Nana Patekar Life Story: नाना पाटेकर को समझना आसान नहीं है. वे ऐसे अभिनेता थे जिन की आंखों में एकसाथ गुस्सा, दर्द, बेचैनी और करुणा दिखाई देती थी. वेव परदे पर आते थे तो कई बार लगता था कि सामने कोई कलाकार नहीं, बल्कि जिंदगी से लड़ता हुआ एक असली आदमी खड़ा है. उन के संवादों में नाटकीयता जरूर होती थी लेकिन उन की आवाज के भीतर ऐसा आक्रोश भी सुनाई देता था जिसे दर्शक अपनी जिंदगी से जोड़ लेते थे.
भारतीय सिनेमा में ढेर सारे कलाकारों ने गुस्सैल किरदार निभाए. ढेर सारे कलाकारों ने पुलिस अफसर, अपराधी, ईमानदार अफसर, नेता और आम आदमी का किरदार परदे पर साकार किया. लेकिन नाना पाटेकर की खासीयत यह थी कि वे सिनेमाई परदे पर इन किरदारों को केवल अपने अभिनय से निभाते नहीं थे, बल्कि उन की पूरी शारीरिक भाषा, बोलने के ढंग, चेहरे की मांसपेशियों और आंखों के इस्तेमाल से उन्हें एक अलग पहचान दे देते थे. उन की आवाज में एक खुरदरापन था. उन के चेहरे पर पारंपरिक फिल्मी नायक या यों कहें कि चौकलेटी हीरो वाली चमक नहीं थी, फिर भी सिनेमा के परदे पर उन के सामने हर दिग्गज कलाकार बौना नजर आता था.
नाना पाटेकर की अभिनय यात्रा का एक सिरा मुंबई की गलियों, गरीबी और संघर्ष से जुड़ा रहा, तो दूसरा सिरा मराठी रंगमंच की गंभीर परंपरा से. नाना पाटेकर का एक सिरा उन के सामाजिक काम अर्थात उन के ‘नाम फाउंडेशन’, किसानों के सवालों और राजनीतिक टिप्पणियों तक जाता है.
उन की जिंदगी में विरोधाभास भी कम नहीं थे. एक तरफ वे किसानों की मदद के लिए अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा देने की बात करते थे, दूसरी तरफ उन की सार्वजनिक टिप्पणियों को ले कर कई बार विवाद होता था. कभी वे बालासाहेब बाल ठाकरे के काफी करीबी माने जाते रहे. मीडिया रिपोर्टस की मानें तो महाराष्ट् में कांग्रेसी व भाजपाई दोनों सरकारों के भ्रष्टाचार पर मिट्टी डालने का काम करते रहे. पिछले कुछ वर्षों से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के प्रति उन के रुख को ले कर भी बहस होती रही. पर नाना पाटेकर हमेशा दावा करते रहे कि उन का किसी राजनीतिक पार्टी से कोई संबंध नही. जबकि, 2024 के चुनाव के दौरान नाना पाटेकर ने खुलेआम नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का ऐलान किया था.
13 साल की उम्र, 35 रुपए की नौकरी
महज 13 साल की उम्र में नाना पाटेकर ने स्कूल की पढ़ाई के बाद मुंबई के चुनाभट्टी इलाके में फिल्मों के पोस्टर रंगने व चिपकाने का काम करना शुरू कर दिया, जिस के लिए उन्हें हर माह 35 रुपए की तनख्वाह मिलती थी.
एक बातचीत में कहा था कि 13 साल की उम्र में काम शुरू करने के कारण वे बहुत जल्दी बड़े हो गए.
13 साल की उम्र से गरीबी की मार झेलते हुए नाना पाटेकर ने अपेन निजी जीवन में जो कुछ अनुभव किया था, वही सब बाद में नाना पाटेकर के अभिनय से सजे किरदारों में नजर आया. जी हां, उन के किरदारों में अकसर एक ऐसा आदमी दिखाई देता है जो व्यवस्था से नाराज है, लेकिन केवल शिकायत नहीं करता. वह अपनी जगह बनाने के लिए लड़ता है.
नाना पाटेकर ने भूख और आर्थिक असुरक्षा को करीब से देखा था. इसी अनुभव के चलते कालांतर में जब वे किसानों के परिवारों से मिले, आत्महत्या करने वाले किसानों की विधवाओं की स्थिति देखी और पानी के संकट से जूझते गांवों पर नजर दौड़ाई तो वे किसानों के दर्द को दिल की गहराइयों से समझ सके और ‘नाम फाउंडेशन’ का ऐलान हुआ.
