Partition 1947: 14 अगस्त 2026 को ‘बंटवारा 1947’ रिलीज हुई और इस फ़िल्म के साथ ही विवाद भी शुरू हो गया. आरएसएस ने आईटी सेल के जरिये अपना पुराना राग अलापना शुरू कर दिया कि भारत के बंटवारे के लिए जवाहरलाल नेहरू और उनकी कांग्रेस पार्टी जिम्मेदार है अगर बंटवारा नहीं होता तो हिन्दुओं को अखंड भारत मिल जाता. आरएसएस का नेरेटिव असल में बेहद भौंडा और इतिहास की समझ से कोसों दूर नजर आता है. सवाल यह है कि क्या बंटवारे के लिए नेहरू या उनकी कांग्रेस जिम्मेदार हैं? अगर बंटवारा नहीं होता तो क्या होता?
‘बंटवारा 1947’ फ़िल्म की कहानी भारत के विभाजन के उस दौर की है, जब देश आजादी के साथ-साथ भयानक हिंसा, डर और पलायन से गुजर रहा था. फिल्म में सनी देओल का किरदार सिकंदर मिर्जा ने निभाया है. सनी देओल ऐसे हालात में फंसे लोगों के बीच खड़े दिखाई देते है, जहां धर्म के नाम पर इंसान एक-दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं. एक परिवार और उसके आसपास के लोगों की जिंदगी अचानक बदल जाती है. घर छूटते हैं, रिश्ते बिखरते हैं और लोग अपनी जान बचाने के लिए अनजान जगहों की ओर भागने को मजबूर होते हैं. फ़िल्म कि कहानी सिर्फ हिंदू-मुस्लिम टकराव की नहीं है बल्कि उस हिंसा के बीच बची हुई इंसानियत की है जहां कुछ लोग नफरत के माहौल में भी दूसरे इंसान को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं. फिल्म इसी सवाल को सामने रखती है कि जब सत्ता और धर्म की राजनीति समाज को बांट देती है, तब आम इंसान के सामने अपने घर, परिवार, पहचान और इंसानियत में से क्या बचाने का विकल्प रह जाता है?
फ़िल्म की कहानी और इस कहानी का सन्देश बिलकुल सीधा है लेकिन यह फ़िल्म विभाजन की त्रासदी के पीछे के असली इतिहास और उसकी पृष्ठभूमि नहीं समझा पाती. वैसे तो बंटवारे पर तमाम फ़िल्में बनी हैं और सैंकड़ो किताबें लिखी गईं हैं लेकिन बंटवारे के पीछे की असली सच्चाई आज भी छुपी हुई है. आरएसएस इसी बात का फायदा उठाती है और झूठे नेरेटिव गढ़ने में कामयाब हो जाती है.
जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस को देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है. यह नेरेटिव आरएसएस चलाती है लेकिन सच बात तो यह है कि हिंदूवादी लोगों को इस बंटवारे के लिए नेहरू और कांग्रेस का धन्यवाद करना चाहिए क्योंकि अगर विभाजन नहीं होता तो देश की तस्वीर ही अलग होती और आरएसएस कभी भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाती. आज ब्यूरोक्रेसी, राजनीती, न्यायालय और बिजनेस पर 98 परसेंट द्विज हिन्दुओं का कब्जा है यह इसी बंटवारे का नतीजा है. आरएसएस कहती है कि नेहरू और कांग्रेस ने देश के टुकड़े कर दिए लेकिन अगर हम इतिहास को आरएसएस के चश्मे से नहीं बल्कि किसान, मजदूर, दलित और औरत की आंख से पढ़ें तो पता चलता है कि बंटवारा एक दिन में नहीं हुआ था. वो 90 साल की राजनीति, जाति और सत्ता के खेल का नतीजा था.
अखंड भारत सिर्फ एक झूठ है
उन्नीसवीं सदी तक भारत का कॉन्सेप्ट तो था ही नहीं, यह भूभाग जिस पर ब्रिटिश राज करते थे वह तो मुगलो से छीनी गई थी. छोटे बड़े टुकड़ों पर सैकड़ों रियासतें राज कर रही थीं और भारत के इस बंदरबांट में अंग्रेज, राजपूत, मुस्लिम और मराठे सब शामिल थे. मुगलों से पहले भी भारत कोई देश कभी रहा नहीं. छोटे बड़े रजवाड़े आपस में लड़ते और जिसे जितनी जमीन मिलती कब्जा कर लेते. भारत के पूरे इतिहास में अखंड भारत जैसा कोई देश कभी था ही नहीं. आरएसएस जिस अखंड भारत की बात करती है वह भारत सिर्फ पौराणिक कहानियों में मिलता है जिसका न तो कोई सिर पैर है और न ही कोई इतिहास. असलियत में अखंड भारत का ढिंढोरा पीट कर आरएसएस सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाती है. आरएसएस कहती है कि पहले भारत एक था, अखंड था. मुसलमानों ने उसे तोड़ दिया और कांग्रेस ने नेहरू के साथ मिलकर देश के 2 टुकड़े करवा दिए. सारी गलती 1947 के बंटवारे की है. इन झूठी बातों के जरिये आरएसएस लोगों को बरगलाती है. जबकि सच इसके उलट है.
भारत पर शक, हूण और कुषाणों का हजार साल तक राज रहा. इस्लाम के आने के बाद 712 में मुहम्मद बिन क़ासिम, 1025 में महमूद गजनवी, 1193 में शहाबुद्दीन गौरी से लेकर 1739 में नादिर शाह और 1761 में अहमदशाह अब्दाली तक ने हजार सालों तक भारत पर हमले किये, सैकड़ों युद्ध हुए लेकिन तमाम लड़ाईयों में कभी भी सीधे तौर पर हिन्दू मुस्लिम की जंग नहीं रही.
1707 में औरंगजेब की मौत के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया. देश में छोटे-छोटे राजा और नवाब पैदा हो गए. मराठे, सिख, निजाम और बंगाल के नवाब सब अपने-अपने इलाके में राज करने लगे. इसी बीच अंग्रेज व्यापार करने के नाम पर आए और धीरे-धीरे पूरे देश पर कब्जा कर लिया. 1857 की लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने सीधे भारत की सत्ता अपने हाथ में ले ली. अब उन्हें देश चलाने के लिए बहुत सारे क्लर्क, वकील, टीचर और अफसर चाहिए थे तो उन्होंने अंग्रेजी स्कूल सबसे पहले उन लोगों के लिए खोले जो पहले से पढ़े-लिखे थे और पहले से पढ़े-लिखे कौन थे? बंगाल के ब्राह्मण और कायस्थ, महाराष्ट्र के ब्राह्मण, गुजरात के बनिए, यूपी के भूमिहार यानी ऊंची जाति वाले लोग. गांव के दलित, आदिवासी और पिछड़े लोग वहीं खेत में काम करते रह गए. उनके लिए न स्कूल था न नौकरी.
