Hindi Story: पालमपुर की सुबहें किसी पुरानी कविता की तरह होती हैं, हर पेड़, हर पत्थर, हर पहाड़ जैसे कोई बिंब हो. सूरज यहां अचानक नहीं उगता, वह धीरेधीरे सफेद धुंध की चादर को खिसकाता है, जैसे किसी चित्रकार की उंगलियां रंगों को धीरेधीरे उजागर कर रही हों. उस चादर के पीछे से धौलाधार पर्वत की बर्फीली निस्तब्धता ?ांकती है. धौलाधार वह हिमाच्छादित पर्वतशृंखला है जो पालमपुर में मौन संरक्षक की तरह खड़ी रहती है, सालों से एक ही मुद्रा में- स्थिर, धवल और अल्पभाषी.

पास बहती न्यूगल नदी की कलकल के पास एक घर है. न बहुत बड़ा, न दिखावटी. छत पर सजी हैं हिमालयी बेलों की कतारें, ब्रह्मकमल, बर्फ गुलाब, सिंहपर्णी और एक पुराना बोनसाई रोडोडेंड्रोन, जिसे उस घर के लोग ‘कुमाऊं वाला’ कहते हैं. यह घर है अभिनव गुप्ताजी का. वे 60 वर्ष के रिटायर्ड जूलौजिस्ट यानी जीवविज्ञानी हैं, जिन्होंने पहाड़ की लुप्तप्राय जीव प्रजातियों और चीलों के पीछे भागतेभागते जीवन गुजारा. उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में धौलाधार की ढलानों पर पाई जाने वाली दुर्लभ तितलियों और कस्तूरी मृगों पर शोध किया था.

जीवनभर उन्होंने इस बात को सम?ाने की कोशिश की कि कैसे ऊंचाई, तापमान और मौसमी बदलाव किसी प्रजाति की संरचना व व्यवहार को बदल देते हैं. उन के औसत कद, हलकी झुकी पीठ, सफेद बाल और अधपकी दाढ़ी व झर्रियों से भरे चेहरे पर अब भी एक खोजी चमक थी. पर अब वे थम गए थे. उन के जीवन की संगिनी, स्वरा, बरसों पहले एक लंबी चुप्पी ओढ़ कर चली गई थीं, वही स्वरा, जो सितारवादक थीं. कमरे के कोने में पड़ा वह पुराना सितार अब मौन था.

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