Neha Bora: 7 अगस्त 2026 को झारखण्ड की राजधानी रांची में JPSC और JSSC एग्जाम में हुए स्कैम के खिलाफ स्टूडेंट्स सड़क पर थे. उनके साथ खड़ी थीं AISA की नेशनल प्रेसिडेंट नेहा बोरा. वो माइक लेकर बोल रही थीं, सिस्टम से सवाल पूछ रही थीं. तभी 26 साल के अमर नाथ पांडेय ने नेहा के चेहरे पर इंक फेंक दिया. सवाल ये है कि एक स्टूडेंट लीडर के चेहरे पर इंक फेंकने से किसको फायदा हुआ? किसको मैसेज गया?
मैसेज सीधा था. जो लड़की आवाज उठाएगी, जो लीड करेगी और जो चुप नहीं बैठेगी उसका यही हाल होगा. ये हमला नेहा के शरीर पर नहीं था. ये हमला हर उस लड़की पर था जो अपनी आजादी के नारे लगाती है, ये हमला हर उस लड़की पर था जो अपने हकों के लिए बोलना चाहती है. एक बोतल इंक की कीमत 20 रुपये होगी लेकिन उससे लाखों लड़कियों के अंदर डर पैदा कर दिया गया. डर हमेशा सस्ता होता है लेकिन उस डर का असर बहुत बड़ा करता है.
अब सवाल यह है कि क्या ये पहली बार हुआ है? बिल्कुल नहीं. 29 मार्च 2026 को इसी रांची के भाभानगर में 28 साल की एक दलित औरत और उसकी 10 साल की बेटी का मुंह काला करके उन्हें नंगे पैर पूरी कॉलोनी में घुमाया गया. जुर्म क्या था? उनके हसबैंड ने गलती से पड़ोसी की बाइक 4 दिन के लिए ले ली थी. आज के समय शोशल मीडिया है और हर आदमी के हाथों में मोबाइल है तो कई मामले उजागर हो जाते हैं. वरना ऐसी घटनाएं तो एक पंचायत से शुरू होती थीं और उसी पंचायत में दफन कर दी जातीं थीं. औरतों की चीखें घर की चारदिवारी से बाहर निकल भी जाती थीं तो पंचायत से आगे नहीं पहुंच पाती थीं. सवाल यह भी है कि इस मेंटेलिटी को जस्टिफाई कौन करता है? जवाब है, धर्म और संस्कृति. यह पूरा खेल डर का है. आदमी को डराओ कि भगवान नाराज हो जाएगा. औरत को डराओ कि संस्कृति खराब हो जाएगी. दलित को डराओ कि कर्मों का फल है.
नेहा बोरा ने ऐसा क्या कर दिया था? नेहा ने कोई बैंक नहीं लूटी थी. नेहा ने किसी का मर्डर नहीं किया था. उन्होंने सिर्फ माइक उठाकर कहा था कि एग्जाम में घोटाला हुआ है, स्टूडेंट्स के साथ चीटिंग हुई है. बस इतनी सी बात पर हमला क्यों? क्योंकि पितृसत्ता को औरत की आवाज से सबसे ज्यादा एलर्जी है. औरत रसोई में रहे, बच्चे पैदा करे, पति की सेवा करे, यहां तक ठीक है लेकिन जैसे ही वो सड़क पर आई, जैसे ही उसने सवाल किया, पैट्रिआर्कल सिस्टम को मिर्ची लग गई.
डाटा से जानिए मानसिकता का सच
एनसीआरबी का डेटा हैरान करता है. महिलाओं के खिलाफ हर साल 4.45 लाख केस दर्ज होते हैं. मतलब हर दिन 1219 केस दर्ज होते हैं. इनमें से 31 फीसदी केस पति और ससुराल वाले करते हैं और जब बात दलित महिलाओं की आती है तो हर 10 मिनट में एक क्राइम होता है. हर दिन 3 रेप होते हैं. यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं बल्कि यह हमारी संस्कृति का रिपोर्ट कार्ड है. यह आज का नया भारत है जहाँ औरतों को लेकर सोच आज भी वही पुरानी है बस हथियार बदल गए हैं.