1857 से 1947 तक भी कोई लड़ाई हिंदू और मुसलमान की नहीं थी. 1857 के बाद से 1947 तक इस देश में असली लड़ाई अमीर और गरीब की रही. पढ़ने लिखने और संसाधनों का जातिगत हक रखने वाले 10 प्रतिशत लोगों और बाकी 90 प्रतिशत शिक्षा और संसाधन से वंचित तबके के बीच की लड़ाई थी.
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में मुगलों के कमजोर होने के बाद द्विजों ने निचली जातियों को हाशिये पर रखकर पद, संसाधन, राजनीती पर कब्जा जमाया और आम जनता को हिन्दू मुसलमान में बांट दिया. इस हिसाब से देखें तो बांटो और राज करो की नीति अंग्रेजों की नहीं द्विजों की रही. उन्नीसवीं सदी में बंगाल से जो नफ़रत का बीज बोना शुरू हुआ वह उत्तर भारत तक फ़ैल गया. बंगाल में जमकर नरसंहार और दंगे हुए. आनंद मठ जैसी किताबें लिखी गई. सर सय्यद अहमद, दयानन्द सरस्वती और बंकिम चंद्र जैसो ने हिन्दू मुस्लिम के बीच बंटवारे की इस आग को हवा दी. .
ब्रिटिश लोग तो कभी भी बीस हजार से ज्यादा नहीं रहे. 1857 के बाद ब्रिटिश भारत में सेना, ब्यूरोक्रेसी, न्यायालय और स्कूल चलाने के लिए अंग्रेजों को सस्ते लेकिन पढ़े लिखे भारतीयों की जरूरत थी. उंची जाती आगे थी इसलिए सारे पदों पर ऊंची जाति के लोग बैठ गये. कंट्रोल, एडमिनिस्ट्रेशन और मैनेजमेंट अंग्रेजों ने अपने हाथों में रखा और बाकी का काम अपर कास्ट के हाथो में थमा दिया गया. अपर कास्ट सिर्फ क्लर्क बनकर नहीं रहना चाहती थी उसे एडमिनिस्ट्रेशन पर कब्जा करना था इसलिए उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आंदोलन शुरू किया इसे ही आजादी की लड़ाई कहा गया. मतलब यह अंग्रेजों की प्रशाशनिक गुलामी से छुटकारा पाने की छटपटाहट थी, क्लर्क से अफसर बनने की होड़ थी जिसे राष्ट्रवादी आंदोलन का नाम दिया गया. यह लड़ाई उंची जाती की थी इसलिए आजादी के बाद सत्ता भी उन्हीं के हाथ आई. आम जनता इस लड़ाई से बाहर ही रही.
हिन्दु एकता का खोखला नारा
आरएसएस यह भ्रम फैलाती है कि हिंदू धर्म हजारों साल से एक है लेकिन सच ये है कि इतिहास में कभी भी हिंदू नाम का कोई एक धर्म नहीं था. हिंदू शब्द फारस के लोगों ने दिया था. इसका मतलब था सिंधु नदी के उस पार रहने वाले लोग. इस देश में शैव थे, वैष्णव थे, जाट थे, अहीर थे, चमार थे. सबके देवता अलग थे, पूजा पद्वती अलग थी, रीति-रिवाज अलग थे और सब सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर भी अलग-थलग रहते थे.
1871 में अंग्रेजों ने पहली बार जनगणना करवाई और पहली बार मुस्लिम, ईसाई और पारसी से अलग बाकी सबको एक कॉलम में डाल दिया और नाम दे दिया हिन्दू. उसी समय बंगाल और महाराष्ट्र के कुछ पढ़े-लिखे ब्राह्मणों ने हिंदू एकता की बात शुरू की. बंकिम चंद्र ने आनंद मठ लिखा और उसमें मुसलमानों को दुश्मन साबित कर दिया. तिलक ने गणेश पूजा को बड़ा त्योहार बनाया और इसे ओबीसी जातियों से जोड़ दिया लेकिन इस हिंदू एकता में देश के असली बासिन्दे गायब थे. मंदिरों में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता था. स्कूलों में उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता था. हिंदू खतरे में है बोलने वाले लोग वही थे जिन्होंने 80 फीसदी हिंदुओं को ही दबाकर रखा था. ये एकता देश की एकता नहीं थी. ये सिर्फ ऊंची जातियों का अपना वर्चस्व बचाने का तरीका था.
अंग्रेजों ने 1905 में बंगाल को धर्म के आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया और 1909 में मुसलमानों के लिए अलग वोट का अधिकार दे दिया लेकिन इसके लिए सिर्फ अंग्रेज जिम्मेदार नहीं थे. हमारे अपने लोगों ने भी आग में घी डाला. एक तरफ हिंदू महासभा और आरएसएस ने कहा कि सारे मुसलमान विदेशी हैं. दूसरी तरफ मुस्लिम लीग ने कहा हिंदुओं के राज में हम सुरक्षित नहीं हैं. जिन्ना ने कहा हिंदू और मुसलमान दो अलग कौम हैं. यहां सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस, आरएसएस, हिन्दूमहासभा और मुस्लिम लीग इन सभी में बड़े-बड़े वकील और जमींदार थे. गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना कलाम, तिलक, गोखले, सावरकर, गोलवलकर, हेडगेवार और जिन्ना सब पढ़े-लिखे और अमीर घरों से ताल्लुक रखने वाले लोग थे. किसान, मजदूर, दलित और औरतों के हकों की बात वहां कोई नहीं कर रहा था. बीसवीं सदी की शुरुआत में सिर्फ डॉ. अंबेडकर ने समाज में गैरबराबरी खत्म करने कि बात की लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं मानी इसलिए आखिर में देश के दो टुकड़े हो गए.
बंगाल विभाजन से हुआ देश का बंटाधार
उन्नीसवीं सदी में नफ़रत के जो बीज सर सय्यद अहमद खान, बंकिमचंद्र चटरजी और दयानन्द सरस्वती जैसे लोगों ने बोये थे उसका नतीजा बीसवीं सदी ने भुगता. 1905 में बंगाल का विभाजन हुआ. नफरत की कहानी यहीं से शुरू हुई और द्विजों ने इसे अपने फायदे में भुना लिया. 1905 में लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक कारण देकर बंगाल के दो टुकड़े कर दिए. एक तरफ आज का पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा जहां हिंदू बहुसंख्यक थे, दूसरी तरफ पूर्वी बंगाल और असम जहां मुसलमान बहुसंख्यक थे. अंग्रेजों का तर्क था कि इतने बड़े प्रांत को चलाना मुश्किल है इसलिए यह विभाजन जरुरी है लेकिन असली खेल ये था कि बंगाल का अपर कास्ट वर्ग ब्रिटिश राज के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन रहा था इसीलिए अंग्रेजों के लिए यह बंटवारा जरुरी था.
