Stepchildren Parenting: आर्थिक संपन्नता ब्लेंडेड परिवारों की कई व्यावहारिक कठिनाइयों को कम कर देती है मगर पैसे से विश्वास, अपनापन, ममता और भावनात्मक सुरक्षा नहीं खरीदी जा सकतीं. यही कारण है कि अनेक संपन्न परिवारों में सौतेले बच्चे अकेलेपन, असुरक्षा, उपेक्षा या बाहरी होने की भावना से जूझते रहते हैं.
सौतेली मां के डर, क्रूरता और आतंक को मशहूर साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में खूब समेटा है. 'सौतेली मां', 'प्रेरणा', 'घर जमाई' जैसी कई कहानियों में उन्होंने दूसरी माता द्वारा बच्चों की उपेक्षा और दुर्व्यवहार को दर्शाया है. पहले के समय में जब मैडिकल साइंस कई बीमारियों का इलाज नहीं ढूंढ़ पाई थी, तब अधिकांश औरतें प्रैग्नैंसी या डिलीवरी के दौरान इन्फैक्शन या गलत तरीके से की गई डिलीवरी के कारण दम तोड़ देती थीं. पीछे छूट जाते थे उन के मासूम बच्चे, जिन्हें संभालना अकेले पति के लिए बड़ा मुश्किल होता था.
संयुक्त परिवार में दादी, नानी, मौसी, बूआ के होने बावजूद उस आदमी पर इस बात का दबाव रहता था कि वह दूसरा विवाह कर अपने बच्चों की जिम्मेदारी अपनी नई पत्नी को सौंपे. आदमी भी भला बिना औरत के अकेले कैसे जिंदगी काट सकता है. लिहाजा, पहली औरत के मरते ही आदमी फटाफट दूसरी शादी कर ही लेते थे. आज भी करते हैं. मगर बच्चों के लिए लाई गई दूसरी मां का स्नेह और ममता कम ही बच्चों को नसीब होती है. कुछ ही औरतें ऐसी होती हैं जो पति की पहली बीवी की संतानों को अपना समझ कर प्रेम कर पाती हैं.
अकसर बच्चे भी किसी दूसरी औरत को मां की जगह स्वीकार नहीं कर पाते हैं. एक अजनबी औरत को 'मां' कहने के लिए परिवार उन्हें मजबूर करता है. दूसरी मां के दिल में अगर बच्चों के लिए मोहब्बत नहीं उपजती तो वह बच्चों को अपने जीवन की सब से बड़ी बाधा समझने लगती थी. फिर जब उस के अपने बच्चे हो जाते हैं तो सौतेले बच्चे तो दुश्मन सरीखे दिखने लगते हैं क्योंकि संपत्ति पर उन का भी हक होता है. लिहाजा, अपना गुस्सा और खीझ हर वक्त वह बच्चों पर निकालने लगती है. सौतेली मां की प्रताड़ना की कहानियों से भारतीय समाज भरा पड़ा है. ऐसी खबरें आएदिन अख़बारों में छपती हैं कि सौतेली मां ने संपत्ति के लालच में बच्चों को मार डाला.
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