बचपन का संघर्ष इंसान को कठोर भी बना सकता है, संवेदनशील भी और अति गुस्सैल भी. नाना के व्यक्तित्व में दोनों बातें दिखाई देती थीं. वे गुस्सैल कभी थे. पर इन के अंदर समाज के कमजोर लोगों के प्रति गहरी बेचैनी भी थी. अपने व्यक्तित्व की इसी खासीयत के चलते वे मेहुल कुमार की फिल्म ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक के किरदार को ऐसी जीवंतता दे पाए कि फिल्म देख कर दिलीप कुमार ने कहा था- ‘नाना पाटेकर क्रांतिवीर है और हमेशा क्रांतिवीर ही रहेंगे.’
जे जे स्कूल औफ आर्ट्स से पढ़ाई पूरी कर बने अभिनेता
नाना पाटेकर ने मुंबई में बांद्रा के स्कूल औफ आर्ट्स में पढ़ाई की, जिसे आज एल एस रहेजा स्कूल औफ आर्ट्स के नाम से जाना जाता है. इस के बाद उन्होंने सर जे जे स्कूल औफ कमर्शियल आर्ट्स में अध्ययन किया और कमर्शियल आर्ट्स की पढ़ाई पूरी की. 1971 के आसपास वे इस शिक्षा के बाद विज्ञापन की दुनिया में काम करने लगे. सर जे जे स्कूल औफ आर्ट्स की पढ़ाई ने उन्हें दृश्य, आकार, रंग और अभिव्यक्ति को देखने की एक अलग दृष्टि दी. विज्ञापन एजेंसी में नौकरी के दौरान उन के भीतर अभिनय की इच्छा भी धीरेधीरे आकार लेने लगी थी. इसी के साथ वे विजया मेहता के साथ मराठी रंगमंच से भी जुड़ चुके थे. पर अभिनेता बनने की लालसा ऐसी तीव्र हुई कि एक दिन उन्होंने नौकरी छोड़ दी. एक बार नाना पाटेकर ने बताया था कि वे विज्ञापन एजेंसी में कमर्शियल आर्टिस्ट और विजुअलाइजर के रूप में काम करते थे.
मराठी रंगमंच ने उन्हें अभिनय की वह बुनियाद दी, जो आगे चल कर हिंदी सिनेमा में उन की पहचान बनी. नाना की अभिनय शैली में मंच का अनुशासन दिखाई देता है. आप उन के किसी भी किरदार को उठा लीजिए. वे संवाद बोलते समय केवल शब्दों पर जोर देते हुए नजर नहीं आएंगे क्योंकि वे शब्दों के बीच की खामोशी को भी इस्तेमाल करते थे. उन का चेहरा कई बार उस बात को व्यक्त कर देता था जिसे संवाद में कहने की जरूरत नहीं होती थी. उन का गुस्सा भी केवल आवाज ऊंची करने से पैदा नहीं होता था. कई बार वे शांत खड़े रहते थे और उन की आंखें ही दृश्य का तनाव बढ़ा देती थीं. नाना पाटेकर ने मराठी रंगमंच पर उन नाटकों में काम किया जिन में मनुष्य के भीतर के संघर्ष, समाज की विडंबनाएं और रिश्तों की जटिलता महत्त्वपूर्ण थीं. मसलन, आप जयवंत दलवी के नाटक ‘पुरुष’ को लीजिए. इस नाटक में लंबे समय तक नाना पाटेकर अभिनय करते रहे. परिणामतया उन की रंगमंचीय पहचान मजबूत हुई.
यही वजह है कि हिंदी फिल्मों से जुड़ने के बाद भी वे पूरी तरह व्यावसायिक ढर्रे के अभिनेता नहीं बने. उन्होंने ऐसे किरदार चुने जो कई बार कहानी के नायक से अधिक जटिल थे. वे खलनायक बनते थे तो उस में भी केवल बुराई नहीं होती थी. वे पुलिस अधिकारी बनते थे तो उस में भी व्यवस्था की कठोरता और निजी नैतिकता के बीच संघर्ष दिखाई देता था.
