Movie Review: गणित की दुनिया में जीरो का भले खूब महत्त्व हो मगर फिल्मी दुनिया में 'आर्यभट का जीरो' माइनस की कैटेगरी में रहेगा. कमल चंद्रा के निर्देशन में बनी फिल्म ऐसे मोड़ पर शुरू होती है जहां आप को लगता है कि आप '12वीं फेल' या 'शादी में जरूर आना' जैसी किसी कहानी का हिस्सा बनने जा रहे हैं, लेकिन जैसेजैसे फिल्म आगे बढ़ती जाती है, अपनी ही बनाई राह से भटक जाती है. नतीजा यह निकलता है कि फिल्म खुद ही कन्फ्यूज्ड हो जाती है कि वह दिखाना क्या चाहती थी.
फिल्म की कहानी उत्तराखंड के देहरादून में रहने वाले ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव यानी बग्गू (हिमांश कोहली) के इर्दगिर्द बुनी गई है. बग्गू 25 साल का ऐसा युवा है जो नालायक है. वह पढ़ाई में कमजोर रहा है और आसपड़ोस, रिश्तेदारों की नजरों में पूरी तरह से नाकाम भी. उस के पिता आर्यभट श्रीवास्तव (नीरज सूद) फोर्थ ग्रेड के सरकारी कर्मचारी हैं. पिता की ख्वाहिश है कि बेटा कामयाब हो और उन का सिर ऊंचा करे लेकिन बग्गू की हर कोशिश असफल होती है.
बग्गू की जिंदगी में असली मोड़ तब आता है जब उस की गर्लफ्रैंड रिंकू (सोनाली सहगल) की शादी एक एसडीएम (गोपाल दत्त) से तय हो जाती है. इस झटके के बाद बग्गू जिद और गुस्से में आ कर आईएएस बनने का फैसला करता है. वह पहले अटेम्प्ट में फेल होता है तो पिता के कहने पर सेल्समैनन की नौकरी करने लगता है. मगर वहां भी झगड़ा कर बैठता है. बापबेटे में इस बात को ले कर झगड़ा होता है तो वह अपनी एक्स गर्लफ्रैंड रिंकू से पैसे ले कर फिर से आईएएस बनने के लिए दिल्ली के मुखर्जी नगर निकल जाता है.
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