी अलग कर देना.’’

गोबिंदा को सारा सामान दे दिया दीपा ने, पर मन में डर भरा हुआ था कि पता नहीं क्या होगा? खैर, पति के डर से दीपा ने गोबिंदा के भरोसे अपनी बेटी को छोड़ा और औफिस गई. बेचैनी तो थी पर जब वापस आई तो देखा, बच्ची खेल रही है और गोबिंदा बड़ी खुशी से बखान कर रही थी, ‘‘भाभीजी, हम ने बिटिया को दूध पिला दिया, वो टट्टी करी रहिन, साफ करा हम, फिर वो चक्लेट मांगी तो हम ने सब खिला दिया.’’

दीपा दौड़ कर फ्रिज के पास गई और जैसे ही दरवाजा खोला, मन गुस्से और दुख से भर गया. अमेरिका से मंगवाई थी, डार्क चौकलेट 3 हजार रुपए की. सिर्फ खाना खाने के बाद एक टुकड़ा खाती थी. दीपा यह सोच कर उदास हो गई कि अब एक साल इंतजार करना पड़ेगा और पतिदेव की डांट पड़ेगी सो अलग. दीपा की सास 2 दिनों बाद ही वापस चली गई थी. इधर, गोबिंदा के रहनेसोने का इंतजाम कर दिया था दीपा ने. हर रोज जितना भी खाने का सामान रख कर जाती वह, सब औफिस से लौटने पर खत्म मिलता. गोबिंदा कहती कि बिटिया ने खा लिया है. 1 साल की बेटी कितना खा पाएगी, वह जानती थी कि गोबिंदा झूठ बोल रही है पर आखिर बच्ची थी. कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करे वह. पति से सारी बात छिपाती थी दीपा.

एक दिन पति घर पर रुके थे. उन्होंने बिटिया के लिए दूध बनाया. गोबिंदा से कहा, ‘बिटिया को ले आओ.’ गोबिंदा किचन में गई और आदतन, हौर्लिक्स का डब्बा निकाला और हौर्लिक्स मुंह में भरा, फिर बिटिया के बनाए दूध को पी कर आधा कर दिया. अभी वह दूध पी कर उस में पानी मिलाने ही जा रही थी तभी पति ने देख लिया. वे जोर से गरजे. गोबिंदा सहम कर दरवाजे की तरफ मुड़ी, पति काफी गुस्से में थे. उन्हें क्रोध आया कि रोज गोबिंदा सारा दूध पी कर और बेटी को पानी मिला कर देती है. हौर्लिक्स भी मुंह में चिपका हुआ था.

पति ने फ्रिज खोल कर देखा. सारी चौकलेट, फल सब खत्म थे. कोई नमकीन, बिस्कुट का पैकेट भी नहीं मिला. वे गोबिंदा के बैग में चैक करने लगे. कई चौकलेट के रैपर, नमकीन, बिस्कुट, फल आदि उस ने बैग में छिपा रखे थे. बैग की एक जेब में से बहुत सारे पैसे भी निकले. गोबिंदा सारा सामान चुरा कर बैग में रखती थी, और रात को छिप कर खाती थी. इधर, बिटिया के नाम पर भी सारा दूध और खाना खत्म कर देती थी. दीपा के पति ने गुस्से में गोबिंदा का हाथ पकड़ कर जोर से झटका दिया. गोबिंदा का सिर किचन के स्लैब के कोने से लगा और खून की धारा बह निकली. दीपा के पति घबरा गए. उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था.

तभी दीपा औफिस की गाड़ी से वापस आई. घर का ताला चाबी से खोला और अंदर घुसते ही चारों तरफ खून देख कर डर गई. उधर, गोबिंदा बाथरूम में सिर पकड़ कर पानी का नल खोल कर उस के नीचे बैठी थी. खून बहता जा रहा था. दीपा ने झट से उसे पकड़ कर बाथरूम से बाहर खींचा और उस के सिर में एक पुराना तौलिया जोर से दबा कर बांध दिया. कुछ पूछने और सोचने का समय नहीं था. पति परेशान दिख रहे थे.

दीपा ने झट अपने डाक्टर मित्र, जो कि पास में ही रहते थे, को फोन किया और पति से गाड़ी निकालने को कहा. पति ने गाड़ी निकाली. दीपा गोबिंदा का माथा पकड़ कर बैठ गई और अस्पताल पहुंचते ही डाक्टर ने गोबिंदा के सिर पर टांके लगा कर, सफाई कर के पट्टी बांध दी.

डाक्टर ने पूछा, ‘‘चोट कैसे लगी?’’

दीपा पति की तरफ देखने लगी. तभी गोबिंदा कहने लगी, ‘‘भाभीजी, हम से गलती हो गई, हम आप से झूठ बोलते रहे कि बिटिया सारी चौकलेट और खाना खात रही, हम खुदही खा जाते थे सबकुछ. आज भइयाजी ने दूध बना कर रखा, हमारा मन कर गया सो हम पी लीहिन, हौर्लिक्स भी खा लीहिन. हम ने आप के परस में से कई ठो रुपया भी लीहिन. भाईजी हम को हाथ पकड़ी कर बाहर खींचे किचन से, हम अंदर भागीं डरकै, हमारा माथा सिलैब पर लग गया और खून निकल रहा बड़ी देर से.’’

पर डाक्टर ने कहा कि इस की माथे की चोट बहुत पुरानी है और खुला घाव है इस के सिर पर. गोबिंदा से डाक्टर ने पूछा कि यह पहले की चोट कैसी है तो वह बोली, ‘‘डागटर साहेब, हमारा भइया 1 हजार रुपया कमा कर लाए रहा, हम ने देख लिया, वो अलमारी मा रुपया रखी रहिन. हम ने रुपया ले लिया और चौकलेट, दालमूठ खरीद लिए. दुकानदार सारा पैसा ले कर हमें बस 2 चौकलेट और 1 दालमूठ का पैकेट दी रहिन. हमरे बप्पा ने देख लिया, सो हम को खूब दौड़ा कर मारे. हम सीढ़ी से गिर गए और कपार फूट गया. पर कोई दवा नहीं दिए हम का. बहुत दिन बाद घाव सूखा. पर चोट लगने पर फिर से घाव खुल जात है.’’

दीपा और डाक्टर चुपचाप बैठे रहे. दीपा ने पैसे देने चाहे पर डाक्टर ने मना कर दिया, बोले, ‘‘रहने दो पैसे. इसे घर भिजवा दो, मुसीबत मोल न लो.’’

दीपा गोबिंदा को ले कर वापस गाड़ी की ओर मुड़ी, अंधेरे में उसे दिखा नहीं और उस का पैर खुले सीवर के गड्ढे में चला गया. बड़े जोर से चीखी वो. डाक्टर क्लीनिक बंद कर के कार में बैठ ही रहे थे, दौड़ कर वापस आए. दीपा का हाथ पकड़ कर जल्दी से ऊपर खींच लिया दीपा के पति और डाक्टर ने. पैर की हड्डी नहीं टूटी थी, पर दोनों घुटने बुरी तरह से छिल गए थे. बड़ी कोफ्त हुई दीपा को, गोबिंदा का इलाज करवाने आई थी, खुद ही घायल हो गई.