UN Women की रिपोर्ट कहती है कि भारत की 30 प्रतिशत औरतें अपनी लाइफ में कभी ना कभी फिजिकल या सेक्सुअल वायलेंस झेलती हैं लेकिन जब यही औरत पॉलिटिक्स या लीडरशिप में आती है तो ये नंबर 3 गुना हो जाता है. इंटरनेट डेमोक्रेसी प्रोजेक्ट की 2023 की रिपोर्ट कहती है कि इंडिया की फीमेल लीडर्स को मेल लीडर्स के मुकाबले 4 गुना ज्यादा ऑनलाइन गाली, धमकी और कैरेक्टर असैसिनेशन झेलना पड़ता है. एक महीने में औसतन 1200 गालियां मिलती हैं. ऑफलाइन भी यही होता है. नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की एक इंटरनल रिपोर्ट लीक हुई थी जिसके अनुसार पंचायत चुनाव लड़ने वाली 43 फीसदी औरतों को चुनाव के दौरान धमकी या हमले का सामना करना पड़ा. 2024 में JNU में महिला स्टूडेंट लीडर्स पर हमले हुए. 2025 में UP में 2 महिला सरपंच को मुंह काला कर गांव में घुमाया गया. 2026 में झारखंड में जनवरी से जून तक ऑनर बेस्ड वायलेंस के 14 केस दर्ज हुए. हर केस में एक ही पैटर्न नजर आया. टार्गेट औरत का चेहरा और शरीर था क्योंकि औरत को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करना सबसे आसान काम होता है.
यह धब्बा इंक का नहीं सोच का है
नेहा के चेहरे पर पड़ा यह महज इंक का धब्बा नहीं है ये पितृसत्ता का ठप्पा है और ये ठप्पा तब तक नहीं मिटेगा जब तक संस्कृति, आस्था और परंपरा के नाम पर चुप्पी बनी रहेगी. पितृसत्ता का सबसे पहला रूल यही है कि औरतें हमेशा मर्दो के नजरिये से दुनिया देखे, मर्दों की सुने और मर्दों के नेरेटिव को ही अपनी जुबान से बोले. औरत के आंख, कान और जबान, मर्दो के कंट्रोल से बाहर न जाए. जो औरतें खुद की आँखों से दुनिया देखती हैं, अपनी मर्जी से सुनती हैं और अपनी जुबान से अपने शब्द बोलती हैं ऐसी औरतों को समाज बर्दाश्त नहीं कर पाता इसलिए ऐसी औरतों को जब भी सबक सिखाना हो, टार्गेट चेहरा होता है. एसिड अटैक में चेहरा बिगाड़ दिया जाता है, इंक चेहरे पर फ़ेंकी जाती है और कालिख भी चेहरे पर पोता जाता है. इस तरह दूसरी औरतों को मैसेज दिया जाता है कि अब तुम बदसूरत हो. अब कोई तुमसे शादी नहीं करेगा. अब तुम्हें कोई पुरुष सहारा नहीं देगा और अब तुम लीड नहीं कर पाओगी.
मतलब सिस्टम को प्रॉब्लम औरत के काम करने से नहीं है. प्रॉब्लम औरत के अपनी मर्जी से बोलने, सुनने और देखने से है. कोई औरत रसोई में 10 घंटे काम करे और चुप रहे तो वह संस्कारी औरत कही जाती है और ऑफिस में 10 घंटे काम करने वाली को चरित्रहीन बता दिया जाता है. घर संभालो तो लक्ष्मी हो सड़क पर निकलो तो बेशर्म हो और ऐसी मेंटिलिटी सिर्फ मर्दो की नहीं होती, औरतें भी इसी मानसिकता की गुलाम हैं क्योंकि हजारों साल से उन्हें भी यही पढ़ाया गया है कि जो औरत घर से बाहर है वो चरित्रहीन है इसलिए जब नेहा पर इंक फेंकी गई तो कुछ औरतें भी बोलीं कि नेहा को इतना बोलने की क्या जरूरत थी. ये इंटरनलाइज्ड मिसोजनी है जिसमें गुलाम को भी गुलामी अच्छी लगने लगती है.