नाना पाटेकर के फिल्मी कैरियर में स्मिता पाटिल का योगदान
मुंबई के फिल्मसिटी स्टूडियो में फुरसत के पलों के दौरान हम से बातचीत करते हुए नाना ने कहा था कि स्मिता पाटिल ने उन्हें फिल्मों में आने के लिए प्रोत्साहित किया. स्मिता पाटिल ने ही उन्हें फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली से मिलवाया था और मुजफ्फर अली ने 1978 में रिलीज फिल्म ‘गमन’ में नाना पाटेकर को वासु का किरदार निभाने का अवसर दिया था.
‘गमन’ के बाद नाना पाटेकर स्टार बन गए हों, ऐसा कुछ नहीं हुआ. लेकिन धीरेधीरे उन्होंने अपने लिए ऐसी जगह बनाई कि जहां अभिनय की गुणवत्ता चेहरे की लोकप्रियता से अधिक महत्त्वपूर्ण थी. 1984 में रवि चोपड़ा निर्देशित ‘आज की आवाज’ फिल्म ने एक पहचान दी. 1986 में एन चंद्रा निर्देशित फिल्म ‘अंकुष’ उन के कैरियर की एक महत्त्वपूर्ण फिल्म साबित हुई. इस में उन्होंने ऐसे युवा की भूमिका निभाई जो सामाजिक अन्याय, बेरोजगारी और व्यवस्था की उदासीनता से जूझ रहा है. फिल्म में उन का किरदार केवल निजी सफलता की तलाश में नहीं था. उस के आसपास की सामाजिक परिस्थितियां उसे लगातार प्रभावित करती थीं. इस तरह का चरित्र नाना की आगे की फिल्मों का भी एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बना.
फिल्म ‘अंकुश’ ने यह संकेत दिया कि नाना केवल सहायक अभिनेता या खलनायक बन कर सीमित नहीं रहेंगे. वे ऐसी फिल्मों के केंद्र में भी आ सकते हैं जिन का मुख्य आकर्षण उन का अभिनय और कहानी का सामाजिक तनाव हो. तभी तो एक साल बाद ही वे एन चंद्रा की ही फिल्म ‘प्रतिघात’ में हीरो बन कर आ गए थे.
उन की शुरुआती फिल्मों में जो बेचैनी थी, वह आगे चल कर उन के सबसे चर्चित किरदारों की पहचान बन गई. विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में अपराध की दुनिया, ‘प्रहार’ में सैन्य अनुशासन और नैतिकता, ‘क्रांतिवीर’ में व्यवस्था के प्रति आक्रोश और ‘अब तक छप्पन’ में पुलिस तंत्र की जटिलता. इन फिल्मों में अलगअलग किरदार होते हुए भी एक ऐसा कलाकार नजर आता है जो अपने किरदार को केवल कहानी का हिस्सा नहीं रहने देता, बल्कि उसे अपने भीतर की पूरी ऊर्जा से भर देता है.
परिंदाः जब नाना पाटेकर का अन्ना परदे से निकल कर दर्शकों के मन में बैठ गया
1989 में विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ रिलीज हुई थी. मुंबई की अंडरवर्ल्ड दुनिया, अपराध, हिंसा और भाईचारे के बीच टकराव को फिल्म ने एक ऐसे माहौल में प्रस्तुत किया, जो उस समय की मुंबई की बेचैनियों से जुड़ा हुआ था.
नाना ने फिल्म में अन्ना नाम के गैंगस्टर की भूमिका निभाई. यह उन के कैरियर की सब से यादगार भूमिकाओं में से एक है. अन्ना का किरदार क्रूर था, लेकिन उस की क्रूरता केवल गुस्से का परिणाम नहीं थी. वह अपराध की दुनिया के अपने नियमों में विश्वास करता था. उस के लिए ताकत, नियंत्रण और वफादारी की अपनी परिभाषा थी. वह दूसरों को डरा कर अपनी सत्ता बनाए रखता था और अपने साम्राज्य को किसी भी कीमत पर बचाना चाहता था.