किसी तरह से दर्द बरदाश्त किया, घर आ कर दवा ली और औफिस से 3 दिन की छुट्टी. बड़ा थकानभरा दिन था. दवा खाते ही नींद आ गई दीपा को. सुबह जोरजोर से दरवाजा खटखटाने और दरवाजे की घंटी बजाने की आवाज आई. दीपा ने घड़ी की ओर देखा, 5 बज रहे थे. किसी तरह से उठ कर दरवाजा खोला. पड़ोसी की लड़की रमा थी, जोरजोर से बोले जा रही थी, ‘‘भाभी, आप की गोबिंदा एक काले रंग का बैग ले कर बालकनी से कूद कर सुबहसुबह भाग रही थी. हम ने खुद देखा उसे. वह उस तरफ कहीं गई है.’’

बड़ा गुस्सा आया दीपा को. पड़ोसी चुपचाप भागते देख रहे थे. उसे रोक नहीं सकते थे. खबर दे कर एहसान कर रहे हैं और साथ में मजे ले रहे हैं. तुरंत ही पति को जगाया दीपा ने, सब सुन कर पति बाइक ले कर तुरंत ही उसे ढूंढ़ने के लिए भागे. उफ, कितनी परेशानी? जब से गोबिंदा आई थी कुछ न कुछ गलत हो ही रहा था. बस, अब और नहीं. अब किसी तरह से मिल जाए तो इस को इस के मांबाप के पास भेज दें.

दीपा रोए जा रही थी. खैर, 2 घंटे में पति गोबिंदा को पकड़ कर ले आए. उस के बैग में 400 रुपए, दीपा की चांदी की पायल और ढेर सारा खाने का सामान रखा था. दीपा के पति का गुस्सा बढ़ रहा था. किसी तरह पति को शांत किया दीपा ने. फिर गोबिंदा से पूछा कि वह भागी क्यों? वह बोली, ‘‘हमें लगा भाभीजी, आप हमें अम्माअब्बा के पास भिजवा देंगे. वो हमें बहुत मारते हैं. हम उहां नहीं जाएंगे. सो, हम बैग ले कर भाग गए.’’

यह और नई मुसीबत. गोबिंदा घर जाना नहीं चाहती थी. पर उस की चोरी और झूठ बोलने की आदत जाने वाली नहीं थी. किसी तरह हाथ जोड़ कर दीपा ने पति से एक और मौका देने को कहा गोबिंदा को. पति ने किनारा कर लिया. दीपा ने बहुत समझाया गोबिंदा को. उस ने कहा कि जितना खाना है खाओ, पर जूठा न करो सामान और बरबाद भी न करो.

अब रोज दीपा गोबिंदा को औफिस जाने से पहले अपनी मां की निगरानी में अपने मायके छोड़ कर जाती. दीपा की बेटी को भी मां ही रखती. कुछ दिनों तक सब ठीक रहा. फिर दीपा के भाई ने गोबिंदा को फ्रिज से खाना और मिठाई चुराते देखा. यही नहीं, मां के पैसे भी गायब होने लगे. मां ने गोबिंदा को रखने से मना कर दिया. फिर दीपा ने अपनी बेटी को मां से रखने को कहा और वो गोबिंदा को घर में बंद कर के ताला लगा कर जाने लगी. इधर, गोबिंदा ने घर में गंदगी फैलानी शुरू कर दी. पूरे घर से अजीब सी बदबू आती. काफी सफाई करने पर भी बदबू नहीं जाती थी.

एक दिन शादी में जाना था. दीपा ने सोचा, गोबिंदा को भी ले जाए. खाना खा लेगी और घूम भी लेगी. शादी रात को 2 बजे खत्म हुई. गाड़ी से वापस आते समय किसी ट्रक ने दीपा की कार को पीछे से बहुत जोर से टक्कर मारी. सब की जान को कुछ नहीं हुआ पर पुलिस केस और पति को पूरे परिवार के साथ सारी रात कार में बितानी पड़ी. सुबह तक कुछ मदद मिली, जैसेतैसे घर पहुंचे.

अब दीपा ने पति से साफसाफ कह दिया कि वो घर छोड़ कर जा रही है. जब तक वे गोबिंदा को उस के मांबाप के पास नहीं भेज देंगे, वो वापस नहीं आएगी. दीपा ने सास को भी फोन कर के सारी बात कही. सास सुनने को तैयार ही नहीं थी. वह उलटा दीपा को ही दोष दे रही थी. खैर, दीपा ने किसी तरह पड़ोसियों से कह कर गोबिंदा के मांबाप तक बात पहुंचाई कि वे यहां आ जाएं, उन की नौकरी लगवा देगी दीपा. नौकरी के लालच में अपने सारे बालबच्चों के साथ गोबिंदा के मांबाप आ पहुंचे.

अपनी मां के घर में ही रुकवाया दीपा ने सब को. उधर, गोबिंदा के लिए कपड़े खरीदे, उसे पैसे दिए. तभी दीपा के पड़ोसियों ने गोबिंदा को अपने घर पर पुराने कपड़े देने के लिए बुलाया. दीपा ने भेज दिया. थोड़ी देर के बाद, गोबिंदा ढेर सारे कपड़े और मिठाई ले कर आई. दीपा ने कहा, ‘‘चलो गोबिंदा, तुम्हारे मांबाप आए हैं, मिलवा दूं.’’

दीपा फ्लैट से नीचे उतरी तो पड़ोसी के घर में हल्ला मचा था. उन के 2 साल के पोते के हाथ में पहनाया सोने का कंगन गायब था. वो सब ढूंढ़ने में लगे थे. दीपा ने भी उन की मदद करने की सोची. उस ने गोबिंदा से भी कहा कि वह मदद करे पर वह तो अपनी जगह से हिली भी नहीं. अपना बैग ले कर बाहर जा कर खड़ी हो गई. दीपा के मन में खटका हुआ. कुछ गड़बड़ जरूर है. उस ने पड़ोसिन को बुला कर उस से कहा कि गोबिंदा की तलाशी लें. गोबिंदा भागने लगी. पड़ोसिन ने और उन की बेटी ने दौड़ कर पकड़ा उसे. गोबिंदा की चुन्नी में बंधा कड़ा नीचे गिर गया. पड़ोसिन गोबिंदा को पीटने लगी. पुलिस में देने को कहने लगी. किसी तरह से दीपा ने छुड़ा कर बचाया उसे.

गोबिंदा, जो अब पहले से काफी मोटी हो चुकी थी अच्छा खाना खा कर, पिटाई से उस का मुंह और सूज गया था. किसी तरह से समझाबुझा कर, सब से हाथ जोड़ कर माफी मांगी दीपा ने. वहां से निबट कर अपनी मां के घर आई दीपा गोबिंदा को ले कर. गोबिंदा के मांबाप को सारी बात बताई. उस के मांबाप चुपचाप सुनते रहे. पैसे की मांग की गोबिंदा की मां ने. दीपा ने तुरंत ही पैसे निकाल कर दिए और उन के गांव वापस जाने का टिकट उन के हाथ में थमा दिया. पर उस का बाप तो नौकरी की रट लगा कर बैठा था. दीपा की मां ने बात संभाली और अगले साल बुला कर नौकरी देने का वादा किया.

दीपा ने अपने पति को बुलाया और सब को गाड़ी में बिठा कर रेलवे स्टेशन छोड़ने गई. ट्रेन छूटने तक दीपा वहीं रही. जैसे ही गोबिंदा सब के साथ निकली, दीपा ने सुकून की सांस ली.

दीपा ने अब नौकरी छोड़ दी. दीपा का मन पुराने घर से उचट चुका था. सो, उस ने वह घर किराए पर दे दिया. वह खुद अपनी मां के घर पर रहने लगी. इधर, पति का तबादला हो गया तो नए शहर में आ कर दीपा सारी बात भूल गई. कुछ दिनों बाद उस की सास का फोन आया कि गोबिंदा के मांबाप कह रहे हैं कि उस के साथ गलत व्यवहार किया है उस ने. वे और पैसा मांग रहे हैं वरना वे केस कर देंगे. दीपा ने सास से कहा कि ठीक है हम पैसा भेज देंगे मगर आप गोबिंदा और उस के परिवार से दूर ही रहेंगी.

