हालात और नजारा 26 जून, 1975 सरीखे ही थे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को घोषणा की कि आज रात 12 बजे से 500 और 1000 रुपए के नोट अवैध हो जाएंगे. इंदिरा गांधी के आपातकाल से तुलना करें तो नरेंद्र मोदी का लगाया यह आर्थिक आपातकाल उस से कमतर नहीं जिस ने आम लोगों का जीना दुश्वार कर के देश भर में हाहाकार मचा दिया.

इंदिरा गांधी के आपातकाल में जहां लोग गिरफ्तारी के डर से घरों में छिपे बैठे थे या महफूज ठिकानों की तरफ भाग रहे थे वहीं नरेंद्र मोदी के आपातकाल में घरों से निकल कर बैंकों के सामने खड़े नजर आ रहे हैं, क्योंकि वे अगर पुराने नोटों के बदले नए नोट या फिर एटीएम से पैसे नहीं निकालेंगे तो रोजमर्रा के खर्चों को चला पाना मुश्किल होगा. इन दोनों आपातकाल में एक और फर्क यह समझ आया कि इंदिरा गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से सहमति ली थी जबकि नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया. उन्होंने सीधेसीधे फरमान जारी कर दिया कि अब पुराने 1000 और 500 रुपए के नोट रद्दी हो चुके हैं और इन का चलन अब गैरकानूनी हो चुका है.

उस आपातकाल में बोलने की पूरी तरह मनाही थी लेकिन इस आपातकाल में बोलने पर आंशिक छूट है, जो हालांकि सोशल मीडिया के हंसीमजाक तक सिमट कर रह गई है, लेकिन हकीकत बेहद कड़वी है कि नोटबंदी के फैसले के पीछे कोई दूरगामी जनहित की बात नहीं है. और इस से वे समस्याएं भी हल होती नहीं दिखतीं जिन का जिक्र प्रधानमंत्री ने किया है.

क्या है नोटों के रद्दीकरण के पीछे छिपी मंशा और लोग क्यों नोटों की हत्या का गुनाह बरदाश्त कर रहे हैं, इसे 1975 के आपातकाल से ही बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. तब लोगों को बताया जा रहा था कि देश में अराजकता है और इस की एक बड़ी वजह बढ़ती आबादी है. लिहाजा इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी ने नसबंदी का फरमान जारी कर दिया था. लोगों को पकड़पकड़ कर उन की नसबंदी की गई और यह प्रचार भी किया गया कि सारे फसाद, भ्रष्टाचार और परेशानियों की जड़ जनसंख्या विस्फोट है. इसे जैसे भी हो इस पर काबू करना जरूरी है.

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