सरिता विशेष

दुनिया की सब से ऊंची पर्वत चोटी तक पहुंचने का सपना देखने की हिम्मत तंदुरुस्त लोगों की भी नहीं होती, पर यह सपना देखा एक पैर से विकलांग मगर बुलंद हौसलों वाली अरुणिमा सिन्हा ने. उस ने अपने शरीर की इस कमजोरी को अपने मजबूत इरादों के मार्ग में आड़े नहीं आने दिया. उस ने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बनाया और एक छोटे से शहर से उठ कर माउंट ऐवरैस्ट पर फतह हासिल की नकली पैर के साथ.

अरुणिमा सिन्हा माउंट ऐवरैस्ट पर पहुंचने वाली पहली विकलांग लड़की है. महज 26 साल की उम्र में वह पद्मश्री अवार्ड से भी सम्मानित की जा चुकी है. यहां तक पहुंचने का सफर उस के लिए आसान नहीं रहा है.

सुलतानपुर के अंबेडकर नगर में रहने वाली अरुणिमा तब केवल 4 साल की थी, जब उस के पिता की मौत हो गई थी, जो आर्मी में थे. बड़ी मुश्किल से उस की मां को स्वास्थ्य विभाग में सुपरवाइजर की नौकरी मिली. अपनी बड़ी बहन के साथ अरुणिमा स्कूल जाने लगी. मगर उस का पढ़ाई से ज्यादा खेलकूद में मन लगता था. उसे फुटबौल और वौलीबौल खेलना पसंद था. वह खिलाड़ी बनना चाहती थी. इसलिए दुनिया की परवाह न कर अपने पैशन को कायम रखा और फिर एक दिन नैशनल प्लेयर बन गई.

अरुणिमा के टेलैंट को पूरा सम्मान नहीं मिला, तो उस ने नौकरी करने की सोची. मगर जनरल कैटेगरी में नौकरी पाना भी आसान नहीं होता. अब तक वह कानून की पढ़ाई कर चुकी थी. उस के जीजा आर्मी में थे. अत: उन की सलाह पर अरुणिमा ने केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) की परीक्षा दी.

उस रात ने जिंदगी बदल दी

कैरियर बनाने के लिए अरुणिमा एक दिन लखनऊ से दिल्ली के लिए निकली. वह पद्मावत ऐक्सप्रैस के जनरल कंपार्टमैंट में थी. 11 अप्रैल, 2011 की काली रात आज भी अरुणिमा को पूरी तरह याद है. वह बताती है, ‘‘रात डेढ़ बजे के करीब डब्बे में कुछ लुटेरे घुस आए और फिर चाकू की नोक पर लोगों को लूटने लगे. एक लुटेरे ने मेरी चेन छीननी चाही. किसी ने उसे रोका नहीं. पर मेरे अंदर की प्लेयर स्पिरिट ने इस का प्रतिरोध किया. मैं ने उस का हाथ मरोड़ दिया. यह देख उस के साथी भी आ गए. एक ने मेरे गले पर हाथ डाला. मैं ने गरदन को झटका दिया तो उस के हाथ में चेन के बजाय शर्ट की कौलर आ गई. लुटेरा मुझे कौलर से पकड़ कर घसीटते हुए दरवाजे के पास ले गया. तभी उन में से एक ने मुझे लात मारी और ट्रेन से नीचे फेंक दिया. उसी समय दूसरे ट्रैक पर ट्रेन आ गई. मैं उस से टकरा कर नीचे गिट्टियों पर गिर गई. दोनों ट्रेनें गुजरती रहीं. न जाने कितने पहिए मेरे पैर के ऊपर से गुजर गए.

‘‘बाद में हाथ नीचे रख कर मैं ने उठने का प्रयास किया तो देखा कि मेरा पैर कट चुका था. थाई को उठाया तो पैर जींस में लटक गया. बस थोड़े से मांस ने उसे मेरे शरीर से जोड़े रखा था. खून की धारा बह रही थी. दूसरे पैर की हड्डियां भी टूट चुकी थीं. मैं पूरी रात ट्रैक पर पड़ी चिल्लाती रही, इतना कि आंखों से दिखना भी बंद हो गया. रात भर पटरियों से ट्रेनें गुजरती रहीं. पटरी और मेरे बीच कुछ ही इंच का फासला था. मैं स्वयं को पटरी से दूर करना चाहती थी पर इतनी ताकत मुझ में नहीं रही थी.

