Ram Mandir: अयोध्या के राममन्दिर का पहला सीईओ कौन होगा, यह उत्सुकता अब आम हो चली है. क्योंकि इस अहम पद के लिए दिए गए इंटरव्यू के तमाम सवाल आस्था और प्रशासनिक कार्यो के अनुभव के साथ साथ जाति और वर्ण से भी जुड़े हुए हैं. जिसका घोषिततौर पर कोई उल्लेख कहीं नहीं किया गया था. लेकिन समझने बाले समझ गए हैं अब जो न समझे उसे अनाड़ी कहने में कोई हर्ज नहीं.
11 अगस्त को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा मंदिर के संचालन के लिए सीईओ पद के लिए आए उम्मीदवारों से जो सवाल किए गए उन्हें देख लगता है कि दरअसल में देखा जांचा और परखा यह जा रहा था कि उम्मीदवार ब्राह्मण प्रतीकों को धारण करता है या नहीं. और उसमे कोई एब या लत तो नहीं जिसे पूरा करने के लिए उसे सेलरी के अलावा भी इधर उधर से पैसे कबाड़ने की जरूरत महसूस होती हो.
आइये देखें ये सवाल जिनका प्रशासनिक कार्यों से रत्ती भर भी लेना देना नहीं .
सवाल नम्बर -1- आप शिखा यानी चोटी रखते हैं या नहीं .
सवाल नम्बर -2- आप जनेऊ पहनते या नहीं.
सवाल नम्बर – 3 – आप शाकाहारी हैं या माँसाहारी.
सवाल नम्बर -4- शराब पीते हैं या नहीं.
सवाल नम्बर -5- भगवान राम के प्रति आपकी आस्था कितनी है.
सवाल नम्बर -6 – राम मन्दिर के प्रति आपका विजन क्या है.
सवाल नम्बर -7- नेतृत्व क्षमता और धार्मिक सामाजिक जुडाव कितना है.
सवाल नम्बर -8 -हिन्दू धार्मिक परम्पराओ के मुताबिक रहना आपके लिए कितना सहज है , और
सवाल नम्बर -9 – – आप कट्टर हिन्दू हैं या सामान्य आस्थावान हिन्दू हैं.
कैसे ये सवाल सिर्फ ब्राह्मण सीईओ ही चुने जाने की तरफ इशारा कर रहे हैं क्योंकि कट्टर हिंदू और आस्थावान हिंदू की पहचान अगर जाति और पेशे से की जाए तो ब्राह्मण ही कट्टर हिन्दू कहे जा सकते हैं बाकी सब स्वभाविक तौर पर आस्थावान होंगे जो चढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं लेकिन जाति के इस गोलमोल झमेले से पहले थोड़े से में यह समझ लें कि आखिर क्यों ट्रस्ट को फुल टाइम सीईओ की जरूरत आन पड़ी और कैसे आखिरी 18 नामों में से एक को चुना जाएगा.
राममन्दिर की चढ़ावा चोरी और घोटाले के बाद न केवल मन्दिर ट्रस्ट की बल्कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी सहित आरएसएस की भी छीछलेदार और किरकिरी हुई थी. इससे बचने ट्रस्ट ने तय यह किया कि अब नए सिरे से मंदिर संचालन के लिए कुछ ऐसी कवायद की जाए जो देखने में ट्रांसपेरेंट लगे. लेकिन ट्रांसपेरेंट हो भी यह जरुरी नहीं. तय यह भी किया गया कि सीईओ के लिए बाकायदा वेकेंसी निकाली जाए जिससे भक्तों को लगे कि उनका चढ़ावा अब सुरक्षित हाथों में है. क्योंकि चढ़ावा घोटाले के बाद अयोध्या जाने बाले भक्तों की तादाद में कमी आई थी जिससे चढ़ावा भी कम मिल रहा था.