उच्च जाति के बंगाली वकील, प्रोफेसर, पत्रकार और जमींदारों ने इस विभाजन का विरोध किया. कलकत्ता हाईकोर्ट, कलकत्ता विश्वविद्यालय, प्रेस और सरकारी नौकरियों पर इन्हीं का कब्जा था. अगर पूर्वी बंगाल अलग हो जाता तो ये सारी संस्थाएं दो हिस्सों में बंट जातीं और इनकी मोनोपली टूट जाती इसलिए वंदे मातरम के नारे के साथ स्वदेशी आंदोलन चला, राखियां बांधी गईं लेकिन यह राष्ट्रवादी आंदोलन असल में अपर कास्ट हितों को साधने की एकजुटता थी. इस आंदोलन में मजदूरी करने वाला, खेत जोतने वाला, चमार, मुस्लिम, जुलाहा कहीं नहीं था.
यह आंदोलन पूरी तरह द्विजों का आंदोलन था. इसी दौर में बंकिम चंद्र का आनंद मठ दोबारा छपा और वंदे मातरम को आंदोलन का गीत बनाया गया. आनंदमठ उपन्यास में मुसलमान शासकों को लुटेरा और संन्यासियों को देशभक्त दिखाया गया था और यह पहली बार था जब साहित्य के जरिए हम हिंदू बनाम वो मुसलमान की लाइन खींची गई. इसी बंगाल से सांप्रदायिकता के वह बीज निकले जो बाद में पूरे उत्तर भारत में फैले. 1946 में कलकत्ता में जो खून की नदियां बहीं, उसकी जड़ें 1905 में ही बो दी गई थीं और सबसे जरूरी बात, इस पूरे खेल में दलित और आदिवासी सिर्फ दर्शक थे क्योंकि न स्वदेशी मिलों में उन्हें नौकरी मिली, न आंदोलन में उन्हें जगह दी गई.
हिंदू एकता का मतलब किसकी एकता?
19वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश जनगणना ने धर्म के आधार पर गिनती शुरू की तो अचानक हिंदू शब्द एक आंकड़ा बन गया. अब सवाल था कि इस आंकड़े को राजनीतिक ताकत में कैसे बदला जाए? यहां आर्य समाज आया. दयानंद सरस्वती ने वेदों की ओर लौटो का नारा दिया और शुद्धि आंदोलन चलाया यानी जो लोग इस्लाम या ईसाई बन गए थे उन्हें वापस हिंदू बनाने का प्रायोजित कार्यक्रम. हकीकत में ये प्रोजेक्ट उन दलितों और आदिवासियों के लिए नहीं था जिन्हें सदियों से मंदिर में घुसने नहीं दिया गया बल्कि ये उन लोगों के लिए था जिन्होंने खुद को हिन्दू कहने से मना कर दिया था.
1915 में हिंदू महासभा बनी और 1925 में नागपुर में RSS की स्थापना हुई. हेडगेवार का तर्क था कि कांग्रेस नरम है और मुसलमानों को खुश रखना चाहती है इसलिए एक ऐसा संगठन चाहिए जो हिंदुओं को संगठित करे लेकिन संगठित होने का मतलब क्या था? इसका मतलब था ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को एक झंडे के नीचे लाना और बाकी 80 फीसदी OBC, दलित, आदिवासी को हिंदू के नाम पर वोट बैंक बनाये रखना. RSS की शाखाओं में कभी इस बात पर चर्चा नहीं हुई कि मंदिरों में पुजारी सिर्फ ब्राह्मण क्यों बनता है या संसाधनों पर कब्जा किन जातियों का है क्योंकि असली एजेंडा सामाजिक बराबरी नहीं था बल्कि असली एजेंडा था राजनीतिक सत्ता हासिल करना और ये सत्ता तभी मिल सकती थी जब मुसलमानों का डर दिखाकर हिन्दुओं को अपने बाड़े में रखा जाता इसलिए 1920 से 1947 के बीच जितने भी सांप्रदायिक दंगे हुए उनमें RSS और हिंदू महासभा के लोग या तो प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे या उन्होंने उस नफरत को वैचारिक जमीन दी.
अंबेडकर बनाम गांधी बनाम जिन्ना- तीन भारत, तीन लड़ाई
अगर 1857 से 1947 के बीच के इतिहास की वास्तविकता को ठीक से समझना है तो तीन नामों को आमने-सामने रखकर पढ़ना होगा. गांधी, जिन्ना और अंबेडकर. गांधी का भारत था रामराज्य वाला. जहां धर्म और नैतिकता से राजनीति चलेगी. जिन्ना का भारत था दो राष्ट्र वाला, जहां मुसलमानों के लिए अलग मुल्क होता क्योंकि हिंदू बहुसंख्यक राज में वो सुरक्षित नहीं थे और अंबेडकर का भारत था संवैधानिक लोकतंत्र वाला, जहां पहले जातियां खत्म होतीं, फिर राष्ट्र बनता.
1932 का पूना पैक्ट इसी लड़ाई की सबसे बड़ी मिसाल है. अंबेडकर दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल चाहते थे ताकि वो खुद अपने नेता चुन सकें. गांधी ने इसके खिलाफ आमरण अनशन कर दिया और कहा कि इससे हिंदू समाज टूट कर बिखर जाएगा. आखिर में अंबेडकर को झुकना पड़ा और उन्हें आरक्षित सीट वाले सिस्टम को स्वीकार करना पड़ा लेकिन वोट देने का अधिकार सबको मिला. गांधी को दलितों के अलग अधिकार से इतना डर क्यों था? जवाब सीधा है क्योंकि अगर दलितों को अलग राजनीतिक पहचान मिल जाती तो हिंदू एकता का झूठ तुरंत टूट जाता. जिन्ना ने भी मुसलमानों के लिए वही मांगा जो अंबेडकर दलितों के लिए मांग रहे थे, सुरक्षा. फर्क सिर्फ इतना था कि मुसलमान संख्या में ज्यादा थे इसलिए उन्हें पाकिस्तान मिल गया और दलित संख्या में बिखरे थे इसलिए उन्हें सिर्फ आरक्षण मिला. इस पूरी बहस में नेहरू कहीं बीच में थे. वो सेकुलर थे लेकिन उनकी पार्टी और उनकी कैबिनेट में भी वही द्विज भरे पड़े थे इसलिए कांग्रेस कभी भी जमीनी स्तर पर जाति तोड़ने का काम नहीं कर पाई.
