Delhi Air Pollution: दशहरा खत्म हो गया. अब दिल्ली में सांस लेना मुश्किल हो रहा है. हर साल का यही ड्रामा है. 9 अक्टूबर को दिल्ली भर में 100 फुट, 120 फुट, 150 फुट के रावण जलाये गए. कहीं गृहमंत्री अमित शाह चीफ गेस्ट रहे तो कहीं सीएम रेखा गुप्ता और कहीं उपराष्ट्रपति. रामलीला कमिटियों के मंच पर हाथ में तीर कमान लिए बड़े बड़े बीजेपी नेता पहुंचे. मैदान में हजारों किलो लकड़ी, पुआल, प्लास्टिक, केमिकल वाले बारूद से बने रावण मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतले. इन पुतलों में आग लगते ही AQI 300 पार पहुंच गया.
सवाल बहुत सीधा है. रावण जलाना आस्था है या इवेंट मैनेजमेंट? अगर आस्था है तो 10 फुट का रावण भी काफी है. प्रतीक तो प्रतीक होता है. रावण के पुतले में आत्मा तो नहीं होती कि 100 फुट वाली ज्यादा पवित्र होगी और 10 फुट वाली कम. राम ने जिस रावण को मारा था कहते हैं कि वह अहंकार का प्रतीक था तो सवाल यह है कि यह अहंकार 10 फुट में क्यों नहीं जल सकता? उसे 100 फुट का बनाने की जरूरत क्यों? जवाब सीधा है. जरूरत इसलिए पड़ती है क्योंकि बड़ा रावण होगा तो बड़ा मंच होगा. बड़ा मंच होगा तो बड़ा नेता आयेगा. बड़ा नेता आयेगा तो मीडिया कवरेज बड़ा होगा. बड़ा कवरेज होगा तो वोट भी थोक में मिलेगा. रावण के बहाने नेता अपनी PR जलाते हैं और धुआं जनता के फेफड़ों में जाता है.
अमित शाह ने रावण जलाकर AQI 300 पार कर दिया लेकिन पर्यावरण मंत्री चुप रहे. रेखा गुप्ता ने रावण जलाया और अगले ही दिन पराली पर ज्ञान बघारने लगीं. यही पाखंड है. अक्टूबर आते ही सरकार कहती है. गाड़ी मत चलाओ, पराली मत जलाओ लेकिन उसी अक्टूबर में 5000 जगहों पर रावण जला कर प्रदूषण को खतरनाक तक पहुंचा दिया जाता है. एक रावण में 300 किलो से ज्यादा लकड़ी, टायर, पेंट और बारूद लगता है. पूरी दिल्ली में हजारों रावण जलते हैं. मतलब एक रात में हजारों टन कार्बन दिल्ली की हवा में घोल दिया जाता है.
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