इस फिल्म के सैट पर नाना पाटेकर पूरी तरह से अपने किरदार में डूबे हुए थे. एक दिन सैट पर विधु विनोद चोपड़ा के संग उन की अनबन हो गई. नाना ने उन्हें एक थप्पड़ जड़ दिया. फिर विधु विनोद चोपड़ा भी हाथापाई पर उतर आए. इस हाथापाई में नाना पाटेकर ने जो शर्ट पहन रखी थी, वह फट गई. शरीर पर सिर्फ बनियाइन बची थी. नाना ने बनयाइन पहने हुए ही उस सीन को शूट करवाया. और उस वक्त जो कुछ सैट पर हुआ था, उस का गुस्सा वगैरह सबकुछ उन के चेहरे पर मौजूद था. फिल्म में यह सीन मौजूद है. कुछ साल बाद इस संबंध में जब नाना पाटेकर से बात हुई थी तो उन्होंने साफसाफ कहा था कि वे अपने गुस्से पर काबू रखना जानते हैं. पर सैट पर गलत बात बरदाश्त नहीं फिर चाहे वह फिल्म के निर्माता की बात हो या निर्देशक की हो या कलाकार की ही क्यों न हो.
फिल्म ‘परिंदा’ का चर्चित संवाद है, ‘धंधे में कोई किसी का भाई नहीं, कोई किसी का बेटा नहीं.’ इस एक वाक्य में अन्ना की दुनिया का पूरा दर्शन छिपा है. यह संवाद लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इस में एक अपराधी की मानसिकता के साथ उस व्यवस्था की कठोर सच्चाई भी दिखाई देती है, जिस में पैसा और सत्ता रिश्तों पर भारी पड़ जाते हैं.
इस भूमिका के लिए नाना को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला. यह पुरस्कार उन के कैरियर का महत्त्वपूर्ण पड़ाव था.
फिल्म ‘परिंदा’ का किरदार और निजी जीवन में गैंगस्टर से संबंध फिल्म ‘परिंदा’ की सफलता व राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद एक अहम सवाल उठा कि ‘क्या किसी अभिनेता का परदे पर गैंगस्टर का किरदार निभाना उस के निजी जीवन को अपराध से जोड़ने का आधार नहीं हो सकता?’ इस सवाल का उठना लाजिमी भी था.
कटु सच यह है कि अगर नाना पाटेकर की मां ने नाना पाटेकर को अपने मायके यानी कि नाना व मामा से दूर न रखा होता तो नाना पाटेकर अभिनेता होने के बजाय कोई मशहूर गैंगस्टर बनते. नाना पाटेकर के सगे मामा का लड़का मान्या सुर्वे अति खूंखार गैंगस्टर था, जिस पर 2013 में फिल्मकार संजय गुप्ता ने फिल्म ‘शूटआउट एट वडाला’ बनाई थी. इस से पहले 1990 में ‘अग्निपथ’ में अमिताभ बच्चन तथा 2012 की ‘अग्निपथ’ में रितिक रोशन द्वारा निभाया गया विजय दीनानाथ चौहान का किरदार भी मान्या सुर्वे के जीवन से प्रेरित था. अपनी मां के कारण नाना पाटेकर अपनी जिंदगी में कभी भी अपने मामा या ममेरे भाई से नहीं मिले थे.
फिल्म ‘प्रहार‘ में केवल अभिनेता नहीं, निर्देशक भी
1991 में नाना पाटेकर ने ‘प्रहारः द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया. फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया और भारतीय सेना के प्रशिक्षण, अनुशासन तथा एक सैनिक की मानसिकता को केंद्र में रखा. इस फिल्म में उन के साथ माधुरी दीक्षित और डिंपल कपाड़िया भी थीं.
नाना पाटेकर ने इस फिल्म में सवाल उठाया था कि हिंसा और अनुशासन के बीच फर्क कहां है? सेना का जवान कठोर प्रशिक्षण से गुजरता है, लेकिन जब वह सामान्य समाज में लौटता है तो क्या समाज उस के अनुभवों और मानसिकता को समझ पाता है?
‘प्रहार’ में नाना पाटेकर ने फिल्म में मेजर प्रताप चौहान का किरदार निभाया. यह ऐसा व्यक्ति था जिस के जीवन में अनुशासन केवल नौकरी का हिस्सा नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवनदृष्टि बन गया था. उस के लिए नियम, जिम्मेदारी और कर्तव्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे. लेकिन समाज में अपराध और भ्रष्टाचार को देख कर उस की प्रतिक्रिया उस व्यवस्था से टकराने लगती है, जो कानून के सहारे चलनी चाहिए. इस फिल्म में नाना का गुस्सा केवल निजी अपमान से पैदा नहीं होता. वह एक ऐसे व्यक्ति का गुस्सा है जो दुनिया को अपने नैतिक मानकों से देखता है और जब उसे लगता है कि उन मानकों का लगातार उल्लंघन हो रहा है तो वह असहज हो उठता है.