‘‘ब्रेन कौंशस था पर बौडी में कोई मूवमैंट नहीं था. मैं बस यही सोचती रही कि खुद को कैसे बचाऊं. ‘‘सुबह 7 बजे के करीब गांव वालों ने मुझे देखा तो उठा कर डिस्ट्रिक्ट हौस्पिटल, बरेली ले गए. वहां डाक्टर आपस में बातें कर रहे थे कि हमारे पास तो एनेस्थीसिया के इंजैक्शन नहीं हैं, फिर ब्लड भी नहीं है. इलाज कैसे शुरू करें? मैं देख नहीं सकती थी पर सुनाई सब कुछ दे रहा था. जाने कहां से मेरे अंदर हिम्मत आई और मैं ने कहा कि सर, पूरी रात मैं ऐसी हालत में ट्रैक पर पड़ी रही. उस दर्द को बरदाश्त किया. फिर अब तो आप मेरे भले के लिए इसे काटेंगे. अत: मैं दर्द सह लूंगी. मेरी बात का असर हुआ. तुरंत डाक्टरों ने मुझे खून चढ़ा कर बिना एनेस्थीसिया का इंजैक्शन लगाए मेरा पैर काट दिया. आज भी मैं उस दर्द को महसूस करती हूं.

‘‘फिर जब बात मीडिया में आई कि मैं नैशनल प्लेयर हूं, तो मुझे लखनऊ ट्रामा सैंटर में भरती कराया गया. वहां से तत्कालीन स्पोर्ट्स मिनिस्टर अजय माकन द्वारा मुझे दिल्ली के एम्स में भिजवाया गया. मैं वहां 4 महीने एडमिट रही. मेरी रीढ़ की हड्डी में 3 फ्रैक्चर थे. एक पैर काट दिया गया था और दूसरी टांग में भी रौड लगाई गई थी. ‘‘थोड़ी ठीक हुई तो हौस्पिटल में ही न्यूज पढ़ा कि अरुणिमा के पास टिकट नहीं था, इसलिए वह ट्रेन से कूद गई थी. घर वालों ने इस का खंडन किया तो खबर आई कि अरुणिमा तो आत्महत्या करने गई थी. सोचने वाली बात है कि जिस लड़की का पैर कट गया, जो लड़की व्हीलचेयर पर है और नहीं जानती कि वह इस से कभी छुटकारा पाएगी भी या नहीं, उस पर ऐसे इलजाम लगें तो उस की मानसिक स्थिति क्या होगी? ‘‘हम एक मध्यवर्गीय फैमिली से थे और सिस्टम में बहुत हाई लैवल पर बातें हो रही थीं. हम अपनी सचाई चिल्लाचिल्ला कर बता रहे थे, लेकिन कोई नहीं सुन रहा था. पर कहते हैं न, जहां चाह होती है वहां राह भी मिल ही जाती है.

‘‘मैं ने सोचा कि ठीक है, आज आप का दिन है. जितना चाहे बोलो. एक दिन मेरा भी समय आएगा. तब मैं साबित कर दूंगी कि मैं क्या हूं. एक दरवाजा बंद होता है तो 10 नए खुल जाते हैं. हौस्पिटल के बैड पर मैं ने सोचा कि अब मुझे वौलीबौल नहीं, लाइफ का सब से टफ गेम खेलना है और फिर मैं ने माउंटेनियरिंग को चुना. पर सोचने और करने में बहुत अंतर होता है. इस कार्य के लिए सही गाइडैंस और स्पौंसरशिप मिलनी जरूरी थी. जब मैं ने लोगों के सामने अपनी यह बात रखी कि मैं माउंटेनियरिंग करना चाहती हूं और माउंट ऐवरैस्ट पर चढ़ना चाहती हूं तो हर किसी ने यही कहा कि पागल हो गई है क्या? एक पैर नकली है, दूसरी टांग में भी रौड पड़ी है, रीढ़ की हड्डी में भी फ्रैक्चर्स हैं, ऐसे में माउंटेनियरिंग? चुपचाप नौकरी कर जीवनयापन करो.