केबिनेट मिशन में तय हुआ अखंड भारत का सपना
1946 आते-आते अंग्रेजों को साफ समझ आ गया था कि अब भारत में उनका राज ज्यादा दिन नहीं चलने वाला. दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था और इंग्लैंड खुद कर्ज में डूबा हुआ था. उधर भारत में भी हालात बेकाबू थे. INA के सैनिकों का मुकदमा और मुंबई में नौसेना की बगावत ने ये साबित कर दिया था कि अब फौज और पुलिस भी अंग्रेजों का साथ नहीं देगी. जनता सड़कों पर थी. ऐसे में लंदन की सरकार ने फैसला किया कि अब भारत को जल्द से जल्द आजादी देकर निकलना है इसीलिए मार्च 1946 में ब्रिटेन से 3 बड़े मंत्री केबिनेट मिशन के तौर पर भारत भेजे गए. इनका एक ही काम था, किसी तरह भारत का बंटवारा रोकना और एकजुट भारत को सत्ता सौंपना.
कैबिनेट मिशन ने एक बहुत ही अनोखा प्लान बनाया जिसे संघीय भारत कहते हैं. प्लान के हिसाब से भारत एक ही देश रहता लेकिन केंद्र सरकार के पास सिर्फ 3 काम होते. रक्षा, विदेश नीति और संचार. पुलिस, शिक्षा, टैक्स, कानून ये सब अधिकार राज्यों के पास रहते. पूरे देश को 3 बड़े ग्रुप में बांट दिया गया था. ग्रुप A में यूपी, बिहार, मद्रास और बॉम्बे जैसे बड़े हिन्दू आबादी वाले स्टेट थे. ग्रुप B में पश्चिमी पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान थे और ग्रुप C में बंगाल और असम थे. ग्रुप B और C मुस्लिम बहुल इलाके थे.
इन ग्रुपों को अपने इलाके के सारे फैसले खुद लेने का अधिकार था. सबसे बड़ी बात ये थी कि 10 साल बाद कोई भी ग्रुप चाहे तो इस संघ से अलग हो सकता था. इस प्लान का मकसद साफ था. मुसलमानों को डर था कि आजादी के बाद हिंदू बहुसंख्यक उन पर राज करेंगे इसलिए उन्हें ग्रुप के जरिए ताकत दे दी गई और कांग्रेस को अखंड भारत का नाम मिल गया यानी न बंटवारा हुआ न किसी की हार हुई.
22 मई 1946 को जिन्ना ने इस प्लान को स्वीकार कर लिया. इसके पीछे 3 बड़ी वजह थीं. पहली ये कि पाकिस्तान की मांग से बड़ा हिस्सा तो उन्हें यहीं मिल रहा था. बंगाल और पंजाब के मुस्लिम इलाके ग्रुप B और C में थे और वहां मुस्लिम लीग की सरकार बननी तय थी. यानी बिना देश तोड़े उन्हें पाकिस्तान जैसा हक मिल रहा था. दूसरी वजह अंतरराष्ट्रीय दबाव था. अमेरिका और ब्रिटेन नहीं चाहते थे कि भारत टूटे क्योंकि उन्हें एक मजबूत भारत चाहिए था ताकि रूस को रोका जा सके.
नेहरू की एक गलती बन गई बंटवारे की वजह
तीसरी और सबसे जरूरी वजह ये थी कि कांग्रेस ने भी 25 जून 1946 को इस प्लान पर हामी भर दी थी. गांधी जी ने कहा था कि ये बुरे में सबसे अच्छा सौदा है. ऐसा लग रहा था कि अब बंटवारा टल गया है और 1 अगस्त 1946 को संविधान सभा बन जाएगी लेकिन 10 जुलाई 1946 को बंबई में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने सब कुछ पलट दिया. उस दिन पत्रकारों ने नेहरू से पूछा कि क्या कांग्रेस कैबिनेट मिशन प्लान को पूरी तरह मानेगी और उसमें कोई बदलाव नहीं करेगी? नेहरू ने जवाब दिया कि कांग्रेस संविधान सभा में पूरी तरह आजाद है. वो प्लान को बदल भी सकती है. हम किसी से बंधे हुए नहीं हैं.
बस यही एक लाइन आग बन गई. जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इसे सीधा धोखा माना. जिन्ना को लगा कि सत्ता मिलते ही कांग्रेस इस ढीले-ढाले संघ को तोड़कर एक मजबूत केंद्र बना देगी और इस तरह मुसलमान फिर से गुलाम बन जाएंगे. जिन्ना को लग गया कि अब बातचीत से कुछ नहीं होगा. जिन्ना के गुस्से का नतीजा 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे के रूप में सामने आया. जिन्ना ने कहा कि अब हम पाकिस्तान मांगने के लिए सड़कों पर उतरेंगे. उसी दिन कलकत्ता में खून की होली खेली गई. 4 दिन के दंगे में 4000 से ज्यादा लोग मारे गए और 10 हजार लोग घायल हुए. इसके बाद नफ़रत की यह आग पूरे देश में फैल गई.
अक्टूबर 1946 में बंगाल के नोआखली में हिंदुओं का कत्लेआम हुआ और उसी महीने बिहार में बड़ी संख्या में मुसलमानों को मार कर नोआखली का बदला पूरा किया गया. जिसमें 5000 से ज्यादा लोग मारे गए. मार्च 1947 आते-आते पंजाब भी जल उठा. जब हर हफ्ते ट्रेनों में लाशें आ रही हों और मोहल्ले जल रहे हों तो वहां संविधान और बातचीत की कोई जगह नहीं बचती. फरवरी 1947 में आए नए वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने 3 महीने में ही समझ लिया कि अब कैबिनेट मिशन का प्लान आगे नहीं बढ़ सकता. कांग्रेस के सरदार पटेल कह रहे थे कि बंटवारा कर दो वरना पूरा देश गृहयुद्ध में जल जाएगा और मुस्लिम लीग कह रही थी हमें हर हाल में अलग पाकिस्तान चाहिए आखिरकार 3 जून 1947 को माउंटबेटन प्लान आया और 15 अगस्त को भारत और पाकिस्तान दो अलग देश बन गए.
इस पूरे घटनाक्रम से 3 बातें साफ होती हैं. जिन्ना को डर था कि मजबूत केंद्र में मुसलमानों की आवाज दब जाएगी इसलिए वो ग्रुप वाला प्लान चाहते थे. नेहरू को डर था कि ढीला-ढाला संघ भारत को कमजोर कर देगा इसलिए उन्होंने प्रेस में वो बयान दे दिया. उन्हें लगा था कि जिन्ना फिर भी मान जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इससे यह साफ हो जाता है कि बंटवारा 15 अगस्त 1947 को नहीं हुआ था, असल में बंटवारा 10 जुलाई 1946 को नेहरू की उस एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही तय हो गया था.
