Readers’ Problems :
बिना औफिस पौलिटिक्स के आगे बढ़ना मुश्किल है.
औफिस पौलिटिक्स में फंस कर काम से मन हटने लगा है. मेरी उम्र 35 वर्ष है, एक मिडसाइज कंपनी में काम करता हूं. औफिस में गुटबाजी और चुगली आम बात है. कुछ लोग मैनेजमैंट के करीब बनने के लिए दूसरों की छवि खराब करते हैं. मैं अपना काम ईमानदारी से करता हूं, लेकिन औफिस पौलिटिक्स से दूर रहने के कारण कई बार मौके हाथ से निकल जाते हैं. मन में यह सवाल उठता है कि क्या बिना पौलिटिक्स के आगे बढ़ना संभव है?
आप का सवाल आज के कौर्पोरेट माहौल की एक बहुत सच्ची तसवीर पेश करता है. औफिस में गुटबाजी और चुगली अकसर इसलिए पनपती है क्योंकि कुछ लोग शौर्टकट से आगे बढ़ना चाहते हैं. यह स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में ईमानदारी से काम करने वाला व्यक्ति खुद को पीछे छूटता हुआ महसूस करे लेकिन यह समझना जरूरी है कि पौलिटिक्स से दूर रहना और पौलिटिक्स को समझ कर प्रोफैशनल तरीके से काम करना - ये 2 अलग बातें हैं. बिना पौलिटिक्स में उलझेआगे बढ़ना संभव है बशर्ते आप अपनी मेहनत को सही ढंग से दिखाई देने योग्य बनाएं.
सब से पहले, अपने काम को विजिबल बनाइए. अकसर ईमानदारी से काम करने वाले लोग यह मान लेते हैं कि अच्छा काम अपनेआप बोल देगा लेकिन प्रोफैशनल दुनिया में सही मंच पर अपने योगदान को सामने रखना भी एक स्किल है. मीटिंग में प्रोजैक्ट की प्रौग्रेस स्पष्ट शब्दों में बताना, समयसमय पर मैनेजर को अपडेट देना और अपने अचीवमैंट्स को तथ्यात्मक ढंग से समझाना सैल्फप्रमोशन नहीं, बल्कि प्रोफैशनल कम्युनिकेशन है. इस से आप की पहचान बनेगी और गुटबाजी के बीच भी आप का काम नजरअंदाज नहीं होगा.
दूसरा, रिश्तों से भागिए मत, लेकिन चुगली का हिस्सा भी मत बनिए. हर औफिस में कुछ अनौपचारिक नैटवर्क होते हैं. आप विनम्र, सहयोगी और प्रोफैशनल रह कर अच्छे वर्किंग रिलेशन बना सकते हैं, बिना किसी की बुराई किए. भरोसेमंद लोगों के साथ तालमेल बनाना कैरियर के लिए जरूरी है, क्योंकि मौके अकसर टीमवर्क और रैफरैंस के जरिए भी आते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आप रिश्ते काम के लिए बनाइए, कामयाबी के लिए किसी को गिरा कर नहीं.
तीसरा, अगर कोई आप को चुगली या नैगेटिव पौलिटिक्स में घसीटने की कोशिश करे तो शांति से विषय बदल दें या खुद को उस से दूर रखें. इस से आप की प्रोफैशनल छवि साफसुथरी बनी रहती है. लंबे समय में मैनेजमैंट उन लोगों पर ज्यादा भरोसा करता है जो स्थिर, भरोसेमंद और परिणाम देने वाले होते हैं, न कि हर समय विवादों में उलझे रहते हैं. आप अपना काम दिखाएं, प्रोफैशनल रिश्ते निभाएं और अपने मूल्यों पर टिके रहें. धीमा रास्ता अकसर टिकाऊ होता है और टिकाऊ सफलता ही असली जीत है.
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टीनऐज बेटे को डील करने का सही तरीका क्या है.
बड़ा बेटा किशोरावस्था में है और पढ़ाई में ध्यान नहीं देता. मैं (उम्र 41 वर्ष), 2 बच्चों का पिता हूं. बड़ा बेटा पढ़ाई में ध्यान नहीं देता तो गुस्से में आ कर मैं उसे डांट देता हूं, कभीकभी सख्ती भी कर बैठता हूं. बाद में गिल्टी फील होती है कि कहीं मैं उसे खुद से दूर तो नहीं कर रहा लेकिन डर भी है कि ढील देने से वह बिगड़ न जाए. सही संतुलन कैसे बनाऊं?
बच्चों की परवरिश में सख्ती और प्यार दोनों की जरूरत होती है लेकिन डर पर आधारित अनुशासन लंबे समय में रिश्तों को नुकसान पहुंचाता है. किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान ढूंढ़ रहे होते हैं, ऐसे में उन्हें समझ और मार्गदर्शन ज्यादा चाहिए.
डांटने के बजाय उस से बात करें. बेटे से पूछें कि पढ़ाई में मन क्यों नहीं लग रहा. उस की रुचियों और कठिनाइयों को समझने की कोशिश करें. सख्ती और ढील के बीच संतुलन का मतलब है स्पष्ट नियम और भावनात्मक सहारा. घर में पढ़ाई का एक तय समय, स्क्रीनटाइम की सीमा और जिम्मेदारियों की सूची होनी जरूरी है लेकिन इन नियमों के पीछे का कारण भी बच्चे को समझाएं. ‘क्यों पढ़ना जरूरी है’ यह बात डर से नहीं, उस के भविष्य के संदर्भ में समझाएं. साथ ही, उस की छोटीछोटी कोशिशों की सराहना करें. सिर्फ गलतियों पर ध्यान देने से बच्चे का मनोबल गिरता है, जबकि सराहना उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.
अपने गुस्से पर भी काम करना बहुत ही जरूरी है. जब आप को लगे कि आप नियंत्रण खो रहे हैं तो उसी पल बातचीत रोक दें, पानी पी लें, थोड़ी देर कमरे से बाहर चले जाएं. बाद में शांत मन से बात करना ज्यादा असरदार होता है. याद रखें, बच्चा आप के व्यवहार से ही भावनाएं संभालना सीखता है. अगर वह आप के गुस्से को संभालते देखेगा तो वह भी धीरेधीरे वही सीखेगा.
अंत में, हर बच्चा एकजैसा नहीं होता. तुलना करने या दूसरों की सफलता का उदाहरण दे कर दबाव बनाने से बचें. अपने बेटे की रुचियों और क्षमताओं को पहचान कर उसे दिशा दें. अनुशासन डर से नहीं, भरोसे से टिकता है. जब बच्चा यह महसूस करता है कि उस के मातापिता उस के साथ हैं, तब वह खुद को सुधारने की कोशिश जरूर करता है. - कंचन
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