‘‘लोगों की सब से बड़ी प्रौब्लम यह है कि वे फिजिकली देखते हैं, मगर किसी के मन में क्या चल रहा है, यह नहीं देखते. पर मैं हिम्मत नहीं हार सकती थी. कैंसर को मात दे कर फिर से क्रिकेट के मैदान में जौहर दिखाने वाले क्रिकेटर युवराज सिंह से प्रेरणा मिली. मैं नहीं चाहती थी कि कोई मुझ पर दयादृष्टि डाले. मैं अपनी पुरानी जिंदगी वापस चाहती थी. वैसे भी खुद के सब से बड़े प्रेरणास्रोत तो हम खुद ही होते हैं. जिस दिन किसी मकसद को पाने के लिए हमारा मन जाग जाए, तो फिर कोई नहीं रोक सकता. मेरा परिवार तो मेरी बैकबोन था ही.

‘‘आमतौर पर नकली पैर के साथ चलने का आदी होने में एक विकलांग व्यक्ति को महीनों या फिर कभीकभी साल भी लग जाते हैं, मगर करीब 4 माह हौस्पिटल में रहने के बाद मैं बाहर निकली तो सीधी माउंट ऐवरैस्ट पर चढ़ने वाली एशिया की पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल से मिलने जमशेदपुर पहुंच गई. उस वक्त मेरे पैर के टांके भी नहीं कटे थे. मेरे बारे में सब कुछ जान और देख कर उन की आंखों में आंसू आ गए. वे बोलीं कि अरुणिमा, तुम ने ऐसी हालत में माउंट ऐवरैस्ट जैसे दुरूह पहाड़ पर चढ़ने के बारे में सोचा यानी अपने अंदर तो ऐवरैस्ट पहले ही फतह कर लिया. अब तो सिर्फ लोगों को दिखाने भर के लिए ऐवरैस्ट पर चढ़ना बाकी है.

‘‘परिवार को छोड़ कर बछेंद्री बाहर की पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने मुझ पर भरोसा जताया था. मुझे बहुत खुशी हुई. मैं जंग में उतरने को तैयार हो गई थी. मेरे हौसले को भाई ओमप्रकाश और बछेंद्री पाल के सहयोग से उड़ान मिलने वाली थी. सफलता के लिए मैं ने जख्मों को सूखने नहीं दिया, रिसने दिया ताकि मंजिल हमेशा याद आती रहे.’’

प्रशिक्षण का दौर

ऐवरैस्ट पर चढ़ने की अनुमति पाने के लिए किसी मान्यताप्राप्त प्रशिक्षण केंद्र से मैडिकली अप्रूव्ड सर्टिफिकेट का मिलना जरूरी होता है जिस में यह भरोसा दिलाया गया हो कि ऐवरैस्ट की चढ़ाई के लिए यह व्यक्ति योग्य है. इसलिए अरुणिमा ने माउंटेन क्लाइंबिंग के मशहूर और मान्यताप्राप्त प्रशिक्षण केंद्र ‘नेहरू इंस्टिट्यूट औफ माउंटेनियरिंग’ से 28 दिनों का बेसिक कोर्स किया, जिस में पहाड़ों की भौतिक दशाओं, सहज क्लाइंबिंग के तरीकों, औक्सीजन सिलैंडर के प्रयोग से जुड़ी सावधानियों सहित और बहुत सी जानकारी दी गई. करीब डेढ़ साल तक अरुणिमा ने बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में क्लाइंबिंग की बारीकियां जानीं. उस ने टाटा स्टील ऐडवैंचर फाउंडेशन द्वारा संचालित ‘ईको ऐवरैस्ट ऐक्सपैडिशन ग्रुप, उत्तरकाशी’ जौइन किया.

शुरूशुरू में अरुणिमा को काफी परेशानी होती थी. वह कहती है, ‘‘शुरुआत में कई दफा ऐसे लमहे भी आए जब मैं सामान्य लोगों के साथ कंपीट नहीं कर पाती थी. ऊपर चढ़ने के क्रम में मेरी टांग, जिस में रौड पड़ी थी, में स्वैलिंग आ जाती और दूसरे पैर पर दबाव पड़ने से ब्लड निकलने लगता. घाव नए थे. कई दफा छाले भी पड़ जाते. मैं ने प्रशिक्षण के दौरान अपनी टांग व पैर की तरफ देखना छोड़ दिया था. कैंप में पहुंच कर ही घावों को साफ करती.

