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घास उगती है, गौरैया कुछ देर जमीन पर फुदकती हैं, उड़ान भर लेती हैं, समुद्र की लहरें भी उठती हैं और किनारे पर सिर फोड़, मिट जाती हैं. मेरे पास मेरे स्पंज हैं. मैं उन्हीं को बढ़ते हुए, फिर मरते हुए देखता हूं. उन की औलाद को भी बढ़ते हुए और मरते हुए देखूंगा. बेशक, मैं भी एक दिन नहीं रहूंगा. समय की ईमानदार गति चुपचाप और सस्नेह देखना मुझे मंजूर है.

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