रेटिंगः साढ़े तीन स्टार

निर्माताः राम चरण

निर्देशकः सुरेंद्र रेड्डी

संगीतकारः अमित त्रिवेदी

कलाकारः चिरंजीवी, सुदीप, अमिताभ बच्चन, विजय सेतुपथी, जगपथी बाबू, नयनतारा, तमन्ना, रवि किशन, निहारिका कोनोडिया, ब्रम्हानंदम, रघु बाबू, राम चरण, अनुष्का शेट्टी

अवधिः दो घंटे 51 मिनट

दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की 150 वीं जंयती पर फिल्मकार सुरेंद्र रेड्डी देशभक्ति के तड़के से भरपूर बायोग्राफिकल एपिक एक्शन फिल्म ‘‘सैरा नरसिम्हा रेड्डी’’ लेकर आए है. जो कि आंध्रप्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उयालवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी सैरा के जीवन पर एक भव्य एक्शन फिल्म हैं. फिल्म मूलतः तेलुगु भाषा में है, पर हिंदी,  कन्नड़,  मलयालम और तमिल में डब करके प्रदर्शित किया गया है. फिल्म में कितना इतिहास है और कितनी कल्पना इसका दावा तो नहीं किया गया है. मगर एक काल खंड विशेष की बेहतरीन एक्शन फिल्म है.

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कहानी:

आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी उयालवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी के जीवन पर आधारित एक काल्पनिक कहानी है. कहानी शुरू होती है 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से. जब झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के बचे हुए चालिस सैनिक अंग्रजों से युद्ध करने से मना करते हैं, तब झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (अनुष्का शेट्टी) अपने सैनिकों व सेनापति से स्वतंत्रता के लिए युद्ध लड़ने के लिए कहते हुए दस साल पहले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दक्षिण भारत के इनाड़ू के उयालवाडा नरसिम्हा रेड्डी (चिरंजीवी) की कहानी सुनाती हैं. आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के पहलदार हैं, जो अपनी प्रजा और अपनी पत्नी सिद्धम्मा (नयनतारा),  अपनी मां (लक्ष्मी गोपालस्वामी) के साथ खुशी से रहते थे. उन दिनों वहां पर 71 छोटे छोटे राज्यों का समूह था और हर राज्य का मुखिया पहलदार कहा जाता था. उसी समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी व्यवसाय के लिए भारत आई थी, लेकिन जल्द ही भारतीय लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया और भारतीय संसाधनों को लूट कर अपने देश ले जाने लगे.

इधर सैरा नरसिम्हा रेड्डी बचपन में छह साल की उम्र से ही वह पहाड़ी के मंदिर का कार्तिक पूर्णिमा पर दिया जलाने जाने गलते है. बचपन में ही गुरू गोसाई वेनकना (अमिताभ बच्चन) ने सैरा को ऐसी शिक्षा दी है, कि अब उनका मुकाबला करने की शक्ति किसी में नही है. युवावस्था में पहुंचते ही जब नरसिम्हा रेड्डी अंग्रजों के अत्याचारों के साक्षी होते हैं, तो वह उग्र हो जाते हैं. और अकेले ही अंग्रजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजा देते हैं. दूसरे पहलदार उनका साथ नही देते हैं. उधर मंदिर मे नाचने गाने वाली लक्ष्मी (तमन्ना) को वह अपना नाम देते हुए उसे मंगलसूत्र पहना देते हैं, पर उससे कहते हैं कि वह अपनी इस कला का उपयोग लोगों के अंदर आजादी के लिए लड़ने की भावना भरने के लिए करे. इधर घर पहुंचने पर पता चलता है कि बचपन में एक खास परिस्थिति के चलते उनका व्याह सिद्धमा (नयनतारा)से हुआ था.

पर अग्रेजों के बढ़ते अत्याचार से लड़ने के लिए सैरा अपने सिंहासन, पत्नी और मां को छोड़ देते हैं. धीरे धीर अन्य क्षेत्र के पहलदार वीरा रेड्डी (जगपति बाबू), अवुकु राजू (सुदीप), राजा पंडी (विजय सेतुपति) भी सैरा नरसिम्हा रेड्डी के साथ हो जाते हैं. सैरा का ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह शुरू होता है. कई मोड़ आते हैं. अंग्रेज फूट डालो, राज करो की नीति का सहारा लेते हैं. उधर सैरा भी बराबर चैकन्ना रहता है और अपने अंदर के गद्दारों को भी खत्म करता रहता है. अंग्रेज लगातार परास्त होते रहते हैं. पर एक दिन अंग्रेजों की बातों में आकर वीरा रेड्डी (जगपति बाबू) ही सैरा नरसिम्हा रेड्डी को पकड़वा देते हैं. परिणामतः सैरा नरसिम्हा रेड्डी शहीद हो जाते हैं.