अखंड भारत में नहीं मिलती आरएसएस को जगह
यही कारण है की आरएसएस भारत के बंटवारे के लिए हमेशा जवाहरलाल नेहरू को कोसती है लेकिन वह सच्चाई छुपा लेती है कि अगर 1946 के अखंड भारत वाला प्लान सफल हो जाता तो आज आरएसएस का वजूद भी नहीं होता. असल में अखंड भारत तो कांग्रेस और जवाहर लाल नेहरू की मांग थी और उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी बात को साफ साफ कह दिया था और उनकी इसी बात से चिढ़कर जिन्ना ने अखंड भारत वाले प्रस्ताव को ठुकरा दिया था.
1946 वाले घटनाक्रम में तो कांग्रेस की भूमिका हिन्दूओं की सबसे बड़ी हितैषी की साबित होती है और नेहरू सबसे बड़े हिन्दू हृदय सम्राट साबित होते हैं. आज की बीजेपी और 1946 की कांग्रेस में ज्यादा फर्क नहीं है. कांग्रेस तब बहुसंख्यक हिन्दुओं की हितैषी बन रही थी और बीजेपी आज वही राजनीती कर रही है. तथ्य ये भी है कि 1946 तक भारत में दो समानांतर सरकारें चल रही थीं. एक तरफ कांग्रेस की और दूसरी तरफ मुस्लिम लीग की. फौज में भी हिंदू-मुसलमान सिपाही एक दूसरे को शक से देख रहे थे. उस स्थिति में अगर बंटवारा न होता तो गृहयुद्ध तय था और गृहयुद्ध में सबसे ज्यादा कौन मरता? वही निचली जाती, वही गरीब आदमी और वही दबी कुचली औरतें जिनकी हिन्दू राष्ट्र में कोई औकात ही नहीं थी.
असल में बंटवारा एक समाधान था वो भी खून से सना हुआ समाधान और इस समाधान ने एक अजीब काम किया. भारत से मुस्लिम अपर कास्ट और मुस्लिम अपर क्लास वर्ग का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया. अब जो बचा वो था 85 फीसदी हिंदू आबादी वाला देश, जिसमें द्विजों का अनुपात और बढ़ गया. अगर बंटवारा न होता तो आज लोकसभा में 250 मुस्लिम सांसद होते 20 मुस्लिम मुख्यमंत्री होते और ऐसे में हिंदू राष्ट्र का सपना देखना भी नामुमकिन होता. विडंबना ये है कि आज जो लोग बंटवारे के लिए नेहरू को गाली देते हैं वो उसी बंटवारे की वजह से बहुसंख्यक हिन्दुओं की राजनीति कर रहे हैं और सत्ता भोग पा रहे हैं.
सच बात तो यह है कि भारत राष्ट्र 1947 में बना एक कानूनी और प्रशासनिक समझौते का परिणाम है. उससे पहले ये भूभाग रियासतों, नवाबों और अंग्रेजों की मिल्कियत था. इस समझौते में आम भारतीयों की कोई भागीदारी नहीं थी. संविधान सभा में 299 सदस्य थे उनमें 30 निचली जाती से थे और उन 30 में भी सिर्फ डॉ अंबेडकर ही थे जो सच में निचली जातियों की आवाज उठा सकने की क्षमता रखते थे बाकी सब द्विज, अमीर और जमींदार थे इसलिए जब आरएसएस यह कहती है कि नेहरू ने बंटवारा करवाया तो पूछना चाहिए कि बंटवारे से पहले इस देश में किसका राज था? जवाब है द्विजों का और बंटवारे के बाद भी किसका राज है? जवाब फिर वही है तो लड़ाई भारत बनाम पाकिस्तान की नहीं है, लड़ाई 10 प्रतिशत बनाम 90 फीसदी की है. इस हकीकत को आरएसएस के चश्मे से नहीं बल्कि जाति और वर्ग के चश्मे से देखा जाये तो अखंड भारत का नारा सिर्फ नफरत की तरफ ही ले जाता नजर आता है, इंसाफ की तरफ नहीं.
हिंदू-मुसलमान के बीच नफ़रत के बीज कैसे बोये गये?
1857 से 1947 तक की आजादी की लड़ाई सिर्फ भाषण, कानून और आंदोलनों की कहानी नहीं है. इस 90 साल के बीच देश में कई बार खून भी बहा है. आरएसएस की किताबों में सबसे ज्यादा जिन दो घटनाओं का नाम लिया जाता है वो हैं 1921 का मोपला विद्रोह और 1946 का बंगाल का दंगा. आज आरएसएस दोनों घटनाओं का इस्तेमाल करके ये साबित करने की कोशिश करती है कि मुसलमान शुरू से ही दंगाई रहे हैं और हिंदू हमेशा से खतरे में रहे हैं लेकिन अगर इन घटनाओं को खुले दिमाग से देखें तो बिल्कुल अलग तस्वीर नजर आती है. इन दंगों के पीछे सिर्फ धर्म नहीं था बल्कि गरीबी, जमीन, लगान और राजनीति थी.
1921 के मोपला विद्रोह की घटना आज के केरल के मालाबार इलाके में हुई थी. वहां की जमीन के मालिक ज्यादातर नायर और ब्राह्मण हिन्दू जमींदार थे और खेतों में काम करने वाले किसान ज्यादातर मोपला मुसलमान थे. अंग्रेजों ने एक बहुत बुरा कानून बना रखा था. अगर किसान समय पर लगान नहीं दे पाता था तो उसकी जमीन जमींदार छीन लेते थे. इसके अलावा जमींदार किसानों से बेगार भी करवाते थे यानी बिना पैसे दिए काम. किसान पिछले 100 साल से इस जुल्म को सहने पर मजबूर थे. उसी समय गांधी जी ने खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन शुरू किया था और केरल में भी इसका खासा असर था.
मोपला के किसानों पर जुल्म बढ़े तो उन्होंने हथियार उठा लिए. जमींदारों के घर, कचहरी और सरकारी दफ्तरों पर हमले हुए. इस दौरान कुछ जगहों पर हिंदू जमींदारों को मारा गया और कुछ मंदिरों को भी नुकसान पहुंचाया गया. अंग्रेजों ने फौज भेजकर इस विद्रोह को बहुत बेरहमी से कुचल दिया. हजारों मोपला किसान मारे गए. अब सवाल ये है कि क्या ये धर्म की लड़ाई थी? जवाब है नहीं. ये असल में गरीब किसान और अमीर जमींदार के बीच की लड़ाई थी. दिक्कत सिर्फ इतनी थी कि किसान मुसलमान थे और जमींदार हिंदू. बाद में धर्म की राजनीति करने वाले लोगों ने इसी को हिंदू बनाम मुसलमान का रंग दे दिया. खुद डॉ. अंबेडकर ने अपनी किताब पाकिस्तान ओर पार्टीशन ऑफ इंडिया में लिखा है कि मोपला किसान गरीबी और लगान के बोझ की वजह से भड़के थे सिर्फ धर्म की वजह से नहीं.