दीपा ही जानती थी कि उस बालमजदूर के साथ क्याक्या झेलना पड़ा उसे. अब उस ने पक्का इरादा कर लिया था कि वह सारा काम खुद करेगी. किसी को भी नहीं रखेगी काम करने के लिए. भले, पैसा कम कमाए पर अब सुकून नहीं गंवाएगी वह.

Social Story : कलेंडर गर्ल – कैसी हकीकत से रूबरू हुई मोहना

Social Story : ‘‘श्री…मुझे माफ कर दो…’’ श्रीधर के गले लग कर आंखों से आंसुओं की बहती धारा के साथ सिसकियां लेते हुए मोहना बोल रही थी.

मोहना अभी मौरीशस से आई थी. एक महीना पहले वह पूना से ‘स्कायलार्क कलेंडर गर्ल प्रतियोगिता’ में शामिल होने के लिए गई थी. वहां जाने से पहले एक दिन वह श्री को मिली थी.

वही यादें उस की आंखों के सामने चलचित्र की भांति घूम रही थीं.

‘‘श्री, आई एम सो ऐक्साइटेड. इमैजिन, जस्ट इमैजिन, अगर मैं स्कायलार्क कलेंडर के 12 महीने के एक पेज पर रहूंगी दैन आई विल बी सो पौपुलर. फिर क्या, मौडलिंग के औफर्स, लैक्मे और विल्स फैशन वीक में भी शिरकत करूंगी…’’ बस, मोहना सपनों में खोई हुई बातें करती जा रही थी.

पहले तो श्री ने उस की बातें शांति से सुन लीं. वह तो शांत व्यक्तित्व का ही इंसान था. कोई भी चीज वह भावना के बहाव में बह कर नहीं करता था. लेकिन मोहना का स्वभाव एकदम उस के विपरीत था. एक बार उस के दिमाग में कोई चीज बस गई तो बस गई. फिर दूसरी कोई भी चीज उसे सूझती नहीं थी. बस, रातदिन वही बात.

टीवी पर स्कायलार्क का ऐड देखने के बाद उसे भी लगने लगा कि एक सफल मौडल बनने का सपना साकार करने के लिए मुझे एक स्प्रिंग बोर्ड मिलेगा.

‘‘श्री, तुम्हें नहीं लगता कि इस कंपीटिशन में पार्टिसिपेट करने के लिए मैं योग्य लड़की हूं? मेरे पास एथलैटिक्स बौडी है, फोटोजैनिक फेस है, मैं अच्छी स्विमर हूं…’’

श्री ने आखिर अपनी चुप्पी तोड़ी और मोहना की आंखों को गहराई से देखते हुए पूछा, ‘‘दैट्स ओके, मोहना… इस प्रतियोगिता में शरीक होने के लिए जो 25 लड़कियां फाइनल होंगी उन में भी यही गुण होंगे. वे भी बिकनी में फोटोग्राफर्स को हौट पोज देने की तैयारी में आएंगीं. वैसी ही तुम्हारी भी मानसिक तैयारी होगी क्या? विल यू बी नौट ओन्ली रैडी फौर दैट लेकिन कंफर्टेबल भी रहोगी क्या?’’

श्री ने उसे वास्तविकता का एहसास करा दिया. लेकिन मोहना ने पलक झपकते ही जवाब दिया, ‘‘अगर मेरा शरीर सुंदर है, तो उसे दिखाने में मुझे कुछ हर्ज नहीं है. वैसे भी मराठी लड़कियां इस क्षेत्र में पीछे नहीं हैं, यह मैं अपने कौन्फिडैंस से दिखाऊंगी.’’

मोहना ने झट से श्री को जवाब दे कर निरुतर कर दिया. श्री ने उस से अगला सवाल पूछ ही लिया, ’’और वे कौकटेल पार्टीज, सोशलाइजिंग…’’

‘‘मुझे इस का अनुभव नहीं है लेकिन मैं दूसरी लड़कियों से सीखूंगी. कलेंडर गर्ल बनने के लिए मैं कुछ भी करूंगी…’’ प्रतियोगिता में सहभागी होने की रोमांचकता से उस का चेहरा और खिल गया था.

फिर मनमसोस कर श्री ने उसे कहा, ‘‘ओके मोहना, अगर तुम ने तय कर ही लिया है तो मैं क्यों आड़े आऊं? खुद को संभालो और हारजीत कुछ भी हो, यह स्वीकारने की हिम्मत रखो, मैं इतना ही कह सकता हूं…’’

श्री का ग्रीन सिगनल मिलने के बाद मोहना खुश हुई थी. श्री के गाल पर किस करते हुए उस ने कहा, ‘‘अब मेरी मम्मी से इजाजत लेने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी ही है?’’

श्री ने भी ज्यादा कुछ न बोलते हुए हामी भर दी. श्री के समझाने के बाद मोहना की मम्मी भी तैयार हो गईं. मोहना आखिर सभी को अलविदा कह कर मौरीशस पहुंची. यहां पहुंचने के बाद उसे एक अलग ही दुनिया में आने का आभास हुआ था… उस के सदाशिवपेठे की पुणेरी संस्कृति से बिलकुल ही अलग किस्म का यहां का माहौल था. फैशनेबल, स्टाइल में फ्लुऐंट अंगरेजी बोलने वाली, कमनीय शरीर की बिंदास लड़कियां यहां एकदूसरे की स्पर्धी थीं. इन 30 खूबसूरत लड़कियों में से सिर्फ 12 को महीने के एकएक पन्ने पर कलेंडर गर्ल के लिए चुना जाना था.

शुरुआत में मोहना उन लड़कियों से और वहां के माहौल से थोड़ी सहमी हुई थी. लेकिन थोड़े ही दिनों में वह सब की चहेती बन गई.

सब से पहले सुबह योगा फिर हैल्दी बे्रकफास्ट, फिर अलगअलग साइट्स पर फोटोशूट्स… दोपहर को फिर से लाइट लंच… लंच के साथ अलगअलग फू्रट्स, फिर थोड़ाबहुत आराम, ब्यूटीशियंस से सलाहमशवरा, दूसरे दिन जो थीम होगी उस थीम के अनुसार हेयरस्टाइल, ड्रैसिंग करने के लिए सूचना. शाम सिर्फ घूमने के लिए थी.

दिन के सभी सत्रों पर स्कायलार्क के मालिक सुब्बाराव रेड्डी के बेटे युधि की उपस्थिति रहती थी. युधि 25 साल का सुंदर, मौडर्न हेयरस्टाइल वाला, लंदन से डिग्री ले कर आया खुले विचारों का हमेशा ही सुंदरसुंदर लड़कियों से घिरा युवक था.

युधि के डैडी भी रिसौर्ट पर आते थे, बु्रअरी के कारोबार में उन का बड़ा नाम था. सिल्वर बालों पर गोल्डन हाईलाइट्स, बड़ेबड़े प्लोटेल डिजाइन के निऔन रंग की पोशाकें, उन के रंगीले व्यक्तित्व पर मैच होती शर्ट्स किसी युवा को भी पीछे छोड़ देती थीं. दोनों बापबेटे काफी सारी हसीनाओं के बीच बैठ कर सुंदरता का आनंद लेते थे.