‘‘एक समय वह भी था, जब सामान्य लोग जो दूरी 10-15 मिनट में पूरी कर लेते, मैं उसे पूरा करने के लिए 2-3 घंटों का वक्त लगाती. वजन ले कर चढ़ नहीं पाती. तब सोचती कि कहां तो मेरा सपना ऐवरैस्ट फतह करने का है और कहां मैं उन के साथ कदम मिला कर भी नहीं चल पा रही. फिर खुद से वादा किया कि एक दिन मैं इन सब से पहले पहुंच कर दिखाऊंगी.

‘‘मैं धीरेधीरे वजन उठा कर चलने लगी. पहले 1 किलोग्राम, फिर 2 किलोग्राम. धीरेधीरे मैं 14-15 किलोग्राम वजन उठा कर आसानी से आगे बढ़ने लगी. प्रशिक्षण के दौरान मुझे 35 किलोग्राम तक वजन उठाना था. 8 माह के बाद वाकई मैं पूरा वजन उठा कर बेस कैंप से दूसरों के साथ निकलती और सब से पहले टौप पर पहुंच जाती. लोग पूछते कि मैडम क्या खाती हो?

 ‘‘इसी दौरान मैं ने सितंबर, 2011 में लद्दाख के माउंट चमसेर कांगड़ी की चढ़ाई की. 21,798 फुट ऊंचे इस पहाड़ की 21,110 फुट की दूरी तो तय हो गई, मगर खराब मौसम के कारण शिखर तक नहीं पहुंच सकी. इस के बाद प्रशिक्षण के दौरान ही ईस्टर्न नेपाल की आईलैंड चोटी (6,150 फुट) की चढ़ाई भी की.

‘फिटनैस का सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए भी मुझे खासी मेहनत करनी पड़ी. 10 दिनों तक स्वयं को प्रूव करने के प्रयास में लगी रही. भारी वजन उठा कर चढ़ाई कर के दिखाया कि मैं यह काम कर सकती हूं. बड़ी मुश्किल से मुझे स्वीकृति मिली. बाद में इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन (आईएमएफ) ने भी हिमालय पर चढ़ने की इजाजत दे दी. ‘‘जब पहली दफा शेरपा (गाइड) ने मेरे पैर को देखा तो मेरा साथ देने के लिए साफ मना कर दिया. उसे लग रहा था कि मैं एक सुसाइड मिशन पर हूं. काफी समझाने पर बड़ी मुश्किल से वह मेरा गाइड बनने को तैयार हुआ. हमारे अभियान को टाटा स्टील द्वारा स्पौंसरशिप भी मिल गई थी.’’

ऐवरैस्ट फतह

अरुणिमा ने आसानी से माउंट ऐवरैस्ट पर फतह हासिल नहीं की. उस का सफर काफी जद्दोजहद भरा रहा. 31 मार्च, 2013 को वह ऐवरैस्ट के लिए निकली. 6 लोग और भी थे. टीएसएएफ इंस्ट्रक्टर सुसेन महतो भी इस अभियान में साथ थे, जो माउंट चमसेर की चढ़ाई के दौरान भी थे.

अरुणिमा के लिए प्रोस्थैटिक लैग (कृत्रिम पैर) का निर्माण राकेश कुमार श्रीवास्तव ने किया था. उन्होंने इसे डोनेट किया था. यह बहुत महंगे वाली प्रोस्थैटिक लैग नहीं थी, मगर अरुणिमा ने इसे पहन कर ही अपना अभियान पूरा किया. अच्छी क्वालिटी वाली महंगी प्रोस्थैटिक लैग्स क्व40-50 लाख से कम में नहीं मिलतीं. जबकि अरुणिमा के पास इतने पैसे नहीं थे. चढ़ने के क्रम में प्रोस्थैटिक लेग काफी समस्या पैदा कर रही थी. इस की पकड़ बारबार ढीली पड़ जाती. ग्लब्स निकाल कर उसे वापस फिट करना पड़ता. मगर -45 से -50 तापमान में यह काम आसान नहीं, क्योंकि बर्फ में हाथ जमने का डर रहता है. रौकी ऐरिया में तो वह सब से आगे होती, मगर आइस एरिया में आते ही हालत बिगड़ जाती. बर्फ में उस के पैर मुड़ जाते. इन परेशानियों की वजह से वह थोड़ा पिछड़ भी जाती. मगर उस ने अपने जज्बे को कभी गिरने नहीं दिया.