क्रांतिवीरः जिस ने गुस्से को जनभाषा बना दिया
1994 में रिलीज हुई मेहूल कुमार निर्देशित फिल्म ‘कांतिवीर’ में नाना पाटेकर ने प्रताप नारायण तिलक की भूमिका निभाई. एक ऐसा व्यक्ति, जिस के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरी नाराजगी थी. वह अन्याय को देख कर चुप नहीं रह सकता था, लेकिन उस की भाषा और व्यवहार पारंपरिक सभ्य समाज के मानकों से मेल नहीं खाते थे. प्रताप नारायण तिलक का चरित्र आम आदमी के उस गुस्से का प्रतिनिधित्व करता था, जो अकसर संस्थाओं के सामने खुद को असहाय महसूस करता है. भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक तनाव, राजनीतिक अवसरवाद और अपराध से परेशान व्यक्ति के पास जब अपनी बात रखने के रास्ते कम रह जाते हैं, तब उस का आक्रोश विस्फोटक हो सकता है. इस फिल्म में उन के संवाद लंबे थे, आवाज ऊंची होती थी और चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई देता था. उन की प्रस्तुति में उस आदमी की बेचैनी थी, जिसे लगता है कि अगर वह चुप रहा तो गलत काम सामान्य बात बन जाएंगे.
‘क्रांतिवीर’ के बाद नाना पाटेकर ने अपने समकक्ष दूसरे कलाकारों की तरह खुद को उसी तरह के किरदारों तक सीमित नहीं रखा. वे फिल्म ‘खामोशी’ में संवेदनशील पिता बने, ‘अब तक छप्पन’ में नियमों व हिंसा के बीच फंसे पुलिस अधिकारी बने तो वहीं फिल्म ‘वेलकम’ में हास्य पैदा करने वाला विचित्र किरदार निभा कर शोहरत पर शोहरत बटोरते रहे.
खामोशीः क्रोध के पीछे छिपा संवेदनशील अभिनेता
‘क्रांतिवीर’ में लंबेलंबे संवाद अदायगी कर दर्शकों का दिल जीतने के 2 साल बाद 1996 में संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म ‘खामोशीः द म्यूजिकल’ में वे जोसेफ ब्रागांजा के पात्र में नजर आए. वह एक ऐसा पिता था जो सुन और बोल नहीं सकता, लेकिन अपनी बेटी के जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है. फिल्म में मनीषा कोइराला और सलमान खान भी थे.
‘खामोशी’ में जोसेफ को अपने परिवार से प्रेम है, लेकिन वह उस प्रेम को हमेशा आसान तरीके से व्यक्त नहीं कर पाता. उस के दिल में पिता की चिंता है, सामाजिक असुरक्षा है और अपनी बेटी के भविष्य को ले कर डर भी है. यह किरदार केवल एक दिव्यांग व्यक्ति का चित्रण नहीं था, बल्कि ऐसे पिता का चित्रण था जो अपनी सीमाओं के बावजूद अपने परिवार को सुरक्षित रखना चाहता है. नाना ने इस भूमिका में चेहरे, आंखों, हाथों और शारीरिक प्रतिक्रियाओं का बहुत बारीक इस्तेमाल किया. जोसेफ के किरदार में पिता और बेटी के रिश्ते की जटिलता दिखाई देती है.
‘अग्निसाक्षी’ और ‘गुलाम ए मुस्तफा’
खामोशी के ठीक विपरीत 1996 में ही रिलीज फिल्म ‘अग्निसाक्षी’ में नाना पाटेकर ने विश्वास नाम के ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई, जिस के व्यवहार में नियंत्रण, हिंसा और मानसिक अस्थिरता का खतरनाक मिश्रण था.
फिर एक साल बाद ही आई ‘गुलाम ए मुस्तफा’. इस फिल्म में नाना पाटेकर ने अपराध की दुनिया से जुड़े एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया जिस के भीतर वफादारी, हिंसा और भावनात्मक लगाव का टकराव था.
यहां एक बड़ा प्रश्न उभरता है. जब कोई अभिनेता बारबार अपराधियों की भूमिका निभाता है तो क्या दर्शक उसे उसी रूप में देखने लगते हैं? नाना के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.
