Hindi Story: सुबह की ऐसी दर्दीली शुरुआत तो जिंदगी में कभी नहीं हुई थी. मैं आराम से सालों से मुंबई के खार इलाके की इस सोसाइटी ‘पर्ल’ में अपने फ्लैट की बालकनी में चाय और अखबार के साथ अपने दिन की शुरुआत करती हूं. उस दिन जैसे ही चाय पी कर खड़ी हुई, कमर के तेज दर्द से चीख सी निकल गई. लगा बस, सब खत्म. आगे कदम रखा ही नहीं गया. मुश्किल से ही वापस बैठ पाई.
नहाते हुए पति नामक प्राणी संजय ने मेरी चीख सुन कर सोचा, मु?ो फिर कोई छिपकली या कौकरोच दिख गया होगा. उन्होंने मेरी चीख को गंभीरता से न लेते हुए यह सोच कर कि मैं पता नहीं कितने दिन चीख का रिस्पौंस न देने पर ताने मारूंगी, वहीं से पूछ लिया, ‘‘क्या हुआ, रंजू?’’
मैं लगभग रो ही दी, ‘‘जल्दी आओ, कमर में कुछ हुआ है.’’ मुझे इस बात की बड़ी शिकायत है कि औरतों के कमर दर्द को कोई सीरियसली नहीं लेता, हमारे देश में सड़कों के गड्ढे, पुल, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी से भी ज्यादा महिलाओं के कमर दर्द को इग्नोर किया जाता है. और तो और, एक महिला को बता कर देखिए कि सुनो बहन, कमर में बहुत दर्द है. उस का जवाब होता है, ‘अच्छा? तुम्हें भी कमर दर्द रहता है? मु?ो तो पता नहीं कितने सालों से है.’ भई, जब तुम ही हलके में ले रही हो तो कोई और क्या ही पीड़ा सुनेगा.
खैर, संजय आराम से ही नहाए. बस, मु?ो दिखाने के लिए ही अफरातफरी में निकले, ‘‘अरे, दिखाओ, क्या हुआ?’’ मन हुआ कहूं, नई साड़ी थोड़े ही पहनी है, जो पल्लू लहरा कर दिखाऊं. मैं ने फिर उठने की कोशिश की, अब तो मेरी आंखों में सचमुच दर्द से आंसू आ गए, ‘‘संजय. मेरी कमर में कुछ हुआ है, दर्द बरदाश्त के बाहर है.’’
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