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सागर कपूर... एक दिलफेंक नौजवान... जो थियेटर ग्रुप की हर लड़की पर डोरे डालता घूमता था, हर नई कली को देखकर उसके पीछे लग जाता था, बीते दो सालों से एक साधारण रंग-रूप वाली लड़की सरिता शास्त्री के चक्कर में पड़ा हुआ था, यह बात उसके दोस्तों को हजम नहीं हो रही थी. मगर इसकी वजह क्या है यह सिर्फ सागर जानता था. सागर को आगे बढ़ने के लिए सरिता का सहारा चाहिए था. वह जानता था कि सरिता उससे प्यार करने लगी है. वह उसके लिए कुछ भी करेगी, कुछ भी लिखेगी. उस वक्त सागर को पब्लिसिटी की बहुत जरूरत थी और पब्लिसिटी उसे सरिता दे सकती थी. और सरिता ने दी भी. सरिता न सिर्फ अपने समाचार पत्र में, बल्कि अपने पत्रकार मित्रों के जरिए अन्य समाचार पत्रों में भी सागर के बारे में लिखवाने लगी.

सागर को सरिता से सिर्फ पब्लिसिटी ही नहीं मिल रही थी, बल्कि वह उससे कई अन्य चीजें भी सीख रहा था, मसलन बातचीत करने का प्रभावशाली तरीका, आंखों में आंखें डालकर सटीक सवाल करने का ढंग, शब्दों का सही इस्तेमाल... ये सभी चीजें उसके व्यक्तित्व में जुड़ती चली गयीं और वह निखरता चला गया.

सरिता और सागर को जब भी समय मिलता वह हाथों में हाथ डाले दूर एकान्त स्थान की ओर निकल जाते थे, जहां वह घंटों सरिता को अपने सीने से लगाए लेटा रहता, उसके लम्बे बालों को अपनी उंगलियों से सुलझाता रहता, उसके चेहरे को अपनी हथेलियों के बीच लेकर अपने चेहरे के बिल्कुल करीब ले आता... सरिता उसकी गरम-गरम सांसों को महसूस करके शरमा जाती... अपनी पलकें झुका लेती... और सागर बेचैन होकर उसके थरथराते होंठों को अपने होंठों में ले लेता.

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