अब तक छप्पनः एन्काउंटर स्पैशलिस्ट
फिल्मकार राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘अब तक छप्पन’ 2004 में रिलीज हुई. इस में नाना ने पुलिस अधिकारी साधु आगाशे की भूमिका निभाई. इस में एक ऐसे अधिकारी को दिखाया गया जो अपराधियों के खिलाफ बेहद कठोर कार्रवाई करता है और अपनी कार्यशैली के कारण पुलिस व्यवस्था के भीतर भी विवादों में रहता है. साधु आगाशे ईमानदार पुलिस अधिकारी होने के साथ ही अपराध से लड़ने के लिए हिंसा का इस्तेमाल करता है. लेकिन उस के तरीके लोकतांत्रिक कानून व्यवस्था के लिए कठिन सवाल खड़े करते हैं. हिंसा उसे नैतिक सवालों के सामने खड़ा करती है.
अपहरण, राजनीति और सत्ता की भाषा
2005 में रिलीज प्रकाश झा की फिल्म ‘अपहरण’ में नाना पाटेकर अपराध और राजनीति के बीच की दूरी मिटाने वाले तबरेज आलम की भूमिका में नजर आए और 2010 में प्रकाश झा की ही फिल्म ‘राजनीति’ सत्ता के लिए संघर्ष की थी.
निजी जीवन में उन की सार्वजनिक छवि का एक हिस्सा यह था कि वे किसी भी सरकार या दल की आलोचना करने से पीछे नहीं हटते थे. यह अलग बात है कि बाद में वे नरेंद्र मोदी के भक्त बन गए थे.
वेलकमः अपने ही गंभीर व्यक्तित्व का मजाक उड़ाना
2007 में अनीस बज्मी की फिल्म ‘वेलकम’ आई, जिस में नाना ने उदय शेट्टी का किरदार निभाया. अनिल कपूर के साथ उन की जोड़ी फिल्म के हास्य का बड़ा आधार बनी. उदय शेट्टी एक गैंगस्टर है जो अपनी बहन की शादी के मामले में असहाय हो जाता है. वह समाज के सामने सम्मानित दिखना चाहता है, जबकि उस का अपना अतीत उसे लगातार परेशान करता है. ‘वेलकम’ की लोकप्रियता ने नाना की पहुंच उन दर्शकों तक भी बढ़ाई, जो शायद उन की गंभीर फिल्मों को पसंद नहीं करते थे. उन के किरदार के संवाद और प्रतिक्रियाएं लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए.
मेहूल कुमार और नाना पाटेकर
फिल्म उद्योग में नाना को ले कर एक धारणा थी. उन के बारे में कहा जाता था कि वे आसान अभिनेता नहीं हैं. लेकिन फिल्मकार मेहूल कुमार ने उन्हें अलग नजर से देखा. उन्होंने नाना में सिर्फ गुस्सा नहीं देखा. उन्होंने एक ऐसा अभिनेता देखा, जो अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभा सकता था. इसलिए मेहुल कुमार ने नाना पाटेकर के साथ एकदो नहीं बल्कि ‘तिरंगा’ व ‘क्रांतिवीर’ सहित 3 फिल्में बनाईं.
‘क्रांतिवीर’ फिल्म नाना पाटेकर के कैरियर का शायद सब से बड़ा मोड़ बनी. प्रताप नारायण तिलक का एक ऐसा किरदार जो व्यवस्था से लड़ता है, राजनीति पर सवाल उठाता है, सामाजिक अन्याय पर सवाल उठाता है. सब से महत्त्वपूर्ण फिल्म का वह दृश्य याद कीजिए जब नाना का किरदार प्रताप खून की शीशियां ले कर सवाल करता है. हिंदू का खून कौन सा है? मुसलमान का खून कौन सा है? क्या कोई फर्क दिखाई देता है? सवाल बहुत साधारण था. लेकिन उस के पीछे चोट बहुत गहरी थी. ‘क्रांतिवीर’ 1994 में आई थी. उस समय देश ने सांप्रदायिक तनाव और दंगों का दर्द देखा था.
मराठी सिनेमाः एक बूढ़ा कलाकार
नाना पाटेकर के कैरियर की चर्चा हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. नाना पाटेकर ने मराठी रंगमंच से शुरुआत कर 2016 में मराठी फिल्म ‘नटसम्राट’ में गणपत रामचंद्र बेलवलकर की भूमिका में एक ऐसे बुजुर्ग रंगमंच कलाकार का था, जिस ने अपना जीवन अभिनय को समर्पित कर दिया.
