Hidden Pain Of Father : दीपक का दिल त्राहित्राहि कर रहा था, जिस पिता को वह अपनी नाकामयाबी, बेरोजगारी की वजह मान कर, उन की शक्ल तक नहीं देखना चाहता था वही पिता जाते हुए भी उसे बहुतकुछ दे गए थे.
सुबह के 8 बज चुके थे. बिस्तर पर लेटा दीपक अभी भी ऊहापोह में उलझा हुआ था कि वह उठ कर बाहर चला जाए या अभी थोड़ी देर और लेटा रहे और पिताजी के घर से चले जाने के बाद कमरे से बाहर निकले.
तकरीबन 6 महीने पहले अपना अट्ठाइसवां जन्मदिन मनाने वाला दीपक अभी तक पूरी तरह से बेरोजगार था और पिताजी के रिटायर होने में एक महीने से भी कम समय बचा था. 30 से ज्यादा सालों तक ईमानदारी से नौकरी करने के बाद इस महीने के आखिर में रिटायर होने वाले पिताजी यानी राजेंद्र बाबू के रिटायरमैंट के बाद की कुल जमापूंजी महज इतनी थी कि अगर राजेंद्र बाबू के रिटायरमैंट के बाद उन की या दीपक की कमाई का कोई साधन नहीं जुटता है तो जमापूंजी से महज तीनचार महीने ही घर का खर्च चल सकता था और घरखर्च की इसी चिंता की वजह से पितापुत्र यानी दीपक और राजेंद्र बाबू में आएदिन तकरार होती रहती थी.
पिता से आएदिन होने वाली तकरार की वजह से ही सुबह 6 बजे से उठे होने के बावजूद दीपक ने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा था और लेटा हुआ इसी उलझन में उलझ हुआ था कि वह उठ कर बाहर जाए या पिताजी के औफिस चले जाने का इंतजार करे.
ऐसा नहीं था कि दीपक ने नौकरी के लिए प्रयास नहीं किए थे. पिछले सातआठ सालों में उस ने प्राइवेट या सरकारी, बड़ी या छोटी, ऐसी कोई नौकरी नहीं छोड़ी थी जिस के लिए वह क्वालीफाई करता हो और जिस को पाने के लिए उस ने हाथपैर न मारे हों लेकिन कारण भले ही सब के जुदाजुदा क्यों न हों, नतीजा सब का एक ही था- नाकामयाबी.
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