प्रतियोगिता के अंतिम दौर में चुनी गईं 15 लड़कियों में मोहना का नाम भी शामिल हुआ है, यह सुन कर उस की खुशी का ठिकाना ही न रहा. आधी बाजी तो उस ने पहले ही जीत ली थी, लेकिन यह खुशी पलक झपकते ही खो गई. रात के डिनर के पहले युधि के डैडी ने उसे स्वीट पर मिलने के लिए मैसेज भेजा था. मोहना का दिल धकधक कर रहा था. किसलिए बुलाया होगा? क्या काम होगा? उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. लेकिन जाना तो पड़ेगा ही. आखिर इस प्रतियोगिता के प्रमुख का संदेश था.

श्री को छोड़ कर किसी पराए मर्द से मोहना पहली बार एकांत में मिल रही थी.

जब वह रेड्डी के स्वीट पर पहुंची थी तब दरवाजा खुला ही था. दरवाजे पर दस्तक दे कर वह अंदर गई. रेड्डी सिल्क का कुरता व लुंगी पहन कर सोफे पर बैठा था. सामने व्हिस्की की बौटल, गिलास, आइस फ्लास्क और मसालेदार नमकीन की प्लेट रखी थी.

‘‘कम इन, कम इन मोहना, माई डियर…’’ रेड्डी ने खड़े हो कर उस का हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर बैठाया.

मोहना अंदर से सहम गई थी. रेड्डी राजकीय, औद्योगिक और सामाजिक सर्कल में मान्यताप्राप्त थे. इतना ही नहीं ‘कलेंडर गर्ल’ में सब से हौट सुपरमौडल का चुनाव तो यही करने वाले थे.

‘‘ड्रिंक,’’ उन्होंने मोहना से पूछा. मोहना ने ‘नो’ कहा, फिर भी उन्होंने दूसरे खाली गिलास में एक पैग बना दिया. थोड़ी बर्फ और सोडा डाल कर उन्होंने गिलास मोहना के सामने रखा.

‘‘कम औन मोहना, यू कैन नौट बी सो ओल्ड फैशंड, इफ यू वौंट टु बी इन दिस फील्ड,’’ उन की आवाज में विनती से ज्यादा रोब ही था.

मोहना ने चुपचाप गिलास हाथ में लिया. ‘‘चिअर्स, ऐंड बैस्ट औफ लक,’’ कह कर उन्होंने व्हिस्की का एक बड़ा सिप ले कर गिलास कांच की टेबल पर रख दिया.

मोहना ने गिलास होंठों से लगा कर एक छोटा सिप लिया, लेकिन आदत न होने के कारण उस का सिर दुखने लगा.

रेड्डी ने उस से उस के परिवार के बारे में कुछ सवाल पूछे. वह एक मध्यवर्गीय, महाराष्ट्रीयन युवती है, यह समझने के बाद तो उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हारी हिम्मत की दाद देता हूं, मोहना… लेकिन अगर तुम्हें सचमुच कलेंडर गर्ल बनना है, तो इतना काफी नहीं है… और एक बार अगर तुम्हारी गाड़ी चल पड़ी, तब तुम्हें आगे बढ़ते रहने से कोई नहीं रोक सकता. सिर्फ थोड़ा और कोऔपरेटिव बनने की जरूरत है…’’

रेड्डी ने व्हिस्की का एक जोरदार सिप लेते हुए सिगार सुलगाई और उसी के धुएं में वे मोहना के चेहरे की तरफ देखने लगे.

रेड्डी को क्या कहना है यह बात समझने के बाद मोहना के मुंह से निकला, ‘‘लेकिन मैं ने तो सोचा था, लड़कियां तो मैरिट पर चुनी जाती हैं…’’

‘‘येस, मैरिट… बट मोर दैन रैंप, मोर इन बैड…’’ रेड्डी ने हंसते हुए कहा और अचानक उठ कर मोहना के पास आ कर उस के दोनों कंधों पर हाथ रखा और अपनी सैक्सी आवाज में कहा, ‘‘जरा सोचो तो मोहना, तुम्हारे भविष्य के बारे में… मौडलिंग असाइनमैंट… हो सकता है फिल्म औफर्स…’’

इतने में दरवाजे पर दस्तक हुई और वेटर खाने की टे्र ले कर अंदर आया. मोहना उन के हाथ कंधे से दूर करते हुए उठी और उन की आंखों में देख कर उस ने कहा, ‘‘आई एम सौरी, बट आई एम नौट दैट टाइप, रेड्डी साहब,’’ और दूसरे ही पल वह दरवाजा खोल कर बाहर आ गई.

उस रात वह डिनर पर भी नहीं गई. रात को नींद भी नहीं आ रही थी. बाकी लड़कियों के हंसने की आवाज रात को देर तक उसे आ रही थी. उस की रूममेट रिया रातभर गायब थी और वह सुबह आई थी.

दूसरे ही दिन उस के हाथ में स्कायलार्क का लैटर था, पहले तो अंतिम दौर के लिए उस का चुनाव हुआ था, लेकिन अब उस का नाम निकाल दिया गया था. वापसी का टिकट भी उसी लैटर के साथ था.

उस के सारे सपने टूट चुके थे. मनमसोस कर मोहना पूना आई थी और श्री के गले में लग कर रो रही थी, ‘‘मेरी… मेरी ही गलती थी, श्री… स्कायलार्क कलेंडर गर्ल बनने का सपना और सुपर मौडल बनने की चाह में मैं ने बाकी चीजों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया. लेकिन यकीन करो मुझ पर, श्री… मैं ने वह लक्ष्मण रेखा कभी भी पार नहीं की… उस के पहले ही मैं पीछे मुड़ गई और वापस लौट आई, अपने वास्तव में, अपने विश्व में तुम्हारा भरोसा है न श्री?’’

श्री ने उसे बांहों में भर लिया…’’ अब 12 महीनों के पन्नों पर सिर्फ तुम्हारे ही फोटोज का कलेंडर मैं छापूंगा, रानी,’’ उस ने हंसते हुए कहा और मोहना रोतेरोते हंसने लगी.

उस की वह हंसी, उस के फोटोशूट की बनावटी हंसी से बहुत ही नैचुरल और मासूमियत भरी थी.

Romantic Story : यही होना था – मां बाप के प्यार का क्या फायदा उठाया था राजू ने ?

Romantic Story : मध्यवर्गीय परिवार का इकलौता लङका राजकुमार उर्फ राजू किशोर उम्र से ही आवारा और बिगड़ैल हो गया था. मांबाप का लाड़प्यार भी उस पर कुछ ज्यादा ही बरसता रहा, जिस कारण वह पढ़ाईलिखाई में पिछड़ा रहता और जिद से हर जरूरी व गैर जरूरी चीजें हासिल कर लेता था. इस पर घर वालों को कभीकभी कर्ज भी लेना पड़ जाता था.

राजू की एक छोटी बहन थी नेहा, जिसे वह जान से भी ज्यादा प्यार करता था. राजू कभी इंटर कालेज बंक कर के दोस्तों के साथ सिनेमा जाता, जुआ खेलता तो कभी शराबगांजे का नशा करता था. कभी जेब खर्च न हो तो चोरियां भी वह करने लगा, मसलन चेन छीनना, पर्स लूटना, मोबाइल छीन लेना आदि.

राजू के मांबाप लाडले बेटे के अंधभक्त बन चुके थे, जिस से वह और मनबढ़ सवाशेर हो चला था.
इसी तरह समय बीतता गया. जब जवानी के दिन शुरू हुए तो राजू लड़कियों की ओर आकर्षित होने लगा. स्कूलकालेज आतीजाती लड़कियों को अश्लील कमैंट्स मारता, हाथ पकड़ता, पीछा कर के छेङखानी करता था. और कहीं सुनसान रास्ते में लङकी दिखती तो उस के साथ गंदी हरकत कर के भाग जाता था.