निजी जीवनः नीलकांति से विवाह और लगभग 35 साल अलग रहना
नाना पाटेकर ने अभिनय जगत में जितनी भी उंचाईयां छूईं, वह उन की पत्नी नीलकांति पाटेकर के योगदान के बिना असंभव था. यों तो बैंककर्मी नीलकांति पाटेकर भी अभिनय से जुड़ी थीं. दोनों की मुलाकात रंगमंच के दौर में हुई थी और 1978 में उन का विवाह हुआ. जब वे नाटकों में काम कर के बहुत कम पैसे कमाते थे, नीलकांति की नौकरी परिवार के लिए स्थिरता का स्रोत थी. अफसोस सफलता हासिल करने के बाद नाना पाटेकर अपनी पत्नी के इस अमूल्य योगदान का सम्मान न कर सके. और, वे दोनों बिना तलाक के पिछले 35 साल से अलगअलग रह रहे थे.
शादी के बाद उन के घर एक नन्हे फरिश्ते ने जन्म लिया. उन का पहला बेटा दुर्वासा था. नाना बेहद खुश थे. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. उन का वह पहला बेटा दुर्वासा बचपन में ही एक गंभीर बीमारी का शिकार हो गया और उस ने महज ढाई साल की उम्र में नाना की बांहों में दम तोड़ दिया. एक पिता के लिए अपने मासूम बच्चे के जनाजे को कंधा देने से बड़ा दर्द दुनिया में कोई नहीं हो सकता. इस सदमे ने नाना को हिलाकर रख दिया. वे हफ्तों तक चुप रहे, रोते रहे. दिन में 60 सिगरेट पीते रहे. फिर एक दिन उन की बहन ने उन्हें चांटा जड़ते हुए सिगरेट न पीने के लिए कहा था. लोगों का मानना है कि उसी हादसे के बाद नाना का स्वभाव एकदम चिड़चिड़ा और गुस्सैल हो गया. उन्होंने अपने दर्द को छिपाने के लिए गुस्से का मुखौटा पहन लिया. मगर खुद नाना कुबूल कर चुके हैं कि वे बचपने से ही गुस्सैल थे. बाद में उन का दूसरा बेटा हुआ, मल्हार पाटेकर, जो नाना पाटेकर के प्रोडक्शन व उन के सामाजिक काम की जिम्मेदारी संभालते हुए हमेशा लाइमलाइट से दूर रहा.
नाना और नीलकांति के बेटे मल्हार ने उन के संबंधों के बारे में कहा कि शारीरिक दूरी के बावजूद भावनात्मक जुड़ाव बना रहा. इस बयान से पता चलता है कि एक ही घर में न रहना और रिश्ता पूरी तरह समाप्त हो जाना 2 अलग बातें हैं.
यह कितना अजीब संयोग है कि परदे पर अकसर परिवार, वफादारी और रिश्तों के बारे में गहरे भावनात्मक किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर अपने वास्तविक जीवन में वैसे नहीं थे. उन का पारिवारिक रिश्ता अलग तरह की जटिलताओं से गुजरा.
अंडरवर्ल्ड से रिश्ता
दिसंबर 2024 में एक बातचीत के दौरान नाना ने यह बात कही थी कि अगर वे अभिनेता नहीं बने होते, तो संभव है कि अंडरवर्ल्ड की दुनिया में चले गए होते.
नाना पाटेकर ने ऐसा क्यों कहा था? क्योंकि नाना पाटेकर का खून सीधेतौर पर मुंबई के सब से खूंखार और बेरहम गैंगस्टर ‘मन्या सुर्वे’ से मिलता था. नाना ने बताया था कि उन का बचपन मुंबई के माहौल से दूर मुरुड-जंजीरा में गुजारा गया. उन की मां चाहती थीं कि बच्चों पर ननिहाल में मौजूद अपराधी माहौल का असर न पड़े. नाना के मुताबिक, अगर वे मुंबई में उसी माहौल में पलेबढ़े होते तो उन की जिंदगी की दिशा अलग हो सकती थी.