मोपला दंगों के दो दशक बाद ही 1946 में बंगाल का दंगा हुआ. इसकी नींव तो 1905 में ही पड़ गई थी जब अंग्रेजों ने बंगाल के दो टुकड़े किए थे. 1946 में मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को डायरेक्ट एक्शन डे का ऐलान किया. जिन्ना का कहना था कि अगर कांग्रेस पाकिस्तान की मांग नहीं मानेगी तो हम सड़कों पर उतरकर अपना हक लेंगे. कलकत्ता उस समय बंगाल की राजधानी थी और यहां हिंदू और मुसलमान की आबादी लगभग बराबर थी.
16 अगस्त को मुस्लिम लीग की बहुत बड़ी रैली निकली. मुस्लिम नेताओं के जहरीले भाषण शुरू हुए. शाम होते-होते अफवाह फैल गई कि मुसलमानों ने हिंदुओं को मारा है. इसके जवाब में दूसरी तरफ से भी हमले शुरू हो गए. अगले 4 दिन तक कलकत्ता की सड़कों पर खून बहता रहा. 4000 से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों घायल हुए. लाशें नालियों में पड़ी थीं. इस दंगे के 2 महीने बाद बिहार में हिंदुओं ने मुसलमानों को मारा और उसके जवाब में नोआखली में मुसलमानों ने हिंदुओं को मारा. इस तरह पूरे देश में खून की एक चेन बन गई.
अपर कास्ट माइंड सेट के अखबारों ने भी आग में घी डालने का काम किया. सवाल यह है कि दोनों ओर मरा कौन? सिर्फ आम आदमी. बंगाल में ही सबसे पहले आनंद मठ में मुसलमानों को विदेशी आक्रांता के रूप में दिखाया गया था. 40 साल तक लोगों के दिमाग में यही भरा गया इसलिए जब 1946 में मौका आया तो लोगों ने आसानी से हथियार उठा लिए. यानी नफरत का बीज बंगाल में ही बोया गया था और 1946 में वो पेड़ बनकर सामने आया. इसी दंगे के बाद ये तय हो गया कि अब हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते और 8 महीने बाद 15 अगस्त 1947 को देश के दो टुकड़े हो गए. तो इसमें सीधे सीधे नेहरू जिम्मेदार कैसे हो गये?
दोनों तरफ के नेताओं ने लोगों से कहा कि तुम्हारा धर्म खतरे में है जैसे ही धर्म का नाम आया, लोग अपनी गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई सब भूल गए और सामने वाले को दुश्मन मान लिया. द्विज नेतृत्व ने हमेशा फायदा उठाया. बंगाल और मोपला दोनों जगह सबसे ज्यादा नुकसान गरीब हिंदू और गरीब मुसलमान का हुआ लेकिन दंगे के बाद राजनीति का फायदा किसे मिला? उन नेताओं को जिनके पास पहले से जमीन, पैसा और पावर थी. हिन्दू महासभा, आरएसएस, कांग्रेस और मुस्लिम लीग इन सभी के टॉप नेता उंची जाति और जमींदार घरों से ही आते थे. दंगों के दौरान इनमें से कोई नहीं मरा. इन दंगों में सबसे ज्यादा पिछड़ी जाति के लोग पिसे. हर दंगे में बलात्कार, लूट और पलायन औरतों का हुआ. सबसे ज्यादा दलितों की बस्तियाँ जलाई गईं क्योंकि यह आसान शिकार थे. दलितों के पास न भागने के लिए पैसा था न कोई उनकी बात सुनने वाला था लेकिन इतिहास की किताबों में उनका नाम तक नहीं है.
मोपला और बंगाल के दंगे यह सिखाते हैं कि जब भी सत्ता में बैठे लोग जनता को जाति और धर्म के नाम पर आम जनता को बांटते हैं तो उसका नतीजा हमेशा तबाही ही होता है. हर बार राजनीति को नफरत से फायदा हुआ और अफसोस की बात ये है कि आज भी यही खेल खेला जा रहा है. आज भी अखंड भारत का सपना दिखाने वाले लोग आपको मोपला और बंगाल की याद दिलाते हैं लेकिन वो ये नहीं बताते कि उन दंगों की जड़ में जाति, जमीन और सत्ता की राजनीति थी.
1947 के बाद असली पावर किसके हाथ में गई?
1947 में 15 अगस्त को भारत आजाद हुआ. अंग्रेज चले गए, तिरंगा फहराया गया और देश का नया संविधान बना. कागज पर सब कुछ बदल गया. कानून में लिखा गया कि अब सब नागरिक बराबर हैं. किसी के साथ जाति, धर्म या लिंग के नाम पर भेदभाव नहीं होगा लेकिन हकीकत में सत्ता चलाने का तरीका पुराने ढर्रे से जरा भी नहीं बदला क्योंकि सत्ता चलाने वाले लोग नहीं बदले थे. यह लोग वही पुरानी वर्णव्यवस्था की नई पैदावार थे जिन्हें हर हाल में अपना जातिवादी वर्चस्व क़ायम रखना था. आजादी मिलने के बाद भी सरकारी नौकरी, अदालत, बिजनेस और राजनीति की चाबी इन्हीं के हाथ में चली गई. संविधान ने सबको बराबर का अधिकार तो दे दिया लेकिन 100 साल की पुरानी नाइंसाफी जारी रही और आज भी ये इंसाफ पूरा नहीं हुआ है.
आजादी के बाद देश की जातिगत गैरबराबरी को खत्म करने के लिए सबसे बड़ी ताकत थी सरकारी नौकरी. कलेक्टर, पुलिस अफसर, जज, बैंक और रेलवे के बड़े अधिकारी. अंग्रेजों के जाने के बाद उनकी कुर्सियों पर भारत की सभी जातियों का बराबर हक होना था लेकिन यहां एक बहुत बड़ी दिक्कत थी. अंग्रेजों के राज में स्कूल, कॉलेज और अंग्रेजी की पढ़ाई सिर्फ कुछ खास जातियों तक ही सीमित थी.