सफर के बारे में बताते हुए अरुणिमा कहती है, ‘‘माउंट ऐवरैस्ट चढ़ाई के दौरान 4 कैंप पार कर समिट तक पहुंचना होता है. शुरुआती दौर में तो खानेपीने की चीजें रास्ते में मिल जाती हैं. स्पौंसरशिप देने वाली कंपनी भी खानेपीने का प्रबंध करती है और फिर कुछ लोग 1 से ज्यादा शेरपा साथ रखते हैं ताकि अधिक सामान साथ जा सके. बेस कैंप (17 हजार 500 फुट) तक दिक्कत नहीं होती. मगर उस के बाद 11 से 15 दिनों का सफर अपने बल पर तय करना पड़ता है. आप कितना सामान उठा पा सकते हैं यह आप को ही सोचना होगा. साधारणतया हमारे लिए औक्सीजन सिलैंडर 5 या 8 किलोग्राम के होते हैं उठाने जरूरी होते हैं. इन के अलावा 2-3 लिटर पानी, चौकलेट्स, मेवा वगैरह रखना भी जरूरी होता है. एक बार के मिशन में क्व50 से क्व60 लाख तक का खर्च आ जाता है. ‘‘कैंप 3 तक ज्यादा खतरे की बात नहीं होती, मगर उस के बाद की स्थिति खतरनाक होती है. साउथ कोल और समिट के बीच के हिस्से को डैथ जौन कहते हैं. यह 26 हजार फुट से ऊपर का एरिया होता है. यहां औक्सीजन की कमी होती है, जिस से क्लाइंबर का दम घुटने लगता है. इस क्षेत्र में यहांवहां डैड बौडीज नजर आ जाती हैं. एक बंगलादेशी क्लाइंबर, जिस से मैं पहले मिली थी, ने मेरे सामने ही दम तोड़ दिया. यही नहीं, वहां अन्य डैड बौडीज भी नजर आ रही थीं. अपनी आंखों से यह सब देखना और डैड बौडीज को लांघ कर आगे बढ़ना आसान नहीं. मैं भी डरने लगी कि कहीं मेरी औक्सीजन भी खत्म न हो जाए और मेरी भी यही स्थिति न हो जाए. मगर मैं ने तुरंत फिर से अपना हौसला दृढ़ किया कि नहीं, समिट पर पहुंच कर मुझे जिंदा लौटना है. फिर जैसा आप सोचते हैं, शरीर भी वैसे ही काम करने लगता है.

‘‘मैं आगे बढ़ी. हिलरी स्टेप के पास जब चोटी बिलकुल करीब होती है, शेरपा मुझे रोकते हुए बोला कि औक्सीजन खत्म होने वाली है, वापस चलो, जिंदा रही तो फिर ट्राई कर लेना. पर मैं अड़ गई और बोली कि नहीं जीवन में गोल्डन चांस कभीकभी ही मिलता है और उसे पकड़ कर रखना पड़ता है. ‘‘मुझे याद आने लगा, जब मां ने और एक दफा बछेंद्री मैम ने भी समझाया था कि जिंदगी में कभीकभी ऐसे हालात भी आते हैं जब फैसला सिर्फ आप का होता है. जहां भी हो, खड़े हो कर, हलका सा पीछे देखना और सोचना कि तुम 1-1 कदम चल कर यहां तक पहुंची हो. सिर्फ अपना एक कदम आगे बढ़ाना और देखना कि कुछ देर बाद तुम टौप पर होगी.