एक बार की बात है. राजू दोस्तों संग एक खंडहरनुमा घर में ताश खेल रहा था. तभी एक लङकी उधर से गुजरी. वह बहुत खूबसूरत थी. अकेला पा कर राजू ने उसे दबोच लिया और दोस्तों के साथ मिल कर उस के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया. वीडियो भी बना लिया. घटना के बाद लङकी ने रोते हुए सब की शिकायत पुलिस से करने की बात कही, तो राजू ने उस का वीडियो इंटरनैट पर लोड कर बदनाम करने की धमकी दे डाली.

यह सुन लङकी घबरा कर और जोरजोर से रोने लगी. कुछ दिन बाद उस ने बदनामी के डर से अपने घर में आत्महत्या कर ली.

राजू की ऐसी कारगुजारियां आगे भी चलती रहीं. उसे इस काम में ज्यादा रस आने लगा था. राजू के मांबाप को उस की इन करतूतों का कभी पता भी नहीं चला. दिन तेजी से गुजरते गए.

एक रोज शाम जब राजू मौजमस्ती कर के घर लौटा तो उस की प्यारी बहन नेहा रोते हुए मिली. मांबाप भी आंसू लिए दुखी नजर आए. जब उस ने इस बारे में जानना चाहा तो सचाई सुन कर जैसे उस के पैरों तले की जमीन ही खिसक गई. उस ने अपनी बहन के साथ ऐसी घटना की कल्पना कभी सपने में भी नहीं की थी.

‘नेहा के साथ दुष्कर्म. नहींनहीं, ऐसा नहीं हो सकता. कोई मेरी बहन के साथ ऐसा कैसे कर सकता है…’ बारबार मन में कौंधते इन सब विचारों से राजू परेशान हो गया था. सारी रात उसे नींद नहीं आई.

दूसरे सुबह थाने जा कर राजू के पिता ने बेटी नेहा से हुई दुष्कर्म की रिपोर्ट लिखानी चाही, तो मां ने बदनामी की दुहाई दे कर उन्हें जाने से रोक लिया.
अब राजू घर में मच रही हलचल को चुपचाप सिर्फ देखता ही रहा और कुछ न कर सका.

Best Love Story : इन्द्रधनुष

Best Love Story : आज बैंक में बहुत भीड़ थी। दो स्टाफ की अनुपस्थिति के कारण कैश काउंटर (रूपयों का लेन- देन) पायल को ही देखना पड़ रहा था। एक जानी – पहचानी आवाज उसके कानों में पड़ी -” मैडम, मुझे 500 की गड्डियाँ ही दीजिएगा ।” उसने झट से ऊपर देखा। देखते ही उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। सामने ऋषि खड़ा था। वो भी उसे एकटक देख रहा था। पायल ने काँपते हाथों से 500 के नोटों के तीन गड्डी निकाल कर देते हुए कहा, ये लीजिए, और चेक के पीछे हस्ताक्षर कर दीजिए। हस्ताक्षर करते वक्त पायल की नजर पेन पर पड़ते ही वो समझ गई कि ये वही पेन है, जो उसने जन्मदिन पर ऋषि को उपहार में दिया था।

उस पेन को देखते ही यादों के तूफान बादल बन कर उसके दिलो – दिमाग में घुमड़ने लगे। ऋषि का जन्मदिन था। सभी मिलकर उसे कुछ देना चाहते थे। उपहार खरीदने का काम पायल और सोनल को सौंपा गया था। सोनल उससे जुनियर थी, और ऋषि के घर के पास ही रहती थी। सोनल ने ही उसे बताया था, कि ऋषि भईया को विभिन्न प्रकार के पेन इकट्ठा करना बहुत पसंद है। वो लिखने और हस्ताक्षर करने के लिए अलग – अलग प्रकार के पेन इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने अपने कमरे में पेन को कुछ इस तरह से सजा कर रखा है। जैसे कि उनका कमरा नहीं, कोई पेन की दुकान हो। इतना सुनते ही पायल ने कहा – ” तो पेन का सेट ही ले लेते है।” पेन का सेट लेते समय पायल की निगाह बार – बार एक खूबसूरत से पेन पर जाकर ठहर रही थी। पर क्यों? ये वो समझ नहीं पा रही थी। उसने सोनल से कहा – ” तू जाकर केक का आर्डर दे कर आ। मैं इस पर रैपर लगवाती हूँ।” सोनल के जाते ही उसने अपनी पसंद की भी एक पेन ले ली, और साथ ही डंठल में लगा एक लाल गुलाब भी ले लिया। जिस पर लिखा हुआ था… some one special. पढ़ते ही उसके होठों पर एक मुस्कुराहट फैल गई।

इधर ऋषि भी पायल के प्रति एक आकर्षण महसूस कर रहा था। जिस दिन पायल नहीं आती थी। उसका लाइब्रेरी में मन नहीं लगता था। ऋषि अपने में आए इस बदलाव को समझने की कोशिश कर रहा था। पायल एक साधारण से व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। पर उसकी निश्छल सी मुस्कान और सादगीपूर्ण बातें ऋषि को बहुत अच्छी लगती थी । उसके छरहरे बदन पर काले – लम्बे घने बाल के सामने सभी लड़कियाँ उसे फीकी लगती थी।

आज ऋषि का जन्मदिन है। उसने नीली जींस पर लाल शर्ट पहन रखी थी। वो बहुत आकर्षक लग रहा था। केक कटा, सबने ऋषि को जन्मदिन की बधाई दी। पायल ने भी लाल गुलाब के साथ अपने पसंद की पेन उसे दी। ऋषि ने धीरे से कहा – “धन्यवाद” । दोनों की नजरें टकराई, और एक प्यार भरी मुस्कुराहट दोनों के होठों पर फैल गई। ऋषि ने सबके कहने पर एक गाना भी गाया था।

भोली सी सूरत, आँखों में मस्ती,
दूर खड़ी शरमाए, आए – हाए…

अब दोनों लाइब्रेरी के बाद काफी हाउस जाते, और घंटों बातें करते रहते। ऋषि की शर्ट की जेब में पेन देखकर पायल खुशी से झूम जाती थी। ठीक ही तो कहा था, ऋषि ने – ” ये पेन अब हमेशा मेरे साथ रहेगा।” पायल मन ही मन सोचने लगी। वो दिन भी कितने खूबसूरत थे। उन्मुक्त जीवन, अल्हड़पन, कॉलेज, लाइब्रेरी, कॉफी हाउस और ऋषि का साथ कितना सुकून देता था। ऋषि का ख्याल आते ही उसके होठों पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट आ गई।… “अरे! आप आधे घंटे से यही बैठी है। हमने तो लंच भी कर लिया।” बैंक में ही काम करने वाली मीना बहल की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी। पायल ने अनमने भाव से कहा – ” आज मुझे भूख नहीं है।”