बंगाल में ब्राह्मण और कायस्थ, महाराष्ट्र में ब्राह्मण, यूपी-बिहार में ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत, गुजरात में ब्राह्मण, बनिया. इन जातियों के घरों में पीढ़ियों से पढ़ाई, वकालत और हिसाब-किताब का काम होता आया था इसलिए अंग्रेजों ने भी इन्हीं लोगों को क्लर्क और वकील बनाया. दूसरी तरफ देश के ज्यादातर दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के लोग गांव में खेती और मजदूरी करते थे. उनके पास न तो स्कूल थे न फीस देने के लिए पैसे थे इसलिए जब 1950 में आजाद भारत का पहला UPSC का एग्जाम हुआ तो उसमें पास होने वाले ज्यादातर लोग इन्हीं पढ़ी-लिखी द्विज जातियों से थे.
1950 से 1990 तक का हिसाब देखें तो IAS और IPS में 70 फीसदी से ज्यादा अफसर सवर्ण थे. अगर रिजर्ववेशन नहीं होता तो यह आंकड़ा 100 फीसदी होता. अदालतों का हाल भी यही था. 70 साल में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में 250 से ज्यादा जज बने लेकिन उनमें दलित और आदिवासी जजों की संख्या बहुत कम रही. असली बदलाव 1990 में आया जब मंडल कमीशन लागू हुआ और OBC को 27 फीसदी आरक्षण मिला. उसके बाद धीरे-धीरे SC, ST और OBC के लोग भी बड़े अफसर बनने लगे. आज तस्वीर पहले से बहुत बेहतर लगती है लेकिन टॉप लेवल पर अब भी द्विजों का वर्चस्व क़ायम है. इसकी वजह साफ है. जिसको पहले से शुरुआत हासिल हो वो रेस में आगे निकल ही जाता है.
सरकारी नौकरी के साथ-साथ बिजनेस और मीडिया पर भी शुरुआती कब्जा उन्हीं लोगों का था जिनके पास पैसा और पढ़ाई थी. आजादी के समय देश के बड़े बिजनेस घराने कौन थे? टाटा, बिरला, डालमिया, बजाज. ये सब बनिया और मारवाड़ी परिवार थे. अंग्रेजों के समय से ही इनके पास मिल, फैक्ट्री और बैंक चलाने का अनुभव था. दूसरी तरफ दलित और पिछड़े समाज के लोग ज्यादातर छोटे कारीगर, दुकानदार या खेतिहर मजदूर थे. उनके पास इतनी पूंजी नहीं थी कि वो कारखाना या कंपनी खोल सकें. बैंक भी उन्हें लोन देने से डरते थे इसलिए आजादी के बाद भी देश की इकोनॉमी उन्हीं बड़े घरानों के हाथ में रही.
मीडिया का हाल भी ऐसा ही था. अखबार निकालने के लिए प्रेस, पैसा और अंग्रेजी की जरूरत होती थी. ये तीनों चीजें शहर में रहने वाले पढ़े-लिखे द्विजों के पास थीं इसलिए अखबारों में खबरें भी उसी नजरिए से छपती थीं. गांव की, किसान की, दलित की खबर को छोटी खबर मानकर पन्ने के कोने में डाल दिया जाता था. 1990 के बाद OBC और दलित मुख्यधारा में आने शुरू हुए लेकिन आज भी देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट और नेशनल टीवी और अखबारों में ऊंची जातियों का दबदबा साफ दिखता है.
राजनीति में तस्वीर थोड़ी जल्दी बदली क्योंकि यहां वोट की ताकत सबसे बड़ी थी. 1947 के बाद भारत में एक इंसान एक वोट का नियम लागू हुआ. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना लेकिन चुनाव लड़ना सिर्फ वोट से नहीं होता उसके लिए पैसा चाहिए, जाति का सपोर्ट चाहिए और लोगों में पहचान चाहिए. 1952 से 1980 तक लोकसभा और विधानसभा में 60 फीसदी से ज्यादा द्विज जातियों का प्रतिनिधित्व क़ायम रहा. वजह ये थी कि कांग्रेस और दूसरी बड़ी पार्टियां टिकट भी उन्हीं लोगों को देती थीं जिनके पास जमीन, पैसा और रसूख था.
असली बदलाव 1980 के बाद आया. मंडल आंदोलन और दलित आंदोलन की वजह से मुलायम सिंह, लालू यादव, कांशीराम और मायावती जैसे नेता उभरे. उन्होंने OBC और दलितों को राजनीति में जगह दिलाई. आज लोकसभा में SC के लिए 84 और ST के लिए 47 सीटें रिजर्व हैं. OBC के लिए आरक्षण नहीं है लेकिन वो अपनी संख्या के दम पर चुनाव जीतते हैं. आज देश के आधे से ज्यादा मुख्यमंत्री OBC या दलित पृष्ठभूमि से हैं. इसका मतलब है कि राजनीति में अब हिस्सेदारी काफी हद तक बराबर हुई है.
संविधान, आरक्षण और आज का भारत
1857 की लड़ाई को पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है लेकिन उसमें आम जनता कहीं नहीं थी. वो राजा और नवाब लड़ रहे थे जिनकी जमीन अंग्रेजों ने छीन ली थी. आम जनता तो इस लड़ाई में अपनी रोजी रोटी के लिए दिहाड़ी पर लड़ रही थी. रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब सब राज घराने के थे. गरीब लोग सिर्फ उनके साथ लड़ने गए थे. बीसवीं सदी की शुरुआत में गांधी, नेहरू, पटेल सब अंग्रेजी पढ़े वकील थे. उनका राष्ट्र का आइडिया भी अंग्रेजों की डेमोक्रेसी से निकल कर आया था. इसी दौर में अंबेडकर और पेरियार जाति खत्म करने की बात कर रहे थे लेकिन उनकी बात को दबा दिया गया. बंटवारे के बाद मुसलमानों का पढ़ा-लिखा वर्ग पाकिस्तान चला गया. भारत में बची सारी सरकारी नौकरी, जज की कुर्सी, सारे ऊँचे पद और कॉलेज की सीट पर ऊंची जातियों का कब्जा और मजबूत हो गया. संविधान तो सबके लिए बना लेकिन उसे चलाने वाले वही उंची जाती के लोग रहे.
26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ. इसे डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बनाया था. ये दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है. इसकी पहली लाइन में ही लिखा गया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, समाजवादी गणराज्य है. इसका मतलब साफ था. यहां सब नागरिक बराबर हैं. सबको इज्जत और सबको मौका मिलेगा लेकिन दिक्कत ये थी कि संविधान तो कागज पर बन गया लेकिन जमीन पर 3000 साल पुरानी जाति व्यवस्था जिंदा थी. गांव में दलित को मंदिर में नहीं घुसने दिया जाता था. स्कूल में OBC के बच्चे को पीछे बैठाया जाता था. सरकारी नौकरी और अदालतों में सिर्फ कुछ खास जातियों का कब्जा था इसलिए अंबेडकर ने बहुत पहले ही चेतावनी दे दी थी कि सिर्फ वोट देने से लोकतंत्र नहीं चलता, पहले सामाजिक लोकतंत्र चाहिए. यानी जब तक समाज में इंसान-इंसान में बराबरी नहीं होगी तब तक संविधान के सारे अधिकार कागज पर ही रह जाएंगे.
