क्यों इतने वर्ष बीतने के बाद मैं फिरदौस को याद कर रहा हूं? फिरदौस को मैं भूला तो नहीं था. उस जैसे को कोई भूल ही नहीं सकता. मेरे सरल जीवन में उस की याद सवाल बन कर तब वापस आई जब पिछले महीने मैं केरल में फैमिली रीयूनियन से लौटा. तब से ये ‘फिरदौस का सवाल’ मुझे लगातार सताए जा रहा है. जैसे भी हो, इस का हल मुझे ढूंढ़ना ही पड़ेगा.कोट््टयम बैकवाटर्स रिजोर्ट में अपने मांबाप, भाईभाभी और भतीजी से कई महीनों बाद मिला. हम सब अलकनंदा, मेरी छोटी बहन का इंतजार कर रहे थे. वह 30 साल की है, बोस्टन में आर्किटैक्ट है, अपनी फर्म के लीड आर्किटैक्ट के साथ शादी करने जा रही है. लड़का इंडियन है. मां को बस उम्र का फर्क खल रहा था, लड़का मेरी बहन से तकरीबन 14 साल बड़ा था. लेकिन यह उस की पहली शादी थी.

यह बात स्पष्ट थी कि अलकनंदा अपने मंगेतर को साथ ला रही थी, केवल हम सब से परिचित कराने, हमारी स्वीकृति पाने नहीं. बड़े उत्साह के साथ हम दोनों का इंतजार कर रहे थे. बहुत हैरानी हुई मुझे जब उस के मंगेतर से मिला. मैं उस से पहले मिल चुका था तब, जब मैं फिरदौस से पहली बार मिला था. यह शरद के दोस्तों में से एक था, ग्रुप में सब से चुप यही रहता था. फिरदौस का जिगरी दोस्त था. बातें फिरदौस औरों से करता मगर हाथ उस का अकसर इस के कंधे पर टिका होता था. अशोक नाम था. तब से अशोक काफी बदल चुका है. बोलने लगा है अब, लीडर टाइप बन गया है. देखने में वैसा ही है. मैं भी ज्यादा नहीं बदला हूं. लेकिन शुरू में उस ने मुझे नहीं पहचाना. बातों का सिलसिला शुरू होने के बाद मैं ने उसे अपनी पिछली मुलाकात के बारे में याद दिलाया. वह हैरान हुआ, फिर जल्द ही किसी और विषय के बारे में बात करने लगा. मुझे उस के बरताव से कोई निराशा नहीं हुई. बस, मन में यह सवाल उठ कर रह गया कि मैं अपनी छोटी बहन से यह कैसे कहूं कि यदि मुझ से किसी तरह का वास्ता रखना है तो इस आदमी से शादी करने का खयाल छोड़ दे.

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