स्कूल से ही शुरू हो जाता है चुप रहने का लेसन
इंक की बोतल कॉलेज में नहीं उठती. यह बीज 6th क्लास में बो दिया जाता है. जब टीचर बोलती है, लड़कियां शोर मत करो, जब PTM में माँ से पूछा जाता है बेटी को नौ बजे के बाद ट्यूशन मत भेजा करो, यही सुझाव बेटे को लेकर कोई नहीं देता. CBSE की 2023 की रिपोर्ट कहती है कि 10th और 12th में लड़कियों का पास परसेंटेज लड़कों से 2 प्रतिशत ज्यादा है लेकिन ग्रेजुएशन के बाद वर्कफोर्स में लड़कियों की भागीदारी सिर्फ 24 फीसदी ही रह जाती है. मतलब स्कूल में टॉप लेकिन हायर एजुकेशन में फ्लॉप. जिसके कारण आधी आबादी जॉब में सिर्फ 24 प्रतिशत की भागीदारी हासिल कर पाती है. स्कूल की असेंबली में लड़कों को लीडर बनाया जाता है और लड़कियों को फ्लावर देने के लिए खड़ा किया जाता है. 15 साल तक यही चलता है फिर जब वही लड़की 22 की उम्र में नेहा बोरा की तरह माइक उठाती है तो सिस्टम को लगता है ये तो स्क्रिप्ट से बाहर जा रही है और स्क्रिप्ट से बाहर जाने वाली की सजा तय है. इंक, गाली, कैरेक्टर सर्टिफिकेट. इसका मतलब प्रॉब्लम नेहा में नहीं है. प्रॉब्लम उस क्लासरूम में है जहां पहली बार किसी लड़की को कहा गया था बैठ जाओ, ज्यादा मत बोलो.
सोशल मीडिया बन गया नया चौपाल जहां औरतों की इज्जत नीलाम होती है
औरतों के मुंह पर कालिख पोतने के लिए पहले पंचायत लगती थी. अब इंस्टाग्राम रील के जरिये भी यही काम हो रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले पंचायत में 50 लोग सुनते थे, अब शोशल मीडिया पर 5 लाख लोग देखते हैं. इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की 2024 की रिपोर्ट कहती है कि इंडिया में हर दिन ऑनलाइन वायलेंस की 8010 शिकायतें आती हैं और इनमें से 72 फीसदी वोयलेंस औरतों के खिलाफ होती हैं. नेहा बोरा पर इंक गिरी, 10 मिनट में वीडियो वायरल हुआ. कमेंट सेक्शन में ग़ालियों की बौछार शुरू हो गई. हर फीमेल एक्टिविस्ट के साथ यही पैटर्न दिखाई देता है.
एमनेस्टी इंटरनेशनल की ट्रोल पेट्रोल रिपोर्ट कहती है कि इंडियन महिला जर्नलिस्ट और एक्टिविस्ट को हर महीने औसतन 1200 एब्यूजिव ट्वीट मिलते हैं और पुरुषों को 300. मतलब लड़कियों को 4 गुना ज्यादा. ये ट्रोलिंग रैंडम नहीं है, ये टार्गेटेड है. जैसे ही कोई लड़की सरकार के खिलाफ, पैट्रिआर्की के खिलाफ, समाज के सड़े हुए मापडंडो के खिलाफ या धर्म के खिलाफ बोलती है उसके DM में रेप की धमकी मिलती है उसके फोटो पर मॉर्फिंग शुरू हो जाती है और कई बार उसके नंबर लीक कर दिए जाते हैं. मकसद एक ही होता है उसे इतना परेशान कर दो कि वो खुद डिलीट करके घर बैठ जाए. ऑफलाइन इंक, ऑनलाइन गालियां दोनों का टार्गेट सेम है. औरत की आवाज बंद करो और सबसे खतरनाक ये है कि ये सब फ्री स्पीच के नाम पर होता है.