‘‘यह बात वीडियो की तरह मेरे दिमाग में चल रही थी और आंखों के आगे सिर्फ ऐवरैस्ट का टौप था. मैं ने तय किया कि मुझे आगे जाना ही है. मैं आगे बढ़ गई और करीब डेढ़ घंटे बाद मैं टौप पर थी. इतना ही नहीं, आज भी मैं जितनी बार बोलती हूं, वह एहसास महसूस करती हूं. हर तरफ बर्फ की सफेद चादर नजर आ रही थी. दिन के 10 बज कर 55 मिनट हुए थे. 21 मई का दिन था. मैं ने तिरंगा फहराया और फिर अपने आदर्श, विवेकानंद की कुछ तसवीरें लगाईं. मेरा मन कर रहा था कि मैं जोरजोर से चिल्ला कर कहूं कि मैं आज ‘टौप औफ द वर्ल्ड’ पर हूं. उन लोगों को जो सोचते हैं कि लड़की, उस पर मिडल क्लास, उस पर भी विकलांग या वे लोग जो एक बार हार कर दोबारा लड़ना नहीं चाहते, उन से चिल्लाचिल्ला कर कहूं कि आप सब कुछ कर सकते हो. विकलांगता दिमाग से होती है, शरीर से नहीं. यदि दिमाग से विकलांग हैं, तो नौर्मल हो कर भी आप कुछ नहीं कर सकते.

‘‘मैं ने शेरपा से कहा कि फोटो खींच लो. उस ने कहा कि अरुणिमा जल्दी चलो. औक्सीजन खत्म हो जाएगी. किसी तरह उस ने एक फोटो खींचा. मैं ने उस से फिर से इसरार किया कि भाई अब एक वीडियो भी बना ले. ‘‘8,848 मीटर की ऊंचाई पर जब औक्सीजन खत्म हो रही हो, ऐसे में मेरा यह कथन सुन कर वह चिल्ला पड़ा कि पागल हो गई है क्या तू? तू मर यहां, मैं जा रहा हूं. पर मैं अपना जनून कैसे छोड़ती? मैं तो 4-5 जोड़ी बैटरी, 2 कैमरे वगैरह ले कर पूरी तैयारी से आई थी. मैं जानती थी कि यदि मैं जिंदा वापस नहीं गई तो भी मेरा यह वीडियो मेरे देश तक पहुंचे. 11 अप्रैल, 2011 को मेरा ऐक्सीडैंट हुआ था और 21 मई, 2013 को मैं टौप औफ द वर्ल्ड पर थी. कैसे? मजबूत इरादों से. दिलोदिमाग में यह लक्ष्य जनून बन कर छा गया था. सोतेजागते, उठतेबैठते सिर्फ माउंट ऐवरैस्ट चोटी दिखती थी. किसी लक्ष्य के प्रति पागलपन ही आप को सफलता दिलाता है.

खैर, उस ने नानुकर कर के मेरा वीडियो बनाया. अब शेरपा ने कहा कि जल्दी नीचे भागो अरुणिमा. 10 बज कर 55 मिनट हो रहे थे.11 बजे के बाद कोई अटैप्ट करता है, तो उसे सुसाइड अटैप्ट कहते हैं. मैं तेजी से नीचे चली. मुश्किल से 50 कदम ही चली थी कि मेरी औक्सीजन खत्म हो गई. वैसे भी ज्यादातर मौतें नीचे आते वक्त ही होती हैं. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या हालात रहे होंगे. एक पल ऐसा भी आया जब मैं सांस न ले पाने की वजह से तड़प रही थी. मैं बर्फ में मुंह दबा कर सांस लेने का प्रयास करने लगी. तब शेरपा ने कहा कि मुझे यकीन नहीं था कि तू ऐवरैस्ट फतह कर पाएगी. मगर तू ने किया. तो अब मैं चाहता हूं कि तू जिंदा वापस भी पहुंचे. चल अरुणिमा, उठ खड़ी हो जा.