जब कारगिल के युद्ध का हिस्सा बने
नाना सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, उन के भीतर एक असली फौजी छिपा था. साल 1999, जब भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल की पहाड़ियों पर गोलियां चल रही थीं, देश के जवान शहीद हो रहे थे तब मुंबई का यह सुपरस्टार चैन से एयरकंडीशनर कमरे में नहीं बैठ सका. नाना पाटेकर ने सीधे तत्कालीन रक्षा मंत्री जौर्ज फर्नांडीस को फोन लगा दिया. नाना ने गरजते हुए कहा, ‘‘मुझे बौर्डर पर भेजो, मैं कारगिल जाना चाहता हूं और अपने देश के लिए लड़ना चाहता हूं.’’ लोग हैरान रह गए. किसी को लगा कि यह कोई पब्लिसिटी स्टंट है, लेकिन नाना सचमुच कारगिल पहुंच गए. भारतीय सेना के मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ उन्होंने 3 साल तक कड़ा सैन्य प्रशिक्षण लिया था. उन्हें मानद कैप्टन और बाद लैफ्टिनैंट कर्नल का पद भी मिला था. कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने जवानों के साथ कंधे से कंधा मिला कर वक्त बिताया. उस भयंकर ठंड और तनाव के बीच नाना का वजन 20 किलो तक घट गया था.
तनुश्री दत्ता ने लगाया ‘मी टू’ का आरोप
कहते हैं कि जहां रोशनी होती है, वहां अंधेरा भी होता है. नाना पाटेकर का जीवन भी विवादों से अछूता नहीं रहा. साल 2018 में जब भारत में ‘मी टू’ आंदोलन की आंधी आई, तो नाना पाटेकर का नाम सब से बड़े विवाद में घसीटा गया. अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने उन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए. इस एक विवाद ने नाना के कैरियर पर ऐसा ब्रेक लगाया कि वे सालों तक फिल्मों से दूर हो गए. अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने आरोप लगाया था कि 2008 में फिल्म ‘हौर्न ओके प्लीज’ की शूटिंग के दौरान एक गाने के दृश्य को ले कर नाना ने उन के साथ अनुचित व्यवहार किया था. नाना ने आरोपों से इनकार किया था. बाद में नाना को कानूनन बरी कर दिया गया था. लेकिन नाना पाटेकर के देहांत के बाद भी तनुश्री अपने आरोपों पर कायम हैं. मार्च 2025 में मुंबई की एक अदालत ने इस मामले से संबंधित आपराधिक कार्यवाही को पर्याप्त साक्ष्य न होने और कानूनी सीमाओं से जुड़े आधारों पर समाप्त कर दिया. तब तक नाना पाटेकर पूरी तरह से भाजपाभक्त बन चुके थे.
कांग्रेस और लोकतंत्र को ले कर उन का नजरिया
नाना ने एक समय कांग्रेस की तारीफ करते हुए कहा था कि भारत में इतने लंबे समय तक लोकतंत्र कायम रहने का श्रेय कांग्रेस को जाता है. उन्होंने यह भी कहा था कि शरद पवार को बहुत पहले प्रधानमंत्री बन जाना चाहिए था और वे उन्हें इस पद पर देखना चाहते थे. तब नाना का जोर लोकतांत्रिक संस्थाओं के लंबे अनुभव और देश की राजनीतिक यात्रा में कांग्रेस की ऐतिहासिक भूमिका पर था.
नाना पाटेकर ने कई बार कांग्रेस सरकारों के कामकाज का बचाव किया था और बाद में भाजपा के प्रति उन का झुकाव बढ़ गया.
2024 में मोदी को ले कर क्या कहा
2024 के लोकसभा चुनाव के आसपास नाना के राजनीतिक रुख को ले कर चर्चा हुई. मार्च 2024 में नासिक में किसानों की एक सभा को संबोधित करते हुए नाना ने कहा था कि किसानों को अच्छे दिनों का इंतजार करते रहने के बजाय अपनी परिस्थितियां बदलने के लिए प्रयास करना चाहिए. उन्होंने राजनीतिक दलों की कार्यशैली पर सवाल उठाए और कहा कि किसानों को तय करना चाहिए कि कौन सी सरकार सत्ता में आए. उन्होंने सरकारों से किसानों की समस्याओं पर ध्यान देने की मांग भी की. नाना ने यह भी कहा कि नरेंद्र मोदी 2024 में भी प्रधानमंत्री बनेंगे. Nana Patekar Life Story




