Hindi Stories: प्रशांत की बेगुनाही सलाखों में कैद थी, उस के मातापिता अपमान के बोझ तले टूट चुके थे और हंसताखेलता परिवार पलभर में बिखर गया था. जब सच के पक्ष में कोई सुबूत न हो, तो न्याय की उम्मीद किस से की जाए?
‘‘अरे, मेरी बात तो सुनिए, रुकिए तो सही,’’ कहते वंदना श्रीकांत के पीछे दौड़ी लेकिन ‘‘छोड़ो मुझे, ऐसी जिंदगी से तो मौत अच्छी’’ कहते दरवाजा धड़ाम से बंद कर के श्रीकांत शर्मा घर से बाहर निकल गए.
?पति, पत्नी और बेटा प्रशांत श्रीकांत का 3 लोगों का छोटा सा परिवार था. श्रीकांत प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था. सीधासादा, नेक और प्रमाणिक. पतिपत्नी दोनों ने बेटे को भी ऐसे ही एटिकेट दे कर पाला था.
कालेज के पहले साल में पढ़ाई करने वाला प्रशांत घर से कालेज और कालेज से सीधे घर आता. न कोई व्यसन और न कोई गंदी आदत. पासपड़ोस में भी इस परिवार का सब के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार था. इन के बाजू वाले घर में भी एक छोटा सा परिवार रहता था. विजय मिश्रा और सरिता मिश्रा जिन की 12 साल की एक बेटी थी नव्या जो न बोल सकती थी, न सुन सकती थी.
दोनों परिवारों के बीच अच्छा मेलजोल था. नव्या प्रशांत को हर साल राखी बांधती, इस नाते दोनों में भाईबहन सा प्यार था. प्रशांत छोटी बहन जैसी नव्या को बहुत लाड़ करता और नव्या भी प्रशांत का बहुत आदर करती. प्रशांत अपनी पौकेट मनी से कई बार नव्या के लिए कभी चौकलेट तो कभी खिलौने ले आता जिस से नव्या खुश हो जाती.
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