‘‘पर मैं नीचे गिर गई. चाह कर भी खड़ी नहीं हो पा रही थी. दम ही नहीं था. फिर मैं ने पौजिटिव सोचा कि जब मैं रेल के ट्रैक पर 7 घंटे पड़ी रही, 49 ट्रेनें आईंगईं, फिर भी मैं जिंदा बची तो जरूर कोई न कोई इतिहास रचना है मुझे. तभी जिंदा बची हूं, तो फिर हिम्मत कैसे हार सकती हूं. n‘‘संयोग देखिए, उसी वक्त एक ब्रिटिश क्लाइंबर नीचे से ऊपर आ रहा था. उस के पास 2 औक्सीजन सिलैंडर थे, पर मौसम खराब होने की वजह से उस ने एक औक्सीजन सिलैंडर जो आधा औक्सीजन से भरा था फेंक दिया और दूसरे के साथ नीचे लौटने लगा, क्योंकि भारी वजन के साथ नीचे उतरना भी कठिन होता है. शेरपा औक्सीजन सिलैंडर को उठा लाया और मुझे लगा दिया. वह मुझे लकी बोलने लगा. मगर मैं लक से ज्यादा कर्म पर विश्वास करती हूं. मैं मानती हूं कि लक उसी का साथ देता है जिस के अंदर जीतने का जज्बा हो वरना बहाने ही बहाने शायद मैं भी बिना माउंट ऐवरैस्ट फतह किए लौट आती और कह देती कि औक्सीजन खत्म हो गई थी, तो कोई मुझ से पूछने नहीं आता. लेकिन क्या मैं स्वयं को समझा पाती?

‘‘खैर, मैं बहुत खुश थी. हील मारमार कर नीचे आ रही थी कि तभी मेरा नकली पैर पूरा निकल गया. ऐवरैस्ट पर तापमान -60 डिग्री तक डाउन हो जाता है. इस ठंड में मेरा हाथ नहीं हिल रहा था. पैर पहले से कटा हुआ था. दिमाग में यह बात आई कि कहीं अब हाथ भी काटना पड़ा तो क्या होगा? 3 स्टेज होती हैं- रैड, ब्लू और ब्लैक. हाथ रैड हो चुका था. ब्लैक होने पर काटना पड़ता. ‘मैं ने यह बात शेरपा से कही तो वह बोला कि हम जितना नीचे जाएंगे, उतना अच्छा होगा. मगर मेरी तो आंखों में आंसू ही आ गए. फिर मैं ने सोचा कि रोनेधोने से कुछ नहीं होगा. अत: फिर तुरंत आंसू पोंछ लिए. इस के बाद मैं ने एक हाथ से रोप को पकड़ा और दूसरे हाथ से नकली पैर को. फिर घिसटघिसट कर चलना शुरू किया. कुछ दूर आने पर रौक मिला. उस में घुसे. पैर को खोल कर सही किया, फिर नीचे चले.

‘‘कैंप 4 से समिट की दूरी लगभग 3,500 फुट है और इसे पार करने में लोग 16-17 घंटे का वक्त लेते हैं. मुझे 28 घंटे लगे. हर किसी ने मान लिया था कि अरुणिमा जिंदा नहीं लौटेगी. पर मैं जब वापस साउथ कोल पहुंची तो सब के चेहरे खिल उठे.’’ यह कहानी है उस हौसले की, जिस ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया. अरुणिमा ने यह साबित कर दिया कि एक लड़की/महिला कोई फैसला कर ले तो फिर उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. अरुणिमा के पास जिंदगी ने 2 विकल्प छोड़े थे- या तो एक कमरे के किसी कोने में पड़ी रह कर अपने जीवन को कोसती या फिर जीवन की कठिनाइयों का सामना कर शिखर को छूने के लिए जमीनआसमान एक करती. अरुणिमा ने दूसरा विकल्प चुना और नतीजा सामने था. वह ‘टौप औफ द वर्ल्ड’ पर थी.

‘मिशन 7 समिट्स’ अभियान के तहत अब तक अरुणिमा एशिया, अफ्रीका, यूरोप और आस्ट्रेलिया की सब से ऊंची चोटियों- क्रमश: माउंट ऐवरैस्ट, किलिमंजारो और कोसियूज्को तक पहुंच चुकी है. अभी 3 देशों की चोटियां फतह करनी बाकी हैं. इस अभियान के अगले चरण हेतु अरुणिमा स्विट्जरलैंड ट्रेनिंग के लिए जा चुकी है ताकि साउथ अमेरिका का माउंट एकोंकागुआ फतह करने निकल सके. उस के इस अभियान को ‘ओर्लिकोन टैक्सटाइल्स इंडिया प्रा.लि. द्वारा स्पौंसरशिप भी मिल चुकी है.