घर आकर आज पायल का दिल नहीं लग रहा था। उसे कॉलेज की लाइब्रेरी याद आ रही थी। जहाँ उसकी मुलाकात ऋषि से हुई थी। स्नातक का आखिरी साल था। जहाँ सभी कोर्स की किताबों से ज्यादा बैंकिंग और सिविल सर्विसेज की किताबें ज्यादा पढ़ते थे। ऋषि बहुत मेधावी छात्र था। सभी उससे कुछ न कुछ जानकारी लेते रहते थे। वहाँ बैठकर आपस में पढ़ाई – लिखाई की ही बातें होती थी। इन सबके बीच ऋषि और पायल कब एक – दूसरे को पसंद करने लगे। उन्हें पता ही नहीं चला। पायल ने जब अपनी मम्मी से ऋषि के बारे में बात की। तो घर में हंगामा हो गया। पायल ने रूआंसी होते हुए कहा – “माँ, ऐसी कोई बात नहीं है। बस, उससे बातें करना मुझे अच्छा लगता है। हम लाइब्रेरी में पढ़ने के बाद कभी-कभी साथ में कॉफी पीते है।” इतना कहकर पायल अपने कमरे में चली गयी।

अब पायल पर हर वक्त नजर रखी जाने लगी। वो कहीं भी घर से जाने के लिए निकलती, तो माँ उसे टोकते हुए कहती – ” कहाँ जा रही है? जल्दी आ जाना।” उसके फोन पर भी उनका ध्यान कुछ इस तरह से गड़ा रहता था। जैसे फोन का रिंग टोन न होकर कोई खतरे की घंटी बजने वाली है। पायल को अपने ही घर में अजनबी सा लगने लगा था। कभी-कभी उसे घुटन सी महसूस होती थी। हर वक्त चिड़िया सी फुकदने वाली अपनी माँ की बिट्टो रानी अब एक उदास सी घूंटे में बंधी गाय के बछड़े सी हो गयी थी।

पायल के भाई की शादी को अभी दो साल ही हुए थे। उसकी भाभी उम्र में उससे बस चार साल बड़ी थी। दोनों में खूब निभती थी। सीमा (भाभी) ने पायल की मनःस्थिति को भाँप लिया था। एक दिन मौका पाते ही उसने पायल से ऋषि के बारे में जानना चाहा तो बस इतना ही पता चला कि वो पायल से सीनियर है, कॉलेज में उसका आखिरी साल है। पर सीमा को इससे संतुष्टि नहीं हुई। उसने पायल पर दबाव बनाया कि उसे ऋषि की पूरी जानकारी चाहिए। जिससे कि वो उसकी मदद कर सके। पायल ने अश्रू भरी निगाहों से सीमा की तरफ देखा, और कहा – “ऋषि अपने भाई के पास रह कर पढ़ाई कर रहा है। उसके माता-पिता गाँव में रहते हैं। मैं इतना ही जानती हूँ।”

आज पायल की माँ ने सीमा को अपने पास बुलाकर एक फोटो दिखाते हुए कहा –
” देख बहू, हमारी पायल के लिए ये कैसा रहेगा। एक बड़ी कम्पनी में काम करता है। मोटी रकम कमाता है। हमारी पायल रानी बनकर रहेगी। ”
सीमा ने हैरानी से अपनी सासू माँ की तरफ देखते हूए कहा – “माँ जी, अभी उसके कॉलेज की परीक्षा है, फिर उसके बाद बैंक की परीक्षा भी उसे देनी है। उसने कितनी मेहनत की है। ”
शारदा (पायल की माँ) ने उसे झिड़कते हुए कहा –
” हो गई, उसकी पढ़ाई-लिखाई। कल उसे सब देखने आ रहे है। उसकी तैयारी कर।”

आज एक बुजुर्ग दम्पति पायल को देखने आए थे। उन्हें अपने बेटा के लिए पायल बहुत पसंद आयी। उन्होंने उसे एक हीरे की अंगूठी दी, और कहा – “ये सागर की तरफ से है। सगाई नहीं होगी। अगले महीने ही हम शादी करना चाहते है।” फिर कुछ औपचारिक बातें करने के बाद वो लोग चले गए।

उनके जाते ही सीमा ने सासू माँ की तरफ देखते हुए कहा – “माँ जी मुझे कुछ अजीब लग रहा है। आज के समय में कोई लड़का न लड़की की फोटो देखे, न उससे बात करे, न अपने होने वाले जीवन संगिनी के बारे में जानने की कोशिश करे। ऐसा नहीं हो सकता है। मुझे तो कुछ दाल में काला लगता है।” शारदा ने प्रत्युत्तर में कहा –

“अरे! बहू ये तो कितनी अच्छी बात है। संस्कारी लड़का है। माता-पिता पर विश्वास कर रहा है। उनकी पसंद से ही शादी कर रहा है। ”

सीमा अपनी सासू माँ की बातों से संतुष्ट नहीं हुई। उसने अपने पति से भी इस बारे में बात की। पति ने भी दो टूक जवाब देते हुए कहा – “पापा – मम्मी ने रिश्ता ठीक किया है,तो सब ठीक ही होगा ।”

सीमा वहाँ से निकलकर पायल के कमरे में गयी। पायल वहाँ नहीं थी। उसके बिस्तर पर एक डायरी और पेन रखा था। सीमा ने इधर-उधर नजरें दौड़ाई तो देखा कि पायल बरामदे में चुपचाप बैठी थी। उसने पायल से कहा तुम कुछ बोलती क्यों नहीं हो। पायल ने एक कागज का टुकड़ा अपनी भाभी की तरफ बढ़ा दिया। जिसमें लिखा था

जिंदगी मेरे इतने करीब आई
फिर रूठ कर बेवजह चली गई।।
तुम्हारा ऋषि

पायल ने झकझोरते हुए कहा – “तुम ऋषि से बात क्यों नहीं करती हो।”
” जब तक उसका कैरियर नहीं बन जाता है। वो कुछ नहीं कर सकता है। उसने दो साल रूकने को बोला है। अब मैं उसे परेशान करना नहीं चाहती। ”

आज पायल के हाथों में मेहंदी लग रही थी। सभी मेहमानों के आ जाने से घर में खूब चहल-पहल थी। शारदा ने सजावट में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दूसरे दिन बारात आयी। खूब धूमधाम से शादी हुई। बिदाई की रस्म के बाद पायल अपने ससुराल के दहलीज़ पर पहुँच गई। वहाँ पर बहू भोज हो जाने के बाद भी उसका अपने पति सागर से कोई बात नहीं हो पायी थी।

आज सागर अपनी माँ के साथ उसके कमरे में आया। सासू माँ ने पायल की तरफ देखते हुए कहा –
“सागर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों में ही उलझा हुआ था। अब तुम दोनों भी एक – दूसरे को समझो। आपस में बातें करो। और हा पायल, कल पूजा है। सुबह जल्दी नहा लेना। प्रसाद तुम्हें ही बनाना है।”

इतना कह कर वह कमरे से चली गई। सागर अपना मोबाइल उठाया, और बाहर बरामदे में जाकर किसी से बातें करने लगा। पायल को कुछ अजीब सा लग रहा था। उसने एक बार भी उसकी तरफ आँख उठाकर नहीं देखा। पायल की कब आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला। जब आँख खुली तो उसने देखा कि पलंग के सामने रखे सोफे पर सागर गहरी नींद में सो रहा है। सुबह के चार बज रहे थे। उसका फोन सामने टेबल पर था। जिस पर लगातार किसी का फोन आ रहा था। पायल अपनी डायरी निकालकर उस पर कुछ पंक्तियाँ लिखने लगी।

नया सफर कुछ धुंधला सा है
दो दिल अब तक तन्हा सा है।।

पायल की नजर जैसे ही घड़ी पर पड़ी। सुबह के पाँच बज रहे थे। सागर अभी भी गहरी नींद में सो रहा था। पायल नहाने के लिए जैसे ही बाथरूम जाने को उठी। तभी उसकी नजर फोन पर पड़ी। जिस पर फोन फिर लगातार आने लगा था। उसने देखा my love Nisha लिखा है ।फोन साइलेंट मोड पर था।