निर्देशनः

बतौर लेखक व निर्देशक सुरेंद्र रेड्डी ने बेहतरीन कला कौशल का परिचय दिया है. मगर फिल्म कुछ ज्यादा ही लंबी हो गयी है. इसे एडीटिंग टेबल पर कसने की जरुरत थी. इंटरवल तक दर्शक टकटकी लगाकर फिल्म देखता रहते हैं. मगर इंटरवल के बाद पूरे 45 मिनट तक बहुत कुछ सामान्य सा होता है और दर्शक महसूस करने लगते हैं कि निर्देशक ने फिल्म पर से पकड़ खो दी. सैरा नरसिम्हा की वीरता दिख चुका. इन 45 मिनट में गाना भी ठूंसा लगता है. लेकिन उसके बाद फिल्म जिस चरमोत्कर्ष पर जाती है, वह कमाल का है. फिल्म के कुछ संवाद काफी अच्छे बन पड़े हैं.

फिल्म के एकशन दृश्य काफी बेहतरीन व प्रभावशाली है. पहली बार इसमें एक्शन व युद्ध कौषल के कुछ अनोखे दृश्य पेश किए गए हैं. इंटरवल के बाद तमन्ना भाटिया का अंग्रेजों के सामने आत्मघाती नृत्य रोंगटे खड़ा कर देता है. यह दृश्य लेखक व निर्देशक की कुशाग्र बुद्धि का परिचायक है. मगर फिल्म का क्लायमेक्स जरुरत से ज्यादा मैलोड्ामा वाला हो गया है.देषभक्ति को उकेरने के नाम पर भी क्लाइमेक्स को लंबा खींचा गया है. दर्शक को फिल्म याद रह जाती है, मगर यह भी सच है कि फिल्मकार ने सिनेमाई स्वतंत्रता का भरपूर उपयोग करते हुए इसे मैलोड्रामा ज्यादा बना दिया.

फिल्म की पटकथा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि फिल्मकार ने दिखाया है कि सैरा नरसिम्हा रेड्डी को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हर बार जीत इसलिए मिलती है, क्योंकि वह दुश्मन से लड़ने के अलावा भीतरघाट करने वाले अपनों की भी पहचान करते रहते हैं. मसलन-बासी रेड्डी (रवि किशन), सैरा नरसिम्हा रेड्डी के साथ होते हुए भी ईस्ट इंडिया कंपनी से मिले हुए हैं और एक दिन वे सैरा नरसिम्हा रेड्डी के पूरे परिवार को खत्म करने की योजना बनाते है, पर सैरा को पता चल जाता है और बासी रेड्डी को मौत की सजा मिलती है.

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फिल्म के कैमरामैन आर रथनावेलु की जितनी तारीफ की जाए ,उतनी कम है.विज्युअल इफेक्ट्स भी अच्छे हैं.

कुल मिलाकर फिल्म एक ऐसी देश प्रेम की कहानी को जीवंत करती है, जो अपने देश और अपने लोगों के लिए, अपने देश और उनके बलिदानों के लिए सैरा के जुनून के बारे में बात करती है. यह एक कहानी है कि कैसे योद्धा ने अपने जीवन और यहां तक कि मृत्यु के साथ भविष्य को बदल दिया.

अभिनयः

चिरंजीवी ने पहली बार कास्ट्यूम ड्रामा वाली फिल्म की है. अपनी बेहतरीन अभिनय क्षमता के बल पर वे सैरा नरसिम्हा रेड्डी को जीवंत करने में सफल रहे हैं. 64 साल की उम्र में उन्होंने इस किरदार को न्यायसंगत तरीके से परदे पर उतारने के लिए अपना दिल और आत्मा लगा दिया. किचा सुदीप की प्रतिभा को जाया किया गया है. नयनतारा के हिस्से करने को कुछ रहा ही नहीं. तमन्ना भाटिया के नृत्य लोगों को याद रह जाते हैं. चिरंजीवी के गुरू की छोटी मेहमान भूमिका में अमिताभ बच्च्न ने उत्कृष्ट अभिनय किया है.

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