सेफ्टी के नाम पर घर की चारदीवारी में कैद करने की मानसिकता
हमने लड़कियों को एक झूठ बेचा है. नाम है सेफ्टी. बोला जाता है घर में रहो, सेफ रहोगी. बाहर जाओगी तो खतरा है. इस सेफ्टी के चक्कर में लड़कियां घर बैठ गईं लेकिन NCRB का डेटा इस झूठ की धज्जियां उड़ा देता है. औरतों के खिलाफ एक साल में 4.45 लाख केस हुए, उनमें से 32 फीसदी केस पति और ससुराल वालों ने किए. मतलब औरतों को सबसे ज्यादा खतरा बाहर नहीं बल्कि घर के अंदर है. फिर भी लड़कियों को कहा जाता है कि रात 8 बजे के बाद मत निकलो, क्यों? क्योंकि बाहर सेफ्टी की कोई गारंटी नहीं. पुलिस, स्ट्रीट लाइट और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सब फेल है तो आसान सल्यूशन क्या है? लड़की को ही घर में बंद कर दो. NFHS-5 के डेटा के अनुसार 18 से 49 साल की 57 फीसदी औरतें अकेले मार्केट या हेल्थ सेंटर तक नहीं जा सकतीं. उन्हें परमिशन चाहिए. ये सेफ्टी नहीं है. ये नजरबंदी है और जब कोई नेहा इस नजरबंदी को तोड़कर सड़क पर आती है तो उसे सजा देनी पड़ती है ताकि बाकी लड़कियां देखकर फिर से अपने कमरे में लौट जाएं. इंक का मकसद चेहरे को खराब करना नहीं, मकसद ये बताना है कि देखो, बाहर की दुनिया तुम्हारे लिए नहीं है.
इकॉनमी को भी डर लगता है पढ़ी-लिखी लड़की से
सरकार भी चाहती है लड़कियां पढ़ें. तभी वह बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा देती है, लोन देती है और लड़कियों को स्कॉलरशिप देती है लेकिन जॉब नहीं देती क्यों? क्योंकि एक इंडिपेंडेंट लड़की सबसे खतरनाक होती है. वर्ल्ड बैंक 2023 की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगर इंडिया में औरतों की वर्कफोर्स पार्टिसिपेशन 50 परसेंट तक पहुंच जाए तो GDP में 27 परसेंट का उछाल आ सकता है लेकिन अभी हम 24 परसेंट पर अटके हैं. कारण यही है कि समाज हो या सरकार दोनों को इंडिपेंडेंट औरतों से डर लगता है इसलिए सरकार नौकरी नहीं देती और समाज लड़कियों को हायर एजुकेशन तक पहुँचने से पहले ही घर में बिठा देता है. कोई लड़की नौकरी तक पहुंच भी गई तो कंपनी में प्रमोशन के टाइम पूछा जाता है. शादी कब करोगी? इंटरव्यू में पूछा जाता है, बच्चे का क्या प्लान है? और यहां भी अगर कोई अपने हकों के लिए आवाज उठाये तो उसे एग्रेसिव का टैग मिल जाता है. नेहा बोरा स्टूडेंट लीडर है. कल को वो MP भी बन सकती है. कल को वो पॉलिसी भी बना सकती है. पितृसत्ता को यही डर है. एक पढ़ी-लिखी और सवाल पूछने वाली लड़की पूरे सिस्टम की नींव हिला देगी इसलिए उसे शुरू में ही रोकना जरुरी है ताकि वो थक कर बोले छोड़ो यार, शादी कर लेती हूं.
देश में 99.9 फीसदी लोग धार्मिक हैं. मतलब समाज में धर्म है, आस्था है, पूजा है लेकिन इक्वालिटी नहीं है. क्यों? क्योंकि हमारी ज्यादातर धार्मिक किताबें ही इस इक्वालिटी के खिलाफ ख़डी हैं. अब जब बचपन से धर्म को घुट्टी की तरह पिलाया जाएगा, स्कूलों में यही पढ़ाया जाएगा, यही टीवी सीरियल में दिखाया जाएगा, यही प्रवचन में बोला जाएगा तो 2026 का कोई धार्मिक लड़का बिगड़ी हुई लड़कियों को धर्म का रास्ता दिखाने के लिए इंक की बोतल क्यों नहीं उठाएगा? यही लड़का किसी लड़की का चेहरा बिगाड़ने के लिए तेजाब की बोतल भी उठाएगा. उसके लिए तो वो धर्म की रक्षा कर रहा है. वो सोचता है मैं मर्यादा बचा रहा हूं जबकि असल में वो पैट्रिआर्की की सर्विस कर रहा है. भगवान के नाम पर सबसे ज्यादा बिजनेस औरत की गुलामी का ही हुआ है इसीलिए जब तक हम इन किताबों को सवालों के कटघरे में खड़ा नहीं करेंगे, तब तक नए-नए अमर नाथ पांडे पैदा होते रहेंगे. Neha Bora