आमतौर पर हिन्दू मन्दिरों में मुख्य पुजारी ही अकाउंटेंट होता है और सीईओ भी वही होता है. मन्दिर के दैनिक संचालन की जिम्मेदारी वही संभालता है और असल बात वह ब्राह्मण ही होता है. अब इस सिस्टम में बदलाव यह किया गया है कि पुजारी और प्रशासक अलग कर दिए गए हैं. जिससे अव्यवस्था न फैले , श्रद्धालुओं को परेशानी न हो और चढ़ावे का पैसा बजाय किसी चंपत राय या यादव की जेब में जाने के सीधा ट्रस्ट को मिले.
सीईओ छांटने के लिए ट्रस्ट ने जो तीन सदस्यीय सिलेक्शन कमेटी बनाई उसमे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस प्रमोद कोहली , रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी और सुरेश हाबरे रखे गए जो हाबरे ग्रुप आफ कम्पनीज के मुखिया होने के साथ साथ शिरडी साईंबाबा संस्थान ट्रस्ट के भी मुखिया रह चुके हैं. मराठा समुदाय से ताल्लुक रखने बाले सुरेश हाबरे ने मन्दिर प्रबंधन पर किताबें भी लिखी हैं.
आमतौर पर साईंबाबा के भक्त जात पात के झंझटों से दूर रहते हैं. अब शिरडी ट्रस्ट के अध्यक्ष रह चुके सुरेश हाबरे से तो यह उम्मीद करना बेकार है कि वे उम्मीदवारों से शिखा और जनेऊ टाइप के सवाल करेंगे. यानी ये सवाल या तो जस्टिस प्रमोद कोहली ने पूछे या फिर विष्णुकांत चतुर्वेदी ने पूछे और इस खास मकसद से पूछे. जिससे सीधे जाति पूछने के आरोप या आक्षेप से बचा जाकर ब्राह्मण सीईओ नियुक्त किया जा सके. क्योंकि गैरब्राह्मण आमतौर पर न तो जनेऊ रखता और न ही चोटी धारण करता.
इस पद के लिए 5300 से भी ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया था. जिनमे से 18 को शार्टलिस्ट किया गया. उनमें से भी तीन को छांटा गया इनमे से जिन दो ब्यूरोक्रेट्स के नाम उजागर हुए हैं वे भी ब्राह्मण ही हैं. पूरी संभावना इस बात की है कि तीसरा भी ब्राह्मण ही होगा. हालाँकि ये मीडियाई कयास ही हैं. लेकिन जिन सवालों की बिना पर सीईओ चुना जाना है उनकी कसौटी पर कोई गैर ब्राह्मण खरा उतरेगा यह कहने की कोई वजह नहीं . नहीं तो शिखा और जनेऊ का प्रशासनिक जिम्मेदारियों से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं. इसी तरह शराब और मांसाहार भी व्यक्तिगत बातें हैं इनका भी औचित्य समझ से परे है .
दरअसल में काकरोचों के सफल आन्दोलन के बाद अब हर कोई धर्म के बाबत वे सवाल पूछने लगा है. जिनका जबाब देने में सनातनियों को असहजता होती है. मसलन यह कि गर्भवती सीता का त्याग क्यों किया गया था , ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ये सब ताडन के अधिकारी बाला दोहा क्या शूद्र और स्त्री विरोधी नहीं और शम्बूक का गुनाह क्या था.. जैसे सैकड़ों सवाल जिन्हें सरिता ने 60 से 80 के दशक में प्रमुखता से उठाया था और आज भी उठाती है और आगे भी उठाती रहेगी. ये सवाल अब 6 दशक बाद फिर पूछे जा रहे हैं यह कम दिलचस्पी बाली बात नहीं.
राममन्दिर का सीईओ अगर उम्मीद के मुताबिक ब्राह्मण ही चुना गया तो जेन जी, काकरोच और गैर काकरोच भी सवाल तो पूछेंगे ही कि क्यों किसी गैर ब्राह्मण को यह अधिकार नहीं दिया गया और अगर ब्राह्मण ही चाहिए था तो सीधे सीधे बता देते कि यह पद ब्राह्मणों के लिए रिजर्व है.





