अमृतसर में रावण के फूंके जाने को देखने वालों की भीड़ को रेल द्वारा रौंदे जाने के लिए अगर कोई जिम्मेदार है तो धर्म की खातिर पगला गए लोग हैं. ये लोग इस रेल की पटरी पर खड़े रावण को देख रहे थे जिस पर ट्रेनें आतीजाती रहती हैं. फूट रहे पटाखों की आवाज में वे तेज आ रही ट्रेन की सीटियां और आवाज सुन कर पटरी से हट नहीं पाए.

धर्म की खातिर जान देने वालों की इस देश में कमी नहीं है. कभी कुंभों या तीर्थ स्थलों पर भगदड़ में लोग मरते हैं, कभी बसों में तीर्थयात्रा करते तो कभी स्नान करते हुए नदियों में बह जाने पर. जब भी कोई एलान होता है कि धार्मिक तमाशा होने वाला होता है, धंधेबाज उस के मौखिक प्रचार में लग जाते हैं और जहां 50-100 लोगों की जगह होती है, हजार 2 हजार जमा हो जाते हैं.

पुण्य कमाने का जो लालच सतत प्रचार के सहारे लोगों के ठस दिमागों में ठूंसा जाता है, उस का असर यह है कि लोग आगापीछा छोड़ कर जेब खाली करने, घंटों लाइनों में खड़े होने और गर्मीसर्दी सहने को तैयार हो जाते हैं. देश भर में मंदिरों को ले कर भयंकर धंधेबाजी चल रही है और पुलिस व व्यवस्था उसी का गुलाम बन कर रह गई है.

अमृतसर की घटना में जिम्मेदार यह धार्मिक पागलपन है जो बढ़ रहा है और हर रोज अतिरिक्त कमाई करा रहा है. जगहजगह मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे उग रहे हैं और हरेक के चारों ओर दुकानों की भरमार हो रही है. हमारे धार्मिक स्थलों की एक निशानी अव्यवस्था है क्योंकि पुण्य कमाने के चक्कर में अनुशासन व व्यवहार के सारे नियम ताक पर रख दिए जाते हैं.

रावण को जलते देखने के लिए कंपाउंड में जगह न मिले तो पास की ऊंची रेल की पटरी पर चढ़ जाना किसी भी तरह की समझदारी नहीं है पर धार्मिक अंधभक्ति इस तरह की रही है कि बिना जाने जेब की चिंता किए लोग छोटेछोटे बच्चों को ले कर पटरी पर चढ़ गए. अच्छाई की बुराई पर विजय का नारा कितना खूनी हो सकता है, यह साफ है.

धर्म के नाम पर भीड़ को जमा करना और सार्वजनिक जगहों पर शोरशराबा व तमाशा करना बंद करना जरूरी है. जब तक यह न होगा, भीड़ जमा होगी क्योंकि भीड़ से ही पैसा मिलता है और इसी पर धर्म की विशाल इमारत खड़ी है.

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