आजादी के बाद समाज में बराबरी लाने के लिए सबसे बड़ा हथियार बना आरक्षण. सरकार ने तय किया कि SC को 15 फीसदी, ST को 7.5 फीसदी और 1990 में मंडल कमीशन के बाद OBC को 27 फीसदी आरक्षण मिलेगा. इसका असर बहुत बड़ा हुआ. आजादी के पहले 40 साल तक IAS, डॉक्टर, प्रोफेसर और जज की कुर्सी पर सिर्फ द्विज लोग दिखते थे. आरक्षण के बाद गांव के गरीब घरों के लड़के-लड़कियां भी अफसर, टीचर और वकील बनने लगे. राजनीति में भी बदलाव आया. पहले गांव का सरपंच सिर्फ ठाकुर या ब्राह्मण बनता था.
आरक्षण और वोट की ताकत की वजह से अब दलित और ओबीसी भी सरपंच, विधायक और सांसद बनने लगे. मायावती, लालू यादव, मुलायम सिंह जैसे नेता इसी सिस्टम से निकले. आरएसएस आरक्षण को देश तोड़ने वाला कहता है लेकिन हकीकत इसके उलट है. आरक्षण ने ही देश को जोड़ा है क्योंकि जब 90 फीसदी लोगों को लगा कि ये देश हमारा भी है, इसमें हमारी भी हिस्सेदारी है तभी वो देश के साथ पूरी ताकत से खड़े हुए. अगर आरक्षण नहीं होता तो आज भी 90 फीसदी लोग खुद को सिस्टम से बाहर महसूस करते.
अगर बंटवारा नहीं होता तो क्या होता?
अगर बंटवारा नहीं होता तो आज भारत की आबादी 200 करोड़ होती. उसमें 60 करोड़ मुसलमान होते. लोकतंत्र में जिसकी संख्या ज्यादा उसकी सरकार बनती है. तब संसद में 250 से ज्यादा मुस्लिम सांसद होते. हर फैसले में मुसलमानों, दलितों और पिछड़ों की राय लेनी पड़ती. ऐसे भारत में हिंदू राष्ट्र बनाना नामुमकिन होता क्योंकि संख्या ही इजाजत नहीं देती. ऐसी स्थिति में कोई भी पार्टी सिर्फ हिंदू वोट के नाम पर अकेले सरकार नहीं बना पाती.
हर कानून बनाने से पहले उसे मुसलमान, दलित और OBC को साथ लेकर चलना पड़ता. हर राज्य की सरकार में अच्छी तादात में मुसलमान मंत्री होते. उस भारत में हिंदू राष्ट्र का नारा लगाना भी मुश्किल होता क्योंकि गणित ही उसकी इजाजत नहीं देता इसलिए ये बहुत बड़ी विडंबना है कि आज जो लोग बंटवारे को सबसे बड़ी गलती कहते हैं, उसी बंटवारे की वजह से वो बहुसंख्यक बनकर राजनीति कर पा रहे हैं. अगर देश अखंड होता तो आरएसएस को कोई पूछता भी नहीं. अगर देश अखंड होता तो आरएसएस को अपनी राजनीती और विचारधारा फैलाने के लिए इतनी जगह ही नहीं मिल पाती.
आजादी की असली लड़ाई क्या है?
ज्योतिबा फुले ने कहा था शिक्षा शेरनी का दूध है जो पिएगा वही दहाड़ेगा. डॉ. अंबेडकर ने नारा दिया था शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो. पेरियार ने कहा जाति तोड़ो और इंसान बनो. इन तीनों ने हमेशा कहा कि असली दुश्मन ब्राह्मणवाद है. यानी वो सोच और वो सिस्टम जो 10 फीसदी लोगों को 90 फीसदी लोगों पर राज करने देता है. आज भी देश की असली लड़ाई यही है. ये लड़ाई हिंदू और मुसलमान के बीच की नहीं है. असली लड़ाई ये है कि क्या गांव के हर बच्चे को एक जैसा स्कूल मिलेगा? क्या सरकारी अस्पताल में गरीब और अमीर का इलाज एक जैसा होगा? क्या नौकरी और बिजनेस में हर जाति और हर धर्म के नौजवान को बराबर मौका मिलेगा? जब तक इन सवालों का जवाब “हां” में नहीं आता तब तक तो आजादी अधूरी है.
उन्नीसवीं सदी तक भारत का कॉन्सेप्ट तो था ही नहीं, यह भूभाग जिस पर ब्रिटिश राज करते थे वह तो मुगलो से छीनी गई थी जिसमें अंग्रेज और मराठे सब शामिल थे. मुगलों से पहले भी भारत कोई एक देश कभी रहा नहीं. छोटे बड़े रजवाड़े आपस में लड़ते और जिसे जितनी जमीन मिलती कब्जा कर लेते. अखंड भारत नाम की कोई चीज इतिहास में कभी थी ही नहीं. भारत नाम का एक देश असल में 1947 में ही बना. बांटो और राज करो सिर्फ अंग्रेजों ने नहीं किया. हमारे अपने समाज के ऊँचे तबके ने भी धर्म और जाति के नाम पर लोगों को बांटकर हमेशा सत्ता हासिल करने का जुगाड़ किया. बंटवारे के लिए नेहरू ही जिम्मेदार नहीं थे उसके पीछे 90 साल की सांप्रदायिक राजनीति और समाज की गंदी जातिवादी असमानता थी.
बंटवारे के बाद के भारत में हिन्दुओं की तमाम जातियों को मिलाकर हिन्दू पहचान में जबरदस्ती पिरो दिया गया जिससे आज आरएसएस की बहुसंख्यक वाली राजनीति चल पा रही है. अखंड भारत जैसा कोई देश कभी था ही नहीं और न ही यह भविष्य में कभी सम्भव भी है. अखंड भारत का ढिंढोरा पीट कर आरएसएस सिर्फ लोगों को बेवकूफ ही बनाती है.
इतिहास को दो तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर इसका इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए किया जाये तो ये जहर बन जाएगा और अगर इसका इस्तेमाल इंसाफ दिलाने और गलतियां सुधारने के लिए किया जाये तो यह दवा बन जाएगा. 1857 की क्रांति से शुरू हुई कहानी आज 2026 में आकर खत्म होती है. इन 170 सालों में हमने गुलामी देखी, आजादी की लड़ाई देखी, बंटवारे का खून देखा और फिर एक नए देश का जन्म भी देखा. अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि आजादी के 80 साल बाद हम कहां खड़े हैं? Partition 1947