पायल नहा कर निकली ही थी, कि सासू माँ की आवाज़ आयी –
“पायल जल्दी से नहा लो। प्रसाद बनाना है।”

पायल जल्दी से तैयार होकर बाहर निकल गई। लाल रंग की गोल्डन बार्डर साड़ी में पायल बहुत सुंदर लग रही थी। सासू माँ ने उसकी तरफ देखते हुए कहा –

” सागर अभी तक सो रहा है। रात देर तक जागना और सुबह देर तक सोना उसकी आदत है। तू आ गई है न, धीरे-धीरे उसकी आदत सुधार देना। पायल ने मुस्कुराते हुए हामी भर दी। पूजा की सारी तैयारियाँ हो गई। पंडित जी भी आ गए। पूजा शुरू होते ही सागर भी पजामा – कुर्ता पहन कर आया, और पूजा पर बैठ गया। पायल ने महसूस किया कि सागर कुछ बोझिल और थका – थका सा लग रहा था। उसके कुर्ते की जेब में मोबाइल रखा था, जिस पर बार – बार किसी का फोन आ रहा था। सागर उसे निकाल कर देखता, फिर अपनी पाॅकेट में रख लेता था। पूजा समाप्त हो गई। सभी मेहमान भी प्रसाद लेकर चले गए। सागर ने अपनी माँ की तरफ देखते हुए कहा –

“माँ आने में थोड़ी देर हो जाएगी। दोस्त के यहाँ पार्टी है।” माँ के कुछ कहने से पहले ही निकल गया।

पायल ने अपनी सासू माँ से सीधे – सीधे सवाल करते हुए कहा – “मम्मी जी ये निशा कौन है? कल रात भर सागर को फोन कर रही थी।” विनीता (सागर की माँ) उसे हक्की – बक्की उसे देखने लगी। फिर अपने को सम्हालते हुए बोली – “आओ आराम से बैठकर बात करते है। तुम अब सागर की पत्नी हो। तुम्हें समझदारी से काम लेना होगा। निशा और सागर एक साथ पढ़ते थे। नौकरी भी दोनों की एक ही शहर में लग गयी। दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। शादी करना चाहते थे। पर हम लोगों ने सहमति नहीं दी। बस इतनी सी बात है। ”

पायल चुपचाप सासू माँ की बातें सुनती रही। कोई जवाब नहीं दिया। दोनों कुछ देर खामोश बैठे रहे। विनीता (सागर की माँ) ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा –

” कल तुझे पग फेरा के लिए मायका जाना है। उसकी तैयारी कर ले। सागर तुझे छोड़ आएगा। ”

दूसरे दिन पायल को उसका भाई लेने आया। मायका पहुँचते ही पायल अपनी भाभी से लिपटकर रोने लगी। घर में हंगामा मच गया। सारी बात जानने के बाद सीमा जोर – जोर से बोलने लगी -” मैंने तो पहले ही कहा था कि लड़के के बारे में पूरा पता करो। पर किसी ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया।”… “मैं उसे छोड़ूँगा नहीं, जिसने मेरी बहन की जिंदगी बर्बाद की है। शारदा भी रोते हुए कहने लगी -” मैं अभी विनीता को फोन लगाती हूँ। ”

इतना सुनते ही पायल ने कहा –

” नहीं, कोई किसी को फोन नहीं करेगा। मैं किस माँ को दोष दूँ। जिसने मुझे जन्म दिया, या जो कुछ दिन पहले मेरी माँ बनी थी। मेरी दोनों माँ ने बस समाज और रिश्तेदारों की परवाह की। मेरे बारे में किसी ने नहीं सोचा। मम्मी हम आज के जमाने के बच्चे है। हम चाहते हैं कि हमारा जीवनसाथी हमारी सोच का हो। हम एक-दूसरे को समझे और उनका सम्मान करें। हम बगावत करना नहीं चाहते है। हम अपने माता-पिता की सहमति चाहते है। अगर आपकी पारखी नजर में ऋषि खरा नहीं उतरता तो मैं खुशी-खुशी आपकी बात मान लेती। पर आपने तो मेरी कोई बात ही नहीं सुनी। सबसे बड़ी बात कि आपने मेरी पढ़ाई छुड़ा कर मुझे अंदर से खोखला बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ा। अब मेरे लिए कोई कुछ नहीं करेगा। जो कुछ करूंगी, मैं खुद करूंगी। मैं पहले कॉलेज की परीक्षा और फिर बैंक नियुक्ति की परीक्षा दूँगी।”

सीमा दूर खड़ी पायल की बातें सुनकर मन ही मन खुश हो रही थी। वो पायल में यही हिम्मत देखना चाहती थी। आज उसे ऐसा लग रहा था कि कॉलेज में ” नारी सशक्तिकरण ” विषय पर हुए डिबेट में उसे जो शिल्ड मिला था। उसकी असली हकदार तो पायल जैसी लड़कियाँ है, जो इतना कुछ हो जाने के बाद भी इतना साहस दिखाती है।

पायल फिर पलटकर ससुराल नहीं गई। बैंक की परीक्षा पास करते ही उसने सागर से मिलकर इस शादी को खत्म करना चाहा। दोनों अपनी सहमति आपसी सहमति से अलग हो गए। पायल को बैंक में नौकरी करते हुए दो साल हो चुके थे। वो ऋषि को आज तक नहीं भूल पायी थी। आज अचानक बैंक में उसे देखकर पिछली सारी बातें चलचित्र की भांति उसकी आँखो के सामने घूमने लगे।

दूसरे दिन बैंक पहुँचते ही पायल ने देखा कि ऋषि बाहर उसका इंतजार कर रहा है। पायल को देखते ही उसने कहा – ” इतना कुछ हो गया, और तुमने मुझे बताया ही नहीं।”…

” क्या बताती? कुछ कहने को था ही नहीं।”
ऋषि कुछ देर तो पायल को निहारता रहा, फिर धीरे से बोला- “अगले महीने मेरी शादी होने वाली थी। मैं अपनी सगाई तोड़ कर आया हूँ। मेरे साथ चलोगी।”

पायल की कुछ समझ में नहीं आ रहा था। ऐसे रास्ते में उसने इतनी सारी बातें कह दी। उसकी आँखों से अश्रू बह रहे थे। जो उसकी सहमति प्रकट कर रहे थे।

शाम को ऋषि घर आया। अब पायल की मम्मी को कोई एतराज नहीं था। बल्कि पायल की पढ़ाई बीच में छुड़वाने का पछतावा था। वो मान गई। अब दोनों एक साथ नए सफर की ओर चल पड़े थे। जहाँ बाँहें फैलाए सतरंगी सपने उनका इंतजार कर रहे थे।

लेखिका : कल्याणी झा कनक

Family Story : कुरसी का करिश्मा – कभी आपने देखा है ऐसा करिश्मा

Family Story : दीपू के साथ आज मालिक भी उस के घर पधारे थे. उस ने अंदर कदम रखते ही आवाज दी, ‘‘अजी सुनती हो?’’

‘‘आई…’’ अंदर से उस की पत्नी कलावती ने आवाज दी.

कुछ ही देर बाद कलावती दीपू के सामने खड़ी थी, पर पति के साथ किसी अनजान शख्स को देख कर उस ने घूंघट कर लिया.

‘‘कलावती, यह राजेश बाबू हैं… हमारे मालिक. आज मैं काम पर निकला, पर सिर में दर्द होने के चलते फतेहपुर चौक पर बैठ गया और चाय पीने लगा, पर मालिक हालचाल जानने व लेट होने के चलते इधर ही आ रहे थे.

