चेन्नई सुपरकिंग्स ने सनराइजर्स हैदराबाद को 8 विकेट से हरा कर इस बार फिर इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल 2018 का खिताब अपने नाम कर लिया. इस से पहले चेन्नई सुपरकिंग्स 2 बार यह खिताब हासिल कर चुकी है.

आईपीएल का चस्का युवाओं को इस तरह लग गया है जैसे नशेड़ी को नशे का बेसब्री से इंतजार रहता है. पिछले एकडेढ़ महीनों में युवा मैच के दौरान टीवी से चिपके रहे या फिर स्टेडियमों में हाथ हिलाते नजर आए. इस से तो यही लगता है कि उन के लिए क्रिकेट सब से ज्यादा महत्त्चपूर्ण है. जबकि आईपीएल मार्केटिंग का मास्टर स्ट्रोक है और इस मास्टर स्ट्रोक का मास्टरमाइंड ललित मोदी इंगलैंड में बैठ कर इस तमाशे का मजा ले रहा है.

सवाल उठता है कि 20-20 ओवर के इस तमाशे में अपना धन और समय गंवा कर क्या हासिल हुआ? जवाब सुनने को मिल सकता है कि इस से मनोरंजन होता है और इस मनोरंजन के लिए थोड़ा सा समय और धन गंवा भी दिया तो इस में हर्ज ही क्या है.

आईपीएल विशुद्ध रूप से मनोरंजन है यानी 20-20 ओवर के इस मैच में खूब इंटरटेनमैंट होता है. इसे मनोरंजक बनाने के लिए खूब प्रचारप्रसार किया जाता है. स्टेडियमों में तरहतरह का म्यूजिक बजाया जाता है. चौकेछक्कों की बरसात होने पर चीयर लीडर्स खूब ठुमके लगाती हैं यानी आप के मनोरंजन के लिए धनकुबेरों ने ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि धन व समय गंवाने के बाद भी आप को खूब मजा आए.

इस मजे के लिए आप पहले टिकट लेते हैं, फिर स्टेडियम तक पहुंचने के लिए किराया देते हैं या फिर पैट्रोल फूंक कर कार या मोटरसाइकिल से वहां पहुंचते हैं. उस के बाद बारी आती है पार्किंग की. फिर वहां पार्किंग के भी पैसे देते हैं और पहुंच जाते हैं अपनी टीम का हौसला  बढ़ाने के लिए मैदान के अंदर. थोड़ी देर बाद आप अपनी प्यास बुझाने या भूख शांत करने के लिए देखादेखी ही सही, औनेपौने दामों में खानेपीने की चीजें खरीदते हैं और शुरू हो जाते हैं चीयर लीडर्स की तरह झूमने.

कुछ युवाओं के झुंड स्टेडियमों में इसलिए भी हुड़दंग मचाते हैं ताकि का फोकस उन पर पड़े और जैसे ही कैमरे फोकस उन पर पड़ता है वे और भी उतावले हो जाते हैं. दूसरे दिन जब कोई रिश्तेदार या अड़ोसपड़ोस के लोग मिलते हैं तो यह कहते नजर आते हैं कि वाह बेटा, तुम ने तो खूब मजे किए. अगली बार हमें भी बताना, हम भी चलेंगे.

चिंता की बात यह है कि उन से यह कोई नहीं कहता कि बेटा, तुम ने जो इतना समय बरबाद किया वहां जा कर, वह व्यर्थ रहा.

हिसाब लगाया जाए तो आप समझ सकते हैं कि यदि एक परिवार के  4 सदस्य मैच देखने जाते हैं तो उन्हें कम से कम 3 से 4 हजार रुपए खर्चने पड़ते हैं और 5-6 घंटे बरबाद किए, सो अलग.

कोई इस बात को समझने को तैयार नहीं कि इस से कुछ भला होने वाला नहीं है, न ही देश को और न ही क्रिकेट के चाहने वालों को. भला उन धनकुबेरों को जरूर हो रहा है जो करोड़ोंअरबों रुपया लगा कर खिलाडि़यों को खरीदते हैं और टीम बना कर आप के सामने परोसते हैं. वे आप से ही पैसा वसूलते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि वे आप को इस चक्रव्यूह में फंसा कर मालामाल हो रहे हैं और आप इस तमाशे में ताली बजा रहे हैं.

चिंता की बात यह है कि इस बात को युवा समझने को राजी नहीं हैं. और न ही मातापिता उन्हें समझाने को राजी हैं क्योंकि मातापिता भी इस तमाशे में गवाह बन रहे हैं.