हर इंसान का जन्म समान रूप से होता है.लेकिन इंसान के जन्म लेने के बाद समाज उसके साथ भेदभाव करते हुए बांट देता है. इंसान को जाति,धर्म से लेकर उसके शारीरिक रंग रूप व शारीरिक बनावट के आधार पर की जाती है.नेत्रहीन यानी कि आंखों की रोशनी खो चुके विकलांगों के साथ सर्वाधिक भेदभाव किया जाता है.नेत्रहीन को बाक्सर बनने की इजाजत नही है.‘बाक्सिंग फेडरेशन नेत्रहीन/दृष्टिहीन दिव्यांग को बाक्सिंग की रिंग में उतरने की इजाजत नहीं देता.

जबकि यूगांडा, इंग्लैंड जैसे देशों में दृष्टिहीन बाक्सर हैं,मगर उन्हें इसे पेशे के रूप में खेलने की इजाजत नहीं है.सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि पैरा ओलंपिक में व्हील चेअर(जिनके पैर नहीं है अथवा जो अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकते) पर बैठे दिव्यांग को बाक्सिंग रिंग में उतर कर बाक्सिंग प्रतियोगिता का हिस्सा बनने का हक है,मगर दृष्टिहीन/अंधे इंसान को पैरा ओलंपिक भी बाक्सर बनने की इजाजत नहीं देता.

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इसे नेत्रहीन विकलांगों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव मानते हुए ही पुरस्कृत फिल्म सर्जक जोड़ी बिजाॅय बनर्जी और कौशिक मंडोल ने एक घंटे की फिल्म ‘ अली: द ब्लाइंड बाक्सर’बनायी है,जो कि जन्म से ही अंधे/दृष्टिहीन बालक के बाक्सर बनने की दास्तान है.यह फिल्म इस बात का भी सबूत है कि एक नेत्रहीन दिव्यांग भी बाक्सर बन सकता है और वह बाक्सिंग रिंग के अंदर आंखों से देख सकने वाले किसी भी बाक्सर के साथ प्रतियोगिता कर सकता है.यानीकि बिजाॅय बनर्जी और कौशिक मंडोल एक ज्वलंत मुद्दे पर मकसदपूर्ण फिल्म लेकर आए हैं, जिसे कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया जा चुका है.

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