‘‘मुझे चौक पर देखते ही पूछा, ‘क्या आज काम पर नहीं जाना.’

‘‘इन को सामने देख कर मैं ने कहा, ‘मेरे सिर में काफी दर्द है. आज नहीं

जा पाऊंगा.’

‘‘इस पर मालिक ने कहा, ‘चलो, मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’

‘‘देखो, आज पहली बार मालिक हमारे घर आए हैं, कुछ चायपानी का इंतजाम करो.’’

कलावती थोड़ा सा घूंघट हटा कर बोली, ‘‘अभी करती हूं.’’

घूंघट के हटने से राजेश ने कलावती का चेहरा देख लिया, मानो उस पर आसमान ही गिर पड़ा. चांद सा दमकता चेहरा, जैसे कोई अप्सरा हो. लंबी कदकाठी, लंबे बाल, लंबी नाक और पतले होंठ. सांचे में ढला हुआ उस का गदराया बदन. राजेश बाबू को उस ने झकझोर दिया था.

इस बीच कलावती चाय ले आई और राजेश बाबू की तरफ बढ़ाती हुई बोली, ‘‘चाय लीजिए.’’

राजेश बाबू ने चाय का कप पकड़ तो लिया, पर उन की निगाहें कलावती के चेहरे से हट नहीं रही थीं. कलावती दीपू को भी चाय दे कर अंदर चली गई.

‘‘दीपू, तुम्हारी बीवी पढ़ीलिखी कितनी है?’’ राजेश बाबू ने पूछा.

‘‘10वीं जमात पास तो उस ने अपने मायके में ही कर ली थी, लेकिन यहां मैं ने 12वीं तक पढ़ाया है,’’ दीपू ने खुश होते हुए कहा.

‘‘दीपू, पंचायत का चुनाव नजदीक आ रहा है. सरकार ने तो हम लोगों के पर ही कुतर दिए हैं. औरतों को रिजर्वेशन दे कर हम ऊंची जाति वालों को चुनाव से दूर कर दिया है. अगर तुम मेरी बात मानो, तो अपनी पत्नी को उम्मीदवार बना दो.

‘‘मेरे खयाल से तो इस दलित गांव में तुम्हारी बीवी ही इंटर पास होगी?’’ राजेश बाबू ने दीपू को पटाने का जाल फेंका.

‘‘आप की बात सच है राजेश बाबू. दलित बस्ती में सिर्फ कलावती ही इंटर पास है, पर हमारी औकात कहां कि हम चुनाव लड़ सकें.’’

‘‘अरे, इस की चिंता तुम क्यों करते हो? मैं सारा खर्च उठाऊंगा. पर मेरी एक शर्त है कि तुम दोनों को हमेशा मेरी बातों पर चलना होगा,’’ राजेश बाबू ने जाल बुनना शुरू किया.

‘‘हम आप से बाहर ही कब थे राजेश बाबू? हम आप के नौकरचाकर हैं. आप जैसा चाहेंगे, वैसा ही हम करेंगे,’’ दीपू ने कहा.

‘‘तो ठीक है. हम कलावती के सारे कागजात तैयार करा लेंगे और हर हाल में चुनाव लड़वाएंगे,’’ इतना कह कर राजेश बाबू वहां से चले गए.

कुछ दिन तक चुनाव प्रचार जोरशोर से चला. राजेश बाबू ने इस चुनाव में पैसा और शराब पानी की तरह बहाया. इस तरह कलावती चुनाव जीतने में कामयाब हो गई.

कलावती व दीपू राजेश बाबू की कठपुतली बन कर हर दिन उन के यहां दरबारी करते. खासकर कलावती तो कोई भी काम उन से पूछे बिना नहीं करती थी.

एक दिन एकांत पा कर राजेश बाबू ने घर में कलावती के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘कलावती, एक बात कहूं?’’

‘‘कहिए मालिक,’’ कलावती राजेश बाबू के हाथ को कंधे से हटाए बिना बोली.

‘‘जब मैं ने तुम्हें पहली बार देखा था, उसी दिन मेरे दिल में तुम्हारे लिए प्यार जाग गया था. तुम को पाने के लिए ही तो मैं ने तुम्हें इस मंजिल तक पहुंचाया है. आखिर उस अनपढ़ दीपू के हाथों

की कठपुतली बनने से बेहतर है कि तुम उसे छोड़ कर मेरी बन जाओ. मेरी जमीनजायदाद की मालकिन.’’

‘‘राजेश बाबू, मैं कैसे यकीन कर लूं कि आप मुझ से सच्चा प्यार करते हैं?’’ कलावती नैनों के बाण उन पर चलाते हुए बोली.

‘‘कल तुम मेरे साथ चलो. यह हवेली मैं तुम्हारे नाम कर दूंगा. 5 बीघा खेत व 5 लाख रुपए नकद तुम्हारे खाते में जमा कर दूंगा. बोलो, इस से ज्यादा भरोसा तुम्हें और क्या चाहिए.’’

‘‘बस… बस राजेश बाबू, अगर आप इतना कर सकते हैं, तो मैं हमेशा के लिए दीपू को छोड़ कर आप की हो जाऊंगी,’’ कलावती फीकी मुसकान के साथ बोली.

‘‘तो ठीक है,’’ राजेश ने उसे चूमते हुए कहा, ‘‘कल सवेरे तुम तैयार रहना.’’

दूसरे दिन कलावती तैयार हो कर आई. राजेश बाबू के साथ सारा दिन बिताया. राजेश बाबू ने अपने वादे के मुताबिक वह सब कर दिया, जो उन्होंने कहा था.

2 दिन बाद राजेश बाबू ने कलावती को अपने हवेली में बुलाया. वह पहुंच गई, तो राजेश बाबू ने उसे अपने आगोश में भरना चाहा, तभी कलावती अपने कपड़े कई जगह से फाड़ते हुए चीखी, ‘‘बचाओ… बचाओ…’’

कुछ पुलिस वाले दौड़ कर अंदर आ गए, तो कलावती राजेश बाबू से अलग होते हुए बोली, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, यह शैतान मेरी आबरू से खेलना चाह रहा था. देखिए, मुझे अपने घर बुला कर किस तरह बेइज्जत करने पर तुल गया. यह भी नहीं सोचा कि मैं इस पंचायत की मुखिया हूं.’’

इंस्पैक्टर ने आगे बढ़ कर राजेश बाबू को धरदबोचा और उस के हाथों में हथकड़ी डालते हुए कहा, ‘‘यह आप ने ठीक नहीं किया राजेश बाबू.’’

राजेश बाबू ने गुस्से में कलावती को घूरते हुए कहा, ‘‘धोखेबाज, मुझ से दगाबाजी करने की सजा तुम्हें जरूर मिलेगी. आज तू जिस कुरसी पर है, वह कुरसी मैं ने ही तुझे दिलाई है.’’

‘‘आप ने ठीक कहा राजेश बाबू. अब वह जमाना लद गया है, जब आप लोग छोटी जातियों को बहलाफुसला कर खिलवाड़ करते थे. अब हम इतने बेवकूफ नहीं रहे.

‘‘देखिए, इस कुरसी का करिश्मा, मुखिया तो मैं बन ही गई, साथ ही आप ने रातोंरात मुझे झोंपड़ी से उठा कर हवेली की रानी बना दिया. लेकिन अफसोस, रानी तो मैं बन गई, पर आप राजा नहीं बन सके. राजा तो मेरा दीपू ही होगा इस हवेली का.’’

राजेश बाबू अपने ही बुने जाल में उलझ गए.

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